जिन्दगी में हज़ारों का मेला जुड़ा | हंस जब-जब उड़ा अकेला उड़ा
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जिन्दगी में हज़ारों का मेला जुड़ा, हंस जब-जब उड़ा अकेला उड़ा।
न वो राजा रहे न वो रानी रही, कहने सुनने को केवल कहानी रही।
चीज हर एक आनी जानी रही, न बुढ़ापा रहा न जवानी रही।
चार दिन के लिये जग झमेला जुड़ा।। हंस जब-जब.........।
ठाठ सारे पड़े के पड़े रह गये, कोठी बंगले खड़े के खड़े रह गये।
सब नगीने जड़े के जड़े रह गये, सब खजाने गड़े के गड़े रह गये।
साथ तेरे न कोई अधेला चला।। हंस जब-जब..........।
सोचले-सोचले अपने अंजाम को, भाव रस के बिना जीव किस काम को ।
भज ले-भजले साहिब के बस नाम को, छोड़ो दुनिया के झूठे जंजाल को।
नाम जपने के लिये तुझको चोला मिला।। हंस जब-जब.........।