Sahibji आरती 1
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Lyrics
आरती करहूँ संत सतगुरु की, सतगुरु सत्यनाम दिनकर की।
काम, क्रोध, मद, लोभ नसावन, मोह ग्रसित करि सुरसरी पावन।
हरहिं पाप कलिमल की, आरती करहूँ संत सदगुरु की ॥
तुम पारस संगति पारस हो, कलिमल ग्रसित लौह प्राणी भव।
कंचन करहिं सुधर की , आरती करहूँ संत सतगुरु की॥
भूलेहूँ जो जिव संगति आवें, कर्म भ्रम तेहि बाँध न पावें।
भय न रहे यम/जम घर की , आरती करहूँ संत सतगुरु की॥
योग अग्नि प्रगटहिं तिन के घट, गगन चढ़े सुरति खुले वज्रपट।
दर्शन हों हरिहर की, आरती करहूँ संत सतगुरु की॥
सहस्त्र कँवल चढ़ि त्रिकुटी आवें, शून्य शिखर चढ़ि बीन बजावें।
खुले द्वार सतघर की, आरती करहूँ संत सतगुरु की॥
अलख अगम का दर्शन पावें, पुरुष अनामी में जावे समावें।
सदगुरु देव अमर की, आरती करहूँ संत सतगुरु की॥
एक आस विश्वास तुम्हारी, पड़ा द्वार मैं सब विधि में हारी ।
जय, जय, जय गुरुवर की, आरती करहूँ संत सतगुरु की॥