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Sahibji (Hindi)

। श्री सत्गुरु वे नमः ।

सतगुरू नाम बताने वाले, आपको कोटिन प्रणाम ।।
सत्य सुमिरन-आदि सच- युगादि सच अनादि सच सुमिरन-भक्ति की शक्ती का रहस्य
सुमिरन- सच्चे परमात्मा की प्राप्ती का द्वार
सुमिरन- सच्ची मुक्ती का रहस्य
सुमिरन- सब दुखों: के अंत की शुरवात
सुमिरन- अत्मा को पाने का सत्य द्वार,
सुमिरन- परम आनंद की प्राप्ती का रहस्य
सुमिरन- परमात्मा को अपने अंदर समाने की विधी
सुमिरन- एक वैज्ञानिक रहस्य
सुमिरन- दिव्य शक्तियाँ पाने का रास्ता
सुमिरन- अत्मसाक्षात्कार कि सीढ़ी

सुमिरन से सुख होत है, सुमिरन से दुःख जाय।
कहे कबीर सुमिरन किये, साँई माँहि समाय ।।
दुःख में सुमिरन संब करे, सुख में करे ना कोय ॥
सुव में सुमिरन जो करै, दुःख काहे को होय।।
गुरु के सुमिरन मात्र से विनशत विध्न अनंत।
तासे सर्वारम्भ में ध्यावत है सब संत।।
सकल सिरोमनि नाम है, सब धरमन के माँहि
अनन्य भक्त व जानिये , सुमिरन भुले नाहि ॥
जप तप संयभ साधना, सब सुमिरन के माँहि।
कबीर जाने संतजन, सुमिरन सभ कछु नाहि ।
श्री सदगुरु चरणों में सादर अर्पण।

सतगुरु-वंदना

प्रथम बंदौं सतगुरु चरण, जिन अगम गम्य लखाइया।

ज्ञान दीप प्रकाश करि, पट खोल दरश दिखाइया।।

जिहि कारणे सिध्या पचे, सो गुरु कृपा ते पाइया।

अकह मूरति अमिय सूरति, ताहि जाय समाइया।।

पहले उन गुरु के चरण-कमलों की वंदना करो, जिन्होंने उस साहिब के दुर्गम घर में सहजता से पहुँचाकर उसका दर्शन करवा दिया। उन्होंने ज्ञान रूपी दीपक का प्रकाश करके अज्ञान के पर्दे हटा दिये और उस साहिब का दर्शन करवा दिया। जिस साहिब को खोजते-2 बड़े-2 सिद्ध मर गये, उन साहिब को गुरू की कृपा से पा उस अमृत में समा गया।

सत्ययुग सत त्रेता तप, द्वापर पूजा चार।

कलि में केवल नाम आधार, सुमिर सुमिर भव उतरो पार॥

अमर आत्मा का देश अमर लोक है। यह आत्मा वहाँ की रहने वाली है। जिस संसार में आप रह रहे हैं, यह आत्मा का देश नहीं है। यहाँ आत्मा कैद की गयी है। पूरे तीन लोक में जितनी भी आत्माएँ हैं, सब कैद हैं। वो एक अगम देश है। वहाँ की सुधि आत्मा भूल चुकी है। सद्गुरु उस अमर लोक से आत्मा को उसके अपने देश अमर लोक ले जाने के लिए आते हैं।

सद्गुरु मधुपरमहंस जी

जयासी वाटे मोक्ष पावावा।

तयाने सदगुरु करावा।

सदगुरुवाचोनी मोक्ष पावावा।

हे न घड़े कल्पांती।। — संत रामदास

आकाश पांघरोनी जग शांत झोपत्लेले। घेऊन एकतारी गातो कबीर दोहे।।

केवल लक्षणों पर मत जाना, हंसों के वेष में बहुत बगुले खड़े हैं साधू बनकर। तुम बुद्धि के घेरे में बँधकर रहोगे और बगुला तुम्हें फाँस लेगा। हृदय की सुनना मुक्त-भाव से तो सद्गुरु जरूर मिल जायेगा। सद्गुरु सदा मौजूद है। प्यासा कोई हो, सरोवर सब में मौजूद है। बस, सजग आँख और बड़ी गहरी प्यास चाहिए तो सद्गुरु को खोज लिया। उसकी आधी आध्यात्मिक यात्रा पूरी हो गई, तुम्हारा एक हाथ परमात्मा के हाथ में पहुँच ही गया। सद्गुरु से 'नाम' दान पाकर तो सुरति परमात्मा से ही मिल गई। सद्गुरु की सुरति से शिष्य की सुरति का योग (जुड़ना) ही आध्यात्मिक शक्ति है।

जिसकी आत्मा का सद्गुरु सुरति से साक्षात्कार हो गया वह तो तुरियातीत अवस्था और विज्ञान-देही से पार निकल गया। इसी सुरति- योग की 'आध्यात्मिक शक्ति' से परमपुरुष अर्थात सर्वशक्तिमान परमेश्वर से अभेद होना होता हैं।

सच्चे संत बारम्बार मानवता को चेताते रहे हैं कि इस जीवन के रहते संसार के भटकावों से निकलें और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करें। इसको जाना तो जीवन-मरण के चक्र से निकल सकोगे जो अंतिम सत्य, निजधाम है। मनुष्य योनि पाकर भी जो इसे न जान सका, वह खाली आया और खाली गया। उसने जन्म गंवाया और भिखारी की तरह मरा। कबीर साहिब से अध्यात्म का सत्य नाम पाकर धर्मदास अध्यात्म के सम्राट बन गए। इसलिए साहिब ने उनको 'धनी धर्मदास' कहा। शिष्य होकर धर्मदास ने अक्षत धन पा लिया; नाम भजन और सुरति का धन, वह जीवित रहते अमरलोक के शाश्वत रहस्य को पाकर 'आत्मा' को जानकर गाए। फिर मरना नहीं होगा केवल शरीर त्यागना होगा। फिर मृत्यु नहीं। दुनिया में सब लोग बाहर से जुड़े हैं, मृत्यु बाहर से ही तोड़ती है। जैसे ही भीतर से जुड़ गये, फिर मृत्यु हमें नहीं तोड़ सकती।

आध्यात्मिकता और धार्मिकता सद्गुरु में पूर्ण समर्पण से ही मिलेगी। समर्पण का अर्थ है 'मैं' भाव की अकड़ छोड़ना, यह भाव रखना कि अब तेरी मर्जी! जो करवाये, जैसा करवाये, तू ही करने वाला है। मैं करता नहीं हूँ, तू करता है, तेरा जीवन, तेरी मौत, तेरी हार, तेरी जीत। तेरा सौन्दर्य, तेरी कुरूपता, सब तेरा। बुरा भी तेरा, भला भी तेरा। ऊँचाई की तरफ जो चलता है, उसे अकेला हो जाना पड़ता है। भीड़ ऊँचाई पर उठने का विचार नहीं करती। भीड़ तो भीड़ है, भेड़चाल उसकी शैली है। इसीलिये पुजारी और कथावाचकों के पास अत्याधिक भीड़ इकट्ठी होती है। सन्तों के पास अकेले ही जाना पड़ता है। सारी भीड़ के साथ जाने वाला लकीर का फकीर है, आत्मज्ञानी नहीं।

आध्यात्मिकता का अर्थ होता है, अकेले जाने की सामर्थ्य। अपने पर इतना भरोसा कि अकेला भी जी सकूँगा। ऐसा व्यक्ति ही सद्गुरु को 'आध्यात्मिक शक्ति' का आधार मानता है। वह पहले अनुभव प्राप्त करता है, फिर मानता है। यह बड़े साहस का सफर है। सद्गुरु ऐसा 'सत्य' है जो शिष्य के रोम-रोम में रम जाता है। इसमें भ्रम की कोई आशंका नहीं रहती।

मिटो ताकि पा सको। 'दिल का हुजरा साफ कर, जानां के आने के लिए।' कई लोग नाम-दान के पश्चात सद्गुरु के सूक्ष्म रूप, ज्योतिर्मय स्वरूप, अथवा परमात्मा की झलक तो पाना चाहते हैं; लेकिन 'समर्पण जैसी कीमत नहीं चुकाना चाहते। फिर जो झलक मिलेगी तो वो मन के खेल की होगी। परमात्मा तो एक अनुभव है, एक स्वाद है, जो पूरे प्राण फैल जाता है, रोम-रोम में समा जाता है। यह एक अनुभूति है, जैसे प्रेम का अनुभूति होती है, ऐसी ही यह अनुभूति है।

सद्गुरु को खोजना ही 'सत्य' के मार्ग की पहली सीढ़ी है। सद्गुरु को पहचानना होगा। झूठे, उच्च वर्ण, भेष, धन, सम्पदा वाले या सुन्दर देह वालों को गुरु बनाना, 'सद्गुरु' की पहचान नहीं है। झूठे गुरु को शीघ्र त्याग कर 'सत्य' 'शब्द' के धनी सद्गुरु की शरण लेना चाहिए। शब्द का रहस्य मिलने से चौरासी का फेरा नहीं मिटता।

कबीर साहिब ने अपने जीवन काल में यह भी बता दिया था कि वे अगली बार जम्मू क्षेत्र से सत्य-भक्ति का डंका पीटते हुए भारत की ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को परा-भक्ति की राह दिखायेंगे। साहिब का शब्द है-

जम्बु द्वीप थान बैठाई। देहि पान तब पंथ चलाई।

कोटि वाणी हम तिन कहँ दीन्हा। जगत जीव कहुँ निर्भय कीन्हा॥

इसमें कोई संदेह नहीं है कि साहिब बंदगी के प्रमुख सद्गुरु मधु परमहंस जी महाराज संत-सम्राट सद्गुरु हुजूर श्री कबीर साहिब जी महाराज के ही रूप हैं।

वर्तमान में भी अतीत की वे घटनाएँ दोहराई जाने के कारण इसी सच्चाई की ओर इशारा कर रही हैं। इतिहास अपने को दोहराता है। सद्गुरु कबीर साहिब जी महाराज की तरह सद्गुरु मधु परमहंस जी महाराज को भी पाखण्डियों से भारी विरोध झेलना पड़ रहा है। पहले की भांति आज भी पाखण्डियों ने साहिब जी के साथ कई कहानियाँ गढ़ दी हैं। कुछ ने उन्हें मुसलमान बनाया है तो कुछ ने उग्रवादी, जबकि कुछ अन्य नयी कहानियाँ तैयार करने में लगे हुए हैं। पाखण्डियों ने अखनूर, खौड़, सारी आदि जगहों पर साहिब-वन्दगी के केवल आश्रम ही नहीं जलाए बल्कि सद्गुरु जी को अपमानित करने तथा कई अन्य तरीकों से उन्हें मार डालने का षड्यन्त्र भी रचा। दो बार उन्हें जहर भी दिया गया, एक बार जिन्दा जलाने का प्रयास भी किया गया, कई बार अन्य-अन्य तरीकों से मार डालने का प्रयास किया गया।

जलाता आ रहा है कुटिया कबीर की कौन!
आज भी बेशरम लगा इसी होड़ में कौन!
तलाश में निकला तो पाये कुछ चोर।
चुरा पाखण्ड जो थे बेच रहे शहर के सब ओर॥

वास्तव में इसमें किसी को क्या दोष दिया जाए, क्योंकि यह सब मन करवाता है। संसार में मन (काल-पुरुष) ने अपनी भक्ति का प्रचार किया हुआ है, वो साहिब की सच्ची भक्ति नहीं होने देना चाहता, क्योंकि वो जानता है कि यदि ऐसा हुआ, यदि जीव सच्चे संत सद्गुरु की शरण में पहुँच गये तो वे उसके चंगुल से छूटकर अमर-लोक चले जायेंगे। इसलिए हर सच्चे संत का विरोध होता आया है।

साहिब तो अपना कार्य करने के लिए आये हैं और उन्हें यह कार्य करना ही है। ये सांसारिक बाधाएँ उन्हें कैसे रोक सकती हैं......

साहिब और साहिब के संतों के कारण ही तो दुनिया के जीव कष्टों में भी सुख की नींद सो रहे हैं। निरंजन ने तो जीवों को अनेक कष्ट देने थे, पर सच्चे संत ही जीवों को इस कष्ट से बचाकर रखते हैं। सोचो, यदि संत इस संसार में अवतरित न होते तो क्या होता! फिर ऐसा ही होता-

आग लगी संसार में, झर-झर गिरे अंगार।
संत न होते जगत में, तो जल मरता संसार।।

इसलिए जब तक साहिब और साहिब के संत काल-पुरुष के देश में रहते हैं, तब तक जीव सुख और शांति का अनुभव करते रहते हैं, और जो जीव उनकी शरण में आ जाते हैं, वे कालपुरुष के इस कष्ट संसार से सदा के लिए छूटकर अपने सही घर अमर-लोक चले जाते हैं।

सुनो भक्तो

सुनो भक्तो यह साहिब हमारा, बड़ी दूर से आया है।
दुनिया जिसको खोजन लागी, गुरु रूप हम पाया है।
नहीं देखा कभी तुमने इसको, देखी इसकी काया है।
सुन पुकार हमारी यह साहिब, लेने हमको आया है।
नहीं रहता यह इस दुनिया में, अमर-लोक फरमाया है।
सच कहता हूँ समझो भक्तो, यह तो हंस अपने लेने आया है।

विश्व का एक ऐसा आध्यात्मिक संगठन जो लाभ-रहित रहकर मानव मात्र में छिपे रहस्यों को आसानी से उजागर करे, सन् 1992 में "साहिब- बन्दगी" मिशन नाम से स्थापित किया। मेरा लक्ष्य मानव मात्र को "आत्मा" और आत्मा के परमस्त्रोत (परमपुरुष-साहिब) दोनों का सच्चा ज्ञान और अनुभव कराना है। आध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में पूरी मानव-जाति इन दोनों से अनभिज्ञ है। "साहिब-बन्दगी" सत्संग के माध्यम से इस त्रिलोकी ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, शरीर, मन, देवी-देवतागण, जीवन-मरण चक्र, धर्म और धर्म पुस्तकों का भेद विश्व को बताने का लक्ष्य है।

जो गुरु गृहस्थ में रहकर अपने को संत कह रहा है, वो आपसे धोखा कर रहा है। वो कभी भी संत नहीं हो सकता है। एक संत चाहकर भी विषय नहीं कर सकता है। जो विषय आनंद ले रहा है, वो माया में फँसा है। उसे सच्चे आनंद का स्वाद अभी नहीं मिला है। फिर जो परमात्मा से मिल जाता है, वो उसी का रूप हो जाता है, उसके लिए सब बच्चे हो जाते हैं। इसलिए बाप अपनी बेटी से शादी नहीं कर सकता, उससे विषय नहीं कर सकता।

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आत्मज्ञानी सद्गुरु मधु परमहंस 'साहिब' जी

सन्त मत विचारधारा में पराभक्ति के प्रचार एवं प्रसार के लिये कबीर साहिब जी के बाद सद्गुरु मधु परमहंस 'साहिब' जी ने जितना कार्य किया उतना शायद ही किसी अन्य सन्त ने किया हो। सद्गुरु मधु परमहंस 'साहिब' जी, जिन्हें प्रेम और आदर से सभी 'साहिब जी' कहते हैं, का अवतरण 18 अप्रैल 1950 (चैत्र पूर्णिमा) को भोपाल (मध्यप्रदेश) में हुआ था। आपके पिता जी का नाम श्री ऐ.डी. बजाज था। पिताजी उच्च कोटि के विद्वान थे। आपकी माता जी श्रीमती देवीबाई बजाज एक दयालु, सहृदया, करुणा एवं ममता की मूर्ति थीं।

प्रारम्भिक जीवन

'साहिब' जी बचपन से ही एक धीर-गम्भीर, परिश्रमी व कुशाग्र बुद्धि वाले रहे हैं। जब वह चार वर्ष के थे, तभी उन्होंने कह दिया था कि वह सेना में नौकरी करेंगे। बचपन से ही वह आध्यात्मिक विषयों व परमात्मा के विषय में चर्चा किया करते थे, जिन्हें सुनकर माता व पिता हँसी व विनोद में टाल देते। उन्हें क्या मालूम था कि उनका यह लाडला सुपुत्र एक दिन अध्यात्म जगत में एक शिरोमणि सितारा बनकर चमकेगा और 'साहिब' जी के रूप में विश्व विख्यात होगा।

देश सेवा का क्षेत्र

'साहिब' जी 18 वर्ष की आयु में 18 जनवरी 1969 को महार रेजीमेण्ट (सेना) में भर्ती हो गये। उन्होंने बड़ी ईमानदारी, सूझबूझ और कर्मठता से भारतीय सेना में नौकरी की। उनके अधिकारी उन्हें कठिन से कठिन कार्य (Assignments) देते, जिन्हें वह ईमानदारी, परिश्रम व लगन के साथ पूरा करते। देश सेवा में उनकी इस लगन व कार्यकुशलता के कारण उन्हें भारतीय सेना के कई पदकों व पुरस्कारों से विभूषित किया गया। एक प्रशिक्षक (Trainer) के रूप में उन्होंने सैनिकों को प्रशिक्षण भी दिया। वह "त्वरित कार्यवाही दल" (Quick Reaction Team) के कमाण्डर भी रहे। नौकरी के दौरान उन्होंने मांस व मदिरा को हाथ से छुआ तक नहीं। 30 सितम्बर 1991 को मानवता की सेवा तथा कालपुरुष के कमाण्डर भी रहे। नौकरी के दौरान उन्होंने मांस व मदिरा को हाथ से छुआ तक नहीं । 30 सितम्बर 1991 को मानवता की सेवा तथा कालपुरुष के चंगुल से जीवात्माओं को मुक्त कराने हेतु स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली।

आध्यात्मिक क्षेत्र

14 वर्ष की आयु (वर्ष 1964) में वह चन्दापुर हवेलिया जिला गोण्डा, (उत्तरप्रदेश) में स्वामी गिरधरानन्द परमहंस जी के सम्पर्क में आये। स्वामीजी भक्ति जगत के उच्च कोटि के पहुँचे हुये सन्त थे। स्वामी जी ने उनमें पराभक्त के प्रति पूर्ण-निष्ठा एवं अदम्य लालसा को देखकर उन्हें पावन नाम दिया और अपना शिष्य बनाया। उनमें गुरु के प्रति कर्त्तव्यनिष्ठा और प्रगाढ़ विश्वास था। अतः स्वामी जी ने इनको सद्गुरु की उपाधि से विभूषित किया। कुछ ही समय में उन्हें आत्मसाक्षात्कार हो गया और उनमें अद्भुत दिव्य-ज्ञान प्रकट हुआ। अतः स्वामी जी ने अपने जीवनकाल में ही उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। नौकरी के दौरान छुट्टियों में वे अपने घर न जाकर गुरु-आश्रम आते और अपने हाथों से गुरुदेव का शयन-कक्ष व बिस्तर आदि साफ करते, अपने हाथ से भोजन बना कर उन्हें खिलाते और आश्रम में सेवा करते। जब वह गुरुदेव के पास होते, तो स्वामी जी उन्हीं से प्रवचन करवाते। स्वामी जी कहते, "तू बहुत ही प्रभावशाली और ओजपूर्ण प्रवचन करता है। तेरे प्रवचन करने का ढंग बहुत ही निराला है।" स्वामी जी ने अपने ही सामने उनसे नये शिष्यों को 'नाम-दीक्षा' दिलवाना भी शुरू कर दिया था। 'साहिब' जी का सदैव प्रयास रहता है कि अपने गुरुदेव के वचनों का अक्षरशः पालन करते रहें। इसीलिये उनके गुरुदेव ने जब भी और जो भी आज्ञा अपने जीवन काल में दी, उसका तुरन्त पालन किया और आज भी सतत पालन करते हैं। 'साहिब' जी बताते हैं कि एक बार उन्होंने अपने घर न जाने का संकल्प किया था। लगभग दस वर्षों तक घर नहीं गये थे। एक दिन गुरुदेव ने कहा, "मधु! तू अपने घर जा।" 'साहिब' जी ने बिना कुछ विचार किये अपना सामान उठाया और अपने घर चल गये। इसी प्रकार एक बार उनके गुरुदेव ने कहा कि "मधु! संगत बहुत गरीब है। वह आश्रम में आने हेतु किराये के लिए पर्याप्त रुपये पैसा नहीं जुटा पाती, जिससे संगत दर्शन व प्रवचन लाभ के लिए यहाँ तक नहीं पहुँच पाती। अतः खुद जाकर उन्हें दर्शन व प्रवचन लाभ देना। ' गुरुदेव की बात को ध्यान में रखते हुए, उन्होंने जगह जगह आश्रम बनवाये हैं और संगत को दर्शन व प्रवचन का लाभ देते हैं। ऐसी कई घटनायें वह समय- समय पर सत्संग के दौरान बताते रहते हैं। वह कहते हैं -

गुरु रीझे तो रीझे रामा, ता पीछे होड हैं सब कामा।

'साहिब' जी बाल ब्रह्मचारी हैं। वह दुनियाँ के सभी प्रकार के विषय- विकारों, विषय- आनंदों (शारीरिक व मानसिक) से दूर हैं। मन और शरीर पर उनका पूरा नियंत्रण है। वह निरन्तर छ:-छ: माह तक सोये नहीं हैं एक बार तो दो वर्ष तक नहीं सोये एवं भोजन भी नहीं खाया है।

कठोर परिश्रमी

'साहिब' जी बचपन से ही कठोर परिश्रमी रहे हैं। रोजाना 24 घण्टे में 18 घण्टे काम करते हैं और कभी थकावट नहीं महसूस करते। जो काम एक मनुष्य चार घण्टे में करता है, वह काम वह दो घण्टे में ही सम्पन्न कर देते हैं। मन और शरीर को अपना घोड़ा बनाकर रखा है। इन दोनों की बातें कभी नहीं सुनते बल्कि इन्हें अपने अनुसार चलाते हैं। छोटा-से-छोटा कार्य करने में भी झिझक नहीं महसूस करते। प्रायः संगत को अपने हाथ से भोजन बनाकर खिलाते हैं, खासकर पंथ के पर्वों-जैसे गुरु पूर्णिमा, कबीर साहिब जी एवं स्वामी गिरधरानंद परमहंस जी के अवतरण दिवस व निर्वाण दिवस आदि में आयोजित भण्डारों के अवसरों पर। वर्ष के 365 दिनों में एक भी दिन अवकाश मानकर आराम नहीं करते। आराम क्या होता है? उन्होंने आज तक जाना ही नहीं। वह अक्सर कहते रहते हैं-'आराम मन का विषय है।' रात हो दिन, सदैव एक ही धुन में रहते हैं। वह धुन है- जीवों को चैतन्य करना। वह 4- 5 प्रवचन करने के बाद रात्रि में ग्यारह बजे के उपरांत, संगत के दुख तकलीफें सुनते हैं और उनका समाधान करते हैं। आश्रम की व्यवस्थाओं आदि आप ही देखते हैं।

सभी धर्मों का आदर

'साहिब' जी सभी धर्मों का समान रूप से आदर करते हैं, जैसे हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध व जैन आदि। आपने सभी धर्मों के ग्रंथ जैसे रामायण, गीता, भागवत, वेद व शास्त्र, कुरान, बाईबिल, आदि ग्रंथ साहिब आदि का अध्ययन किया है और प्रवचन के दौरान उन ग्रंथों से उद्धरण भी देते रहते हैं। कबीर साहित्य पर उनका गहन अध्ययन है। वह भक्ति की तीनों धाराओं - सगुण, निर्गुण व पराभक्ति विधियों व विधानों में पूर्ण पारंगत हैं। पराभक्ति के स्थान पर उन्होंने सत्यभक्ति को निरूपित किया, क्योंकि वर्तमान में कालपुरुष ने कबीर साहिब के नाम पर बारह पंथ जीव को भ्रमित करने के लिए चला रखे हैं तथा ये सभी पंथ भी पराभक्ति की बात करते हैं। अतः इन बारह पंथों के प्रचार हेतु संगत भ्रमित न होने पाये, उन्होंने पराभक्ति के स्थान पर सत्यभक्ति को स्थापित किया।

सगुण भक्ति धारा

साहिब जी कहते हैं कि भक्ति का प्रारम्भिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए सगुण भक्ति का मानना उचित है। जैसे एक शिशु को शिक्षा के शुरुआती दौर में वर्णमाला - अ, आ, क, ख, ग आदि पढ़ाया जाता है। इसीलिए वह सगुण भक्ति धारा को भक्ति क्षेत्र की प्रारम्भिक पाठशाला मानते हैं। 'साहिब' जी सभी तीर्थ स्थानों में गये हैं। 'साहिब' जी कहते हैं कि ये सभी देवी-देवता विद्यमान हैं, काल्पनिक नहीं हैं।

सत्यभक्ति

'साहिब' जी सत्यभक्ति की धारा के पोषक हैं। वह कहते हैं कि जीव आदिकाल से ही सांसारिक विषय वासनाओं का शिकार है। मन और माया के चंगुल में फँसा है, अतः वह अपनी कमाई से इनके चंगुल से मुक्त नहीं हो सकता। वह इस चंगुल से सद्गुरु की कृपा से ही छूट कर संसार-सागर से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। 'साहिब' जी ने भक्ति की इस धारा को भक्ति क्षेत्र का उच्च कॉलेज, जैसे डिग्री कॉलेज अथवा विश्वविद्यालय का दर्जा दिया है। जैसे एक डिग्री कॉलेज अथवा विश्वविद्यालय में विशिष्ट विषयों पर बहुत गहन एवं विस्तार से पठन-पाठन किया जाता है, इसी तरह से इस भक्ति धारा में साधक भक्ति क्षेत्र के उच्च स्तर का ज्ञान प्राप्त करता है। जाता है, इस तरह से इस भक्ति धारा में साधक भक्ति क्षेत्र के उच्च स्तर का ज्ञान प्राप्त करता है। इसी धारा के अन्तर्गत 'साहिब' जी ने 'साहिब बन्दगी' पंथ की स्थापना की है।

'साहिब बन्दगी' पंथ

जैसा कि ऊपर स्पष्ट किया जा चुका है कि कलियुग में जीव अपनी दूषित प्रवृत्तियों के कारण अपने स्वयं के प्रयास से संसार-सागर से मुक्त नहीं हो सकता, बल्कि एक सद्गुरु की कृपा से ही यह कार्य संभव है। सद्गुरु की सुरति में विशेष गुण होता है। वह अपनी सुरति में परमात तुत्व लाकर 'नाम दीक्षा' देते समय शिष्य के भीतर उसकी सुरति में छोड़ते हैं, जिससे शिष्य की आत्मा चैतन्य हो जाती है। यही नामदान कहलाता है। इसी प्रक्रिया को आध्यात्मिक आनुवांशिकी (Spiritual Genesism) और सन्तमत धारा में 'भृंगमता' भी कहते हैं। साहिब बन्दगी पंथ में शिष्यों को सात नियम बताये जाते हैं जिनका पालन करना अनिवार्य है। ये नियम इस प्रकार हैं:

  1. सत्य बोलना;
  2. नशा न करना;
  3. मांस न खाना;
  4. परस्त्रीगमन न करना;
  5. हक की कमाई खाना;
  6. चोरी न करना व चोरी का सामान न खरीदना;
  7. जुआ न खेलना।

'साहिब' जी कहते हैं कि सद्गुरु से वास्तविक पवित्र सजीवन नाम प्राप्त करने के पश्चात, शिष्य में उक्त नियमों को पालन करने की शक्ति स्वयंमेव आ जाती है। वह कहते हैं कि उनकी पारस सुरति शिष्य में बदलाव अवश्य लाती है। करने की शक्ति स्वयंमेव आ जाती है। वह कहते हैं कि उनकी पारस सुरति शिष्य में बदलाव अवश्य लाती है, क्योंकि वह जो वस्तु 'नाम' देते हैं, वह परमपुरुष के यहाँ से आया है। वो इन तीनों लोकों में प्राप्य नहीं है। इसीलिए वह कहते हैं कि "जो वस्तु मेरे पास है, वह ब्रह्माण्ड में कहीं भी नहीं है। मैं इसे कोई घमण्ड से नहीं कह रहा हूँ, यह वास्तविकता है।" 'नाम दान' के समय एक सद्गुरु तीन कार्य करता है -

(1) मन और आत्मा का विलगिकरण कर देता है।
(2) हृदय प्रकाशित कर देता है।
(3) एक शक्ति शिष्य के अंदर बैठा देता है जो उसकी बराबर सुरक्षा करती है और उसका पग-पग पर मार्गदर्शन करती है।

साहिब यह भी कहते हैं कि "मैं अपने अनुभव से बता रहा हूँ कि नाम-दान के बाद एक नहीं, लाखों शिष्यों में बदलाव आया है। उन्हें अब चोरी, ठगी, धोखाधड़ी, बेईमानी इत्यादि नहीं भाती है। अब उन्हें मन और माया के द्वारा फैलाये हुये विषय विकार अच्छे नहीं लगते हैं, काग पलट हँसा कर दीना।" नाम की शक्ति शिष्यों को (जीवों को) संसार-सागर से पार कर देगी। इस पथ में उपासना का केंद्र बिन्दु सद्गुरु है, अर्थात शिष्य को अपने सद्गुरु का, विश्वास और श्रद्धा के साथ ध्यान व भजन करना है। उसकी भक्ति का केन्द्र केवल सद्गुरु है और उसके इसी विश्वास व श्रद्धा के आधार पर सद्गुरु उसे (शिष्य को) मन और माया के जाल से छुड़ाकर, अपनी कृपा से संसार-सागर से मुक्ति दिला देते हैं। फिर शिष्य 84 लाख योनियों में नहीं फँसता। यही सहज मार्ग है।

सच्चे सेवक

मध परमहंस 'साहिब' जी अपने को केवल सेवक मानते हैं। बचपन में माता-पिता व परिवार की सेवा की। वर्ष 1969 से देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए ईमानदारी और कठोर परिश्रम के साथ देश की सेवा की। वर्ष 1970 से जीवों को कालपुरुष के चंगुल से मुक्त करने हेतु संगत को चैतन्य कर रहे हैं। उनकी एक ही ख्वाहिश है कि कालपुरुष के मायाजाल से अधिक से अधिक जीवों को निकाल कर अमरलोक ले जायें, क्योंकि युगों से जीव, काल-निरंजन के लोकों में बिना अपनी किसी त्रुटि के असहनीय कष्ट भोग रहा है। वह प्रतिमाह लगभग 15000 किलोमीटर की कठिन यात्रा करते हैं, जिसमें जम्मू और कश्मीर की दुर्गम घाटियों की क्लिष्ट यात्रा भी शामिल है। इस यात्रा के दौरान वह लगभग सभी आश्रमों पर पहुँचने का प्रयास करते हैं और वहाँ पर संगत को दर्शन व प्रवचन का लाभ देकर सभी में आध्यात्मिक ऊर्जा प्रवाहित करते हैं। वह कहते हैं कि ''सद्गुरु का दर्शन'' करके जीव को ऊर्जा बराबर मिलती रहती है जो कालपुरुष के प्रभाव को नियंत्रित करने में सहायक होती है इसीलिये जितना अधिक से अधिक हो सके, सद्गुरु का दर्शन करना चाहिएसत्संग प्रवचन करना उनका नित्य कर्म है। 4-5 सत्संग-प्रवचन प्रतिदिन करके (प्रत्येक प्रवचन लगभग डेढ़ से दो घण्टे का होता है) कभी थकते नहीं हैं तथा जो भी प्रवचन करते हैं वह अपनी अनुभूति व आत्मज्ञान पर आधारित होता है, किसी धर्म पुस्तक अथवा शास्त्र को पढ़कर नहीं।

माँ की तरह संरक्षण व स्नेह

साहिब जी अपने शिष्यों को एक माँ की तरह पूर्ण संरक्षण व स्नेह देते हैं। वह यह भी कहते हैं कि "एक माँ तो कभी-कभी गुस्से में अपने बच्चों से नाराज होकर उन्हें झिड़क देती है परन्तु मैं ऐसा कभी नहीं करता। यदि मैंने संगत को झिड़की देकर उसे संरक्षण व प्यार देना बंद कर दिया, तो फिर कालपुरुष की जीत हो गई, क्योंकि कालपुरुष तो चाहता ही है कि एक भी जीव सत्यभक्ति में न जाने पाये।" (सत्यभक्ति में जाकर जीव सत्यलोक पहुँच जायेगा और कालपुरुष के चंगुल से छूट जायेगा)। चाहे जितना शिष्य लापरवाह हो जाय, फिर भी साहिब जी उससे नाराज नहीं होते, बल्कि उसे आध्यात्मिक ऊर्जा देकर उसका आत्म कल्याण करते हैं।

एक कुशल वैद्य

साहिब जी को रोगों की बहुत अच्छी पहचान है। वह रोगी की आँखों को देखकर, उसके रोग की पहचान कर लेते हैं। स्वास्थ्य रक्षा एवं रोगों के उपचार पर उन्होंने छः पुस्तकें लिखी हैं। वे हैं - [1] सेहत के लिए जरूरी, [2] रोगों से छुटकारा, [3] रोगों की पहचान, [4] आयुर्वेद का कमाल रोगों के निदान में, [5] सेहत संजीवनी व [6] रोग निवारक। उनका खीरा, मूली व पपीता का सुबह का नाश्ता स्वास्थ्य के लिये बहुत गुणकारी है। आश्रम में उनके निर्देशन में बना हुआ च्यवनप्राश, हर्बल चाय व गैस हरण चूर्ण बहुत प्रभावी हैं। इन सभी उत्पादों में चुनी हुई विशेष जड़ी-बूटियाँ डाली जाती हैं। गैस हरण चूर्ण बहुत प्रभावी हैं। इन सभी उत्पादों में चुनी हुई विशेष जड़ी-बूटियाँ डाली जाती हैं। कश्मीर की घाटियों में उपलब्ध शुद्ध शहद भी आश्रमों में उपलब्ध है। ये सभी उत्पाद लागत से कम मूल्य में संगत को प्राप्य हैं। एड्स (AIDS) की अचूक दवा उनके पास है। बहुत से रोग जैसे कमर दर्द, नसों व नाड़ियों का दर्द आदि रोगी को योगासन करवा कर वे तुरन्त ही ठीक कर देते हैं। वह सदैव प्रज्ञावस्था में रहते हैं, जिसके कारण मन और शरीर के कष्ट उन्हें नहीं सताते।

साहिब जी के उपवास करने का तरीका बड़ा ही वैज्ञानिक है। जो व्यक्ति उस विधि विधान से उपवास करते हैं, उन्हें पेट के रोग कभी हो ही नहीं सकते। वह स्वयं योगासन व व्यायाम करते हैं और संगत को भी यही करने की सलाह देते हैं। उनकी दिनचर्या बहुत नियमित व नियंत्रित है। इसीलिए वह अक्सर कहा करते हैं कि मैं कभी भी बूढ़ा नहीं होऊँगा। खानपान - साहिब जी का खानपान बहुत सादा व बहुत नियंत्रित है। वह बहुत ही नपातुला भोजन करते हैं - एक बार में १६ निवाले बस। भोजन में मिर्च व मसाला व खटाई बिलकुल ही नहीं व नमक की मात्रा नाममात्र की होती है। भोजन में स्वाद से उन्हें कोई मतलब नहीं है। पहनावा - उनका पहनावा बहुत ही सादा है। वह प्राय: सफेद कुर्ता पायजामा और जाड़े में सफेद स्वेटर पहन लेते हैं।

आडम्बर से दूर

साहिब जी बाहरी दिखावे से बहुत दूर रहते हैं। वह शरीर पर कोई भी अलंकरण धारण नहीं करते - गले में फूल मालायें नहीं, सोना अथवा अन्य कोई आभूषण नहीं, माथे पर तिलक नहीं, लम्बी-दाढ़ी व न लम्बी जटायें, उंगलियों व हांथों में कोई अलंकरण नहीं। उनके सादगीपूर्ण पहनावे को देखकर नवागन्तुक साहिब जी को नहीं पहचान पाते। उन्हें देखकर शायद ही कोई कहेगा कि वह एक विलक्षण प्रतिभा से विभूषित ब्रह्माण्ड में एकमात्र सद्गुरु हैं। वह कभी भी सुरक्षा गार्ड नहीं चाहते।

पाककला विशेषज्ञ

लंगर का भोजन साहिब जी के करकमलों द्वारा ही आहार-विशेषज्ञ की भाँति ही तैयार किया जाता है। आश्रमों में संचालित किये जा रहे लंगर में स्वादिष्ट, पौष्टिक, भोजन बनाने का कार्य भी साहिब जी के दिशा- निर्देशन में होता है। लंगर में मौसम के अनुसार फल, सलाद, अचार, तेल-घी की मात्रा आदि के उपयोग से आहार-विशेषज्ञ की भाँति पाककला में 'साहिब' जी की निपुणता की झलक मिलती है।

संगीत कला में निपुण

मधु परमहंस 'साहिब' जी संगीत कला की दोनों विधाओं में बहुत निपुण हैं। वह भजन बहुत ही सुरीली लय में गाते हैं। कौन-सा राग, किस मौसम अथवा दिन के किस पहर में गाना चाहिये, यह उन्हें विशेषज्ञ की भाँति ज्ञान है। उनके गाने की लय व तान इतनी सुरीली और मधुर होती है कि उस समय सम्पूर्ण वातावरण ही संगीतमय हो जाता है। उन्हें सभी वाद्य यंत्रों विशेषकर तबला व ढोलक बजाने का विशेष ज्ञान है। वह कविता की रचना भी कर लेते हैं।

मन के विशेषज्ञ

मधु परमहंस 'साहिब' जी ने मन को साक्षात देखा है। अपनी एक पुस्तक में उन्होंने इसका विवरण दिया है। वह कहते हैं कि नाम प्राप्ति के बाद ''मैं भजन करने लगा, क्योंकि गुरु का इसके लिए आदेश था। सुमिरन करते-करते, जब मैं एकाग्र हुआ, तो कोई मुझे व्यवधान डालने लगा। उन्होंने पाया कि मैं भजन करना चाहता हूँ और कोई व्यवधान डाल रहा है! अतः यह जानने की मुझे उत्सुकता हुई। जब मैं और एकाग्र चित्त से सुमिरन करने लगा, तो जिन-जिन चीजों से व्यवधान पड़ रहा था, वे साफ-साफ दिखाई पड़ने लगीं। इसी बीच मैं ''नाम शब्द'' को बराबर पकड़े रहा, जिसके कारण मैं विचलित नहीं हुआ। अभी तक मुझे वह दिखाई नहीं पड़ा, जो मुझे विचलित कर रहा था। अब मैं और एकाग्र हो गया तो मैंने देखा कि मुझे भूख-प्यास विचलित कर रही है, अतः मैंने पक्का संकल्प करके भोजन ग्रहण करना छोड़ दिया। मैंने सोचा कि मैं तो आत्मा हूँ। आत्मा को खाने-पीने की जरूरत ही नहीं है। मैं पुन: एकाग्र हुआ। अब मुझे लगने लगा कि कोई आदेश आया कि सो जाओ, वरना कमजोर हो जाओगे। अब मैंने सोना भी छोड़ दिया और खाना भी छोड़ दिया। केवल सुमिरन करता रहा और एक भी श्वाँस बिना सुमिरन के नहीं छोड़ी। मैं अब सुषुम्ना में आ गया। इस अवस्था में लगातार छ: माह तक रहा, तो मुझे आदेश देने वाला साफ नजर आने लगा कि वह किस तरह बोलता है और किस बिन्दु पर बैठा है। राह तक रहा, तो मुझे आदेश देने वाला साफ नजर आने लगा कि वह किस तरह बोलता है और किस बिन्दु पर बैठा है। 'यह मन ही था' मैंने उसे हरकत नहीं करने दी और मैं संसार की सभी वस्तुओं से समग्र रूप से अलग हो गया। इसी बिन्दु पर मुझे परम आनन्द की अनुभूति हुई। आत्मानुभूति होने के दौरान मन के रहने के स्थान व उसके द्वारा की गई विभिन्न क्रियाओं को स्पष्ट रूप से जानने के कारण ही मन के कार्य करने के तौर-तरीकों व उन्हें नियंत्रित करने के विभिन्न उपायों पर ''साहिब जी'' अपने प्रवचन के दौरान संगत से चर्चा करते रहते हैं। अपनी पुस्तकों में भी उन्होंने इस विषय पर विस्तार से चर्चा की है, जो पालन करने योग्य है।

आँखें करिश्माई हैं

मधु परमहंस 'साहिब' जी की आँखें करिश्माई हैं। आँखें बहुत गम्भीर और दिव्य तथा आध्यात्मिक ज्ञान से पूर्ण हैं। वह एक पल में शिष्य के मनोभावों को पढ़ लेते हैं। वह इन्हीं के द्वारा अपनी दिव्य कृपा संगत पर बरसाते रहते हैं। उनके सानिध्य में रहने पर जिस अनोखे आनन्द की अनुभूति होती है, उसका वर्णन करना कठिन है। केवल अनुभव करने वाला ही जानता है, परन्तु कह नहीं सकता। वह कहते हैं कि आर्टिस्ट उनके शरीर के सभी अंगों का चित्र बना सकता है, परन्तु आँखों का चित्र नहीं उकेर सकते। वह इसका कारण यह बताते हैं कि ''आँखों में ही मेरा वास है।''

सन् 1970 में भारतीय सेना की सेवा में रहते हुए अपनी जीवंत-मूर्ति से मैंने जिस व्यक्ति को 'नामदान' दिया, उसका नाम था नीर सिंह राठौर। दीक्षा देने के बाद मैंने नीर सिंह को कहा कि नीर सिंह इस दुनिया में सबसे बड़ा पंथ अगर कोई है तो वो तुम्हारा पंथ है। मेरी बात सुनकर नीर सिंह मुस्कुराया और बोला, यह आप क्या कह रहे हैं? गुरुदेव! आपका न तो कोई पंथ है, न कोई संगत है और न ही आपके भक्ति-मार्ग को कोई जानता है; मैं ही पहला ऐसा व्यक्ति हूँ जिसने आपको गुरु धारण करके आपसे 'नाम दीक्षा' प्राप्त की है। मैं आपका इकलौता सत्संगी हूँ और आप मुझ से कह रहे हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा पंथ मेरा है। मैंने कहा - 'नीर सिंह देखते चलो, साहिब तुम्हें खुद ही हमारी कही हुई बात पर भरोसा करवा देगा। जो वस्तु हमने तुम्हें दी है, वो वस्तु ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है। हमारे कहने का अभिप्राय यह है कि एक सच्चा गुरु कभी मजाक में भी झूठ नहीं बोलता है, चाहे कोई माने या न माने।"

दुर्लभ मानुष जनम है

दुर्लभ मानुष जनम है, मिले न बारम्बार।
पक्का फल ज्यों गिर पड़ा, बहुरि न लागे डार॥

मानव तन प्रकृति की अनुपम कृति है। शास्त्रों में इसे ८४ लाख योनियों में सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। समाज शास्त्रियों ने सभी जीवों की, उनकी श्रेष्ठता के आधार पर जो वंशावली बनाई है, उसमें मानव को ही सबसे ऊपर स्थान दिया है। इसके कारण बताये गये हैं। इनमें सबसे प्रमुख कारण यह है कि मनुष्य भोग कर्म करने के साथ-साथ क्रियात्मक कर्म करने हेतु भी बनाया गया है, जबकि अन्य योनियों के जीव केवल भोग करने हेतु ही बनाये गये हैं। दूसरा कारण यह है कि अन्य योनियों के जीवों में विवेक बुद्धि नहीं है, जबकि मनुष्य में विवेक बुद्धि है। अन्य योनियों के जीवों में विवेक बुद्धि न होने के कारण वे आज भी उसी स्थिति में हैं, जिस स्थिति में वह पहले थे। उनकी दैनिक जीवनचर्या में कोई परिवर्तन नहीं आया है जैसे पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े आदि। ये जीव जिस तरह सदियों पूर्व जीवन-यापन करते थे, आज भी उसी प्रकार से जीवन-यापन कर रहे हैं। ये जीव केवल तीन कार्यों में ही जीवन पर्यन्त रत रहते हैं। पेट भरना, अपनी सुरक्षा करना व प्रजनन करना ही इनके समस्त कार्य हैं। इसके अतिरिक्त वे कोई अन्य कार्य नहीं करते।

इसके विपरीत मनुष्य इन भोगवादी क्रियाओं के अतिरिक्त सृजनात्मक कार्य भी अपनी विवेक-बुद्धि की सहायता से जीवन पर्यन्त करता रहता है। इसी विवेक बुद्धि ने उसे बहुत महत्वाकांक्षी बना दिया है, जिसके कारण आज के मनुष्य ने विभिन्न क्षेत्रों में बहुत उन्नति की है। बड़े- बड़े वैज्ञानिक शोध किये हैं। शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी तरक्की की है। आर्थिक जगत में उन्नति के नये आयाम छुए हैं। युद्ध के लिए अत्याधुनिक अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण किया है, जिसके फलस्वरूप अब दुश्मन को परास्त करने के लिए युद्ध की आवश्यकता ही नहीं रह गई है, बल्कि एक विनाशकारी विस्फोटक बम को अपने ही स्थान से हजारों मील दूर दुश्मन के महत्वपूर्ण ठिकानों पर गिराकर उन्हें नष्ट कर सकता है। आवागमन व दूरसंचार के क्षेत्र में अभूतपूर्व तरक्की की है। यही स्थिति मनोरंजन संसाधनों के क्षेत्र में भी है। इतना ही नहीं, उसने अपने जीवनयापन के संसाधनों का विकास एवं विस्तार किया है। अपनी बौद्धिक शक्ति का उपयोग करके उसने विभिन्न प्रकार की सुख सुविधाओं की वस्तुयें एकत्र कर ली हैं, जिनका उपयोग करके वह बहुत संतुष्टि का अनुभव करता है और मानसिक रूप से तृप्ति महसूस करता है। आज वह अपनी लगभग सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करके अपने को धन्य मानता है, परन्तु इतनी अधिक प्रगति एवं सुख-सुविधाओं का उपभोग करके भी जब वह दूसरों को अपने से अधिक धन सम्पन्न व वैभवशाली पाता है तो उसे स्वयं में कमियां ही कमियां दिखाई पड़ती हैं, जो उसे स्वार्थी और ईर्ष्यालु बना देती हैं। अब वह और अधिक धन कमाने के लिए सोचने लगता है और गलत रास्ते, जैसे चोरी, ठगी, बेईमानी, जालसाजी आदि हथकण्डों को भी अपनाने लगता है। इस प्रकार वह अकूत धन सम्पत्ति तो एकत्र कर लेता है परन्तु उसे संतोष फिर भी प्राप्त नहीं होता। यदि उससे पूछा जाय कि अपने इस अकूत धन, सम्पत्ति और सुख सुविधाओं का उपभोग करके क्या वह वास्तव में सुखी है? क्या वह संतुष्ट है? क्या उसका अंतःकरण तृप्त है? तो वह इनके उत्तर 'नहीं' में ही देगा। कहने का अभिप्राय यह कि मन द्वारा उत्पन्न की गई इच्छाओं की पूर्ति के पश्चात भी, उसके मन में अतृप्ति विद्यमान है। भौतिक अथवा बाह्य रूप से तृप्त होते हुये भी अंदर से अतृप्त है जिसके कारण समाज में हिंसा और अत्याचार आदि व्याप्त है। उसमें बाह्य रूप से चमक विद्यमान है, परन्तु अन्तःकरण प्रकाश की किरणों से विहीन है। पश्चिमी देशों में व्याप्त हिंसा, व्याभिचार व आत्महत्यायें इसी असन्तोष व नैराश्यता का परिणाम है, जहाँ समाज में १० वर्ष की उम्र के छोटे-छोटे बच्चे बन्दुक व पिस्तौल से किसी की भी हत्यायें तक कर डालते हैं।

समाज में व्याप्त इसी असंतोष व नैराश्यपूर्ण वातावरण को देखकर एक जिज्ञासु, भगवान् महावीर स्वामी के पास गया। उसने स्वामी जी से पूछा कि हे प्रभु! मनुष्य के पास आज सुख-सुविधाओं के असीमित साधन हैं और वह उन साधनों का भरपूर उपयोग भी कर रहा है। फिर भी वह सन्तुष्ट नहीं है। वह नैराश्यता से पूर्ण है, जिससे समाज में अशान्ति का वातावरण है, चारों ओर भय ही भय व्याप्त है। इसके क्या कारण हैं?

इस प्रश्न का समाधान देने हेतु स्वामी जी उस जिज्ञासु को लेकर एक नदी के पास गये। उन्होंने जिज्ञासु को एक लोटा दिया और कहा कि इसे नदी में डाल आओ। जिज्ञासु नदी के किनारे गया और लोटे को नदी में दूर फेंक दिया। कुछ देर तक वह लोटे को नदी के पानी में उतराता हुआ देखता रहा। उसने देखा कि अंत में वह लोटा उतराता हुआ नदी के दूसरे किनारे पहुँच गया। वह स्वामी जी के पास वापस आया और बताया कि लोटा थोड़ी दूर पानी में उतराता रहा और बाद में उतराता हुआ वह नदी के दूसरे किनारे पहुँच गया। तदोपरांत स्वामी जी ने उसे दूसरा लोटा दिया और कहा कि इसे भी नदी में डाल आओ। इस लोटे की तली में एक छेद था। इस लोटे को भी उसने नदी में दूर फेंक दिया। वह देखता है कि लोटा थोड़ी दूर तक तो पानी में उतराता रहा, परन्तु कुछ समय पश्चात लोटे को तली में बने छेद से पानी उसमें भर गया और वह नदी में बीच धारा में डूब गया। उसने वापस आकर पुनः स्वामी जी को बताया कि दूसरा लोटा थोड़ी दूर तक पानी में उतराता रहा और उसके बाद वह बीच में ही पानी में डूब गया। अब स्वामी जी ने उसे बताया कि जो लोटा पानी में डूब गया उसकी तली में छेद था, जिसके कारण छेद से नदी का पानी लोटे में भर गया और वह पानी में डूब गया। इसके विपरीत पहले लोटे की तली में कोई छेद नहीं था। अतः उसमें पानी नहीं भरा और वह पानी में उतरता रहा। फिर धीरे-धीरे उतराता हुआ नदी के दूसरे किनारे पहुँच गया।
इसी प्रकार मनुष्य में बहुत-सी महत्वाकांक्षायें भरी हुई हैं। मन में हर पल
कोई न कोई इच्छा जन्म लेती रहती है, जिनको पूरा करने के लिए मनुष्य
बराबर प्रयासरत रहता है। इन इच्छाओं के कारण ही वह काम-क्रोध-
लोभ-मोह व अहंकार आदि बुरी प्रवृत्तियों से पीड़ित है। मनुष्य का मन
छेद और उसमें व्याप्त ये बुरी प्रवृत्तियाँ लोटे में आये पानी के समान हैं, जो
शरीर को सदैव बोझिल किये हुये हैं और यह बोझा इतना भारी है कि
शरीर रूपी लोटा नदी रूपी भवसागर में तैर नहीं पाता और भव सागर की
मझधार में ही डूब जाता है। इसके विपरीत यदि मनुष्य के मन में उपरोक्त
बुराइयाँ न होतीं तो उसका मन विकार रहित होता, किसी अन्य के प्रति
मन में विद्वेष न होता, ईर्ष्या न होती, काम-क्रोध आदि बुरे मनोभाव न
होते तो मन शान्त होता व शरीर हल्का होता। फलस्वरूप वह पहले लोटे की तरह सद्गुरु की कृपा से संसार सागर से पार हो जाता है।

उन्होंने उसे आगे बताया कि मनुष्य इसी प्रकार जीवन पर्यन्त इन्हीं
दुष्प्रवृत्तियों में फँसा रहता है। वह अपने व अपने परिवार के लिये जीवन
पर्यन्त अधिक से अधिक सुख-सुविधाओं के साधन एकत्र करता रहता है
और रात दिन इसी उधेड़बुन में फँसा रहता है। इसी पशोपेश में व्यस्त रहने
के कारण कब उसका बहुमूल्य जीवन व्यतीत हो गया, उसे पता ही नहीं
चल पाता? यहाँ तक कि अन्त में इस संसार से चलने की बारी आ जाती
है। अब वह मृत्यु शैय्या में पड़ा हुआ है। उसका वही शरीर व मन, जो
कुछ समय पहले तक सांसारिक कार्यों को करने में व्यस्त था, जो झूठ-
ठगी व बेईमानी करने में लगा हुआ था अब असहाय दिखाई पड़ रहा है,
कुछ भी नहीं कर पा रहा है। यह घटना हर एक के साथ होती है, परन्तु
अन्त समय तक किसी को कुछ भी नहीं समझ में आता और जब यमराज
के दूत अपने भयंकर भेष में सामने खड़े दिखाई पड़ते हैं, तो सम्पूर्ण जीवन
का लेखा-जोखा याद आने लगता है और पछताता है कि उसने जो कुछ
किया, वह अपनी दुष्प्रवृत्तियों के वशीभूत होकर किया, अपने आत्म-
कल्याण के लिये तो कुछ किया ही नहीं। किसी सद्गुरु के चरणों में
बैठकर उनकी कृपा तो प्राप्त ही नहीं की। सभी कुछ केवल सांसारिक-
स्वार्थ की पूर्ति के लिए किया। वह समझता है कि अब कुछ भी नहीं हो
सकता। बहुत देर हो गई है। "का वर्षा जब कृषि सुखाने समय चूकि
पुनि का पछताने।"

मृत्यु शैय्या पर पड़ा-पड़ा वह कभी अपनी धन सम्पत्ति के विषय
में सोचता है, तो कभी कुटुम्ब सम्बन्धियों, जोकि सामने खड़े हैं, को
बेबस निहारता है। यही करते-करते उसके प्राण पखेरू उड़ जाते हैं और
कर्मानुसार दूसरा जन्म धारण कर लेता है। जीवन मरण का यह चक्र जीव
के साथ करोड़ों वर्षों से चल रहा है और मनुष्य संसार सागर में सदियों
से डूबता-उतराता रहा है। इस प्रकार उसका मनुष्य जन्म व्यर्थ ही चला
गया। कबीर साहिब जी कहते हैं -

रात गँवाई सोय कर, दिवस गवाया खाय।
हीरा जनम अमोल था, कौड़ी बदले जाय।।

सद्गुरु मधु परमहंस जी कह रहे हैं कि माँ के उदर में गर्भ के दौरान
रहना, जन्म धारण करना व मृत्यु का वरण करना बहुत दुखदायी है। जब
जीव माँ के उदर में होता है, तो उसे माँ के उदर में व्याप्त गर्मी को सहना
पड़ता है। फिर गर्भ की थैली के पास मलमूत्र की थैलियाँ भी होती हैं, जो
भयंकर बदबू देती हैं, उस बदबू से रूबरू होना पड़ता है। माँ के पेट से
जन्म लेते समय गर्भद्वार से निकलते वक्त भयंकर कष्ट होता है। इसीप्रकार
मृत्यु के समय भी जीव को बहुत कष्ट होता है। यदि आपकी कोई प्रिय
वस्तु जैसे कमीज पेन्ट आदि खो जाय तो बड़ी तकलीफ होती है, फिर
मृत्यु के समय तो उसके सभी सामान जैसे घर, द्वार, रुपया-पैसा, संग
सम्बन्धी आदि सभी एक साथ छूट जाते हैं, तो इस बिछड़ने से तो और भी
अधिक कष्ट का वह अनुभव करता है। "पुनरपि जन्मं, पुनरपि मरणं, जननी जठरे दुखम् दुखम्।" साहिब जी कह रहे हैं कि इधर उसे अपनी
सम्पूर्ण सम्पत्ति व धन एवं परिवार से बिछूड़ जाने का दु:ख, उधर यमराज
का खौफ। यह सभी उसे इतना भयंकर कष्ट देते हैं, जितना कि एक हजार
विच्छुओं द्वारा एक साथ डंक मारने से होता है। उसके प्राण इन्हीं सब में
अटके रहते हैं। इस स्थिति में, जब उसकी मृत्यु होती है, तो जहाँ उसके
प्राण मृत्यु के समय अटके हैं, उसी रूप में उसका पुनर्जन्म होता है "अन्त मता सा गता।" तात्पर्य यह है कि मनुष्य जन्म का लाभ नहीं ले पाया।
नानक देव जी कहते हैं कि यह मनुष्य कई बार कीट पतंगा बन चुका है,
कई बार हाथी, मछली, पक्षी, सर्प व वृक्ष आदि के रूप में जन्म लिया।

सद्गुरु मधु परमहंस जी कहते हैं कि 84 लाख योनियों में चक्कर
लगाने के पश्चात उसे मानव देह प्राप्त हुई थी और इसी तन के बाद
परमपुरुष से मिलने की बारी थी। फिर केवल मानव तन ही परमपुरुष को
प्राप्त कर सकता है अन्य योनियों के जीव नहीं। यहाँ तक कि देवता भी
नहीं। अतः यदि मानव शरीर प्राप्त करने के बाद भी, किसी सद्गुरु की
छत्रछाया में बैठकर, परमपुरुष से लौ नहीं लगाई, तो उसे 84 लख
योनियों में चक्कर लगाने के बाद ही मिल सकती है जिसमें 3 करोड़ वर्ष
लगेंगे, परन्तु यह भी जरूरी नहीं कि उसे पुन: मानव योनि प्राप्त हो ही
जाय। इसीलिये मनुष्य तन पाना बहुत दुर्लभ बताया गया है जो बार-बार
नहीं मिलता जैसे एक पका हुआ फल जब डाल से टूट कर नीचे गिरता है,
तो दुबारा वह पेड़ पर नहीं लग सकता।

साहिब जी कहते हैं कि मनुष्य भ्रमवश सांसारिक विषय-वासनाओं
में सुख ढूंढ रहा है, जबकि यह शरीर तो धोखा है। यह तो हाड़-मांस का
एक जीता हुआ पुतला है। इसे सुन्दर व कमनीय देखना केवल उसकी
आँखों का करिश्मा है, अन्यथा कुछ नहीं है, केवल भ्रम है और उसका
अज्ञान है बस। जो कुछ भी आँखों से दिखाई पड़ रहा है, कानों से सुनाई
पड़ रहा है, आदि आदि सब कुछ धोखा है। यह शरीर पाँच तत्वों - पृथ्वी,
आकाश, जल, अग्नि और वायु से बना है "क्षिति जल पावक गगन समीरा।" ये सभी नाशवान हैं। तो फिर इससे मोह करना भी धोखा है।
स्वयं सांसारिक मोह भी धोखा है, इस शरीर में निवास कर रहे काम-क्रोध-लोभ-मोह व अहंकार आदि भी उसे गर्त में ले जाने वाले हैं। फिर भी भ्रमवश वह सोचता है कि इस दुनिया में आये हैं तो जीभर मजा लूट
लो। अगले क्षण क्या होने वाला है, किसी को कुछ भी ज्ञात नहीं है "यह जग मीठा, अगला किन दीठा।" अतः इन्द्रियों के सुख को लूट लो।
यही सब कुछ है, जबकि वास्तविकता यह नहीं है। वास्तविकता तो यह है
कि इन सांसारिक भोगों का मजा लेना मनुष्य द्वारा इस शरीर को धारण
करने का उद्देश्य ही नहीं है, क्योंकि ये तो क्षणिक वासनायें हैं, जोकि कुछ
समय के अन्तराल से हमेशा उत्पन्न होती रहती हैं और जितना उनको
भोगो, उतनी ही उग्र रूप में ये पुन: महसूस होती हैं जैसे आग में घी
डालने से आग की लपटें और तीव्र हो जाती हैं। इनकी पूर्ति से उसमें
केवल असंतोष उपजता है, जो जीवन को और कलुषपूर्ण बना देता है।

सन्त कहते हैं कि यह शरीर रूपी मकान, आत्मा रूपी हमको किराये
पर एक निश्चित अवधि के लिए मिला है और अवधि समाप्त होने के बाद
आत्मा, इस शरीर को छोड़कर कर्मानुसार कहीं और चली जायेगी, क्योंकि
यह अवधि पुन: बढ़ाई नहीं जा सकती। अत: हमारा प्रयास होना चाहिये कि
इसी अवधि के अन्दर अपनी मुक्ति का मार्ग खोज लें, आत्मकल्याण का
मार्ग खोज लें, जिससे कि आत्मा कर्मानुसार मृत्युलोक में भटकने की जगह,
सत्यलोक चली जाय, परमपिता के धाम चली जाये, जहाँ से यह मूल रूप
से आई थी और यह काल निरंजन के चंगुल से सदा-सदा के लिये मुक्ति पा
जाये।

यह कार्य बाह्य संसार के वातावरण में रहकर व सांसारिक भोग
वासनाओं में लिप्त होकर नहीं किया जा सकता, बल्कि किसी पूर्ण गुरु की
खोज करके, सद्गुरु के चरण कमलों में बैठकर, उसकी कृपा पाकर, उसके
निर्देशन में बाह्य इन्द्रियों को नियंत्रित कर अपने अंतःकरण की गहराइयों में
उतरना होगा, "देख हिये नैना।" अर्थात अपनी बाह्य प्रवृत्तियों को नियंत्रित
करना होगा और अन्दर की दुनिया में जाना होगा कहने का तात्पर्य यह
है कि उसे अपने ध्यान में सद्गुरु के स्वरूप को बिठाकर उनका
सुमिरन करना होगा व उनसे सुरति जोड़नी होगी इस स्थिति में जिस
अभूतपूर्व आनन्द का अनुभव होता है, वह बाह्य इन्द्रियों से प्राप्त सुख से
बिलकुल ही भिन्न व निराला होता है। एक बार जिसे इस अनन्द की
प्राप्ति हो जाय, तो फिर उसे किसी अन्य सुख या मौजमस्ती लूटने की
इच्छा ही नहीं रह जाती। इस आनन्द के सामने सभी सुख तुच्छ प्रतीत होते
हैं। यही सहज साधना का मार्ग है, जो एक सद्गुरु की कृपा से ही सम्भव
है। इस स्थिति में आत्मा बलवती हो जाती है और मन की ताकत कम हो
जाती है। मन की इच्छा करने की गति शिथिल हो जाती है। वह (मन)
अब कल्पना लोक में विचरण नहीं कर पाता। बुद्धि के निर्णय करने का
कार्य नियंत्रित हो जाता है, चित्त की स्फूरणा कम हो जाती है और अहंकार
क्रिया करना लगभग बन्द कर देता है। मन की वृत्तियाँ काम-क्रोध-मद-
मोह-लोभ व अहंकार आदि शान्त हो जाती हैं। अब मनुष्य को अपने
अन्तरात्मा की अनुभूति होने लगती है। इस प्रकार सहज साधना के मार्ग
को अपना कर वह संसार-सागर से पार हो सकता है। यही मानव तन
धारण करने का उद्देश्य है।

सारांश यह है कि जीव, मनुष्य का तन पाकर बहुत भाग्यशाली है।
उसे यह समझ लेना चाहिए कि यह शरीर उसे अपना आत्मकल्याण करने
के लिए मिला है और 84 लाख योनियों में आवागमन के चक्कर से मुक्ति
प्राप्त करने हेतु मिला है व सतलोक जाने हेतु प्राप्त हुआ है। अतः उसे
चाहिये कि इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु वह किसी सद्गुरु की शरण ग्रहण कर
ले। उन्हीं की छत्रछाया में उनके द्वारा बताये हुये मार्ग पर मनसा वाचा
कर्मणा चले और मन व माया के लुभावने जाल में न फँसे। तभी मानव तन
को प्राप्त करने का लक्ष्य पूरा होगा और इसी से मानव तन की सार्थकता
भी सिद्ध होगी, अन्यथा नहीं।

अनुराग सागर वाणी में चर्चा आती है कि काल निरंजन ने सृष्टि
रचना करने के साथ ही सृष्टि के संचालन और नियंत्रण हेतु 'कर्म' विधान
भी बनाया और उसका पालन न करने अथवा तोड़ने पर कठोर दण्ड का
भी प्रावधान बनाया। उसने वेद, जो निरंजन की स्वंसा से निकले थे तथा,
जिसके आधार पर ही अन्य पुराणों व शास्त्रों की रचना की गई, में भी ये
सभी कर्म के प्रावधान अपनी मर्जी के मुताबिक बनाये ताकि जीव इन्हीं में
उलझा रहे और 84 लाख योनियों की धारा से मुक्त न होने पाये और इस
प्रकार सदैव उसके नियंत्रण में बना रहे। सभी पुराणों व शास्त्रों ने इस
'कर्म' विधान को मानने की अनिवार्यता पर जोर दिया है। गोस्वामी
तुलसीदास जी भी कह रहे हैं -

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा। जो जस करे, सो तस फल चाखा।।

अर्थात यह विश्व कर्म-विधान के सूत्रों में बँधा हुआ है और जो जीव,
जैसा कार्य करता है, तद्नुसार ही उसे फल की प्राप्ति होती है।"बोया पेड़ बबूल का आम कहाँ से खाय।" कहते हैं कि कर्म अंतःकरण में संग्रहीत रहते हैं और कर्मानुसार उनकी बुद्धि बन जाती है तथा वह वैसे ही
कर्म करने लगता है। एक नास्तिक अपने पूर्व जन्म के कर्मों के फलस्वरूप
ही इस जन्म में नास्तिक बना है। कर्म की विशेषता है कि जो भी कर्म जीव
करता है, कर्म-फल उसका एक हजार गुना बढ़कर मिलता है। अतः यदि
वह गलत कार्य करता है, तो उसे इस गलत कार्य का प्रतिफल भी एक
हजार गुना बढ़कर मिलता है। इसीलिये पुराने जमाने में हमारे पूर्वज
गलत कार्य सोचने या करने से बचते थे। कबीर साहिब जी भी कहते हैं -

करम गति टारे नाहिं टरी।
मुनि वशिष्ठ से पंडित ज्ञानी, सोध के लगन धरी।

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आइये, निरञ्जन ने कर्म जाल कैसे फैलाया? उसकी चर्चा करें । निरञ्जन का जन्म परमपुरुष द्वारा पुकारे गये उस शब्द से हुआ था, जिसे उन्होंने कुछ संशय के साथ तथा जोर से पुकारा था। इसी संशय के कारण निरञ्जन की प्रवृत्ति नकारात्मक हो गई और जोर से निकले हुये शब्द के कारण उसके स्वभाव में क्रूरता आ गई । यही दोनों अवगुण उसके द्वारा जीवों के प्रति किये गये व्यवहार में कसाईपन के रूप में दिखाई पड़ते हैं। उसने आद्यशक्ति, जिसे परमपुरुष ने उसके पास हंस आत्मायें देकर, इसलिये भेजा था कि दोनों मिलकर सत्य सृष्टि करेंगे, निरञ्जन ने आद्यशक्ति को अपनी पत्नी बनने के लिए विवश किया। जब आद्यशक्ति ने उसे बताया कि वह एक रूप में उसकी बहन है और दूसरे रूप में उसकी पुत्री है, अतः ऐसा करने पर उसे पाप लगेगा। तब उसने आद्यशक्ति से कहा कि मैं ही पाप व पुण्य का कर्ता हूँ। अतः पाप-पुण्य से मैं नहीं डरता और आगे भी पाप-पुण्य का जाल ऐसा फैलाऊँगा कि जीव उनमें उलझ जायेगा और फिर वह कहीं नहीं जा पायेगा। फिर वह हमारा ही होकर रहेगा। उसके इस कथन से स्पष्ट है कि निरञ्जन ने अपनी कृटिल तरकीबों से जीवों को अपने 'कर्म जाल' में फँसाने के लिए पहले से ही ताना-बाना बुन लिया था। वेद, भी निराकार ब्रह्म तक की बात करते हैं और बाद में नेति-नेति-नैति कहकर चुप हो गये। यह निराकार ब्रह्म भी मन के रूप में नाशवान है, तो फिर निराकार ब्रह्म भी परमपुरुष नहीं हो सकता, क्योंकि परमपुरुष तो अमर हैं। अतः वेद भी सभी को भ्रमित करते हैं । इधर निरञ्जन आद्यशक्ति को बताकर गुप्त रूप से शून्य में समा गया और मन रूप में जीवों के साथ हो गया। निरञ्जन ने 204 युगों तक (तीन बार में) एक पाँव पर खड़े हो, एकाग्र होकर परमपुरुष का ध्यान किया था, अतः अपने तप के बल से वह मन रूप में संकल्प-विकल्प करके अपने भ्रम जाल में बहुत प्रभावशाली ढंग से जीवों को उलझाये हुये है ।

इसके पूर्व, एनकेन प्रकारेण निरञ्जन ने आद्यशक्ति को अपनी पत्नी बना लिया। इस प्रकार आद्यशक्ति निरञ्जन के कुचक्र में फँस गई। बाद में दोनों ने मिलकर ब्रह्मा-विष्णु-महेश की उत्पत्ति की। तदन्तर त्रिदेवों-ब्रह्मा-विष्णु-महेश की एक-एक कन्या पत्नी के रूप में देकर उन्हें भी काम के वशीभूत कर दिया। इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी उसके कुचक्र में फँस गये । फिर आद्यशक्ति और त्रिदेवों ने मिलकर जीवों को विभाजित करने के लिए 84 लाख योनियों का निर्माण किया व चार खानियाँ पाँच तत्व से बनाई । इन चारों खानियों में 84 लाख योनियों के जीवों को श्रेणीबद्ध किया। सभी खानियों के जीवों में पाँचों तत्व बराबर-बराबर नहीं थे। किसी खानि में एक तत्व, किसी खानि में दो, किसी में तीन और किसी में चार तत्व थे। मानव योनि में पाँचों तत्वों का समावेश किया। इस कारण विभिन्न खानि के जीवों की प्रकृति व प्रवृत्तियों में बहुत अन्तर है। परिणामस्वरूप एक खानि का जीव जब दूसरी खानि में जाकर जन्म लेता है और शरीर धारण करता है तो वह सदैव भ्रम की स्थिति में रहता है। निरञ्जन का इन खानियों की संरचना करने का भी यही उद्देश्य था कि ये सभी जीवात्मायें, जो सतलोक से आद्यशक्ति के साथ सत्य सृष्टि के लिये भेजी गई थीं और जिन्हें निरञ्जन और आद्यशक्ति ने मिलकर छलपूर्वक मैथुन सृष्टि में डालकर उलझा दिया था, निरञ्जन द्वारा बनाये गये चौरासी के चक्र में भ्रमित होकर घूमती रहें और उन्हें यह सोचने का मौका ही न मिले कि वे परमपुरुष का अंश हैं तथा सतलोक वासी हैं न कि शून्य लोकवासी और इसीप्रकार भ्रम में पड़ी रहें। यह मन इच्छायें करके जीव से उनकी पूर्ति हेतु नाना प्रकार के कार्य करवाता है और फिर उन्हीं कर्मों के आधार पर उन्हें कष्ट भी देता है । कबीर साहिब जी कह रहे हैं।

सद्गुरु मधु परमहंस जी कहते हैं कि मानव तन, पाँचों तत्वों से बना होने के कारण चैतन्य है। अतः वह नाम के सहारे सतलोक जा सकता है, जबकि अन्य योनियों के जीव तत्व भिन्नता के कारण सतलोक नहीं जा सकते हैं। सद्गुरु "नामदान" के समय जीव के सभी पुराने कर्म (उस समय तक के) अपनी विशेष ताकत से काटकर पुराने कर्म बंधनों से उसे मुक्त कर देता है। फिर काल उसे परमधाम जाने से नहीं रोक पाता।

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धर्मदास जी कबीर साहिब से पूछ रहे हैं कि यह सृष्टि तो मनुष्य के कारण बनाई गई थी, फिर ये दूसरी योनियाँ क्यों बनीं? तब कबीर साहिब जी धर्मदास को बताते हैं कि यह मानव चोला बड़ा ही सुखदायक है। गुरु का ज्ञानी यही समझ सकता है। वास्तव में 84 लाख योनियाँ मनुष्य के कारण ही बनाई गई ताकि जीव मुख और भ्रमित बना रहे, क्योंकि विभिन्न योनियों से आने के कारण जीव मुख व भ्रमित बना रहता है । हाँ, यदि एक ही योनि अर्थात मानव योनि बनाई गई होती, तो उसे लगातार मानव तन ही मिलता रहता। तब जीव चैतन्य होकर सत्यभक्ति में लग सकता था और गुरु धारण करके अपनी मुक्ति का मार्ग खोज लेता। परन्तु निरञ्जन ने ऐसा नहीं होने दिया। इससे स्पष्ट है कि निरञ्जन ने यह कार्य बड़ी कूटनीति से किया, जिससे सभी जीव भ्रमांक अवस्था में बने रहें, क्योंकि जीवों को भ्रमांक में रखकर ही उसके संसार का काम चल सकता था। कहने का तात्पर्य यह है कि निरञ्जन की इस व्यवस्था के अनुसार जीव बार-बार काल के मुख में जाता है, जिससे वह चैतन्य नहीं हो पाता है। सद्गुरु मधु परमहंस जी कहते हैं कि यही काल का खेल है, जिसे बड़े-बड़े योगी, काजी व पंडित आदि कोई भी नहीं समझ पाया।

कबीर साहिब जी कहते हैं -

सुनु धर्मन यह है यमराज। ताहि न चीन्हत पंडित काजी। चारों मिलि संरचना कीन्हा। कच्चा रंग सुजीवहि दीन्हा।। पाँच तत्व तीन गुण जानो। चौदह यम तासंग पछानो।। यह विधि कीन्ही नर की काया। मारे खाय, बहरि उपजाया।।

कबीर साहिब जी कह रहे हैं कि आद्यशक्ति और त्रिदेवों ने मिलकर जगत की रचना की, जिसमें जीव को कच्चा रंग दिया अर्थात उन्हें नश्वर शरीर दिया । पाँच तत्व, तीन गुणों के अतिरिक्त उसकी चौदह इन्द्रियों पर उनके देवता भी बैठे हुये हैं जो आत्मज्ञान की बातें न करके विषय भोग की तरफ आकृष्ट हैं और विषयभोग में व्यस्त हैं। विभिन्न इन्द्रियों पर बैठे चौदह देवता इसप्रकार हैं-

पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ - देवता का नाम

कान - दिशाजी

आँख - सूर्य देव

नाक, - अश्विनी कुमार

जिह्वा! - वरुण

त्वचा. - गरुण जी

पाँच कर्मेन्द्रियाँ

पैर - उपेंद्र जी

गुदा, - यम

भुजायें, - इन्द्र

मुख, - अग्निदेव

शिश्न। - प्रजापति

चार अन्तःकरण की इन्द्रियाँ

मन - चन्द्रमा
बुद्धि, - ब्रह्मा
चित्त, - वासुदेव अहंकार - शिव जी

इसके अतिरिक्त प्रत्येक जीव के शरीर में सात चक्र हैं और प्रत्येक

चक्र पर एक देवता जीव को भ्रमित करने के लिए बैठा रखा है -

चक्र - देवता का नाम - देवता का लोक
मूलाधार चक्र - गणेश जी - सिद्ध लोक
स्वाधिष्ठान चक्र - ब्रह्मा व सावित्री - ब्रह्मा लोक
मणिपूरक चक्र - विष्णु व लक्ष्मी - विष्णु लोक
अनाहत चक्र - शिव व पार्वती - शिव लोक
विशुद्धि चक्र - आधशक्ति - शक्ति लोक
आज्ञा चक्र - आत्मदेव
सहज सार चक्र - मन - निरंजन लोक

उपरोक्त सभी देवता (आत्मदेव को छोड़कर) भी जीव को विषय विकारों में उलझाये रहते हैं, जिसके कारण जीव में ज्ञान होने के बावजूद वह आत्म कल्याण के लिए कुछ भी सोच नहीं पाता, यानि भ्रमित रहता है।

बाद में काल निरञ्जन ने ८८ हजार ब्रह्मा उत्पन्न किये और ब्रह्मा ने आगे चलकर जीवों की सृष्टि की और उसने वेद शास्त्रों आदि में उलझा भी दिया तथा निरञ्जन का ध्यान करने को कहा। वेद मत के अनुसार परमपुरुष का भेद नहीं मिला, क्योंकि उसने भी निरञ्जन तक की खबर दी।

साहिब जी कह रहे हैं कि यह सब निरञ्जन ने ही किया। यही निरञ्जन असूर का रूप धारण करके जीवों को सताता है, ऋषियों, मुनियों को तंग करता है और फिर यही अवतार धारण करके उन असुरों का संहार करता है। यह जीवों को अपनी लीला दिखाकर अपनी महिमा बताता है, जिस कारण जीव उसी को अपना रक्षक मान लेते हैं, पर वह रक्षक की कला दिखाकर अंत में जीवों को खा जाता है। अंत में सभी जीव काल के मुख में जाते हैं और पछताते हैं। कबीर साहिब जी कहते हैं कि जीवों का असली रक्षक तो परमपुरुष है, जिसे जीव पहचानते ही नहीं हैं, क्योंकि असली रक्षक तो परमपुरुष है, जिसे जीव पहचानते ही नहीं हैं, क्योंकि उस पुरुष का भेद उन्हें कहीं पर भी नहीं मिला और जो भक्षक यानि कष्ट देता है, उसी को अपना रक्षक मान कर उसका ध्यान भजन करते हैं।

सद्गुरु मधु परमहंस जी कह रहे हैं कि काल का यह खेल कोई समझ नहीं पाया। यह एक भयानक कसाई की तरह है जो लाखों जीवों को तप्तशिला पर भून-भून कर रोजाना खाता है और जीवों को जलाकर कष्ट देता है, फिर ८४ लाख योनियों में उनके कर्मानुसार भेज देता है। यह यम बाजी कोई चीन्ह न पाया। आशा दे यम जीव नचाया।। लख जीव नित्य प्रति खाई । महा अपरबल काल कसाई।। तप्तशिला निशिदिन तहुँ जरई। तापर लै जीवन कँह धरई।। जीवहिं जारे कष्ट दिलावे। तब फिर लै चौरासी नावे।। इतना ही नहीं, उसने मृत्यु के उपरांत जीवों को कर्मानुसार कष्ट देने के लिए सात कुंड भी बना रखे हैं। किसी कुंड में बहुत गर्म तेल भरा है, किसी में विष्ठा, किसी में पीब आदि। अतः जब जीव मृत्यु के उपरांत यमलोक आता है, तो उन्हें उनके कर्मानुसार यम के दूत इन कुंडों में धक्का देकर फेंक देते हैं और जीव भयंकर कष्ट में तड़पता चिल्लाता रहता है। इसका वर्णन पुराणों और शास्त्रों में आता है।

काल निरञ्जन के विस्तार के विषय में साहिबजी कह रहे हैं कि इसका विस्तार २१ ब्रह्मांड तक है।

सात शून्य सातहि, कमल, सात सुर्त स्थान। इक्कीस ब्रह्मांड लग, काल निर्ञ्जन जान।

ये २१ लोक इस प्रकार हैं-

पाताल, रसातल, महातल, तलातल, सुतल, वितल, अतल आदि पाताल लोक के अंतर्गत आते हैं। गणेश लोक, ब्रह्मलोक, विष्णु लोक, शिव लोक, शक्ति लोक, आत्म लोक, व निरञ्जन लोक, अचिन्त लोक, सोहंग लोक, मूल सुरति लोक, अंकुर लोक, इच्छा लोक, वाणी लोक, और सहज लोक आदि अन्य १४ लोक हैं।

साहिब जी कहते हैं कि जब जीव "नाम" पर विश्वास कर लेगा तो उसे योग, व्रत, तप आदि को करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। वेद शास्त्रों आदि का भरोसा छोड़कर केवल "नाम" पर विश्वास करेगा जिससे सभी प्रकार के वहम अंदर ही धुल जायेंगे। जब जीव "सुरति" लगाकर बैठेगा, तो काल भी उसके पास नहीं आयेगा। "सार नाम" उसकी हर समय रक्षा करेगा।

साहिब जी ने कहा कि, जो जीव हमारी भक्ति करेगा और सदैव "नाम" सुमिरन करता रहेगा वह काम-क्रोध व अहंकार आदि स्वयं छोड़ देंगे। वे तुम्हारी दुनिया को त्यागकर "अमरलोक" पहुँच जायेंगे। साहिब जी यह भी कहते हैं कि जो जीव नाम दीक्षा" पाने के बाद नाम का सुमिरन निरन्तर करते रहेंगे, तो मैं जीव को तथा उनसे पूर्व के ७१ वंशों के पुरखों को भी तार दूँगा। इसीलिये निरञ्जन जीवों को भरमाता रहता है, ताकि जीव शब्द को पकड़कर सत्यभक्ति से न जुड़ पाये। इससे निरञ्जन को दो फायदे हैं - एक तो ऐसा जीव दूसरे जीवों को सत्यभक्ति से नहीं जोड़ पायेगा, दूसरे उस जीव के पूर्व के ७१ पुरखे निरञ्जन के चंगुल से नहीं छूट पायेंगे।

मौको कहाँ ढूँढ़े बन्दे, मैं तो तेरे पास में।

ना मैं जल में, ना मैं थल में, नहीं शून्य आकाश में।

ना तीरथ में, ना मूरत में, ना एकान्त निवास में।

ना मंदिर में, ना मस्जिद में, ना काशी कैलाश में।।

ना मैं भँवर गुफ़ा में रहता, नहीं नाभि के पास में।

ना मैं जप में, ना मैं तप में, नहीं बरत उपवास में।

ना मैं क्रिया करम में रहता, नहीं योग सन्यास में।

मैं तो रहौं सहर के बाहर, मेरी पुरी मवास में।

खोजी होय तुरत मिल जाऊँ, पल भर की तालाश में।

कहे कबीर सुनो भई साधो, मैं श्वाँसों की साँस में।।

कबीर साहिब जी कह रहे हैं कि परमपुरुष भोली भाली जनता को सावधान करते हुये उनसे स्पष्ट कह रहे हैं कि हे मनुष्यों तुम मुझे प्राप्त करने के लिए विभिन्न स्थानों में क्यों घूमते-फिरते हो? मैं तो तुम्हारे पास ही हूँ, तुमसे जरा भी दूर नहीं हूँ। मैं धरती या जल या आकाश में निवास नहीं करता हँ। मैं किसी तीर्थ स्थान, जैसे बद्रीनाथ, केदारनाथ, रामेश्वरम् या जगन्नाथ जी आदि में नहीं बसता हूँ । मैं किसी मुर्ति या एकान्त में भी नहीं रहता हँ । मैं मन्दिर, मस्ज़िद, कासी अथवा कैलास में भी नहीं रहता हूँ। मैं जप, तप, व्रत, उपवास, वैराग्य अथवा किसी अन्य क्रियाकर्म, जैसे स्नानादि, दान, हवन, यज्ञ आदि में नहीं रहता हूँ। कुछ लोग अपनी भृकुटि में ध्यान लगाकर, मुझे पाने का प्रयास करते हैं अथवा बंकनाल, जोकि भँवरगफा के नाम से भी जानी जाती है, में उठ रही अनहद धुनों को, मुझे प्राप्त करने के लिए सुनते हैं, परन्तु उनमें से किसी भी स्थान पर मैं नहीं रहता हूँ। मैं तो किसी सच्चे खोजी को पलभर में ही ढूँढने पर मिल जाता हूँ। वास्तृविकता यह है कि मैं प्रत्येक जीव की हर श्वास में रहता हूँ और चूँकि श्वासों में ही आत्मा का वास है, अत: मैं प्रत्येक जीव की आत्मा में निवास करता हूँ। कहने का तात्पर्य यह है कि मेरा निवास स्थान प्रत्येक जीव की आत्मा में है।

गुरु नानक देव जी कह रहे हैं -

सारांश यह है कि परमपुरुष 'सत्य' है । उसे पाने के लिए जगह-जगह जाने की आवश्यकता नहीं है, स्थान, स्थान पर जाकर ढूँढने की आवश्यकता नहीं है। सच्चाई यह है कि वह मनुष्य के अन्दर आत्मा में निवास कर रहा है, परन्तु आत्मा के ऊपर अज्ञान व भ्रम का पर्दा पड़ा हुआ है, जिसके कारण उसकी अनुभूति नहीं हो रही है। आत्मा पर पड़े हुये इस अज्ञान एवं भ्रम के पर्दे को एक सद्गुरु ही हटा सकता है। अत: इसके हेतु उसे किसी सद्गुरु की शरण में जाना चाहिए और उनके चरणों में बैठ कर आत्म कल्याण हेतु उनकी कृपा माँगनी चाहिये। एक सद्गुरु की कृपा से ही उसे आत्मज्ञान प्राप्त होगा और तब उसे परमपुरुष के दर्शन अपनी आत्मा में होंगे। कबीर साहिब जी सलाह देते हैं -

दिल महिं खोजि, दिलै दिलि खोजहूँ इहंई रहीमा राभा।।

सत्य-भक्ति

सत्य-भक्ति धारा में उपासना का केन्द्र बिन्दु सद्गुरु होता है, अर्थात सत्य-भक्ति सदगुरु के ही चारों ओर घूम रही है। इसमें सद्गुरु द्वारा दिये गये 'नाम' का बहुत महत्व है । इस भक्ति में हमारे शरीर के 10 दरवीजे हैं, पर सुरति को जगाना ही 11वां दरवाजा है । आत्मा ग्यारहवें दरवांजे से निकलकर अपने मूल स्थान (सत्यलोक) को लौट जाती है, जहाँ से फिर कभी उसे वापस नहीं आना होता।

हाँ, सद्गुरु ही 'सत्य-भक्ति' का स्वामी है। बिना सद्गुरु की कृपा के जीव इस संसार-सागर से पार नहीं हो सकता। इसलिये सद्गुरु का ध्यान भजन ही 'सत्य-भक्ति' का सार है। एकमात्र सदगुरु की भक्ति से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की भक्ति हो जाती है जैसे पेड़ की जड़ में पानी डाले, तो उस पेड़ को पत्ता-पत्ता हरा हो जाता है। इसी तरह

देवी देवल जगत में, कोटिन पूजे सदगुरु की पूजा किये सब की पूजा होय।।

सद्गुरु ही परमपुरुष का सच्चा प्रतिनिधि होता है। परमपुरुष को हमने कभी नहीं देखा, अतः उसका कौन-सा रूप ध्यान में लायें, यह एक प्रश्न है, जबकि सद्गुरु हमारे सामने हैं तो उनका रूप हम अपने ध्यान में आसानी से बिठा सकते हैं। अत: हमें सद्गुरु का ही ध्यान-भजन करना चाहिये।

जो जिसका ध्यान करता है, वह अन्त में उसी को प्राप्त होता है। जैसे निर्गुण-भक्ति में पाँचों मुद्राओं की जितनी सीमा है, वहीं तक साधक पहुँच पाता है। इसी तरह सद्गुरु की पहुँच आत्मा के देश-अमरलोक तक है, अतः उसी की भक्ति से हम उस लोक को पहुँच सकते हैं।

'नाम' का महत्व तो सगुण-निर्गुण दोनों भक्तियों में है, पर 'सत्यभक्ति' में दिया गया 'नाम' इन नामों से परे है। यह 'नाम' एक सजीव वस्तु है। सगुण-निर्गुण भक्तियों में साधना की कमाई का महत्व है, परन्तु सत्यभक्ति में 'सार-नाम' प्राप्ति का; क्योंकि यह 'सार-नाम' प्राप्त करने वाला, यदि साधना न भी करे, तो भी सदगुरु की कृपा से यह संसार-सागर से पार हो जाता है। यह सजीवन नाम ही सद्गुरु की शिष्य पर सबसे बड़ी कृपा है। 'सत्यभक्ति' में शिष्य गुरुकृपा से अदूभुत आध्यात्मिक शक्तियाँ सहज में ही प्राप्त करता है।

साहिब कह रहे हैं कि हे मनुष्य ! तुम कहाँ भटकते फिर रहे हो, सद्गुरु की खोज करो, क्योंकि सद्गुरु से 'सार नाम' पाये बिना तुम्हारे जीव को काल ले जायेगा। इसलिये सद्गुरु से 'नाम' पाकर काल के खेल से बचो। मैं युग-युग से 'सार-शब्द' समझाता आ रहा हूँ, जो विश्वास करके मेरे शब्द को मान लेता है, उसे मैं बचा लेता हूँ। है धर्मदास ! मैं उसे चिताकर ऐसे अजर, अमर, घर ले जाता हूँ, जहाँ काल नहीं जा सकता है।

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हमारे अन्दर में परमात्मा निवास कर रहा है, पर क्या वजह है कि

वो नज़र नहीं आ रहा है। हम सोचते हैं कि परमात्मा कहीं चतुर्भुज होगा

कहीं शंख आदि हाथ में पकड़े हुए होगा। क्योंकि हम इन्हीं चीजों से

वाकिफ हैं, इसलिए हमने परमात्मा को भी सांसारिक नजरिए से ही

कल्पित किया हुआ है । साहिब कह रहे हैं:

पुहुप वास से पातला, वायू से अति झीन।

पानी से उतावला, दोस्त कबीरा कीन।।

फूलों की खुशबू से भी सूक्ष्म, वायु की गति से भी तेज, पानी में

भी झीना, ऐसा मेरा दोस्त (परम-पुरुष) है।

इस परमात्म-तत्व को गुरु प्रगट करता है। आइए देखें कि

आखिर परमात्मा को कैसे प्रगट किया जाता है । यूँ तो वो घट-घट में है।

घट-घट मेरा साईंया, संतन करी पुकार।

बलिहारी वा घट की, जा घट परगट होय।।

गुरु प्रगट कैसे करता है परमात्मा को ?

बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो लखाय।।

यह कैसे लखाते हैं गोविंद को? बुल्लेशाह कह रहे हैं-

ना रब्ब मैं तीरथ ढीठ्या, न रोजा नमाजे।

बुल्लेशाह नू मुर्शिद मिल्या, अन्दरों रब्ब लखाया।।

चेतना का सूत्राधार अष्टमचक्र में है। वो परम चेतन स्वरूप है। नानक देव भी कह रहे हैं-

उघरा वह द्वारा। वाह गुरु परिवारा।

चढ़ गई चंग पतंग संग। ज्यों चंद चकोर निहारा।।

सुरति सोर जोर ज्यों खोलत। कुंजी कुलफ किवारा।

सुरति धाई धँसी ज्यों धारा। पैठि निकसि गई पारा।

आठ आटा की अटारि मझारा। देखा पुरुष न्यारा।।

निराकार आकार न ज्योति । नहिं वह वेद विचारा।

ओंकार करतार नहिं कोई। नहिं वहाँ काल पसारा।।

वे साहिब सब संत पुकारा। और पाखंड पसारा।

सतगुरु चीन्ह दीन्ह यह मारग। नानक नजर निहारा।।

कह रहे हैं कि अठवें चक्र में न्यारा पुरुष देखा। यह कौन सी

आठवीं अटारी है ? यह आठवाँ चक्र है । शीश के सवा हाथ ऊपर अधर

आसन कहा। कोई तीसरे तिल में ध्यान रोक रहा है, कोई बंकनाल में

रोक रहा है, कोई सुषुम्ना में रोक रहा है, पर साहिब शीश से सवा हाथ

ऊपर बोल रहे हैं। क्योंकि

इडा विनशे पिंगला विनशे, विनशे सुखमन नाड़ी।

कहें कबीर सुनो हो गोरख, कहाँ लगइहों ताड़ी।।

हमारा दिमाग कार्यान्वित कर रहा है। कानून बनाने वाला मन रूपी डॉन पर्दे के पीछे छिपकर बैठा है। वो जो चाहता है, उसे ही आगे सब करते हैं । मन ऐसे खामोश बैठा है । जब भी कार्यान्वित करवाना होता है, वो दिमाग को संदेश देता है। दिमाग पूर्ण रूप से उसी का तद्रूप है। शरीर में बड़ा झंझट है। सुषुम्ना के घाट से संदेश आ रहे हैं। वहीं से सारी तरंगें आ रही हैं। हमारा शरीर इन तरंगों पर काम कर रहा है। दिमाग में आने वाले विचार भी वास्तव में आपके नहीं हैं। पूरे शरीर का कार्य दिमाग कर रहा है । पर उसके पीछे डॉन खड़ा है। यह सहस्रार में बैठा है। इसी को पारब्रह्म भी कहते हैं। त्रिकाल में सभी यहीं तक अटके। साहिब कह रहे हैं:

जीव के संग मन काल को वासा। अज्ञानी नर गहे विस्वंसा।।

तो हम परमात्मा को अनुभव क्यों नहीं कर पा रहे हैं ? क्योंकि

वो अष्टमचक्र में है । उसकी तरंगों को हमारा दिमाग नहीं समझ सकेगा।

उसको हमारी इंद्रियाँ नहीं समझ सकेंगी, हमारा मन, हमारी बुद्धि नहीं

समझ सकेगी। इनका सब्जेक्ट नहीं है।

हम आँखों से देख रहे हैं। अगर हम नाक से देखना चाहें तो नहीं देख पायेंगे । सूत्र ही नहीं है नाक में । मुँह से सुनना चाहें तो नहीं हो पायेगा। कान ही माध्यम है। अगर आँखों से सूँघना चाहें तो नहीं होगा। यह नासिका का सब्जेक्ट है, आँखों का नहीं। तो खुशबू हमारी नासिका का सब्जेक्ट है। दृश्य आँखों का सब्जेक्ट है । इस तरह परमात्मा इंद्रियों का सब्जेक्ट नहीं है। वो दिव्य-दृष्टि का सब्जेक्ट है । और यह दिव्य-दृष्टि हमारी सुरति में है। अभी वो इन इंद्रियों में लगी हुई है, उलझी हुई है, इसलिए परमात्मा का अनुभव नहीं हो पा रहा हैं। इसे संसार से हटाकर एकाग्र कर लेंगे तो परमात्मा का अनुभव हो जायेगा।

सकल पसारा मेंटि कर, मन पावना कर एक।

ऊँची तानो सुरति को, तहाँ देखो पुरुष अलेख।।

यानी हमारी आत्मा इन इंद्रियों और शरीर में है। जिस चीज

की अनुभूति होनी है वो दुनिया में उलझी हुई है।

परमात्मा आपसे अभिन्न है। वो अष्टम चक्र में है । लेकिन हम

उसके संदेश नहीं सुन पा रहे हैं। आपके पास संदेश आ रहे हैं। आप समझ

नहीं पा रहे हैं। आप भूल गये हैं। गुरु इसी सुरति को जगाता है। उसके बाद

संदेश आने लग जाते हैं।

अंधि सुरति नाम बिन जानो।।

वायु से स्पन्दन भिन्न नहीं हो सकता है, जल से शीतलता भिन्न

नहीं हो सकती है, आग से तपिश भिन्न नहीं की जा सकती है। इसी तरह

आत्मा से परमात्मा अलग नहीं हो सकता है। वो अभिन्न है। केवल

भ्रमित अवस्था में होने से हम उसे अनुभव नहीं कर पा रहे हैं। वो तो

आपसे कभी दूर नहीं था.….. नहीं हैं |

जहाँ जाना तहँ निकट है, रहा सकल भरपूर।

बाड़ी गर्व गुमान ते, ताते पड़ गयो धूल।।

यह है ही है। तिलों में तेल है ही है। क्रियान्वित करने पर ही

अनुभूति है। इसी तरह परमात्मा आपमें है। गुरु प्रगट कर देता है। वो

अष्टमचक्र में एक्टिव कर देगा। वो अपनी पारस सुरति से चेतन करता

है। तब पूरे संदेश मिलते जायेंगे।

जैसे मन संदेश दे रहा है कि खा लो, सो जाओ। जहाँ आप भ्रमित अवस्था में जाओगे तो वहाँ ये संदेश मिलते जायेंगे। वो तरंगें आपके पास आती जायेंगी । वो अति सूक्ष्म हैं।

यह होता है प्रगट करना। फिर वहाँ ध्यान रखने से आपमें दिव्य

शक्ति का संचालन होता जायेगा। तूफान के बीच खडे हो जाते हैं तो

उसके झपेटे आते हैं, इस तरह उस तत्व में आत्मा जाती है तो चेतन होती है।

पग बिन चले सुने बिन काना। कर बिनु कर्म करे विधि नाना।।

आनन रहित सकल रस भोगी। बिना वाणी वक्ता बड़ योगी।।

तन बिनु परस नैन बिनु दरशे। गहे ज्ञान सब शेख विशेखे।।

यह विधि सकल अलौकिक करनी। महिमा जाय कवन विधि वरणी।।

आँखों के बिना देखना है। कानों के बिना सुनना है। हाथों के बिना काम करना है। जिस समय मौत होती है तो वो शरीर मिल जाता है। जहाँ इच्छा करता है, वहीं जाता है। उसी वाहन में बैठकर जाता है। फिर माया के शरीर छूटते जाते हैं, आत्मा हलकी होती जाती है। एक के बाद एक शरीर छूटता जाता है। फिर शुद्ध हंस रूप होकर अमर लोक में प्रवेश होता है।

कर्मकाण्डियों पर व्यंग्य करते हुए बुल्लेशाह कह रहे है कि परमात्मा से बिछुड़ा हुआ जीव इस संसार में अकेला है, क्योंकि वापिस परमात्मा के घर की राह बताने वाला यहाँ इसका कोई नहीं है। उल्टे कर्मकाण्डियों ने इसे अपने जाल में फँसा रखा है। ये कर्मकाण्डी सारे संसार के जीवों को अपने जाल में फँसा कर ठग रहे हैं, लूट रहे हैं। कह रहे हैं कि वापिस परमात्मा के घर ले जाने वाला, परमात्मा से मिलाने वाला सद्गुरु, नाम रूपी नौका लेकर खड़ा है। इसलिए हे जीव, तू देर न कर और सद्गुरु की नौका में सवार हो जा। तेरा परमात्मा रूपी प्रीतम तेरे पास ही है। सद्गुरु तेरे सारे कष्ट दूर कर देगा।

सार नाम ही सत्य पुरुष है।

संत सद्गुरु जो नाम शिष्य को देते हैं, वो ऐसा नाम नहीं है, जो

संसार के लोगों ने समझ लिया है। धर्मदास जी भी साहिब से पूछ रहे हैं-

धर्मदास कहै सुनो गोसाई। पुरुष नाम कहऊँ समुझाई ॥

सहस्रनाम जो वेद बखाना। नेति नेति कह बहुरि निदाना।।

कौन नाम को सुमिरन करई। कैसे सदा पुरुष चित धरई ॥।

कैसे आवागमन मिटाई। क्षर-अक्षर कह समुझाई ॥

संत-सद्गुरू परमात्म-तत्व को लाकर शिष्य के, भीतर छोड़ते हैं। यही नाम कहलाता है। इस नाम के बिना

कोई भी जीव संसार-सागर से पार नहीं हो सकता। यही नाम अर्थात

स्वयं परमात्मा जीव को इस संसार-सागर से परे अमर-देश में ले

जाता है।

पहली बार जब साहिब धरती पर आए तो 100 साल रहकर वापिस गये। पर एक भी जीव को नहीं ले जा सके। परम-पुरुष ने पूछा कि कोई भी जीव नहीं लाए। कहा-नहीं। परम-पुरुष ने पूछा- कहा कि जिसे सुबह समझाता हूँ, शाम को भुला देता है। जिसे शाम को समझाता हूँ, वो सुबह भुला देता है। तब परम-पुरुष ने कहा कि यह लो गुप्त वस्तु (नाम)। जिस घट में यह वस्तु दे दोगे, उसपर काल का जोर नहीं चलेगा।

इस तरह नाम रूप में सद्गुरु स्वयं मालिक साथ में कर देता है, जिसके कारण जीव की स्वयं कमाई की कोई जरूरत नहीं रहती, वो स्वयं ही शरीर छूटने के बाद अनल पक्षी की तरह अपने घर की तरफ चल पडता हैं।

फिर वो शब्द कुछ और है, जिसका जिक्र साहिब ने अपनी वाणी

में किया है। वो दो वस्तुओं के टकराव से उत्पन्न होने वाला शब्द नहीं

है। वो ध्वनि रहित शब्द है। उसे निःशब्द शब्द कहा गया। उसमें प्रकाश

भी है, पर वो प्रकाश सांसारिक नहीं है.....बड़ा अद्भुत है। वहाँ द्वैत

नहीं।

वो शून्य के पार होता है। ध्यान भजन में कभी आपकी रूह को वो शब्द उठाना चाहता है। वो शून्य पार से आता है। पर वो ऐसे नहीं आता है। जब भाव बनता है, जब आप न जाग्रत में होते हैं, न स्वप्न में, एक मध्यावस्था होती है। जैसे ही आप जाग्रत में आए, अपने का बोध हुआ तो वो चला जाता है। आप अपने को भूल जाते हैं एक क्षण के लिए, तब वो आ जाता है। वो एक डोर है, जिसे पकड़कर आप इस काया से बाहर निकल सकते हैं.....बड़ी आसानी से। सद्गुरु ने डोर फेंकी हुई हैं। बस, आपको उसे पकड़ना है। आप पकड़ें नहीं तो सद्गुरु का क्या दोष। फिर वो कुछ नहीं कर सकता है।

यदि आपने भी उस शब्द को पकड़ लिया तो

आपको भी उसकी तरह ही उड़ने की कला आ जायेगी। इसलिए एकाग्र

रहना है, जरा सा भी ध्यान इधर उधर नहीं हो, अपने आप ही सुधि भूल

जाओ । उस शब्द के एक पल के ध्यान की किसी से समानता नहीं की

जा सकती है, किसी जप तप से नहीं।

करोडों कल्प काशी में रहने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल

आधा क्षण शब्द का ध्यान करने से मिल जाता है, ऐसा शास्त्र कह

रहे हैं,

कल्पकोटि सहस्राणि काशीवासे चयत्फलम्।

क्षणादर्ध चिंतिते शब्दे भवेत्तस्य ततोधिकम्।।

सहस्र चौकड़ी युग का एक कल्प होता है। सोचो, कितनी महिमा है उस शब्द की।

सुरति निरंतर शब्द में, लगन मगन रह जोय।

और दृश्य भासे नहीं, भक्ति कहैवे सोय।।

शब्द में सुरति को लगाने की जरूरत है। सुरति को शब्द में समा देना है।

काल फिरै सर ऊपरे, जीवहि नजर न आाय।

कहें कबीर गुरु शब्द गहि, जम से जीव बचाय।।

लोहा चुम्बक प्रीत है, लोहा लेत हाय।

मुख चकोर की रीति से, शब्द में दृष्टि लगाव।

गुरु प्रदेश सुरति भई, अनुभव गम्य न पाव।।

ऐसे में शब्द रूह को चुम्बक की तरह उठाकर अपने में समा लेगा

और उड़ चलेगा अपने देश की ओर। उसे ही प्रथम अवस्था की विहंगम

साधना कहा गया।

तीन प्रकार से साधना होती है। एक है पपील मार्ग, दूसरा है मीन मार्ग और तीसरा है विहंगम मार्ग। पपील चींटी को कहते हैं। इसमें साधक ध्यान द्वारा धीरे धीरे ऊपर उठता जाता है । यह पैदल यात्रा के समान है। दूसरा, मीन मछली को कहते हैं। जैसे मछली पानी के सहारे ऊपर की ओर चढ़ जाती है, ऐसे ही इसमें आंतरिक शब्दों के सहारे सुरति ऊपर की ओर चलती है । तीसरा, विहंग पक्षी को कहते हैं । इसमें पक्षी की तरह जहाँ चाहो, उड़ चलना होता है। इसमें रूह शब्द में समा जाती है और उसमें बैठ यात्रा करती है। यह गति बहुत तेज होती है। अरबों मील एक सैकेंड में आत्म सफर तय करती है।

यह शब्द भी तीन प्रकार का है । एक तो ऊपर से ही खींचकर चल पड़ेगा, लगेगा कि कोई खींच रहा है। दूसरा, जो कान के रास्ते से धीरे धीरे अन्दर आ जायेगा। इन दोनों में सुरति रूहानी चक्कर काटकर वापिस आ जायेगी। यदि ध्यान बराबर शब्द में रहा तो सुरति अमर लोक तक भी पहुँच जायेगी। फिर तीसरा, जो धुँ-धुँ करता हुआ आयेगा और आत्मा को शरीर से पूरी तरह से निकालकर ऐसे बाहर कर लेगा, जैसे कपड़ा निचोड़कर पानी निकालते हैं। उस समय मन भयभीत करेगा, डरायेगा कि अब तो मर गये। वो एक क्षण का समय भयानक लगेगा। बस, यही वो क्षण है, यदि डर गये तो वो छोड़ देगा, बलात् नहीं ले जायेगा। पर यदि न डरे तो वो सीधा अमर लोक ले जायेगा, क्योंकि वो आता ही इसलिए है। उसी शब्द के अन्दर साहिब का वास है। जब सद्गुरु की कृपा होती है, तभी वो आता है अन्यथा करोड़ों साल बैठे रहने से वो नहीं आने वाला।

शब्द की डोर पकड़ाने वाला सद्गुरु ही है। तो वो शब्द आत्मा को अपने में बिठा चल पड़ता है। उसमें बैठ आत्मा सब नजारे देखती चलती है राह के। वो शब्द पारदर्शी है और आत्मा सब ओर से देख सकती है। तो सोचें, कल्पना से परे है वो आनन्द । फिर थोड़ी दूर पहुँचने पर वो शब्द बातें भी करने लगता है। उस आनन्द का वर्णन नहीं किया जा सकता है। ऐसे साधक की वाणी मौन हो जाती है। वो वाणी का विषय ही नहीं है। वो निःशब्द है, तो किसकी मजाल है कि उसका वर्णन कर सके। जो उसका वर्णन करने की चेष्टा करता है, उसने उसका अनुभव ही नहीं किया होता।

बस, उसकी ओर केवल इशारा ही किया जा सकता है, पर न तो

उस आनन्द का वर्णन किया जा सकता है और न उसके रूप-आकार

का।

.....तो बातें करता हुआ वो शब्द ब्रह्माण्ड को चीरते हुए साहिब

के दरबार में ले चलता है।

सुरति शब्द में जोरते, खुले गगन किवाड़।

जगमग जगमग हो रहा, परम पुरुष दरबार।।

47 लाख साल के 4 युग होते हैं। 4 युग हो गये तो एक चौकड़ी हुआ। 100 बार चार युग हुए तो 100 चौकड़ी युग हुए। 100 के बाद हजार, फिर दस हजार, फिर लाख, फिर दस लाख, फिर करोड़, फिर दस करोड़, अरब, 10 अरब, फिर नील, दस नील, पदम, दस पदम, शंख, 10 शंख, असंख्य, 10 असंख्य, फिर अनन्त।

4 असंख्य चौकड़ी युग हो चुके हैं। यानी अरबों बार सृष्टि का

नाश हो चुका है।

परम-पुरुष ने कहा कि इतना राज्य करना ही है। एक बार

निरंजन ने कहा कि मुझे भी नाम दे दो। साहिब ने कहा कि यदि तुझे नाम

दे दूँगा तो तू कभी छल नहीं कर सकेगा। छल छोड़ दिया तो आत्माएँ

निकल जायेंगी !

अब यहाँ आदमी सस्पेंशन में आ जाता है। इसका मतलब है कि सत्यपूरुष चाहते हैं कि सभी जीव न निकलें। और शाप दिया कि एक लाख जीव रोज़ खाना। तो यह तो जीवों को ही कष्ट दिया। नहीं, यह कष्ट निरंजन को है। जब आपको चोट पहुँचती है तो यह आत्मा को कष्ट नहीं होता है। आत्मा का कुछ नहीं बिगड़ता है। यह कष्ट निरंजन को होता है। उसी को मुसीबत दी है। वो दर्द उसे होता है। यह समझाना कितना कठिन है।

कई जन्म आपने पहले निरंजन की भक्ति की है। कई जन्मों तक पुण्य कर्म किये। आप महा भाग्यवान हैं। अब आप सद्गुरु की शरण में पहुँचकर नाम प्राप्त किये। आप साधारण नहीं हैं। इसलिए आपका नम्बर लगा है। या फिर स्वयं सतजन कृपा कर देते हैं। मैंने जो कहा कि जो वस्तु मेरे पास है, वो ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है, प्रमाणित करता हूँ। पूर्ण गुरु आपको बदल देता है, दिव्य-दृष्टि खोल देता है। 10वाँ द्वार खुलता है तो चाँद, तारे आदि नजर आते हैं, पर जब 11वाँ द्वार खुलता है तो मन नज़र आता है।

वो दिव्य-दृष्टि खुलेगी तो काम, क्रोध दिखेगा। अन्यथा कितनी

भी तपस्या करना, यह मन काबू में नहीं आयेगा, यह समझ नहीं आयेगा।

कपिल मुनि, पाराशर ऋषि आदि ने कम तप नहीं किया था । पर नहीं हो

सका मन काबू में । इसलिए

नाम होय तो माथ नमावे। ना तो यह मन बाँध नचावे।।

जब पूर्ण गुरु एक ताकत रोपित कर देता है तो अन्दर का पूरा

खेल दिखने लगता है, अपने अन्दर के शत्रुओं को साधक समझने लगता

है, मन समझ में आ जाता है।

मैंने बार-बार कहा है कि जो वस्तु मेरे पास है वो ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है। यह सुन एक ने मुझसे कहा कि जो आप कहते हैं कि जो पॉवर मेरे पास है, किसी के पास नहीं, इसे प्रमाणित करो। मैंने उससे कहा कि मैं पॉवर नहीं बोल रहा हूँ, वस्तु बोल रहा हूँ, शब्दों की तरफ ध्यान दो। जैसे कोई दुकानदार कहता है कि जो मिर्ची मेरे पास है, कहीं नहीं मिल सकती। वो कहता है कि यह फलानी-फलानी जगह से आई है ।...तो मैं जिस वस्तु की बात कर रहा हूँ, वो भी इस संसार की नहीं है, तीन लोक में कहीं नहीं है। वो चौथे लोक की वस्तु है। जब वो वस्तु मिलती है तो तीन चीजें आ जाती हैं। मैंने अपनी इस चीज़ का अनुभव एक-दो पर नहीं, बल्कि लाखों लोगों पर किया है। इसलिए इसमें कोई संशय नहीं है, पक्की बात है। तीन चीज़ें स्थापित होती हैं। जिसे भी मैं नाम देता हूँ, तीन चीजें पक्का हो जाती हैं:

आत्मा और मन अलग हो जाते हैं।

संसार का आकर्षण समाप्त हो जाता है।

एक पूर्ण सुरक्षा मिल जाती है।

असर सामने है। मेरा हर नामी नाम पाकर बदल जाता है। हर इंसान मन तरंग में नाच रहा है। मन प्रबल है। पर मेरे नामी के साथ अब ऐसा नहीं हो पा रहा है। नाम पाने के बाद मेरा हर नामी चेतन हो जाता है। अन्य पंथों के लोगों के साथ मेरे नामी की तुलना की जाए तो उनका अपने ऊपर कोई होल्ड नहीं मिलता है, कोई आध्यात्मिकता नहीं मिलती है। मेरे नामी अपने को सबसे अलग पाते हैं, उन्हें अपने अन्य साथी बेवकूफ़ लगते हैं, उनकी हरकतें पागलों वाली लगती हैं, क्योंकि उनके मन का कोई पता नहीं होता कि कब अच्छे बन जाएँ और कब गंदे। कब खराब हो जाए, कोई पता नहीं। यानी मन पर कोई होल्ड नहीं होता, इसलिए पागल ।

मेरे नामी का मन पर होल्ड होता है, क्योंकि नाम देकर मैं साथ में मन से उसकी आत्मा का बिलगीकरण कर देता हूँ, दोनों को अलग कर देता हूँ, जिससे मन समझ में आने लगता है। यह काम दुनिया में सबसे कठिन है, जो कोई नहीं कर सकता है। जब मन समझ आने लग जाता है तो दुनिया फीकी लगने लग जाती है, उसका आकर्षण समाप्त होने लग जाता है। फिर तीसरा, हर नामी को लगता है कि उसके साथ में एक सबल संरक्षक है, हरेक को वो संरक्षक अनुभव होता है। सच है, यह जो वस्तु मेरे पास है, ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है। इस वस्तु से मन की दुनिया समाप्त होती जाती है और आत्मा का रूप समझ आने लग जाता है।

ध्यान क्यों किया जा रहा है ? यह जानने के लिए कि मैं क्या हूँ ? गुरु आत्मा और मन को अलग कर देता है। किसी कीमत पर यह काम अपनी ताकत से नहीं हो सकता है। मन ने ऐसे उलझा दिया है कि आत्मा कुछ समझ नहीं पा रही है। मन कहता है कि रोटी खानी है तो आत्मा कहती है कि यही मेरी इच्छा है। इस तरह मन ने आत्मा को अपने पीछे लगा रखा है। आत्मा सभी इच्छाओं में, कल्पनाओं में घूम रही है। जितने भी कर्म मनुष्य कर रहा है, सभी उलझन वाले हैं। जब भी कोई चाहे कि इससे निकलें तो यह नहीं निकलने दे रहा है। इसकी पकड़ बड़ी दूर तक है। धन-दौलत दे देगा, सिद्धियाँ-शक्तियाँ दे देगा, पर अपने से आगे नहीं जाने देगा। एक अदब गुरु आपको बाहर निकाल देगा।

गुरु यथार्थ में आत्म रूप दिखाता है। हंस की चोंच में गुण है। वो दूध पीता है। अगर उसमें पानी मिला हो तो वो उसे छोड़ देता है, केवल दूध-दूध पी जाता है। यदि पाव दूध में पाव पानी मिलाकर दे दिया जाए तो वो पूरा दूध पी लेगा और पूरा पानी छोड़ देगा। यह काम और कोई नहीं कर सकता है। केवल हंस । ऐसे ही पूर्ण सद्गुरू की सुरति में यह ताकत है कि आत्मा और मन को अलग कर सकता है। यह काम गुरु पल में कर देता है। फिर आत्मा दुबारा मन में नहीं समा सकती। चाहकर भी नहीं। जैसे

दूध को मथ घृत न्यारा किया ।

पलट कर फिर ताहिं में नाहिं समाई।

दूध से घी बना लिया तो फिर दूध नहीं हो सकता। यदि दही को

मथ माखन निकाल लिया तो फिर चाह कर भी उसमें नहीं समा सकता।

जब पूर्ण गुरु आत्मा की मन से अलग कर देता है तो फिर आत्मा मन में

नहीं समा सकती है ।

कितनी भी ताकत लगा ले कोई, यह काम नहीं कर सकता है।

कोटि जन्म का पथ था, गुरू पल में दिया पहुँचाय।।

तब एक संतुष्टि मिलती है । जैसे काँटा लगा हो तो निकालने पर

आराम मिलता है। ऐसे ही मन का काँटा गुरु निकाल देता है। फिर आप

चाहकर भी जगत के पदार्थों में रम नहीं पायेंगे। जगत के पदार्थ आपको

रोमांचित नहीं कर पायेंगे । ऐसे पर ही कहा-

सतगुरु मोर शूरमा, कसरकर मारा बाण।

नाम अकेला रह गया, पाया पद निर्वाण।

यह काम पल में किया। फिर तीसरा, एक संरक्षक भी साथ हो

गया। हर पल के लिए एक ताकत साथ में दे देता है। तभी तो कहा-

जब मैं था तो गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाहीं।

प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाहिं ॥

जो आप अपने को महसूस कर रहे हैं, यही धोखा है। यह आपा

ही अनासक्त है। यह पूरा खत्म हो जाता है। क्यों?

गुरु समाना शिष्य में, शिष्य लिया कर नेह।

बिलगाए बिलगे नहीं, एक रूप दो देह ॥

गुरु आपको अपने समान कर देगा। आप अपनी दुनिया ही भूल

जाओगे। साहिब की वाणी में वजन है-

नाम पाय सत्य जो बीरा, संग रहूँ मैं दास कबीरा॥

सच मानना, अभी बार-बार चेताकर कह रहा हूँ, जब यहाँ से

चला जाऊँगा तो दुनिया पछताएगी, क्योंकि सत्य है- जो वस्तु मेरे पास

है, ब्रह्माण्ड में कहीं भी नहीं है।

नींद एक गुलामी है। इस गुलामी से आजाद हो जाओ। नींद की

चाह खतरनाक होती है। तब आप कोई काम नहीं करना चाहते हैं। नींद

बड़ी शत्रु है। भजन करने बैठो तब भी यह आड़े आती है। यह नशा बड़ा

आकर्षित करता है। इस पर कहा--

यह जग खावे और सोवे। दास कबीर जागे अरु रोवे।।

मैं भोजन खूब खिलाता हूँ ।

कहें कबीर कमाल से, दो बाते कर ले।

इक साहिब की बंदगी, भूखों को कुछ देय।।

जैसे साहिब की भक्ति की तरफ मुड़ोगे, निरंजन का जोर बढ़ता जाएगा। वो जानता है। निरंजन

को यह तकलीफ नहीं है कि आपको नाम मिला। वो जानता है कि आपको नाम मिला, पार हैं। पर वो आपको एक सीमा में रखना चाहता है। वो चाहता है कि आप इतना आगे न बढ़ सकें, इतनी

शक्तियाँ न पा सकें कि दूसरों को भी इस भक्ति में जोड़ सकें। किसी-न-किसी तरह निरंजन आपके काम खराब करेगा।

कच्चा जीव विचलित हो जाई।।

इसलिए जब आप समर्पित हो गये तो आपका दुःख भी हमारा हो गया, आपका सुख भी हमारा हो गया। साहिब ने एक बात बोली-

अपनी अपनी गरज को, अरज करें सब कोय।

मेरी अरजी है यही, तेरी मरजी होय।।

जब जीवन साहिब को समर्पित किया तो दुःख क्या और सुख क्या। चाहे डुबाओ, चाहे उबारो, सब मंजूर कर लेना है।

तीन लोक में सत्यनाम ही सार है। जो इस नाम में लीन हो जाते हैं, वो ही इस तीन लोक से पार हो पाते हैं । एक तो योगी लोग हैं, जो बड़ी-बड़ी जटाएँ रखे हुए हैं, फिर एक वो हैं, जो तन पर भभूत रमाए हुए हैं, एक मौन धारण किए हुए हैं। इस तरह ये सब युगों से भ्रमित होकर फिर रहे हैं। एक तो वो लोग हैं, जो शिव (हरि) की भक्ति करते हैं, एक आद्य-शक्ति की भक्ति करते हैं, एक वो लोग हैं, जो पितरों की भक्ति करते हैं। इस तरह से सब त्रिताप सहते हुए तीन लोक के स्वामी में ही भूले हुए हैं। एक तो वो हैं, जो अन्न को छोड़कर केवल दूध पी रहे हैं, पर बिना हृदय के साफ किये तो प्रभु नहीं मिलते। हे मनुष्यो, जागो, इन भ्रमों से बाहर निकल सत्यनाम का शरण ग्रहण करो, नहीं तो काल के फंदे में ही फँसोगे।

असंख्य युग तक शंकर जी शून्य में ध्यान करते हैं, पर उन्होंने अपने

में उसे नहीं देखा, फिर साधारण मानव क्यों पागल हो रहा है। त्रिदेव

आदि उसे खोजते हुए थक गये, पर उसका पार नहीं पाया। फिर

दूसरों की क्या मजाल है । वो तो ऐसे ही बेकार में भवसागर में ही

गोते खाते हैं। शिव, सनकादिक, नारद, शारदा, शेष आदि उसकी

स्तुति करते हुए थक गये, पर वो भी उसका संदेश नहीं कह सके।

सब एक निर्गुण, निराकार, निरंजन, ज्योति स्वरूप का ही जाप्

करते रहे, पर सत्य तक नहीं पहुँच सके। ग्रंथों में भी उसकी खबर

नहीं है। नौ नाथ, चौरासी सिद्ध आदि भी भ्रमित ही रहे। कस्तूरी ढूँढ़ते

मृग की तरह कोई उसका भेद नहीं पाया। इसलिए हे मानव, अगर भला चाहता है तो सही और गलत को परख ले।

जो बाहरी उपासना कर रहे हैं, वो उसे अध्यात्म कह रहे हैं । जो

तीर्थ कर रहा है, वो भी कह रहा है कि अध्यात्म यात्रा। जो मूर्ति-पूजा कर रहा है, वो भी उसे अध्यात्म ही कह रहा है। जो निराकार की भक्ति कर रहा है, वो भी कह रहा है- अध्यात्म। नहीं, ये अध्यात्म नहीं है। हमारी आत्मा कैसी है ? क्या प्रक्रियाएँ करती है ? शरीर से कहाँ संबंधित हुई है ? मन से गठान किस बिंदू पर हुई है ? हमारी आत्मा शरीर कैसे बन गयी ? पुनः शरीर और मन से छुटकारा कैसे मिले ? ये अध्यात्म है। दुनिया में भक्ति दो तरह की है। एक है, सत्य-भक्ति, दूसरी है, काल-पुरुष की। जिस चीज़ का नाम भक्ति है, वह कोई भी ख़राब नहीं है। 'भक्ति' शब्द ही आनन्ददायक है। जैसे माँ शब्द अपने आप में इज्जतदायक है, इसी तरह 'भक्ति' शब्द आनन्द का स्त्रोत है।

संतों ने किसी भी भक्ति का खण्डन नहीं किया। पर हमें थोड़ा विचार करना होगा, हर भक्ति का महत्त्व समझना होगा। जैसे समय तो सभी घड़ियाँ बता देती हैं, पर एक घड़ी 20 रुपये की है, एक 300 रुपये की तो एक 1000 रुपये की। क्या इनमें अन्तर नहीं होगा ? जरूर होगा। इसी तरह सभी भक्तियाँ भी एक जैसी नहीं है। एक भक्ति काल-पुरुष की है तो दूसरी परम-पुरुष की। एक भक्ति हमें संसार-सागर में ही भरमाने वाली है तो दूसरी संसार-सागर से परे अमर सत्य की ओर ले जाने वाली।

काल-पुरुष की भक्ति के भी दो पहलू हैं-सगुण तथा निर्गुण। सगुण-भक्ति में धामों का महत्त्व है, देवी-देवताओं का महत्त्व है। इसका लक्ष्य क्या है? इससे सालोक्य तथा सामीप्य मुक्ति मिल जाती है । सगुण-भक्ति का दायरा सीमित है। यदि अमेरिका जाना है तो मेटाडोर या बस द्वारा नहीं जाया जा सकेगा। ठीक इसी तरह इस भक्ति से महानिर्वाण नहीं मिलता। जीव अपने कर्मों के अनुसार ही स्वर्ग आदि में जाते हैं और कर्मों के क्षीण होने पर पुनः मृत्यु-लोक में आ जाते हैं। फिर शुभ कर्मों के कारण अच्छे कुल में जन्म होता है। जैसे शुभ-कर्म करके कोई स्वर्ग में गया, आनन्द में रहा, लेकिन फिर कर्मों के क्षीण होने पर मृत्यु-लोक में ऊँचे कुल में आया। इसके विपरीत यदि उसने पुनः खोटे कर्म कर दिये तो फिर चौरासी में जाएगा। हमारा धर्म भी यही मानता है। हमारे पूर्वज इसी कारण पाप कर्म नहीं करना चाहते थे, पर आज हम पापों में लिप्त हो गये हैं। जो रोगी, पीड़ित आदि हैं, वे चौरासी की धारा से मानव-तन में आए हैं जबकि जो ऊँचे कुल में अच्छे लोग हैं वे स्वर्ग से मानव-तन में आए हैं। लेकिन इतना तो तय है कि चाहे अच्छे कर्म करो, चाहे बुरे, इस भक्ति से अगर सोचो कि मुक्ति मिल जाएगी तो यह नहीं हो पाएगा ।

जो अपने को भक्ति में ज्यादा नहीं रमाना चाहते, वे सगुण- भक्ति ही करते हैं, लेकिन कुछ लोग थोड़ी गहराई में जाते हैं; वे निर्गुण-भक्ति अर्थात् योग, ध्यान आदि पर विशेष बल देते हैं । इनका स्तर थोड़ा ऊँचा है। ये पाँच मुद्राओं को महत्त्व देते हैं, पर ये भी निराकार तक जाते हैं। मुक्ति वाली बात यहाँ भी नहीं है। कुछ मुक्ति की आकांक्षा रखते हुए भी अज्ञान से यह भक्ति करते रहते हैं, क्योंकि दुनिया भक्त के भेद को नहीं जानती है।

योगी, यति, जंगम, सेवड़ा, संन्यासी, वैरागी- ये षट्दर्शन कहलाते हैं। योगी वे हैं, जिनकी जटाएँ और दाढ़ी खुली होगी, हाथ में त्रिशुल होगा। जंगम मयूर मुकूट धारण किये रहते हैं। संन्यासी गेरुए वस्त्र धारण किये रहते हैं, दाढ़ी साफ़ होती है। वैरागी गले में माला डाले रखते हैं, दाढ़ी बढ़ी हुई होती है, बाल भी बढे हुए होते हैं और हाथ में कमण्डल होता है। सेवडे रुद्राक्ष की माला पहनते हैं और भभूत रमाते हैं।

निर्गुण-भक्ति में सारूप्य और सायुज्य दो मुक्तियाँ मिल जाती है। लाखों, करोड़ों साल तक जीव का पुनर्जन्म नहीं होता है, पर प्रलय के बाद जब सृष्टि बनती है तो निर्गुण भक्तों को भी बार- बार जन्म लेना पड़ जाता है। तभी तो साहिब ने सगुण और निर्गुण से परे, ऐसी सत्य-भक्ति की बात की, जिसमें जीव का पुनर्जन्म नहीं होता है। ये तीन लोक खत्म हो जायेंगे। कबीर साहिब ने तथा संतों ने एक ऐसे लोक की बात कही है, एक ऐसे अमर-लोक की, जहाँ प्रलय नहीं है। वह एक अनोखा देश है। यदि वास्तव में हमारे शास्त्र, हमारे बड़े-बड़े महात्मा, संत-पुरुष यह मानकर चल रहे कि आत्मा अमर है तो इस आत्मा का देश भी ऐसा होना चाहिए, जहाँ प्रलय का निशान न हो। वो भी अमर होना चाहिए। तभी तो वह सत्य कहा जायेगा, क्योंकि 'सत्य सोइ जो विनशे नाहीं'।

जिस भी किसी चीज़ का, किसी देश, काल या अवस्था में विनाश हो जाता है, वो सच नहीं हो सकती। उसका विश्वास भी नहीं करना । वासुदेव कृष्ण ने अर्जुन से यही कहा था कि यह आत्मा किसी भी देश, काल या अवस्था में नष्ट नहीं होती। शस्त्र, इसे काट नहीं सकता, अग्नि इसे जला नहीं सकती, वायु इसे सुखा नहीं सकती, पृथ्वी इसे दग्ध नहीं कर सकती, आकाश इसे विलोम नहीं कर सकता। किसी प्रलय, महाप्रलय में भी यह नष्ट नहीं होती, पुरानी नहीं होती, वृद्ध नहीं होती, जवान नहीं होती, बाल अवस्था से भी परे है। यदि महाप्रलय में पूरे तीन-लोक को आकाश विलोम कर लेता है तो अवश्य ही तीन-लोक में जो कुछ भी है, सब झूठ है, सब माया हैं। आकाश यानी शून्य ही निरंजन है; वही मन है । इस शून्य के अन्दर जो कुछ भी है, सब माया है।

मन ही माया तो एक है , माया मनहिं समाय ।

तीन लोक में संस पड़ी, काहे कहूँ समुझाय ॥

साहिब ने जिस देश की बात की है, वो इस रचना से बाहर है। जब तक आत्मा वहाँ नहीं पहुँचती, तब तक यह चक्कर नहीं छूटने वाला। वहाँ न पवन है, न पानी है, न जन्म-मरण है, न माता है, न पिता है, न मैं हूँ, न तू है। साहिब फिर चेता रहे हैं-

चल हँसा सतलोक, छोड़ो यह संसारा।

यह संसार काल है राजा, कर्म का जाल पसारा॥

उस देश में सब जीव सुरक्षित हैं। वहाँ बीमारियाँ, समस्याएँ आदि कुछ भी नहीं हैं। इस दुनिया में तो बड़ा ही झंझट है, पर वहाँ कोई झंझट नहीं है । यहाँ यदि कोई दुर्बल है तो बलवान उसे कष्ट देता है, पर वह लोक बड़ा ही निराला है। वहाँ कोई दुःख नहीं है। वहाँ कोई अपना पराया नहीं है। इस दुनिया में बड़ी पीड़ा है, कष्ट हैं। इसकी व्यवस्था बड़ी ही गन्दी है। कैसा है इसका स्रष्टा! आत्मा तो यहाँ बड़ा कष्ट सह रही है। हम सब अपने बाल बच्चों की सुख- सुविधा, खाने-पीने का ध्यान रखते हैं। हम कभी नहीं चाहते कि उन्हें कोई कष्ट मिले; पर हम देख रहे हैं कि इस दुनिया में बड़ा कष्ट है। यह आत्मा कभी चींटी बनती है, कभी मच्छर बनती है, गन्दी- गन्दी योनियों में जाती है। कौन है इस संसार का नियंत्रणकर्ता ? यदि परमात्मा है तो बड़े दुःख की बात है; सभी दुःखी हैं।

इसलिए हमें विचार करना होगा कि हम कौन-सा लक्ष्य लेकर भक्ति कर रहे हैं। यदि हम स्वर्ग में जाने के लिए भक्ति कर रहे हैं तो यह लक्ष्य हमारा ठीक नहीं है; यदि कष्टों से निवारण के लिए हम भक्ति कर रहे हैं तो यह भी लक्ष्य बहुत छोटा है। हमारा लक्ष्य उस अमर-सत्य की प्राप्ति होना चाहिए ताकि हम सदा-सदा के लिए इस भवसागर से छूट सकें। इसलिए हमें सगुण-निर्गुण-दोनों भक्तियों से ऊपर उठना होगा; पूर्ण सद्गुरु की खोज करनी होगी; सद्गुरु के सच्चे नाम को प्राप्त करना होगा। ऐसे में ही हम अपने सही लक्ष्य को प्राप्त कर पायेंगे। पर यदि हम छल- कपटी और निरंजन की भक्ति कराने वाले गुरुओं के चंगुल में फंसे रहे तो हमारा अमोलक मानव तन बेकार में चला जाएगा। इसलिए हमें बिल्कुल सतर्क रहना होगा भक्त क्षेत्र में, क्योंकि

दुर्लभ मानुष जन्म है, मिले न बारम्बार ।

तरुवर ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि न लागे डार ॥

33 करोड़ देवता, पाँच तत्व आदि की भक्ति सगुण-भक्ति में आती हैं। यह सरल भक्ति है। इसमें भी गुरु ज़रूरी है। वो केवल रास्ता बता देता है कि कैसे भक्ति करनी है। इसमें तीर्थ, व्रत, यज्ञ, स्नान, मूर्ति पूजा आदि का माहात्म्य है। इसमें भी किसी एक इष्ट की भक्ति करते हुए साधक उसे प्राप्त करता है।

पर दुनिया सगुण-भक्ति भी ठीक से नहीं जानती है। जो सभी देवी-देवताओं की मना रहा है, वो सगुण-भक्ति भी ठीक से नहीं कर रहा है। मान लो कि कोई हनुमान जी की भक्ति कर रहा है। यदि वो शिवजी की भक्ति भी कर रहा है तो हनुमान जी उससे प्रसन्न नहीं हो सकते हैं । ऐसा इसलिए कि उस भक्त को हनुमान जी पर पूरा भरोसा नहीं है कि वो उसकी मदद करेंगे, उसे नरक में जाने से बचा लेंगे। इसलिए हम जिस किसी की भी भक्ति कर रहे हैं, पूरे भरोसे के साथ करनी होगी ताकि कम से कम उसे प्राप्त कर सकें। अगर हमारा ध्यान सब में रहेगा तो अन्त में किसी को भी प्राप्त नहीं होंगे ।

फिर आज तो सगुण-भक्ति करने वाले पाप-कर्म भी किये जा रहे हैं। भक्ति में पाप की जगह नहीं है। दुनिया सगुण भक्ति भी ठीक से नहीं जानती है। 33 करोड़ देवताओं का वास हमारे शरीर के अन्दर है। पेट में विष्णु जी का वास है। पेट में मांस, शराब आदि कोई भी गंदा पदार्थ मत डालो तो यह विष्णु जी का सच्ची भक्ति है। पैरों में उपेंद्र जी हैं । पैरों को किसी ग़लत दिशा में न ले जाओ तो यह उपेंद्र जी की भक्ति है।

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साहिब ने कहा कि काल, जो पूरे तीन-लोक को सता रहा है, का ही सारा संसार ध्यान कर रहा है । जिस निराकार की बात वेद कर रहा है, वही काल है, पर कोई उसका भेद नहीं पा रहा है। उसी के तीन बेटे त्रिदेव हैं और सारा संसार उन्हीं की सेवा, उन्हीं की भक्ति कर रहा है। त्रिगुण के जाल में सारा संसार फँस गया है। जिनकी यह जग भक्ति करता है, अंत में वही उसे खा जाता है । सभी जीव सत्पुरुष के हैं, परम-पुरुष के हैं, साहिब के हैं, पर यम ने, काल ने धोखे से उन्हें अपने जाल में फँसा लिया है। पहले तो यम असुर रूप में जीवों को सता रहा है। दूसरे फिर वो अवतार धारण कर असुरों का संहार कर रहा है । जीव कष्टों से बचने के लिए पुकार कर रहे हैं, रक्षा के लिए परमात्मा को पुकार रहे हैं। जीव सोच रहे हैं कि यह हमारा स्वामी है, रक्षक है। काल विश्वास देकर धोखा कर रहा है । उसकी प्रभुता देखकर जीव विश्वास कर रहे हैं कि यह ही हमारा रक्षक है, पर अंतकाल में वो ही जीवों को फिर निराश कर रहा है, उनका भक्षण कर रहा है। काल दयाल-पुरुष का भेष बनाकर, दया दिखाकर बाद में उन्हें मरवा रहा है।

साहिब परम-पुरुष को कहते हैं और 'बंदगी' प्रणाम का पर्यायवाची है। इस तरह उस परम-पुरुष को प्रणाम का दूसरा नाम 'साहिब-बंदगी' है । साहिब-बंदगी पंथ कोई कबीर पंथ नहीं है । यह संत-मत भी नहीं है । यह तो संतों का सिर्जनहार है। संत-मत इसलिए नहीं है कि कबीर साहिब से नाम लेने से पहले सभी काल-पुरुष की भक्ति ही तो कर रहे थे। पहले संत शब्द ही नहीं था। इसलिए उनकी वाणी में काल-पुरुष की भक्ति से संबंधित शब्द भी हैं, जिन्हें पढ़कर भक्त लोग भ्रमित हो जाते हैं। और संकलनकर्ता कोई संत तो है नहीं कि सत्य-भक्ति से संबंधित शब्द छाँटकर अलग कर सके। तो दूसरा हम कबीर पंथी भी नहीं हैं । वर्तमान में जितने भी कबीर पंथी हैं, वो साहिब की मूल शिक्षा पर चल ही नहीं रहे हैं, भूल चुके हैं। काल-पुरुष सबको उलझा देता है। कइयों में ऐसा है कि दीक्षा हमसे लो पर गुरु साहिब को मानो। कबीर साहिब यह कहकर नहीं गये कि मेरी भक्ति करना। वो तो सदगुरु की भक्ति के लिए बोल गये। वास्तव में मुझे कबीर साहिब की वाणी को लेने की जरूरत भी नहीं है। यह तो मैं मजबूरी में उदाहरण के लिए, अपनी बात का प्रमाण देने के लिए ले रहा हूँ, क्योंकि मैं जो बोल रहा हूँ, वो अनुभूति की बात कर रहा हूँ, ऑखों देखी बात कर रहा हूँ जबकि कबीर साहिब की वाणी को तो कई युगों से तोड़- मरोड़कर मनमाने ढंग से प्रस्तुत किया जा रहा है। इसलिए यदि आप कबीर साहिब की वाणी को ही पढ़ेंगे तो भी भ्रमित हो जायेंगे। क्योंकि शुद्धता नहीं रह गयी है। मैं आपके सामने शुद्ध अध्यात्म पहुँचा रहा हूँ इसलिए आपको कबीर साहिब या संतों की वाणी के गिर्द न घुमाकर अपने गिर्द ही घुमा रहा हूँ ।

एक ने कहा कि आप निरंकारी भी नहीं हैं, राधा स्वामी भी नहीं हैं, जैनी भी नहीं हैं, मुसलमान भी नहीं हैं, फिर मामला क्या है? फिर क्या हैं ? मैंने कहा कि यह फ़िलासफ़ी समझने में बड़ा समय लग जायेगा। किसी को इस्लाम समझाना हो तो क़ुरान आगे रख दो, समझ जायेगा हिंदू धर्म समझाना हो तो बता दिया जाता है कि त्रिदेव हैं। ईसाई धर्म समझाना हो तो क्राइस्ट का संदेश दे दो। किसी को राधा स्वामी बताना हो तो भी बता दिया जाता है कि यह-यह है, फलाने ने यूँ कहा। और फलाने ने यूँ कहा पर किसी को साहिब-बंदगी समझाना हो तो पसीना छूट जाता है। इसलिए आप परेशान हो जाते हैं। मैंने समझा दिया है आपको। आपके बस की बात नहीं है।

पहले जितने भी आए, काल की भक्ति कही। हम ऋषि-मुनियों के उदाहरण नहीं दे रहे हैं। क्योंकि उन्होंने तो काल की बात की है। हमारी फ़िलासफ़ी तो ऐसी है कि एक छोटा-सा लड़का गाता फिरता है- मुझे अपने ही रंग में रंग दे फिरे, साहिब अपने ही रंग में रंग दे फिरे॥ जो कह रहे हैं कि किसी को नहीं मानता, ठीक कह रहे हैं। हम मीराबाई की फ़िलासफ़ी पर नहीं हैं। क्योंकि उन्होंने तो पहले सगुण भक्ति की है, सगुण पद भी गाए हैं। बाद में जब रविदास जी से दीक्षा ली तो सत्य- भक्ति में आई। तो पहले वाला कोई पढ़ेगा तो कहेगा कि एक ही बात है। हम अंतर ठीक से समझाएँगे। पूलट साहिब भी पहले निरंजन के दायरे में घूम रहे थे। नानक देव स्वयं ओंकार की उपासना कर रहे थे। बाद में साहिब से नाम लिया। हम एक को बॉयकाट नहीं कर रहे हैं। उसकी वाणी पर चलो, यह नहीं कह रहे। जो लोग कह रहे हैं कि किसी को नहीं मानता, वो ठीक ही कह रहे हैं। कबीर की फ़िलासफ़ी पर चलना, यह भी नहीं कह रहा हूँ। समय के साथ लोगों ने उनकी वाणी को इतना तोड़-मरोड़ दिया है कि कुछ कहते नहीं बनता। भ्रमित ही जाता है इंसान। सबने अपनी बात बीच में मिला दी है। अपनी सुविधा के अनुसार लिख दिया है। इसलिए मैं जो आपके पास पहुँचा रहा हूँ, वह शुद्ध है।

मेरे गुरुदेव मेरे गुरुभाइयों को बोल गये कि इन्हें ही गुरु मानना मेरे जाने के बाद, क्योंकि मैं अब अपने बिंदु पर जा रहा हूँ। तो हम सद्गुरु फ़िलासफ़ी पर चल रहे हैं।

गुरु आज्ञा ले आवही, गुरु आज्ञा ले जाहीं। कहे कबीर तत्ता दास को, तीन लोक डर नाहीं।।

तो मैं आपको शुद्ध चीज़ दे रहा हूँ। माँ ने बेटे को जन्म दिया तो बाद में खिलाया, पढ़ाया, लाड़-प्यार देकर बड़ा किया। नाम-दान के समय मेरा काम ख़त्म नहीं हो गया। माँ को परवरिश करनी होती है । तो मैं इसलिए दौड़ता घूम रहा हूँ । रोज के 5-5 सत्संग दे रहा हूँ । इसलिए हमारी फ़िलासफी है- सद्गुरु भक्ति।

जो सत्लोक की बात कह रहे हैं, उनमें भी भ्रांतियाँ हैं। वे तो पढ़कर बोल रहे हैं। कोई कहे कि जम्मू शहर समुद्र के बीच टापू पर है तो जो जम्मू में रहने वाले हैं, उनको कैसा लगेगा! ऐसे ही मैं जान जाता हूँ कि ये खुद नहीं गये हैं। मैं तो स्वर्ग जाना हो तो चला जाता हूँ, ब्रह्माण्ड में घूमता रहता हूँ । पर सच यह है कि मैं अपने से बाहर नहीं निकलना चाहता हूँ।

कहा कि भक्ति का सार बताता हूँ । अब तक बहुत भक्त संसार में हुए; भक्ति तो की, पर युक्ति नहीं आई । हर चीज की एक युक्ति होती है। महायोगेश्वर शिवजी आदि भक्ति जानते हैं, जिसमें 'ओंकार' नाम का जाप करना होता है । उस ओंकार से ही जगत की उत्पत्ति है । पर इस भक्ति को गुप्त रखा गया । इसे केवल शिवजी ही जानते हैं, कोई और नहीं जानता: पर मेरी भक्ति इससे परे हैं। जिस भक्ति की बात मैं कर रहा हूँ, उसे योगेश्वर भी नहीं जानते हैं, फिर आम संसारी किस गिनती में है ! सब निरंजन का ही ध्यान लगा रहे हैं। उसे भी कोई बिरला ही जानता हैं, फिर आगे की बात कोई कैसे मानेगा! इसलिए मेरी भक्ति कोई नहीं जानता है । सभी निरंजन की भक्ति ही कर रहे हैं। कोई भी सच्चे घर को नहीं पाता है।

तू राम सुमर पछतायेगा।

हम कह रहे हैं।

तू नाम सुमर पछतायेगा।

इसलिए मेरी भक्ति कोई नहीं जानता है । सभी निरंजन की भक्ति ही कर रहे हैं। कोई भी सच्चे घर को नहीं पाता है।

हम आपको शुद्ध चीज़ दे रहे हैं। हम घी खिला रहे हैं और वो भी शुद्ध दे रहे हैं, बिना लस्सी वाला दे रहे हैं। बाकी से अलग भक्ति दे रहे हैं। बाकी काल की भक्ति दे रहे हैं, हम परम-पुरुष की भक्ति दे रहे हैं।

बाकी जितने भी पंथ हैं, सत्य मानना, सब काल-पुरुष की भक्ति कर रहे हैं। कुछ हमारी तरह बातें बोल रहे हैं। सच खंड, अमर लोक, सत्पुरुष की बात कर रहे हैं, पर वास्तव में भक्ति वो भी काल-निरंजन की ही कर रहे हैं। क्योंकि वाणियों में वो बातें लिखी हैं, इसलिए वो पढ़कर बोल रहे हैं। लेकिन उनके पास अपना कुछ नहीं है। अन्दर से वो खालमखाली हैं।

हे धर्मदास ! जो तुम सच्ची भक्ति पूछ रहे हो तो पहले यह समझ लो कि नाचना-गाना, घंट बजाना, मूर्ति पूजा करना आदि भक्त में नहीं आते। फिर रोना, गाना आदि भी भक्ति नहीं है। इन चीजों से साहिब खुश नहीं होते हैं । ये सब तो काल का जाल है, क्योंकि मन ही रोता है, मन ही गाता है, मन ही जागता है, मन ही सोता है। इसलिए जब तक भीतर लग्न नहीं लगती, तब तक सुर्ति चेतन नहीं हो सकती। जब तक सत्यनाम नहीं मिल जाता, तब तक कौन-सी भक्ति हुई ! सच्चे साहिब के घर का तो पता नहीं है, फिर झूठे ही मन में खुश होते रहने से क्या होता है! ऐसे तो कहने-सुनने को बहुत सारे भक्त बन जाते हैं, पर सच्ची भक्ति का भेद मालूम नहीं होता। बिना देखे ही उसका बखान करते रहने से कुछ नहीं होता। सारा संसार ऐसे ही बाहरी चीजों में उलझा हुआ है, फिर संसार-सागर से पार कैसे पाया जा सकता है !

धर्मदास तुम हो बुद्धिवंता। भक्ति करो पावो सतसंता।। एक पुरुष है अगम अपारा। ताको नहीं जाने संसारा। ताकी भक्ति से उतरे पारा। फिर के नहिं ले जग अवतारा।। भक्ति ही भक्त भेद बहू भारी। यही भक्ति जगत ते न्यारी।।

हे धर्मदास ! तुम बुद्धिमान हो, इसलिए संतों के संग में जाकर सत्य-भक्ति को प्राप्त करो। एक पुरुष अगम्य है, उसको संसार नहीं जानता है । उसकी भक्ति से ही जीव संसार-सागर से पार होकर फिर वापस नहीं आता है। यही सच्ची-भक्ति का गुप्त भेद है, जो संसार में प्रचलित सब भक्तियों से न्यारी है।

मेरे एक शिष्य वी.जे. कनव ने 8 जून 2012 को प्रात: 10.35 बजे मोबाइल फोन पर पूछा कि साहिब जी! हम सिमरन सही कर रहे हैं या कहीं भटक रहे हैं; वो क्या चिन्ह, क्या लक्षण है, जिन्हें देखकर हमें पता चले कि हम आपकी राह पर ठीक जा रहे हैं, मार्गदर्शन करें । मैंने कहा - वी.जे. कनव, "मन और माया का नशा तुम्हारे सिर से उतार दिया है, संसार की आसक्ति खत्म कर दी। मन पर 'नाम' की नकेल लगा दी है। 'आत्मा' को चेतन कर दिया, आत्मा 'मन' की तरंगों को पढ़ने लग गई । सुरति को मन और माया के दायरे से निकाल कर 'साहिब' की सुरति के साथ जोड़ दिया । काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहँकार को एक सीमित दायरे में बाँध दिया। ये सब कार्य साहिब-कृपा से हुआ । इसमें तुम्हारा एक पैसे का भी सहयोग नहीं है, न ही सुमिर्न का और न ही किसी साधना का। तुम्हारा प्रश्न ही तुम्हारी अनुभूतियों का उत्तर है। 'सुमिरन' है तो गलत नहीं होगा सही ही होगा।"

सद्गुरु भक्ति का मतलब ही यह है कि सदगुरु की आज्ञानुसार चलता रहे। जिन बातों के लिए मना किया वो कभी न करे। जो करने को कहा, वो मरते दम तक करता रहे। धन से सद्गुरु की सेवा करना भी अच्छी बात है, तन से सदगुरु की सेवा करना बड़ी बात है; पर 'मन' से सद्गुरु सेवा करना बहुत कठिन है। यदि आपनी "मैं" बीच में आ गई तो मन से सत्गुरु सेवा नहीं हो पायेगी। अपनी "मैं" को हटा देना बहुत कठिन कार्य है। इसलिये 'मन' से 'सदगुरु' की सेवा कोई विरला ही कर पाता है। इसमें सत्गुरु को 'परमपुरुष' करके मानना है। उनके हरेक शब्द को 'परमपुरुष' को आज्ञा समझकर मानना है। यह भरोसा दिल में हमेशा रखना है। भरोसे की नींव पर ही 'सद्गुरु भक्ति' का महल खड़ा हो पायेगा। मन का कोई तुर्क बीच में नहीं आने देना है, क्योंकि 'मन' किसी भी तरह से सतगुरु की सेवा नहीं करने देना चाहता। 'सदगुरु' की पूजा मात्र से ही समस्त ब्रह्माण्ड की पूजा हो जाती है । page 51

भाइयो, हम आपको समझाने आए हैं। आप हमारे हो, आप अमरलोक के हो, पर निरंजन के देश में रह रहे हो।

कैसे होगा आत्म साक्षात्कार

सभी आत्मा का साक्षात्कार करना चाहते हैं। सभी चाहते हैं कि आत्मा को जानें, पर आत्मा अनुभव नहीं हो रही है, दिखाई भी नहीं दे रही है। शास्त्राकारों ने जो वर्णन किया है, उसके अनुसार तो आत्मा का किसी भी देश, काल और अवस्था में नाश नहीं है। जब चिंतन करें तो पता चलता है कि यह घोर आश्चर्य है। आत्मा के ज्ञान बिना मानव जगह-जगह सिर पटक रहा है।

आत्मज्ञान बिना नर भटके, क्या मथुरा क्या काशी।।

इस तरह आत्मतत्व गौण है, पता नहीं चल रहा है। हम सब जाने-अनजाने कह तो रहे हैं कि मन-माया के बीच फँसे हैं, इसलिए छूटना भी चाह रहे हैं, निकलना चाह रहे हैं, चाह रहे हैं कि अपने को जानें। सभी कह रहे हैं कि आत्मा का साक्षात्कार करना है। आत्मा क्यों नहीं दिख रही है? इस बात को जानने की आवश्यकता है। आओ, देखते हैं, समझते हैं कि आत्मा का पता कैसे चले, आत्मा का बोध कैसे हो।

सुरति और निरति के मिलने से आत्मतत्व का पता चल जायेगा। फिर क्या है सुरति और क्या है निरति? ये कैसे मिलें? आओ, इस ओर चलते हैं।
जैसा कि पहले कहा कि अगर बाहरी दृष्टि से भी देखें तो पता चलता है कि सुरति विशेष चीज है। हम सब बाहरी कामों को करने के लिए सुरति का इस्तेमाल करते हैं। दुनिया के जितने भी कार्य हम करते उनमें सुरति चाहिए। बोलना हो, सुनना हो, चलना हो या कोई अन्य कार्य करना हो, सुरति नितान्त आवश्यक है। इसी सुरति का दूसरा नाम ध्यान है। यदि एक्सीडेंट हो जाए तो ड्राइवर को यही कहते हैं कि भाई, ध्यान कहाँ था? इसी ध्यान या सुरति का दूसरा हिस्सा है- निरति। निरति शरीर में फँसी हुई है। यह शरीर को चलाने वाली शक्ति है। हाथ जो चल रहे हैं, निरति है। निरति का ही नाम है- जीव। निरति का वास आँखों के पीछे है, पवन में समायी है। श्वास खुद-ब-खुद नहीं चल रही है, लगेगा कि कोई ले रहा है और छोड़ रहा है। इस क्रिया को करने वाला है- निरति। यही है- जीव। इसी श्वास से पूरा शरीर चेतन है। इसी में निरति है। यह श्वांसा द्वारा 9 नाड़ियों में से 72 नाड़ियों में, फिर पूरे जिस्म में फैली है। श्वांसा में आपकी हाजिरी है। कोई मर गया तो कहते हैं कि यम प्राण निकालकर ले गया। यानी वायु में आत्मा का वास है।

तो निरति श्वांसा द्वारा शरीर में समाई हुई है जबकि सुरति मन के साथ बाहर घूम रही है। इस तरह सुरति को मन ने और निरति को माया ने पकड़ रखा है। ये दोनों को एक नहीं होने दे रहे हैं। इन्हीं को एक करने के लिए ध्यान किया जा रहा है। जब ये दोनों मिल जायेंगे तो आत्म-साक्षात्कार हो जायेगा। ध्यान एकाग्र करने से यही तात्पर्य है कि किसी बिंदू पर पूर्ण रूप से सुरति और निरति को क्रमशः बाहरी जगत् से और शरीर से निकालकर एकाग्र किया जाए। ध्यान एकाग्र करने से यही तात्पर्य है कि किसी बिंदू पर पूर्ण रूप से सुरति और निरति को इकट्ठा करके एकाग्र किया जाए। अब मन ने कैसे पकड़ा सुरति को? मन के चार रूप हैं- मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। जब यह संकल्प करता है तो इसे मन कहते हैं। इच्छाएँ आत्मा की नहीं हैं, शरीर और मन की आवश्यकता है। कोई निश्चय करने पर यही मन बुद्धि कहलाता है। मान लो, मन ने इच्छा की कि कमरा बनाना है। फिर बुद्धि इस पर निश्चय करती है कि बनाएँ या नहीं, पैसा है या नहीं। मान लो, बुद्धि ने हाँ कर दी, तो फिर तीसरा रूप चित्त सक्रिय हो जाता है। चित्त बताना शुरू करता है कि लेबर वहाँ फलानी जगह मिलेगी, सीमेंट वहाँ मिलेगा, रेत, बजरी के लिए फलाने को आर्डर देना है। जब हम चलकर वहाँ जाते हैं तो वो मन का चौथा रूप अहंकार कहलाता है। इसलिए जितनी भी अनुभूतियाँ हैं- मेरा घर, मेरे बच्चे, यह सब मन है।
सुरति ध्यान है। कभी यह ध्यान इच्छाओं में, कभी निश्चय में, कभी याद में लगा रहता है। बस, ऐसे ही उलझा रहा है मन आत्मा को। मन ही इच्छा करता है। मन और इंद्रियों की साँठ-गाँठ है। ये मिलकर आत्मा को परेशान कर रहे हैं। इन सब मिल जीव को घेरा।। आत्मा का जिन कर्मों से कोई संबंध नहीं है, वो किये जा रही है। जो भी काम हो रहे हैं, शरीर के निमित्त ही। खेती-बाड़ी का आत्मा से क्या संबंध। जितने भी कर्म हैं, लक्ष्य एक ही है, शरीर की आवश्यकताओं की पूर्ति। इन सब कर्मों में आत्मा भी शामिल हो गयी। आत्मा ने अपने को शरीर माना। यही अज्ञान है। आत्मा में इंद्रियाँ ही नहीं हैं। आत्मा का भोग-विलास से क्या संबंध। किसी से कोई संबंध नहीं है आत्मा का, पर आत्मा इन कामों में प्रविष्ट हो रही है। जैसे मकान खड़ा है तो नींव आधार है, इसी तरह अज्ञान ही इस संसार का आधार है। ज्ञान हो जाने पर संसार का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। वशिष्ठ मुनि से जब राम जी ने संसार के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा- हे राम, किस संसार की बात कर रहे हो। संसार कभी उत्पन्न ही नहीं हुआ है। यह तुम्हारे चित्त का परिणाम है। चित्त का निग्रह करो, संसार का अस्तित्व ही मिट जायेगा। जो कुछ भी हम अनुभव कर रहे हैं, मन है। 24 घंटे मन आत्मा को भरमाए रहा है। ज्ञान की प्राप्ति के बाद संसार का अस्तित्व उसी प्रकार समाप्त हो जाता है, जैसे रस्सी को साँप समझ लेने का भ्रम।
मन 24 घंटे आत्मा को भ्रमित किये हुए है। आखिर क्यों? क्योंकि जितने भी काम हैं, उनमें आत्मा की ऊर्जा चाहिए। यदि आत्मतत्व को निकाल दो तो संसार में कुछ नहीं होगा, वीरान हो जाएगा संसार। यदि सब आत्मनिष्ठ हो जाएँ तो कैसा होगा। कोई काम नहीं करेगा फिर। क्योंकि तब आत्मा को पता चल जाता है कि संसार का कोई भी पदार्थ उस तक नहीं पहुँच सकता, उसे किसी चीज की जरूरत नहीं है। इसलिए मन इसे भ्रमित किये हुए है।

मन बेहद गंदी चीज है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार मन की वृत्तियाँ हैं। ये पाँचों बड़ी गंदी चीजें हैं। ये मन की सहायक हैं। ये जगत् के आधार हैं। ये ही शस्त्र हैं। इन्हीं से मन आत्मा पर वार करता है।

जैसे बुखार पकड़ लेता है तो मुख कड़वा हो जाता है, इसी तरह मन ने सुरति को पकड़ा हुआ है। पूरी दुनिया मन की तरंग में उलझी हुई है। सृजन को स्थिर रखने के लिए मन ने काम, क्रोध आदि को उत्पन्न किया। यदि काम न होता तो न ही विषय-विकार होते और न ही सृजन आगे बढ़ता। यदि लोभ न होता तो कोई संग्रह ही नहीं करता। मोह नहीं होता तो कोई किसी को न पालता। जंगल में छोड़ देते तब माँ-बाप अपने बच्चों को या नदी में बहा देते।

जिस तरह पिंजरे का हरेक तार पंछी को कैद करने के लिए है, इसी तरह मन की प्रत्येक वृत्ति आत्मा को कैद करने के लिए है। ये सब मिलकर सुरति को बाहर उलझाए हुए हैं। दूसरी ओर निरति माया के साथ उलझी है। वो श्वास के साथ इंद्रियों में उलझी है। शरीर में सार ही श्वास है। गोरखनाथ की कबीर साहिब से गोष्ठी हुई तो गोरखनाथ ने पूछा-

गोरख: काया मध्ये सार क्या? साहिब: काया मध्ये स्वंसा सार। गोरख: कहाँ से उठत है, कहाँ को जाय समाय? साहिब: शून्य से उठत है, नाभि दल में आय। गोरख: हाथ पाँव इसके नहीं, कैसे पकड़ी जाय? साहिब: हाथ पाँव इसके नहीं, सुरति से पकड़ी जाय।

सुरति के दंड से, घेर मन पवन को, फेर उलटा चले।।

सुरति और निरति का मेल नहीं हो रहा है, तभी आत्मा का साक्षात्कार नहीं हो रहा है। यह बहुत बड़ा रहस्य है। असल में श्वास शून्य से नाभि में चक्कर काट रही है। इसे ऊपर की ओर पलटना है, तभी सुरति और निरति का मेल हो पायेगा। गोस्वामी जी भी कह रहे हैं-

उलटा जाप जपा जब जाना, बाल्मीकि भये ब्रह्म समाना।।

पलटू साहिब भी तो यही कह रहे हैं-

अरे हॉ रे पलटू, ज्ञान भूमि के मध्य चलत तहूँ उलटी स्वाँसा।।

इस श्वास को शीश से सवा हाथ ऊपर शून्य की ओर ले जाना है। अभी तो यह आदत नहीं है, पर धीरे-धीरे आदत हो जाने से सहज हो जायेगा। यहाँ साहिब कह रहे हैं-

पवन को पलट कर, शून्य में घर किया, धर में अधर भरपूर देखा। कहूं कबीर गुरु पूरे की मेहर से, त्रिकुटी मध्य दीदार देखा।।

ध्यान रहे कि सुरति के द्वारा श्वास ऊपर की ओर चलेगी। इसलिए--

सकल पसारा मेटि कर, मन पवना कर एक। ऊँची तानो सुरति को, तहाँ देखो पुरुष अलेख।। जब श्वास ठीक ऊपर की ओर चलेगी तो शरीर खाली होने लगेगा, सुरति और निरति मिलने लगेंगी। ऐसे समय में मन चालाकी से सुरति को दूसरी जगह ले जायेगा और उसी समय निरति नीचे नाभि में आ जायेगी, क्योंकि वो श्वास में है और श्वास सुरति के सहारे ही ऊपर जा रही थी। अतः सारा खेल ही समाप्त हो जायेगा। इसलिए साहिब कह

पल पल सुरति संभाल।। सुरति के सहारे ही निरति ऊपर की ओर चलेगी। सुरति के दंड से घेर मन पवन को, फेर उलटा चले।। वाह, मन को क्यों घेरना? क्योंकि यह सुरति के अन्दर, निरति के अन्दर समाया हुआ है। सुरति और श्वांसा एक कर दोगे तो श्वांसा अष्टम चक्र की ओर चलने लगेगी। ऐसे में सुरति का सिमटाव होने लगता है। मन ऐसा नहीं होने देता है। वो सुरति को चुपके से हटा देता है। जब नाभि में श्वांसा गिरेगी तो पता है क्या होगा। श्वास के गिरते ही निरति बिखर जायेगी, शरीर में समा जायेगी। अब जब समा गयी तो सुरति का शुद्ध रूप नहीं मिल पायेगा। वास्तविक रूप दोनों के मिलने के बाद मिलेगा।

तन थिर मन थिर बचन थिर, सुरति निरति थिर होय। कहैं कबीर वा पलक को, कल्प न पावै कोय। ।

वो एक पल कल्पांतर की साधना से भी उत्तम है। पर यह पल इतनी आसानी से आता नहीं है।

इड़ा पिंगला चलती हैं तो साँस नाभि में आती है। इड़ा बायाँ स्वर है और पिंगला दायाँ स्वर है। जब दोनों बंद होगी तो सुषुम्ना खुलेगी। इसी को कह रहे हैं-

बाहर का पट बंद कर, अन्दर का पट खोल।।

इड़ा पिंगला के मध्य सुषुम्ना से होती हुई श्वास शीश से सवा हाथ ऊपर शून्य की ओर चलेगी, जहाँ सुरति और निरति का मेल होना है, पर मन की चेष्टा होगी कि सुरति और निरति न मिल पाएँ। वो ध्यान को हटाएगा, भगाएगा कहीं और। मत सोचना कि अब यह दिखे, वो दिखे। देखते रहो कि मन कहाँ जा रहा है। क्योंकि इसी को नियंत्रित करके तो आत्म-साक्षात्कार होगा। Page ५७

राजा जनक द्वारा आत्म-ज्ञान माँगने पर अष्टावक्र ने उनसे कहा- मैं तुम्हें दो मिनट में आत्मज्ञान देता हूँ पर अपना तन, मन, धन मुझे दे दो। राजा जनक ने कहा- दिया। अष्टावक्र ने कहा कि आज से तुम्हारा मन मेरा है, तुम्हारा तन मेरा है और धन भी मेरा है। इसलिए हम आज्ञा देते हैं कि मन से कोई इच्छा नहीं करना, बुद्धि से कोई फैसला नहीं करना और चित्त से कुछ याद नहीं करना और अहंकार में आकर कोई क्रिया नहीं करना। फिर कहा- आँखें बंद करो। राजा जनक ने आँखें बंद कीं। अष्टावक्र ने पूछा- कुछ पता चला। राजा ने कहा- हाँ, अनुभव हो गया।

मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार का निग्रह करने के बाद जो बचता है, वो ही आत्मा है। राजा जनक पात्र थे, इसलिए दिखा दिया। ...इस तरह जैसे -जैसे मन एकाग्र होता जाएगा, शरीर खाली होता जाएगा। शरीर श्वास के बिना मुरझाने लगता है। यह चेतन ही श्वांसा से है। मन श्वास को नीचे लाने लगता है। तब चाहोगे कि हिलूँ तो नहीं हिल पाओगे। यह तो पता चलेगा कि हाथ यहाँ हैं, पैर यहाँ हैं, पर आज्ञा नहीं मानेंगे। ऐसे में मन डरायेगा कि शरीर नहीं मिलेगा। बड़े- बड़े यहाँ पर डर जाते हैं और शरीर के विषय में सोचने लगते हैं। फिर लगेगा कि घोर अंधकार में सिमटता जा रहा हूँ। हरेक को शरीर से मोहब्बत है। कुछ शरीर को बलात् ढूँढने लगते हैं। फिर धीरे-धीरे लगेगा कि केवल श्वांस हूँ। मन श्वास को नाभि में लाकर आपको तंग करना चाहता है, हताश करना चाहता है, पर लगे रहना। जैसे ही शीश से सवा हाथ ऊपर शून्य में स्थित हो जाती है श्वास, इसी को कह रहे हैं-

शून्य महल चढ़ बीन बजाय, खुले द्वार सतघर की।।

जब शून्य पलटने लगती है तो अपना वजूद भी मिटने लगता है। जो यह अनुभूति है कि 'फलाना हूँ'....भूलने लगता है। जैसे ही शून्य पलटती है तो आत्म-साक्षात्कार हो जाता है।

आपको बार-बार अमर-लोक की बात इसलिए बता रहा हूँ कि आपके दिल में पक्की इच्छा बनाना चाहता हूँ कि अमर-लोक में जाना है, फिर लौटकर इस दुनिया में नहीं आना है। यानी यदि जीते जी नहीं भी पहुँच सके तो भी पक्की इच्छा हो जायेगी तो मरकर वहीं जाओगे। इसलिए जब सच्चा नाम मिल जाए तो बाकी को छोड़ देना, क्योंकि दो जगहों पर विश्वास रहेगा तो कहीं के नहीं रह जाओगे। इसलिए-

एक नाम को जानकर दूजा देई बहाय।।

जब पूर्ण गुरु का सच्चा नाम मिल जाए तो बाकी सब आशा छोड़ देना। वो नाम आपको अमर-लोक ले जायेगा। तब उस परम तत्व में समाकर परम आनन्द में खो जाओगे।

इंद्रियों के मज़े में जब आत्मा खो जाती है तो आनन्द प्रतीत होता है; पर पूर्ण आनन्द नहीं होता। अंदर की दुनिया में खो जाती है तो भी पूर्ण आनन्द नहीं होता। 10वें द्वार से निकल जाती है तो भी पूर्ण आनन्द नहीं मिलता। वो 1 प्रतिशत रह जाता है। यह 1 प्रतिशत का रह जाना ही मन की सीमा में ही रह जाना है, अमर - लोक नहीं पहुँच पाना है। पर पूर्ण सद्गुरु मिलता है तो यह अपने में ही खो जाती है। फिर यह अपने में से बाहर नहीं निकलना चाहती है। इस तरह जब अमर-लोक में चली जाती है तो परम तत्व में खोकर परम परम आनन्द में लीन हो जाती है। यही तो सच्चा आनन्द है, जो परम शुद्ध आनन्द है। जब तक तीन लोक की सीमा में है, तब तक पूर्ण आनन्द मिल ही नहीं सकता है। इस तीन लोक की सीमा से परे जाकर ही पूर्ण आत्मानन्द को पाया जा सकता है, परमानन्द को पाया जा सकता है। बस, सद्गुरु यानी पूर्ण गुरु मिल जाए तो यह काम हो जायेगा। पलटू साहिब कह रहे हैं-

पलटू पावै सहज में, सतगुरु की है देर। इहाँ उहाँ कुछ है नहीं, अपने मन का फेर।।

सुमिरण क्या है? सुमिरण आत्मा तक पहुँचने का द्वार है, एक रास्ता है। बड़े कम लोग हैं, जो सुमिरण को समझते हैं। आइए, सुमिरण बताता हूँ। वासुदेव ने कहा कि हे अर्जुन! जो गुज़र चुका, वो निरर्थक है, उसका कोई मतलब नहीं है। अगर पहले राजा थे, आज राज्य नहीं है तो याद करने से कुछ लाभ नहीं होने वाला है। अतीत अर्थहीन है। अतीत का कुछ याद करना समय नष्ट करना है। भविष्य अनिश्चित है; उसका कोई पता नहीं है। अनिश्चित का संकल्प अच्छा नहीं है। किसी कारण से प्लैन किया हुआ काम नहीं भी बन सकता है। इसलिए अनिश्चित है। इसलिए तू अतीत का कुछ भी याद नहीं कर और भविष्य की कल्पना भी नहीं कर। तू वर्तमान में जी।

मैंने कइयों से पूछा कि वर्तमान क्या होता है? कोई नहीं बता पाया। जो बोला जा रहा है, वो वर्तमान नहीं है। जो देखा जा रहा है, वो वर्तमान नहीं है।

वर्तमान में जिओगे तो केवल एक शुद्ध चेतना रह जायेगी, जिसमें न संकल्प हैं, न विकल्प। वो आत्मनिष्ठता की स्थिति है।

इसका मतलब है कि सुमिरण द्वार है, क्योंकि सुमिरण से ही ऐसी स्थिति बनती है।

सुमिरण से आत्मनिष्ठ हो जाओगे। आप अपने में आते जायेंगे। अतीत और भविष्य दोनों को भूल जाओ तो आप आत्मा के नज़दीक पहुँच जायेंगे। नानक देव जी कह रहे हैं कि जो निरंतर सुमिरण कर रहा है, वो प्रभु का रूप हो जायेगा। पक्का।

सुमिरण का भाव आपके ध्यान को एकाग्र करता है। यह एक ही मन है। यदि सुमिरण में नहीं लगाया तो भटकाता रहेगा। यदि सुमिरण में लगा दिया तो भटकाव ख़त्म हो जायेगा।

जब आप वर्तमान में हैं तो समझो कि आत्मा में हैं। साहिब के शब्द बड़े स्टीक हैं। पर वर्तमान कोई नहीं समझ पाता है। वर्तमान है- आत्मा। देखना भी अतीत है। जब कोई संकल्प न हो, कोई विकल्प न हो तब बनेगा वर्तमान।

पलटू वजूद में अजब विश्राम है, होय मौजूद तो समझ आवै।।

सुमिरण एक बड़ी चीज़ है। साहिब ने सुमिरण पर बड़े शब्द कहे।

कुछ कह रहे हैं कि खाना-पीना देह के लिए। पर वेद तो कह रहा है-

आहार शुद्धम् तो बुद्धि शुद्धम्। बुद्धि शुद्धम् तो ध्यान शुद्धम्।। ध्यान शुद्धम् तो ज्ञान शुद्धम्। ज्ञान शुद्धम् तो मोक्ष शुद्धम्।।

मैंने कोई अलग धर्म नहीं बनाया। मैंने किसी का धर्म नहीं बदला। लोग कहते हैं कि हम हिंदू हैं। मैं कहता हूँ कि हम ही हिंदू हैं। क्योंकि वे केवल कहते-भर हैं, पर कहीं भी हिंदुत्व पर चलते नहीं हैं। हिंदू का अर्थ ही यही है कि जो हिंसा से दूर हो। सत्य और अहिंसा इसके दो मुख्य सिद्धांत हैं। इसलिए जो सत्य और अहिंसा पर चलने वाला है, वो हिंदू है।

हिंदू वास्तव में कोई धर्म नहीं है। यह तो महान् संस्कृति है। हरेक मनुष्य, जो सत्य और अहिंसा पर चलने वाला हो और परमात्मा की सत्ता को मानने वाला हो, वो हिंदू है। इसलिए हमसे बड़ा हिंदू कोई कैसे हो सकता है!

हम तो एक परमात्मा की भक्ति कर रहे हैं, पर सच यह है कि देवताओं की जितनी अच्छी भक्ति हम जानते हैं, उतनी कोई नहीं। सभी देवताओं का वास हमारे शरीर में है। विष्णु जी का स्थान पेट में है। यदि हम वहाँ माँस, शराब आदि गंदी चीजें डाल रहे हैं और उनकी भक्ति कर रहे हैं तो समझो कि हम उनकी सही भक्ति नहीं कर रहे हैं। ऐसे से विष्णु जी को बुरा लगता है। यानी हम उन्हें दुःख ही दे रहे हैं और अपने को उनका भक्त भी कहला रहे हैं। कान के देवता अश्विनी कुमार हैं। यदि हम कानों से गंदे-गंदे शब्द सुनकर मजा ले रहे हैं तो अश्विनी कुमार को बुरा लगता है। आँखों के देवता सूर्य और चन्द्रमा हैं। उनकी सच्ची भक्ति इसी में है कि हम अच्छी-अच्छी चीजें देखें। गंदे दृश्य न देखें। मुख के देवता अग्निदेव हैं। उनकी भक्ति इसी में है कि हम मुख में कोई भी गंदा पदार्थ नहीं डालें। शराब, माँस आदि खाने वाला अग्नि को भी रुष्ट ही कर रहा है। देवताओं की सच्ची भक्ति यह है। लोगों को न तो सगुण और न निर्गुण भक्ति का ही सही ज्ञान है।

**जो कोई मानै कहा हमारा। सो हंसा निज होय हमारा।।**
**अमर करों फिर मरन न होई। काल खूँट न पकड़े कोई।।**
**फिरके नहिं जन्में जग माहीं। काल अकाल ताहि दुख नाहीं।।**
**सुखसागर सुख मूल बतावा। बड़ भागी हंसा काह पावा।।**
**अंकुरी जीव जू होय हमारा। भवसागर ते होय नियारा।।**

कह रहे हैं कि संसार की उत्पत्ति और प्रलय भी निरंजन ही करता है, पर मेरा भेद निरंजन से आगे है। इसलिए संसारी जीव नहीं मानते हैं। जो कोई मेरा कहना मानता है, वो मेरा हंस हो जाता है। फिर काल उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाता है। वो काल के दुःखों से छूट जाता है। मैं उसे अमर कर देता हूँ। उसका फिर कभी जन्म नहीं होता है। ऐसा कोई बिरला अंकुरी जीव ही होता है, जो संसार-सागर से पार हो पाता है। ...तो जिसके अन्दर सद्गुरु का नाम आ जाता है, वो मन से पार हो जाता है। यह नाम की ताकत उसे अन्दर से ही ज्ञान देती चलती है। ...तो-

शब्द शब्द सब कोई कहे, वह तो शब्द विदेह। जिभ्या पर आवे नहीं, निरख परख कर लेह।।

जिस नाम की साहिब बात कर रहे हैं, वो विदेह नाम है। यह नाम सबमें समाया हुआ है। यही शब्द सबका आदि है।

बिन पावन की राह है, बिन बस्ती का देश। बिना पिण्ड का पुरुष है, कहैं कबीर संदेश।।

वो अमर-लोक वास्तव में खुद परम-पुरुष ही है और जिस सार-शब्द के बारे में कहा, वो भी स्वयं परम-पुरुष ही है। इसलिए-

अदाकर खुद खजाने से, छुड़ा ले अपने बंदे को।।

बड़ा प्यारा कह रहे हैं-

सुरति करौ मम साईया, हम है भव जल माहिं। आपहि हम बहि जाहिंगे, जो न गहोगे बाहिं।।

गुरु का इतना महात्म्य ऐसे ही नहीं कहा। वो मालिक को घट में प्रगट कर देता है। अन्यथा काल के इतने ज़ोरदार बंधनों में बँधा जीव कैसे छुट सकता है!

बहु बंधन ते बाँधिया, एक बिचारा जीव। जीव बिचारा क्या करे, जो न छुडावे पीव।।

नाम-दान के समय गुरु ऐसा करता है कि शिष्य की आत्मा में एक ताकत, जो विकेंद्रित होती है, उसे एकाग्र कर देता है, उसे जाग्रत कर देता है। वो नाम आपमें है। केवल उसे जगा देता है।

वो अगम को अंदर में ही लखा देता है। कली जब खिलती है तो उसकी सुगंध चारों ओर फैलती है। सुगंधि तो उसमें थी ही। ऐसे ही उस शब्द (नाम) का वास आत्मा में ही है, केवल पूर्ण गुरु द्वारा जगाने की ज़रूरत है।

सद्गुरु के बिना अगर कोई सोचे कि काम हो जायेगा तो कभी नहीं होगा। मैं एक उदाहरण देता हूँ। मैं मिजोरम में सत्संग कर रहा था। एक लड़का था। वो मेरी बड़ी सेवा करता था। वो बर्तन भी माँजता था, झाड़ू भी लगाता था, अन्य काम भी करता था। एक दिन कुछ नामी आपस में नाम के विषय में बात कर रहे थे। वो भी सुनने लगा। उन्होंने सोचा कि शायद यह भी नामी है। बात करते-करते नाम का ज़िकर आ गया। तो उसे भी पता चल गया कि क्या नाम जपते हैं। वो नाम करने लगा। उसके दिल में एक नकारात्मक सोच आई। उसने सोचा कि अब नाम जपने का पता चल गया है, अब क्या गुरु करना! वो नाम करने लगा, पर उसने नाम नहीं लिया। मैंने पूछा भी, पर उसने नहीं लिया। कहा- बाद में लूँगा। फिर कहीं बात हो रही थी तो उसे ध्यान करने का भी पता चल गया। अब वो नाम भी करने लगा और ध्यान भी। अब उसने सोचा कि गुरु करने की ज़रूरत नहीं है। यह छल था। उसके दिल में कपट आ गया। एक दिन ऐसा हुआ कि वो और मेरे कुछ नामी सत्संग घर में बैठे हुए थे। आकाश से बिजली गिरी और सीधी उस लड़के पर गिरी। वो वहीं मर गया।
छः महीने बाद वो मेरे पास आया। वो प्रेत-योनि में चला गया था। तब उसने मुझसे आधा घण्टा तक बात की। वो मुझे 'महाराज' बोलता था। मैंने देखते ही कहा कि तुम पहचान में आ रहे हो। वो बोला- महाराज! पहचाना नहीं। मैंने कहा- अच्छा, तू फलाना है न! वो बोला- हाँ महाराज! मैंने कहा कि तू प्रेत-योनि में कैसे चला गया? उसने कहा कि ऐसे-ऐसे मैंने आपसे छल किया था। उसकी मुझे यह सज़ा मिली है कि मैं प्रेत-योनि में चला गया हूँ। तब उसने बताया कि प्रेत-योनि बड़ी गंदी है। इस ब्रह्माण्ड में इतने बंदे नहीं हैं, जितने प्रेत घूम रहे हैं। कई प्रेत इंसानों के शरीर में घुसकर उनका खून पीते हैं। बड़े गंदे हैं। उसने कहा कि मुझसे सब प्रेत भी डरते हैं। मैं जो आपका नाम जपता रहा, इससे कोई मेरे पास नहीं आ पाता है। वो बोला कि मैं ब्रह्माण्ड में बहुत दूर तक उड़कर चला जाता हूँ। वहाँ बहुत समय रहता हूँ। तब वहाँ से आवाज़ आती है कि तुमने गुरु नहीं किया है, आगे नहीं जा सकते हो। तब मुझे वापिस आना पड़ जाता है। उसने आखिर में कहा कि आज मैं आपसे नाम लेने आया हूँ; मुझे नाम दो। मैंने कहा कि इस शरीर में नाम नहीं दूँगा, क्योंकि नाम मानव-तन में देते हैं। उसने कहा कि मैं आपकी सेवा करूँगा। जो कहागे, वो करूँगा। मैंने कहा कि मुझे तुम्हारी ज़रूरत नहीं है; फिर देख लेंगे। तब वो बंदगी करके चला गया।

तो कहने का भाव है कि यह नाम बिना सद्गुरु के प्राप्त ही नहीं किया जा सकता है। यह नाम कोई अलफ़ाज़ नहीं है। यह विधिवत् तरीके से लिया जाता है। एक ने मुझसे पूछा कि यदि आपको हज़ारों लोगों को एक -साथ नाम दोगे तो भी क्या ऐसे ही शीश पर हाथ रखकर दोगे? मैंने कहा- पक्का। नाम दिया ही ऐसे जाता है। सार-शब्द को देने की विधि ही यही है। कोई अलफ़ाज़ थोड़ा है कि सुना दिया। एक ने मुझसे पूछा कि यदि आपको लाख लोगों को नाम देना पड़े तो क्या तभी भी आप शीश पर हाथ रखकर नाम दोगे? मैंने कहा- यह वादा रहा। क्योंकि यह पंजा देखकर ही निरंजन पीछे हटता है। गुरु का पंजा शीश पर नहीं है तो क्या लाभ! कुछ मुझसे कहते हैं कि आशीर्वाद दो। मैं नहीं देता हूँ आशीर्वाद। यह तो दिखावे वाली बातें हैं। जिसके शीश पर एक बार पंजा नाम के समय रख दिया, फिर उसे किसी आशीर्वाद की ज़रूरत नहीं है। इसलिए तो सद्गुरु की इतनी महिमा है। सद्गुरु के बिना परमात्मा रूपी प्रियतम की प्राप्ति किसी भी तरह से संभव नहीं है। धर्मदास जी एक शब्द बड़ा प्यारा कह रहे हैं।

तो शब्द की बात हो रही थी। इस शब्द के बिना मुक्ति का कोई और साधन नहीं है और यह नाम सद्गुरु से ही मिल सकता है। इस तरह सद्गुरु के बिना महा निर्वाण की प्राप्ति जीव कभी भी नहीं कर सकता है।

है यहाँ सतगुरु बिना, कोई मोक्ष का दाता नहीं।।

इस शब्द के पारखी संसार में बहुत कम हैं। सब ही तो पाखण्ड में उलझे हैं। उन्हें उलझाया गया है। अपने हितों के लिए स्वार्थियों ने समाज को भटका दिया है। सब अनात्म कार्यों में लगे हुए हैं। सब पाखण्ड में लगे हुए हैं। सब गलत भक्तियाँ में लगे हुए हैं। सच्ची भक्ति कैसे करते हैं, किसी को मालूम नहीं है। जिसे भी सत्य का संदेश दिया जाए, वही बैरी हो जाता है। जो सद्गुरु को पहचानकर दौड़कर उनके पास पहुँच जाते हैं, ऐसे शब्द के पारखी संसार में बहुत कम हैं। साहिब कह रहे हैं- हम अमर-लोक की केवल बात ही नहीं कर रहे, हम वहाँ पहुँचने का सही-सही सूत्र बोल रहे हैं और वहाँ पहुँचने के लिए जिस वस्तु की ज़रूरत है, उसी के लिए तो मैं बार-बार कह रहा हूँ कि मैं घमण्ड से नहीं बोल रहा, पर जो वस्तु मेरे पास है, वो ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है।

पाखण्डियों को इस बात से भी कोई दिक्कत नहीं है कि हम परम-पुरुष की भक्ति कर रहे हैं। उन्हें दिक्कत है तो बस यही कि हमारे नामी उनके चंगुल में नहीं फँस पा रहे हैं, जिसके कारण उनका धंधा ही चौपट हो गया है। वे हमारी निंदा मजबूरी में कर रहे हैं। बस, बात यह है कि सबका मुकाबला ही हमारे साथ है। मैं कहीं सत्संग कर रहा था तो एक पंडिताइन खड़ी हो गयी। वो बोली कि आपका नाम ही सच्चा है; बाकी किसी के पास कुछ नहीं है; सब खाली हैं। मैंने कहा- क्यों? वो बोली कि मुझे कहाँ- कहाँ नहीं घुमाया गया! पर किसी के पास जाकर मैं ठीक नहीं हुई। किसी के नाम में ताकत ही नहीं है। आपके नाम में बड़ी ताकत है। पंडिताइन ऐसे नहीं बोल रही थी। उसने सबको आजमाया था। वो अकेली पूरे गाँव पर भारी पड़ती है। मुझे ही ले लो।

जैसा गुरु वैसा चेला।। में एक मधु नहीं मान रहा हूँ।
गुरु समाना शिष्य में, शिष्य लिया कर नेह। बिलगाए बिलगे नहीं, एक रूप दो देह।।

यदि मैं अपने नामियों को निचोड़ दूँगा तो हरेक के भीतर से मैं ही निकल आऊँगा। मैंने जो अपनी पुस्तकों में लिखा है कि जो वस्तु मेरे पास है, वो ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है, वो ऐसे ही नहीं लिखा है। यदि प्रूफ करूँ तो वैसा है! यह घमण्ड से नहीं। यह प्रूफ ऐसा कि जैसे कहावत है कि 'हाथ कंगन को आरसी क्या'। यदि कंघी करनी है तो दर्पण की जरूरत पड़ती है। यदि बिंदी लगानी है तो दर्पण की ज़रूरत पड़ती है कि कहीं गलत जगह तो नहीं लग रही है। यदि हाथ में कंगन पहनने हैं तो फिर दर्पण की ज़रूरत नहीं पड़ती है। कंगन तो आँखों से देख सकते हैं। तो जो चीज़ मैं बोल रहा हूँ, वो आँखों से देख भी सकते हैं।

जिसको नाम देता हूँ, उसे पूरा बदल देता हूँ। ऐसा कोई बदल नहीं पा रहा है। फिर बुरे मार्ग पर जा नहीं पायेगा। बस, वही बात हो जायेगी।

तो खान-पान में मेरे नामी बड़े भारी पड़ते हैं। वे सबको चुभते हैं। इसलिए वे हमारे नामियों को बड़ा मानकर ईर्ष्या करते हैं। वो मेरे नामियों को नहीं छोड़े हैं, मेरे नामियों ने उन्हें छोड़ दिया है। मेरे नामी समझौता नहीं करते हैं। मेरे नामी सच्चे हिंदू की तरह हैं। वे भोग लगाए बिना भोजन नहीं कर रहे हैं। वेद तो कह रहा है कि भोजन शुद्धम् तो बुद्धि शुद्धम्। बुद्धि शुद्धम् तो ज्ञान शुद्धम्। ज्ञान शुद्धम् तो ध्यान शुद्धम्। ध्यान शुद्धम् तो मोक्ष शुद्धम्।।

अब मेरे नामी सत्लोक जायेंगे या नहीं, यह प्रूफ भी देता हूँ। कौन-सी गाड़ी से जायेंगे? पहले देखते हैं कि जो वस्तु है, वो कैसी है? एक बार मैंने सत्संग में पूछा कि जिसे लगता है कि कोई ताकत हमेशा हमारे साथ काम कर रही है, वो हाथ खड़ा करो। सबने किया। एक डॉक्टर ने भी किया। मैंने

डॉक्टर से पूछा तो कहा कि ऑफिस की मीटिंग पर जा रहा था। झांसी जा रहा था। ड्राइवर को नींद आने लगी। मैं ड्राइविंग करने लगा। मुझे भी झपकियाँ आने लग गयीं। एक्सीडेंट होने वाला था कि ख़ुद ही स्टेयरिंग घूमी, खुद ही ब्रेक लग गयी। मेरे कॉन्शिएस ने कहा कि न तो यह स्टेयरिंग मैंने घूमाई, न ब्रेक मैंने लगाई और न मैं जागा ही हूँ।

वो ताकत हाज़िरी बताती है।

मेरा कर्ता मेरा साइयाँ

मेरे नामी सत्लोक जायेंगे या नहीं, गवाही के साथ बताता हूँ। इस आत्मा को बाँधने वाला कोई पैदा नहीं हुआ। दो प्रमाण दूँगा। परोक्ष और अपरोक्ष। दोनों सूत्र बताऊँगा। पहली बात, वेद कह रहा है कि 'अंतमतः सागतः ' अर्थात अंत में जहाँ इच्छा होगी, वहीं जाओगे। साहिब तो कह रहे हैं-

जिसकी आस लाग रही जहँवा, कहैं कबीर पहँ चाऊँ तहँवा।।

यही बात गीता में वासुदेव ने अर्जुन को कही। "जहँ आशा तहें वासा होई। वाको टार सकै न कोई।।"

मैंने अपने नामियों की आस संसार से तोड़ दी। उनकी एक ही आस है और वो यह कि सत्लोक जाना है। शास्त्रानुकूल जहाँ आस होगी, वहीं जाना है।

एक चीज़ बारीकी से देखना कि दुनिया मेरे नामियों की आस्था, उनकी दृढ़ता पर मचलती है, इसलिए हमला करती है।

प्रूफ करूँगा कि वे सत्लोक जायेंगे या नहीं। सबसे पहली बात यह कि आत्मा इस संसार में बंधन में है। आत्मा से वो सभी काम करवाए जा रहे हैं, जो कभी नहीं करना चाहता है। यह आत्मा बंधन में है। आत्मा को मन ने बाँधा है। वो जो काम चाहता है, करवा रहा है। साहिब ने वाणी में कहा-

मनहिं निरंजन सबै नचावे। नाम होय तो माथ नवरावे।।

सबको नचा रहा है। जो भी चाह रहा है, करबा रहा है। बड़ा ताकतवर है। पर किस किस को नचा रहा है?

यक्ष किन्नर सुर नर मुनि, सबहि कीन बेहाल हो।। गण गंधर्व ऋषि मुनि अरु देवा। सब मिल लाग निरंजन सैवा।।

क्या इस निरंजन में इतनी ताकत है? आत्मा तो परमात्मा का अंश है। इसको बाँध दिया। हावी हो गया। मैं कहूँगा कि आत्मा से ताकतवर इस संसार में कोई भी सत्ता नहीं है। घमण्डी नहीं बना रहा हूँ। पर सत्य है। इस बंधन में आत्मा ने अपना जोर लगाया हुआ है। यदि नहीं लगाएगी तो इसे कोई नहीं बाँध सकता है। इस पर कहा-

आपा क आपा हि बँधयो।।

अपने आप ही अपने को बाँध दिया। हे हंस! तुमने अपने आप ही अपनी ताकत से अपने को बाँध दिया है। कैसे?

जैसे स्वान काँच मंदिर में, भरमत भूक मरयो।।

जैसे काँच के महल में रहने वाला कुत्ता अपनी ही परछाई को दूसरे कुत्ते समझ भोंक- भोंक कर प्राण त्याग देता है। कोई नहीं मारा उसे। अपनी ही ताकत अपने ख़िलाफ़ लगा दी।

जैसे नाहर कूप में, अपनी प्रतिमा देख परयो।।

जैसे शेर कुएँ में अपनी परछाई देख दूसरा शेर समझ कूद पड़ा। अपनी आवाज़ प्रतिद्वंदित हुई। उसने छलाँग लगा दी। दूसरा शेर नहीं था।

मरकठ मूठ स्वाद न बिसरे, घर घर नटत फिरो।।

बंदर सुराही में हाथ डाल देता है। चने की मुट्ठी भर लेता है। अब खींचता है, ताक़त लगाता है। एक ताक़त से मुट्ठी में चने पकड़ रखे हैं और अब बाहर निकालने के लिए ज़ोर लगा रहा है। यही काम आत्मा कर रही है। जो चने पकड़े हैं, उसे छोड़ दे तो आज़ाद है। उसी से तो बँधा है न। वहाँ तभी ताकत है। आत्मा को किसी ने नहीं पकड़ा है।

कहै कबीर नलनी के सूगना तोहि कोने पकरो।।

तोते को शिकारी नलनी में फँसाता है। वो नलनी को खुद पकड़ा होता है। नलनी के साथ एक शीशा बँधा रहता है, जिसमें अपनी परछाई को दूसरा तोता समझ लड़ने लगता है, सोचता है कि दूसरे तोते ने पकड़ लिया।

अब मैंने अपने नामियों को पूरा- पूरा मुक्त किया है। मन ने आत्मा को जकड़ा है। आत्मा गंदे काम भी कर रहा है, विकार भी। मन कह रहा है तो समझ नहीं आ रहा है। जिस दिन से मैंने अपने नामियों को नाम दिया, वो अच्छे क्यों हुए? मन समझ में आ गया है। अब वो मन की आज्ञा नहीं मान रहे हैं। आम आदमी को मन की बात समझ में नहीं आ रही है। इतनी बड़ी चीज़ दे दी। मन के पिंजड़े से आज़ाद कर दिया। आत्मा में बड़ी ताकत है। परमात्मा तक पहुँचने की ताकत है। घर की नाली में फेंका हुआ पानी नाले, नदियों से गुज़रता हुआ समुद्र में पहुँच जाता है। आत्मा में परमात्मा तक जाने की ताकत है। मैंने बस अपने नामियों को मन से अलग कर ज्ञान दे दिया। अब उनकी आत्मा कोई गलत काम स्वीकार नहीं कर रही है। यह है- गुरु ने आत्म रूप लखायो।। हमने आत्मा को चेतन कर दिया। टिकट लेकर ट्रेन में बैठने का अधिकार मिल जाता है। इस तरह नाम देकर मैंने उन्हें अमर-लोक में जाने का पूरा-पूरा अधिकार दे दिया है। उनके साथ वो ताकत काम कर रही है। उन्हें वैरागी बना दिया है। अब उनका संसार में दिल ही नहीं लगता है। घूम-घूमकर फिर मेरे पास ही आते हैं।

जिन विषया सकली तजी, लियो वेश वैराग। कह नानक रे सुन मना, ता घट ब्रह्म निवास।।

यह जगत् अब उन्हें नीरस लग रहा है। इसी पर साहिब कह रहे हैं- कहूं जगत से न्यारा।।

फिर मैं हर महीने हरेक आश्रम में पहुँच रहा हूँ। सत्संग कर रहा हूँ। यह सत्संग भक्ति को मजबूत करता है। जैसे चुनाई करने के बाद तराई की ज़रूरत पड़ती है। वो तराई सीमेंट को मजबूत करती है। ठीक तराई नहीं की जाए तो सीमेंट और बालू फिर से मिट्टी बन जायेगा। यह तराई 7 दिन करते हैं। इस तरह सत्संग भक्ति और विश्वास को मजबूत करता है।

समाज जो हमारे लोगों को अपने में समाहित नहीं कर पाया, उसके पीछे एक यह भी बहुत बड़ा कारण है। कई बड़े-बड़े पंथ हमारे समकक्ष हैं। वे समाज में समाहित हो गये हैं। वो भी मूर्ति - पूजा नहीं कर रहे हैं। कुछ अन्य भी हैं जो मूर्ति - पूजा नहीं कर रहे हैं, पर समाज में घुलमिल गये हैं। हमारे पंथ को समाज ने अपने में समाहित नहीं किया। इसके लिए मैं बड़ा खुश हूँ। सच यह है कि हम समाज को अपने में समाहित कर रहे हैं।

हमारे समाज की भक्ति तो यही है कि पाप भी कर रहे हैं और भक्ति भी कर रहे हैं। हड्डी भी चबा रहे हैं, शराब भी पी रहे हैं, झूठ भी बोल रहे हैं, सारे गंदे काम कर रहे हैं और साथ ही भक्ति भी कर रहे हैं। हम इन चीज़ों को स्वीकार नहीं कर रहे हैं। साहिब-बंदगी बड़ा ही मजबूत पंथ है। संसद में जम्मू की अधिक सीटें नहीं हैं। सीटों के लिहाज़ से जम्मू का कोई वजूद नहीं है, पर राजनीति बड़ा महत्व रखती है, क्योंकि यह भारत का शीश है। बड़ी-बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ यह महसूस करती हैं कि साहिब बंदगी उनकी जीत में रोड़ा है। इसलिए हमारा विरोध तो होना ही है। मैं सावधान हूँ। पर विरोध आपका होगा।

तो मैं जो अपनी संगत को हर महीने मिलता हूँ, उसके दो ही लक्ष्य हैं। मैं कोई ज्ञान देने नहीं आता हूँ। ज्ञान तो मैं नाम के समय ही दे चुका हूँ। जो चीज मैंने उन्हें दी है, वो पल-पल ज्ञान दे रही है। मैंने सिस्टम सेट कर दिया है। केवल सावधान करने आता हूँ। क्या अच्छा है,

मैं अपनी संगत की भक्ति को सुरक्षित करना चाहता हूँ, इसलिए सत्संग करता हूँ। उनके दिलों में उस अमरलोक की आशा उत्पन्न करना चाहता हूँ। क्योंकि-

जिस की आस लाग रही जहँवा। कहैं कबीर पहँ चाऊँ तहँवा।।

एक ने कहा कि आप कमाई नहीं करना कह रहे हैं। फिर जो शीश से सवा हाथ ऊपर ध्यान करने को कह रहे हैं, वो कमाई नहीं हुई क्या? हमें कुछ करना ही हुआ न! मैंने कहा कि जाओ, आज के बाद कुछ मत करना। यह तो केवल एक उपक्रम बताया। ध्यान का महत्व है। कुछ न करोगे तो मन की उठापठक लगी रहेगी। बस, यह बात है। इसे उलझाकर रखना है।

कह रहे हैं कि यही नाम हंस को अमरलोक पहुँचाता है। जो इस नाम का सुमिरन करता है, वो परम-पुरुष को पा लेता है। इस नाम से सब दुख और झगड़े समाप्त हो जाते हैं और निरंजन बैठा पछताता है। जो इस नाम को सिर पर चढ़ाकर रखता है, उसे सब सुख प्राप्त हो जाते हैं। जो कपट करता है, वो भ्रमित होकर भटकता ही रहता है। जो आदि शब्द है, वही मेरा नाम है और जो उसे जान जाता है, वो पार हो जाता है। उस हंस के बड़े भाग्य हैं, वो मन से मुक्तिदायक इस नाम को ग्रहण करता है।

साहिब कह रहे हैं कि हे हंसराज धर्मदास, जब तुम पार पहुँचाने वाले इस नाम को पा लोगे तो भय रहित हो जाओगे। बिना भय रहित हुए तुम भेद नहीं जान सकते हो। जब गुरु की दया होती है, तभी हंस अमर लोक में जा पाता है। तब इस नाम पर चढ़कर हंस भवसागर के पार होता है। यह अदभुत नाम है, जो मुक्ति का दाता है।

जब कूर्म भी नहीं था और काम भी नहीं था, तब परम पुरुष ने अपना नाम प्रकट किया, जो स्वयं परम-पुरुष ही था। जो इस नाम को पा जाता है, काल उसे अपने से दूर अमरलोक पहुँचने देता है। यदि वो ऐसा नहीं करे तो स्वयं जल भी नहीं लाँघ सकेगा। यदि कुछ बोलने के लिए सिर उठाए तो सिर ही चला जायगा और यदि पकड़ने की कोशिश करे तो अंगहीन हो जायेगा। यह सार नाम सद्गुरु देता है, इसलिए निरंजन उसे अपने शीश पर पाँव रखने देता है। जो भी इस नाम में वास कर लेता है, उसे काल का भय नहीं रह जाता है। नाम के प्रताप से काल भाग जाता है और हंस अमर लोक में चला जाता है।

जब कोई सुमिरन करता है तो सुषुम्ना क्रियाशील होती है। जब सुषुम्ना क्रियाशील होती है तो समग्र चेतना बढ़ जाती है। दरअसल सुमिरन सुषुम्ना को चेतन करने की विधि है। स्विच को घुमाया तो डेक की आवाज़ बढ़ने लगती है। इसी तरह श्वांसा का स्विच ऊपर की ओर घुमाना है। इससे सुषुम्ना खुलेगी। सुषुम्ना खुल जाती है तो शरीर की चेतना बढ़ती है। कभी ट्रांसफॉर्मर लगाते हैं। यदि वोल्टेज कम आ रही है तो एक स्टेप ऊपर करते हैं। तो करेंट बढ़ जाता है। जैसे एक स्टेप ऊपर करने से बिजली बढ़ गयी, इसी तरह सुषुम्ना खुलने से शरीर की चेतना बढ़ जाती है। तब शरीर परम चेतन हो जाता है। हमारे सूक्ष्म स्नायुमंडल पर प्रभाव पड़ता है। वो कोशिकाएँ जाग उठती हैं। वो पूरे शरीर की चेतना का संचालन करती हैं।

सुषुम्ना नाड़ी खुलती है तो ऊर्जा बच जाती है। सही में आराम और सुख मिलता है। सपने में भी आप उलझन में रहते हैं। सपने में भी मुसीबतों में होते हैं। मुसीबतें आती हैं। ग़लत काम भी हो जाते हैं। वहाँ भी मन क्रियाशील होता है। पर सुमिरन में मन की उठापठक बंद होती है। एकाग्र होने पर आप कम्प्लीट आराम करते हैं। जब एकाग्र हो जाते हैं तो सच्चा सुख मिलता है। इसलिए साहिब कह रहे हैं-

जप तप संयम साधना, सब सुमिरन के माहिं। कबीर जानत संत जन, सुमिरन सम कछू नाहिं।।

सबै रसायन मैं किया नह नाम सम कोय।।

क्यों? क्या वैज्ञानिक तरीके से देख सकते हैं। बिलकुल। जिस समय सुषुम्ना खुलती है तो एनर्जी खर्च होने से बचती है। इससे चेतना बढ़ती है। यही शरीर को विशेष ऊर्जा देती है, जिससे शरीर में आने वाले रोग भी खत्म हो जाते हैं। इसे वैज्ञानिक तरीके से भी जोड़ा जा सकता है। तब शरीर की क्रियाओं से ऊपर उठ जाते हैं। हालांकि नींद में भी ऊपर उठ जाते हैं, पर ब्रेन क्रियाशील रहता है। बाहर की कोशिकाएँ चाह बंद होती हैं, पर कहीं नींद में अधिक काम करते हैं।

साहिब ने सुमिरन का महात्म्य बोला। कभी कुछ सुषुम्ना की बात करते हैं। मैं पूछता हूँ कि क्या तुम वैज्ञानिक तरीके से, तकनीकी तरीके से सुमिरन की महत्ता बता सकते हो क्या? सुमिरन से सुख होता है, यह कैसे मान लें? परमात्म- अनुभूतियाँ होती हैं। सुमिरन से सच में सुख होता है क्या? इसे वैज्ञानिक तथ्यों से कैसे प्रमाणित किया जा सकता है? सुषुम्ना नाड़ी से चेतना उठती है। यह मेरुदण्ड से होती हुई, नितंब से नीचे टाँगों तक जाती है। ऊपर यही इड़ा-पिंगला से होती हुई ब्रह्मनल तक जाती है।

कितने तपसी तप कर डारे, काया डारी गारा। ग्रह छोडि भये सन्यासी, तऊ न पावत पारा।। इसलिए जो सुमिरन करने वाला है, उसकी स्वाभाविक इड़ा-पिंगला लय हो जायेगी। अन्य कितना भी तप करने वाला होगा, नहीं हो पायेगी। क्योंकि मन दुनिया में धकेलता है। उस समय ऐसा होता है कि आप एकाग्र बैठना चाहते हैं, पर वो प्रवेश नहीं लेने देता है। ब्रेक लगा रखी है। दिखता भी नहीं है। सब मिलाकर आदमी आंतरिक जगत की बात समझ नहीं पाता है। सुरति से सुषुम्ना नाड़ी खुलती है। साहिब कह

जिस श्वांस में सुमिरन नहीं हुआ, बेकार है। जो भी श्वाँस नाभि में पहुँची, जिंदगी को ख़त्म कर रही है। टार्च जली तो एनर्जी ख़त्म हो रही है। गाड़ी फ्यूल का अवशोषण करती है, चूसती है तो गैस बाहर निकलती है। इसी तरह श्वाँसा ले रहे हैं। नाभि में जाकर अवशोषण हो रहा है। फिर मुँह से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड है। फ्यूल भी तो इंजन के चलने पर गंदी गैस के रूप में बाहर निकला। इससे इंजन पर असर पड़ा। श्वाँसा लेने से असर पड़ रहा है। यह शरीर के सब अंगों को संचालित कर रही है। इसे संचित करने वाले दीर्धायु हो जाते हैं।

तो इस तरह से हम सुषुम्ना में चल रहे हैं। वहाँ प्रवेश ले लिया तो सुरति परम चेतन हो जाती है। 1000 गुणा चेतना बढ़ जाती है। सुषुम्ना नाड़ी वर्तमान में भी बड़ा कमाल दिखा रही है। मोबाइल ऑफ करने पर भी टाइम चलता रहता है। उसे अन्दर से ऐसे जोड़ा गया है कि तब भी बंद नहीं हो रहा है। इस तरह सुषुम्ना भी किसी सीमा तक ऑन है ही है। बंद होने के बाद भी काम कर रही है। जब खुल जाती है तो फिर कहना ही क्या है।

क्यों भटकता फिर रहा है तू तलाशे यार में। रास्ता शाह रग में है दिलबर पे जाने के लिए।।

श्वांसा स्वाभाविक इड़ा-पिंगला के माध्यम से नाभि में आ रही है। माइक की तार डेक के साथ जुड़ी है। माइक में सिस्टम है। इस तरह श्वास ले रहे हैं, सिस्टम है। कभी इड़ा नाड़ी चल रही है, कभी पिंगला नाड़ी। नहीं तो लगातार चलेंगी तो गर्म हो जायेंगी। एक चलती है तो एक आराम करती है। इड़ा-पिंगला से ली जा रही श्वांसा सीधी नाभि में पहुँचती है। जब पहुँचती है तो शरीर ऑक्सीजन द्वारा ही क्रियान्वित होता है। यह श्वांसा नाभि में जाकर बदलती है। सिस्टम है। मीटर लगा है। लाइन पंखे में लगी है तो पंखा घूमने लगता है। एक लाइन बल्ब के साथ है तो बल्ब जलने लगता है। आपके नाभि क्षेत्र में बड़े सिस्टम हैं। वायु रिफाइण्ड होती है। वायु 10 रूपों में बदलती है। गन्ना मिल में गया तो बड़े उपयोग होते हैं। शराब बनती है, चीनी बनती है, पेपर आदि बनता है। सभी चीजें काम में आती हैं। इस तरह श्वांसा नाभि में जाकर

पहुँचती है तो यह 10 पवन में बदलती है। गन्ना कई रूपों में बदल जाता है। नाभि-दल-कमल में श्वांसा 10 रूपों में हो जाती है- अपान, उदान, प्राण, समान, सर्वतनव्याम, नाग, धनन्जय, कृकल, जम्भाई और देवदत्तअपान गुदा स्थान पर है। इसका काम है- मल को बाहर करना। यह खराब हुई तो हालत ख़राब हो जायेगी। उदान कलेजे में रहती है। इसका काम है- अपान को ऊपर नहीं आने देना। यह उदान की ड्यूटी है। यह इसे दबाए रखती है। तीसरी है- प्राण। यह वहाँ बन गयी। हृदय में निवास करती है। हृदय धड़क रहा है; इसी का काम है। चौथी- समान, जोड़ों में रहती है। हम टाँगों, बाज़ू, हाथों की उँगलियों आदि को फोल्ड कर लेते हैं, पर मुर्दे की बाजू फोल्ड करो तो नहीं होती, उँगलियों को फोल्ड करना चाहो तो नहीं होतीं, क्योंकि वो वायु निकल गयी। यह हवा का खेल था। सर्वतनव्याम पूरे शरीर में फैली है। यह शरीर को मोटा होने से रोकती है। मौत के कुछ घंटों के बाद शरीर फूलना शुरू हो जाता है, क्योंकि वो वायु भी निकल गयी। इसलिए मोटापा गैस ट्रबल है। धनन्जय भुजाओं में और सीने में रहती है। जो हम बल लगाते हैं, यह धनन्जय वायु का काम है। जितने भी काम करते हैं, इसका खेल है। इस तरह चेतना बिखर जाती है। नाग वायु कंठ में रहती है। इसका काम नींद लाना है। जो नींद को काबू करते हैं, वो इस वायु को कंट्रोल करना जान जाते हैं। कृकल वायु बड़ा काम करती है। यह नासिका के अग्रभाग पर रहती है। इसका काम है- छींकना। इसका काम है कि वायुओं को आपस में मिलने न देना। शरीर में खेल ही प्राणों का है। शास्त्रानुसार पाँच प्राण हैं और पाँच उपप्राण हैं।

जब सुरति सभी से रहित हो जाए; जब संकल्प-विकल्प से परे हो जाए, फिर परमात्म अनुभूति बड़ी आसानी से हो जायेगी। पर मन पहुँचने नहीं दे रहा है। किसी-न-किसी चिंतन में आत्मा को, ध्यान को उलझाकर रखता है। यह तथ्य बड़ा बारीक है।

जिस गहराई को मैं समझा रहा हूँ, बड़ा कठिन है। मैंने समझा दिया। आप समझ गये; पर आप वाक्यबद्ध नहीं कर पाते हैं; वाणी नहीं मिलती है। मैं सरलता से बोल देता हूँ।

साहिब कह रहे हैं--

मूल कबीरा गहि चले, काल खेले संसार।।

तो मैं कह रहा था कि जब सुरति चेतन हो ऐसी अवस्था में पहुँचती है, जहाँ बुद्धि नहीं है, चित्त नहीं है, उस स्थिति में परमात्मा आपको खुद ही दीक्षित करता है। जब आदमी इस अवस्था में पहुँचता है तो अत्यंत सूक्ष्म रूप में अनुभूति करता है-

पुहुप वास से पातला, पानी से अति झीन। वायु से उतावला, दोस्त कबीरा कीन।।

फूल की खुशबू से भी पतला, पानी से भी अधिक सूक्ष्म और वायु की गति से भी तेज़ है। ऐसा कबीर का दोस्त है। इंद्रियातीत है; इंद्रियों से नहीं जाना जा सकता है। व्योमातीत है; रंग-रूप आदि से भी परे है। शब्दातीत है; शब्दों में नहीं बताया जा सकता है। अनिर्वाचनीय है; वाणी का विषय नहीं है। निरालंब है; किसी पर आधारित नहीं है, स्वयं ब्रह्म में ओतप्रोत है।

आत्मा को इंद्रियों से नहीं समझ सकते हैं। दिव्य-दृष्टि से अनुभूति होती है। ऐसे समय इसमें तब न कर्म-इंद्रियों का, न शरीर के किसी अंग का, न तत्व का योग होता है। तब स्वयं ईश्वरीय तत्व का प्रकाश हमारी आत्मा के अन्दर आ जाता है। इसलिए--

आतम में परमातम दरशे।।

आप बड़े भाग्यवान हैं, जो साहिब की भक्ति में आए हैं। हम तक आना बड़ा ही मुश्किल है। निरंजन ने चारों ओर से घेरा डाला है। आप इतिहास उठाकर देखें तो पता चलता है कि किसी भी महात्मा का इतना विरोध नहीं हुआ होगा। यह निरंजन का खेल है, एक दायरा खींचा है, कोई नहीं पहुँचे। हमारी बातें साधारण नहीं हैं।

हमने नामदान के समय शर्त दी। तुम अपना रुख न बदलना। तुम स्लिप न खाना। तुम पर तंत्र न लगेगा, भूत न लगेगा। बहुत शक्ति है आपके पास।

सुमिरन करने वाले के पास अष्ट सिद्धि, नव निधि खुद आ जाती हैं।

कर परतीत मिलाऊँ ताहि।। बस, तुम भरोसा रखना।

भक्ति बड़ी बारीक चीज है। हमें चिंतन करना होगा कि भक्ति का क्या लक्ष्य है?

नाम हमार सुमिरै जो कोई

नाम हमार सुमिरै जो कोई। आवागमन रहित सो होई।। हमरा नाम लेत घर आवै। सुख सागर निर्मल हो जाई।। नाम लेत जो काल डराई। सुमिरत नाम दूर हो जाई।। हमरो नाम सार है भाई। जो चीन्हे तेहि काल न खाई।।

कह रहे हैं कि जो हमारे नाम का सुमिरन करता है, उसका आवागमन मिट जाता है। नाम का सुमिरन करने से काल का भय समाप्त हो जाता है। मेरा नाम सार-नाम है। जो इसे पहचान लेता है, उसे काल नहीं खा पाता है।

साहिब कह रहे हैं कि जो अमृत शब्द का सुमिरन करता है, वो अमृत-स्वरूप ही हो जाता है। जो इस नाम को नहीं पाता, वो जीव प्रलय में आ जाता है। जिस नाम का मैं बखान कर रहा हूँ, इसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी नहीं जानते हैं। निरंजन भी इस नाम को नहीं पा सकता है। हे धर्मदास! ऐसा नाम मैंने तुम्हें दिया है। यह अमृत नाम सत्पुरुष ने दिया है, जिसे कोई नहीं जानता है।

तो फिर कह रहे हैं-

अपने को गुरुहि समर्पे । ताको कबहूँ काल न दर्पे।।

इसलिए सुरति रखना। सुमिरन हमें परमात्मा के नज़दीक ले चलता है। सुमिरन हमें आन्तरिक शांति प्रदान करता है। जहाँ सुमिरन हो रहा है, वहाँ काल नहीं आ सकता है। जहाँ सुमिरन नहीं है, वहीं काल है। क्योंकि पूरा सच यह है कि सुमिरन के अलावा जो भी कर रहे हैं, बेकार है। इसलिए पल-पल सुरति को संभालने के लिए कहा, क्योंकि भक्त को चाहिए कि एक भी पल बेकार न जाने दे।

जिसके हृदय में सत्यनाम है, वो कभी भी हार नहीं सकता है। वो माया का नशा तोड़कर अमरलोक में चला जाता है। सुरति और निरति को एक करके जब साधक नाम में रम जाता है तो वहाँ पहुँच जाता है। वो देश अत्यंत प्रकाशमय है। वहाँ पाँच तत्व और तीन गुणों से उत्पन्न दुख नहीं हैं। वहाँ पहुँचकर वो हंस कहलाता है और जन्म-मरण को समाप्त कर सदा के लिए अमरलोक में निवास करता है।

अपनी ताकत से जीवात्मा कभी भी निरंजन की फाँस काटकर वहाँ नहीं पहुँच सकती है। निरंजन के बड़े पहरे हैं। सद्गुरु परम-पुरुष में मिला हुआ है। उसमें मिलने से उसकी सुरति में वो मूल तत्व आ जाता है कि आपके अन्दर भी परम-पुरुष को प्रगट कर देता है। यूँ परम-पुरुष किसी को आसानी से अपने में नहीं समाने देते हैं, पर जो परम गुरुमुख होता है, उसे परम-पुरुष यह अवसर प्रदान कर देते हैं और वो उनमें समाकर उन्हीं का रूप हो जाता है। फिर वापिस आकर वो संसार के अन्य जीवों को भी वो तत्व प्रदान करके काल के कष्टों से बचा लेता है। वो जो सार नाम देता है, उसके बिना अन्य किसी भी उपाय से जीव संसार से पार नहीं हो सकता है। ऐसा इसलिए कि निरंजन से ताकतवर अन्य कोई भी नहीं है। यह नाम स्वयं परम-पुरुष ही है। इसलिए इस नाम के अलावा और कोई भी उपाय नहीं है कि जीव अपनी ताकत से या अन्य किसी सांसारिक गुरु द्वारा दिये जाने वाले 52 अक्षर के सांसारिक नाम द्वारा पार हो सके। परम-पुरुष में मिले हुए सद्गुरु द्वारा दिये जाने वाले सत्यनाम से ही यह जीव कठिन काल के कष्टमय संसार से पार हो सकता है। क्योंकि उस नाम के आगे निरंजन का बस नहीं चलता। इसलिए साहिब कह रहे हैं-

अदाकर खुद खजाने से, छुड़ा ले अपने बंदे को।।

यानी नाम रूप में वो परम-पुरुष खुद इसे वहाँ ले जाता है।

अब सद्गुरु की महिमा इसलिए है कि वो परम-पुरुष स्वयं जीव को कल्याण करने में सक्षम नहीं है। वो एक सागर की तरह है, जो स्वयं अपने जल को दूसरों तक पहुँचाने में सक्षम नहीं है। वो तो चंदन के वृक्ष की तरह है जो स्वयं अपनी महक को दूसरों तक नहीं पहुँचा सकता है। अब बादल ही समुद्र के जल को ले जाकर दूर-दूर तक पहुंचाते हैं और सारा वातावरण सुंदर कर देते हैं। चंदन की महक को दूसरों तक पहुँचाने का काम हवा करती है। कुछ ऐसा ही रोल सद्गुरु अदा करते हैं। वो परम-पुरुष में समाकर उनकी वो परम चेतन सुरति को अपने में समेटे हैं और नाम दान के समय उस परम चेतन सुरति से शिष्य की सुरति के अन्दर छिपे परम-पुरुष के तत्व को जाग्रत कर देते हैं। इसी को नाम दान कहते हैं। फिर यही नाम जीते-जी या शरीर के छूटने पर हंस को उसके सही ठिकाने (अमरलोक) ले जाता है।

मैं कबीर विचलूँ नहीं, शब्द मोर समरथ। ताको लोक पठावहूँ, चढ़े शब्द के रथ।।

शब्द रूपी जहाज़ पर बैठकर संत उस देश को जाते हैं। साहिब ने सुरति को जगाने की बात कही। यह सुरति नाम से जगेगी। फिर नाम के सुमिरण की बात कही। यह सुमिरण क्या है? यह सुरति को एकाग्र करता है।

होंठ कण्ठ हाले नहीं, मुख नहं नाम उचार। गुप्त सुमिरण जो लखे, सोई हंस हमार।।

साहिब ने अनहद शब्द की बात भी की है।

कर नैनों दीदार महल में प्यारा है। आँख कान मुख बंद कराओ, अनहद झींगा शब्द सुनाओ।। दोनों तिल एक तार मिलाओ, तब देखो गुलजारा है।।

जब अपने में आते जायेंगे तो दिव्य - शक्ति बढ़ती जायेगी। यह तो आपमें है ही है। इसे कहीं से आहूत नहीं करना है। आत्मा समग्र गुणों से परिपूर्ण है। फिर अविवेक से काम कैसे हो जाते हैं? इंद्रियों के काम कैसे हो जाते हैं? क्योंकि आत्मा ने अपने को यही मान लिया है। आत्मा ने संकल्प-विकल्प को ही अपना आपा मान लिया।

कभी आप सोचते हैं कि अमर-लोक में जाकर देखेंगे कि कैसे हैं प्रभु! कैसी है आत्मा! नहीं, वहाँ जाकर ऐसा नहीं लगता है कि अहा, कैसा है प्रभु! कोई आश्चर्य नहीं लगता है। नींद में होते हैं तो जागने पर अपने ही घर में होते हैं। कोई आश्चर्य थोड़ा लगता है कि कहाँ हूँ! आपके अनन्त जन्म हो चुके हैं। तब भी आत्मा नहीं भूली है। आप जानते हैं। सूर्य को बादल आच्छादित किये हैं। आत्मा का कुछ भी कम नहीं किया जा सकता है। जो न्यूनाधिक हो जाए, वो नष्ट हो जायेगा। आत्मा में कुछ भी प्रविष्ट नहीं किया जा सकता है। यह परिपूर्ण है। तो कुछ नया नहीं लगता है। कुछ आश्चर्य नहीं लगता है। हाँ, केवल यह आश्चर्य लगता है कि कहाँ चला गया था! वो प्रभु अन्जाना नहीं लगता है।

आत्मा को ज्ञान है। इसलिए मैं किसी को भी हलके में नहीं लेता हूँ। केवल विस्मृति हो गयी है।

किताब का पन्ना पलटते हैं, पढ़ते हैं। पर कभी नज़र के सामने से पेज हट जाता है। ध्यान नहीं रहता है कि कौन सी चीज़ कहाँ लिखी है। कहीं किसी को मिलते हैं तो उसका नाम याद नहीं आता है। आप उसे जानते हैं, पर नाम याद नहीं आता है। चित्त की भ्रमक स्थिति से यह हुआ। आत्मा मन के साथ में रह रही है, इसलिए भ्रमित हो गयी है।

सत्य तक पहुँचने के लिए गुरु नहीं, सद्गुरु की जरूरत पड़ेगी। सद्गुरु यानी एक पूर्ण गुरु। यदि रूहानी दुनिया के नज़ारे लेकर कुछ समय आनन्द में रहकर पुनः इस भवसागर में गोते खाने की इच्छा हो तब तो कोई भी पहुँचा हुआ गुरु ठीक है, पर यदि सदा-सदा के लिए इस भवसागर से छुटकर परम सत्य को जानने की लालसा हो तो फिर सद्गुरु अर्थात् पूर्ण गुरु के सच्चे 'नाम' की जरूरत है। जिसे सद्गुरु का सच्चा नाम मिल गया, वो चाहे तो अन्दर की रूहानी दुनिया में भी जा सकता है, उसे भी देख सकता है, पर उसके पास जो नाम होगा, वो उसे पिण्ड और ब्रह्माण्ड- दोनों से परे अमर सत्य तक ले जाने वाला होगा। वहाँ अपने

ज़ोर से, नाम की कमाई से नहीं पहुँचा जा सकता। वहाँ जाने के लिए सद्गुरु की कृपा की जरूरत होगी। निरंजन और माया किसी भी जीव को इस ब्रह्माण्ड से बाहर नहीं जाने देते। वे अन्दर की दुनिया में भी जीव को जाने नहीं देना चाहते। अनेक बाधाएँ डालकर जीव को भ्रमित कर देते हैं। फिर इस ब्रह्माण्ड से पार जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। वहाँ निरंजन और माया पूरी ताकत से जीव को खींचते हैं। साहिब कहते हैं कि जीव करोड़ों प्रयत्न करने पर भी वहाँ से पार नहीं हो सकता। सद्गुरु जीव को अपनी शक्ति देकर वहाँ से पार करता है तभी तो कहा है:

बिन सतगुरु पावे नहीं, कोई कोटिन करे उपाय।।

साहिब कह रहे हैं कि इस गुप्त नाम को प्रगट नहीं करना है, गुप्त ही रहने देना है। इसी गुप्त नाम से संसार के जीव पार होंगे। जिसके घट में यह नाम आयेगा, वो हंस सत्य-लोक में पहुँच जायेगा। मूल नाम पा लेने पर काल के सारे जाल कट जायेंगे। मैं युग-युग इस संसार में आता हूँ और मूल नाम की डोरी से हंसों को सत्य-लोक ले जाता हूँ। इस नाम से हंस के करोड़ों कर्मों का जाल भी कट जाता है। चाहे कोई कितना भी ज्ञान प्राप्त कर ले, ज्ञान की बातें कर ले, पर मूल नाम के बिना मुक्ति हो ही नहीं सकती है। यह नाम कहने में नहीं आता है। जो इस नाम को पा लेता है, वो संसार- सागर से पार हो जाता है।

इस सच्चे नाम को पाकर ही जीव संसार-सागर से पार हो सकता है। इसलिए संतों ने इस नाम की महिमा का बखान किया है। सांसारिक नाम की महिमा का बखान उन्होंने नहीं किया है। मानव-तन को पाकर यदि हमने सच्चे सद्गुरु द्वारा सच्चे नाम को प्राप्त नहीं किया तो यह तन बेकार में चला जायेगा। इसलिए इस अमोलक मानव-तन को पाकर झूठ में नहीं उलझना है, विषय-विकारों में नहीं उलझना है।

नर तन का फल विषय न भाव। भजो नाम सब काज बिहाई।।

कई बार कीट, पतंगा बन चुका है; कई बार हाथी, मछली, कुरंग आदि बन चुका है; कई जन्म तू पक्षी और सर्प हो चुका है और कई जन्म वृक्ष की योनि भोग चुका है। यह मनुष्य-तन बहुत देर बाद प्राप्त हुआ है। अब तो ईश्वर से मिलन की बारी है। यदि इसे पाकर भी ईश्वर की ओर नहीं बढ़ा तो फिर बार-बार पत्थर, पहाड़ आदि ही बनेगा; बार-बार गर्भ में आयेगा, 84 लाख योनियों में घूमता फिरेगा। इसलिए तू दुर्लभ मनुष्य जीवन को यूँ न गँवा और साधु-संतों की संगति कर, गुरुजनों की सेवा कर, जिससे तेरा जीवन सफल हो। मान- अभिमान को छोड़ कर जीते-जी मन को मार दे, जीते-जी मर जा ताकि बार-बार तुझे मरना न पड़े। तुझमें तो इतनी शक्ति है कि जो चाहे, कर सकता है। यह मनुष्य-तन तुझे ईश्वर में मिलने को मिला है; उसने तुझे अपने से मिलने के लिए ही यह अवसर प्रदान किया है, इसलिए तू इसे पाकर उसी का भजन कर, उसी के गुण गा!

यदि मनुष्य-तन पाकर भी ईश्वर का भजन नहीं किया तो लानत है इस शरीर को। बच्चे तो पशुओं के भी हैं; मैथुन तो वे भी करते हैं, सोते तो वे भी हैं, खाते वे भी हैं, फिर मनुष्य श्रेष्ठ कैसे हुआ! इसके पास तो बुद्धि है, उसका इस्तेमाल कर। यदि इसने संसार की असारता का रहस्य न जाना, ईश्वर-भक्ति में न लगा तो जानवरों से बेहतर नहीं है। हीरा सा जन्म बेकार में खो रहा है यह।

सत्संग है क्या? पहले इस बात को पहले समझना होगा। 'सत्य' का संग ही सत्संग है। सत्य क्या है? 'सत्य सोई जो विनशे नाहीं' वो सत्पुरुष, जिसका कभी नाश नहीं होता, ही सत्य है और जो उसे जान लेता है, उसे पा लेता है, वो भी सत्य हो जाता है; इसलिए सद्गुरु भी सत्य है। सद्गुरु और सत्पुरुष में कोई भेद नहीं रहता। सत्पुरुष की संगत तो हम नहीं कर सकते, अतः सद्गुरु का संग ही सत्संग है।

विरह-वेदना जब बहुत अधिक हो जाती है, तब ही सद्गुरु के साथ प्रेम की कहानी रंग लाती है, तब ही सद्गुरु के सच्चे प्रेम का पता चलता है, तब ही प्रेम का वो आनन्द मिलता है, जिसे पाकर जीव को कल्याण होता है।

जब सद्गुरु के लिए तड़प बढ़ जाती है तो सोए हुए भी कभी-कभी सद्गुरु की ताकत आकर आपकी आत्मा को उठा ले चलती है ब्रह्माण्ड के नज़ारे दिखाने के लिए। आप जब भी सोएँ, गुरु के लिए तड़प रखकर ही सोएँ। ऐसे में जब भी लेटे-लेटे या नींद में 'धुँ-धुँ' का शब्द सुनाई पड़े तो डर मत जाना; समझ लेना कि सद्गुरु आ गये लेने के लिए।

धुँ-धुँ शब्द शून्य ते पारा। धुँ-धुँ शब्द ही जीव उबारा।।

फिर वह शब्द आपकी आत्मा को उठाकर ऊपर की ओर चल पड़ेगा। थोड़ी दूर जाकर वह शब्द आपसे बातें भी करने लगेगा। फिर अनन्त ब्रह्माण्डों को लाँघते हुए वह शब्द आपको अलौकिक दुनिया की सैर करायेगा।

शुरू-शुरू में सद्गुरु और शिष्य साथ-साथ चल रहे होते हैं, लेकिन एक स्थान पर पहुँचकर सद्गुरु शिष्य की आत्मा को अपने अन्दर बिठा लेता है। अब शिष्य सद्गुरु में बैठ चारों ओर के नज़ारे देखता है। कुछ आगे चलकर सद्गुरु उसे बाहर निकालता है। आत्मा पूछती है कि उसे अपने में क्यों समाया था। सद्गुरु बताते है कि तुमने वहाँ अपने को भूल जाना था; केवल मैं ही वहाँ भूलता नहीं हूँ, अन्य सभी भूल जाते हैं। फिर आगे चलकर सुरति का सागर आता है। वहाँ आत्मा बिल्कुल निर्मल हो जाती है, और मन छूट जाता है। अब सद्गुरु आत्मा को लेकर अमर-लोक में प्रस्थान करता है। अमर-लोक पहुँचने पर सत्य-पुरुष के दर्शन से आत्मा में 16 सूर्य का प्रकाश आ जाता है। अब वहाँ आत्मा से पूछा जाता है कि उसे परमात्मा चाहिए या सद्गुरु। आत्मा परमात्मा की ओर खिंचती है। यदि वह परमात्मा माँगती है तो वहीं सत्लोक में रह जाती है और यदि वह सद्गुरु माँगती है तो साहिब उसे अपने में समा लेता है और ऐसे में वह आत्मा साहिब जैसी हो जाती है। ऐसे साहिब किसी को अपने में समाने नहीं देता, पर तब साहिब उसे समा लेता है अपने में।

यही है सद्गुरु के साथ सच्चे प्रेम की कहानी, जिसमें 'मैं' समाप्त हो जाता है, केवल साहिब रह जाता है। सत्य ही है।

**प्रीति बहुत संसार में, नाना विधि की सोय।**
**उत्तम प्रीति सो जानिये, सतगुरु से जो होय।।**
**प्रेम प्रेम सब कोई कहै, प्रेम न चीन्हें कोय।**
**जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावै सोय।।**

प्रत्येक ग्रह का अपना गुरुत्वाकर्षण है। इस तरह मन-माया में बड़ा आकर्षण है। जब जीव ब्रह्माण्ड से पार होने लगता है तो मन-माया पूरी ताकत से नीचे खींचते हैं। ऐसे में यदि सद्गुरु नहीं किया है, सद्गुरु का नाम नहीं है तो करोड़ों उपाय करने पर भी पार नहीं हो सकता है। पर यदि गुरु किया हुआ है तो वो उस समय जीव आत्मा को अपने में समा करके वहाँ से पार कर देता है। इसलिए-

बिन सतगुरु पावे नहीं, कोई कोटिन करे उपाय।।

जब सद्गुरु की कृपा होती है तो नींद में या ध्यान में 'धुँ-धुँ' का शब्द सुनाई पड़ता है। फिर यह शब्द (आठवाँ गुरु) आत्मा को शरीर से निकाल कर ऊपर की ओर ले चलता है और फिर यही अनन्त ब्रह्माण्डों को लाँघते हुए आत्मा को उसके सही ठिकाने (अमर - लोक) ले जाता है।

जीवन का अब सौंप दिया, सब भार तुम्हारे हाथों में। है जीत तुम्हारे हाथों में, है हार तुम्हारे हाथों में।।

कबीर साहिब ने भवसागर से मुक्ति की सहज और न्यारी युक्ति दिखाई। सद्गुरु सुरति के सुमिरन में रमे रहने को भीतर लगन लगाना कहा। ऐसा भक्त ही 'साध' होकर अपनी 'सुरति' को जगा लेता है। ठौर- ठिकाना जाने बिना लोग मन में ही मग्न रहकर भक्त कहलाते हैं और भक्ति-भेद कोई नहीं पाता।

इड़ा-पिंगला सम करने पर श्वांसा ऊपर की ओर चलती है। यही 'सुरति' से 'निरति' पवन को घेरना है। हमारी श्वांसा शून्य से नाभि में आ रही है, इसे ही पलटकर ऊर्ध्वमुखी कर दिया। जब श्वांसा ऊपर की ओर चलने लगेगी तो सभी 10 वायु 'निरति' रूप 'प्राण' धीरे-धीरे सुषुम्ना नाड़ी की तरफ आने लग जाते हैं। सुषुम्ना नाड़ी कफ रूप गोल-गठान से बन्द है; सब प्राण रूप 10 वायुओं अर्थात 'निरति' की एकाग्रता और ध्यान की ताकत से यह खुलती है। ऐसे सुषुम्ना नाड़ी खुल गई।

चन्द और चकोर की रीति से ध्यान कर। पल ही पल में देख ले अजूबा कर।।

इस तरह सुषुम्ना जाग्रत/चेतन हो जाती है, अर्थात हमारी श्वांसा-पवन की ताकत से ही सुषुम्ना खुलती है। पर, यदि योगी की सुरति वहाँ से हट गई तो श्वांसा-पवन फिर नाभि में गिर बैठ जायेगी। कोई भी इस साध्य योग-तप से ब्रह्म समान हो सकता है। वाल्मीकि जी मरा-मरा जप कर नहीं, स्वंसा को पलट कर ब्रह्म समान हुए। बड़े-बड़े पंथों वाले आज के गुरुओं लोगों ने आम लोगों में भ्रम फैलाया कि - वाल्मीकि जी मरा-मरा जप कर ब्रह्म समान हो गये। साँस, सुरति और नाम एक करके श्वांसा को ऊर्ध्वमुखी पलटा जाता है। ऐसी एकाग्र कठोर साधना से सुषुम्ना खुलती है। सद्गुरु के सहज-मार्ग में शीश से सवा हाथ ऊपर अधर में अर्थात आकाश-तत्व में जाए बिना 'नाम' को सुरति और निरति में समाकर सद्गुरु सुमिरन में रहना है। अमर-तत्व जो परमपुरुष का अंश है, उसी तत्व को मथकर सद्गुरु अपनी 'सुरति' को शिष्य की 'सुरति' से मिलाकर पार ले जाते हैं। निरंजन के लोक सहस्त्रसार (दशम द्वार) में दाहिने कमल को सुरति पाती है। यहीं से आगे का ध्यान सुरति-कमल 'सद्गुरु' स्थान है; इसी आत्म-तत्व का मूल-शब्द मन शिष्य को दिया है। सात-सुरति निरंजन स्थान के बाद अष्टम-कमल, इसी सुरति-कमल स्थान को कहा है। शरीर में निरंजन की सात-सुरति का वर्णन करते हुए कबीर साहिब ने वाणी में कहा-

कबीर साहिब कह रहे हैं कि शरीर में फैली, 'निरति' पवन को घेरकर 'सुरति' के साथ एकाग्र करने से ऊपर 'शब्द' के मिलन से अपनी आत्मा का दर्शन करोगे। अपने 'आत्मस्वरूप' को सुरति से देख लेने पर अष्ट सिद्धि-नौ निधियाँ तुम्हारी दासी हो जायेगी। सद्गुरु में सुरति एक रत्ती के किसी अंश बराबर भी कम न हो। दिन- प्रतिदिन आठों पहर सद्गुरु के सुमिरन में सुरति गहरी होती जाये, कभी विश्वास में कमी नहीं आने पाए; इस तरह पूरे होश में रहो। सद्गुरु ने तुम्हें क्षमा-शील-दया-विवेक के गुण दिये हैं। इस शरीर के भीतर काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार वृत्तियों के भयंकर चोर घात लगाये बैठे हैं। कभी भी जरा भी बेपरवाह मत होना।

दुनिया में भक्ति की श्रेणी हैं: मुँह से शब्दों द्वारा बोलकर जपना सामान्य जाप है। जो अन्तर में 'मन' से जपते हैं वे देव हैं। केवल 'सुरति' से जाप करने वाला ही संत कहलाता है। इसलिए सद्गुरु की सेवा और जाप 'सुरति' से करना ही सत्य-भक्ति है।

मुख से जपे सो मानवा, मन से जपे सो देव। सूरति से जपे सो सन्त है, ताकी करिये सेव।।

यह मानव शरीर जीवन रूपी ऊषा काल है, इसी में 'सूरति-निरति' रूपी नौबत बज रही है, जो अन्य जीवों को नसीब नहीं है। इस द्वार से इधर-उधर मत देखो और सुरति को सार-शब्द पकड़कर ऊपर चढ़ाओ। सद्गुरु द्वारा दिया गया गुप्त सार - शब्द स्वत: ही सहज है और समस्त शब्दों का कारण है। इस निरंजन सृष्टि की प्रकृति से वह 'शब्द' परे है, अगम है, अपर है, परमपुरुष में समाया हुआ है। उस शब्द का अनुभव सद्गुरु चरणों को आधार बनाकर सहज समाधि में होगा।

अब चल ऊघा काल है, नौबध बाजत द्वार। इधर उधर मत देखिये चढ़ि ये सुरति सम्हार।।

जैसे दौड़ने के लिए दोनों टाँगों का समान महत्व है। जैसे काम करने के लिए दोनों हाथों का समान महत्व है, इसी तरह सुरति और निरति दोनों का एक हो जाना 'आत्मज्ञान' के लिए महत्वपूर्ण है। जब दोनों मिल जायेंगे तो मूल 'शब्द' दिखेगा।

मन 24 घण्टे आत्मा को आखिर क्यों भ्रमित किये हुए है? क्योंकि जितने भी काम हैं, उनमें 'आत्मा' की ऊर्जा (शक्ति) चाहिए। यदि 'आत्मा' तत्व को निकाल दो तो संसार में कुछ नहीं होगा, सब वीरान है। मन कभी आत्मनिष्ठ नहीं होने देगा क्योंकि फिर कोई काम नहीं करेगा। इसलिए भ्रमित किये हुए है 'मन'

सुरति और निरति का मेल नहीं हो रहा है तभी आत्मा का साक्षात्कार नहीं हो रहा है। श्वाँसा-पवन शून्य से नाभि में चक्कर काट रही है; इसे ऊपर की ओर पलटना है, तभी सुरति और निरति का मेल हो पायेगा। इङ्गला-पिङ्गला चलती हैं तो साँस नाभि में आती है। इड़ (इङ्गला) नासिका का बांया स्वर और पिंगला (पिङ्गला) दायाँ स्वर है; जब दोनों सम होकर ऊर्ध्वमुखी चलेंगी तो सुषुम्ना खुलेगी। गुरु नानक देव जी कह रहे हैं-

इङ्गला पिङ्गला सुषुम्न बूझे, आपे अलख लखावे। ताके ऊपर साँचा सद्गुरु अनहद सुरत समावे।।

मन-बुद्धि-चित्त और अहंकार का निग्रह करने के बाद जो बचता है, वो ही 'आत्मा' है। साहिब वाणी में कह रहे हैं-

इङ्गला-पिङ्गला सम (मिलकर) होकर ऊर्ध्वमुखी चलेंगी तभी मन, बुद्धि, चित्त से पवन (निरति) अलग होकर सुरति के साथ अधर में उलट कर चलेगी। पाँच-तत्व की मानव देह से विदेह-सुरति पृथक है, परन्तु यही ब्रह्म (निरंजन) के अंग से संसार में तीन-गुणों की कला से युक्त होकर प्रगटी है। निरति संग चेतन शरीर में समाई 'सुरति' शरीर से ऊपर (शीश सवा हाथ) जाकर ही परम 'शब्द' से लग्न लगाती है। कबीर साहिब समझाते हैं कि इस तरह आप अपने विशेष चेतन रूप से परमात्मा अमरलोक को 'आत्मरूप' होकर पहचानोगे।

सुषुम्ना नाड़ी खुलने का मतलब है 10 वायुओं को अपने मुकाम में खींच करके सुषुम्ना नाड़ी में ले जाना। जब ये 'निरति' रूप वायु अपने-अपने स्थान से उठ जायेंगी तो शरीर काम करना बंद कर देगा और आपकी ऊर्जा खर्च नहीं होगी। जमीन में समाधि लेने वाले योगी-साधक भी सभी वायुओं को ऊपर उठाते हैं और आज्ञा-चक्र में ले जाते हैं। कुछ प्राणायाम द्वारा कुम्भक रेचक ज्ञान से अपना पवन-संग्रह करते हैं और वे मेरुदण्ड से भी पवन खींचते हैं। आज्ञा चक्र में जाकर निग्रह करते हैं, ये पवन-क्रियाएँ कहलाती हैं, लेकिन वो कभी 'दशम द्वार' तक नहीं पहुँच पाते; आज्ञा चक्र तक पहुँचते हैं। आज्ञा चक्र में भी अपने स्वरूप का अनुभव होता है लेकिन उसमें 'मन' शामिल रहता है।

सार शब्द सत्पुरुष कहाया। यह सार-शब्द स्वयं परमात्मा है। इन्सान के शरीर में बड़ी दिव्य शक्तियाँ हैं, पर लोग इन दिव्य शक्तियों को ही आध्यात्मिक शक्तियाँ कह रहे हैं। भाइयो, ये आध्यात्मिक शक्तियाँ क्या हैं? क्या आत्मा के पास भी शक्तियाँ हैं? हाँ 'आत्मा' के पास छः शरीरों से बड़ी और निराली शक्तियाँ हैं। जैसे आपके बच्चों में आपके गुण, आपकी शक्तियाँ हैं; इसी तरह 'आत्मा' परमात्मा का अंश है, तो जो शक्तियाँ परमात्मा [साहिब परमपुरुष] में हैं, वो आत्मा में होंगी कि नहीं। पक्का होंगी! सबमें एक जैसी आत्मा है; आत्मा के अन्दर जो शक्तियाँ हैं, वे आध्यात्मिक हैं।

कबीर पंथ के अंदर भी बारह पंथ मत-मतान्तर हैं, वो भी उलझे हुए हैं। अन्तर्मुखी नहीं हो पा रहे हैं। केवल 'सद्गुरु' और 'नाम' कहकर भ्रम में हैं। किसी भी गुरु गद्दी का स्वामी न तो बालब्रह्मचारी है और न ही सन्यासी होकर घर-परिवार से अलग है। न ही कोई निज मेहनत से पेट भर रहा है, न ही परिवार से बाहर किसी पात्र शिष्य को गद्दी सौंप कर जा रहा। फिर भी अनेक संत मत के पंथ, सद्गुरु और सत्यलोक या चौथे लोक की बातें बता रहे हैं। एक गुप्त 'नाम' जाने बिना पाँच नाम देकर स्वयं 'संत' और 'सद्गुरु' कहला रहे हैं। इसलिए समझा रहा हूँ-

केवल कबीर का गाया गायेगा, तीन लोक पछतायेगा। कबीर का गाया बूझेगा तो अन्तर्गत को सूझेगा।।

इसलिए साहिब-बंदगी सत्संग में कहता हूँ - 'जो वस्त मेरे पास है, ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है।' विश्वास के साथ विनम्रता से कह रहा हूँ। सच्चा नाम' ही वास्तव में सार-शब्द है और यह स्वयं साहिब ही है। इसलिए जब 'सद्गुरु' से 'सार-शब्द' मिल जाएगा तो 'जीव' का सारा अज्ञान समाप्त हो जायेगा और मनुष्य सत्य-भक्ति के पथ पर चलते हुए अपने सच्चे घर 'अमरलोक' को प्राप्त करेगा। 'हंस' होकर अपने निज 'अमरलोक' को प्राप्त करने वाली आत्मा फिर कभी इस त्रिलोक के भवसागर में वापिस नहीं आती।

फिर वहाँ से आगे चलते हैं तो एक बिंदू आता है, जहाँ गुरु शिष्य एक हो जाते हैं, लगता है कि जितनी ताकत उसकी है, उतनी मेरी भी है। परम पुरुष के पास पहुँचते हैं। परम पुरुष पूछता है कि गुरु चाहिए या मैं चाहिए। वहाँ गुरु और परम पुरुष का अंतर ऐसा लगता है, जैसे दीपक और सूर्य। आत्मा सीधा परम पुरुष के पास खिंचती है। अगर वहाँ परम पुरुष कहा तो सीधा वहाँ सत्लोक में ही रह जायेगा। अपने में नहीं समाने देता है। अगर वहाँ कहेगा कि सद्गुरु चाहिए तो बात और होगी। यह तब होगा, जब उसने यहाँ पर भी यही धारणा रखी कि सद्गुरु ही परम पुरुष है। तब परम पुरुष अत्यंत प्रसन्न होकर अपने में समाता है। तब अपने में समाता है। इस पर साहिब ने कहा-

जुड़वा करूँ निज सम ओहे।।

मैं आपसे जो यह रहस्य बोल रहा हूँ, यह बहुत बड़ा रहस्य है। जब आत्मा परम पुरुष को देखती है, तभी 16 सूर्यों का उसका प्रकाश हो जाता है। लेकिन जब समाती है तो उसी की तरह हो जाती है। अब वो धरती पर आते हैं। अब उनके पास पारस सुरति है। यह अत्यंत रहस्यमयी बात बोल रहा हूँ। उसे कहते हैं कि जाओ, तुम्हें निरंजन कभी भी नहीं छू सकेगा। अपनी सुरति से तुम जीवों को चेतन कर दोगे। जब जीव चेतन हो जायेंगे तो उन पर माया नहीं लगेगी। तब वो फिर सद्गुरु कहलाता है। ठीक है।

फिर क्या करेगा गुरु! जिस दिन नाम देगा, पूरा मन का सिस्टम खत्म कर देगा। उसके पास पारस सुरति है।

अब फैसला आपके हाथ में है। स्वयं विचार कर लो न कि गुरु- भक्त मनुष्य की भक्ति कहें या उन्हें परम-पुरुष करके मानें।

मेरे हरि मौको भजे, मैं सोऊँ पाँव पसार।।

आप क्या याद करोगे! मैं याद आऊँगा। गुरु ने पार कर दिया है। सिर्फ जो चीज़ दी है वो संभालना। बाकी कह रहे हैं कि कमाई करनी है। वो कह रहे हैं कि इसी से पार होगे। हम कह रहे हैं कि हो सके तो करना, नहीं तो कोई बात ही नहीं है। सुमिरन न करोगे तो मन दुनिया रमाना चाहेगा।

सत्यनाम निज औषधि, सतगुरू देई बताय। औषधि खाय अरु पथ गहे, ताकी वेदन जायं।।

इसलिए अन्तर है। मत करो सुमिरन, पर फिर मन के दायरे में मत आना।

सुमिरन मन की रीत है, सो मन है तुझ माहिं।।

सुमिरन नहीं करोगे तो मन के संकल्प-विकल्प शुरू हो जायेंगे और अन्तर पड़ेगा। जिस दिन नाम दिया तो सब प्रकाशित कर दिया। जो कई दिन गुफाओं और कन्दराओं में बैठकर तप करने से होना था, वो पल में कर दिया।

कोटि जन्म का पथ था, गुरु पल में दिया पहुँचाय।।

तुम्हारा काम बन चुका है। जो पूँजी दी है, इसे लुटाना मत। वो कह रहे हैं कि पूँजी कमाना। हम कह रहे हैं कि जो पूँजी दी है, लुटाना नहीं।

मन चुपचाप कोई-न-कोई संकल्प-विकल्प करेगा। उससे बचने को कहा। वो कुंद करना चाहेगा। ध्यान करने के लिए तो अपने काम के लिए कहा ताकि दूसरों को भी समझा सको। मैं एक-एक के घर तो नहीं जा सकता न! आपके साथ खुद-ब-खुद सब काम होता जा रहा है। ममता छूट रही है, मोह छूट रहा है। मन तो आपको सलाम करता होगा। मन को जहाँ चाहो, लगाओ। सब चीजें नियंत्रण में हैं। सब चीजें कंट्रोल में होती जा रही हैं। गृहस्थ आश्रम में रहते हुए भी आप महात्मा वाला जीवन जी रहे हैं।

नाम दान ग्रहण करने के उपरान्त इसका सत्त अभ्यास एवं जप आवश्यक है। ध्यानावस्था को प्राप्त किए बिना अनुभूति सम्भव नहीं। यह काम तो भक्त को स्वयंमेव ही करना है, अन्यथा स्वयं का कल्याण तथा आत्मज्ञान की सम्भावना क्षीण है। गुरु संकेत कर सकते हैं, मार्गदर्शन सम्भव है। तुम्हें नदी के किनारे पर लाकर खड़ा कर सकते हैं। परन्तु पानी तो स्वयं ही पीना पड़ेगा। जल ग्रहण करेंगे तो ही प्यास बुझेगी, यह अनुभव है। यही एकमात्र ज्ञान होगा अथवा नदी के रासायनिक तत्त्वों की जानकारी, विश्लेषण तथा अन्य सभी कुछ जानकर भी तुम कभी प्यास को न जान पाओगे। रास्ता केवल एक है। पानी स्वयं पी लो। अनुभूति प्राप्त करो। जानकारी अथवा सूचना इकट्ठी कर लेने से अनुभव न मिलेगा।

प्रश्न: आपका नाम कैसा है? उत्तर: यह सार नाम वाणी का विषय नहीं है। यह 52 अक्षर से परे सजीव नाम है। नाम दान के समय संत सद्गुरु एक क्रिया करता है। वो आपके अन्दर जो ईश्वरीय सत्ता है, उसे जाग्रत करके एकाग्र कर देता है। आपकी आत्मा को मन से निकालकर अपने में समाता है और फिर वापिस शरीर में प्रविष्ट करता है। इस क्रिया से मन और आत्मा अलग हो जाते हैं। इस क्रिया को नाम-दान कहते हैं। वो नाम स्वयं परम पुरुष है, जो आपकी सुरक्षा में, आपको हंस बनाने के लिए, आपको काल पुरुष से बचाने के लिए, आपको मन-माया की मार से बचाने के लिए, आपको इस संसार सागर से पार अमरलोक ले जाने के लिए 24 घंटे आपके साथ में रहता है। संक्षेप में संत सद्गुरु उस परम पुरुष को ही सार नाम के रूप में आपके साथ दे देता है। अन्यथा कोई भी ताकत ऐसी नहीं है, जो काल पुरुष से छुड़ाकर जीव को भवसागर के पार ले जाए।

प्रश्न: क्या जीव को कष्ट देने वाले निरंजन का भी कभी नाश होगा और सारे जीव सदा के लिए मुक्त हो पायेंगे? उत्तर: हाँ, निरंजन का भी एक दिन नाश हो जाएगा। पर इसमें बहुत समय लगेगा। क्योंकि परम पुरुष ने निरंजन को 127 असंख्य चौकड़ी युगों का राज्य दिया है। जब तक यह समय पूरा नहीं हो जाता, तब तक निरंजन रहेगा।

47 लाख 4 युग होते हैं। 4 युग हो गये तो एक चौकड़ी युग हुआ। 100 बार चार युग हुए तो 100 चौकड़ी युग हुए। 100 के बाद हजार, फिर दस हजार, फिर लाख, फिर दस लाख, फिर करोड़, फिर दस करोड़, अरब, 10 अरब, फिर खरब, फिर नील, दस नील, पदम, दस पदम, शंख, 10 शंख, असंख्य, 10 असंख्य, फिर अनन्त।

4 असंख्य चौकड़ी युग हो चुके हैं। यानी अरबों बार सृष्टि का नाश हो चुका है और अरबों बार होना बाकी है। तब जाकर निरंजन का नम्बर लगेगा।

अब सुरति कहाँ है? कैसे एकाग्र करें? इसका सवाल है। सुरति मन के काबू में है। मैंने ध्यान का सूत्र बताते समय इसे शीश से सवा हाथ ऊपर रखने को कहा। क्यों? आपने इस पर गौर नहीं किया। अगर कहीं भी ध्यान रोका, आपको लगेगा कि इन्हीं आँखों से देख रहा हूँ। आपको एक अनुभूति दिलानी है कि तुम शरीर के बिना भी हो। इसलिए देखना किससे है, ध्यान से। क्योंकि 11वाँ दरवाजा ध्यान के अन्दर है। आपके ध्यान को रोकने के लिए किसी आधार की जरूरत नहीं है। आपने शरीर धारण किया तो आपको लगता है कि शरीर के लिए कोई आधार चाहिए। आपके ध्यान को कोई आधार नहीं चाहिए। यह तो शरीर को आधार चाहिए। इसलिए साहिब कह रहे हैं-

ऊँची तानो सूरति को, तहाँ देखो पुरुष अलेख। अधर आसन किया, अगम प्याला पिया।।

यहाँ ध्यान करने के लिए इसलिए बोला कि तुम्हारा ध्यान देखेगा कि तुम पहले इस सोच से मुक्त हो जाओ कि तुम शरीर हो। इस बात से मुक्त हो जाओ। तुम एक चेतना हो। यहाँ इसलिए समेटने के लिए बोला कि ग्राउण्ड में आ जा। ग्राउण्ड में आकर के सावधान! वहाँ कुछ देखोगे तो पहले अचरज होगा कि कैसे देखा। शरीर में आओगे। मन भ्रमित करेगा। यहाँ हम अलग हुए कि नहीं।

तो मैंने उससे कहा कि सुमिरन ध्यान को कंट्रोल करेगा। आप मत चिंता करो। मैंने आपको लाइफ जैकेट पहनाई हुई है। मन डुबा नहीं पायेगा। चाहे तुम्हें तैरना आता है चाहे नहीं आप डूबोगे नहीं।

जप तप संयम साधना, सब सुमिरन के माहिं। कबीर जानत संत जन, सुमिरन सब कछु नाहिं।।

यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि जितनी देर तक हम सुमिरन में हैं, हम मन पर लगाम कसे हुए हैं। सुमिरन के दो लाभ हैं। पहला यह कि आप आत्मनिष्ठ रहेंगे। यह है- जाप स्थिति। आप बहुत चेतन रहोगे। फिर अजपा आता है। याद नहीं करोगे, तब भी हमेशा एकाग्र रहोगे। चलते- फिरते भजन करते रहना। हमारी आत्मा श्वास लेने की आदी हो गयी है। इसलिए श्वांसा के सुमिरन से मन नियंत्रण में आएगा। श्वांस पूरे शरीर को चेतन कर रही है। जब श्वांस से सुमिरन किया तो वो पूरे रोम-रोम से सुमिरन हो जाता है।

कहत कबीर सुनो भाई साधो, हर स्वांसों की स्वांस में।। मौको कहाँ ढूँढे रे बंदे, मैं तो तेजे पास में।।

कभी-कभी मन हताश करता है। हमने आपको एक भय दिया। तुम्हारे पहले वाले कर्म खत्म कर दिये। फिर कहा कि सावधान। इसके बाद जो ग़लत करोगे, सज़ा मिलेगी। इस तन से कोई भी पाप कर्म नहीं करना। कुछ भी ग़लत किया तो सज़ा मिलेगी। उसमें एक अन्तर होगा। मान लो, आपने 10 तमाचे की ग़लती की। साहिब 10 तमाचे एक-साथ नहीं मारेगा। एक दिन खींचकर एक पड़ेगा। 2-4 दिन बाद दूसरा पड़ेगा। आपको हर तमाचे का पता चलेगा कि क्यों पड़ा। फिर 4-6 दिन बाद एक और पड़ेगा। पूरे एक -साथ पड़ते तो नुक़सान होना था। 10 पड़ेंगे- ही-पड़ेंगे। फिर बताया जाएगा कि यह काम किया था, इसलिए 10 तमाचे पड़े। अगली बार खुद ही सीधे हो जाओगे।

जो सार-शब्द को मानकर ग्रहण कर लेता है और उस पर विश्वास कर लेता है, वो काल का फंदा तोड़कर चौथे लोक (अमर-लोक) में निवास पा लेता है।

गुरु की महिमा का बखान करने से पाप नष्ट होते हैं। दूसरी ओर गुरु की निंदा तो भूलकर भी नहीं करनी है। यदि आपने पहले कोई और गुरु किया था, आपको लगा कि वो आपकी आत्मा का कल्याण नहीं कर पायेगा और आप मेरे पास आए। पर फिर भी उस गुरु की निंदा नहीं करनी है। यह दोष लगता है। चाहे वो कैसा भी हो। जिसे आपने गुरु कर लिया, उसकी निंदा नहीं करनी है। यदि वो आपको भवसागर से पार करने में सक्षम नहीं है तो चुपचाप दूसरे गुरु की खोज करके उसकी शरण में आ जाओ, पर पहले वाले गुरु की निंदा न हो। फिर सच्चे संत-सद्गुरु की निंदा तो सुनना भी पाप है।

सत्यनाम को सुमिरता, हंस कर भावै खींझ। उलटा सूलटा बोइये, ज्यों खेतन में बीज।।

जिस तरह खेत में बीज चाहे कैसे भी डाल दो, वो अंकुरित हो जाता है। इस तरह सच्चे नाम का सुमिरन चाहे कोई हंसते हुए करे यानी दिल से करे या फिर खींझते हुए करे यानी बेमन से करे, वो फलित ही होता है।

किसी की जाति आदि पूछकर कि नीच तो नहीं है, पानी पिया जाता है। पर यह नहीं मालूम है कि जिस मिट्टी के घर में रहा जा रहा है, उस मिट्टी में पूरी सृष्टि मरकर समाई हुई है। अट्ठासी हजार मुनि, छप्पन कोटि यादव भी इसी में मिले हुए हैं। क्षण-क्षण पर पैगम्बर इस मिट्टी में गाड़ गये हैं और वे मिटटी में मिलकर, सड़कर मिट्टी ही हो गये हैं। पर किसी नीच के हाथ का पानी नहीं पिया जाता है। फिर नदी का पानी भी कहाँ साफ है! मछली, कछुए, घड़ियाल आदि के शरीर का रक्त, वीर्य आदि भी उसी में मौजूद होता है, क्योंकि वे तो वहीं संभोग क्रिया करते हैं। फिर उस नदी के जल में लोग कूड़ा-कर्कट भी फेंकते हैं यानी सारा नरक उसमें बहता हुआ आता है। फिर कुछ लोग लाश को पानी में बहा देते हैं, इसलिए कई पशुओं और इंसानों की लाशें भी उसमें सड़-गलकर मिल जाती हैं। पर किसी नीच के हाथ का पानी नहीं पिया जाता है। फिर दूध भी कहाँ से आता है! हड्डी और माँस की नलियों से होता हुआ ही आता है। यह तो पी लिया जाता है, पर यदि कोई छोटी जाति का घड़े को हाथ लगा दे तो उस घड़े का पानी तक नहीं पिया जाता है। जहाँ वेद- कितेब मन में भ्रम उत्पन्न करते हैं और पाखण्ड कार्यों में उलझाते हैं, वहाँ उन्हें त्यागकर आगे बढ़ना चाहिए।

ऐसा योग नहीं देखा कि माया में भूलकर असावधान होकर भटकता फिरे। महादेव का पथ चलाकर लोग अपने को महन्त कहलवाते हैं और बाजार में समाधि लगाकर दुनिया को अपने चमत्कार दिखाते हैं और शस्त्र आदि धारण कर मेलों में चलते हैं। ये कच्चे सिद्ध हैं, जिन्हें यश और धन रूपी माया प्यारी है। सोचो, दत्तात्रेय ने कब किसी का किला तोड़ा था! शुकदेव ने कब तोप चलाने वाली फौज को इकट्ठा किया था! नारद जी ने कब किसी पर बन्दूक चलायी थी! व्यासदेव ने कब युद्ध का बाजा बजाया था! पर ये मंदबुद्धि लड़ाई-झगड़े में लगे रहते हैं और युद्ध वाले अस्त्र-शस्त्र धारण किये रहते हैं। कहने में तो ये विरक्त बनते हैं, पर मन में यश और धन के लोभी हैं। ये सोने के भूषण और चमकने वाले वस्त्र पहनकर साधु-वेष को लज्जित करते हैं। ये किसी से घोड़ा-घोड़ी बटोर लेते हैं तो किसी से गाँव दान में पा लेते हैं और करोड़पति बनकर चल पड़ते हैं।

वो मूर्ख बड़ी भूल में है, जो हर प्राणी में आत्मराम को नहीं देखता। जबरन आकर गाय को बाँध ले गया और खुद गला काटकर उसकी जान ले ली। जीवित प्राणी को मुर्दा कर दिया और फिर कहा कि हलाल हुआ अर्थात ठीक या जायज काम हुआ। जिस माँस को तू अपवित्र कहता है उसकी उत्पत्ति तो सुन। वो माँस तो रज-वीर्य से बना है और उसी अपवित्र माँस को तुमने खा लिया। हे मूर्ख! तू अपने इस पाप को नहीं देखता और कहता है कि हमारे बड़ों ने भी यह काम किया और यही उपदेश दिया है, पर सुन, जिन्होंने तुम्हें ऐसा उपदेश दिया है, उन पर तो इसका पाप लगेगा ही, साथ ही तुम्हारी भी एक दिन ऐसे ही गर्दन काटी जायेगी। जवानी से तुम्हें बुढ़ापा आ गया, पर तुम्हारा दिल अभी भी साफ़ नहीं हुआ। कर्मकाण्ड करते-करते तू एक दिन ऐसे ही मर जाता है। चाहे कोई कितनी भी धार्मिक पुस्तकें पढ़ता रहे, पर यदि वो सबमें एक आत्मा नहीं देख रहा है, जीवहत्या कर रहा है तो वो चाहे हिंदू हो या मुसलमान, नरक में ही जायेगा।

एक बड़ा आश्चर्य होता है कि किसी के घर में कोई व्यक्ति मर जाए तो उसके घर में कई दिन तक भोजन नहीं किया जाता है और दूसरी तरफ किसी पशु की हत्या करके उसकी रसोई बनती है और बड़े चाव से माँस खाया जाता है। नित्यकर्म, स्नानादि किया जाता है, पर जब हड्डी चबाई जाती है तब षट्कर्म पूरे होते हैं! धर्म के नाम पर जीव-हत्या होती है, पर यह तो बुरा काम है। यह ठीक नहीं है। साहिब कहते हैं कि दुनिया भ्रम में भूली हुई है। परमात्मा का सही घर कोई बिरला ही पाता है।

सत्य नाम जिन्ह चीन्हिया, झीना पिंजर तास। नैन न आवै निंदरी, अंग न जामै माँस।।

जो नाम को जान लेते हैं, उनका शरीर दुर्बल हो जाता है। उनकी आँखों से नींद गायब हो जाती है और शरीर में माँस नहीं जम पाता है। अर्थात उनकी भूख-प्यास भी समाप्त हो जाती है।

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कहैं कबीर सुमिरन किये, साईं माहिं समाय।

सुमिरन से सुख होत है, सुमिरन से दुख जाय ॥

क्या सच में सुमिरन से सुख की प्राप्ति होती है ? कहैं कबीर सुमिरन किये, साईं माहिं समाय ॥

क्या सच में केवल सुमिरन से हम परमात्म-तत्व को प्राप्त कर सकते हैं ? केवल सुमिरन से परमात्म-तत्व की प्राप्ति होती है। जितनी देर सुमिरन कर रहे हैं, उतनी देर आप आत्मनिष्ठ हैं, उतनी देर आपका मन पर नियंत्रण है, उतनी देर आप आत्मा के नज़दीक हैं।

जप तप संयम साधना, सब सुमिरन के माहिं।
कबीर जानत संत जन, सुमिरन सम कछु नाहिं ॥

जप, तप, संयम, साधना आदि सब सुमिरन में आते हैं। एक बालक था। उसके बाप ने कहा कि तू माता को परेशान करता रहता है, कभी खोया खाना, कभी दही खाना, कभी बरफी खाना। तू ऐसा किया कर कि तू दूध पी लिया कर; उसी में सब कुछ आ जाता है; सब उसी से बनती हैं। इस तरह सुमिरन के अन्दर सब आ जाता है। सुमिरन के समान कुछ भी नहीं है।

सुमिरन से सुख होत है, सुमिरन से दुख जाय ॥

क्या यथार्थ में सुख की प्राप्ति होती है ? जब भी सुमिरन कर रहा है, शांत है, चिंतन पर नियंत्रण है। कुछ अन्य विचार उत्पन्न नहीं होते हैं।

राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति ऊबारी। कहुँ लगि करौं मैं नाम बड़ाई। राम न सकहिं नाम गुन गाई ॥

रामायण में भी सुमिरन को महत्त्व है। गुरु नानक देव जी कह रहे हैं:

नानक जो निशि दिन भजे, रूप राम तेहि जान ॥

जितनी देर सुमिरन में है, आत्मा के नजदीक है, उतनी देर आप एकाग्र हैं।

सकल रोग की औषध नाम॥

क्या सही में सब रोगों की औषधि है यह नाम ? इस पर नजदीकी से कोई नहीं जाता है। सही में यह बहुत बड़ी औषधि है।

सबै रसायन मैं किया, नहिं नाम सम कोय।

यह सर्व रोगों की दवा है। जब कोई कहता है कि पेट में दर्द है तो मैं कहता हूँ कि नाम-भजन करना। कोई कहता है कि सिर-दर्द है, कोई उपाय नहीं मिल रहा है तो मैं उसे भी कहता हूँ कि नाम-भजन करना। कोई कहता है कि भूत-प्रेत तंग कर रहे हैं तो उसे भी कहता हूँ कि नाम करना। तो कभी वो सोचता है कि जिस भी काम के लिए जाओ, यही कहते हैं कि सुमिरन करना। एक ही बात कहते रहते हैं। साफ तो कह रहे हैं-

सुमिरन से सुख होत है, सुमिरन से दुख जाय।
कहैं कबीर सुमिरन किये, साईं माहिं समाय ॥

क्या सही में परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है ? हाँ! यह बात फ़र्ज़ी नहीं है। इसमें वजन है। यह सुमिरन साधारण नहीं समझना। यह मामूली काम नहीं है। सुमिरन से पक्का सुख मिलता है। नहीं तो चिंतन करता रहता है; उसी को सुख-दुख आता रहता है। सुमिरन करता है तो परमात्मा की किरणें आती हैं। सुमिरन से हृदय प्रकाशित हो जाता है। हम सांसारिक भाव में भी देखें तो जो भी सोचते हैं, उसका असर दिमाग पर पड़ता है। किसी ने अपमान किया तो दुखी हो गये। चिंतन से दुखी हो गये। कुछ गलत किया तो सोचने लगे; लज्जा आ गयी। सोचने से शर्म आ गयी। यानी चिंतन का असर हम सब पर पड़ता है। तो प्रभु का चिंतन करेंगे तो कुछ तो होगा न! हम उसका रूप हो जायेंगे। गुरु नानक देव जी ऐसे नहीं कह रहे हैं-

नानक जो निशि दिन भजे, रूप राम तेहि जान ॥

सुमिरन परमात्मा तक जाने का संसाधन है। इससे परमात्मा में समा जायेंगे। एक चील के ऊपर जूएँ होती हैं। उनकी औकात नहीं है कि आसमान में उड़ें। पर चील के अन्दर बैठकर वो आसमान में भी उड़ लेती हैं। साहिब कह रहे हैं-

मुझमें गुण एकौ नहीं, जान लेय सिरमौर। तेरे नाम प्रताप। पाऊँ आदर ठौर ॥

सुमिरन से इहलौकिक और पारलौकिक- दोनों वस्तुएँ मिल जाती हैं। सुमिरन बहुत कुछ देता है। साहिब कह रहे हैं- साईं माहिं समाय। इससे बड़ी बात क्या है ?

सत्य नाम निज औषधि, सतगुरु देई बताय। औषधि खाय अरु पथ रहै, ताकी वेदन जाय ॥

चलते-फिरते भी नाम करना।

एक आदमी ने ३५ साल तक शादी नहीं की। बाद में की। वो रो रहा था। कह रहा था कि मुझे वापिस वहाँ नहीं पहुँचा सकते हो क्या? मैं बड़ा मस्त रहता था। वो असंतुष्ट था। इंसान को अपनी किसी भी चीज़ पर कंट्रोल नहीं है। आपके अन्दर कुछ अज्ञात शक्तियाँ संचालन कर रही हैं। कब कैसी सोच आ जाए, यह खुद भी नहीं जानता है। अन्दर में रहने वाले शत्रुओं को कौन चला रहा है, इसका इल्म नहीं है।

ध्यान का समय बड़ा महत्वपूर्ण है। ध्यान में कभी यह नहीं सोचना कि अभी यह चीज़ देखूँ, अभी उड़ूँ। कभी भी नहीं। समग्र एकाग्रता का मतलब है कि सूक्ष्म तरंगों से अन्दर के विकारों को परखो। सूक्ष्म तरंगों से अपने अन्दर में उठने वाले विकारों को पकड़ो कि ये कल्पनाएँ कहाँ से आ रही हैं। बहुत एकाग्र होकर देखो कि मन की स्फुरणा कैसे हो रही है। ध्यान से देखो कि बुद्धि के निश्चय कैसे बन रहे हैं। आपको यह भी संकेत मिलेगा कि आत्मदेव से कौन काम करवा रहा है। आत्मा कैसे संचालित हो रही है, यह भी ध्यान में पता चलेगा। आत्मदेव १४ इंद्रियों को कैसे संचालित कर रहा है, यह भी पूरा पता चलेगा। इसलिए ध्यान में बैठने में आनाकानी नहीं करना। बाद में पता चलेगा कि सभी का संचालन मेरे द्वारा हो रहा है। इसी का ज्ञान नहीं होने दे रही है वो ताक़त। यही वो बात है कि मैं कौन हूँ? वर्तमान में संचालित होने वाली चीज़ों को ही आत्मा ने अपना रूप माना है।

इस तरह स्वीडन से एक का लेटर आया। वो कह रहा था कि मैं आपसे नाम लेना चाहता हूँ, पर क्या उसके लिए मुझे भारत आना पड़ेगा ? पर मेरा विश्वास है कि संतों के लिए स्थान की दूरी महत्व नहीं रखती है।

वो ठीक कह रहा था, पर उसमें एक शंका आ सकती है। वो कहीं उसे सपना समझ सकता है। जब आप प्रार्थना करते हैं तो वो मुझतक पहुँचती है। साहिब की तरफ से कोई देरी नहीं है। आपकी तरफ से तैयारी नहीं है। आपको हमेशा तैयार रहना है। इस पर साहिब ने कहा-

मैं आया संसार में, फिरा गाँव की खोर। ऐसा बंदा न मिला, जो लीजे झट की पिछौर ॥

कह रहे हैं कि गली-गली घूमा, पर कोई नहीं मिला, जो उसी समय तैयार हो।

काल का जीव माने नहीं, मैं कोटिन कहूँ समझाय। मैं खींचत हूँ सतलोक को, यह बाँधा जमपुर जाय॥

एक और बात बताता हूँ। दो मिनट में किसी का सबकुछ छुड़ा सकता हूँ, पर एक बात है-

नीम कीट जस नीम पियारा॥

जैसे नीम के कीड़े ने कड़वी नीम ही पी है, इसलिए उसे अमृत पसंद नहीं है। यकायक बदलाव होगा तो दुनिया के लोग पागल समझेंगे। जब सत्लोक जाना है तो पूरा बोरी-बिस्तर समेटकर जाना है। यह नहीं कि तब आप सोचें कि आकर सोते रहेंगे। इतना बदल दिया है कि आपको खुद ही आश्चर्य हो रहा है कि क्या हो गया। मुझे केवल चाहना है। जो चाहूँगा, वो हो जायेगा, आप सब कुछ छोड़ देंगे। किसका तख्ता कब पलटना है, पलटा जा सकता है। पर यह काम निरंजन का है, क्योंकि राजा वो है।

जिस देश में कोई भी महापुरुष रहता है, वो देश सुरक्षित रहता है। एक दिन किसी ने कहा कि हमें एलियन्स से ख़तरा है। मैंने हज़ारों बार देखें हैं, पर कैसे बोलूँ। ये सिद्ध पुरुष हैं। मैं उस लोक में भी जाता हूँ। आर्मस्ट्रांग ने चाँद पर भी देखे थे। एलियन्स को आदेश है कि इंसानों को तंग न करें। निरंजन का पूरा नेटवर्क है। यदि किसी बिल्डिंग को गिराना हो तो वो केवल इच्छा करेंगे कि गिर जाए, तो गिर जायेगी। तो सोचें कि किसी हथियार से उनसे टक्कर ली जा सकती है क्या! नहीं। पर उन्हें हिदायत है कि इंसानों को नहीं दिखेंगे। वो इसपर चलते हैं। प्रेतात्मा में भी बड़ी ताक़त होती है। तो मैंने कहा कि चिंता मत करो, ये अपनी मर्यादा में रहेंगे। अगर उत्पात मचायेंगे तो देख लेंगे। यदि वो इंसानों को ख़त्म करके धरती पर रहना चाहें तो यह नहीं होगा। जब भी आदमी ख़त्म होगा, पूरा ब्रह्माण्ड ख़त्म हो जायेगा। यह मेरी बात याद रखना। पर यह बात कोई नहीं जानता है। जब भी पृथ्वी ख़त्म होगी, पूरा ब्रह्माण्ड ख़त्म हो जायेगा। जब भी पृथ्वी का जीव ख़त्म होगा, स्वर्गादि लोक ख़त्म हो जायेंगे। सभी जीव यहीं से तो कर्म करके स्वर्गादि में जा रहे हैं। देव-लोक में भी यहीं से कर्म करके जा रहे हैं, पितर-लोक में भी यहीं से जा रहे हैं, ब्रह्म-लोक में भी यहीं से जा रहे हैं। जब आई.ए.एस. आफिसर नहीं निकलेंगे तो कोई डी.सी. कैसे बनेगा! यानी पूरा आधार यहीं से है। यह टेक्निकल बात है। यहीं से सब कर्मानुकूल जा रहे हैं। अगर इंसान ख़त्म हो गया तो स्वर्ग लोक, विष्णु लोक सब ख़त्म हो जायेगा। पूरे ब्रह्माण्ड का अंत हो जायेगा। ग्लोबल वार्मिंग होगी तो पहले गरीब मरेगा, पर बाद में अमीर भी मरेगा। जब खाना ही नहीं होगा तो चाहे सोना होगा भी क्या करेगा! खायेगा क्या? तो चाहे देव-लोक है, चाहे सिद्ध-लोक, सबकी ऊर्जा यहाँ है, सबकी टिकट यहीं से है। इसे मिटाना पूरा ब्रह्माण्ड मिटाना है। इसे मिटाया तो पूरा ब्रह्माण्ड मिटाना पड़ेगा। नाव हट गयी तो बिल्डिंग खतरनाक है।

मेरी बातें हवाई नहीं होती हैं। आपके दिल तक उतरेंगी। मैं आपको अपने ही गिर्द घुमाता हूँ। मैं जानता हूँ कि मेरे लोग बड़े अमीर हैं। सच तो यह है कि जिस दिन से नाम दिया, सब कुछ दे दिया, अब बाकी देने को कुछ नहीं रहा। आप कहेंगे कि अभी काफी आगे बढ़ना है, सत्लोक देखना है, अभी तो कुछ हुआ नहीं है और आप कह रहे हैं कि सब दे चुका हूँ। समझें। आत्मा और परमात्मा का ज्ञान देने की जरूरत थी। दोनों दे दिये। इसके बाद क्या था? आपने कल्पना की होगी कि परमात्मा कोई सुंदर-सुंदर प्रकाशित होगा। यहाँ देखकर कल्पना की है। पर ऐसा नहीं है।

रूप अरूप जाय न बोली। हलका गुरुआ जाय न तौली॥

वो रूप-अरूप से परे है। ९०-९० साल की बूढ़ियों को देखता हूँ तो लिपस्टिक, यह, वो। मैं बेख़बर रहता हूँ। मैं जानता हूँ कि शरीर ढक लेना है। पर क्या अच्छा लग रहा है, क्या पहनूँ, यह नहीं सोचता हूँ। क्योंकि संतुष्ट हूँ। आदमी संतुष्ट नहीं है। किसी अवस्था में भी संतुष्ट नहीं है। मैं अपने में हूँ। पहली बात है कि मुझे किसी को शरीर से आकर्षित ही नहीं करना है। मैंने अध्यात्म से किसी को आकर्षित करना है। हीरो बनकर नहीं करना है। आप उलटे-पुलट कर भी देखेंगे तो यह बात मुझमें नहीं मिलेगी। तो दो चीजें आपको दे दीं। आपको संभालना है। पहला आत्मज्ञान और दूसरा प्रभु दे दिया। सच यह है कि साहिब आपमें प्रकट है। वो पहले भी साथ में था, पर काम नहीं कर रहा था। खड्ढे में गिरना था तो गिर पड़ते थे। पर अभी वो साथ में रहकर काम कर रहा है।

मेरा प्रभु मौको भजे, मैं सोऊँ पाँव पसार ॥

पर आपकी कल्पना वाला परमात्मा लाइटें नहीं है। आपको सच्चा साहिब दे दिया। हमने आपकी धारणा बनाई हुई है कि प्रभु ऐसा-ऐसा होगा। पर उसका सही स्वरूप आपकी कल्पना से परे है। क्योंकि उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। वो कल्पना से भी परे है।

अगुण कहूँ तो झूठ है, सगुण कहा न जाय।
अगुण सगुण के बीचव में, कबीरा रहा लभाय ॥
एक कहूँ तो है नहीं, दो कहूँ तो गार।
है जैसा तैसा रहे, कहैं कबीर विचार ॥

वो पुरुष भी नहीं है, स्त्री भी नहीं है। शब्द भी नहीं है।

शब्द कहौं तो शब्दै नाहीं। शब्द हुआ माया के माहीं ॥

शब्द भी नहीं है। शब्द का संबंध माया से है, भौतिक चीज़ों से है। हवा के द्वारा आपके कान तक तरंगें पहुँचीं तो आपको सुनाई पड़ा। कुछ इसी को परमात्मा कह रहे हैं। नहीं, यह भौतिक चीज़ है, ख़त्म हो जाती है। इसलिए-

कहन सुनन से न्यारा है।

किसी इंद्री से नहीं जाना जा सकता है।

ऐसा मेरा दोस्त है। मैंने वो चीज़ दी। वो मदद कर रहा है। यदि कहूँ कि बोलो तो नहीं बोल पाओगे। पर आपके साथ में कर दिया है। बयान करना चाहोगे तो नहीं कर पाओगे। वो मन, बुद्धि आदि से भी परे है, पर है। कई बार ऐसी समस्याएँ आ जाती हैं कि आप सुलझा नहीं सकते हैं, पर लगता है कि कोई ताक़त आकर सब ठीक कर गयी। साहिब अपनी मौजूदगी आपके अन्दर दिखा देता है।

तो आत्मा का ज्ञान दे दिया। आपको चेतन कर दिया है। अब मन की नहीं चल रही है। होश में कर दिया है। यह आत्मज्ञान हुआ। अब आपकी रुचि ही ख़त्म है। अन्दर से पूरा नाटक लग रहा है। यह आत्मज्ञान नहीं है क्या। आपकी तुलना में बड़े-बड़े ज़ीरो हैं। आपको आसानी से ये चीजें मिल गयीं, इसलिए मूल्य नहीं समझ पा रहे हैं। साहिब कह रहे हैं-

कोटि जन्म का पंथ था, गुरु पल में दिया पहुँचाय ॥

मुझे अपना पिंजर भी छोड़ना पड़ा तो दुखी नहीं होऊँगा। पर यह समझाने के लिए है। मेरी हाज़िरी आप अपने अन्दर पाते होंगे। साहिब तो आपको लेने के लिए हर समय तैयार है, पर आप तैयार नहीं हैं। दुनिया में किसी भी चीज़ में लगाव नहीं रखना। उसकी रज़ा में रहना। तो आपको दो चीज़ें दी। बहुत ताकत मिली। अब यह मन आपको नचा नहीं पा रहा है। ऐसे ही नहीं कहा-

सतगुरु नाम बताने वाले, तुमको कोटि प्रणाम ॥

जैसे बाप ने एक शुक्राणु माता के गर्भ में स्थापित किया और अपना काम कर दिया, आपका सृजन कर दिया। इस तरह नाम-दान के समय मैंने अपना काम कर दिया था। अब माया खुद-ब-खुद छूटती जा रही है।

जब आप भक्ति करेंगे तो दुनिया आपको स्थिर नहीं होने देगी। यह मामूली बात नहीं है। संतत्व का इतिहास उठाकर देखें तो महापुरुषों का घोर विरोध हुआ। हमारे आश्रम में भी हमला हुआ। यह हमला क्यों हुआ? क्या गलती हुई? ६० साल ऊपर है, संन्यासी का जीवन जी रहा हूँ। विरोध क्यों हुआ? यह तो तय है कि विरोध होगा। चाहे मैं इंग्लैंड जीऊँगा, चाहे अमेरिका, विरोध होना ही है। क्योंकि निरंजन को मालूम है कि इनसे जो जुड़ा, मेरे काबू में नहीं आयेगा। बाकी उसके काबू में हैं। पहला यह कारण है। यह काल-पुरुष का संसार है। यहाँ हरेक भ्रमित है। काल चाहता है कि कोई भी ज्ञान प्राप्त न कर पाए। मन-माया चाहते हैं कि जीवात्मा फँसी रहे।

यह संसार काल का देशा। बिना नाम नहीं कटे क्लेशा ॥

सत्संग करता हूँ तो आपको सतर्क करने के लिए। नाम देकर आपमें सिस्टम फिट कर दिया है। किसी का ज़ोर नहीं चल रहा है। आपके अंतःकरण में फिट कर दिया है। कामदेव, जो सबकी ख़बर ले रहा था, कुछ नहीं कर पा रहा है। दुनिया ऑटोमेटिक छूटती जा रही है। आप निर्मल होते जा रहे हैं। संसार स्वप्नवत् लग रहा है आपको। केवल आपको बचना है कि स्लिप न खाएँ।

जगजीवन को भी साहिब ने नाम दिया। वो लोग बाद में मूर्ति पूजा लग गये। इस तरह कई बाद में भटक गये। ऐसा क्यों हुआ? जिस माहौल में आप रह रहे हैं, वहाँ वहम-ही-वहम है। सब काल का पालन कर रहे हैं। पक्के गुणों से भी ईर्ष्या होगी।

महापुरुषों को भोजन क्यों खिलाते हैं ? १०० आदमी को भोजन खिलाया और १ ब्राह्मण को खिलाया, बराबर है। पर ब्राह्मण वो जो माँस न खाता हो, शराब न पीता हो। १०० ब्राह्मण को खिलाना और एक कन्या को खिलाना बराबर है। क्योंकि यह आद्य-शक्ति को खिलाना हुआ। १०० कन्या को खिलाना १ साधु को खिलाना बराबर है। १०० साधुओं को खिलाना और १ भक्त को खिलाना बराबर है। पूरे ब्रह्माण्ड को खिलाना और १ संत को खिलाना बराबर है। समस्त लोकों को खिलाना और गुरु को खिलाना बराबर है। इससे क्या लाभ मिलता है ? अन्न प्राण हैं। मैं हमेशा बहुत बड़ा पुण्य करना चाहता हूँ। ज़रूरत नहीं है, पर फिर भी करना चाहता हूँ। मैं अच्छा भण्डारा खिलाना चाहता हूँ। इसके लिए महाजन से कई बार उधार भी लेना पड़ जाता है। किसी को भोजन खिलाकर संतुष्ट करना चाहता हूँ। टॉप का भोजन खिलाकर संतुष्ट करना है। घर में भी भोजन खिलाओ तो संतुष्ट करें, बातें न करें, शांति से भोजन खिलाएँ ताकि तार न टूटे। मेरी कोशिश होती है कि संतुष्ट करूँ खिलाकर।

जो कोई गुरु को भोजन खिलावे समझो वो विराट जगावे॥

पितर-लोक, पूरा ब्रह्माण्ड उससे संतुष्ट हो जाता है। क्योंकि-

अलख पुरुष की आरसी, संतन केरी देह। लखा जो चाहै अलख को, इन्हीं में लख लेह ॥

गुरु को परमात्मा करके मान रहा है। यानी पूरे ब्रह्माण्ड को खिला दिया।
तो मैं आश्रम में भण्डारा क्यों करना चाहता हूँ ? कोई यदि भण्डारे के लिए कहे तो उसे भी आश्रम में भण्डारे के लिए कहता हूँ, क्योंकि मैं जानता हूँ कि ढूँढ़ने पर भी ऐसे महात्मा और कहीं न मिलेंगे। मेरे पिता का शरीर छूटा तो भी अपनी पेंशन से, आश्रम में भण्डारा किया। इतना फल क्यों है ? क्योंकि अन्न प्राण हैं। जिसका अन्न खाकर ध्यान कर रहे हैं, शक्ति उसी अन्न से लगी न! उसी अनाज से उस दिन आपको शक्ति मिली। उसका १०वाँ अंश उसी के पास जायेगा। इसलिए ज्ञानियों को, महात्माओं को भोजन खिलाया जाता है। जो जिसका दाना खाकर भजन कर रहा है, उसे उसका १०वाँ अंश मिलेगा।

हम जो मानव बना रहे हैं, कलयुग में बनाना मुश्किल है। इस तरह इनके पास जो दाना पहुँचा, उसका हिसाब नहीं है। इस संसार में सबसे बड़ा दान है, भोजन। प्राण दिखाने के लिए कहो तो अन्न रख देना। इस अन्न को गुस्से में न बनाना, आग-बबूला होकर न बनाना। खाने वाले का भी वैसा ही स्वभाव हो जायेगा। मैं भोग इसलिए लगाता हूँ कि यदि किसी की कमाई में दोष हो या कोई अन्य दोष हो तो उसे फ़िल्टर कर देता हूँ।

सुमिरन भक्ति की शक्ति है। सार-शब्द का ध्यान-सुमिरन करने से सहज ही अमरलोक का मार्ग प्रशस्त होता है। सुरति को साधने से सब 'कर्म' कट जाते हैं। सद्गुरु नाम की प्राप्ति और सुमिरन से साँसारिक कर्मफल कट जाते हैं तो सहज ही दिव्य ज्ञान का प्रकाश भक्त में समा जाता है। नाम सुमिरन ऐसा सार-तत्व है जिससे काल-कराल की पीड़ा और ताप से मुक्त हो जाती है। भक्तों को सुख और संतोष का आनन्द अनुभव होता है। इसी भाव से कहा-

उठ जाग री मोरी सुरति सुहागिन जाग री।

गुरु की गुण व शक्तियाँ शिष्य में आयेंगी। जैसा गुरु होगा वैसा ही शिष्य बनेगा यह आध्यात्मिक सत्य है। गुरुकुलों का प्रभाव आज भी वर्ण, कुल और परिवार में प्रत्यक्ष है। सत्यलोक में सत्यपुरुष और हंस (आत्मा) समान है, यही मोक्ष का सत्य है। वहाँ परमपुरुष और आत्मा अलग-अलग नहीं हैं।

एक रूप सभी हैं, न रखदा बन्द न बन्दा।

सद्गुरु के दर्शन, चरणों में बन्दगी और सेवा से उनको सुरति मिलती है। सेवा से महायज्ञ का फल प्राप्त हो जाता है। गुरु चित्र के आगे माथा झुकाना मात्र भक्ति नहीं है। भक्ति के तत्व को समझना होगा। गुरु के जीवित रहते केवल गुरु और उनके बाद 'शब्द सुरति' ही सर्वोपरि है। मैं स्वयं गुरु के शब्द के पालन में ही परमार्थी संत-आश्रमों का निर्माण कर रहा हूँ, सत्संग कर रहा हूँ। गुरु-दीक्षा लेते समय शिष्य सच्चे संकल्प से तन-मन-धन गुरु को अर्पित करता है। तन-मन-धन गुरु क्यों लेता है? ये तीनों चीजें आत्मा के लिए अवरोध हैं, कोष हैं। आत्मा इनके ही कारण शरीर धर्म का पालन करने लगी है। धन का मोह खतरनाक है इसे खोने से आदमी पागल हो जाता है। संतान के जाने से इतना संकट और कष्ट नहीं अनुभव करता जितना धन के जाने से होता है। सद्गुरु इन तीनों से ध्यान हटाकर शिष्य को आत्मा बनाता है, जिससे कि सुरति दृढ़ हो। इंसान की सोच भी मन है, फैसला भी मन करता है, क्रियायें भी मन है। गुरु में विश्वास रखो गुरु में सुरति लगाये रखने से, सुमिरन से ही रोग दूर होंगे और भक्ति प्राप्त होगी। आत्मा में मन समाया नहीं है, उससे भिन्न है, भिन्न ही रहेगा किन्तु नजदीकी बहुत ज्यादा है। इसीलिए कबीर साहिब ने कहा-

मुक्ति भेद मैं कहूँ बिचारी, जाको नहीं जाने संसारी। जाकी सुरत लाग रहे जहवाँ, कहै कबीर पहुँचाऊँ तहवाँ ॥

ध्यान करने से मन नियंत्रित होता है और सुरति आत्मानुभव होता है। आत्मा अपना स्वरूप पहचानने लगती है, आत्मा को जानने ही ध्यान किया जाता है। श्वासों में यदि सुमिरन समा लें तो कभी भी सुरति से अलग नहीं होंगे। श्वासों को ऊपर जाने और बाहर जाने को सुरति से जोड़ना ही आत्मसाक्षी रूप है। श्वास-श्वास में प्रभु का वास है यह कहने से काम नहीं चलेगा। सुमिरन को सुरत-निरत से जोड़ना होगा। श्वास के सुरति से अलग होने के कारण ही आत्मा पर मन का कब्जा है।

स्वास सुरति के मध्य में, कभी न न्यारा होय। ऐसा साक्षी रूप है, सुरत निरत से जोय॥

एक लक्ष्य, एक कारण, एक मुद्रा है, श्वास-श्वास के मध्य में ही सार है। श्वास के मध्य में ही प्रभु विराजते है। सद्गुरु परमात्मलीन है और सद्गुरु का चिंतन शिष्य को उसकी तद्रूप बनाता है। यह सुमिरन का वैज्ञानिक महत्व है। श्वासों को नाम सुमिरन में लगा दें, जीवन में कभी कोई बाधा नहीं आएगी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं, हनुमान जी के रोम-रोम से राम का सुमिरन इसी रीत से होता था। यह कठिन भक्ति नहीं है, यज्ञों, तीर्थों, जप-तप से सहज है, कुछ खर्च नहीं होगा, कोई कष्ट नहीं होगा। सब लोग साँसों को व्यर्थ गँवा रहे हैं। जिनके मध्य आत्मा का वास है उन्हीं श्वासों की और कोई ध्यान नहीं दे रहा है। सब बाहरी भक्तियों में और धर्म कर्मों में जीवन गँवा रहे हैं।

जैसे भूमि और बीज के मिश्रण से अनाज पैदा होता हैं, ऐसे ही श्वास स्वर के मध्य सुरति से साक्षी भाव होता है। शरीर के भीतर श्वास ही सार है, श्वास हमारी अपनी नहीं है, शून्य (आकाश) से, सहस्रार से आ रही है। श्वास को सुरति से पकड़ी जा सकती है। शून्य से आ रही श्वास को नासिका केवल ग्रहण करती है। श्वास लेने वाला कपाट (ब्रह्माण्ड) में रह रहा है। आत्मदेव श्वास ले रहा है, नाभि में श्वास आ रही है, इससे शरीर में प्राण है। गुरु में श्वास-सुरति के स्नानारत रहने वाले भक्त को, तैंतीस करोड़ सुर-देवता भी देखकर मोहित हो जाते हैं। ऐसे भक्त का वे सब भी हृदय में ध्यान रखते हैं। ज्ञान स्थिति के इस परमगुण के सामने अन्य सब सगुण ज्ञान स्वयं को शुद्ध करता है (मुँह धोता है)। साहिब कबीर की वाणी है-

सुरति करहि अस्नान तैतिस कोटि सूर देवता, लखै अभ्यंतर धरि ध्यान ॥

सकल सुर-देवताओं के ज्ञान के संदर्भ में साहिब ने भेद बताया है। सृष्टि के मध्य में आकाश ऐसा ही है जैसे हमारी देह के मध्य में नाभि है। इसलिए आकाश (शून्य) से पवन का भी श्वास रूप में हमारे देह-मंदिर की नाभि तक आना-जाना है। यह भेद कोई विरला ही जानता है। जो लोग योग-भक्ति द्वारा निराकार आकाश में ध्यान लगाते हैं उनकी सुरति आकाश में हो रही ध्वनि या अनहद नाद को ही ग्रहण करती है। इस तरह जो आकाशीय-ब्रह्माण्ड में भक्ति-योग-ध्यान से भ्रमण करते हैं उन्हें बिना मृदंग आदि के ही शब्द-झंकार अनुभव होता है। इसी आकाशीय शब्द-झंकार धुनों में आनन्द मग्न होकर योगी मान लेते हैं कि ब्रह्म को प्राप्त हो गये। इससे मात्र सिद्धियाँ प्राप्त होती है। अपने ईष्ट किसी देवी-देवता लोक का ज्ञान मिल जाता है। सगुण-निर्गुण ज्ञान की पराकाष्ठा यही है कि देह मंदिर की नाभि से आकाश तक सुरति से आत्मबोध जैसा होता है, मुक्ति या मोक्ष मार्ग नहीं मिलता।

जब आस्था पूरी है, तो जीव अंत समय गुरु को ही पुकारता है। अंतःकरण से निकली पुकार गुरु तक पहुँचती। इसी का नाम आस्था है, यही विश्वास है जिसके कारण, गुरु ही आता है, यमदूत पास भी नहीं आ सकेगा।

कबीर साहिब कह रहे हैं कि जन्म और मरण से छुटकारे के लिये इस देह की गति को पहचानो। इस शरीर में आने-जाने श्वासों के मध्य ही आत्मा का वास है। सद्गुरु से ज्ञान का प्रकाश पाये बिना इस तत्व को नहीं जान पाओगे। यह बोलना, चलना, खाना, पीने के भ्रम-मात्र में मत रहो, पागल मत बनो। सुरति को संभालो।

सत्यलोक की सुहागिन सुरति से सद्गुरु मन को सुकृत भाव से जोड़ देता है। ऐसा मनोरथ सफल होने पर स्वयं ही मंगल-सुमिरन हो जाता है और सुरति के माँझे में आगे की तरफ उठ चलती है। इससे हंस (आत्मा) का स्वरूप सँवार कर परमपुरुष से मिलन हो जाता है। ऐसे ही सद्गुरु के संदेश में सहज से आत्मदर्शन हो जाता है। गुरु परम निदान होकर काल पर विजय मिल जाती है। शीश और गगन के मध्य अधर में शिष्य को सद्गुरु चारों दिशाओं से घेर कर सुरति से अपने में समा लेता है। सुरति से ऐसा अमूल्य शब्द सोहंग को सुहाने वाला लिख देता है कि पूर्ण आनंद मिलता है।

सद्गुरु शब्द में समाकर सुहागिन हुई सुरति के कारण माया त्याग कर मन बैरागी बन जाता है। माया तो उस अमरबेल के समान ही जो वृक्ष पर लिपट कर फैलती है, ऐसी माया को सद्गुरु हटाने में समर्थ है। जब सत्गुरु की दया-कृपा हो जाती है तो फिर सुरति कहीं अन्यत्र नहीं भटकती। फिर कहीं भी जाओ सुरति गुरु की परिक्रमा करते हुए साथ रहती है और जो भी कर्म किये जाते हैं, वे पूजा हो जाते हैं। फिर घर में रहो अथवा किसी वन-बगीचे में सब जगह एक समान हो जायेगी, कोई दूसरा भाव ही नहीं रहेगा। अंतर में मन को गुरु-शब्द ही घेर लेगा और विषय-वासना मिट जावेंगी। जागते-सोते, उठते-बैठते ऐसी धुन लगेगी कि सद्गुरु सामने ही है। न तो आँखें बन्द करना पड़ेंगी न ही कान मूँदने होंगे, न ही शरीर को कष्ट देना होगा। खुले नेत्रों से भी सुरति सद्गुरु-साहिब को ही देखेगी और स्वयं उन जैसा ही पाओगे। साहिब ने भरोसा दिया है कि इस उनमुनि अवस्था में उस परमपद को जो सुख-दुःख से परे है, पाकर सदा सुख पाओगे।

पाँचवीं मुक्ति को विदेह मुक्ति कहकर भी समझाया है। परमपुरुष विदेह रूप कमल में वास करते हैं। सुरति भी विदेह शब्द रूप पुरुष में है। अमरलोक में सम्पूर्ण द्वीप पुरुष ने सुरति से ही रचे हैं। निरंजन को भी सुरति-शब्द से ही उत्पन्न किया है। परमपुरुष शब्द के साथ सुरति विदेह मुक्ति की डोरी रूप है। इसी कारण सुरति शब्द में ही समाई है। निरंजन ने भी सुरति को एकाग्र करके मन रूप समाया है। शब्द को सुरति से बाँध कर ही भवसागर से निकालने सद्गुरु जीवों को पुकारते हैं। विदेह नि:अक्षर शब्द में ही सद्गुरु का वास है और सुरति स्वरूपी होकर शिष्य में प्रवेश करते हैं। संसार को कृत्रिम मायाजाल जानकर सद्गुरु के नेत्रों में सुरति की अग्र झलक दिखेगी। गुरु के विदेह शब्द की गहन गहराई में उतरकर ही शब्द का प्रकाश उठेगा। विदेह नाम में ध्यान मग्न रहने से सुरति शब्द में समाने पर शरीर मृतक समान हो जाता है। इस प्रकार जीते जी आत्मस्वरूप पाकर शीतलता और दग्ध तपन का कोई आभास नहीं रहता। जन्म-मरण की शंका समाप्त हो जाती है। चलते-फिरते सद्गुरु शब्द के सुमिरन से शरीर के अचेत होने का ध्यान रखने की जरूरत नहीं रहती। स्वयं ही चेतन्यता रहती है। सुरति विदेह शब्द के साथ जुड जाने से सांसारिक मोह के पिता, माता, बहन, भाई, पुत्र, पुत्री बंधु-बांधव की ममता का बंधन नहीं रहता। मकान-सम्पत्ति और आभूषण का लोभ छूट जाता है। भूख-प्यास को मिटाने स्वाद की इच्छा नहीं रहती। ऊँच-नीच का विचार समाप्त हो जाता है। धर्म-अधर्म से ऊपर उठकर इनसे न्यारे हो जाते हैं। दुःख-सुख सब समान हो जाता है। ऐसी अवस्था होने पर विदेह रूप को जान जावोगे। इस काया-पिण्ड को सीप के समान जानकर शब्द रूप स्वाति को अन्दर आने दो। जब सीप को स्वाति बूँद मिल जायेगी तो मुक्ता ही उत्पन्न होंगे। अर्थात सीप रूप देह में स्वाति रूप विदेह शब्द समाने पर शरीर का संचालन मन से नहीं होता। मन से सुरति निकल कर सत्य शब्द के संग हो जायेगी तो विकारों का प्रवेश नहीं हो सकेगा।

मन से सुरति को मुक्त रखने पूर्ण सद्गुरु का आश्रय चाहिए। सद्गुरु की सुरति रखते-रखते एक दिन शिष्य सद्गुरुमय ही हो जाता है। अष्टावक्र गीता में भी इसी मूल तत्व को स्वीकार किया गया है। शरीर स्थूल है, सृष्टि स्थूल है जो दिखाई देती है किन्तु इनके भीतर जो सूक्ष्म तत्व है वह दिखाई नहीं देता। शरीर में आसक्ति होने से वह तत्व विषय भोगों की ओर प्रवृत्त होता है।

संतत्व केवल समर्पण की बात कहता है। संतत्व की मान्यता है कि आत्मा कहीं अन्यत्र नहीं है उसे खोजना नहीं है। यह देह तो आत्म-प्राप्त ही है, पर वह मन के बंधन में केवल विस्मृत हो गई है, उसे पुनः स्मृति में लाना है। इसके लिए मात्र सुरति ही पर्याप्त है और कुछ नहीं करना है। परमपिता जिसे संतत्व की धारा में परमपुरुष अथवा सत्यपुरुष कहा है उसी के मानव रूप सद्गुरु का हम अपने अन्दर स्थान बना लें, यही पर्याप्त है। सद्गुरु की सुरति रखी तो सद्गुरुमय हो जायेंगे। तीन लोकों के आगे अर्थात आत्मा के मूल ठिकाने अमरलोक में वापस पहुँचने के लिए पूर्ण सद्गुरु की आवश्यकता है। काल के बंधनों से मुक्ति हेतु पूर्ण सद्गुरु की अनुकम्पा और सुरति ही लक्ष्य हो तो फिर कोई बंधन नहीं रहेगा।

सांसारिक विषयों के प्रति जो आसक्ति है उसे विष समझकर छोड़ दें और पूर्ण सद्गुरु को समर्पित होकर उसकी सुरति, उसकी स्मृति में रम जायें। यही विदेह होने का मुक्ति का मार्ग है। सद्गुरु की सुरति मिलने में ही ग्यारहवें द्वार अर्थात परममुक्ति द्वार का रहस्य छिपा है। सद्गुरु की सुरति पाकर शिष्य की सुरति वैसे ही पारस बन जाती है जैसे लोहा पारस के सम्पर्क से स्वर्ण बन जाता है। साँसें समाप्त हो जाएँ उसके पहले जाग जाओ। नाम-भजन द्वारा आत्म-साक्षात्कार का अनुभव कर लो। जीवन उसी अनुभव के लिए मिला एक अवसर है, इसे गँवाओ मत। नश्वर जगत के आकर्षण में फँसे लोग बार-बार मरते हैं। आखिर क्या करते हैं गुरुदेव अपने शिष्य को बदलने? गुरु अपना ज्ञान, अपने गुण, अपनी आदतें, अपनी शक्तियाँ सभी चीजें सुरति से पल भर में शिष्य के भीतर स्थानांतरित कर देता है। यह बड़ा कौतुक का विषय है।

गुरु की कीजे दंडवत, कोटि कोटि प्रणाम। कीट न जाने भृंग को, वह कर ले आप समान ॥

कबीर साहिब ने कहा कि यदि मुक्ति चाहते हो तो नाम में रात दिन सुरति लगाये रखो। नाम के बल पर ही जन्म-मरण का दुख मिट सकता है। इसलिए सुरति से नाम को पकड़कर सत्यलोक का आनन्द पाओगे। वहाँ आनंदमय हंस का प्रकाश सोलह सूर्यों के समान है।

सुरति से दिन-रात सद्गुरु शब्द में निरन्तर मन को रमाने को ही साहिब कबीर ने सहज मार्ग बताया है। कह रहे हैं कि मेरी सहज समाधि ही सबसे भली है। न आँख मूँदूँ और न कान ही बन्द करूँ, कोई कष्ट नहीं उठाता। मैं तो खुले नेत्रों से ही हँसते-हँसते अपने परमात्मा को पहचान कर उस विराट दिव्यस्वरूप को टकटकी लगाय देखता हूँ। बस इतना ही जानता हूँ कि उस सत्य-शब्द से मन को अलग नहीं होने देता हूँ जिस कारण सब मलिन वासनाओं का त्याग हो गया। उठते-बैठते, सोते-जागते उस शब्द का नशा रहता है जो कभी नहीं छूटता। यही उनमुनि रहनी है जो मैंने दुनिया के लोगों के सामने प्रगट करके गाई है। दुःख-सुख सब उस परमशब्द से जुड़कर उसी में समा गए हैं।

जैसे चकमक पत्थर में आग है पर दृष्टगोचर नहीं होती, दो पत्थर के घर्षण से ही प्रकट होती है। इसी तरह परमात्मा सबके अन्दर है; पर उस अनाम-शब्द को सुरति से मथोगे तब प्रकट होगा। सद्गुरु रूपी भेदी साथ होगा, तब ही हम अन्दर के उस खजाने तक पहुँच पायेंगे।

जैसे दूध दुह दधि माखन, बिन मथे भेद न घी का। जिस दिन सद्गुरु नाम देता है तो सुरति की मथानी से उस अद्भूत सत्ता को आपमें प्रविष्ट करता है जिसके द्वारा आत्मा अपने देश जा सकती है।

सुमिरन सुरति लगायके, मुख ते कछु न बोल। बाहर के पट बंद कर, अन्दर के पट खोल ॥

कह रहे हैं - कि सुरति को प्रभु नाम स्मरण में लगा दे और मुख से कुछ मत कहो अर्थात दिखावा मत करो। बाहर के दरवाजे बन्द करके अन्दर के द्वार खोलो अर्थात भीतर ही भीतर नाम का जाप करो। प्रभु-नाम स्मरण में मन ऐसा लगाना चाहिये जैसे पतंगा दीपक की लौ में लगाता है। दीपक की अग्नि से उसके पंख जलते हैं पर पतंगा फिर भी उसकी तरफ ही जाता है और जलकर प्राण भी दे देता है।

सुमिरन सों मन लाइये, जैसे दीप पतंग। प्रान तजै छिन एक में, जरत न मोड़े अंग ॥

सुमिरन में मन ऐसा लगाना चाहिए जैसे मछली पानी के साथ लगाती है, जो जल से बिछुड़ते ही प्राणों को त्याग देती है।

सुमिरन सों मन लाइये, ज्यों पानी संग मीन। प्रान तजै पल बिसरे, दास कबीर कहि दीन ॥

सुमिरन तो ऐसा होना चाहिए जैसे गाय अपने बछड़े का करती है। गाय चारा चरते हुए भी उसे कभी नहीं भूलती; उसकी सुरति, ध्यान बछड़े में ही रहता है। इसी तरह खाते-पीते, सोते-जागते नाम का सुमिरन करना चाहिए, हर समय उसे याद करते रहना चाहिए।

संत सहजो बाई कह रही हैं कि गुरु के नाम का सुमिरन तो सब करते हैं, पर सुमिरन करने में भी विचार है। करोड़ों में एक ही सुमिरन की सही विधि जानता है। नाम-सुमिरन हृदय में छिपाकर करना चाहिए कि होठ भी आपस में न हिलें और कोई समझ भी न पाये कि सुमिरन हो रहा है।

सहजो सुमिरन सब करैं, सुमिरन माहिं विवेक। सुमिरन को जो जानि है, कोटिन मद्धे एक ॥ सहजो सुमिरन कीजिये, हिरदे माहिं दुराय। होंठ होंठ सूँ नहिं हिलै, सरकै न कोई पाय ॥

सहजो कह रही हैं जागते हुए भी प्रभु के नाम का सुमिरन करते रहो और सोते हुए भी उसी में लगन लगाये रखो। उस नाम में ऐसा घुलमिल जाओ कि सुमिरन की यह तार कभी भी टूट न सके।

जगत में सुमिरन करै सोवत में लौ लाय। सहजो इव रस ही रहै, तार टूट नहिं जाय ॥

संत दादूदयाल जी कह रहे हैं कि सुमिरन रूपी नौका बड़ी ही प्यारी है, इसलिए प्रभु नाम को अपने हृदय से कभी न भुलाओ। सत्गुरु ने गुप्त नाम सुरति से दिया है इसलिए सुरति में साँसों से उसके नाम का सुमिरन करते रहो। ऐसा करते करते एक दिन प्रभु से ही मिल आओगे। प्रभु से मिलने का यह सहज मार्ग सद्गुरु ने ही बताया है।

दादू नीका है, हृदय न बिसारि। मूरति मन माहै बसै, हरि साँसै साँस सँभारि ॥ साँसै साँस सँभालता, एक दिन मिलि है भाई। सुमिरन पैंड़ा सहज का, सत्गुरु दिया बताई॥

सत दूलनिदास जी कह रहे हैं कि शरीर से श्वास पल में बाहर जाती है और पल में अन्दर आती है। ऐसी निरंतर चलने वाली साँसों से नाम की रट लगाकर सुमिरन कर लो।

श्वासे पलक माँ जात है, पलकहिं माँ फिरि आउ। दूलन ऐसी श्वास से सुमिरन रट लाउ ॥

सत चरनदास जी समझाते हैं कि नाम सब धर्मों का मूल और सबसे श्रेष्ठ है। सच्चा भक्त वही है जो हर समय सत्यनाम का सुमिरन करता रहता है, भूलता नहीं है।

सकल सिरोमनि नाम है, सब धरमन के माहि। अनन्य भक्त वह जानिये, सुमिरन भूले नाहिं ॥

कबीर साहिब ने कहा दुःख में तो सभी याद करते हैं क्योंकि दुःख में याद आ जाता है। सुख में कोई याद नहीं करता, सब भौतिकता में मस्त हो जाते हैं, धन का, शरीर का, नशा रहता है। जो सुख में भी प्रभु को न भूले, सदा सुमिरन करता रहे, उसे दुःख आ ही नहीं सकता। जप, तप, साधना आदि सब सुमिरन से ही हो जाते हैं, सुमिरन करने वाले को इनकी जरूरत नहीं रहती। संतजन इस बात को भली प्रकार जानते हैं कि नाम-सुमिरन के समान कुछ भी नहीं है। नाम सुमिरन करने से ही सुख मिलता है और दुखों से छुटकारा मिलता है। नाम सुमिरन से ही परमात्मा को पाया जा सकता है।

दुख में सुमिरन सब करैं, सुख में करै न कोय। जो सुख में सुमिरन करै, तो दुख काहे को होय ॥ सुख में सुमिरन न किया, दुख में किया याद। कहै कबीर ता दास की, कौन सुनै फरियाद ॥ जप तप संयम साधना, सब सुमिरन के माहिं। कबीर जानैं संतजन, सुमिरन सम कछु नाहिं ॥ सुमिरन से सुख होत है, सुमिरन से दुख जाय। कहै कबीर सुमिरन किये, साँई माँहि समाय ॥

आगे समझा रहे हैं कि इस शरीर का कोई भरोसा नहीं है, यह तो एक पल में नष्ट हो जायेगा। इसलिए श्वास-श्वास में सुमिरन कर लो, अन्य कोई उपाय करने की ज़रूरत नहीं है। मैं न तो हाथ की माला जपता हूँ और न मुख से राम-राम जपता हूँ। मेरा मन तो हर समय सुमिरन में लगा रहता है और मैं आराम करता रहता हूँ। अर्थात दिखावा नहीं कि मैं सुमिरन कर रहा हूँ। दिखावा करने वाले के माला तो हाथ में फिर रही है, जीभ मुँह में फिर रही है, और मन चारों दिशाओं में फिर रहा है, यह तो कोई सुमिरन नहीं है।

साहिब कबीर ने सत्यलोक (अगमपुरी) के ध्यान की जानकारी और विधि सद्गुरु से जानने का ज्ञान दिया है। गुरु से तत्व विचार ग्रहण करके उसी की सुरति को मन में रखने बताया है। सुरति और निरति को एकाग्र करके ही उस अगम (पहुँच से परे) घर को जाओगे। संतोष, विवेक, विचार और क्षमा ही सद्गुरु शिष्य के मन में उतार देते हैं। गुरु के सत्य शब्द में सुरति लगाकर अर्थात एकाग्र होकर उस अलख-अक्षर घर में समाओगे। शब्द की झंकार में ही उस अलख का दर्शन मिलेगा। सुरति की डोर आगे रखकर अलख-अमरधाम की लौ लगाओ तो ध्यान में उस देश को ही पाओगे जहाँ हंसों का आनंद है। सद्गुरु ने सुरति की डोरी ही सत्यपुरुष से लाकर जीवों को पुकारा है कि इसे संभाल कर अपने परमपिता से मिल जाओगे। जो गुरुमुख होगा अर्थात शब्द का पालन करेगा वो ही हंस अमरलोक में वास करेगा।

मैंने अपने शिष्य के मन को कुछ नहीं दिया है, जो दिया आत्मा को दिया है। आपकी आत्मा से संबंध किया है। क्या दिया, यह मन नहीं जान पायेगा। मन तो विरोधी शक्ति है। आपकी आत्मा जान रही है, आप परम प्रकाशमय हैं। जब शिष्य मेरी सुरति करेगा, मुझमें ध्यान लगायेगा, तब मैं मिलूँगा। मन से चाहेगा तो नहीं हो पायेगा क्योंकि मन वर्जित है। मन पकड़ भी नहीं पायेगा। निरंजन को श्राप मिलता है कि ध्यान नहीं कर सकता। इसी कारण मेरे शिष्य भी मेरा ध्यान नहीं कर पाते। जिसका भी ध्यान चाहो, कर सकते हो, पर मेरा ध्यान नहीं कर पाओगे। यह बहुत बड़ा कौतुक है। कभी-कभी निरंजन मेरे रूप में भी मेरे शिष्यों को ध्यान में मिलेगा। भ्रमित करने की कोशिश करेगा। सब कुछ बना लेगा पर आँखें नहीं बना सकेगा। क्योंकि दृष्टि में आत्मा का वास है।

बन्दगी में सबको नेत्रों में देखने कहता हूँ। सद्गुरु के नेत्रों से आपकी आत्मा को कुछ मिलता है। मेरे भक्त मेरे पास बार-बार क्यों आते हैं, वो सुरति लाती है जो मैंने शब्द के साथ आत्मा को दी है।

कबीर भेदी भक्त से, मेरा मन पतियाय। सीढ़ी पावै सबद की, निर्भय आवै जाय ॥ भेदी सब जानै गुन, अनभेदी जानै क्या। कै जाने गुरु पारखी, कै जाके लागा बान ॥ पिउ परिचय तब जानिये, पिउ से हिलमिल होय। पिउ की लाली मुख पड़ै, परगट दीसै सोय ॥

ऐसे मुमुक्षु भक्त की तलाश सद्गुरु को भी रहती है जो सत्य-शब्द की सीढ़ी का भेद जानकार श्वास-श्वास में सद्गुरु संग रहता है। जिसने भेद को जान लिया है वो श्वास-सुरति के गुणों को जानता है। जो श्वासों के मूल्य से अनजान है वह सुरति को कैसे जानेगा। सद्गुरु तो इस दुनिया का पारखी है, वह सब भेद जानता है, उनके अलावा वह जानेगा जिसे भेद को जानने की लगन लगी है। सद्गुरु से मिलन होने पर परमपिता का परिचय मिल सकेगा। सद्गुरु से सत्य-शब्द की सुरति मिलने पर ही परमात्मा आप में प्रकट हो सकेगा।

सुरति को साधने संत पलटू साहिब सहज मार्ग बताते हैं कि मैं सब को छोड़कर केवल गुरु में ही ध्यान लगाता हूँ। ब्रह्मा-विष्णु-महेश त्रिदेवों की पूजा और मूर्ति चित्त में नहीं लेता। मेरा प्यारा सद्गुरु ही मेरे घट के अन्दर रहता है और मैं उसी को शीश नवाता हूँ। मैं काशी-करवत लेकर प्राण नहीं दूँगा और न पंचकोसी परिक्रमा करने जाऊँगा। प्रयाग और अन्य तीर्थों में जाकर सिर नहीं कटाऊँगा। फिर न मैं अजपा-जाप करता हूँ और न त्रिकुटी में ध्यान करता हूँ। मैं कठिन पद्मासन में बैठ अनहद धुनें भी नहीं सुनता हूँ। मैं सब मंत्र-जाप छोड़कर केवल गुरु का सुमिरन करता हूँ। गुरु की छवि ही मेरे हृदय में समाई हुई है और उन्हीं के ध्यान में मग्न रहता हूँ। मैंने तो गुरु के साथ ही प्रेम की बाजी लगाई हुई है। यदि मैं जीत गया तो उन्हें पा लूँगा और यदि हार गया तो भी उनका ही कहाऊँगा। वाणी है-

सद्गुरु के मिलन से इस देह रूपी घर में आनन्द की सुहावनी लहर समा जाती है। सुरति-निरति को एकाग्र कर देखने पर ऐसा प्रतीत होता है जैसे सद्गुरु शीश के ऊपर सिंहासन लगाये बैठे हैं। साधु संगत के पुण्यों से ही गुरु के दर्शन मिले हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे अब पूरा शरीर सद्गुरु की सुरति से ही भर गया है। उनके मिलन से दुर्लभ अमृत विचार झरने लगते हैं। बिना मंत्र और जाप के ही उनकी सुरति से सहज ही त्रिकुटी में बसा आत्मस्वरूप दिखने लगता है, मन का कष्ट नहीं रहता। कबीर साहिब के शिष्य धर्मदासजी कहते हैं कि जो जीव साहिब अर्थात सत्यपुरुष की आगम-अगाध गति को पा लेता है वो उसी में समा जाता है। सद्गुरु शरण में आकर अगम प्रभु को पहचान लेता है।

न कुछ किया न कर सका, न करने योग शरीर। जो कुछ किया सो साहिब किया, भया कबीर कबीर ॥

इसलिए आप देखना, मैंने कर्म के लिए नहीं कहा। पर कहा कि कु-कर्म नहीं करना। सुमिरन नहीं करना है तो मत कर, एकाग्र रहो। पर पहले एकाग्र होने के लिए आयाम है- सुमिरन। ध्यान एकाग्र होने में बाधक से निपटने के लिए सुमिरन की क्रिया करनी है। सुमिरन मन की चोट से बचाव है।

फिर बाहर की तरफ ध्यान नहीं रखना।

आपको कहा कि आपको इहलौकिक सुख भी मिलेगा और पारलौकिक सुख भी मिलेगा। आध्यात्मिक शक्तियां भी मिलेंगी। संसारियों को और भक्तों को भी सताने वाले भूत-प्रेत आदि आपको कुछ नहीं कर पायेंगे। जादू-जड़ी आदि भी आपको नहीं लगेंगे। ये भक्तों को भी लग जाते हैं। पर आपको नहीं लगेंगे। लेकिन एक बात सुनना कि साहिब को पकड़े रहना। वो कहते हैं कि तरक्की भी देंगे। इस तरह-

कबीर का घर दूर है, जैसे लम्बी खजूर। चढ़े तो अमृत पावसी, गिरे तो चकनाचूर ॥

चाह मिटी चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह। वो ही शाहनशाह है, जिसको नाहिं चाह ॥

इसका एक और कारण है और वो यह कि आत्मा बहुत सुंदर है। यह शाही है। काल भी हो जाए, पर शाही आदमी का शाहीपना समाप्त नहीं होता है। आत्मा है ही शाही। वो है ही अति सुंदर। इसलिए शरीर में आकर इसे ही सुंदर बना रही है और संतुष्ट नहीं है, क्योंकि उस सुंदरता तक शरीर की पहुँच नहीं है।

तो आत्मज्ञानी खाता भी है, देखता भी है, पर उसका देखना और होता है। कुछ स्त्री को देखते हैं कि वो शरमा जाती है। पर आत्मज्ञानी दूसरी नज़र से देखता है। यह अंतर होता है। बाकी स्वाद के लिए खाते हैं, पर आत्मज्ञानी शरीर के लिए अनिवार्य ऊर्जा के लिए खाता है। उसके सब क्रियाकलापों में बहुत अंतर है।

गुरु साहिब तो एक है, बाकी सब आकार ॥ अपा तज के गुरु भजे, तब पावै दीदार

वो शक्तियाँ आपके साथ में हैं। वो शक्तियाँ आपको चेतन कर रही हैं। आपके साथ में हमेशा ऐसा लगेगा कि एक ताकत है। यह नाम है।

सतगुरु नाम बताने वाले, तुझको कोटिन प्रणाम ॥ गुप्त नाम गुरु बिन नहीं पावै। पूरा गुरु अकह समझावै ॥

यानि धीरे-धीरे आत्मा की क्षमताएँ बढ़ती जायेंगी। यह है- सहज मार्ग। मन समझ में आता जायेगा। चित्त समझ आता जायेगा। कपाट की सब चीजें समझ आती जायेंगी। साधना भी स्वयं होती जायेगी। कई अन्दर से संकेत मिलने लग जायेंगे अंतःकरण में। कई ऐसी नाड़ियाँ खुल जाती हैं। कई क्रियाओं का बोध हो जाता है। रिद्धियाँ-सिद्धियाँ सबका भंडार इस मानव तन के अन्दर भरा पड़ा है। पर हम एक अदद गुरु के बिना ये चीजें प्राप्त ही नहीं कर सकते हैं। इसलिए तो कह रहे हैं-

गुरु मिलन से झगड़ा खत्म हो गया॥ ना तो तन ही रहा न मन ही रहा, गुरु मिलन से झगड़ा खत्म हो गया॥

जबसे आपको नाम मिला है, आपकी पता चल रहा होगा, आभास हो रहा होगा कि कुछ शक्तियाँ आपको बचाती चल रही हैं, आपका संरक्षण करती चल रही हैं। आपको लगता होगा कि एक दिव्य सत्ता आपके साथ में है। यह शक्ति एक पूर्ण गुरु आपमें जाग्रत कर देता है। तभी तो बुल्लेशाह ने अपनी वाणी में कहा-

ना रब्ब मैं तीर्थां दीठ्या ना रोज़ा नमाज़े । बुल्ले शाह नूँ मुर्शद मिलयां, अंदरो रब्ब लखाया॥

एक सद्गुरु आपको कोई परमात्मा का रास्ता थोड़ा बताता है, कोई योग की क्रिया थोड़ा बताता है। वो तो-

कोटि जन्म का पथ था, पल में दिया लखाय॥

आपके अन्दर उस दिव्य सत्ता को प्रगट कर देता है। यह है- सद्गुरु का कार्य। गुरु आपके अन्दर की वो क्षमता स्वयं जागरूक कर देता है। मानव तन अमोलक है। देवता लोग इस मानव तन को प्राप्त करने की चाह रख रहे हैं। वो चाहते हैं कि काश हमें भी तन मिले। क्योंकि इस तन के अन्दर क्षमताएँ हैं। आप शरीर की शक्तियाँ जगाएँ, अच्छी बात है। आप योग करें, खराब नहीं बोल रहे हैं। लेकिन उसी तरफ एकाग्र नहीं हो जाओ न! यही पर्याप्त नहीं है। जब तक आत्म शक्ति नहीं जगेगी, आदमी संसार-सागर से पार नहीं हो सकता है। आत्म शक्ति योग नहीं जगा सकता है। आत्म शक्ति बाहरी उपासना करने वाला नहीं जगा सकता है। आत्म शक्ति एक पूर्ण सद्गुरु जगा सकता है। इसलिए कबीर साहिब ने अपनी वाणी में पूर्ण सद्गुरु का दर्जा ईश्वर से भी ऊपर कहा। जब तक पूर्ण सद्गुरु की प्राप्ति नहीं होती है, तब तक उस अमर लोक की प्राप्ति हो ही नहीं सकती है। इसलिए ये क्षमताएँ हमें एक अदद गुरु के द्वारा ही प्राप्त हो सकती हैं। इसी लाइन में फिर बाकी संतों ने भी आकर उस देश की बात की। यदि आप संतों की वाणी का शोध करें तो पायेंगे कि उन्होंने उस अमर लोक की बात की है और साहिब के नक्शेकदम पर चले हैं। जो-जो बातें उन्होंने कहीं हैं, उनका अनुकरण किया है, पूरा-पूरा अनुकरण किया है।

साहिब ने समाज को एक अलग चीज़ दी। उन्होंने ११वें द्वार की बात की। ११वाँ द्वार आपकी सुरति के अन्दर है। १०वें द्वार तक तो योगी भी कह रहे थे। साहिब ने ११वें द्वार की बात की, अमर लोक की बात की, नाम की बात की और कहा कि आपको सद्गुरु पार कर देगा। तो यह अंतर है।

भक्ति भक्ति में भेद है।

साहिब वाणी में साफ कह रहे हैं-

नौ द्वारे संसार सब, दसवाँ योगी तार। एकदश खिड़की बनी, जानत संत सुजान ॥

गंग औ जमुन के घाट को खोज ले, भंवर गुंजार तहाँ होय भाई॥

गंगा यमुना का घाट सुषुम्ना है। वो खोज नहीं पाता है तो इलाहाबाद पहुँच जाएगा।

त्रिवेणी के घाट पर भई संतन की भीड़ ॥

इडा पिंगला है त्रिवेणी का घाट। यहां संतों की भीड़ है। यहाँ धुनें हो रही हैं। आगे रहस्य गुरु बोलेगा-

सरस्वती देख तहाँ निर्मल बहै, तास के पिये सब प्यास जाई ॥

सुषुम्ना बंद पड़ी है। जो लॉक कभी न खोलें, वहाँ जंग लग जाती है।

सुरति और निरति, मन पवन को पलट कर, गंग औ जमुन के घाट आने॥

सुरति, निरति और मन, पवन को पलट दे। साहिब की कई चीजें दुनिया समझती नहीं है। जो होश है, वो सुरति है। वो घूम रही है। जो घट में है, वो निरति है।

पाँच को नाथ कर,अगम का आनंद ले पाँचों तत्वों को नाथ ले। साहिब कह रहे हैं- सकल पसार मेटि कर, मन पवन कर एक । ऊँची तानों सुरति को, देखो पुरुष अलेख॥

मन, पवन को एक करना है।

पाँच को नाथ कर, साथ सोहं लिया । अधर दरियाव का सुख माने ॥

स्वंसा को साथ ले लिया। ध्यान भजन में तो बैठना होगा न। लेकिन आपने फैसला कर रखा है कि ध्यान भजन नहीं करना है। आप ही हैं। यह तो एक विकल्प है। आपने विकल्प ले लिया कि आप पार कर दो। मेरी प्राथमिकता है कि भजन करना। यह नहीं कि कुछ न करूँ। यदि आपको कहा जाए कि मनमोहन सिंह जी का ध्यान करो तो ध्यान आ जाता है। किसी हीरो का ध्यान करो तो आ जाएगा। उसका ध्यान आ जाएगा। पर मेरा ध्यान नहीं आ रहा है। जब तक आप मन की स्थिति में हैं, तब तक नहीं मिलेगा। पूर्ण एकाग्र हो जाओगे तो मिलेगा। सपने में भी मिलूँगा तो चेतन हो जाओगे।

आप सुमिरन भजन करना। सुमिरन तो ऑटोमेटिक चीज़ है। उससे सुषुम्ना खुल जाएगी।

जप तप संयम साधना, सब सुमिरन के माहिं ॥

ऑटोमेटिक इड़ा पिंगला लय हो जायेंगी। इड़ा पिंगला लय होती है तो सुषुम्ना खुल जाती है। ९ द्वार पवन से बंद हैं। पवन ऊपर खींचें तो ९ द्वार लॉक हो जायेंगे। जैसे स्वंसा ऊपर सिमटती है तो लॉक हो जाता है। फिर स्वंसा ऊपर चलती है। मन सुरति को भटकाता है। यदि एकाग्र रहे तो ऊपर चलते चलते एक शून्य बन जाती है। वो शून्य पलटनी है।

शून्य महल की फेरी देही, सो बैरागी पक्का होई ॥

शून्य के पलटने पर तुरीया अवस्था बन जाती है। फिर तुरीया में जाकर समझ जाता है कि माया के शरीर में कैसे घुसना होता है। वो यह खेल समझ जाता है

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जीवन की कला

जीवन की कला बताता हूँ। जब लोग टेंशन दें तो नहीं लेना। साइड होकर निकल जाना। कभी कोई गाली देता है तो आप भी गाली देते हैं। यह आपका नुकसान है। एक आदमी टेंशन दे रहा है, तो आप गुस्सा हो गए, तो उसका तो काम बन गया। जब आपने नहीं लिया, तो उसी की तरफ है टेंशन। यह है - जिंदगी की कला। अपने को साध लो।

एकै साधे सब सधे। सब साधे एक जाय॥

सर्वप्रथम तो जो व्यक्ति अपने को शरीर मान रहा है, उसको मैं बहुत पिछड़ा हुआ मानता हूँ। मैं एक बात बताता हूँ, यह घमंड नहीं है, मैं कभी भी थकता नहीं हूँ। मेरी माँसपेशियाँ, मेरा शरीर तौबा भी कर दे, तो भी नहीं थकता हूँ। वजह यह है - मेरी यह मान्यता है कि मैं शरीर नहीं हूँ, मैं अपनी बड़ाई नहीं बोल रहा हूँ। सुनिए -

"कोई न रहा, एक पुरुष रूप रहेगा।" वो ही रहेगा, जिस दिन प्रलय आ जाती है। न जाने कितने बड़े पीर-पैगम्बर धरती पर आए, सिर्फ़ एक वो ही रहेगा। पूरी व्यवस्था परिवर्तित हो जाती है, सिस्टम समाप्त हो जाते हैं। कोई पूछने वाला भी नहीं होगा, जब यह पृथ्वी नष्ट हो जाएगी, पता ही नहीं होगा। कितने कृष्ण आए, ब्रह्मा आए, कितने शिव-सनकादिक आए। कागभुशुंडि जी रामायण में कह रहे हैं - 100 बार महाप्रलय देखी, जिसमें देवी-देवताओं को भी लय होते देखा। वो कह रहे हैं ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सनकादिक को भी मैंने लय होते देखा। पता नहीं लोग क्या पोथियाँ पढ़ रहे हैं, क्या धर्मशास्त्र पढ़ रहे हैं। लेकिन कभी भी किसी भी देश काल में नष्ट नहीं होने वाला, "आदि सचु जुगादि सच है भी सच नानक होसी भी सच" (नानक की वाणी)। जो कभी भी किसी देशकाल अवस्था में नष्ट नहीं होता, उसे अनादि, अनन्त कहते हैं।

वो सत्य अनादि-अनन्त है। ऐसे तो सूर्य भी सच लग रहा है, पर यह अनादि-अनन्त नहीं है, एक दिन नष्ट हो जाएगा। पृथ्वी भी सच लग रही है पर ये अनादि-अनन्त नहीं है, अनादि-सांत हैं। परमात्मा अनादि-अनन्त है, एक वो ऊर्जा है, एक वो तत्व है जो वृद्ध नहीं होता, नष्ट नहीं होता, न्यूनाधिक नहीं होता, विभाजित नहीं होता, अभौतिक, अविनाशी। इसलिए उसकी कई संज्ञाएँ दीं। तो परमात्मा के विषय में हम सबकी अलग-अलग मान्यताएँ बन गई हैं। आइए, हम सब स्वछंद भाव से इस बात पर विचार क्यों न करें, कोई आपस में क्यों लड़ाई करे! हम प्रेम से भी तो किसी को जीत सकते हैं; प्रेम से भी तो किसी का नज़रिया बदल सकते हैं। मैं अपने सत्संगियों को बोलता हूँ - जो मेरी निन्दा कर रहे हैं, बन्धुओ, आप मानेंगे, ऊर्जा वाला सोलर सिस्टम आपके साथ फिक्स कर देता हूँ, ठीक है। केवल सोलर लैम्प ही सूरज की रोशनी रिसीव करता है और रात को रोशनी देता है। आप बल्व रख दो, वो नहीं रोशनी देगा, ट्यूब लाईट रख दो, वो नहीं रोशनी देगी, बाकी चीजें रख दो, वो नहीं रोशनी देंगी। उनमें सिस्टम नहीं है ऊर्जा को एकत्रित करने का। ठीक है। आपमें मैंने सिस्टम जोड़ दिया है, उसे पृथक नहीं करना। यह पृथक हो जाता है, शराब पीने से, चोरी, बेईमानी करने से, परस्त्रीगमन करने से। जैसे प्रत्येक मनुष्य के शरीर में इस चमड़ी के नीचे एक सफेद चमड़ी है। जिनकी चमड़ी मटमैले रंग की है, उन्हें बीमारी होने के अधिक आसार हैं, जिनकी लाल रंग की है उनको कम। सफेद दाग के निशान जख्म की जगह से शुरू होते हैं।

सच यह है, परमात्मा एक कोशिश में है, प्रभु एक कोशिश में है। आपको माया और मन से बचाने के लिए, आपको यहाँ से छुड़ाने के लिए कोशिश में है। आप एक मानवीय आधार से सोचें। आपके बच्चों को परेशानी हो तो आप परेशान हो जाते हैं। चाहे आपका बच्चा गलती करके, जुर्म करके जेल जाए, तो भी आप उसे छुड़ाना चाहते हैं। वही बात तो हमारे लिए भी लागू होती है जो आपके लिए है।

साहिब कह रहे हैं कि यदि तुम भक्त करना चाहते हो तो निंदा से नहीं घबराना। यदि कोई पाँच सोटियाँ भी तुम्हारे सिर पर मारे तो सह सको तो सह लेना। कोई मूरख मिले तो मौन ही रहना। उसे ज्ञान देने का प्रयास न करना। पराई स्त्री से प्रेम नहीं करना। उसे दूर से ही देखकर डरना। इस संसार में विषयों की बेल लगी है। तुम देख सुनकर ही पाँव आगे बढ़ाना। साहिब कह रहे हैं कि यह बड़ी बारीक बात है, तुम मरहमी होकर समझ लेना।

साहिब कह रहे हैं कि निर्धन का धन नाम है। इस धन को कोई चोर चुरा नहीं सकता है। यह धन कभी कम भी नहीं होता है। यह धन कष्ट समय में काम आता है। इसलिए सोते, जागते, उठते, बैठते, हर समय इस नाम का सुमिरन करते रहो। यह धन दिन-दिन बढ़ता ही जाता है, थोड़ा-सा भी कम नहीं होता है। संसार की दौलत तो एक दिन छोड़नी पड़ जाती है और पास में कुछ भी नहीं रह जाता है। लेकिन जिसके पास यह धन है, उसे पारस की भी कोई आवश्यकता नहीं है।

साहिब कह रहे हैं कि एक-एक दिन करके यह शरीर समाप्ति की ओर जा रहा है। इसलिए संभल जा और नाम से प्रीत कर। बचपन तो तेरा बीत गया, अब जवानी भी जा रही है। अब तो बुढ़ापा आने वाला है और फिर तू इस संसार से विदा हो जाएगा। तेरे बाल काले से सफेद हो गए हैं और आँखों में कष्टों के कारण आँसू भर आए हैं। हे मूरख! अब बुढ़ापा आ रहा है! तेरी आयु पल-पल क्षीण होती जा रही है। साहिब कह रहे हैं कि जिन्होंने सार नाम को हृदय से बिसार दिया है, वो सब कुछ हार गए हैं।

साहिब कह रहे हैं कि हे मनुष्य! तूने बड़ी मेहनत करके, कष्ट सहकर माया इकट्ठी की, पर अंत समय में तुझे पाँच गज की चादर ही ओढ़ाई जाएगी। तब माता, पिता, भाई, बंधु कोई भी तेरे काम नहीं आएगा। ये महल, ये हाथी, घोड़े सब यहीं धरा का धरा रह जाएगा और दूसरे लोग इसका भोग करेंगे। इसलिए इसे अपनी न जानकर तू नाम से लौ लगा।

आत्मा जिस जीव-शरीर में कैद है, उसी शरीर की हर श्वाँस के आने-जाने में परमपुरुष है। प्रत्येक देह की श्वाँस-उश्वाँस में वह अमरलोक का स्वामी, आत्मरूप समाया है, जिसका कुछ-कुछ आभास सद्गुरु अपने शिष्य को कराते हैं। उस सत्यलोक के स्वामी की गति दिखाई नहीं देती, सद्गुरु ही उसे अविगत की गति दिखाने में समर्थ है।

कहै कबीर सुनो धरमदासा, परमपुरुष है श्वाँस उस्वंसा। घट-घट बोले अजब अनूपा, सो है सत्यलोक को भूपा॥ अविगति की गति लखी न जाई, कछु कछु तुमको दीन्ह लखाई॥

जैसे राम का नाम लेने मात्र से राम नहीं मिल सकते, ऐसे ही केवल 'सत्य' शब्द कहने मात्र से परमात्मा को नहीं जाना जा सकता। सत्य को जानने कोई संत-सद्गुरु की शरण में रहना होगा। सद्गुरु उस नाम रूपी परम-सत्य को शिष्य के भीतर प्रकट कर देते हैं। शिष्य को उस निःअक्षर गुप्त 'नाम' की प्राप्ति के लिए कोई साधना नहीं करनी पड़ती, केवल सद्गुरु के शब्द को निरखता रहे। सद्गुरु शब्द पर ध्यान ही परमात्मा को पाने का सुरति-योग है।

सुरति में समाया नाम ही वह b है जो प्रत्येक मनुष्य के भीतर है। सद्गुरु उस सोई पड़ी ताकत को अपनी सुरति से जगा देते हैं फिर वही शक्ति आजीवन शिष्य की रक्षा करती है। सद्गुरु से प्राप्त 'नाम' की शक्ति के अतिरिक्त शिष्य को किसी भी अवतार, देवी-देवता, तंत्र-मंत्र, तीर्थ-व्रत आदि भक्ति की आवश्यकता नहीं रहती। सद्गुरु भक्ति से सम्पूर्ण भय और संशय समाप्त होकर अंत में मोक्ष प्राप्ति का विश्वास रहता है। यही कारण है कि मुझ से 'नाम' रूपी अद्भुत शक्ति को प्राप्त कर सभी शिष्य अपने साथ हर समय सांसारिक आकर्षणों से मुक्त रहकर सुरक्षित अनुभव करते हैं। वास्तव में यह परमपुरुष के निःअक्षर अनश्वर 'नाम' का ही कमाल है कि हँसात्मा निरंजन की सृष्टि से मुक्त होकर निज अमरधाम जाती है।

साहिब ने कहा कि जो 'नाम' कहने-सुनने में आते हैं, वे सब नश्वर संसार के हैं। क्षर-अक्षर अर्थात् नश्वर भाषा-क्षरों के नामों को छोड़कर निःअक्षर सार-शब्द को सद्गुरु से ग्रहण करो। निःअक्षर गुरु-शब्द पाकर ही भवसागर के पार जाओगे। सद्गुरु के अक्षर शब्द-भेद को नहीं जानने के कारण ही संसार में सब लोग नश्वर कैद में हैं। इस क्षर अर्थात् नश्वर के झमेले में पड़कर सब सिद्ध और साधु, बार-बार जन्म-मरण का गर्भ भोगते रहते हैं। निःअक्षर अर्थात् कहने-सुनने-पढ़ने से परे 'नाम' को जाने बिना सभी काल के घेरे में रहते हैं। साहिब कबीर कह रहे हैं कि सद्गुरु से साँचे-शब्द की पहचान करो।

त्रिलोकीनाथ निरंजन की इस दुनिया में मनुष्य देह पाकर सब दिन एक-जैसे नहीं रहते। किसी दिन रूखा-सूखा मिल सकता है तो किसी दिन दूध-मलाई मिल सकती है। किसी दिन पत्ते आदि खाने पड़ सकते हैं तो किसी दिन पर्वत पर कंद-मूल-फल मिल सकते हैं। किसी दिन कुछ भी नहीं मिलता है। किसी दिन फटे-पुराने कपड़े पहनने पड़ सकते हैं। चौरासी लाख योनियों का खेल देख लो; मनुष्य योनी में कभी ऊँचे घर में तो कभी नीचे घर में जन्म लेना पड़ सकता है। कभी देवी-देवल मंदिर, मस्जिद, बाग-बगीचा मिलता है तो कभी मैदान में रहना पड़ता है। इसलिए संसार की आशा को त्याग कर आत्मा के घर अमरलोक का विचार करो और सद्गुरु 'नाम' का सहारा लो।

अकह-निःअक्षर-अनश्वर परमपुरुष 'नाम' ही सद्गुरु-शब्द है। अनश्वर-चेतन-अमूल-सहज-आनन्दमयी पाँच वृत्तियुक्त आत्मा ही देह की मूल शक्ति है। शास्त्र भी आत्मा का यही स्वरूप कहते हैं। ऐसी आत्मा उसके जैसे ही गुण-वृत्तियों वाले 'नाम' को सद्गुरु रूप ग्रहण करती है। इन गुणों से युक्त 'सुरति' का स्वामी ही सद्गुरु** है, जिसे पाकर 'आत्मा' शरीर के बंधनों को जानकर अपने स्वरूप को पहचानती है। परमात्म-रूप शक्ति युक्त 'आत्मा' सत्य शब्द पाकर मन रूप निरंजन के छल-कपट को जान जाती है। शरीरों के बंधन में काल-निरंजन की ठुकराई मानने वाली आत्मा, सद्गुरु-सुरति-शब्द पाने के अवसर से ही तो वंचित रखी गई है। यही जन्म-जन्मांतर का रहस्य है।

साहिब कह रहे हैं दुनिया के लोगों का ध्यान तो उल्टा है। सब मोह और खान-पान के ध्यान में मग्न हैं। नारी और पुरुष दोनों एक-दूसरे से हैं किन्तु दोनों ही एक-दूसरे को स्पर्श करने और देखने में मग्न हैं। नारी रात-दिन पुरुष का ध्यान करती है और पुरुष नारी के रूप-सौन्दर्य का ध्यान करता है। साहिब कह रहे हैं इस तरह सभी जीव जगत में उलझे रहकर गर्भवास के चक्र में फँसे हैं।

निशदिन आठों पहर सुमिरन की विधि मैंने शिष्य भक्तों को दी है, उस पर ध्यान रखें। आकाश से पवन नासिका द्वारा नाभि तक आकर पुनः बाहर निकल जाती है। यही पवन नाभि से दस-प्रकार अंगों में समाकर 'निरत' रूप शरीर की शक्ति है। इसी निरत-पवन में सुरति भी उलझकर मन के निर्देशन में दिमाग तक आ-जा रही है। पवन रूप-निरत को नाभि में जाने से रोक कर ऊर्ध्वगति देना है, ऊपर ले जाकर नासिका से सीधी बाहर करना है। इस तरह निरति से सुरति के मिलन का मार्ग नासिका के इङ्गला-पिङ्गला द्वार से होगा। जब आप इस गुरु-आज्ञा का ध्यानपूर्वक पालन करते रहेंगे तो सुरति का निरति से मिलन होकर सुषुम्ना नाड़ी की बंद-गाँठें खुलेंगी। यही वो बंद-दरवाजा है जिसके ऊपर दशमद्वार पर निरंजन ने त्रिलोकों से परे जाने का ग्यारहवाँ द्वार रोक रखा है। सुरति-निरति के मिलन से ये दोनों एक होकर बड़ी शक्ति बनकर सुषुम्ना की टेढ़े-मेढ़े मार्ग में प्रवेश करती हैं। यही त्रिवेणी संगम है गंगा-जमुना और सरस्वती का। इसी संगम के घेरे के प्रवाह से भक्ति कैसे करते हैं को 'नाम' रूप सद्गुरु-शब्द शक्ति पकड़ती है। 'मन' की पाँचों शक्ति स्वरूप वृत्तियाँ काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार नामी गुरुमुख के पकड़ में आ जाती हैं। मन की 25 प्रवृत्तियों की ममता-माई भी वश में आ जाती है। इस विधि से सद्गुरु 'नाम' की शक्ति से दशम द्वार पर विजय प्राप्त होती है। अर्थात् सद्गुरु सुरति के साथ शिष्य की सुरति को पाकर 'सर्वशक्तिमान' मन का वश नहीं चलता और भक्त शीश से ऊपर अधर में चढ़कर अभय पाता है। साहिब कहते हैं -

बिना सद्गुरु कृपा और सुमिरन किए कुछ नहीं होगा, गुरु-आज्ञा पर ध्यान लगाए रखना होगा। बावन अक्षरों में आने वाले नामों को छोड़कर निःअक्षर-अकह 'नाम' का ध्यान ही सद्गुरु सुरति से मिलन है। इस 'नाम' को पण्डित और मसालची दोनों नहीं देख सकते। यही 'नाम' आत्मरूप दर्शन है। जो किताबों के शब्द-अक्षरों से दूसरों को रौशनी दिखाते हैं, वे स्वयं ही अँधेरे में हैं। दुनिया के पंडित खुद ही कर्म के भ्रमों में उलझे हुए पेट के धंधों में व्यस्त हैं।

सद्गुरु-शब्द से अमरपद प्राप्त होगा जो जीव और ब्रह्म से परे मोक्ष ध्यान-सुमिरन से गुरु-उजा (ऊर्जा) हृदय को प्रकाशित करती है। यदि घर का मालिक जाग रहा हो तो चोर मकान में सेंध नहीं लगा सकता। 'वाणपति जागसी, काह करे तसकरा।' हमेशा सुरति में रहना, चेतन रहना, चुपचाप बैठकर देखना कि मन क्या कर रहा है। मन अचेतन अवस्था पसंद करता है, परेशान करेगा, थकान अनुभव कराएगा। मन को ऊब होती है। मन हर पल बहाए ले जा रहा है; कहीं कल्पनाओं में, कहीं इच्छाओं में। आत्मा के बिना मन कुछ नहीं कर सकता, इसलिए किसी ध्यान में एकाग्र नहीं होने देता। चित्त भी आत्मा के सहयोग के बिना कुछ याद करने में सक्षम नहीं है। जब मन के चारों रूपों - मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार से हरकत नहीं करने दोगे तो उसे काबू करना मुश्किल नहीं है। मन की क्रिया स्वाभाविक नहीं है, आत्मशक्ति लेकर ही कर पाता है। श्वांसा खुद नहीं चल रही, आप ले रहे हैं, लेने के लिए एक क्रिया कर रहे हैं। वो कोई चेतन है जो आँखों के पीछे बैठ श्वाँस ले रहा है। आप गुरु को समर्पित होंगे, सुमिरन में रहेंगे, तब ही मन नियंत्रण में रहेगा। मन को पकड़ना है, उसे ही मारना है। इसे ही कहते हैं 'मैं' को मारना। जब 'मैं' मर गई तो समझो मन मर गया। मन को मारकर ही तो इसकी दुनिया के तीन-लोक से बाहर आत्मा के मूल लोक जाना है। इसलिए कहा -

चिंता तो गुरु नाम की, और न चितवे दास। जो कछु चितवे नाम बिन, सोई काल की फाँस॥

यह मनुष्य तन दुर्लभ है, इसको पाने देवता भी तरसते हैं, क्योंकि इसमें भोग भी है, कर्म भी है, अवनति भी है, उन्नति भी है, अर्थात् भोग और कर्म के फल की प्राप्ति होती है। केवल मनुष्य देह में रहकर ही आत्म-मोक्ष की भक्ति अर्थात् सद्गुरु से सत्य-नाम मिलना सम्भव है। यदि मनुष्य तन पाकर भी आत्म-कल्याण का मार्ग नहीं जाना तो व्यर्थ ही मनुष्य-जन्म गँवा दिया। बच्चे तो पशुओं के भी हैं; भोग-वासना-मैथुन क्रिया तो वे भी करते हैं। पशु भी सोते हैं, भोजन के लिए प्रयास भी करते हैं। फिर मनुष्य श्रेष्ठ कैसे हुआ! मनुष्य बुद्धि-विवेक का उपयोग करके संसार की असारता का रहस्य न जाना, मुक्ति मार्ग की भक्ति, परमात्म प्राप्ति नहीं जाना तो जानवरों से बेहतर नहीं है।

मनुष्य संसार में कर्म और भोग इन्द्रियों के मजे में मतवाला रहता है। काल हर समय सिर पर मंडरा रहा है, वो कभी भी मार-पछाड़ सकता है। मरते समय परिवार, कुटुम्ब, सगे-सम्बंधी काम नहीं आयेंगे और यम-दूत के जूते ही खाने पड़ेंगे। संसारी जीव दो दिन के तमाशे को देख कर फूला-फूला फिर रहा है, कभी हार नहीं मानता। अज्ञान से भरा मनुष्य बहस भी बहुत करता है, पर याद रखो, मरने पर कोई खोजना चाहेगा तो भी ढूँढ नहीं पायेगा कि कहाँ गए। तुलसी साहिब हाथरस वाले की वाणी है -

संसार-सृष्टि के समस्त तत्व और प्रकृति का किसी न किसी प्रकार से देह-भाव है। ज्ञान के कोटि-शब्द जो दुनिया में बोले गए उन सबसे अलग है विदेह निःतत्व शब्द जो बिना जिभ्या से बोले ही जाप में समाता है। सद्गुरु के सार-शब्द से जीव भवसागर से पार हो जाता है। काल का जोर जीव पर नहीं चल पाता। क्षर-अक्षर सब माया है, सद्गुरु निःअक्षर समझाते हैं। जगत में तो अक्षर-ब्रह्म का ही गुणगान है, कोई निःअक्षर के मर्म को नहीं जानता। सार-शब्द का भेद पाए बिना कोई भी अमरलोक नहीं जा सकता, मोक्ष नहीं मिलेगा। सद्गुरु का सार-शब्द सत्यलोक में ही समाया है जो जन्म-मरण के आवागमन को नष्ट कर देता है। जीव-शरीर में आने-जाने का बीज ही शब्द के सुरति में समाने से नष्ट हो जाता है। हमारे शीश और शून्य (आकाश) के मध्य अधर में शब्द-तत्व का वास रहता है जो निरंजन के लोक दशम द्वार से बाहर है। जब उस अधर में जीव का वास हो जाता है तब काल-कसाई की सीमा से बाहर हो जाता है।

जो सुरति (ध्यान) से जिसको पाता है, उसी का रूप हो जाता है। श्री विष्णु ने अलख-निरंजन का मन से ध्यान लगाया तो छाया रूप देखकर विष्णु का मन मग्न हो गया। इस प्रकार श्री विष्णु सुरति से मन (निरंजन) की छवि को पाकर उसी का तद्रूप हो गए। ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सनकादि सभी ने अलख-निरंजन की इसी लीला-भक्ति को चित्त में समाकर शून्य में समाधि लगाई। शून्य की ऐसी ध्यान समाधि से ज्ञान कहा और ज्योतिस्वरूप में दृढ़ता पाई, पर ज्योतिस्वरूप का मर्म नहीं पाया। ज्योतिस्वरूप निरंजन ने ही मीन रूप अवतार लिया, वराह रूप अवतार लिया, नरसिंह रूप धरा, वामन अवतार लिया। परशुराम होकर क्षत्रियों का संहार किया। राम रूप होकर रावण को मारा। कृष्ण रूप हो कंस का संहार किया। बौद्ध रूप में जगन्नाथ अवतार लिया। इस प्रकार विविध भाँति संसार में लीलाएँ करने देह धारण कर व्याप्त है। इसी काल की साधना का जाप योगी और वियोगी करते रहे, भेद किसी ने नहीं जाना। सार-शब्द का भेद पाए बिना सभी नेति-नेति कहकर रह गए। पाँच-तत्व और तीन गुणों से न्यारे निःतत्व भेद को कोई नहीं पा सका। निःअक्षर मर्म को जानकर निःतत्व हँस ही परमलोक में जाता है। साहिब वाणी है -

निःतत्व भेद जो गुप्त है, पाँच तीन से न्यारा। निःतत्व जो हँस है, जाय पुरुष दरबार॥

जिस, परमपिता, आनंदमयी लोक का विदेह 'नाम' और विदेह 'ध्यान' साहिब ने कहा; वह तो हमारी सुरति में ही समाया है। 'जीवात्मा' का गुण-तत्व स्वयं वही परमात्मा है, जिसे कुछ भी खाने-पीने की ज़रूरत नहीं है। वो कभी मरता नहीं है और जन्म भी नहीं लेता। उसकी कोई जाति-गोत्र-वर्ण नहीं है। वो तो सदा अखंडित, अगम, अपार और अवर्णनीय है। वह न भूमि है, न आकाश, न सूरज-चाँद और प्रकाश है। उस साहिब ने सृष्टि रूप माया और पाँच तत्व तीन गुण निर्मित नहीं किए. साहिब (परमपुरुष) न तो रघुपति बने न ही अहिरावण। न वह दशअवतार धरै, न उसने सृष्टि रूप माया और पाँच-तत्व, तीन गुण निर्मित किए। साहिब ही सगुण-निर्गुण सृष्टि की रचना और विस्तार करने वाले हैं। सात महाशून्य तक निरंजन की सृष्टि का निर्गुण विस्तार साहिब ने बताया। इन्हीं तक निरंजन सृष्टि में हमारी सुरति समाई है। इस प्रकार सात-पाताल, सात ही शून्य आकाश और सात-महाशून्य (अंधकारमय अज्ञात) इन इक्कीस ब्रह्माण्डों तक काल-निरंजन का ही ज्ञान है।

सात शून्य सातहि कमल, सात सूरत स्थान । इक्कीस ब्रह्माण्ड लग, काल निरंजन ज्ञान ॥

बावन अक्षरों में आने वाले शब्दों का आधार तो जिभ्या है, पर आदि-अक्षर जिभ्या से न्यारा है। उस आदि अक्षर को सद्गुरु से ही पाया जा सकता है; पूर्ण गुरु ही उस शब्द को देने में समर्थ है। जो मनुष्य बावन अक्षरों में आने वाले नामों की भक्ति के फेर में है, वह मनुष्य काल के चेले ही हैं। चार वेदों से अक्षरों की रचना हुई है और छ: शास्त्रों से 52 अक्षर बने हैं। अठारह पुराण और भागवत गीता ने बावन अक्षरों को सब पर प्रकट किया है। इन बावन-अक्षरों से बँधी डोर टूटने पर सहज ही काल का वचन छूट जाएगा।

अक्षर होय नि:अक्षर गहे, अक्षर है उपदेश॥ निःअक्षर अक्षय डर चढ़ जाय, जीव अक्षराज के देश।

यह ब्रह्माण्ड काल निरंजन की रचना है, उसका घर है। साहिब कह रहे हैं कि जब से 'तीन लोक' बने हैं तब से सभी जीव 'काल' को ही 'परमात्मा' मानकर भज रहे हैं। कोई भी सच्चे परमात्मा [परमपुरुष] की भक्ति नहीं करता न ही उसकी जानकारी है। सभी 'काल' [मन/निरंजन] के शिंकजे में ही जकड़े रह गए। परमात्मा के गुप्त अमरलोक को कोई भी प्राप्त नहीं कर पाया जो हँसात्मा का घर है। निरंजन ने तीन-लोक में किसी को भी परमपुरुष के मूल रूप का, मूल ठिकाने का भेद नहीं दिया। काल निरंजन ने सभी जीवों को 'मृत्यु' का भय देकर अपनी 'माया' में उलझाया है। मृत्यु का भय ब्रह्माण्ड के हरेक लोक-लोकान्तर में अपना ताण्डव दिखा रहा है। सब देवों के प्रधान त्रिदेवों से लेकर एक साधारण जीव तक सभी 'काल' की पकड़ और मार के दायरे में हैं।

'हँस स्वरूप' आत्मा इस प्रकार 'मन' में समाई है जैसे दूध में पानी। कोई कितनी भी चेष्टा कर ले कि दूध और पानी को किसी साधन द्वारा अलग कर दे, कभी नहीं कर पाएगा। सद्गुरु की कृपा के बिना 'आत्मा' कभी भी खुद को 'मन' से अलग नहीं कर सकती है, चाहे कितना भी प्रयत्न कर ले।

आत्मा को केवल एक पूर्ण 'सद्गुरु' ही छुड़ा सकता है इस 'मन' से और माया के बंधनों से; दूसरा कोई ईष्ट/देव नहीं छुड़ा सकता। क्योंकि एक पूर्ण सद्गुरु ही जानता है कि आत्मा का मूल ठिकाना कहाँ है और मन-माया के बंधन में कैसे फँसी है। साहिब ने चेताया है कि यदि आत्मा के मूल घर को जानना चाहते हो, उसे पाना चाहते हो तो अपनी 'मैं' को मिटाकर एक सच्चे 'सद्गुरु' की शरण प्राप्त कर लो। एक सद्गुरु ही तुम्हारी सुरति को उस मूलधाम का भेद दिखाकर आत्मा को वहाँ पहुँचा सकते हैं। जितने भी साधन तुमने 'परमात्मा' की प्राप्ति के लिए अपना रखे हैं, वो सब झूठे हैं, मन द्वारा प्रेरित हैं।

मैंने अपने शिष्यों को सांसारिक आसक्ति से छुड़ा दिया; मन पर 'नाम' की नकेल लगा दी, आत्मा को चेतन कर दिया; आत्मा 'मन' की तरंगों को पढ़ने लग गई। सुरति को मन और माया के दायरे से निकाल कर परमपुरुष की सुरति के साथ जोड़ दिया। काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार को एक सीमित दायरे में बाँध दिया; अब आत्मा 'मन' की प्रेरणा से नहीं सद्गुरु सुरति से कर्मों को पहचानेगी।

काल की दुनिया के भ्रमजाल में फँसे कोई बड़े भाग्यवान ही पुण्यों के संचय से सन्त-मत को जानकर गुप्त 'नाम' पाते हैं। सद्गुरु के सच्चे शब्द को पाकर ही आत्मा अपने मूल-घर को जान पाती है। सद्गुरु की दया से निःअक्षर नाम जब जीव पाता है तभी 52 अक्षरों से बाहर होकर काल का घर छूटता है। तीन-लोक में समाए काल और चौथे अमरधाम निर्वाण का भेद जाने बिना मनुष्य बैल के समान, गाड़ी में जूड़े से बँधा रहता है। निरंजन ने दस-अवतार रखकर पूरे संसार का रक्षक और भक्षक बना है। वही सबका पालनकर्ता भी है और संहार भी करता है। षट्-दर्शन की साधना और यंत्र-मंत्र-तंत्र, हवन-पूजन, भक्ति मार्ग के योगी, जंगम, सेवड़ा, सन्यासी, दरवेश, ब्राह्मण सभी काल के फंदे में फँसे हैं। शब्द-शब्द में बहुत अन्तर है, सद्गुरु के सार-शब्द को पृथ्वी-आकाश के बाहर अधर में सुरति से मथकर ही विदेह शब्द मिलेगा। सद्गुरु की दया से ही इस विदेह ध्यान और विदेह शब्द की भक्ति सम्भव है।

संत मत में गुरु को परमात्मा से बड़ा कहा है। भक्त को यदि अपने गुरु में पूर्ण विश्वास नहीं होगा तो वह भक्त की श्रेणी में नहीं आ सकता। जब कोई भक्त कष्ट निवारण के लिए अपने सद्गुरु रूपी ईश्वर को छोड़ किसी अन्य की उपासना प्रारम्भ कर दे तो अपने ईष्ट का अपमान ही करता है। कोई ऐसा करता है तो इसलिए कि उसे अपने सद्गुरु पर पूर्ण विश्वास नहीं है। उसके मन में अपने गुरु या ईश्वर के प्रति कोई शंका है। वह अन्य किसी को भी अपने ईष्ट गुरु से बलशाली समझता है। कोई भक्त किसी रोग, हत्या, भूत-प्रेत आदि के कष्ट निवारण के लिए ओझा, यंत्र-तंत्र या देवता की शरण में चला जाए तो इसका एकमात्र अर्थ यही तो है कि उसे अपने सद्गुरु-परमात्मा की शक्ति-सामर्थ्य में विश्वास नहीं है। भक्त को अपने सद्गुरु या ईश्वर की सामर्थ्य पर भरोसा नहीं है कि वो कष्ट का निवारण कर सकेगा। इस प्रकार एक भक्त अपने गुरु या ईश्वर का अपमान करता है, शक्ति और सामर्थ्यहीन मानता है। संतमत में सद्गुरु ही सर्व-समर्थ्यवान है, यही दृढ़ विश्वास गुप्त सच्चे नाम का विदेह ध्यान है। तीन-लोक, त्रिदेव और तैंतीस करोड़ देवताओं से परे ले जाने वाला विदेह-नाम ही सद्गुरु है। 'मन' इसी कारण भक्तों को भिन्न-भिन्न शब्द-नामों में उलझाता है कि आत्मा शरीर से मुक्त न हो।

सद्गुरु-संत मत आडम्बरों और पाखण्ड को भक्ति मार्ग में बाधक बतलाता है। ऐसे तबके जो अंधविश्वास की ओर ले जाते हैं, भक्ति-मार्ग से सम्बन्धित नहीं होते, उनसे समाज को सावधान करते हैं। प्रमुख रूप से ये तबके जो समाज को भ्रम में डालते हैं और भक्ति से विमुख करते हैं पाँच तरह के हैं -

  1. प्रथम तबका उन सयाने-ओझा-पंडों का है जो अंधश्रद्धा फैलाकर भूत-प्रेतों की भक्ति में लगाते हैं। किसी व्यक्ति को या किसी पशु को कोई रोग हो जाए, ये लोग अदृश्य शक्ति, हवा, भूत का प्रकोप बताकर पूजा, बलि आदि करवाते हैं। सयाने-ओझा लोग समाज को परमात्म-भक्ति से दूर कर देते हैं। ये लोग अपनी जीविका चलाने सबको जीवन भर अपने जाल में उलझाए रखते हैं।

  2. दूसरा तबका उन ज्योतिषियों का है जो ज्योतिष विद्या जानते नहीं। ज्योतिष विद्या का सम्बन्ध तो गणित के पढ़े-लिखे विद्वानों से है, लेकिन पेट पालने सैकड़ों तोते रम जाति के नाम पर घूमते रहते हैं। नकली ज्योतिष शास्त्री बनकर लोगों को डरा-धमका कर लूटने में लगे रहते हैं। ज्योतिष विद्या का सम्बंध ध्यान परमात्मा से हटाकर ग्रह-नक्षत्रों आदि की उपासना में लगा देते हैं।

  3. तीसरा तबका तांत्रिकों का है। यह तबका विभिन्न सिद्धियों का हवाला देकर समाज को भ्रमित करता है। सिद्धि और तंत्र-मंत्र की भक्ति को ही परमात्मा की भक्ति बताकर समाज को लूटते हैं। साहिब कबीर ने इनसे सावधान करते हुए कहा -

  4. चौथा तबका देवी-देवताओं के यज्ञ, हवन, कथा, झाँकी के नाम पर समाज को लूटता है। ये भी परमात्म ज्ञान से समाज को भटकाते हैं।

  5. पाँचवाँ तबका जात-पाँत, छूआ-छूत फैलाकर समाज को बाँटता है। जाति के आधार पर भगवान के नाम और मंदिर बनाकर अपने से छोटी जाति के व्यक्तियों को प्रवेश और पूजा से वंचित कर देते हैं। जाति और भगवानों के नाम पर हिंसा फैलाते हैं, कुकर्म कर और उजाड़ कर मानव अधिकारों से वंचित करते हैं।

ये पाँचों तबके समाज को भ्रमित कर परमात्म-भक्ति से दूर गलत राह पर ले जाते हैं। साहिब बन्दगी सत्संग समाज को भ्रमित करने वाले इन तबकों से प्रत्येक व्यक्ति को सावधान करता है। संत-सद्गुरु जीवों के कल्याण हेतु 'नाम' रूपी अमोलक रत्न लेकर अवतरित होते हैं, विदेह नाम-ध्यान में लगाते हैं।

अलग-अलग छोटे-बड़े भगवानों नामों से तो एक बड़ा और दूसरा छोटा भगवान होने की बुद्धि के साथ गुणों में हीनता ही उत्पन्न होगी। सत्, रज, तम तीन गुणों की भक्ति और कर्म संसार में मनुष्य भटक रहा है। एक सत्य 'नाम' ही भवसागर से पार लगाने वाला है। एक 'नाम' और 'ध्यान' की विदेह भक्ति करने वालों को अन्य-अन्य भक्ति करने वाले नास्तिक कह रहे हैं। मैं कहता हूँ जो भिन्न-भिन्न अनेक भगवानों की भक्ति करते हैं, वे सब नास्तिक हैं। क्योंकि अनेकों की पूजा-भक्ति में कहीं विश्वास भाव नहीं होगा, यही नास्तिकता है। आस्तिक का विश्वास तो दृढ़ होगा, उसका एक सत्य और परमात्मा जीव मात्र में समान होगा। आस्तिक सदा अहिंसक रहकर काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार जैसी 'मन' की वृत्तियों पर अंकुश रखेगा।

सैय्यद बुल्लेशाह के गुरु राइयाँ जी कँजड़े थे। बुल्लेशाह ने कहा है -

खाक हो गुरु के चरण में तो तुझे मंजिल मिले। आपा तज गुरु को भजे तब पाये दीदारं॥

हे पगले मन! संसार में तुम्हारा कौन है! जैसे ओस की बूँद मोती समान लगती हैं, पर सूर्य की ताप और हवा से नष्ट हो जाती हैं। ऐसे ही इस शरीर के लिए जितना चाहे खा-पी लो, लेन-देन कर लो, ये सब अधूरा ही रह जाएगा। वो 'आत्मा' तो इस शरीर से न्यारी है, उसके बिना शरीर तो जैसे मिट्टी ही है। चार-दिन की इस जिंदगी में तू साहिब का भजन कर ले। इस माया की गाँठ बाँध कर कहाँ ले जाएगा! अंत समय भाई, बन्धु, कुटुम्ब-कबीला, बेटे-नाती आदि कोई काम नहीं आयेंगे। जीवन रूपी दिन की रात हो जाएगी। मरने पर तुम्हारे ऊपर एक चादर डाल देंगे और चार-लोग मिल तुम्हें उठाकर श्मशान ले जायेंगे। इस सत्य का विचार करो और सद्गुरुवाणी को ग्रहण कर लो।

गुरु धारण करने के बाद यदि मोह समाप्त हो जाए, तन का ताप और पीड़ा मिट जाए, दुःख और सुख की सत्ता भी समाप्त हो जाए; दुःख अधिक कष्ट न दे सके, सुख अधिक प्रसन्नता न दे पाए, तब समझो सच्चा गुरु मिल गया है। ऐसे में तुम स्वयं गुरु रूप हो जाओगे।

संसार के सभी धर्म 'निराकार निरंजन' की भक्ति कर रहे हैं। 'निराकार निरंजन' को हिंदु 'परमात्मा' कह रहे हैं, मुसलमान 'खुदा' कह रहे हैं, ईसाई 'GOD' कहकर सम्बोधित करते हैं, सिक्ख 'वाहेगुरु' कहकर सम्बोधित करते हैं। कबीर साहिब ने ही सर्वप्रथम 'निराकार निरंजन' को 'कालपुरुष' कहकर सम्बोधित किया और उस 'परमपुरुष', परमतत्व का भेद संसार को दिया जिसका रहस्य स्वयं 'कालपुरुष' ने अनादिकाल से संसार के सभी जीवों से छुपाकर रखा ताकि कोई भी जीव अपने सच्चे रक्षक अर्थात् परमपुरुष की प्राप्ति कभी नहीं कर सके। संसार के सभी धर्म भक्षक को ही रक्षक मान रहे हैं।

सुरति में समाया नाम ही वह ईश्वरीय ताकत है जो प्रत्येक मनुष्य के भीतर है। सद्गुरु उस सोई पड़ी ताकत को अपनी सुरति से जगा देते हैं फिर वही शक्ति आजीवन शिष्य की रक्षा करती है। सद्गुरु से प्राप्त 'नाम' की शक्ति के अतिरिक्त शिष्य को किसी भी अवतार, देवी-देवता, तंत्र-मंत्र, तीर्थ-व्रत आदि भक्ति की आवश्यकता नहीं रहती। सद्गुरु भक्ति से सम्पूर्ण भय और संशय समाप्त होकर अंत में मोक्ष प्राप्ति का विश्वास रहता है। यही कारण है कि मुझ से 'नाम' रूपी अद्भुत शक्ति को प्राप्त कर सभी शिष्य अपने साथ हर समय सांसारिक आकर्षणों से मुक्त रहकर सुरक्षित अनुभव करते हैं। वास्तव में यह परमपुरुष के निःअक्षर अनश्वर 'नाम' का ही कमाल है कि हँसात्मा निरंजन की सृष्टि से मुक्त होकर निज अमरधाम जाती है।

साहिब ने कहा कि जो 'नाम' कहने-सुनने में आते हैं, वे सब नश्वर संसार के हैं। क्षर-अक्षर अर्थात् नश्वर भाषा-क्षरों के नामों को छोड़कर निःअक्षर सार-शब्द को सद्गुरु से ग्रहण करो। निःअक्षर गुरु-शब्द पाकर ही भवसागर के पार जाओगे। सद्गुरु के अक्षर शब्द-भेद को नहीं जानने के कारण ही संसार में सब लोग नश्वर कैद में हैं। इस क्षर अर्थात् नश्वर के झमेले में पड़कर सब सिद्ध और साधु, बार-बार जन्म-मरण का गर्भ भोगते रहते हैं। निःअक्षर अर्थात् कहने-सुनने-पढ़ने से परे 'नाम' को जाने बिना सभी काल के घेरे में रहते हैं। साहिब कबीर कह रहे हैं कि सद्गुरु से साँचे-शब्द की पहचान करो।

त्रिलोकीनाथ निरंजन की इस दुनिया में मनुष्य देह पाकर सब दिन एक-जैसे नहीं रहते। किसी दिन रूखा-सूखा मिल सकता है तो किसी दिन दूध-मलाई मिल सकती है। किसी दिन पत्ते आदि खाने पड़ सकते हैं तो किसी दिन पर्वत पर कंद-मूल-फल मिल सकते हैं। किसी दिन कुछ भी नहीं मिलता है। किसी दिन फटे-पुराने कपड़े पहनने पड़ सकते हैं। चौरासी लाख योनियों का खेल देख लो; मनुष्य योनी में कभी ऊँचे घर में तो कभी नीचे घर में जन्म लेना पड़ सकता है। कभी देवी-देवल मंदिर, मस्जिद, बाग-बगीचा मिलता है तो कभी मैदान में रहना पड़ता है। इसलिए संसार की आशा को त्याग कर आत्मा के घर अमरलोक का विचार करो और सद्गुरु 'नाम' का सहारा लो।

अकह-निःअक्षर-अनश्वर परमपुरुष 'नाम' ही सद्गुरु-शब्द हैअनश्वर-चेतन-अमूल-सहज-आनन्दमयी पाँच वृत्तियुक्त आत्मा ही देह की मूल शक्ति है। शास्त्र भी आत्मा का यही स्वरूप कहते हैं। ऐसी आत्मा उसके जैसे ही गुण-वृत्तियों वाले 'नाम' को सद्गुरु रूप ग्रहण करती है। इन गुणों से युक्त 'सुरति' का स्वामी ही सद्गुरु है, जिसे पाकर 'आत्मा' शरीर के बंधनों को जानकर अपने स्वरूप को पहचानती है। परमात्म-रूप शक्ति युक्त 'आत्मा' सत्य शब्द पाकर मन रूप निरंजन के छल-कपट को जान जाती है। शरीरों के बंधन में काल-निरंजन की ठुकराई मानने वाली आत्मा, सद्गुरु-सुरति-शब्द पाने के अवसर से ही तो वंचित रखी गई है। यही जन्म-जन्मांतर का रहस्य है।

साहिब कह रहे हैं दुनिया के लोगों का ध्यान तो उल्टा है। सब मुँह और खान-पान के ध्यान में मग्न हैं। नारी और पुरुष दोनों एक-दूसरे से हैं किन्तु दोनों ही एक-दूसरे को स्पर्श करने और देखने में मग्न हैं। नारी रात-दिन पुरुष का ध्यान करती है और पुरुष नारी के रूप-सौन्दर्य का ध्यान करता है। साहिब कह रहे हैं इस तरह सभी जीव जगत में उलझे रहकर गर्भवास के चक्र में फँसे हैं।

निशदिन आठों पहर सुमिरन की विधि मैंने शिष्य भक्तों को दी है, उस पर ध्यान रखें। आकाश से पवन नासिका द्वारा नाभि तक आकर पुनः बाहर निकल जाती है। यही पवन नाभि से दस-प्रकार अंगों में समाकर 'निरत' रूप शरीर की शक्ति है। इसी निरत-पवन में सुरति भी उलझकर मन के निर्देशन में दिमाग तक आ-जा रही है। पवन रूप-निरत को नाभि में जाने से रोक कर ऊर्ध्वगति देना है, ऊपर ले जाकर नासिका से सीधी बाहर करना है। इस तरह निरति से सुरति के मिलन का मार्ग नासिका के इङ्गला-पिङ्गला द्वार से होगा। जब आप इस गुरु-आज्ञा का ध्यानपूर्वक पालन करते रहेंगे तो सुरति का निरति से मिलन होकर सुषुम्ना नाड़ी की बंद-गाँठें खुलेंगी। यही वो बंद-दरवाजा है जिसके ऊपर दशमद्वार पर निरंजन ने त्रिलोकों से परे जाने का ग्यारहवाँ द्वार रोक रखा है। सुरति-निरति के मिलन से ये दोनों एक होकर बड़ी शक्ति बनकर सुषुम्ना की टेढ़े-मेढ़े मार्ग में प्रवेश करती हैं। यही त्रिवेणी संगम है गंगा-जमुना और सरस्वती का। इसी संगम के घेरे के प्रवाह से मन रूप निरंजन को 'नाम' रूप सद्गुरु-शब्द शक्ति पकड़ती है। 'मन' की पाँचों शक्ति स्वरूप वृत्तियाँ काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार नामी गुरुमुख के पकड़ में आ जाती हैं। मन की 25 प्रवृत्तियों की ममता-माई भी वश में आ जाती है। इस विधि से सद्गुरु 'नाम' की शक्ति से दशम द्वार पर विजय प्राप्त होती है। अर्थात् सद्गुरु सुरति के साथ शिष्य की सुरति को पाकर 'सर्वशक्तिमान' मन का वश नहीं चलता और भक्त शीश से ऊपर अधर में चढ़कर अभय पाता है। साहिब कहते हैं -

बिना सद्गुरु कृपा और सुमिरन किए कुछ नहीं होगा, गुरु-आज्ञा पर ध्यान लगाए रखना होगा। बावन अक्षरों में आने वाले नामों को छोड़कर निःअक्षर-अकह 'नाम' का ध्यान ही सद्गुरु सुरति से मिलन है। इस 'नाम' को पण्डित और मसालची दोनों नहीं देख सकते। यही 'नाम' आत्मरूप दर्शन है। जो किताबों के शब्द-अक्षरों से दूसरों को रौशनी दिखाते हैं, वे स्वयं ही अँधेरे में हैं। दुनिया के पंडित खुद ही कर्म के भ्रमों में उलझे हुए पेट के धंधों में व्यस्त हैं।

सद्गुरु-शब्द से अमरपद प्राप्त होगा जो जीव और ब्रह्म से परे मोक्ष ध्यान-सुमिरन से गुरु-ऊर्जा हृदय को प्रकाशित करती है। यदि घर का मालिक जाग रहा हो तो चोर मकान में सेंध नहीं लगा सकता। 'बाणपति जागसी, काह करे तसकरा।' हमेशा सुरति में रहना, चेतन रहना, चुपचाप बैठकर देखना कि मन क्या कर रहा है। मन अचेतन अवस्था पसंद करता है, परेशान करेगा, थकान अनुभव कराएगा। मन को ऊब होती है। मन हर पल बहाए ले जा रहा है; कहीं कल्पनाओं में, कहीं इच्छाओं में। आत्मा के बिना मन कुछ नहीं कर सकता, इसलिए किसी ध्यान में एकाग्र नहीं होने देता। चित्त भी आत्मा के सहयोग के बिना कुछ याद करने में सक्षम नहीं है। जब मन के चारों रूपों - मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार से हरकत नहीं करने दोगे तो उसे काबू करना मुश्किल नहीं है। मन की क्रिया स्वाभाविक नहीं है, आत्मशक्ति लेकर ही कर पाता है। श्वांसा खुद नहीं चल रही, आप ले रहे हैं, लेने के लिए एक क्रिया कर रहे हैं। वो कोई चेतन है जो आँखों के पीछे बैठ श्वाँस ले रहा है। आप गुरु को समर्पित होंगे, सुमिरन में रहेंगे, तब ही मन नियंत्रण में रहेगा। मन को पकड़ना है, उसे ही मारना है। इसे ही कहते हैं 'मैं' को मारना। जब 'मैं' मर गई तो समझो मन मर गया। मन को मारकर ही तो इसकी दुनिया के तीन-लोक से बाहर आत्मा के मूल लोक जाना है। इसलिए कहा -

चिंता तो गुरु नाम की, और न चितवे दास। जो कछु चितवे नाम बिन, सोई काल की फाँस॥

यह मनुष्य तन दुर्लभ है, इसको पाने देवता भी तरसते हैं, क्योंकि इसमें भोग भी है, कर्म भी है, अवनति भी है, उन्नति भी है, अर्थात् भोग और कर्म के फल की प्राप्ति होती है। केवल मनुष्य देह में रहकर ही आत्म-मोक्ष की भक्ति अर्थात् सद्गुरु से सत्य-नाम मिलना सम्भव है। यदि मनुष्य तन पाकर भी आत्म-कल्याण का मार्ग नहीं जाना तो व्यर्थ ही मनुष्य-जन्म गँवा दिया। बच्चे तो पशुओं के भी हैं; भोग-वासना-मैथुन क्रिया तो वे भी करते हैं। पशु भी सोते हैं, भोजन के लिए प्रयास भी करते हैं। फिर मनुष्य श्रेष्ठ कैसे हुआ! मनुष्य बुद्धि-विवेक का उपयोग करके संसार की असारता का रहस्य न जाना, मुक्ति मार्ग की भक्ति, परमात्म प्राप्ति नहीं जाना तो जानवरों से बेहतर नहीं है।

मनुष्य संसार में कर्म और भोग इन्द्रियों के मजे में मतवाला रहता है। काल हर समय सिर पर मंडरा रहा है, वो कभी भी मार-पछाड़ सकता है। मरते समय परिवार, कुटुम्ब, सगे-सम्बंधी काम नहीं आयेंगे और यम-दूत के जूते ही खाने पड़ेंगे। संसारी जीव दो दिन के तमाशे को देख कर फूला-फूला फिर रहा है, कभी हार नहीं मानता। अज्ञान से भरा मनुष्य बहस भी बहुत करता है, पर याद रखो, मरने पर कोई खोजना चाहेगा तो भी ढूँढ नहीं पायेगा कि कहाँ गए। तुलसी साहिब हाथरस वाले की वाणी है -

संसार-सृष्टि के समस्त तत्व और प्रकृति का किसी न किसी प्रकार से देह-भाव है। ज्ञान के कोटि-शब्द जो दुनिया में बोले गए उन सबसे अलग है विदेह निःतत्व शब्द जो बिना जिभ्या से बोले ही जाप में समाता है। सद्गुरु के सार-शब्द से जीव भवसागर से पार हो जाता है। काल का जोर जीव पर नहीं चल पाता। क्षर-अक्षर सब माया है, सद्गुरु निःअक्षर समझाते हैं। जगत में तो अक्षर-ब्रह्म का ही गुणगान है, कोई निःअक्षर के मर्म को नहीं जानता। सार-शब्द का भेद पाए बिना कोई भी अमरलोक नहीं जा सकता, मोक्ष नहीं मिलेगा। सद्गुरु का सार-शब्द सत्यलोक में ही समाया है जो जन्म-मरण के आवागमन को नष्ट कर देता है। जीव-शरीर में आने-जाने का बीज ही शब्द के सुरति में समाने से नष्ट हो जाता है। हमारे शीश और शून्य (आकाश) के मध्य अधर में शब्द-तत्व का वास रहता है जो निरंजन के लोक दशम द्वार से बाहर है। जब उस अधर में जीव का वास हो जाता है तब काल-कसाई की सीमा से बाहर हो जाता है।

जो सुरति (ध्यान) से जिसको पाता है, उसी का रूप हो जाता है। श्री विष्णु ने अलख-निरंजन का मन से ध्यान लगाया तो छाया रूप देखकर विष्णु का मन मग्न हो गया। इस प्रकार श्री विष्णु सुरति से मन (निरंजन) की छवि को पाकर उसी का तद्रूप हो गए। ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सनकादि सभी ने अलख-निरंजन की इसी लीला-भक्ति को चित्त में समाकर शून्य में समाधि लगाई। शून्य की ऐसी ध्यान समाधि से ज्ञान कहा और ज्योतिस्वरूप में दृढ़ता पाई, पर ज्योतिस्वरूप का मर्म नहीं पाया। ज्योतिस्वरूप निरंजन ने ही मीन रूप अवतार लिया, वराह रूप अवतार लिया, नरसिंह रूप धरा, वामन अवतार लिया। परशुराम होकर क्षत्रियों का संहार किया। राम रूप होकर रावण को मारा। कृष्ण रूप हो कंस का संहार किया। बौद्ध रूप में जगन्नाथ अवतार लिया। इस प्रकार विविध भाँति संसार में लीलाएँ करने देह धारण कर व्याप्त है। इसी काल की साधना का जाप योगी और वियोगी करते रहे, भेद किसी ने नहीं जाना। सार-शब्द का भेद पाए बिना सभी नेति-नेति कहकर रह गए। पाँच-तत्व और तीन गुणों से न्यारे निःतत्व भेद को कोई नहीं पा सका। निःअक्षर मर्म को जानकर निःतत्व हँस ही परमलोक में जाता है। साहिब वाणी है -

निःतत्व भेद जो गुप्त है, पाँच तीन से न्यारा। निःतत्व जो हँस है, जाय पुरुष दरबार॥

जिस, परमपिता, आनंदमयी लोक का विदेह 'नाम' और विदेह 'ध्यान' साहिब ने कहा; वह तो हमारी सुरति में ही समाया है। 'जीवात्मा' का गुण-तत्व स्वयं वही परमात्मा है, जिसे कुछ भी खाने-पीने की ज़रूरत नहीं है। वो कभी मरता नहीं है और जन्म भी नहीं लेता। उसकी कोई जाति-गोत्र-वर्ण नहीं है। वो तो सदा अखंडित, अगम, अपार और अवर्णनीय है। वह न भूमि है, न आकाश, न सूरज-चाँद और प्रकाश है। उस साहिब (परमपुरुष) न तो रघुपति बने न ही अहिरावण। न वह दशअवतार धरै, न उसने सृष्टि रूप माया और पाँच-तत्व, तीन गुण निर्मित किए। साहिब ही सगुण-निर्गुण सृष्टि की रचना और विस्तार करने वाले हैं। सात महाशून्य तक निरंजन की सृष्टि का निर्गुण विस्तार साहिब ने बताया। इन्हीं तक निरंजन सृष्टि में हमारी सुरति समाई है। इस प्रकार सात-पाताल, सात ही शून्य आकाश और सात-महाशून्य (अंधकारमय अज्ञात) इन इक्कीस ब्रह्माण्डों तक काल-निरंजन का ही ज्ञान है।

सात शून्य सातहि कमल, सात सात पाताल। इक्कीस ब्रह्माण्ड लग, केवल निरंजन काल॥ अक्षर होय नि:अक्षर गहे, जीव सुरति अक्षरराज के देश। निःअक्षर अक्षय डर चढ़ जाय, उपदेश॥

बावन अक्षरों में आने वाले शब्दों का आधार तो जिभ्या है, पर आदि-अक्षर जिभ्या से न्यारा है। उस आदि अक्षर को सद्गुरु से ही पाया जा सकता है; पूर्ण गुरु ही उस शब्द को देने में समर्थ है। जो मनुष्य बावन अक्षरों में आने वाले नामों की भक्ति के फेर में है, वह मनुष्य काल के चेले ही हैं। चार वेदों से अक्षरों की रचना हुई है और छ: शास्त्रों से 52 अक्षर बने हैं। अठारह पुराण और भागवत गीता ने बावन अक्षरों को सब पर प्रकट किया है। इन बावन-अक्षरों से बँधी डोर टूटने पर सहज ही काल का वचन छूट जाएगा

यह ब्रह्माण्ड काल निरंजन की रचना है, उसका घर है। साहिब कह रहे हैं कि जब से 'तीन लोक' बने हैं तब से सभी जीव 'काल' को ही 'परमात्मा' मानकर भज रहे हैं। कोई भी सच्चे परमात्मा [परमपुरुष] की भक्ति नहीं करता न ही उसकी जानकारी है। सभी 'काल' [मन/निरंजन] के शिंकजे में ही जकड़े रह गए। परमात्मा के गुप्त अमरलोक को कोई भी प्राप्त नहीं कर पाया जो हँसात्मा का घर है। निरंजन ने तीन-लोक में किसी को भी परमपुरुष के मूल रूप का, मूल ठिकाने का भेद नहीं दिया। काल निरंजन ने सभी जीवों को 'मृत्यु' का भय देकर अपनी 'माया' में उलझाया है। मृत्यु का भय ब्रह्माण्ड के हरेक लोक-लोकान्तर में अपना ताण्डव दिखा रहा है। सब देवों के प्रधान त्रिदेवों से लेकर एक साधारण जीव तक सभी 'काल' की पकड़ और मार के दायरे में हैं।

'हँस स्वरूप' आत्मा इस प्रकार 'मन' में समाई है जैसे दूध में पानी। कोई कितनी भी चेष्टा कर ले कि दूध और पानी को किसी साधन द्वारा अलग कर दे, कभी नहीं कर पाएगा। सद्गुरु की कृपा के बिना 'आत्मा' कभी भी खुद को 'मन' से अलग नहीं कर सकती है, चाहे कितना भी प्रयत्न कर ले।

आत्मा को केवल एक पूर्ण 'सद्गुरु' ही छुड़ा सकता है इस 'मन' से और माया के बंधनों से; दूसरा कोई ईष्ट/देव नहीं छुड़ा सकता। क्योंकि एक पूर्ण सद्गुरु ही जानता है कि आत्मा का मूल ठिकाना कहाँ है और मन-माया के बंधन में कैसे फँसी है। साहिब ने चेताया है कि यदि आत्मा के मूल घर को जानना चाहते हो, उसे पाना चाहते हो तो अपनी 'मैं' को मिटाकर एक सच्चे 'सद्गुरु' की शरण प्राप्त कर लो। एक सद्गुरु ही तुम्हारी सुरति को उस मूलधाम का भेद दिखाकर आत्मा को वहाँ पहुँचा सकते हैं। जितने भी साधन तुमने 'परमात्मा' की प्राप्ति के लिए अपना रखे हैं, वो सब झूठे हैं, मन द्वारा प्रेरित हैं।

मैंने अपने शिष्यों को सांसारिक आसक्ति से छुड़ा दिया; मन पर 'नाम' की नकेल लगा दी, आत्मा को चेतन कर दिया; आत्मा 'मन' की तरंगों को पढ़ने लग गई। सुरति को मन और माया के दायरे से निकाल कर परमपुरुष की सुरति के साथ जोड़ दिया। काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार को एक सीमित दायरे में बाँध दिया; अब आत्मा 'मन' की प्रेरणा से नहीं सद्गुरु सुरति से कर्मों को पहचानेगी।

काल की दुनिया के भ्रमजाल में फँसे कोई बड़े भाग्यवान ही पुण्यों के संचय से सन्त-मत को जानकर गुप्त 'नाम' पाते हैं। सद्गुरु के सच्चे शब्द को पाकर ही आत्मा अपने मूल-घर को जान पाती है। सद्गुरु की दया से निःअक्षर नाम जब जीव पाता है तभी 52 अक्षरों से बाहर होकर काल का घर छूटता है। तीन-लोक में समाए काल और चौथे अमरधाम निर्वाण का भेद जाने बिना मनुष्य बैल के समान, गाड़ी में जूड़े से बँधा रहता है। निरंजन ने दस-अवतार रखकर पूरे संसार का रक्षक और भक्षक बना है। वही सबका पालनकर्ता भी है और संहार भी करता है। षट्-दर्शन की साधना और यंत्र-मंत्र-तंत्र, हवन-पूजन, भक्ति मार्ग के योगी, जंगम, सेवड़ा, सन्यासी, दरवेश, ब्राह्मण सभी काल के फंदे में फँसे हैं। शब्द-शब्द में बहुत अन्तर है, सद्गुरु के सार-शब्द को पृथ्वी-आकाश के बाहर अधर में सुरति से मथकर ही विदेह शब्द मिलेगा। सद्गुरु की दया से ही इस विदेह ध्यान और विदेह शब्द की भक्ति सम्भव है।

संत मत में गुरु को परमात्मा से बड़ा कहा है। भक्त को यदि अपने गुरु में पूर्ण विश्वास नहीं होगा तो वह भक्त की श्रेणी में नहीं आ सकता। जब कोई भक्त कष्ट निवारण के लिए अपने सद्गुरु रूपी ईश्वर को छोड़ किसी अन्य की उपासना प्रारम्भ कर दे तो अपने ईष्ट का अपमान ही करता है। कोई ऐसा करता है तो इसलिए कि उसे अपने सद्गुरु पर पूर्ण विश्वास नहीं है। उसके मन में अपने गुरु या ईश्वर के प्रति कोई शंका है। वह अन्य किसी को भी अपने ईष्ट गुरु से बलशाली समझता है। कोई भक्त किसी रोग, हत्या, भूत-प्रेत आदि के कष्ट निवारण के लिए ओझा, यंत्र-तंत्र या देवता की शरण में चला जाए तो इसका एकमात्र अर्थ यही तो है कि उसे अपने सद्गुरु-परमात्मा की शक्ति-सामर्थ्य में विश्वास नहीं है। भक्त को अपने सद्गुरु या ईश्वर की सामर्थ्य पर भरोसा नहीं है कि वो कष्ट का निवारण कर सकेगा। इस प्रकार एक भक्त अपने गुरु या ईश्वर का अपमान करता है, शक्ति और सामर्थ्यहीन मानता है। संतमत में सद्गुरु ही सर्व-समर्थ्यवान है, यही दृढ़ विश्वास गुप्त सच्चे नाम का विदेह ध्यान है। तीन-लोक, त्रिदेव और तैंतीस करोड़ देवताओं से परे ले जाने वाला विदेह-नाम ही सद्गुरु है। 'मन' इसी कारण भक्तों को भिन्न-भिन्न शब्द-नामों में उलझाता है कि आत्मा शरीर से मुक्त न हो।

सद्गुरु-संत मत आडम्बरों और पाखण्ड को भक्ति मार्ग में बाधक बतलाता है। ऐसे तबके जो अंधविश्वास की ओर ले जाते हैं, भक्ति-मार्ग से सम्बन्धित नहीं होते, उनसे समाज को सावधान करते हैं। प्रमुख रूप से ये तबके जो समाज को भ्रम में डालते हैं और भक्ति से विमुख करते हैं पाँच तरह के हैं -

  1. प्रथम तबका उन सयाने-ओझा-पंडों का है जो अंधश्रद्धा फैलाकर भूत-प्रेतों की भक्ति में लगाते हैं। किसी व्यक्ति को या किसी पशु को कोई रोग हो जाए, ये लोग अदृश्य शक्ति, हवा, भूत का प्रकोप बताकर पूजा, बलि आदि करवाते हैं। सयाने-ओझा लोग समाज को परमात्म-भक्ति से दूर कर देते हैं। ये लोग अपनी जीविका चलाने सबको जीवन भर अपने जाल में उलझाए रखते हैं।

  2. दूसरा तबका उन ज्योतिषियों का है जो ज्योतिष विद्या जानते नहीं। ज्योतिष विद्या का सम्बन्ध तो गणित के पढ़े-लिखे विद्वानों से है, लेकिन पेट पालने सैकड़ों तोते रम जाति के नाम पर घूमते रहते हैं। नकली ज्योतिष शास्त्री बनकर लोगों को डरा-धमका कर लूटने में लगे रहते हैं। ज्योतिष विद्या का सम्बंध ध्यान परमात्मा से हटाकर ग्रह-नक्षत्रों आदि की उपासना में लगा देते हैं।

  3. तीसरा तबका तांत्रिकों का है। यह तबका विभिन्न सिद्धियों का हवाला देकर समाज को भ्रमित करता है। सिद्धि और तंत्र-मंत्र की भक्ति को ही परमात्मा की भक्ति बताकर समाज को लूटते हैं। साहिब कबीर ने इनसे सावधान करते हुए कहा -

  4. चौथा तबका देवी-देवताओं के यज्ञ, हवन, कथा, झाँकी के नाम पर समाज को लूटता है। ये भी परमात्म ज्ञान से समाज को भटकाते हैं।

  5. पाँचवाँ तबका जात-पाँत, छूआ-छूत फैलाकर समाज को बाँटता है। जाति के आधार पर भगवान के नाम और मंदिर बनाकर अपने से छोटी जाति के व्यक्तियों को प्रवेश और पूजा से वंचित कर देते हैं। जाति और भगवानों के नाम पर हिंसा फैलाते हैं, कुकर्म कर और उजाड़ कर मानव अधिकारों से वंचित करते हैं।

ये पाँचों तबके समाज को भ्रमित कर परमात्म-भक्ति से दूर गलत राह पर ले जाते हैं। साहिब बन्दगी सत्संग समाज को भ्रमित करने वाले इन तबकों से प्रत्येक व्यक्ति को सावधान करता है। संत-सद्गुरु जीवों के कल्याण हेतु 'नाम' रूपी अमोलक रत्न लेकर अवतरित होते हैं, विदेह नाम-ध्यान में लगाते हैं।

अलग-अलग छोटे-बड़े भगवानों नामों से तो एक बड़ा और दूसरा छोटा भगवान होने की बुद्धि के साथ गुणों में हीनता ही उत्पन्न होगी। सत्, रज, तम तीन गुणों की भक्ति और कर्म संसार में मनुष्य भटक रहा है। एक सत्य 'नाम' ही भवसागर से पार लगाने वाला है। एक 'नाम' और 'ध्यान' की विदेह भक्ति करने वालों को अन्य-अन्य भक्ति करने वाले नास्तिक कह रहे हैं। मैं कहता हूँ जो भिन्न-भिन्न अनेक भगवानों की भक्ति करते हैं, वे सब नास्तिक हैं। क्योंकि अनेकों की पूजा-भक्ति में कहीं विश्वास भाव नहीं होगा, यही नास्तिकता है। आस्तिक का विश्वास तो दृढ़ होगा, उसका एक सत्य और परमात्मा जीव मात्र में समान होगा। आस्तिक सदा अहिंसक रहकर काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार जैसी 'मन' की वृत्तियों पर अंकुश रखेगा।

सैय्यद बुल्लेशाह के गुरु राइयाँ जी कँजड़े थे। बुल्लेशाह ने कहा है -

खाक हो गुरु के चरण में तो तुझे मंजिल मिले। आपा तज गुरु को भजे तब पाये दीदारं॥

हे पगले मन! संसार में तुम्हारा कौन है! जैसे ओस की बूँद मोती समान लगती हैं, पर सूर्य की ताप और हवा से नष्ट हो जाती हैं। ऐसे ही इस शरीर के लिए जितना चाहे खा-पी लो, लेन-देन कर लो, ये सब अधूरा ही रह जाएगा। वो 'आत्मा' तो इस शरीर से न्यारी है, उसके बिना शरीर तो जैसे मिट्टी ही है। चार-दिन की इस जिंदगी में तू साहिब का भजन कर ले। इस माया की गाँठ बाँध कर कहाँ ले जाएगा! अंत समय भाई, बन्धु, कुटुम्ब-कबीला, बेटे-नाती आदि कोई काम नहीं आयेंगे। जीवन रूपी दिन की रात हो जाएगी। मरने पर तुम्हारे ऊपर एक चादर डाल देंगे और चार-लोग मिल तुम्हें उठाकर श्मशान ले जायेंगे। इस सत्य का विचार करो और सद्गुरुवाणी को ग्रहण कर लो।

गुरु धारण करने के बाद यदि मोह समाप्त हो जाए, तन का ताप और पीड़ा मिट जाए, दुःख और सुख की सत्ता भी समाप्त हो जाए; दुःख अधिक कष्ट न दे सके, सुख अधिक प्रसन्नता न दे पाए, तब समझो सच्चा गुरु मिल गया है। ऐसे में तुम स्वयं गुरु रूप हो जाओगे।

इस संसार को किसी भी 'महापुरुष' और विद्वान ने 'सुखों का सागर' नहीं कहा। सभी ने संसार को 'दुःखों का सागर / भवसागर / दुःखों का घर' ही कहा। दुःख क्यों? दुःख कैसा?

पहला दुःख यह है कि इस संसार में सभी जीव जन्म-मरण के कालचक्र में फँसे हुए हैं। शरीर धारण करना अपने आप में बहुत बड़ा दुःख है। शरीरधारी कभी भी सम्पूर्ण सुख की आशा नहीं कर सकता, क्योंकि शरीर स्वयं एक बंधन है, जिसमें हर एक जीव बंधा है।

दूसरा दुःख यह कि पंच भौतिक शरीर रोगों का घर है। चाहे कोई कितना भी धनवान हो, कितना भी बलवान हो, रोगों की मार से नहीं बच सकता।

तीसरा दुःख यह कि इस संसार में सभी रिश्ते शरीर के कारण ही हैं। जो भी रिश्ता शरीर से जुड़ा है, एक दिन उसे खत्म होना ही है, क्योंकि शरीर स्वयं एक नाशवान चीज है।

चौथा दुःख यह कि इस संसार में हर एक शरीरधारी जीव कर्मों का फल भोग रहा है। साहिब कह रहे हैं कि जीवन रहते एक सच्चे सद्गुरु की शरण पाकर हमेशा के लिए इस भवसागर से पार उतर जाओ, इस दुःखों के घर से बाहर हो जाओ, ताकि दोबारा फिर कभी भी इन दुःखों को नहीं भोगना पड़े।

सद्गुरु की शरण पाकर भी जीव यदि कोई नया यत्न करता है तो वह मिथ्या शरणागत है। ऐसे यत्न करने वाले झूठे शरणागत की राह, फिर से यमदूत रोक लेते हैं। जो केवल सद्गुरु शरण में विश्वास रखता है, उसे कोई युक्ति और प्रयत्न करना शेष नहीं रहता। इसलिए सद्गुरु में पूर्ण समर्पण सर्वोपरि है; यही शरण पकड़कर जीव पलभर में काल के पंजे से छूट जाता है और पार होता है।

मनुष्य को अज्ञान और अंधकार में रखने वाली ताकत 'परमपुरुष' नहीं है बल्कि 'मन' है। मन ने मनुष्य को केवल इतनी ही सोच, समझ और बोध दिया है कि हर व्यक्ति पूरे जीवन यही सोचकर जिये कि जो कुछ हो रहा है भगवान ने किया है। कि सभी जीवों का सृजन भगवान ने किया है, भगवान ने ही आत्मा को अलग-अलग जीव-शरीरों में डाला है। कि भगवान ही इस संसार को बनाता-चलाता-मिटाता है और भगवान की मर्जी के बिना कोई कुछ नहीं कर सकता। कि भगवान संसार के कण-कण में बसता है, धर्मों की रचना भगवान ने की है, सब भगवान का ही स्वरूप हैं। कि केवल कर्म करो, 'फल' की चिंता मत करो क्योंकि भगवान ने ही करम का विधान बनाया है, भगवान ने ही मनुष्य को बनाया है, वही कर्म करवा रहा है। कि भगवान ही अवतार धारण करके धरती पर आते हैं, 'पाप' और 'पापियों' का विनाश करते हैं। कि जीवन और मृत्यु का खेल भगवान ने बनाया है; जीवन और मृत्यु भगवान के हाथों में है आदि; सभी सोच 'मन' ही की रचना है ताकि मनुष्य 'आत्मा' के प्रति निश्चिंत होकर अपना जीवन अज्ञान और 'अंधकार' में व्यतीत करे। यही सोच पूरा जीवन उसके 'दिल' और दिमाग में बनी रहे कि जीवों का संचालन स्वयं भगवान कर रहे हैं। जब भी कोई मनुष्य 'मन' को समझने की, जानने की कोशिश करता है, चिन्ता करता है तो 'मन' उसी पल जीव को भ्रमित करके उसकी बुद्धि पलट देता है और उसे अन्दर से संसार में रमने के लिए प्रेरित करता है ताकि जीवात्मा उसका (मन का) भेद न जान पाए।

मनुष्य को हर उस वस्तु का घमंड है जो नाशवान है। जब तक मनुष्य को नाशवान वस्तुओं का घमंड है, तब तक उसे किसी भी कीमत पर उस 'परमतत्व' का बोध नहीं होगा, जो घमंड की सीमा से बाहर है। जहाँ तक भी घमंड है, वहाँ तक अज्ञान है, अंधकार है, मन है, माया है, सृष्टि है और विनाश है। पैदा होने से लेकर मृत्यु होने तक मनुष्य अज्ञानवश हर एक 'कर्म' स्वयं को बाँधने के लिए कर रहा है। सबसे बड़ा कौतुक यही है कि 'मृत्युलोक' में रहने वाला प्रत्येक मनुष्य यही मानकर 'कर्म' कर रहा है कि वह पूर्ण रूप से 'आज़ाद' है और उसका संचालन स्वयं 'परमात्मा' कर रहा है। सच्चाई मनुष्य की इस मान्यता, इस सोच के बिल्कुल उलट है। मनुष्य बहुत बुरी तरह से बाँधा हुआ है और उसका संचालन एक क्रूर और शैतानी ताकत कर रही है; उसी ताकत को साहिब कबीर ने 'कालपुरुष' कहा। संत पलटू साहिब कह रहे हैं इस कर्म-बंधन से स्वयं को छुड़ाने और मन को वश में करने सद्गुरु शरण पाकर अज्ञान/अंधकार से निकल जाओ।

अर्थात्, जब सद्गुरु रूपी प्रियतम मिल जाए तो मन को पीसकर इतना महीन कर लो कि संसार का लालच न रहे। मन की इच्छाएँ दब जाएँ, मन का अनुसरण करना बंद हो जाए। सद्गुरु शरण पाकर अपनी मान-बड़ाई की चाह नहीं रहे बल्कि सबसे छोटा, नन्हा-सहज बन कर रहना। आगे निकलने की चाह छोड़कर, बड़ी-बड़ी बातें भी नहीं करना। अहं-घमंड खोकर, खाक में मिलकर रहना। यदि कोई गाली भी दे जाए तो चुपचाप क्षमा कर देना, बदल में कुछ न कहना। दूसरे की तारीफ़ करके अपने को सबसे छोटा ही समझना और दोनों हाथ जोड़कर सबको प्रणाम करना। ऐसे मनुष्य जीवात्मा के सिर पर भक्ति रूपी हीरे की चमक दिखाई देती है।

जिन लोगों ने निराकार भक्ति में संसार की बाहरी माया अर्थात् भौतिक संसार को त्याग कर अपने अन्दर गोता लगाया, 'मन' ने उन्हें अन्दर की 'माया' में उलझा दिया। किसी को भी अपने मूल स्वरूप तक पहुँचने नहीं दिया, सबको भटका दिया। कोई कुण्डलिनी में उलझ गया, कोई तीसरे तिल में उलझ गया, कोई भृकुटी में उलझ गया, कोई त्रिकुटी में उलझ गया, कोई अनहद-धुनों में उलझ गया, तो कोई ज्योति में उलझ गया। कोई प्रकाश में उलझ गया, कोई सात-चक्रों में उलझ गया, तो कोई दशमद्वार में उलझ गया। कोई 'ओम्' में उलझ गया, कोई सोहंग में उलझ गया, कोई 'ज्योति-निरंजन' में उलझ गया, कोई 'सत्' में उलझ गया तो कोई 'र-रंकार' में उलझ गया। कोई सिद्धि-शक्तियों में उलझ गया। 'मन' ने सभी को भ्रमित करके कहीं-न-कहीं उलझा दिया। एक भी जीव अपने 'सत्यस्वरूप' की प्राप्ति नहीं कर सका, सच्चे विदेह-शब्द अर्थात् 'नाम' के भेद को नहीं जान पाया और 'माया' से नहीं निकल पायासाहिब कबीर ने सद्गुरु से प्राप्त 'नाम' द्वारा सहज-योग से शून्य को भेदने का ध्यान बताया।

दुनिया वाले सिर्फ बोलते हुए घूम रहे हैं 'सबका मालिक एक'; लेकिन एक भी आदमी को अपने उस 'एक मालिक' - सच्चे मालिक की खबर नहीं है, उसके सच्चे घर का पता नहीं है। सभी ने उस एक को छोड़कर अपनी-अपनी समझ, अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार 'अनेक मालिक' बना लिए हैं। क्योंकि वो 'एक' को न तो 'माया' (कर्म-ज्ञानेन्द्रियों) द्वारा प्राप्त किया जा सकता है और न ही 'मन' (मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार) द्वारा। अनादि काल से यह संसार भिन्न-भिन्न नाम देकर भ्रम में अन्दर-बाहर भटक रहा है। कबीर साहिब कह रहे हैं कि 'जीवात्मा' को अपने उस 'एक' सच्चे मालिक की प्राप्ति बिना 'सद्गुरु' के कभी भी नहीं होगी, चाहे कितना भी भटक ले। कोई उसे 'ओम' मान रहा है तो कोई रहीम-करीम-कृष्ण मान रहा है। कोई जीसस मान रहा है तो कोई शक्ति-महावीर और 'बुद्ध' मान रहा है। कोई कितना भी खोज ले, उस 'एक' की खबर और ठिकाना सिर्फ एक सच्चे 'सद्गुरु' के पास ही मिलेगा। जब तक एक सच्चा और 'पूर्ण गुरु' जीव के 'मन' पर 'नाम' की नकेल नहीं लगा देता तब तक 'मन' और मन की वृत्तियाँ - काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार किसी भी कीमत पर काबू में नहीं आ सकतीं।

साहिब ने चेताया कि जो मनुष्य सच्चे हृदय से अपना सब कुछ (तन-मन-धन) एक सच्चे और पूर्ण गुरु को सौंप देता है, उस जीवात्मा का कर्ता फिर स्वयं 'साहिब' (परमपुरुष) हो जाता है। ऐसे जीव का कार्य 'साहिब' स्वयं ही करते चलते हैं, और ऐसा जीव सभी चिंताओं से मुक्त होकर हमेशा 'गुरु चरणों' में रहकर आत्मानंद प्राप्त करता है। यह संसार 'कालपुरुष' की भक्ति कर रहा है। हम संसार को परमपुरुष की भक्ति दे रहे हैं जो मोक्ष-अमरधाम है। इसलिए सद्गुरु के 'शब्द' और आज्ञा का पालन ही सर्वोच्च भक्ति-साधना है।

आदिभक्ति और दीर्घ ध्यान योगेश्वर शिवजी ने किया और दशम द्वार में 'ररंकार' नाम 'अक्षर' आया। यही अक्षर 'ररंकार' जाप शब्द हुआ। सनक-सनन्दन-सनतकुमार जैसे ब्रह्मलीन अवतार पार नहीं पाए और निरंजन में ही समाए। कोई भी निरंजन से अलग नहीं है। चौदह लोक 'ब्रह्म' के अन्दर ही बसे हैं, कोई भी 'ब्रह्म' से बाहर नहीं है। 'मन' से ही शरीर के भीतर अनहद-धुनें समाती हैं, 70 प्रकार के वाद्य बजते हैं। मन ही गाता है और मन ही रोता है। पल में प्रेममय होकर नाचने लगोगे और पल ही में मन रुला देगा। मन ही जागता और सोता है। सच्ची सुरति और लगन के बिना कहीं ठौर-ठिकाना नहीं है। सब झूठ और भ्रम से मन में ही मग्न हैं। किसी ने सद्गुरु शरण में जाकर सच्चे साहिब को नहीं जाना। बिना देखे-जाने ही सब बखान करने और महिमा गाने में लगे हैं।

सत्यपुरुष-साहिब का देश सत्यलोक है जो इस तीन लोक से परे है। तीन-लोक के रचियता निरंजन ने छल-कपट-धोखे से सृष्टि का निर्माण कर 'आत्मा' को जीव-योनियों में बाँधा है। सत्यपुरुष ने तो अमरलोक के ही मानसरोवर स्थान में निरंजन को हँसात्माओं पर राज करने का वचन दिया था। इस प्रकार इस भव-सागर के मूल में ही छल-कपट-धोखा है, फिर 'आत्मा' निरंजन के बंधन में रहकर मुक्ति की आशा कैसे की जा सकती है। ऐसी दुनिया के पंच-तत्व धर्मों में।

यदि सद्गुरु अपने करिश्मे दिखाना शुरू कर दें तो सब उन्हीं में समा जाएँगे। सत्यपुरुष का काल-निरंजन को तीन-लोक पर राज करने का वचन न कटे यह ध्यान भी सद्गुरु को रखना है। इसलिए युक्तिपूर्वक ही सद्गुरु द्वारा जीवात्माओं को पार करना होता है। जो अंकुरी जीव होते हैं, वे साहिब की सत्यभक्ति को सुनकर दौड़े आते हैं (जबकि कालपुरुष में मंत्र)। साहिब कबीर ने जीवात्मा को हँसा कह कर पुकारा है। हे हँस! सद्गुरु सुमिरन में रहकर अब सँभल जाओ, जब प्रलय होती है तो कोई भी बचता नहीं है। ब्रह्मा-विष्णु और कैलाशवासी शिव (हरि) भी सृष्टि प्रलय में नहीं बच पाते। चाँद, सूरज, धरती, आकाश शेष नहीं रहते। सृष्टि का निर्माता निरंजन अर्थात् भोग लेने वाला भगवान भी नहीं बचता। सत्-विष्णु तो 'मन' ही है, वो भी प्रलय के अधीन है। सोलह-संख (गणना में संख सबसे बड़ी संख्या है फिर असंख गणना होती है) युग बीत गए, चौदह-लोक भी नष्ट हो जाते हैं। यह ब्रह्माण्ड और अण्ड-पिण्ड भी प्रलय में समा जाते हैं। सद्गुरु कबीर कह रहे हैं मुझे तो वही हँसात्मा पसंद है जो परमपुरुष से लगन लगा कर उसमें समाने आतुर है। ऐसे सद्गुरु भक्त हँस होकर अमरलोक में रहते हैं फिर करोड़ों प्रलय कुछ नहीं बिगाड़ पाते।

नाम की ताकत ऐसी है कि आपको पक्का इशारा मिलेंगे। जैसे आगे कोई खतरनाक चीज होगी, आपको संकेत मिलेगा। कोई घटना होने वाली होगी, आपको पहले ही अंदर से पता चल जाएगा। आप निगाह में हैं, क्योंकि आप पनाह में हैं। थोड़े जो दुःख, संकट मिलते हैं, वो कमी आपकी तरफ से होती है। यह कमी साहिब की तरफ से नहीं है।

साहिब के दरबार में, कमी काहू की नाहीं। बंदा मौज न पावही, चूक चाकरी माहीं॥

साहिब कह रहे हैं -

अंदर सफा बाहर सफा, फिर साहिब काहे खफा॥

सन 1970 में भारतीय सेना की सेवा में रहते हुए अपनी जीवन्त-सुरति से मैंने जिस व्यक्ति को 'नामदान' दिया, उसका नाम था नीर सिंह राठौर। दीक्षा देने के बाद मैंने नीर सिंह को कहा कि नीर सिंह इस दुनिया में सबसे बड़ा पंथ अगर कोई है तो वो तुम्हारा पंथ है। मेरी बात सुनकर नीर सिंह मुस्कुराया और बोला, यह आप क्या कह रहे हैं? गुरुदेव! आपका न तो कोई पंथ है, न कोई संगत है और न ही आपके भक्ति-मार्ग को कोई जानता है; मैं ही पहला ऐसा व्यक्ति हूँ जिसने आपको गुरु धारण करके आपसे 'नाम दीक्षा' प्राप्त की है। मैं आपका इकलौता सत्संगी हूँ और आप मुझ से कह रहे हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा पंथ मेरा है। मैंने कहा - "नीर सिंह देखते चलो, साहिब तुम्हें खुद ही हमारी कही हुई बात पर भरोसा करवा देगा। जो वस्तु हमने तुम्हें दी है, वो वस्तु ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है। हमारे कहने का अभिप्राय यह है कि एक सच्चा गुरु कभी मजाक में भी झूठ नहीं बोलता है, चाहे कोई माने या न माने।"

हम पाँच शब्द और पाँचों मुद्राओं (योग) से आगे की भक्ति कह रहे हैं - सार शब्द निःअक्षर रूपा। लिखा न जाई पढ़ा न जाई; बिन सद्गुरु न कोई पाई। वह सार-शब्द निःअक्षर गुप्त नाम ही सद्गुरु है। सद्गुरु सुरति आपकी सुरति के साथ होकर भवसागर से पार करेगी। साहिब कबीर ने स्वयं को स्थापित कर पूजा नहीं करवाई। कोई सम्प्रदाय और पंथ स्थापित नहीं किया; अपितु समझाया न कुछ किया न करे सका, न करने योग शरीर। जो कुछ किया सो साहिब किया, भया कबीर कबीर।

मैं नाम देने के साथ ही शरीर छुड़वा सकता हूँ, उसी पल आत्मा को अमरलोक पहुँचा सकता हूँ। यह बात मैं घमण्ड से नहीं बल्कि भरोसे के साथ बोल रहा हूँ। आत्मा को निरंजन के माया शरीर से बेहद प्रेम हो गया है। संसार में सभी शरीर से प्यार कर रहे हैं, शरीर ही बनकर जी रहे हैं। स्वयं का बोध, आत्मा का बोध नहीं है। इस संसार में माँस और हड्ड़ियों की पूजा होती है। कोई भी मंत्र ऐसा नहीं है जो परमात्मा को किसी यज्ञ या अनुष्ठान में बुलवा ले। उसका जीता-जागता स्वरूप देखना है तो सद्गुरु नेत्रों में देखो। जो आँखें परमात्मा को देख चुकी हैं, उनकी आँखों से ही दिव्य-ज्योति प्राप्त होती है।

सद्गुरु भक्ति में सद्गुरु को परमपुरुष करके मानना है, हरेक शब्द को परमपुरुष की आज्ञा समझकर मानना है। यह भरोसा दिल में हमेशा रखना है कि सद्गुरु की पूजा मात्र से ही समस्त ब्रह्माण्ड की पूजा हो जाती है। शिष्य की आत्मा तक कोई आम धर्मगुरु नहीं पहुँच सकता है; वहाँ तक केवल एक पूर्ण गुरु अर्थात् सद्गुरु की ही पहुँच है। सद्गुरु के साथ रिश्ता जुड़ते ही शिष्य की आत्मा (सुरति) जाग जाती है; जोकि अनादिकाल से मन और माया के रंग में रंगी हुई थी।

सगुण-निर्गुण भक्ति विचारधाराएँ हैं। किसी भी दृष्टिकोण से कोई मत या विचारधारी है, अच्छा है। मेरा विचार है कि सभी धर्म जो उपासना पद्धतियाँ कह रहे हैं, उसमें छल-कपट न करें, किसी को दुःख न दें, दान-पुण्य करें, आदि का महात्म्य है। हमें इससे आगे बढ़ना होगा, हम इसलिए कह रहे हैं कि इन कर्मकाण्डों से आत्मा का मुक्त तत्व नहीं मिल पाएगा। मेरी लक्ष्य ही आत्मा को नाम-सुरति से जगाकर अमरलोक ले जाना है।

इंसान का मूल स्वभाव जहरीला है, क्योंकि इसकी रचना एक जहरीली वस्तु द्वारा हुई है, जिसका नाम 'मन' है। 'मन' की वृत्तियाँ - काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार भी अत्यन्त जहरीली हैं। इन सभी ने मिलकर अनादिकाल से हर एक जीव का 'आत्मस्वरूप' दूषित कर रखा है। इन वृत्तियों की वजह से कोई भी अपने अत्यन्त सहज और निर्मल 'आत्मस्वरूप' को प्राप्त नहीं कर पा रहा है। सभी पर 'मन' की वृत्तियों का आधिपत्य है। 'आत्मा' स्त्री-पुरुष के जिस भी शरीर को धारण करती है, उस शरीर को अपना मानती है। शरीर का संचालन आत्मा स्वयं की ऊर्जा से करती है परन्तु आत्मा को घोर-अज्ञान और भ्रम में रखने वाली ताकत कोई और नहीं बल्कि 'मन' है। मन ही आत्मा का तद्रूप बनकर हर शरीर में आत्मा के साथ रहता है। कर्मगति और कर्मफल विधान का दाता 'मन' ही तीन लोकों का स्वामी है। तीन-लोकों में 'मन' सदा आत्मा के साथ है। जिस कच्चे बर्तन (शरीर) का संसार में सभी को घमंड है, जिस झूठी शान-शौकत पर आप सभी को नाज़ है, जिस माया को इकट्ठा करके आप सभी दीवानों की तरह झूम रहे हैं; अज्ञानवश इन सभी को अपना मान रहे हो, यह सब कुछ एक ही झटके में 'काल' आप से छीन लेगा। इन सबकी रचना काल-पुरुष ने की है, आप सबको उलझाने के लिए, आपको अपने सच्चे "साहिब" से दूर रखने के लिए।

साहिब जी - अपने परिवार में अकेली मैं हूँ जिसने आपसे नामदान लिया है। सभी परिवार वाले और रिश्तेदार मेरा बहुत विरोध करते हैं, मुझे आपके सत्संग में भी नहीं आने देते हैं। सभी आपके बारे में उल्टा-सीधा बोलते रहते हैं, जिससे मुझे बहुत परेशानी होती है।...साहिब जी, बचपन में मैं, जब किसी आर्मी वाले (Army Person) को देखती थी तो मेरा बचपन से ही आर्मी में जाने का शौक था और जब से आप से मिली हूँ मेरा यह शौक और भी बढ़ गया कि - मेरे साहिब जी भी आर्मी (भारतीय फौज) में थे। मुझे भी आर्मी में जाना है, पर घर वाले मुझे आर्मी की भर्ती के लिए जाने नहीं देते और गालियाँ निकालते हैं। उनसे लड़कर जब जाती हूँ तो मेरा काम नहीं बनता है, जिसकी वजह से मैं बहुत परेशान रहती हूँ।...साहिब जी आप ही कहें मैं क्या करूँ?

मैंने, शीला राजन से कहा - सुरति रखना, चिंता मत करो तुम्हारा विरोध लाज़मी है, क्योंकि सत्य-भक्ति से किसी और को नहीं बल्कि तीन-लोक के स्वामी 'मन' को परेशानी है। तुमने 'नाम' ले लिया है इसलिए तुम पर उसका जोर नहीं चलता और वो तुम्हारे परिवार वालों में बैठकर, परेशानी देना चाहता है; गुरु-भक्ति से नीचे गिराना चाहता है। आपको सामने सद्गुरु के 'नाम' का 'सत्य' है उसे साक्षात अपने बीच में होने का विश्वास परिवार-रिश्तेदार और दुनिया वाले नहीं करेंगे। जिनमें जन्म-जन्म के बाद बीज का अंकुरण हुआ है, सत्य की ओर वे ही जा सकेंगे - सद्गुरु सत्संग में। ऐसे ही अंकुरित लोग साहस करेंगे, उन्हीं की जिज्ञासा फलीभूत होगी। वे ही सद्गुरु के सत्य-नाम का अमृत पान करेंगे।

'सत्य' के साथ चलना कठिन है। 'मन' रूपी काल निरंजन के गाल में समाया अभाग 'जीव' मनुष्य तन पाकर भी आत्म-मोक्ष की सरल भक्ति को नहीं पाता। सद्गुरु का सत्य रूप इसलिए दिखाई नहीं देता कि मनुष्य - (1) सत्य नहीं बोलना चाहता, (2) नशे की मादक वस्तुओं का सेवन नहीं छोड़ना चाहता, (3) शाकाहारी भोजन तक सीमित नहीं होना चाहता, (4) चोरी, बेईमानी, चालाकी, मन, बुद्धि और चित्त से चाहता है, (5) पूर्ण चारित्रवान होने में कठिनाई अनुभव करता है, (6) ईमान की थोड़ी कमाई से जीवन-यापन नहीं करना चाहता और (7) किसी न किसी प्रकार का जुआ खेलकर धन पाना चाहता है। साहिब-बन्दगी सत्संग में मेरे भक्तों को इन सात-स्वर्णिम नियम-सिद्धान्तों का पालन अनिवार्य है - सदा सत्य बोलें, शुद्ध शाकाहारी रहें, किसी प्रकार का नशा न करें, किसी तरह का जुआ न खेलें, न तो चोरी करें न ही चोरी का सामान खरीदें, चरित्रवान रहने का ध्यान मन-वचन-शरीर से रखें और मेहनत से कमाए धन का ही उपयोग करें। दृढ़ता के साथ सातों सिद्धांतों के पालन की शक्ति तभी सम्भव है जब परमपिता (परमपुरुष-साहिब) का जीवंत पवित्र-नाम किसी को जीवन में मिल जाए। 'आत्मा' को एक पूर्ण गुरु ही सच्चे 'नाम' से चैतन्य करने में समर्थ है।

सत्यपुरुष की जानसी, तिसका सद्गुरु नाम।

जिसकी आत्मा सत्यपुरुष में समाई हो, जिसका वास्तविक निवास अमरलोक में हो, वो ही सद्गुरु है।

...तो, शीला राजन, तुम बिल्कुल परेशान मत होना, बस भाव रखना, सुरति रखना, सब कुछ अपने आप होता जाएगा। इंसान केवल उसी वस्तु का मोल समझता है जिसे प्राप्त करने के लिए उसने जीवन में बहुत कड़ी मेहनत की हो। जो वस्तु बिना किसी मेहनत के मिल जाए, ऐसी वस्तु का मोल इंसान ठीक से नहीं समझ पाता है। सोचता है कि यह सब तो किस्मत की बात है, मिलनी ही थी। सत्य कहीं इससे बहुत ही दूर है। जिस आत्मज्ञान को प्राप्त करने के लिए हमारे पूर्वजों ने कठिन साधनाएँ की, योग किया... उन सबका लक्ष्य और पहुँच ही सहज रूप से समझाता हूँ -

'सत्य' के साथ चलोगे तो....

  1. मन विरोध करेगा।
  2. घर वाले विरोध करेंगे।
  3. दोस्त / रिश्तेदार विरोध करेंगे।
  4. समाज विरोध करेगा।
  5. संसार विरोध करेगा। तब समझ लेना, परमात्मा मिलेगा!

'सत्य' के खोजी किसे सद्गुरु माने? क्या मेरे सानिध्य में सत्संग में आने वाले, मेरे कहने से मुझे सद्गुरु मान लेंगे? नहीं। साहिब ने समझाया कि सद्गुरु की पहचान और सामर्थ्य क्या है।

परमपुरुष (साहिब) का अकह, निःअक्षर, सच्चा 'नाम' जिसके पास है, कबीर साहिब ने उसे सद्गुरु कहा। जिसे मोक्ष अमरधाम का 'अटल नाम' जन्म-जन्म का कष्ट हरने वाला मिल गया, वही 'धन्य' भाग्य वाला है। क्योंकि उस 'सत्य' नाम को पाए बिना मनुष्य भवसागर में ही भटकता रहेगा। काल के गाल में ही समाएगा!

सृष्टि में केवल एक 'सद्गुरु' ही ऐसी आध्यात्मिक-शक्ति का स्वामी है जिसके द्वारा वह 'आत्मा' को इस नश्वर सृष्टि (तीन लोकों) की सीमा से सदा के लिए जन्म और मृत्यु के अनंत चक्र से अपनी कृपा द्वारा मुक्त करता है

मेरा प्रयास रहेगा कि संत-मत के सिद्धान्तों की शिक्षा से 'मन' के बनाए माया-छल-इन्द्रजाल भरे अज्ञानमय (Darkness) संसार के जीवन को 'मानव' जानें। 'धर्मवाद' की बाधाओं, जैसे हिंदुवाद, इस्लामवाद, सिक्खवाद, बुद्धवाद, जैनवाद आदि को छोड़कर 'सत्य' को जानें। ईश्वर और आध्यात्म शिक्षा के नाम पर स्थापित अनेकों आध्यात्मिक संगठन दान के नाम पर और सदस्यता के नाम से धन लेते हैं। 'साहिब बन्दगी' सत्संग किसी प्रकार की सदस्यता राशि संगठन से जुड़ने वालों से नहीं लेता। सभी मानव (आत्माएँ) जो अंतिम 'सत्य' की खोज में हैं, वे सब मेरे हैं, उनके लिए मेरा सत्संग सदा खुला है। सबके स्वैच्छिक सहयोग का अंशदान और सेवा-समर्पण से सत्संग केन्द्र संचालित हैं। सत्य आध्यात्म (सत्यभक्ति) में अधर्म, पाप, दोष, झूठ, हिंसा और निंदा का कोई स्थान नहीं है। छल-पाखण्ड, सामाजिक कुरीतियों और बुराईयों के विरुद्ध लड़ने और मानव कल्याण के लिए सत्य के खोजी ही मेरे पास आएँगे


जो वस्तु मेरे पास है, ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है

'साहिब' हँस (आत्माओं) का परमस्रोत ही एकमात्र परमात्मा है। उस एक 'परमात्मा' को जानने का केवल एक पथ है - 'सत्गुरू भक्ति'।

  • अव्यक्त 'मन' (कालपुरुष) की रचना; प्रकृति और काम-क्रोध, लोभ-मोह-अहंकार हैं जो आत्मा (हंसा) या परमपुरुष के कार्य नहीं हैं।
  • आत्मा की अत्यन्त दर्द और दु:ख से भरी बीमारी (जन्म-मृत्यु) का उपचार केवल 'नाम' (जीवंत पवित्र नाम) ही, सच्चा पथ है।
  • अज्ञानता के कारण मन और शरीर की गुलामी का जाल स्वयं अपने ही विरुद्ध बनाकर 'आत्मा', स्वयं अपनी शक्ति विदेह 'मन' को दे रही है।।
  • इस सृष्टि में 'आत्मा' का सच्चा रक्षक केवल सदगुरु है। अन्य कोई गुरु, देवी या देवता में यह शक्ति नहीं है कि वह काल के बंधनों से आत्मा को मुक्त करा सके।

इस 'काल' मन के संसार में केवल सद्गुरु और सद्गुरु से 'नाम' प्राप्त किये हुए जीव ही चेतन हैं, होश में हैं, स्थिर हैं, मन पर सवार हैं। बाकी सभी जीव 'काल' का भोजन हैं, अचेतन हैं, अस्थिर हैं, और 'मन' के गुलाम हैं।

There is only one GOD - "SAHIB" [Supereme Lord of Soul] and to realise that one GOD there is only one Path - "SATGURU BHAKT" Sex, Anger, Greed, Attachment, Ego is the creation and the Nature of Formless Mind (Kaal Purush); not Soul (Hansa) or Supreme Lord (SAHIB), "Naam" (Alive Holy Name) is the only medicine which Cures the most painful and deadly disease (Birth-Death) of a Soul, Right from the root. Due to ignorance, Soul itself is empowering the Formless mind and body to create a net of bondages against its own self.

SATGURU is the True saviour of a soul in this Universe. No others Guru or Deity has the power to liberate you from the clutches of Kaal.

एक सच्चा-गुरु ही ईश्वर से बड़ा है। ऐसा गुरु जो त्रिदेवों, अवतारीं, देवी-देवताओं, ॐ-शब्दों, ध्वनियों, ज्योति, निरंजन, आद्यशक्ति, अव्यक्त भगवान की भक्त-ध्यान करता है - वो सतगुरु नहीं है।

इस धरती पर केवल हम ही हैं जो शुद्ध रूप में 'परमपुरुष' की भक्ति जीवों को दे रहे हैं। बाकी जितने भी पंथ, मठ, सम्प्रदाय, श्रम आदि हैं वे सभी 'कालपुरुष (निरंजन-मन) की भक्ति में लीन हैं। हम 'चौथे लोक' के स्वामी अर्थात 'साहिब' की भक्ति का रहस्य जीवों को प्रदान कर रहे हैं। हम 'त्रि-लोक' के स्वामी अर्थात 'निरंजन' की भक्ति नहीं कर रहे हैं। हम 'निरंजन' को कालपुरुष कह रहे हैं क्योंकि 'निरंजन' ने ही सभी जीवों को शरीरों में डालकर जन्म-मरण के बंधन में अनादिकाल से बाधा हुआ है। पूरी दुनिया 'विनिष्टिकर्ता' (अव्यक्त 'मन') की ही भक्ति कर रही है। कोई भी सच्चे रक्षक (परमपिता) के बारे में नहीं जानता। 'कर्म' आप स्वयं नहीं कर रहे हैं, कोई आप से करवा रहा है, आपको अज्ञान में रखकर। 'कर्म' की रचना आपको बाँधने के लिए की गई है, आपको कष्ट देने के लिए। इस रहस्य को पूरे ब्रह्माण्ड में केवल एक 'सदगुरु' ही जानता है, और कोई नहीं।

जो भी सच्चे-सद्गुरु की भक्ति करता है, कभी दुबारा नारी के गर्भ (जन्म और मृत्यु के अनंत चक्र) में नहीं आता। 'साहिब' (SUPREME POWER) के अमरलोक में केवल 'साहिब' ही SUPREME हैं, दूसरा और कोई नहीं। अमरलोक में न साकार है, न निराकार, न निरंजन है, न ही आद्यशक्ति, न ही त्रिदेव हैं, न ही अवतार। न राम हैं, न ही कृष्ण हैं, न गुरु हैं, न ही गणेश। न ही देवी देवता हैं, न ही मुनि-मुनीष, न ही योगी हैं, न ही योगेश्वर। न ही पीर हैं, न ही पैगम्बर। न शब्द हैं, न ही अनहद-नाद। न ज्योति है न ही प्रकाश। न पिण्ड है न ही ब्रह्माण्ड।

संतत्व की धारा ने गुरु को परमात्मा से बड़ा कहा क्योंकि सदगुरु स्वयं जीव को 'काल' के बंधनों से मुक्त करवाता है। सद्गुरु 'सार-शब्द' का ज्ञाता है। सदगुरु की 'सुरति' पारसमय हैं। सद्गुरु अपनी 'पारस सुरति' का स्पर्श देकर जीवात्मा को परम चेतनता प्रदान करता है। सद्गुरु मुन और माया का नशा जीव के सिर से हमेशा के लिए उतार देता है। ये सब काम सद्गुरु स्वयं करता है। शिष्य का इसमें रत्ती भर भी सहयोग नहीं होता। इसीलिए संतों ने इसे सहज मार्ग कहा।

यही आध्यात्मिक शक्ति जिसमें 'आत्मा' को मन से मुक्त किया जाता है 'नाम-दान' कहलाता है। सच्चे अर्थों में यह आध्यात्मिक अनुवांशिकी Spiritual Genesism (आध्यात्म पथ का 'भृंगमता) कहलाता है।

सच्चा जिन्दा नाम (सजीवन नाम) प्राप्त होने के बाद से ही शिष्यों को अनुभव होने लगता है कि उनके पीछे हमेशा एक गुप्त शक्ति खड़ी है। जैसे ही मेरा कोई भी अनुयायी कुछ गलत चाहे अनजाने में हो अथवा कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटित हो तो वो सजीवन शक्ति (नाम) तुरन्त आकर रक्षा करती है और सही मार्गदर्शन करती है।

यही गुप्त-शक्ति सर्वशक्तिमान (परमपुरुष-साहिब) का जिंदा पवित्र-नाम (सजीवन नाम) है जो इस ब्रह्माण्ड में सिर्फ मेरे पास है। शिष्यों में यह दीक्षा (नामदान) स्वतः ही एक ऐसी प्रक्रिया देती है जो अज्ञानता के घोर अँधेरे को मिटाने की क्रिया करती है और जीवात्मा को माया के इन्द्रजाल का आवरण (पर्दा) हटाने में समर्थ बनाती है। शिष्य, भौतिकता, मन-शरीर का जाल (मन-माया का जाल) हटाकर, अपने आत्मस्वरूप (परमपुरुघ-साहिब) को पा लेता है जोकि नश्वर सृष्टि से परे का अनुभव है। अकेले पूर्ण आध्यात्मिक गुरु (सतगुरु) की भक्ति समस्त देव भक्तियों को समाहित कर लेती है। क्योंकि संत-सतगुरु ही वो दर्पण है जिसमें हम परमात्मा (परमपुरुष-साहिब) को देख सकते हैं। साहिब जी की वाणी है

काग पलट हँसा कर दीना ||
ऐसा परुष नाम में दीना ||

सद्गुरु शब्द के मायने (अर्थ) क्या है?

'सद्गुरु' का अर्थ है एक गुरु (आत्मा) जो स्वयं मन, शरीर, सृष्टि के दायरे से मुक्त हो चुका है और चौथे लोक-अमरलोक में परमपुरुष से एकात्म है। वो अमरलोक जो परमपुरुष (परमपिता) और उसके हँसों (हँसात्माओं) का वास्तविक अनश्वर घर है। 'सद्गुरु' शब्द कबीर साहिब द्वारा प्रथम बार दुनिया को दिया गया शब्द है। साहिब जी के आने से पहले सद्गुरु और संत शब्द ही नहीं थे।

'कबीर' शब्द के मायने (अर्थ) क्या है?

हर एक जीव (प्राणी) में रह रहीं एक अनश्वर आत्मा है, जो परमपिता (परमपुरुष-साहिब) का ही अंश (PART) है। जिसका पाँचों तत्वों (पृथ्वी-जल-अग्नि-वायु व आकाश) से पृथक सच्चा अस्तित्व है, उसे 'कबीर' कहा जाता है।

कक्का केवल नाम है, बब्बा वरण शरीर रर्रा सब में रमि रहा जिसका नाम कबीर सोई ज्ञानी पुरुष है सतगुर सत्य कबीर रज वीरज पैजा नहीं स्वासा नहीं शरीर

निरंजन कौन है

  • जब परमपिता (परमपुरुष) ने अपनी ही मौज में स्वयं को प्रकट करके 16-शब्द उच्चारे, तब शब्द-शक्ति रूप 16 पुत्र अस्तित्व में आए।
  • जब परमपिता ने तेज अंग से शब्द उच्चारा, इससे पाँचवा शब्द-पुत्र निरंजन उत्पन्न हुआ।
  • पूरी सृष्टि निरंजन (मन) की भक्ति किसी न किसी तरह कर रही है: उसे ही अपना सच्चा रक्षक (भगवान) सब मान रहे हैं। सत्य आध्यात्मिक ज्ञान के अभाव के कारण यह हो रहा है। निरंजन (मन) को ही पूरी दुनिया के लोग अनेकों नामों जैसे राम, हरि, नारायण, व्रह्म, परब्रह्म, परमात्मा, भगवान, परमेश्वर, आदि निरंजन, निराकार, निरंकार, ओंकार (ओम), निर्गुण भगवान, अल्लाह, GOD आदि नामों से पुकारते हैं।

कालपुरुष कौन है?

  • सभी संत (साहिब संत) जिन्होंने अमरलोक (चौथेलोक) और परमपिता (परमपुरुष-साहिब) से एकाकार का अनुभव किया है, मन (निरंजन) की वास्तविक सीमाओं को जानते हैं। उन्होंने सृष्टि की उत्पत्ति का पूरा रहस्य भी जान लिया और फिर निरंजन (मन) की बनायी दुनिया के मायाजाल (छल) में रह रही मानवता के सत्य को अपने आत्मज्ञान से खोजा।
  • सभी संतों ने जिनमें स्वयं प्रथम साहिब-संत सदगुरु ''कबीर'' परमपिता (परमपुरुष) थे, निरंजन (सृष्टि के भगवान) को 'कालपुरुष' नाम से पुकारा है। क्योंकि मन (निरंजन) ही संसार की प्रत्येक जीवात्मा को दर्द और दु:खों का देने वाला है। निरंजन (मन) ही परमपुरुष और आत्माओं के बीच बाधा बनकर खड़ा है।
  • सद्गुरु नेत्रों में सत्य-ऊर्जा है, उनके नेत्रों के ध्यान से ही भक्त की त्रिकुटी में आत्मा-जाग्रत होती है। इसलिये श्वास और सुरति के बीच सद्गुरु नयनों को लाने का योग करना ही एकाग्र होने का मंत्र है। इसी एकाग्र 'ध्यान' से 'मुन' की चंचलता या मन की तरंगों को वश में करना साध्य है। सदगुरु जिस गुप्त-सुरति से 'नाम' (Alive Holy NAME) दीक्षा देकर आत्मा को जाग्रत करते हैं; वही सदगुरु के ध्यान से आत्मरूप में मिलता है।

सिद्ध, साधू, योगी, योग-मुद्राओं में अक्षर-शब्द-जाप से काल-निरंजन का भक्ति करके सत्य को ही पाते हैं। वो काल ही रक्षक, और भक्षक होकर संसार का संहार करता है। ओंकार' को मन में निश्चय करके परमात्मा रूप ज्ञान लिया है 'ओंकार' शब्द ध्वनि तो देह-ब्रह्माण्ड का ही अ - (आकार) है। 'उ' कार स्वप्न अवस्था है। 'म' कार शून्य में वायु के टकराने से उत्पन्न तेज है। शून्य के आकाशीय ब्रह्माण्डों में यही ध्वनि-रूप ब्रह्म' का आभास देने वाली तुरिया-अवस्था है।

क्षर-अक्षर (नश्वर भाषा शब्द) से परे निःअक्षर (पढ़ने-बोलने और मिटने वाले नहीं) शब्द 'नाम' (सजीवन नाम) एक पूर्ण आध्यात्मिक गुरु (सद्गुरु) देता है, वो आत्म-परमात्म रूप है। इस निःअक्षर 'नाम' को धारिण कर शीश से सवा-हाथ ऊपर शून्य से निराधार-आधार में सुमिरन होता है। सद्गुरु-नाम सार-शब्द में समाया सुरति योग है। ऐसा विदेह-शब्द जो पाँच-तत्व, पच्चीस प्रकृति और तीन गुण के पिण्ड-ब्रह्माण्ड से न्यारा करके निजघर (अमरलोक) ले जाता है।

मेरा शिष्य सजीवन 'नाम' पाकर मन की वृत्तियों के पॉँच-चोर काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, पच्चीस प्रकृतियों और तीन-गुणों की माया से मुक्त हो जाता है। मन की इन शक्तियों को वश में करके ही दिमाग (Brain) में आ रही 'मन' की अति सूक्ष्म तरंगों को 'आत्मज्ञान' की ओर मोड़ा जा सकता है। कहाँ से आए हो और कहाँ तुम्हें जाना है; यह समझ में आता है कि -

हम बासी उस देश के, जहाँ पारब्रह्म का खेल।
दीपक जरै अगम का,बिन बाती बिन तेल।।
हम बासी उस देश के, जहाँ जात वरण कुल नाहीं।
शब्द मिलावा होता है, देह मिलावा नाहीं।।

सत्य-भक्ति सद्गुरु के ही चारों ओर घूमती हैं। इसमें सदगुरु की सुरति में समाया परमपुरुष के विहंगम् 'नाम' का गूढ़ रहस्य है। इसमें अधर में अर्थात देह-शीश और शून्य के मध्य 11वें द्वार से निकल कर सद्गुरु संग विहुँग मुद्रा में 'आत्मा' अपने मूल घर (अमरलोक) जाती है। यही सच्चा मोक्ष है, फिर पुनः निरंजन की सृष्टि रचना में मृत्यु लोक में नहीं आना पड़ता।

एक सच्चे सद्गुरु से मोक्ष का मार्ग मिलने का सिद्धान्त ही यह है कि वो आत्मज्ञान कराने सबके सामने साक्षात है। तीन लोकों के परमात्मा, भगवान (देवी-देवता और पैगम्बर) के नाम साक्षात नहीं है, केवल मन-रूप निरंजन का मनोभाव हैं। मनुष्यों की इच्छायें, अभिलाषायें पूरी करने देवगण, तंत्र-मंत्र की साधना या आस्था से मुक्ति का मार्ग नहीं मिलेगा। सतगुरु ही अपनी विहंग-सुरति 'आत्मा' को 'नाम दान' द्वारा देकर परमपद की ओर ले जाते हैं। मनोकामनाओं के भँवरजाल से निकालकर 'सत्य' आत्मज्ञान देते हैं। जीवन का सुख और संतोष शिष्य स्वयं अनुभव करने लगता है।

सदगुरु कभी भी समाज और परिवार के प्रति कर्तव्यों से अपने भक्तों को विमुख नहीं होने देते। सद्गुरु के सानिध्य में आया भक्त मन की वृत्तियों से बैरागी होकर परिवार और समाज के प्रति कर्तव्यों को निभाता है। सदगुरु भक्त सन्यासी होकर परिवार से भागता नहीं है फिर भी मन-माया से छूट जाता है, जो सच्चा वैराग्य है।

मेरे शिष्य को पूर्ण सुरक्षा मिलती है।

गुरूको शीश पर राखिये लीजै आज्ञा मान।
कहे क बीर ता दास को तीन लोक डर नाहीं ।।

मेरा शिष्य "नाम" धारण करने के बाद पूर्ण सुरक्षित है। 'नाम' से होश में होकर 'मन' की वृत्तियाँ नियंत्रण में हैं। 'इन्द्री पसारा रोक ले सब सुख तेरे पास।' में यथार्थ में बोल रहा हूँ, अहंकार से नहीं बोल रहा, मैंने अपने शिष्य को 'नाम' देकर बदल दिया है। सच मानना, अभी बार-बार चेता रहा हूँ, जब यहाँ से चला जाऊँगा, तो दुनिया पछतायेगी। क्योंकि, यह सत्य है- "जो वस्तु मेरे पास है, ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है।"

...सच तो यह है कि कालपुरुष 'नामी' का कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। यदि कुछ दुःख मिलता भी है तो उसे साहिब की रजा मानना, घबराना नहीं। कालपुरुष मेरे नामी को दुःखी नहीं कर सकता है वो कष्ट देने में सक्षम नहीं है! क्योंकि सत्गुरु की ताकत साथ में खड़ी है वो बचाती चलेगी। यदि कहीं कष्ट हुआ तो जरूर शिष्य गलत चला होगा, तभी सजा मिली; पर यह सजा भी मैं ही दूँगा।

सच से बड़ा कोई तप ही नहीं है और झूठ से बड़ा कोई पाप नहीं है। जिस हृदय में सच नहीं वहाँ साहिब नहीं आते, इसलिये सच की पालना बहुत जरूरी है। मेरा नामी मजाक में भी झूठी बात नहीं कहे। किसी को यह वादा भी मत करना कि कल या परसों आपके पास आऊँगा/आऊँगी। यदि शरीर छूट गया तो फिर नामी होकर भी अमरलोक नहीं जा पाओगे; पुनः जन्म लेना पड़ेगा वादा निभाने के लिए। इसलिए हर 'नामी' ऐसा कहे कि 'यदि साहिब की मौज हुई तो आऊँगा।'

एक जन्म नहीं, अनेक जन्मों तक भी; यदि किसी कारण से किसी का दोबारा जन्म हो जाये, यह 'नाम' भक्ति तब भी नष्ट नहीं होगी। जैसे माता-पिता अपने बच्चों का कल्याण ही चाहते हैं, इसी तरह गुरुजन भी अपने शिष्य का कल्याण चाहते हैं। सद्गुरु से बढ़कर इन्सान का भला चाहने वाला कोई दूसरा हो नहीं सकता। माता-पिता भी जिसके समतुल्य नहीं हो सकते हैं। सदगुरु की शरण में आकर जीव चिन्तामुक्त हो जाता है। शरणागति बहुत बड़ी चीज है। विभीषण राम जी की शरण में गया था। युद्ध में रावण विभीषण पर शक्ति का इस्तेमाल किया तो रामजी ने उसे आगे होकर अपने पर ले लिया था। जो जिसकी शरण में जाता है, वो उसकी रक्षा करता है; पक्का करता है।

जो सद्गुरु की शरण में हैं, उन्हें अपने कल्याण की भी कोशिश करने की जरूरत नहीं है, साहिब खुद कर लेगा। शरणागत में भक्त भी खुद आ जायेगी, ज्ञान भी आ जायेगा। जैसे जब तक बच्चा माँ की शरण में रहता है, तब तक माँ उसकी बहुत देखभाल करती है। अपने हाथों से उसे खिलाती है, नहलाती है, पहनाती है, सब चीजों का ध्यान रखती है। रोता है तो भी कराती है। जब बच्चा बड़ा हो जाता है तब इतना ध्यान नहीं रखती। फिर तो खाना बनाकर आगे रख देती है, पर अपने हाथों से खिलाती-थोड़े ही है। इसी तरह जब तक व्यक्ति गुरु की शरण में हो तब तक गुरु को उसकी चिंता रहती है। ज्ञानी जीव की चिंता गुरु को ज्यादा नहीं रहती, इसलिये ज्ञानी होकर भी गुरु के आगे छोटे बनकर जाना चाहिये ताकि गुरु को बराबर हमारा ध्यान रहे।

जिस तरह माँ जानती है कि बच्चा क्यों रो रहा है। कभी-कभी बच्चा भूख से रोता है, कभी कष्ट में पड़कर रोता है। कभी ऐसे भी रो लेता है कि माँ उसे उठाये। माँ को चिंता है, वह बच्चे की पुकार सुनकर जान जाती है कि क्यों रो रहा है। भूख से जो रोना है, वो अलग हैं; किसी आफत के कारण रोना है वो अलग है। माँ को ज्ञान है; इसलिये वह सब काम छोड़कर भागती है बच्चे के पास और चुप कराती है। इसी तरह आप जिस हाल में भी गुरु को याद करते हैं, गुरु को पता चल जाता है। इसलिये जब भी शिष्य किसी मुसीबत में हैं, मुझ को याद करते हैं तो पाते हैं कि कोई शक्ति आई और अचानक मुसीबत टल गई। यही बात साहिब कबीर ने कही

लाख कोस जो गुरु बसै, दीजै सुरति पठाय।
शब्द तुरी असवार है, पल आवै पल जाय।।

सच तो यह है कि जिस दिन से सद्गुरु नाम मिलता है, साहिब खुद आपके साथ हो जाता है। इसलिये साहिब रक्षा भी करता है; पूरी-पूरी मदद करेगा। मेरे शिष्य सुखदेव भारद्वाज ने पूछा साहिबजी! मैं जानना चाहता हूँ कि 'नाम' लेने से आपने जो सुरक्षा हमें प्रदान की है... क्या हमारे घर में जो गैरनामी हैं क्या उनको भी उसका फायदा मिलेगा? साहिब जी... मेरे घर में मम्मी, पापा नामी हैं.... भैया-भाभी ने 'नामदान' नहीं लिया। मेरा भतीजा कई बार बीमार हो जाता है तो लोग वहम में डाल देते हैं उन्हें हम तो इन सब पर यकीन नहीं करते... क्याकि हमें अपने साहिब जी पर पूरणा यकीन (भरोसा) है...! जो वस्तु आपने हमें दी है वो इस ब्रह्माण्ड में कोई नहीं दे सकता...साहिब जी आपने हमें दुनिया से निराला कर दिया है।

...कृपा कर बतायें कि हमारे घर के गैर-नामी भी सुरक्षित हैं हमें आपके द्वारा दी गई 'नाम' की ताकत के साथ?...

सभी शिष्यों से कहता हूँ कि यदि आप सोचें कि -" मैं कुछ भी न करूँ तो क्या साहिब करायेगा?. हॉँ करायेगा, जरूर करायेगा।"

आप अपना सर्वस्व साहिब पर छोड़कर देखना । यदि आप में विश्वास नहीं है, छल-कपट है तो फिर नहीं होगा ऐसा। साहिब की भक्ति में अपना सर्वस्व भुला कर देखना। आप सदगुरु को अपना सहारा बनाना, जीवन का भार सौप दोगे तो साहिब को करना पड़ जायेगा।

साहिब जी ने भक्त को पूर्ण सुरक्षा पाने ही दुनिया के सम्प्रदाय समूहों के भक्तों से कहा

भक्ति साहिब की बहुत बरीक है, शीश सौंपे बिना भक्ति नाहीं ।
होय अवधूत संब आश तनकी तजै, जीवता मरे सो भक्ति पाहीं।।
नाचना कूदना ताल को पीटना , राँड़िया खेल है भक्ति नाहीं।
रैनदिन तार निर्धार सो लागी रहै, कहै कबीर तब भक्ति पाहीं।

सच्चे 'नाम' का रहस्य दुनिया नहीं समझ पाई। सभी 'नामदान' (दीक्षा) देने लगे, सभी संत बन गये, इसलिये नाम का रूप अलोप हो गया। सच्चा 'नाम' के स्रोत कबीर साहिब जी थे उनके द्वारा ही संतों का सिरजन हुआ, इसी के आगे तुलसी दास गुरु रविदास जी, गुरु नानकदेव जी, पलटु साहिब, दादू दयाल जी, दरिया साहिब, गरीब दास जी आदि संतों ने नाम का भेद संसार को दिया। साहिब जी से पहले भी संसार में लाखों नाम प्रचलित थे, पर उनसे जीव मुक्त नहीं हो सकता। ऐसे तो सभी को 15-20 नाम पता होते हैं, फिर संतों को 'सद्गुरु' की इतनी महिमा गाने की क्या जरूरत थी। संतों ने तो गुरु को गोविन्द से भी बड़ा बताया है।

सच्चा 'नाम' वाणी का विषय नहीं है। यह 52 अक्षरों में आने वाला नाम नहीं है। जो उच्चारण का विषय हो गया वो सचा नाम नहीं है, वो आत्मबोध नहीं करा सकेगा; किसी प्रकार से आत्मबंधनों से मुक्त नहीं कर सकेगा।

सदगुरु में विश्वास और हृदय में सत्य 'नाम' के ध्यान से ही घट-घट में समाया 'राम' अर्थात 'आत्मा' का दर्शन होगा यही सबसे बड़ा सुरक्षा-कवच है जब सदगुरु सानिध्य में स्वयं अनुभव प्रकट होगा तब ही 'आत्म-देव' पहचाना जा सकेगा। स्वयं में आत्मा को पाने पर ही संसार का पसारा और भूय-संशय असार हो जावेगा। सब झूठा जंजाल लगने लगेगा। निःअक्षर राम वाला 'नाम' सब घट में होकर भी सबसे न्यारा है। वही 'जीव' के भीतर आत्मरूप है। वही नाम सदगुरु "नाम' के निरन्तर ध्यान में समाया है। स्वयं आत्मा को जब जीव देख लेता है तब अपने आपको ही पाकर सब में समा जाता है, समदृष्टी हो जाता है। वाणी है -

परमपुरुष (साहिब) को सृष्टि, मन, प्राण, जीवों के विस्तार और विनाश से कोई संबंध नहीं है। परमपुरुष तो अपनी हूँ (आत्मा) को इस निरंजन सृष्टि से मुक्त कराने सदगुरु को भेजते हैं। जो सद्गुरु की ओट (शरण) में आ जाता है फिर उसे कालपुरुष कभी नहीं सता सकता।

ऐसे ही, सच्चा 'नाम' तो मन पर शिकंजा कसता है। मन और माया की पूरी प्रक्रिया (System) जाम कर देगा।

सद्गुरु मेरा सूरमा, कसके मारा वाण।
नाम अकेला रह गयां, पाया पद निर्वाण

इतनी बड़ी 'नाम' ताकत की गारंटी शिष्य को मिलती है निर्वाण की, मोक्ष की। व्यक्ति अनात्म चीजों में परमतत्व की खोज करता है, क्योंकि उसे भ्रमित किया गया है। सदगुरु से मिला 'नाम' रक्षा करता है। इस निःअक्षर गुप्त है नाम से तन के रोग और समस्त पापों का नाश हो जाता है। काल इस सत्यनाम को देखकर दूर ही रहता है। बुरी नजर, जादू-टोना, सम्मोहन, वशीकरण आदि शक्तियाँ भी सद्गुरु-शब्द के आगे टिक नहीं पातीं; उलटा उन्हें चलाने वाले पर ही प्रतिघात करती हैं। विषधर नाग, वीर-बैताल आदि दूर से ही पछताकर रह जाते हैं। साहिब जी की वाणी है-

सतगुरु शब्द सहाय हूँ सा, सतगुरु शब्द सहाई । निकट गए तन रोग न व्यापै, प्राप ताप मिट जाई ।। राग द्वेष छल छिद्र न दरपै, सनम्णख नहिं ठहराड । विषधर मन में करे पछतावा, काल रहे अरधाई ।। बीर बैताल वाण गलि जाई , यम के कोट ढहाई। अठवन पठवन दुष्टि न लागै, उलटि ताहि धरि खाई़े। मोहन वशीकरण उच्चाटन, मारन मन पछताइ। सतगुरु शब्द कहत हौं महिमा, उलटि चला चटकाई।। जहाँ लगि काल कालिका के गुण, सबही रहे उरझाई। कहहिं कबीर छूटे यम बँधन, सुकृत लाख दोहाई ।।

मन की वृत्तियों और प्रकृतियों की विकट स्थितियों पर विजय पाना सद्गुरु की शरणागति के सिवा अन्य कहीं संभव नहीं है (शिष्य को अपनाकर सदगुरु 'नाम' की ताकत उसकी आत्मा को दे देते हैं। यही है। "सदगुरु शब्द सहाई।" जिस दिन से मनुष्य को सद्गुरु से' नाम' मिलता है, उसी दिन से वह 'नाम' जीव की सुरक्षा इन शत्रुओं अर्थात 'मन' की अन्तर-शक्तियों से करता है। 'नाम' मनुष्य-देह के अन्दर 'मन' की शक्तियों से लड़ने के विरुद्ध सतु-शक्तियाँ उत्पन्न कर देता है। 'नाम' आसुरी शक्तियों से लड़कर बंधन में फँसी 'आत्मा' का बचाव करता है। 'नाम' मनुष्य के अन्दर विवेक, ज्ञान, क्षमा, संतोष और दीनता को उत्पन्न करके मन की शैतानी शक्तियों को परास्त करता है। विवेक रूपी राजा के बहादुर सरदार ज्ञान, क्षमा, संतोष, दीनता; मोह रूपी राजा के सरदारों काम-क्रोध-लोभ- अहँकार को उनकी अवगुणी सेना सहित पराजित कर देते हैं।

सचे'नाम' की अध्यात्मक- शक्ति मिलने के बाद 'मन' के कर्मों को करवाने वाले काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहँकार स्पष्ट दिखाई पड़ने लगते हैं। इस कारण 'आत्मस्वरूप' की रक्षा होती है, आदमी स्वयं को जानने लगता है। कोई पाप कर्म नहीं कर पाता। जैसे ही कोई हीन कर्म का विचार आता है तो 'नाम' की शक्ति विचार बदल कर सतर्क होने के लिए प्रेरित कर देती है। हीन भावना से मुक्त होकर आचार, विचार, व्यवहार आदि शुद्ध हो जाते हैं। ऐसे व्यक्ति को कोई मूर्ख नहीं बना सकता, इसके विपरीत 'नामी' व्यक्ति को दुनिया के लोग मूर्ख लगते हैं। एक 'नामी' व्यक्ति जानता है कि दुनिया के लोग शरीर और मन के व्यक्तित्व में भूले हैं। सबको अपने व्यक्तित्व का अहँकार मात्र है। मेरा शिष्य आत्मनिष्ठ होकर हृदय में निवास करता है। मन द्वारा संचालित मस्तिष्क (Brain) का दास मेरा शिष्य नहीं रहता। संसार के लोगों के आचार-व्यहवार उसे अविवेकपूर्ण लगने लगते हैं।

बिना सत्य 'नाम' पाये मनुष्य लोहार की धौंकनी के चमड़े की तरह मसान ही है। जीता जागता हुआ एक गुणहीन मनुष्य है। उसका जीवन व्यर्थ ही चला जाता है, जीवन-मृत्यु के चक्र में बँधा हुआ। बिना सत्य 'नाम' पाये मनुष्य एक जीवित प्राणी भी मुर्द के समान है।

तब, कबीर साहिब ने समझा कर कहा धर्मदास तुम चिंता मत करो सार नाम सत्पुरुष कहाया।' 'पुरुष शक्ति जब आन समाई तब नहिं रोके काल कसाई।' हे धर्मदास! तुम्हारे पास जो नाम है सबसे न्यारा है, अमोलक है, सजीवर है, अनादि है, नित्य है। यह 'सार नाम' स्वयं सत्यपुरुष है। इसी सारनाम से परमपुरुष ने अमरलोक प्रकट किया और यही 'सारनाम' मानव को भवबंधन से मुक्ति दिलाने वाला है। "सारनाम से लोक बनाया, सार नाम हँसन मुक्ताया।" इसी सारनाम की डोर पकड़कर प्राणी जगत से मनुष्य अमरलोक जायेगा।

दास कबीर ले यें संदेशवा, सार शब्द गहि चलो वा देशवा।

जो मनुष्य सार-शब्द पा लेता है वह उस 'शब्द' का ही हो जाता है। उसे फिर कालपुरुष के बनाये नियम जप-तप-तीर्थ-व्रत आदि की जरूरत नहीं रहती है। साहिब जी ने चेताया कि-

शब्द विदेह नाम सर्वोपरि, सब घट रहा समाई। 
कहे कबीर अबकी जो बुझे, अमरलोक चलि जाई।।

सत्य नाम मिलने के बाद मेरे शिष्य सब चाह और चिंता से मुक्त होकर सुरक्षित अनुभव करते हैं। उनमें पहले के जीवन और आज के जीवन में बहुत अंतर है। पहले मन जो चाहता था करवाता था, अब नहीं करवा सकता है। मन की सब चालबाजियाँ और हरकतें अब समझ में आती हैं, दिखाई देती हैं हर 'नामी' को। 'मन' मालिक नहीं रहा, सत्य की लौ सदा जगाये रखती है। 'आत्मा' मन से मुक्त होकर, शरीर में रहते हुए भी हाइब्रिड बीज की तरह हो गई। अब किसी प्रकार का गलत खान-पान हो तो 'नाम' की चेतना तुरन्त रोक देती है। सब सत्य-भक्तों को सद्गुरु के सत्यनाम की ऊर्जा सदा जगाये रखती है। अंकुरी 'नामी' व्यक्ति को 'मन' द्वारा खराब नहीं किया जा सकता - हाइब्रिड हो गये। 'नामी' व्यक्ति को पल-पल संकेत मिलता रहेगा, मन के हथियार- काम, क्रोध, लोभ, मोह का वश नहीं चलता। इसीलिये वाणी है-

गुरु पारस गुरु परस है गुरु अमृत की खान। 
शीश दिये जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान।
.......कबीरा तो भी सस्ता जान।

मनुष्य जन्म एक चौराहा है, इस जन्म से सब दिशाओं में मार्ग जाते हैं। अनन्त सम्भावनायें मनुष्य के लिए अपना द्वार खोले खड़ी हैं। मनुष्य जो होना चाहे हो सकता है। पशुओं का भाग्य होता है, जिसे कोई बदल नहीं सकता। कुत्ता, कुत्ते की तरह ही जियेगा और कुत्ते की तरह ही मरेगा। मनुष्य का ऐसा भाग्य नहीं है। मनुष्य तो अनंत बीजों की भाँति पैदा होता है, जिस बीज पर श्रम करेगा वे ही फूल उसमें खिलेंगे। शरीर के लिए जियेगा तो शरीर का ही रहेगा। संसार के कर्मों से संसार के सुख-दुःख के फल ही मिलेंगे। हम प्रतिपल अपने प्रत्येक विचार, अपने प्रत्येक कृत्य से स्वयं का निर्माण कर रहे हैं।

साहिब-बन्दगी सत्संग मनुष्य को चेतना का साक्षात्कार पाना बताता है। केवल जिज्ञासा शांत करना नहीं, मुमुक्षु की दृष्टि पाना बताता है। और, सबसे बड़ी बात सद्गुरु का आश्रय है। ये तीनों दुर्लभ हैं; अलग-अलग भी और एक साथ मिलें तो, परमपिता का अनुग्रह ही है। मोक्ष फिर आपके करीब ही है।

संत आश्रय सबसे न्यारे। देखें पण्डा पुजारी मौलवी सारे। 
जीवन्त परमपिता की पूजा। सत्संग ऐसा मिले न दूजा।।

मनुष्य यदि नहीं पहचाने तो यह उसका अज्ञान है; गलत मार्ग का श्रम- साधना और बीज केंली के फूल ही देगा।

त्याग और वरण (भोग) दोनों ही कर्म हैं, मन की तपस्या है जो स्वयं करना है। इसके विपरीत सत्य-भक्ति जिससे मोक्ष प्राप्त होता है, उसके दाता सद्गुरु हैं। एक सद्गुरु संत ही गुप्त "नाम" देकर शिष्य के सब पाप काटकर पाप हर लेता है। सत्य-भक्त स्वयं को योग-साधना और ध्यान से पार नहीं होता अपितु सद्गुरु संत स्वयं में शिष्य की 'आत्मा' को समाकर (बंध करके) निरंजन लोक से पार ले जाता है। जीवात्मा सदा के लिए नश्वर लोकों और कर्मफल-भोग से मुक्त होकर अक्षय अमरलोक पहुँच जाती है।

किसी भी प्रकार की क्रिया, फल की आकांक्षा लिये रहती है। हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है और निश्चित फल अवश्य मिलता है। इसी से चौरासी लाख योनियों की बार-बार यात्रा होती है। कालपुरुष के घेरे से निकलना संभव नहीं होता। महर्षि अष्टावक्र ने किसी भी प्रकार का अनुष्ठान (समाधि) बाधक ही बताया है। यम-नियम, आसन, मुद्रा, प्राणायाम साधने को नहीं कहा। क्रिया ही मुक्ति में बाधा बन जाती है। जैसे मकड़ी स्वयं जाल बुनती और उसी में स्वयं को फँसाती है, उसी प्रकार कालपुरुष के बंधन में 'आत्मा' उलझी है।

आत्म-अनुभव का प्रकाश किसी काल्पनिक प्राण-प्रतिष्ठित-मूर्ति से मिलना सम्भव नहीं है। सद्गुरु जिस गुप्त मूल 'नाम' की दीक्षा द्वारा अपनी सुरति से देता है; वही सद्गुरु के ध्यान से शिष्य को आत्मरूप में मिलता है। 'सत्य' पथ सद्गुरु का ध्यान ही है जो सीधा 'आत्मा' से जुड़ता है, सुरति योग है। यह व्रत-तीर्थ-जप-तप-साधना और संन्यास से सहज है, सरल है। प्रत्येक गृहस्थ भी सद्गुरु-शब्द और नियमों का पालन करके पूर्ण सुरक्षा का अनुभव करते हुए मोक्ष पाता है। इसके विपरीत कठिन तपस्या के लिए संन्यासी बनकर गृह-त्याग से भी कोई मन के बंधनों से मुक्त नहीं होता।

अपने अन्दर ही परमात्मा को पाने की बात तो सब करते हैं पर उपाय कोई नहीं बताता। इसी कारण मनुष्य यहाँ-वहाँ भटक कर धर्म मान रहा है। आत्मज्ञान किसी को नहीं मिलता। एक पूर्ण गुरु की तलाश करने की शिक्षा मनुष्यों को कहीं नहीं मिलती है। साहिब जी ने बहुत सरल तरीके से 'सद्गुरु' और 'नाम' के स्वाँस-स्वाँस में सुमिरन का उपाय 'आत्मस्वरूप' को पाने के लिए दिया। ध्यान रोक कर शरीर के अन्दर किसी भाग में एकाग्र करने नहीं कहा। स्वाँस और सुरति के 'मध्य' रहकर शीश से सवा-हाथ ऊपर सद्गुरु को ध्यान का माध्यम बनाने कहा, इसी को अन्तर में जाना कहा। सद्गुरु ही परमात्मा को खड़ा करके स्वयं हट जाता है, शिष्य को भटकने नहीं देता; मन द्वारा उत्पन्न भ्रमों से सुरक्षा करता है। इसी सुरति-योग को वेदों से आगे स्वाँसों की साधना और स्वसंवेद कहा।

सूक्ष्म वेद भेद जो पावे, अजर अमर होय लोक सिधावे।

मन-आत्मा-प्राण-स्वाँसा-देह-ब्रह्माण्ड और मोक्ष के आध्यात्मिक ज्ञान के बजाय मनुष्यों को बाहरी आडम्बरों की पूजा-भक्तियों में उलझा दिया गया है। निज आत्मस्वरूप के ज्ञान से वंचित कर सांसारिक गुरुओं ने मनुष्यों को शरीर के जीवन-मरण-भोग-कर्म और कर्मफलों के धर्म तक सीमित कर दिया है। सगुण-भक्ति में भी आज कोई राम-भक्त, गोस्वामी तुलसीदास के इस तत्व-ज्ञान का सत्संगी नहीं है कि ब्रह्मा और शिव शंकर के समान होने पर भी पूर्ण गुरु के बिना भवसागर से पार होना संभव नहीं है।

गोस्वामी जी ने कहा-

गुरु बिन भवनिधि तरइ न कोई। 
जौं विरंचि शंकर सम होई।।
ब्रह्म नाम ते नाम बड़ वरदायक वरदानि।
रामचरित सत्कोटि में, लिया महेश जिय जानि।।

सांसारिक धर्म जगत में मग्न धर्म अनुयायी कबीर साहिब की इस सीख के सत्संगी नहीं बनना चाहते कि सद्गुरु की दया-कृपा के बिना, आत्म-ज्ञान नहीं होगा। एक पूर्ण गुरु की शरण में स्वाँसा (निरति) और सुरति (आत्मा) के अन्दर के जोड़ को जाने बिना परमात्मा को नहीं जाना जा सकेगा।

स्वाँस सुरति के मध्य में, कबहूँ न न्यारा होय। 
ऐसा साक्षी रूप है, सुरति निरति से जोय।।

स्वसों को सुरत में लगा कर ही 'मन' रूपी पवन (निरति) को घेर कर उल्टा चलाया जा सकता है। इस प्रकार स्वाँस पवन को शीश से सवा हाथ ऊपर अधर में ले जाकर सद्गुरु में ध्यान एकाग्र करके जन्म-मरण के भ्रम का ज्ञान हो जावेगा। इसी क्रिया से देह रूप पिण्ड में ब्रह्माण्ड का खेल दिखेगा और जगत का भ्रम टूटेगा। शीश और अधर के बीच सुरति में ध्यान करने पर देह भी आकाशवत लगेगा। इसी से सुषुम्ना नाड़ी रूप डोर पलट कर अधर में ले जावेगी। यही पवन को पलट कर शून्य में घर करना है। स्वाँसा रूप मन-पवन को स्वयं की साधना-भक्ति से अधर-सुरत में रोकना संभव नहीं है। पूरे गुरु अर्थात् सद्गुरु के 'नाम' सुमिरण से ही स्वाँसों को सुरति से जोड़ा जा सकता है। वाणी है-

खेल ब्रह्माण्ड का पिण्ड में देखिया, जगत की भ्रमना दूर भागी। बाहरा भीतरा एक आकाशवत्, सुषुम्ना डोर तहाँ पलट लागी।। 
पवन को पलट कर शून्य में घर किया, घर में अधर भरपूर देखा।
कहे कबीर गुरु पूरे की मेहर से, त्रिकुटी मध्य दीदार देखा।।

सिद्धियों से कामनायें उत्पन्न होती हैं। कामना से मोह उत्पन्न होता है। मोह से लोभ उत्पन्न होता है। लोभ से वासना उत्पन्न होती है। इन सब की पूर्ति की कमी से क्रोध उत्पन्न होता है। इसलिये सिद्धि प्राप्त मनुष्य की शरण में आने वाले हर व्यक्ति में भी यही दोष उत्पन्न होना स्वाभाविक परिणाम है। यही सब संसार में चल रहा है। यह भी सत्य है कि सभी मनुष्यों का प्रारब्ध या पुण्यों की पूँजी सद्गुरु शरण तक पहुँचने की नहीं होती। मनुष्य देह के अन्दर आठ कोने, अष्टदल कमल अन्तःकरण के बीच 'मन' घूमता रहता है।

(1) उत्तर-दल पर 'मन' जब जाता है तो भक्ति भाव, परमार्थ, दया की भावनायें आती हैं। मनुष्य कुछ घंटे शांत रहेगा। (2) जब मन दक्षिण- दल पर जाता है तो गुस्सा आयेगा; आप कभी-कभी कहते हैं कि मूड ठीक नहीं है। बिना बात लड़ने लग जाते हैं, पता नहीं चलता, बहुत क्रोध आयेगा। (3) पश्चिम-दल पर 'मन' बैठेगा तो दिल में विषय-विकार उत्पन्न होंगे। (4) पूर्व-दल पर 'मन' रहेगा तो हँसी-मजाक करोगे। हँसी वाली बात नहीं हो फिर भी हँसी आयेगी। (5) वाम वायु-दल पर 'मन' रहेगा तो लोभ उत्पन्न करेगा। (6) अग्नि-कोण पर 'मन' बैठेगा तो ईर्ष्या उत्पन्न होगी; दूसरे की बुराईयाँ बोलते रहोगे। (7) नैऋत्य-दल के कोण पर बैठेगा मन, तो वैराग्य उत्पन्न होगा। और (8) ईशान-दल पर 'मन' बैठेगा तो अहंकार उत्पन्न होगा, उतनी देर घमण्ड में रहेगा मनुष्य। इस विधि सबको 'मन' नचाये जा रहा है। काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार से सब कर्म करवाये जा रहा है। आपको दुखी रखता है, आपको सुखी रखता है; इस तरह सबको जकड़ा हुआ है। कोई इससे बचकर भाग नहीं सकता। पूरी-पूरी हुकूमत चल रही है 'मन' की। वो चाहे तो आप खुश हो जाते हैं; वो चाबी घुमाता है तो दुखी हो जाते हैं। हर जीवात्मा को चौरासी चक्कर में डालना है; इसलिये निश्चित पाप करवाना ही है।

दस्सों दिशा में लागी आग, कहे कबीर कहाँ जइयो भाग।

आठों-दल पर 'मन' घूमता रहता है मनुष्य के शरीर में; जहाँ-जहाँ जायेगा, मनुष्य वैसा-वैसा करता जायेगा। कबीर साहिब भी कहते हैं कि - मेरी बातों को सुनकर लोग मुझ पर खीझते हैं, क्रोध करते हैं.... लेकिन मुझसे झूठी बात नहीं कही जायेगी... और सच तो यह है कि जिसने इस संसार की रचना की है, वो खुद भी दुखी है।

साँच कहूँ तो सब जग खीझै, झूठ कहा न जाई। 
कहे कबीर वो भी दुखिया, जिन यह राह चलाई।।

आपका शत्रु कौन है, कैसा है, जो आपकी 'आत्मा' को अज्ञान की परतों में ढके हुए है? सब अक्षम हो रहे हैं। जब चिंतन करते हैं तो पाते हैं कि क्रूर ताकत जो आत्मा की विरोधी है, किसी को अपना निजस्वरूप नहीं पाने दे रही है, वो 'मन' ही है।

मन 24 घण्टे आत्मा को भ्रमित किये हुए है। आखिर क्यों? क्योंकि जितने भी काम हैं, उनमें 'आत्मा' की ऊर्जा (शक्ति) चाहिये। यदि आत्म- तत्व को निकाल दो तो संसार में कुछ नहीं होगा, वीरान हो जायेगा 'मन' का यह कल्पित संसार। उसी 'मन' से अलग करके आपको 'आत्मस्वरूप' जानने की शक्ति देने मैं आया हूँ; वो 'वस्तु' केवल मेरे पास है।

साहिब-बन्दगी सत्संग से संसार को यह सच्चा ज्ञान दिया जा रहा है कि "मनुष्य को बनाने वाला, चलाने वाला, और मिटाने वाला 'परमपुरुष' (साहिब) नहीं है बल्कि जीवात्मा के साथ रहने वाला स्वयं निराकार- मन (निरंजन) है।" 'मन' ही पूरे जीवन साथ रहता है मनुष्य का "काल" बनकर। काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार रूप 'मन' के ये ही अचूक शस्त्र हैं जिनसे वो विनाश और निर्माण करता है। पूरा संसार इन्हीं पाँच शत्रुओं के चँगुल में है। जब तक मनुष्य इन पाँच खूँखार शत्रुओं के काबू में है, तब तक मनुष्य को कभी भी सुख और शांति की प्राप्ति नहीं हो सकती। जब तक मनुष्य 'मन' की सीमा के अन्दर बँधा है तब तक मनुष्य न तो अपनी 'आत्मा' को जान सकता है और न ही 'परमात्मा' को पा सकता है। क्योंकि मनुष्य अज्ञानवश उसी 'निराकार मन' (काल) की भक्ति कर रहा है जो उसे मार कर खा जाता है।

मन आपका बैरी था, बैरी है और बैरी रहेगा। मन कभी भी 'निर्मल' नहीं हो सकता। संसार के लोग 'मन' को पूरी तरह से जानते नहीं, पहचानते नहीं हैं; इसलिये 'मन' की खुशी को ही अपनी खुशी मानते हैं। मन की इच्छा को ही अपनी इच्छा मानते हैं, मन के फैसले को ही अपना फैसला मानते हैं। याद रखना 'मन' पतित है, शापित (श्रापित) है। यह हमेशा अपने ही फायदे का पाठ 'आत्मा' को पढ़ाता है। इसका हरेक फैसला 'आत्मा' को बंधन और कष्ट में डालने वाला ही होता है। मन से कभी भी यह उम्मीद नहीं रखना कि यह आपका कल्याण चाहता है। मन को इस संसार में मज़ा 'इन्द्रियों' द्वारा मिल रहा है जिसकी ऊर्जा का स्रोत स्वयं 'आत्मा' है। याद रखना, शरीर की जिस भी 'इन्द्री' से आपने भौतिक संसार का मज़ा लिया, वो मज़ा अंत में आपको कष्ट देकर ही जायेगा। इन्हीं 'इन्द्रियों' के मज़े के कारण 'आत्मा' शरीर से मोह रखे हुए है, शरीर को एक पल के लिये भी छोड़ना नहीं चाहती।

साहिब कबीर ने भी चेताया कि तीन लोक में काल-निरंजन (मन) ने पाँच वृत्तियों और मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार; (कर्म) छः शरीर; चार मुक्तियों; अष्ट सिद्धि-नौ निधि का जाल बुनकर सभी जीवों को इस 'मायाजाल' में फाँस रखा है। कोई भी जीव 'तीन लोक' से परे अपने मूल स्रोत अर्थात् 'अमरलोक' तक नहीं पहुँच सकता है। बिना 'सद्गुरु कृपा' के कोई भी जीवात्मा इस 'मायाजाल' से नहीं छूट सकती चाहे कोई युग-युगान्तर तक ध्यान-समाधि क्यों न करता रहे।

'आत्मा' कोई और नहीं बल्कि तुम स्वयं हो जिसने 'मन' द्वारा रचे हुए पिंजरे (शरीर) को अपना ही रूप मान लिया है और अपने रखे हुए नाम से पहचान रहे हो कि मैं भूपेन्द्र ठाकुर हूँ। सजा तुम्हीं ने भोगनी है, किसी और ने नहीं। 'आत्मा' स्वयं अपनी शक्ति लगा रही है अपने विनाश के लिये। 'आत्मा' स्वयं को शरीर, इन्द्रियाँ, मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार मान चुकी है। 'आत्मा' स्वयं को इस बात का विश्वास दिला रही है कि मैं शरीर हूँ, आत्मा नहीं। इस भ्रम के कारण आत्मा उस ताकत को न तो देख पा रही है और न ही समझ पा रही है, जो ताकत आत्मा को निरन्तर संदेश दे रही है, कर्म करने के लिए प्रेरित कर रही है। आत्मा ने खुद को इच्छायें मान लिया है। आत्मा ने खुद को स्त्री/पुरुष मान लिया है। आत्मा ने उस सत्ता को 'परमात्मा' मान लिया है जिसने इस आत्मा को शरीर में डाला। इस पूरे भ्रमजाल को रचने वाला कोई और नहीं बल्कि स्वयं 'निराकार मन' है। तीन लोक इसी 'निराकार मन' का बुना हुआ भ्रमजाल है जिसमें रहने वाली सभी जीवात्मायें अनादिकाल से भ्रमित हैं। कबीर साहिब कह रहें हैं कि जब तक 'सद्गुरु' नहीं मिलेगा, आत्मा का इस मन और माया के बार-बार के जन्म-मरण से पिण्डा नहीं छूटने वाला।

सद्गुरु मिले सत्य शब्द लखावे, कर्म रेख बंधन मुक्तावे |

अपनी स्वाँसों को 'नाम' के सुमिरन में लगाओ, फालतू के चिंतन-मनन में नहीं। 'मन' पूरे दिन में एक पल भी यह प्रेरणा नहीं देने वाला आपको कि चल भाई सद्गुरु के नाम का सुमिरन कर ले, उनका ध्यान कर ले थोड़ी देर। मन पूरे दिन संसार में ही लगायेगा आपके ध्यान को। इसकी पहचान कर लो कि यही काल है। जितनी देर सद्गुरु का सुमिरन करोगे उतनी देर यह बँध जायेगा, इसकी हरकत रुक जायेगी।

कुछ पंथ दुनिया में जीने की कला सिखाते हैं। पर कैसे जीना है, कैसे रहना है, यह तो माता-पिता भी बताते हैं। दूसरी ओर कैसे दुनिया छोड़नी है, यह जानना अति आवश्यक है। जब इंसान दुनिया छोड़ने की कला सीख लेता है तो फिर रहने की कला अपने आप आ जाती है। फिर वो किसी को दुःख नहीं देता है, किसी से छल-कपट नहीं करता है। जब हम भक्ति क्षेत्र में देखते हैं तो पाते हैं कि भक्ति के प्रति समाज को सावधान करने की कोई इच्छा कहीं नहीं है। वे भी आज भक्ति क्षेत्र में जुट गए हैं जो भगवान के नाम पर ठगी कर रहे हैं। क्योंकि उन्हें समझाया गया है कि जो चाहो करो, थोड़ा इधर दे दो तो पाप कट जायेगा। इसी कारण इंसान भटक गया, उसमें भक्त का लक्षण नजर नहीं आ रहा है। ऐसे लोगों की बात भी छोड़ दें तो जो भक्ति दे रहे हैं, उनमें भी भक्ति का कोई लक्षण नहीं है।

मैं भक्तों को कहता हूँ - भरोसे के बिना प्रेम नहीं हो सकता, प्रेम के बिना ध्यान नहीं हो सकता, ध्यान के बिना ज्ञान नहीं हो सकता, ज्ञान के बिना भक्ति नहीं हो सकती और भक्ति के बिना मुक्ति नहीं हो सकती।

'मन' को कैसे जानें?

'मन' क्या है? 'मन' का स्वरूप कैसा है? मन कहाँ रहता है? मन की क्रिया क्या है? मन कैसे क्रिया करता है? मन किस भाषा में बोलता है? मन क्या चाहता है और क्यों चाहता है? मन की ताकत क्या है? मन के हथियार कौन-कौन से हैं? मन का बंधन क्या है? मन ने कैसे बाँधा है आत्मा को? मन से 'आत्मा' को मुक्त करवाने का सूत्र क्या है? जब तक इन सभी प्रश्नों के उत्तर ठीक से नहीं समझोगे, इस 'मन' की मार से किसी भी कीमत पर बच नहीं सकते और न ही 'मन' को काबू कर सकते हो। "तेरा बैरी कोई नहीं, तेरा बैरी मन।"

मैं इन्हीं प्रश्नों के उत्तर से आपको 'आत्मा' और 'मन' को जानने में सक्षम बनाता हूँ। मेरा 'भक्त' संसार के आकर्षण में नहीं फँसता और फिर मुक्ति की ओर अग्रसर होता है।

'मन' क्या है?

मन 'निरंजन' है। निरंजन में 'निर' का अर्थ है नहीं और 'अंजन' का अर्थ है आँख से देखने वाला; मतलब है वो सत्ता जिसे किसी भी प्रकार से आँखों द्वारा नहीं देखा जा सकता है। इस तीन लोक का 'स्वामी' मन ही है। इसी मन को साहिब जी ने 'कालपुरुष' कहा है। इसी मन के द्वारा सभी सांसारिक विकारों की रचना हुई है। मन के द्वारा ही इस ब्रह्माण्ड की रचना होती है। मन इसका संचालक और कर्ता है। मन के द्वारा ही इस पूरे ब्रह्माण्ड (तीन लोक) का नाश होता है।

'मन' का स्वरूप कैसा है?

मन 'निराकार' है। इस 'मन' के स्थूल रूप शरीर (5-कर्म इन्द्रियाँ, 5-ज्ञान इन्द्रियाँ) हैं और 'मन' का सूक्ष्म रूप है मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार (4 सूक्ष्म इन्द्रियाँ जिन्हें 'अन्तःकरण' भी कहते हैं)। जब यह मन इच्छा करता है तो इसे 'मन' कहते हैं। जब यह मन फैसला करता है तो इसे 'बुद्धि' कहते हैं। जब यह मन याद करता है तो इसे 'चित्त' कहते हैं, और जब मन क्रिया करता है तो इसी मन को 'अहंकार' कहते हैं। जितने भी कर्म मनुष्य कर रहा है वे सभी कर्म इसी 'मन' की प्रेरणा द्वारा हो रहे हैं।

'मन' कहाँ रहता है?

'मन' शून्य में अर्थात् 'आकाश तत्व' (पंचम तत्व) में रहता है। यहीं शून्य में रहकर पूरे ब्रह्माण्ड का संचालन करता है। मनुष्य शरीर के अन्दर इस 'मन का वास' सुषुम्ना नाड़ी में है जहाँ से यह पूरे शरीर को अपने आदेश मस्तिष्क द्वारा प्रेषित करता है।

'मन' की क्रिया क्या है?

मन की क्रिया 'कर्म' है। 'पाप' और 'पुण्य' दोनों ही प्रकार के कर्म इसी 'मन' द्वारा होते हैं। जितने भी कर्म (क्रियायें) आप सब कर रहे हैं ये सब मिलकर 'मन' ही है। इन्हीं सब मन की क्रियायों के बीच में 'आत्मा' कैद है।

'मन' कैसे क्रिया करता है?

'मन' हरेक क्रिया को करवाने के लिए सबसे पहले 'इच्छा' करता है। उदाहरण के लिए आप में इच्छा हुई आम खाना है। यह इच्छा मन ने की 'आम खाना है' पर आप समझ नहीं पा रहे कि यह इच्छा मन ने की या फिर आत्मा ने की। ध्यान रहे 'आत्मा' शरीर नहीं है और न ही आत्मा में इन्द्रियाँ हैं। आत्मा सभी प्रकार की इच्छाओं से परे है, आत्मा में कोई भी इच्छा नहीं है। जो आप यह सोच रहे हैं कि ये मेरी 'इच्छा' है, यही 'मन' है 'आत्मा' नहीं है। अब मन 'इच्छा' करने के बाद 'बुद्धि' द्वारा निश्चय करता है कि आम खरीदने के लिए पैसा है या नहीं और अगर पैसे हैं तो आम कितने पैसों से खरीदूँ। यह पूरा फैसला 'मन' के द्वारा ही होता है। जब 'बुद्धि' से निश्चय हो जाता है कि पैसे भी हैं और आम खरीदना भी है तो फिर 'मन' चित्तकोष में समाकर याद करता है कि 'आम किस जगह से मिलेंगे', 'किस दुकान पर मिलेंगे', 'वहाँ तक किस रास्ते द्वारा जाया जाए'। अन्त में मन दिमाग (Brain) को 'क्रिया' करने का हुकुम देता है अपनी तरंगों द्वारा और दिमाग पूरे शरीर को संचालन करने के लिए कहता है। इस प्रकार शरीर के माध्यम से 'मन' हर क्रिया (अहंकार) को 'कर्म' रूप में तब्दील कर देता है।

'मन' किस भाषा में बोलता है?

मन की भाषा 'तरंग' है। मन अपने सभी संदेश सुषुम्ना नाड़ी के मध्य में बैठकर तरंगों द्वारा दिमाग (Brain) तक पहुँचाता है। दिमाग की केवल एक ही ड्यूटी है, 'मन के हर एक हुक्म को जो तरंगों द्वारा उस तक पहुँचते हैं, उन सभी का पालन करना। दिमाग पूर्ण रूप से 'मन' का गुलाम (नौकर) है, क्योंकि दिमाग मन की रचना है।

'मन' क्या चाहता है और क्यों चाहता है?

मन इस ब्रह्माण्ड (तीन लोक) में केवल एक चीज़ चाहता है और वो यह है कि "कोई भी जीवात्मा उसकी कैद से मुक्त न हो पाये।" मन इसलिए ऐसा चाहता है क्योंकि वह जानता है कि अगर इंसान ने अपनी आत्मा को जान लिया तो फिर वह मुक्त हो जायेगा और कभी भी फिर दोबारा उसकी आज्ञा का पालन नहीं करेगा। 'मन' को इस बात का पूरा ज्ञान है कि आत्मा के सहयोग के बिना वह पंगु है अर्थात् कुछ भी नहीं कर सकता है। आत्मदेव अगर चेतन हो गया तो फिर इसे अपने 'मूल' तक पहुँचने में कोई बाधा नहीं रोक सकती। इसलिये 'मन' ने सभी जीवात्माओं को घोर अंधकार (अज्ञान) में रखा हुआ है, इस ब्रह्माण्ड में।

'मन' की ताकत क्या है?

मन की ताकत 'अज्ञान' है। अज्ञान की उत्पत्ति 'अंधकार' से होती है और इस ब्रह्माण्ड (तीन लोक) में अंधकार 'आकाश तत्व' (पंचम तत्व) के द्वारा है। इसी 'आकाश तत्व' (शून्य) में 'मन' समाया हुआ है।

'मन' के हथियार कौन-कौन से हैं?

'मन' के पास 'पाँच' अचूक हथियार हैं जिसके द्वारा यह हर जीवात्मा पर अपने वार करता है। ये पाँच हथियार हैं: काम-क्रोध-लोभ-मोह और अहंकार।

'मन' का बंधन क्या है?

'मन' का बंधन भी 'अज्ञान' है। अज्ञान यह है कि हरेक 'आत्मा' खुद को शरीर और मन बनाकर इस संसार-सागर में जन्म और मरण के कर्मजाल में फँसी हुई है। सच यह है कि इस 'आत्मदेव' को किसी भी कर्म की आवश्यकता नहीं है। केवल 'अज्ञान' के कारण यह 'आत्मदेव' खुशी-खुशी मन की प्रेरणा से सभी प्रकार के (क्या पाप-क्या पुण्य) कर्मों में शामिल हो रहा है। फिर इन्हीं किये हुए कर्मों का फल भोगने के लिए 'आत्मा' को बार-बार शरीर के बंधन में बँधना पड़ रहा है।

'मन' ने किससे बाँधा है आत्मा को?

मन ने 'आत्मा' को काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार का जाल बुनकर उसी में बाँधा हुआ है। कोई भी जीवात्मा अपनी ताकत से इन बंधनों से मुक्त नहीं हो सकती है। ये पाँचों शत्रु 'अजय' हैं। केवल 'सद्गुरु की कृपा' के द्वारा ही इन 'अजय' शत्रुओं पर सवारी की जा सकती है अर्थात् इन पाँचों को काबू किया जा सकता है। अन्य किसी भी तपस्या से, साधना से, मन्त्र से, भक्ति से, योग से, शब्द से, नाम कमाई से; इन 'अजय' शत्रुओं पर कभी भी विजय नहीं प्राप्त की जा सकती है।

'मन' से 'आत्मा' को मुक्त करवाने का सूत्र क्या है?

मन के सभी बंधनों से 'आत्मा' को केवल एक ही सूत्र द्वारा मुक्त करवाया जा सकता है और वह सूत्र है 'नाम' (विदेह नाम) जो इस ब्रह्माण्ड में केवल एक पूर्ण गुरु 'सद्गुरु' के पास ही उपलब्ध होगा। यह 'नाम' गुप्त है जिसे किसी भी धर्मग्रंथ द्वारा नहीं पाया जा सकता है। जिस 'नाम' की बात मैं कर रहा हूँ वह 'नाम' अमर है, जीवित है और किसी भी दृष्टि में लिखने, पढ़ने, बोलने में नहीं आता है। जिस 'नाम' के द्वारा 'आत्मा' की मुक्ति होगी वह 'नाम' सद्गुरु की 'सुरति' में है। केवल 'सद्गुरु कृपा' के द्वारा ही आत्मा को उस 'नाम' की प्राप्ति हो सकती है जिसे प्राप्त करके 'आत्मा' हमेशा के लिए 'मन और माया' (जन्म-मरण के चक्र) के बंधनों (तीन लोक) से मुक्त हो जायेगी और अपने मूल (चौथे लोक/अमरलोक) अर्थात् साहिब (परमपुरुष) में समा जायेगी। कबीर साहिब कह रहे हैं - "तीन लोक में मन का राज, चौथे लोक में नाम निर्वाण।।"

मानव देह रूप ब्रह्माण्ड में गुदा द्वार से दशवें द्वार तक सभी सात-चक्र काल-निरंजन की सीमा तक ही हैं। इन चक्रों पर ध्यान से भौतिक शक्तियाँ ही उत्पन्न होती हैं जो वास्तव में 'मन' की ही शक्तियाँ हैं (इन्हीं को दिव्य शक्तियाँ भी कहा जाता है)। इन सात-चक्रों में किसी पर भी ध्यान केन्द्रित करने से आत्मा की सत्य 'आध्यात्मिक शक्ति' उत्पन्न नहीं हो सकती है। काल-निरंजन (मन) का वास सहस्रार चक्र ही है, यहीं से वह इस नश्वर संसार की हर जीवात्मा (सतगुरु को छोड़कर) को संचालित करता है। एक भी व्यक्ति की आत्मा (हमारा आत्मस्वरूप) तीन-लोक की सीमाओं से पार नहीं जा सकती है। सातों-चक्रों में से किसी पर भी ध्यान-योग, काल-निरंजन की ही रचना में ले जाता है। सात-चक्रों में किसी पर ध्यान-साधना से अष्ट सिद्धि और नौ निधियों में से एकाधिक की प्राप्ति ही होती है। 'आत्मा' का ज्ञान नहीं हो सकता। अष्ट सिद्धियाँ और नौ निधियाँ सभी हरेक मनुष्य-देह में ही अवस्थित हैं। ये सभी काल-निरंजन (मन) द्वारा ही जागृत होती हैं और "मन की शक्तियों (दिव्य शक्ति) के रूप में जानी जाती हैं।

ये सभी अद्भुत शक्तियाँ मनुष्य के शरीर और 'मन' से ही सम्बन्धित हैं और इनका परमात्म शक्तियों (परमपुरुष-साहिब) से कोई सम्बंध नहीं है। इनका किसी भी प्रकार से आध्यात्मिक शक्तियों (आत्मा) से सम्बंध नहीं है। एक भी व्यक्तिगत 'आत्मा' पूरी सृष्टि में मन और शरीर (माया) के बंधन से स्थाई मुक्ति नहीं पा सकती, चाहे कोई समस्त अष्ट सिद्धियाँ और नौ निधियाँ पाने में सफल क्यों न हो जाए।

हम 'अमरलोक' की बात कर रहे हैं, 'आत्मा' की बात कर रहे हैं। बड़े दुःखों का संसार है। कभी कुछ लोग समस्या लेकर आते हैं, कहते हैं, कृपा करो। मैं कहता हूँ कि ठीक बात है, पर कम-से-कम 'आत्मा' के लिये भी तो सोचो न। यह तो शरीर की जीवन की क्षणिक समस्या है। जो बड़ी समस्या है, उसके लिए आदमी नहीं सोच रहा है। कभी भौतिक पदार्थ मिल जाते हैं, कभी नहीं मिलते हैं; यह आनी-जानी माया है। साहिब जी ने बड़ी प्यारी बात कही - "कहे कबीर किसे समझाऊँ, सब जग अँधा।"

फिर कह रहे हैं

मैं आया संसार में, फिरा गाँव की खोर। ऐसा बंदा न मिला, जो लीजै फटक पिछोर।।

मृत्यु के समय जीवात्मा को इस शरीर से निकाल कर फिर दूसरे शरीर में कष्टप्रद प्रक्रिया से प्रविष्ट किया जाता है। दूसरे शरीर में जाकर 'आत्मा' अपने पिछले शरीर की सुध भूल जाती है और जो नया जीव-शरीर मिलता है, उसी को अपना और सच्चा समझने लगती है। ऐसे ही हर बार सब नित्य लगता है। जन्म-मृत्यु का यह क्रम इसी तरह चलता रहता है और अनश्वर-निर्मल यह 'आत्मा' चौरासी के चक्कर काटती हुई अनन्त दुःखों को प्राप्त होती है।

इसलिए मोक्ष का ज्ञान नितांत आवश्यक है। मोक्ष से तात्पर्य ही सच्चे और अटूट आनंद की प्राप्ति है जो 'आत्मा' का स्वभाव है। सब आनंद की खोज में तो हैं, सच्चे सुख की तलाश में तो हैं पर 'अज्ञान' के कारण 'उपाय' नहीं कर रहे हैं। 'आत्मा' न दुःखों और कष्टों से भरे संसार से छूटकर आनंद के सागर में पहुँच सके ऐसा 'उपाय' देने वाला 'सद्गुरु' के सिवा अन्य कोई नहीं है। 'सद्गुरु' को खोजना होगा, पहचानना होगा।

मेरे परदादा गुरु ब्राह्मण थे, वे चित्रकूट में रहते थे। उन्होंने मेरे दादा गुरु स्वरूपानंद जी को अपनी गद्दी दी, वे क्षत्रिय थे। जाति में उत्तराधिकारी नहीं बनाया। दादा गुरु ने मेरे गुरु स्वामी गिरधरानंद जी परमहंस को गद्दी दी, वह जाति से ब्राह्मण थे। स्वामी जी ने मुझे गुरु गद्दी सौंपी। उनके तीन पुत्रों को उत्तराधिकारी नहीं बनाया, उनमें से किसी को गद्दी नहीं दी। हम देख रहे हैं। हर कलियुगी महात्मा अपने परिवार-बच्चों की फिक्र में लगा है, समाज की फिक्र नहीं है। इन महात्माओं को अपने लाखों-करोड़ों शिष्यों में से एक भी काबिल नहीं मिला, अपना पुत्र या रिश्तेदार ही क्यों दिखा?

मेरे ग्यारह-आश्रम जला दिये गये; देखो कितने खतरनाक लोगों की टीम है। मुझे ठीक-ठीक मालूम है जिन्होंने जलाए। उन्होंने भण्डार के पतीले, बर्तन आदि कुछ भी नहीं छोड़ा, सब लूटकर ले गये। हम 21वीं शताब्दी में जी रहे हैं। आश्रम जलाए, लूट की, यह छोटी बात नहीं थी। उन्होंने सोचा कि ये कमजोर, परेशान लोग हैं, पर यह उनकी भूल थी। और भी तेजी से मेरे सत्संग आश्रमों का निर्माण होता चला गया। हम कमजोर नहीं हैं, शिष्ट हैं। हमने अहिंसा को कमजोरी से नहीं ताकत से ओढ़ा हुआ है। मेरे शिष्य सच्चे भक्त हैं, संसार आकर्षण और बुराईयों से दूर हैं।

मैं मानता हूँ कि मुझसे अमीर कोई है ही नहीं, क्योंकि मुझे किसी से कुछ चाहिए ही नहीं। "वो ही शहंशा है जिसको नाहि चाह...।"

मैं मानता हूँ कि मुझसे अधिक ताकतवर भी कोई नहीं है। रात-दिन लगा हूँ लोगों को आत्म-कल्याण के पथ पर ले जाने। उन्हें मेहनत नहीं कर सकता और मेहनती बेईमान नहीं हो सकता है। मुझे समझाने कि सत्-भक्ति क्या है। एक बात समझ लेना कि बेईमान निंदा-स्तुति से कुछ नहीं लेना है, पर समाज चिंतन करे। इसलिये रात-दिन भ्रमण करके, सत्संग करने, सब जगह जी रहा हूँ। समाज कुरीतियों से बचे, पारखण्डी बाबाओं से बचे जो आपको नरक की ओर ले जा रहे हैं।

सत्य-भक्ति में शिष्य के लिये 'सद्गुरु' ही परम पुरुष है। जिस शिष्य ने अपने सदगुरु को परमात्मा नहीं माना वह शिष्य ही नहीं है। "एक सच्चा गुरु स्वयं एक परम शिष्य है।" शिष्य ही सद्गुरु की शक्ति है। एक पूर्ण पात्र शिष्य को ही सद्गुरु स्वयं स्वरूप में एकाकार कर लेता है। तब वे दो नहीं एक ही परमात्म रूप होते हैं। यही तो वो स्थिति होती है जब शिष्य परमात्मा साक्षात्कार कर अपने शरीर और मन से पृथक होता है। सद्गुरु इसी प्रकार संसार के मनुष्यों से पृथक होता है। सद्गुरु इसी प्रकार संसार के मनुष्यों को सत्य-पथ पर ले जाता है; शिष्यों के माध्यम से प्रकाश किरणें बिखेरता है।

सभी यति-तपी, योगी, सन्यासी कितना भी तप क्यों न कर लें, वे अपने तन के एक-एक स्थान (चक्र) की सिद्धि करते-करते जन्म नष्ट करते रहेंगे। एक सद्गुरु को समस्त ब्रह्माण्डों की शक्तियाँ स्वयं-सिद्ध रहती हैं, इसलिये सद्गुरु अपने शिष्यों की इन ब्रह्माण्डों की सीधे प्राप्ति करवाकर इनके 'मायाजाल' में फँसने ही नहीं देता है। छः विभूतियाँ तो केवल त्रिदेवों और उनके कुछ भगवान अवतारों को प्राप्त हैं; इसलिये योगी-यति-सन्यासी एकाधिक सिद्धियाँ ही प्राप्त कर भ्रम में फँस जाते हैं। वे स्वयं सिद्ध पुरुष ही बन जाते हैं, मोक्ष का मार्ग और उपाय भूल जाते हैं। एक सद्गुरु अपने शिष्यों को इनमें फँसने से बचाता है। फिर भी कोई उलझता है, माया के चक्र में फँसता है, उसके लिए साहिब कबीर कहते हैं -

सात द्वीप नौ खण्ड में, सद्गुरु फेंका डोर। ता पर हँसा ना चढ़े, तो सद्गुरु का क्या जोर।।

सद्गुरु को पारस सुरति के स्पर्श द्वारा - जीवात्मा को उसकी मूल चेतना प्रदान करके परममोक्ष दिलवाती है, अपनी कृपा द्वारा। सद्गुरु कभी भी किसी भक्त को शब्द-कमाई या सुरति शब्द अभ्यास करने के लिए, नहीं कहते। सद्गुरु का ध्यान ही 'परममोक्ष' का द्वार है।

'नाम' देने के साथ ही शरीर छुड़वा सकता हूँ, उसी पल आत्मा का अमरलोक पहुँचा सकता हूँ; यह बात को मैं घमण्ड से नहीं बल्कि भरोसे के साथ बोल रहा हूँ। मुझे ऐसा करने में एक पल का समय भी नहीं लगेगा। ऐसा इसलिये नहीं करता हूँ कि यह 'मन' का संसार है। यहाँ पर 'मन' (निरंजन) ने सभी को शरीर के मोह में बाँधा हुआ है। आत्मा स्वयं को - शरीर मान रही है। आत्मा को शरीर से बेहद प्रेम हो गया है। संसार में सभी शरीर से प्यार कर रहे हैं, शरीर बनकर जी रहे हैं। अज्ञान के कारण शरीर मिटने के डर से रोते हैं, दुःखी होते हैं। स्वयं का बोध नहीं है, आत्मा का बोध नहीं है। इस संसार में मांस और हड्डियों की पूजा होती है।

अगर 'नाम' देते ही आत्मा को शरीर के बंधन से मुक्त कर दिया तो आप ही के परिवार वाले, रिश्तेदार मुझे हत्यारा कहेंगे, महात्मा नहीं। क्योंकि सभी 'मन' के गुलाम हैं, काल के दायरे में बँधे हैं। डर के मारे फिर कोई दूसरा मनुष्य (जीव) मेरे पास आएगा ही नहीं 'नाम' लेने के लिए, वो सोचेगा कि गुरुजी तो नाम देने के साथ ही मार डालता है, भागो रे भागो।

"है यहाँ सद्गुरु बिना कोई, मोक्ष का दाता नहीं।" यह बात ऐसे ही नहीं कही गई, वो 'सजीव नाम' देता है, जड़ी देता है जो अलौकिक है, विदेह है। वो 'नाम' रक्षा करता है, आपको जगा देता है। नाम पाकर आपका विवेक जाग जाता है क्योंकि सत्य नाम के बिना 'सुरति' अंधी है। अभी अज्ञान है क्योंकि हृदय अंधकार में है। अंधकार अज्ञान देता है। अंधकार है तो काम-क्रोध-लोभ-मोह आदि मन समझ आने लगता है, पूरा दिखने लगता है। नाम पाकर आप समझ सकते हैं कि क्या बदलाव आप में आया है।

गुरु बिन हृदय शुद्ध नहीं होई। कोटिन भौंति करे जो कोई।।

जिस निराकार सत्ता की सब अपना परमात्मा मान रहे हैं; साहिब जी कह रहे हैं वो सत्ता ही संसार का नाश करने वाली है। पूरा ब्रह्माण्ड (तीन लोक) 'कालपुरुष' निरंजन की उपासना कर रहा है। कालपुरुष को यह संसार कई नामों से सम्बोधित कर रहा है, जैसे - 'निराकार, निर्गुण ब्रह्म, पूर्ण ब्रह्म, ओंकार, हरि, हर, खुदा, GOD' आदि। साहिब जी कह रहे हैं कि सभी 'जीवों' को कालपुरुष ने अंधकार में रखा हुआ है इसलिये कोई भी अपनी साधना से परमपुरुष को प्राप्त नहीं कर पा रहा है। मनुष्य अनेकों यतन करता, चाहे युग युगान्तर तक भी उस परमपुरुष (साहिब) को प्राप्त करने के लिए रहे, पर बिना 'सद्गुरु' के कभी भी उस परमतत्व (परमपुरुष) की प्राप्ति नहीं कर पायेगा।

परमपुरुष (साहिब) द्वारा कोई भी जाति, धर्म, मजहब का सृजन नहीं हुआ है। ये सब धरती पर रहने वाले मनुष्यों ने ही सृजित किया है; अपने मन द्वारा अपनी कल्पना द्वारा। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बुद्धिस्ट, यहूदी, पारसी आदि जितनी भी धाराएं इस धरती पर हैं, इन सबकी रचना 'मनुष्य' द्वारा हुई है; परमात्मा द्वारा नहीं। यदि ये काम परमपुरुष द्वारा किया गया होता तो फिर परमात्मा ने माँ के गर्भ में ही सबके अलग-अलग धर्म, अलग-अलग जातियाँ सृजित कर देने थे। 'हिन्दू को माँ के गर्भ से ही हिन्दू बनकर बाहर निकलना था। 'मुस्लिम' को माँ के गर्भ से ही मुस्लिम बनकर बाहर निकलना था। पंडित' को माँ के गर्भ से ही माथे पर तिलक और जनेऊ लेकर बाहर निकलना था। 'मौलवी' को माँ के गर्भ से ही टोपी और दाढ़ी लेकर बाहर निकलना था। 'पादरी' को माँ के गर्भ से ही गले में 'क्रॉस' डलवाकर बाहर निकलना था। मानवता इसी मन (निरंजन) की ही रचना में उलझी है अनादिकाल से इसलिये कोई भी मनुष्य न तो खुद ही हकीकत को समझ पा रहा है और न ही उस एक परमात्मा (परमपुरुष) को जान पा रहा है जो मानव द्वारा सृजित धर्मों, जातियों, अपने-अपने भगवानों, मन शरीर के झमेले और झगड़े से बाहर हैं। साहिब जी ने उसी 'एक परमात्मा' (परमपुरुष) की 'सहज' प्राप्ति का सूत्र और भेद पूरी मानवता को दिया है।

गुरु और शिष्य का रिश्ता बहुत गहरा है। इस रिश्ते से गहरा रिश्ता संसार में और कोई भी नहीं है। संसार के सभी भौतिक रिश्ते तन और मन तक ही सीमित हैं, तन छूटते ही रिश्ता खत्म। लेकिन, गुरु का और शिष्य का रिश्ता तन और मन की सीमा से भी आगे का है, सीधा 'आत्मा' के साथ जुड़ा है। शिष्य की 'आत्मा' तक कोई आम गुरु नहीं पहुँच सकता है: वहाँ तक केवल एक पूर्ण गुरु अर्थात 'सद्गुरु' की ही पहुँच है। सद्गुरु के साथ रिश्ता जुड़ते ही शिष्य की 'आत्मा' (सुरति) जाग जाती है जो कि अनादिकाल से 'मन' और 'माया' के रंग में रंगी हुई है। सद्गुरु की 'पारस सुरति' का स्पर्श मिलते ही शिष्य की सुरति भी चेतन हो जाती है और ठीक 'मन' की तरंगों को पढ़ने लग जाती है जो हर पल उसे (सुरति को) थकित कर रही हैं।

सदगुरु का ध्यान करने से शिष्य की आत्मा के ऊपर से 'मन' और 'माया' की अज्ञान रूपी परतें खुद-ब-खुद छूटने लग जाती हैं और ध्यान के द्वारा ही शिष्य के अन्दर 'सदगुरु की' आध्यात्मिक शक्तियों का भी प्रवेश होने लग जाता है। यह पूरी प्रक्रिया बड़ी 'सहजता' के साथ होती चली जाती है।

साहिब जी ने समझाया हैं कि आत्मा तो सद्गुरु पाकर मन की गठन और बंधनों से मुक्त होने और निज लोक अमरधाम जाने की पात्र है। व्यक्ति तो एक शरीर मात्र है जिसमें व्यक्तित्व अर्थात मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार है। इन्हीं में 'आत्मा' फँसी है। इसीलिये भक्ति के लिए समय न मिलने पर और अनुभव न होने पर आप कहते भी हैं कि मन और माया में फँसे हैं। माया यह शरीर और 'मन' ही व्यक्तित्व है। केवल एक सद्गुरु ही इस बंधन को, इस गांठ को तोड़ने में समर्थ है।

शिष्य ने कहीं भी और कभी भी सद्गुरु के साथ छल-कपट किया तो फिर उसे कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। 'सद्गुरु' तो हर पल 'रूहानियत' देना चाहता है, बिना रुके; पर कोई सहजता से लेने वाला भी तो हो। वाणी तो समझा कर कह रही हैं, शिष्य को, कि अगर तुमसे पूरी दुनिया भी रूठ जाये तो चिंता नहीं करना, परमात्मा भी रूठ जाये तो भी घबराना नहीं; लेकिन ध्यान रहे कभी 'सद्गुरु को नहीं रूठने देना। क्योंकि अगर सद्गुरु रूट गया तो 'काल' के शिकंजे से स्वयं 'परमात्मा' भी नहीं निकाल पायेगा।

साहिब संतों ने जिस मुक्ति की बात की है, दावे के साथ कहा है कि 'सद्गुरु' और सुरति भक्ति से जन्मने और मरने की क्रिया सदा के लिये समाप्त हो जायेगी। क्योंकि सत्य-भक्ति से 'जीव' अपने सही स्वरूप को प्राप्त कर निज-अमरलोक को पहुँच जायेगा जहाँ से फिर कभी वापस नहीं आना होगा। दुनिया के शास्त्र-धर्मों पर आधारित लोग संतों की बात को समझे बिना ही सोच रहे हैं, 'सब भक्तियाँ एक ही हैं।'

साहिब कबीर पुकार-पुकार कर कह रहे हैं - हे बन्दे! इस झूठी दुनिया से ऊपर उठ और अपने देश चल। परमपुरुष 'सत्य' की भक्ति वेद-शास्त्रों की सीमा और विधान-ज्ञानियों की समझ से कहीं ऊपर है। वहाँ बुद्धि और कल्पना की पहुँच ही नहीं है।

सच्चे 'नाम' अर्थात 'आत्मा' के निज-नाम को नहीं पाने के कारण ही त्रिदेव भी माया के जाल में हैं, जैसे सृष्टि-कर्ता 'निरंजन' स्वयं दुःखी है। वे त्रिदेव जिनकी गण-गंधर्व सेवा करते हैं, जिनके आधीन जगत के समस्त देवता हैं। कालपुरुष (निरंजन) ही इस भवसागर का कर्ता और कारण है। सृष्टि के इस मायाजाल से केवल वही बच सका जिसने सद्गुरु से सच्चा 'नाम' लिया। साहिब जी ने चिताया

ऋषि मुनि गण गंधर्व असुर देवा। सब मिल करें निरंजन सेवा।। जाय निरंजन सो हो भेंटा। काल रूप धर करे समेटा।। वही निरंजन का विस्तारा। तामें उरझे सब संसारा।। भक्ति गुप्त जाने नहिं कोई। सुर्त सनेही पावै सोई।। इ नते भक्ति गुप्त है, सुनु धर्मदास सुजान ।।

देह आभास के कारण सुख-दुःख होते हैं। इसलिये संसार का सुख-दुःख दोनों भ्रम हैं। ये सब तो शरीर की अवस्था हैं - इच्छाओं की पूर्ति से सुख होता है और पूरी न होने से दुःख हो जाता है। 'आत्मा' इनसे परे है, संसार के किसी पदार्थ की इसे जरूरत नहीं है। 'आत्मा' का ज्ञान होने के बाद पता चलता है कि यह तो इन्द्रियों से परे है। यानी आत्म-तत्व को जानना ही होगा इसके अलावा मुक्ति को जानने का कोई उपाय नहीं है। हम जीवन में कुछ आवश्यक चीजों का वर्गीकरण करते हैं। कुछ चीजें आवश्यक हैं, कुछ अतिआवश्यक हैं। इसलिये भक्ति के लिए 'आत्म' ज्ञान अतिआवश्यक है। इसे प्राथमिकता देना है। बहुत जरूरी है आत्मा' का ज्ञान; इस संसार सागर से पार होने के लिए। परमानन्द प्राप्ति के लिए आत्मज्ञान जरूरी है। केवल भगवान' या 'ईश्वर' का शाब्दिक अक्षर नाम लेने से आत्मज्ञान नहीं होगा, मुक्ति नहीं मिलेगी।

मेरा समस्त धर्मों का अध्ययन है। प्रायः मैं एक बात बोलता हूँ घमण्ड से नहीं बोल रहा हूँ कि जितना वेद को मैं ठीक से समझ रहा हूँ कोई वेदज्ञानी नहीं जानता होगा। कुरान शरीफ को जितना मैं अच्छी तरह समझा हूँ एक मौलवी नहीं जानता होगा। जितना बाइबिल को मैं ठीक तरह जानता हूँ उतना एक पादरी नहीं जानता होगा। ग्रंथ-साहिब को जितना मैं ठीक से समझता हूँ उतना एक ग्रंथी नहीं जानता होगा। मैं अष्टांग योग और बुद्धत्व के सिद्धान्त को जितना अच्छी तरह जानता हूँ उतना एक बौद्ध भिक्षु नहीं जानता होगा। आओ मैं इसकी वजह बताता हूँ। इन धर्मशास्त्रों में जितने लोक-लोकान्तरों की बात कही गई है वहाँ एक दृष्टा के लिए प्रलय है। मैं उन लोक-लोकान्तरों में भ्रमण देखा है। आप इसे ऐसे समझें कि एक आदमी कश्मीर के बारे में पढ़ा है और एक आदमी कश्मीर घूमा है। दोनों में बहुत बड़ा अन्तर होगा न। एक कथावाचक पढ़ रहा है कि स्वर्गादि में लोग रहते हैं। मैं स्वर्ग में करता जाता हूँ। वो चाहे जीवन भर पढ़ता रहे स्वर्ग के बारे में, गया नहीं है, परन्तु उसे यथार्थ बोध नहीं है। उसे मैं जाता हूँ। पितृ तर्पण, पितृ लोक की बातें होती हैं, मैं पितृ लोक भी जाता हूँ। अमरलोक जाने के रास्ते में ये सभी लोक-लोकान्तर पड़ते हैं, मेरा तो निज लोक अमरलोक ही आना-जाना है। घमण्ड से नहीं बोल रहा हूँ, उन लोक-लोकान्तरों के बारे में कोई गोष्टी करना चाहे तो आए। कई सिद्ध-साधक जिस सिद्धलोक की बात करते हैं, सिद्धों में क्या शक्ति है, वो मैं जानता हूँ। मैं सिद्ध लोक होकर जाता हूँ।

अरे भाई आप जम्मू से दिल्ली जा रहे हैं तो आपको पठानकोट, जालन्धर और अम्बाला का पता नहीं चलेगा क्या! आप लगातार आ-जा रहे हैं, आपको पता नहीं होगा क्या! स्टेशन आया, नहीं आया, आपको जरूर पता होगा। मैं नर्कों में भी जाता हूँ। नर्क में कैसी यंत्रणाएँ हैं। सात कुम्भी नर्क क्यों हैं। जैसे जेल में कुछ विचाराधीन कैदी हैं यानी अभी उनको दण्ड नहीं मिला है, विचाराधीन हैं, कच्चे कैदी हैं वे। तीन साल से नीचे जो कारावास है उनकी अलग व्यवस्था है। जो आजीवन कारावास है उनकी अलग रहन-सहन व्यवस्था है। इस तरह-सात नरक हैं।

तो देखा, दूर से देखा यमदूत एक आदमी को मोगरों से मार रहे थे। वह आदमी बहुत परेशान हो रहा था। मैं क्या देख रहा था एक परछाई को मार रहे हैं। ये क्यों परेशान हो रहा है। मैं क्या सोच रहा था, ओह! ये तो यह तो भाई मैं आपसे पूछना चाहता हूँ। मेरी हर बात प्रमाणित है। कोई डंडा मारने आता है आप डरते हैं या नहीं। क्यों डर रहे हैं। शरीर में रहकर देह अभ्यास के कारण निचर बन गई है। इस कारण नर्क में वो परछाईनुमा शरीर है, वही उसका व्यक्तित्व (Individuality) है। वास्तव में उसको कोई नहीं मार सकता है। मैं उदाहरण देता हूँ। जितने भी धर्म हैं सब में ठीक-ठीक लिखा है, पर व्याख्या करने वाले अपने-अपने अनुसार कर रहे हैं, कमी यहीं हो रही है। किसी पंथ के मत में पहले अलख देश कहा फिर सच्चखंड बोल रहे हैं; यह तो गप्प है। मुझे एक बात बताओ, जिनको उल्टा करके आग के कुएँ में डाल रहे हैं वो उसी समय नहीं मर जायेगा/एक है विष्टा का कुम्भ। ऐसे सात-कुम्भ हैं वहाँ, इनको कुम्भी नर्क बोलते हैं। एक लाख- -योजन यानी करीब 12 लाख किलोमीटर गहरा वो घड़ा है। कुम्भ घड़े कहते हैं। आप सोचो न। अर्थात् मानसिक वहाँ। एक कुआँ हो सौ फीट गहरा, उसमें पचास फिट पानी भरा हो 50 फीट खाली हो। आदमी को उस कुएँ में फेंक दें तो आदमी थोड़ी देर में मर जायेगा। इसी प्रकार मूत्र कुम्भ नर्क है, मवाद कुम्भ नर्क है, रुद्र (खून) कुम्भ नर्क है। सात कुम्भ नर्क हैं। धर्मराज के दरबार में पूरा सिस्टम है, उसके अनुसार सज़ा देते हैं। कोई व्यर्थ सज़ा नहीं है। चोरी करने की सज़ा, कत्ल करने की सज़ा के अनुसार दण्ड मिलता है। हलाहल के आग के कुएँ में कोई फेंके जो लाख योजन गहरा हो, सड़ा मूत्र कुम्भ ऐसे कुम्भ में कितनी देर कोई ज़िन्दा रहेगा। तुरन्त मर जाएगा। तो वे हजारों-हजारों साल ऐसे रह रहे हैं। कोई तो बात है। वो मानस-पीड़ा मिलती है। जैसे विष्ठा देखकर घृणा हुई न! एक पीड़ा मिली न! वो पीड़ा है। लम्बे-लम्बे सजे लगे हों, आदमी को कहो चलो उन पर कितनी देर चलेगा। किसी ने सोचा इस बात पर। वहाँ वो भतिकारी शरीर है, उसी को सज़ा है। तलवार उसको खोंचकर मारे वो डर रहा है। मैं उस नर्क में देख रहा हूँ तलवार आर-पार हो रही है। कुछ भी नहीं हुआ वो डरे जा रहा है, चिल्ला रहा है, हाय मार डाला, हाय मार डाला।

एक आत्मज्ञानी को नर्क कुछ भी नहीं है, वो तो अपने स्वरूप में है; यमदूत ही भाग जायेंगे। आपके सामने यमदूत आ ही नहीं पायेंगे, उनको आपसे करंट लगेगा, उन्हें। साहिब ने साफ-साफ कहा-

जबहि नाम जीव ले मोरा। यमदूत का रहे न फेरा।। आदि नाम है सत्य कबीरा। जो जन गहे छूटे भव पीरा।। आदि नाम निजसार भाई। जमराजा तेहि निकट न आई।। सार शब्द का सुमरण करिहे। सहज अमरलोक निस्तरि है।। सुमरन का बल ऐसा होई। कर्मकाट सब पल में खोई।। ज्ञान उपदेश कहा गुरुपुरा। नाम गहे चेला कोई सुरा।।

कोई हजार साल तक आग का वर्णन करता रहे, कभी आग देखी नहीं है, पर अच्छा बोलने वाला है। एक अन्य व्यक्ति जिसे अच्छा बोलना नहीं आता, पर एक बार उसने आग को देख लिया। किसका ज्ञान ज्यादा होगा: निश्चित ही जिसने आग को देखा है।

कैसे बदला आपको। नाक, हाथ, पाँव नहीं बदले और यकीन रखना ये भी बदल दूँगा। मैं कोई टोटके वाली बातें नहीं कर रहा हूँ, बातचीत में काफी संतुलन रखता हूँ। मैंने ये सब प्रैक्टिकली आजमाया है। एक आदमी को मैंने कहा - अपना हमशक्ल बना दिया। लोग मुझसे कहते हैं, ये आपका भाई है क्या। नैचर भी वैसी कर दी। तो मैं चुप हो गया। मैंने कहा ये हो सकता है। फिर मैंने सोचा, देखें क्या लड़की को भी अपना हमशक्ल बना सकता हूँ। तो एक लड़की को भी हमशक्ल बना दिया। बस मैं जान गया, विजयी हो गया। फिर वहीं रोक दिया मैंने ऐसा करना। एकाग्रता (Concentration) से सब कुछ हो सकता है; आप जिसका भी ध्यान करेंगे वैसे हो जायेंगे। एकलव्य को द्रोणाचार्य जी ने धनुर्विद्या कभी नहीं दी। एकलव्य ने माटी की मूर्ति बनाकर द्रोणाचार्य का गुरु रूप ध्यान किया तो उनकी पूरी कलायें आ गई। जब गुरु की माटी की मूर्ति में इतनी ताकत है तो प्रत्यक्ष में तो होगी ही। साहिब ने ऐसे ही बोला क्या! - 'गुरु को कीजै दण्डवत् कोटि कोटि प्रणाम, कीट न जाने भुंग को वो कर ले आप समान।'

आप देखिये क्या हुआ। आपकी बदल दिया। कितना - गुरु समाना शिष्य में, शिष्य लिया कर नेह।' क्या मैं अपने नामी में समाया। पक्का समाया। कैसे समाया - अपनी सुरति एकाग्र कर यानि कनसेंट्रेशन द्वारा। एक तो फिजिकली है और एक व्यक्तित्व है। मैंने आपका व्यक्तित्व अपनी तरह बनाया। मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि इतनी बड़ी महिमा गुरु स्तुति की क्यों है। इसका तात्विक भाव क्या है। मैंने अपना व्यक्तित्व आपमें समाया क्या! बिल्कुल। जो आप पहले थे वो मैंने पूर्ण खत्म कर दिया। ये घमण्ड से थोड़ी बोल रहा हूँ; यथार्थ बोल रहा हूँ। मैं अपना पूरा व्यक्तित्व आपके अंदर दिखाता हूँ। मुझे मांसाहार से घृणा है, आपको भी हो गई होगी। चाहे पहले आप तीनों-टाइम मांस खा रहे थे; नाश्ते में अंडे, दोपहर को मटन और रात को मछली। अब तो इनके खाने के बर्तन में भी नहीं खाओगे। जितना परहेज अब आप कर रहे हैं मांसाहारी इतना परहेज कभी नहीं करेगा। इतनी घृणा यह मुझसे आई। मैं झूठ नहीं बोलता, आप भी नहीं बोल सकते हैं; यदि बोलोगे पछताओगे बहुत, हाय क्यों बोल दिया।

आप सभी की प्रतिदिन 'अस्थाई मृत्यु' होती है लेकिन आप में से किसी को भी इस रहस्य का पता नहीं है। आप रोज 'स्थूल शरीर' से निकल कर एक दूसरे सूक्ष्म-शरीर में प्रवेश ले लेते हैं जिसे लिंग देही (अंगूठे जितनी) कहते हैं। फिर दोबारा आप 'स्थूल शरीर' में खुद-ब-खुद वापस आ जाते हैं, लेकिन आप पूरे क्रम से बिल्कुल बेखबर हो। यह आप सभी के साथ रात्रि के समय घटित होता है। यह रोज आप सभी के साथ जीवन भर चलता है, लेकिन आप में से किसी को भी इसका बोध नहीं है। आप सभी के पास एक नहीं बल्कि 'छः, शरीर' हैं लेकिन आपको इन छः शरीर में से किसी भी एक शरीर का यथार्थ बोध सही नहीं है। आप सभी 'परमपुरुष' को अंश हैं, आप साधारण नहीं हैं। आप अज्ञानवश खुद को शरीर और मन मान लिया है। आप सभी ने 'इन्द्रियों' के अधीन होकर अपना मूल्य भ्रमवश कम कर लिया है। आप सभी ने अज्ञानवश उन विभूतियों को अपना भगवान मान लिया है, जिनका आपकी 'आत्मा' के साथ कोई भी सम्बंध नहीं है। आप सभी अनादिकाल से इस 'कालपुरुष' के देश में रह रहे हैं इसलिये आप सभी अपने सच्चे 'शरीर' 'अमरलोक' की सुध भूल चुके हैं।

माता-पिता-भाई-बहन-बेटा-बेटी-पति-पत्नी आदि सभी रिश्ते केवल 'इन्द्रियों' के हैं। इन सबकी रचना 'मन' और 'माया' ने मिलकर 'आत्मा' को बंधन में रखने के लिए की है। इनमें से कोई भी रिश्ता 'आत्मा' का नहीं है। ये सभी रिश्ते इन्द्रियों' के कारण सच्चे लग रहे हैं। एक भी व्यक्ति इस संसार में ऐसा नहीं है जो इन रिश्तों को दिल से झूठा मानकर जी रहा हो। सभी इन्हें सच मानकर जी रहे हैं। यह कमाल है इस 'जाग्रत अवस्था' का जिसके कारण 'आत्मा' इन सभी रिश्तों को, इस संसार को, शरीर को, इन्द्रियों को, मन को, इच्छाओं को अपना ही अंग मान रही है। जब तक आप इस जाग्रत अवस्था में हैं आपको इस संसार की हरेक वस्तु, हर एक पदार्थ 'सत्य' आभासित होगा। आपकी बुद्धि चाहकर भी इन्हें झुठला नहीं पायेगी। यही 'कालपुरुष' की रची हुई 'माया' है जिसमें तीन लोक समाये हुए हैं

आप सभी को हर पल बाहरी संसार में रखने की साजिश आप सभी के अंदर समान रूप से निरंतर चल रही है जिससे आप सभी बेखबर हैं। आप सभी के षड्यंत्र रचने वाला आप ही के अंदर बैठा है, लेकिन कहाँ बैठा है, किस रूप में बैठा है, कैसे साजिश रच रहा है, क्यों साजिश रच रहा है, कौन है? इसकी भी कोई ख़बर नहीं है, आपको! साहिब कह रहे हैं कि इतना बुद्धिजीवी मनुष्य जिसने पृथ्वी के गर्भ में झाँक लिया, समुद्र की गहराई को माप लिया, सौरमण्डलों की जानकारी प्राप्त कर ली; वो मनुष्य अपने शरीर के अंदर की पूरी संरचना और चल रही गतिविधि से पूरी तरह बेख़बर है।

साहिब कह रहे हैं कि जिस सत्ता ने मनुष्य को घोर 'अज्ञान' और अंधकार' में रखा हुआ है, मनुष्य उसी सत्ता को 'परमात्मा' मानकर अनादिकाल से पूजता आ रहा है। जो सभी जीवों की क्रूरता के साथ 'मारकर' खाता जा रहा है, सभी ने डर के कारण उस शैतान को 'परमात्मा' का दर्जा दे दिया है। निरंजन खोपड़ी पर सवार होकर हरेक व्यक्ति से 'झूठ' बुलवाता है। झूठ बोलने वाले व्यक्ति को यह पता होता है कि वो 'झूठ' बोल रहा है, उसके बावजूद भी व्यक्ति 'झूठ' बोलता चला जाता है। 'झूठ' निरंजन की पोषण करता है इसलिये निरंजन 'आत्मा' की ताकत लेकर ही 'झूठ' की व्यक्ति के जीवन में स्थापित करवा देता है, 'आत्मा' को कुंद रखने के लिये। झूठ बोलने वाले व्यक्ति का दिमाग और हृदय दोनों में ही अंधकार बह जाता है और दोनों ही पूरी तरह से स्थिर ही जाते हैं। निरंजन की ताकत झूठ के कारण बहुत ज्यादा बढ़ जाती है जिससे उसकी 'आत्मा' पर पकड़ और भी मजबूत और गहरी हो जाती है। साहिब ने झूठ के नुकसान की व्याख्या अपनी वाणी में बड़े सुन्दर ढंग से की है कि 'झूठ' बोलने से बड़ा कोई 'पाप' नहीं और 'सच' बोलने से बड़ी कोई तपस्या नहीं है।

साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप। जाके हृदय साँच है, ताके हृदय आप।।

एक वैज्ञानिक मिला मुझसे। कहने लगा, कोई आत्मा/परमात्मा नहीं है, सब बकवास है, बेकार और फिजूल की बातें हैं। भोले भाले लोगों को अपने पीछे लगकर पेट पालने के धंधे हैं सब। हैरानी, वो वैज्ञानिक सीधे शक में मुझ झूठा कह रहा था। उसके कहने का मतलब था कि सब कुछ अपने आप बना है अर्थात प्राकृतिक, किसी ने नहीं बनाया। मैंने उस वैज्ञानिक से कहा कि जिस शरीर को धारण किया हुआ है तुमने, क्या वो खुद-ब-खुद बन गया? जो बाकी जीव-जन्तु तुम देख रहे हो, क्या वे खुद-ब-खुद बन गए? जो प्रकृति तुम देख रहे हो क्या वो खुद-ब-खुद बन गई? जिस दिमाग ने तुम्हें वैज्ञानिक बनाया क्या वो खुद-ब-खुद बन गया? जिन आँखों से तुम देख रहे हो क्या वो खुद-ब-खुद बन गई? - जितने भी विचार, सोच, कल्पनायें तुम्हारे दिमाग के अंदर हर पल सृजित हो रही हैं क्या वो खुद-ब-खुद आ गई? जो तत्व तुम देख रहे हो क्या वो खुद-ब-खुद बन गए? क्या तुम्हें दिखाई नहीं दे रहा है कि सब कुछ कितनी प्लानिंग या योजनाबद्ध तरीके से बना है। यह तो तुम्हारे दिमाग का दिवालियापन है जो तुम ऐसा बोल रहे हो। मैंने कहा अभी तुम कच्चे वैज्ञानिक हो। जिस दिन सही में तुम एक अच्छे और काबिल वैज्ञानिक बन जाओगे, परमात्मा को दिन में हजार बार नमस्कार करोगे।

आओ गुरु और सतगुरु के रहस्य को जानें

गुरु

  1. गुरु केवल काया-नाम का ज्ञाता है।
  2. काया के जो ध्यान सूत्र हैं, उनसे माया का ज्ञान होता है।
  3. काया के नाम में गुरु का स्थान ही नहीं है।
  4. गुरु मन की आत्मा से अलग नहीं कर सकता। और न ही मन का काबू कर सकता है।
  5. गुरु रास्ता बताने वाला है।
  6. गुरु का नाम लिखने, पढ़ने, बोलने और जपने में आता है।
  7. गुरु शास्त्रों की साक्षी देकर अपना तत्व स्थापित करता है।
  8. काया का नाम मुर्दा नाम है जो देही को दिया जाता है।
  9. गुरु की पहुँच केवल दशम द्वार तक है।
  10. गुरु भक्ति केवल नाम-कमाई पर केंद्रित है।
  11. गुरु भक्ति केवल सगुण-निर्गुण दायरे तक ही सीमित है।
  12. गुरु तीन-लोक का ज्ञाता है।
  13. गुरु आत्मा का ज्ञान नहीं ले सकता।
  14. गुरु मुक्ति नहीं दे सकता।
  15. गुरु मन-माया की सीमा में बंधा हुआ व्यक्तित्व है।
  16. गुरु परमपुरुष का भेद नहीं जानता।
  17. गुरु किसी भी जीव-आत्मा को भवसागर से पार करने की क्षमता नहीं रखता।
  18. गुरु की पहुँच केवल निराकार सत्ता (काल निरंजन) तक ही है।
  19. गुरु द्वारा बताए हुए सभी देशों अथवा धुनों का जिकर किया जा सकता है।

सतगुरु

  1. सतगुरु ही केवल अकह नाम, विदेह-नाम का ज्ञाता है।
  2. संतगुरु के अकह नाम व सार-नाम से सुरति को जगाया जाता है जो मन और माया से बाहर जा सकती है।
  3. विदेह नाम में गुरु का स्थान अष्टम चकर में होता है।
  4. सतगुरु आत्मा को मन से अलग कर देता है। और मन पूरा कंट्रोल में आ जाता है।
  5. सतगुरु घर पहुंचाने वाला है।
  6. सतगुरु का नाम एक गुप्त पावर है जो जीवन भर आखरी स्वरस तक सेवक की सुरक्षा करती है, यह गुप्त पावर जो लिखने पढने बोलने में नही आता है।
  7. सतगुरु किसी शास्त्र का मुहताज नहीं है। वह अपने अनुभव से देखा हुआ तत्व स्थापित करता है।
  8. सतगुरु का नाम जिन्दा नाम है जो सुरति को दिया जाता है।
  9. सतगुरु की पहुँच ग्यारहवें द्वार तक है।
  10. सतगुरु भक्ति पूरी तरह गुरु कृपा' पर केंद्रित है।
  11. सतगुरु भक्ति की सीमा अनन्त तक है, जो सगुण-निर्गुण से भी आगे है।
  12. सतगुरु चौथे-लोक का ज्ञाता है।
  13. सतगुरु आत्मा का सम्पूर्ण ज्ञान देता है।
  14. सतगुरु ही केवल पूर्ण-मुक्ति का दाता है।
  15. सतगुरु मन-माया की सीमा से ऊपर मुक्त एक अमर व्यक्ति तत्व है।
  16. सतगुरु खुद परमपुरुष में मिला हुआ और उन्हीं का तदरूप है।
  17. सतगुरु अपनी कृपा से किसी भी जीव-आत्मा को भवसागर से हमेशा के लिए पार करने की क्षमता रखता है।
  18. सतगुरु की पहुँच सीधा परमपुरुष तक है!
  19. सद्गुरु के सार शब्द अथवा अमर लोक का खुलासा नहीं किया जा सकता।

गुरु कृपा सों साधु कहावै

जब भी मेरा सत्संगी किसी गैर नामी व्यक्ति से 'परमपुरुष' की "सत्यभक्ति" की बात करता है तो यह एक अवसर है जो 'परमपुरुष' स्वयं उस व्यक्ति को सत्संगी के माध्यम से देते हैं; कालपुरुष के बंधनों से हमेशा के लिए मुक्त होने का अवसर।

'मृत्यु लोक' में सभी 'शरीर' के संगी-साथी हैं, 'आत्मा' का संगी-साथी कोई भी नहीं है। इस 'मृत्युलोक' में 'आत्मा' का सच्चा संगी-साथी अगर कोई है तो वह केवल एक पूर्ण-गुरु 'सत्गुरु' ही है जो 'शरीर' के मिटने के बाद भी आत्मा' का साथ निभाते हैं। सतगुरु" आत्मा' को अपने में समाकर 'सतलोक' पहुँचाते हैं, जहाँ पहुँच कर फिर यह 'आत्मा' दोबारा कभी भी 'मन' और 'माया' के दायरे में वापस नहीं आती।

मैं अपने नामी-सत्संगियों से कहता हूँ कि एक-व्यक्ति की सद्गुरु को सत्य-भक्ति के साथ जोड़ना, एक करोड़ गौओं को कसाई के चंगुल से छुड़ाने के बराबर है। जो व्यक्ति भक्त के मूलज्ञान, मूल सिद्धान्त और मूलमार्ग को जाने बिना 'मोक्ष' या 'परमात्मा' को प्राप्त करने की चाहत लेकर भक्ति करता है; ऐसे अज्ञानी व्यक्ति को न तो कभी 'मोक्ष' की प्राप्ति होती है और न ही परमात्मा की। ऐसी दिशाहीन भक्ति करने वाले व्यक्ति के बंधन और भी गहरे/मज़बूत होते चले जाते हैं जिनसे छूट पाना फिर उस व्यक्ति के लिए नामुमकिन हो जाता है। इस संसार में भेड़चाल की प्रथा है। सब एक-दूसरे की देखा-देखी विवेकहीन भक्ति कर रहे हैं। इसलिये सभी भक्ति के मार्ग से भटके हुए हैं, भौतिक क्रियाओं और बाहरी आडम्बरों में उलझकर अपने अति बहुमूल्य जीवन को व्यर्थ में ही गंवा रहे हैं।

जिस ध्यान ने परमतत्व' की अनुभूति करनी है वह ध्यान 'मन' के साथ संसार (माया) में रमा हुआ है। मन का भौतिक संसार 'ध्यान' की ताकत के द्वारा ही क्रियाशील हो रहा है। मन जानता हैं कि ध्यान (आत्मा) के बिना उसका कोई अस्तित्व नहीं है, सब कुछ शून्य है। इसलिये मन 'ध्यान' को एक पल के लिये भी एकाग्र नहीं होने दे रहा है। बाहरी संसार में और बाहरी क्रियाओं में 'ध्यान' को उलझाये हुए है। ध्यान कोई मामूली वस्तु नहीं है। सृष्टि की पूरी रचना का भेद आपके 'ध्यान' के अन्दर है।

साहिब ने बताया है कि धरती पर 360 स्थान ऐसे हैं जहाँ पर 'काल निरंजन' (मन) ने अपनी 'मायावी शक्तियों' को स्थापित किया हुआ है। मनुष्य उन सभी स्थानों पर 'काल' की मायावी-शक्ति के चमत्कार को देखकर अपनी सुध-बुध खो बैठा है और भूलवश उन्हें ईश्वरीय शक्तियाँ मानकर फिर उन्हीं मायावी शक्तियों का प्रचार करता हुआ संसार में घूमता रहता है। केवल संत-सद्गुरु ही काल की इस माया को समझते हैं; बाकी संसार तो माया के चमत्कारों का दीवाना है।

निरंजन (कालपुरुष) तीन-लोक सृष्टि के विधाता और आद्यशक्ति (माया-शरीर) में यह समझौता है, कि निरंजन 'मन' बनकर अलोप रहेगा और आद्यशक्ति प्रकृति-शरीर बनकर सबको थकित रखेगी यह भेद किसी को नहीं देगी। संसार में मन' है, 'शरीर' है, 'कर्म' है इसलिये यहाँ पर कभी भी स्थाई और पूर्ण 'शांति' नहीं मिल सकती, आनंद नहीं मिल सकता। जीवात्मा जिस स्थाई/सम्पूर्ण शांति और आनन्द की तलाश में अनादिकाल से इस संसार में भटक रहा है; वो स्थाई/सम्पूर्ण शांति और आनन्द जीवात्मा को केवल 'अमरलोक' में ही प्राप्त होगा क्योंकि वहाँ 'मन' नहीं है, 'शरीर' नहीं है, कर्म नहीं है। जीवात्मा को इस संसार में भ्रमित करके 'शरीर' और 'कर्म' के बंधन में बाँधने वाला कोई और नहीं, बल्कि स्वयं 'मन' है।

मनुष्य को अपने बारे में और जीवन के बारे में केवल इतना ही ज्ञान है कि मैं स्त्री/पुरुष हूँ, मेरे माता-पिता हैं, मेरे भाई-बहन हैं, मेरा घर-परिवार है, मुझे भगवान ने बनाया है, इस दुनिया को भगवान ने बनाया है, इस दुनिया को भगवान चला रहा है; सभी धर्म भगवान के बनाये हुए हैं। किसी को भी मानो, किसी की भी पूजा करो, सभी भगवान का ही रूप। मुझे पढ़-लिख कर अच्छी नौकरी करना है, मुझे व्यापार करना हैं, मुझे बहुत नाम/धन कमाना है, मुझे बहुत बड़ा आदमी बनना है। मुझे शादी करनी है मुझे अपना परिवार बनाना है, आदि-आदि। 'मन' और 'माया' ने अपनी गुलामी करवाने के लिए इस जीवन के प्रति संसारी मनुष्य को केवल इतनी ही सोच-समझ दी है। इतना ही बोध दिया है।

हमारा ना तो इस धरती पर किसी के साथ कम्पटीशन है और ना ही इस ब्रह्माण्ड में किसी के साथ कम्पटीशन है क्योंकि जो वस्तु हमारे पास है वो इस ब्रह्माण्ड तीन लोक में कहीं भी नहीं है।

जिस प्रकार धरती पर 'हंस' और 'पारस पत्थर' दुर्लभ हैं ढूँढ़ने से भी नहीं मिलते; ठीक इसी प्रकार 'संत' भी अतिदुर्लभ हैं। एक सच्चे 'संत' की प्राप्ति केवल उन्हीं जीवों को होती है जिन पर या तो 'परमपुरुष' साहिब कृपा कर दें या फिर 'संत' ही दया कर दें, क्योंकि स्वयं 'परमपुरुष' भी एक सच्चे और पूर्ण 'संत' के हुकुम की पालना करते हैं।

इन्सान ने बहुत से भगवान बना लिये हैं, आगे भविष्य में भी और कई नए भगवान बनायेगा इन्सान। हर धर्म का अपना-अपना भगवान है। ऐसा कहना भी ग़लत नहीं होगा कि अब तो हरेक बिरादरी/जाति का अपना खुद का एक भगवान है। इन्सान अपनी सहूलियत देखकर ही खुद के लिए भगवान चुनता है और फिर अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिये उसकी आराधना करता है। अगर चुना हुआ भगवान स्वार्थों की पूर्ति ठीक ढंग से नहीं कर पाता है तो इन्सान फिर उसकी जगह कोई दूसरा भगवान चुनने में देरी नहीं करता। इन्सान खुद के बनाये हुए भगवानों के भ्रमजाल में पूरी तरह से उलझ चुका है - इसलिये भीतर से अशांत है, परेशान है, दुविधा में है, स्थिर नहीं है। सभी शरीर और इन्द्रियों का 'सुख' खोज रहे हैं। एक बात याद रखना जिन-जिन पदार्थों में आप 'सुख' खोज रहे हैं उनमें सुख नहीं है। संसार के सारे सुख मन का भ्रम हैं।

जिन जीवों के हृदय में लोक-लाज का भय और अपने ऊँचे कुल-जाति- धर्म का घमण्ड समाया रहता है; वे कभी भी सत्य-भक्ति' का मार्ग अपना नहीं कर पाते और न ही कभी 'सत्य' अर्थात 'सद्गुरु की कृपा' के पात्र बन पाते हैं। ऐसे अज्ञानी जीव अपने घमण्ड के कारण ही मन और माया (शरीर) की दलदल में फँस कर अनन्त जन्मों तक बार-बार के आवागमन (जन्म-मरण) का दुःख भोगते रहते हैं।

मैं (खुदी) से निकलना मुक्ति है।

आप सब न तो शरीर हैं, न ही इन्द्रियाँ हैं, न मन हैं, न ही बुद्धि है, न चित्त हैं, न ही अहँकार हैं। आप न विचार हैं, न ही कल्पना है, न पुरुष हैं, न ही स्त्री हैं, न आत्मा हैं, न ही परमात्मा हैं। न मनुष्य हैं, न ही देवता हैं। आप सब केवल 'मूल सुरति' हैं। आप सब 'परमपुरुष की अंश' हैं। आप सब अनादिकाल से 'मन' के साथ शरीर रूपी पिंजरे में रह रहे हैं इस कारण अपना 'मूल स्वरूप' भूल चुके हैं। खुद को शरीर और 'मन' मानकर भ्रमजाल में जी रहे हैं।

मन पर सवारी करने का मतलब है अपनी 'मैं' अर्थात अपनी 'खुदी' पर सम्पूर्ण नियंत्रण करना। इस 'मैं' में क्या-क्या है, आओ देखते हैं। इस 'मैं' में सबसे पहले आता है, 'स्थूल शरीर' अर्थात 5-कर्मेन्द्रियाँ, 5-ज्ञानेन्द्रियाँ, 5-तत्व, 25-प्रकृतियाँ, 5-शब्द, 5-शरीर, 7-चक्र, 14-लोक और 14-देवता। इस 'मैं' (खुदी) में शरीर के बाद आता है 'मन' अर्थात मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार-काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार-इच्छाएँ-विचार-संकल्प/विकल्प-सोच-कल्पना-संस्कार आदि। ये सब मिलकर 'मैं' बनती है। यह 'मैं' ही 'मन' है। ये समस्त तीन-लोक इसी 'मैं' अर्थात मन में समाये हुए हैं। इसी 'मैं' के बीच में 'आत्मदेव' कैद है। इस 'मैं' से बाहर निकलना ही मोक्ष है।

बुद्धि की रचना पूर्व जन्म के संस्कारों (प्रारब्ध) के अनुसार होती है। जैसे संस्कार मिलेंगे वैसी ही बुद्धि मिलेगी। संसार में बहुत से लोग ऐसे हैं जो 'आत्मा' को नहीं मानते, 'परमात्मा' को नहीं मानते, 'पुनर्जन्म' को नहीं मानते। ऐसे विचार उनकी बुद्धि में क्यों हैं? पूर्व जन्म के निकृष्ट संस्कारों के कारण ऐसी विचारधारा है। ऐसे लोगों के विचार सुनकर आप फिजुल में परेशान नहीं होना, क्योंकि उन बेचारों को यह नहीं पता है कि उनकी ऐसी विचारधारा क्यों है। इसी प्रकार संसार के लोगों की विचारधारायें एक-दूसरे से भिन्न हैं। क्यों सबके विचार भिन्न हैं जबकि 'आत्मदेव' तो सबमें एक है? यह 'मन' का खेल है जिसे संसार के लोग कभी भी समझ नहीं पायेंगे।

चौरासी भोगने के बाद 'आत्मा' की मुक्ति प्राप्त करने के नये मानव-शरीर मिलता है। यह आपका पहला-जन्म नहीं है। पर सबक अनंत जन्म हो चुके हैं। अनंत बार आप सबने चौरासी का चक्कर काटा है, अनंत बार मनुष्य-तन प्राप्त किया है। अनंत बार पत् किया है; अनंत बार स्वर्ग आदि लोकों का सुख-दुःख भी भोगा है। अनंत बार नरक की यातनायें भी भोगे हैं। लकिन आप सब 'मन' की सीमा और धनोें से कभी भी मुक्त नहीं हो पाये। 'मन' ने आपको 'तीन-लोक' के दायरे से बाहर नहीं निकलने दिया।

जैसा व्यवहार जीवन में आप स्वयं अपने प्रति चाहते हैं वैसा ही व्यवहार आप दूसरों से करें। हमेशा याद रखना, आप जिस मृत्यु लोक' में रह रहे हैं, यह 'कर्म भूमि' है। जैसा बीज बोयेंगे, वैसा ही फल पायेंगे। ध्यान रहे, किसी भी जीव को मनवचन कर्म से पीड़ा नहीं देना, आत्मीय व्यवहार करना, जहाँ गलती हो वहाँ क्षमा माँग लेना। गलती ने अपनी ताकत/अक्ल्ल्/दौलत/रुत्बे का घमण्ड नहीं दिखाना।

आधा/अधूरी ज्ञान हर उस व्यक्ति के लिए अत्यंत घातक है जो उन्नति मार्ग पर चल रहा है, फिर चाहे वो भौतिक उन्नति हो या आध्यात्मिक उन्नति। जिस भी व्यक्ति के जीवन में आधा/अधूरा ज्ञान है, समझ लेना वो व्यक्ति अहंकार को दलदल में डुबा हुआ है। ऐसा व्यक्ति अहंकारवश स्वयं को ही परम ज्ञानी मानकर जीवन भर के लिये अपनी उन्नति के हरेक द्वार को अपने ही हाथों से ताला लगाकर बंद कर देता है।

इस तीन लोक में सभी माया के ईष्ट हैं, सभी का रिश्ता 'मन' के साथ है 'आत्मा' के साथ नहीं। एक पूर्ण सदगुरु ही केवल 'आत्मा' के सचे हैं जो स्वयं 'आत्मा' को 'कालपुरुष' के दायरे से अपना सच्चा विदेह नाम' देकर हमेशा के लिए मुक्त करवा लेते हैं। सत्गुरु के अलावा दूसरा कोई भी ईष्ट 'आत्मा' को कालपुरुष के चंगल से मुक्त करवाने की ताकत नहीं रखता।

जिस व्यक्ति के हृदय में 'नाम' नहीं है, वो व्यक्ति एक 'जिंदा लाश' के समान है जिसे न तो 'श्वास' की कोई खबर है, न 'मन' की कोई खबर है, न 'माया' की कोई ख़बर है, न आत्मा की कोई खबर है, न बंधनों की कोई ख़बर है। ऐसे व्यक्ति को न 'जीवन' की कोई ख़बर है, न मृत्यु की कोई ख़बर है, न 'धर्म' की कोई ख़बर है, न 'कर्म' की कोई ख़बर है। 'नाम' से रहित व्यक्ति को न तो पूर्ण 'गुरु' की कोई ख़बर है और न परमपुरुष' की कोई ख़बर है। साहिब कह रहे हैं कि ऐसा बेसुध जीव 'शरीर' बनकर ही पैदा होता है और अंत में 'शरीर' बनता हुआ ही मर जाता है।

साहिब ने मांसाहार और हिंसा को महापाप कहा, हिंसक पशुओं के साथ तुलना करते हुए मनुष्यों को समझाया - आपके बच्चे को कोई काटकर खा जाये तो आपको कैसा लगेगा? आपके दिल में ऐसे व्यक्ति के प्रति दया होगी क्या, जो आपकी आँखों के सामने आपके बच्चे को काटकर खाये? जब सभी जीवों में समान रूप से 'परमपुरुष' का ही 'अंश' है तो फिर किसी जीव की हत्या करके, उसे काटकर खा रहे हो, तो क्या 'परमपुरुष' की दया के पात्र बन पाओगे? कभी भी नहीं। इस सृष्टि में चौरासी लाख योनियाँ हैं जिन्हें दो प्रकार की श्रेणियों में बाँटा गया है - मांसाहारी और शाकाहारी। मनुष्य शाकाहारी' श्रेणी का जीव है जिसके शरीर की संरचना कुदरत ने केवल सब्जी, फल, अनाज आदि का सेवन करने के लिए की है; मांस, मछली, अंडा आदि खाने के लिए नहीं। हरेक श्रेणी में रहने वाला जीव कुदरत के नियम अनुसार अपना जीवन-बसर करता है। मनुष्य इकलौता ऐसा जीव है जो कुदरत के सभी नियमों का उल्लंघन करता है। कुदरत द्वारा निर्धारित किये गए मापदंडों के विरुद्ध चलता है। मनुष्य द्वारा मांस, मछली, अंडा आदि का सेवन करना भक्ति में वर्जित है, इसे 'महापाप' की श्रेणी में रखा गया है। जो मनुष्य मांस का सेवन करता है, वह प्रत्यक्ष रूप से 'राक्षस' है। ऐसे व्यक्ति की संगति करने की भी मनाही है जो मांस का सेवन करता है, क्योंकि ऐसे व्यक्ति की संगति करने से भक्ति में बहुत बड़ी हानि होती है। कह रहे हैं

माँसाहारी मनवा प्रत्यक्ष राक्षस जान। इनकी संगति न करो होये भक्ति में हानि।।

काल-निरंजन ही शरीर के सब कर्मों में उलझाये रखने के लिए पुण्य-पाप करवा रहा है। काल ने ही जगत में ऐसे धर्म-स्थान बनाये जहाँ मनुष्य हिंसा का विचार किये बिना ही जीव हत्या कर पूजा और भोग कर रहा है। एकमात्र 'सद्गुरु' शरण में आकर 'नाम' प्राप्त होने पर मनुष्य को कालपुरुष 'आत्मा' के लम्बन का यह जाल समझ में आता है। वाणी है -

मन को दो चीजों से सख्त नफरत है - 'एकाग्रता' और एकता मन को इन दोनों से क्यों नफरत है? मन यह अच्छी तरह जानता है कि एकाग्रता और एकता के भेद/बल/महत्व को समझ गए, जान गए उसकी हुकूमत समाप्त हो जायेगी। मन, इसलिये संसार के लोगों को जीवन भर न तो पूर्ण रूप से एकाग्र होने देता है, और न ही लोगों में पूर्ण एकता बनने देता है। मन बड़ी ही चालाकी के साथ हरेक व्यक्ति की खोपड़ी पर सवार होकर उसकी एकाग्रता और एकता को भंग कर देता है ताकि व्यक्ति हमेशा उसके अधीन रहे और उसके हर हुक्म की 'पालना' करता रहे। 'मन' ने इसी कारण से संसार में नाना धर्म, नाना जातियाँ, नाना भक्त पद्धतियाँ, नाना कर्म, नाना पंथ, नाना गुरु, नाना मुक्तियाँ, नाना विचार-धारायें सृजित की हुई हैं ताकि संसार का कोई भी जीव पूर्ण रूप से 'सत्य' अर्थात 'परमपुरुष' की तरफ 'एकाग्र' न हो सके और एकजुट होकर उस 'सत्य' की उपासना न कर सके जिसकी प्राप्ति स्वयं 'मन' नहीं कर सकता क्योंकि मन स्वयं 'झूठ' में अर्थात 'माया' में रमा हुआ है. निरंजन 'मन' तीन-लोकों में 17-चौकड़ी असंख्य युगों तक रहने के लिए परमपुरुष द्वारा श्रापित है। यह अवधि मानव बुद्धि की कल्पना/गणना से परे है।

'सत्य-भक्ति' अत्यंत बारीक है जिसकी प्राप्ति जीव द्वारा शीश' [मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार रूपी मैं/खुदी] सौंपे बिना नहीं हो सकती। जिस भी जीव को काल और 'माया' के बंधनों से हमेशा के लिए मुक्त होना है, उसे अपना शीश अर्थात अपनी मैं अहमं/अहंकार को अपने ही हाथों से काटकर, अपने ही पैरों तले रोंद कर सत्गुरु की शरण में आना पड़ेगा, तभी भवसागर से पार हो पायेगा।

भक्ति में झूठ-पाप-छल-कपट-हिंसा-माँसाहार-जुआ-नशा आदि के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। जो मनुष्य ऊपरलिखित विषय वस्तु में से किसी एक वस्तु का भी संग कर रहा है तो वह मनुष्य 'भक्ति' से कहीं बहुत दूर है। मैं अपने शिष्यों से सात-नियमों का कठोरता से पालन कराता हूँ और उन्हें पालन करने की शक्ति देता हूँ। हमेशा सत्य बोलना, किसी प्रकार की नशा नहीं करना, शाकाहारी रहना, चरित्रवान रहना, अपनी मेहनत की कमाई खाना, चोरी नहीं करना (मन-वचन-कर्म से सावधान रहकर) और किसी प्रकार का जुआ नहीं खेलना। इसलिये मेरे सब शिष्य दुनिया से निराले होकर साधु हैं। 'नाम' दान देने के साथ ही शरीर छोड़वा सकता हूँ, उसी पल 'आत्मा' को 'अमरलोक' पहुँचा सकता हूँ। यह बात मैं घमण्ड से नहीं बल्कि भरोसे के साथ बोल रहा हूँ। मुझे ऐसा करने में एक पल का समय भी नहीं लगता। ऐसा इसलिये नहीं करता हूँ कि यह मन का संसार है, यहाँ पर मन ने सभी को शरीर के मोह में बाँधा हुआ है। आत्मा स्वयं को शरीर मान रही है। आत्मा को शरीर से बेहद प्रेम है। संसार में सभी शरीर से प्रेम कर रहे हैं; शरीर बनकर जी रहे हैं। अज्ञान के कारण शरीर मिटने पर रोते हैं, दुःखी होते हैं क्योंकि स्वयं की बोध नहीं है। इस संसार में मांस और हड्डियों की पूजा होती है. अगर नाम देते ही आत्मा को शरीर के बंधन से मुक्त कर दिया तो आप ही के परिवार, वाले, रिश्तेदार मुझे 'हत्यारा' कहेंगे, महात्मा नहीं क्योंकि सभी मन के गुलाम हैं, काल के दायरे में बँधे हैं। डर के मारे फर कोई दूसरा जीव मेरे पास आएगा ही नहीं नाम लेने के लिए, वो सोचेगा की गुरुजी तो नाम देने के साथ ही मार डालते हैं, भागो रे भागो।

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सद्गुरु का आत्मा स्वयं परमपुरुष में समा चुकी होती है इसलिये। सद्गुरु के पास 'पारस सुरति' (परमपुरुष की सुरति) होती है जिसके। स्पर्श द्वारा संद्गुरु किसी भी जीवात्मा को उसकी मूल-चेतना। प्रदान करके के 'परममोक्ष' दिलवा देते हैं, अपनी कृपा द्वारा। सद्गुरु कभी भी किसी जीव को शब्द कमाई/सुरति शब्द अभ्यास करने के लिए नहीं कहते। सद्गुरु का ध्यान ही 'परममोक्ष' का द्वार। है क्योंकि वह स्वयं 'परमपुरुष' का तदरूप हो चुके होते हैं।

साहिब ने इस परा-रहस्य को उजागर करके अपनी वाणी में समझाया कि 'आत्मा' का मूल यथार्थ ज्ञान केवल 'अमरत्लोक' में है क्योंकि वहाँ पर मन का कोई अस्तित्व नहीं है। आत्मा वहाँ पर अपने मूल हंस स्वरूप में रहती है। अमरलोक में 'मन' नहीं है, माया नहीं है, जन्म और मृत्यु नहीं है, सुख-दुःख नहीं है, बाधाएँ नहीं हैं, व्याधियाँ नहीं है; तू- मैं नहीं है। जब तक आपकी आत्मा अपने इस मूल देश अर्थात 'अमरलोक' की प्राप्ति नहीं कर लेगी, जन्म-मरण के क्रम से इसका पिण्ड नहीं छूटे सकता। बार-बार के आवागमन से आपको 'मुक्ति' नहीं मिल सकती।

मैंने अपने 'सत्य भक्तों' का मन और माया का नशा सिर से उतार दिया; संसार की आसक्ति खत्म कर दी। मन पर सत्य 'नाम' की नकेल लगा दी। आत्मा को चेतन कर दिया; आत्मा 'मन' की तरंगों को पढ़ने लग गई। 'सुरति' को मन और माया के दायरे से निकाल कर 'साहिब की सुरति' के साथ जोड़ दिया। मन की वृत्तियों काम-क्रोध-लोभ-मोह- अहंकार को एक सीमित दायरे में बाँध दिया। यह सब काम 'परमपुरुष' की कृपा से हुआ। इसमें शिष्य का एक पैसे का भी सहयोग नहीं है, न ही सुमिरन का और न ही किसी साधना का; बस मुझमें (सद्गुरु) समर्पण- शरणागति से हुआ।

आपको अगर बेवजह जेल में बंद कर दिया जाय तो आप पक्का विरोध करेंगे, बाहर निकलने के उपाय तलाश करेंगे, बाहर निकलने की भरपूर कोशिश करेंगे। आत्मा को भी बेवजह 'मन' ने शरीर रूपी जेल में बंद कर रखा है, लेकिन आत्मा बिल्कुल भी मन का विरोध नहीं कर रही है, बाहर निकलने के उपाय नहीं तलाश रही है। क्यों? यही है संसार का इकलौता सबसे बड़ा कौतुक (Wonder) कि 'आत्मा' अनादिकाल से शरीर रूपी जेल में बंद होने के बावजूद, छूटने का प्रयास नहीं कर रही है।

मनुष्य का संचालन कर शैतानी ताकतें कर रही हैं, परमात्मा नहीं। ये शैतानी ताकतें मनुष्य के भीतर ही रहती हैं जो दिखाई नहीं देतीं लेकिन अपना काम बखूबी निभाती चलती हैं। मनुष्य अपने अन्दर निवास कर रही शैतानी ताकतों से बिल्कुल बख़बर है। जब तक मनुष्य इन शैतानी ताकतों (काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार-मन-बुद्धि-चित्त) के आधीन है कभी भी सुखी नहीं हो सकता, निर्मल नहीं हो सकता, अच्छा नहीं हो सकता। इन शैतानी ताकतों को केवल "मूल सुरति" (ध्यान की शुद्ध पराकाष्ठा) द्वारा ही जाना जा सकता है।

हंस आत्मा को जगाने/चेताने सद्गुरु साहिब हर युग में मृत्युलोक में आते हैं और हर बार निरंजन उन्हें आने से रोकता है। द्वापर युग के बाद जब कलियुग में साहिब आए तो काल निरंजन ने अपने लोक में रोका और कहा तुम तीनों युगों में मेरे जीव संसार में गए और मेरे भवसागर को उजाड़ा। तुम्हारे बल पर आत्मा हंस होकर निज घर जाती है तुम पर मेरा कोई जोर नहीं चलता है। अबे तुम फिर मेरे जगत में जा रहे हो। अब मेरे जगत का कोई जीव तुम्हारा शब्द नहीं सुनेगा। मैं (कालपुरुष) इतने कर्म और भ्रम के असीमित ठाठों (सुविधाओं) में जीवों को उलझा दूँगा कि उन्हें मुक्ति का मार्ग सूझेगा ही नहीं। सबको मांस, मदिरा, ही प्रिय भोजन लगेगा सब मनुष्य वो ही खायेंगे। मैं अनेकों पंथों का विस्तार कर दूँगा, चण्डी, जोगिन और भूत पूजाओं के भ्रम में जगत को उलझा दूँगा। आत्मा को अनेक प्रकार के माया-शरीर और इच्छाओं के फन्दों में बाँध दूंगा कि अंत समय सुरति में संसार ही रहेगा, मुक्ति की बात नहीं। हे कबीर! तुम्हारी भक्ति कठिन है, कोई नहीं मानेगा, फिर भी जो तुम्हें (सद्गुरु) पहचान लेगा उस जीव के सब भ्रम दूर हो जायेंगे। तब ज्ञानी साहिब ने काल निरंजन से छल दूर करने उससे कहा -

काल निरंजन ने सभी जीवों को 'मृत्यु' का भय देकर अपनी 'माया' में उलझाया हुआ है। मृत्यु का भय ब्रह्माण्ड के हरेक लोक-लोकान्तर में अपना तांडव दिखा रहा है। त्रिदेवों से लेकर एक साधारण जीव तक सभी 'काल' की पकड़ और मार के दायरे में हैं। एक सच्चा 'संत' ही काल की इस पकड़ और मार से बाहर है, क्योंकि वह अपने निजस्वरूप अर्थात शुद्ध आत्मस्वरूप में निवास करता है। सद्गुरु के संतजन ही केवल उस अमरदेश की ख़बर रखते हैं, जहाँ काल नहीं है, शरीर-कर्म-बंधन नहीं हैं, विनाश नहीं है।

जन्म-मृत्यु रूपी महारोग से संसार के सभी प्राणी दुःखी को प्राप्त हो रहे हैं। केवल 'सद्गुरु नाम' के द्वारा ही इस महाँरोग से छुटकारा मिल सकता है। नींद तो मौत की निशानी है, इसलिये साहिब कह रहे हैं कि उठो और जग जाओ। जो इस बात को समझता है कि उसकी पूंजी तो स्वाँस है, जो एक पल में आती है और दूसरे ही पल चली जाती है, जिसका कोई भरोसा भी नहीं कि वापिस शरीर में आए या नहीं। जो इस बात को भली भाँति समझता है, उसे तो 'नाम' में ही हर समय 'सुरति' लगाये रखनी चाहिए। सभी कर्म का सार यह है कि हृदय से सद्गुरु के नाम का ही सिमरन करते रहो और किसी भी वाद-विवाद में मत पड़ो। वाद-विवाद में फँसे रहना तो मूर्ख लोगों का काम होता है। संतों को तो वाद-विवाद करने की फुर्सत ही नहीं होती क्योंकि वे हर समय 'नाम' का ही सिमरन करते रहते हैं। सद्गुरु के नाम का सिमरन चाहे कोई खुशी-खुशी हँसता-हँसता करे, चाहे गुस्से से करे, वो निष्फल नहीं जाता, अवश्य ही लाभदायक सिद्ध होता है। गुरु नानक देव जी विवाद करने वालों को जीतने के लिए वचन कह रहे हैं -

नानक हारा सो भला, जीतन दे संसार।
हारा तो हरि से मिले, जीता यम के द्वार।।

संतों की जमात नहीं होती। संत तो विरले होते हैं। संत अपनी पहचान दे देते हैं। संसारी जीव सच्चे 'संत' की स्वयं ही पहचान नहीं कर सकते क्योंकि उनकी चेतना अत्यंत कुंद होती है। सगुण, निर्गुण, देव, त्रिदेवों की की आदि करने वाले 'संत' नहीं होते। संत तो स्वयं उस 'परमपुरुष' तद्रूप होते हैं जिनकी महिमा का बखान धर्मग्रंथ/ शास्त्र भी नहीं कर सकते। 'संत' तो स्वयं 'सत्यस्वरूप' होते हैं जिनके मुखारविंद से निकला हर शब्द 'परमचेतन' होता है जो किसी भी जीव के हृदय को पल में प्रकाशित करने की ताकत रखता है। संत के पास वो अद्भुत शक्ति है, जिसके द्वारा वह किसी भी जीव को अपने समान बना सकता है। परमात्मा से ज्यादा ताकत 'संतों' में होती है। संसारी जीव 'परमात्मा' को खोजता है और परमात्मा स्वयं संतों को खोजता है; क्योंकि संतजन उस बयार (हवा) की तरह होते हैं जो 'सत्य' की खुशबू को अपने में संजोकर लोक-लोकान्तरों तक पहुँचाते हैं। यह कार्य केवल सच्चे संतजन ही कर सकते हैं, परमात्मा नहीं। संत-सद्गुरु जब चाहे, जिसका चाहे, कर्म का लेखा मिटा सकता है, विधि का विधान बदल सकता है, अपनी कृपा द्वारा। जिसे सच्चे संत की शरण और 'नाम' रूपी दिव्य औषधि मिल जाती है, वो जीव हमेशा के लिए 'कर्म' और 'काल' के बंधन से मुक्त हो जाता है। साहिब वाणी है -

सभी रसायन हम करी, ना ही नाम सम कोय।
रंचक घट में संचरै, सब तन कंचन होय।।
वस्तु कहीं ढूँढे कहीं, केहि विधि आवे हाथ।
कहे कबीर सब पाइये, जब भेदी लीजै साथ।।

परमपुरुष से चैतन्य प्रकाश के अंश होने के कारण निरंजन के माया शरीरों में जीव-रूप आने पर शरीर भी चैतन्य हो जाता है। सत्यपुरुष की प्रथम इच्छा ही सार-शब्द होकर उन परमपूरुष की 'सूरति' से विहँग- रूप जुड़ी है। परमपुरुष ने जब स्वयं को प्रकट किया तो श्वाँसा ही सारशब्द रूप निर्मित हुई। यही भेद साहिब ने शिष्य धर्मदास को बताते हुए समझाया कि 'सारशब्द' ही गुप्त नाम है जो विहँगम-मार्ग द्वारा शिष्य को सदगुरु-सुरति से जोड़े रखता है। हंस रूप आत्मा निरंजन (कालपुरुष) और आद्यशक्ति (माया) द्वारा इस त्रिलोक की माया-सृष्टि में 84 लाख-योनियों में कैसे बँधी गई।

सार-शब्द सतपुरूष कहाया। यह सार-शब्द परमपुरुष स्वयं हैं। इसका अर्थ है 'सार शब्द' मालिक है, सच्चा परमात्मा है। वो ध्वनि-रहित शब्द है। उसे 'निःशब्द' शब्द कहा गया। उसमें प्रकाश भी है, पर वो बड़ा अद्भुत है, सांसारिक प्रकाश नहीं है। दो वस्तुओं के टकराव से उत्पन्न होने वाला शब्द नहीं है। वो ध्वनि-रहित शब्द है। वो शून्य के पार से आता है। न भजन में कभी आपकी रूह को वो 'शब्द' उठाना चाहता है। वो शून्य पार से आता है।

दस-रूपों में समाई प्राणवायु में ही 'निरति' के संग सात-सुरति हमारी देह में समाई हैं। सातों नामों से देह-सृष्टि में समाई सुरति को समेट कर विहँगम-मार्ग से मूल गुप्त 'नाम' द्वारा 'हंस' का निर्वाण सदगुरु करते है। सात-सुरेति नालों का वर्णन करते हुए साहिब ने समझाया

  1. सिंधु नाल।
  2. पुहुप नाल,
  3. अमीनाल,
  4. सुरति नाल,
  5. अग्रनाल
  6. सोहंग नाल,
  7. अजर नाल।

इन सातों-सुरति खजाने को परखने वाला विशेषज्ञ केवल एक 'सद्गुरु' ही है। सूरति से निरति को एक करके सत्य-शब्द तक ले जाने वाला सदगुरु ही जीव-मुक्ति का ज्ञानदाता है। ऋषि-तपस्वियों-योगियों ने अपनी साधना-तपस्या से पिंड-ब्रह्माण्डों में जो कुछ देखा उसी अनुभव को वेद मंत्रों में व्यक्त किया। 'सद्गुरु' ही सार-शब्द' देकर जीव को भवबंधन से छुड़ाते हैं। शून्य और महाशून्य ब्रह्माण्डों के 21 लोकों से परे 'अमरलोक' जो सद्गुरु का मूल घर हैं, न्यारा है।

कबीर साहिब ने भवसागर से मुक्ति की सहज और न्यारी युक्ति दिखाई। सद्गुरु सुरति के सिमरन में रमे रहने को भीतर लगन लगाना कहा। ऐसा भक्त ही 'साधु' होकर अपनी 'सुरति' को जगा लेता है। ठौर- ठिकाना जाने बिना लोग मन में ही मगन रहकर भक्त कहलाते हैं और भक्ति-भेद कोई नहीं पाता।

आइए देखते हैं कि गुरु आपको क्या देता है। गुरु परमात्मा का रास्ता नहीं बताता 'कोटि जन्म का पंथ था गुरु पल में देय बताय।' पारस 'सुरति' है संत के पास, क्योंकि वो उस अनंत में मिला है। वो 'सुरति' से आपका वर्ण पलट देगा। आपको अपनी तरह बना देगा, अपनी पूरी ऊर्जा आप में पहुँचा देगा। माया भी नहीं लगेगी। विषय-विकार समझ में आने लगेंगे। हृदय प्रकाशित हो जाएगा, यह है अकह 'नाम'। इसमें आपको योग करने की जरूरत नहीं है। जिस दिन से नाम प्राप्त होता है उस दिन से एक बहुत बड़ी सत्ता आपके साथ खड़ी रहती है। मन और माया ठीक से समझ में आने लगते हैं। अंदर का पूरा खेला समझ में आने लगेगा।

यह एक प्रक्रिया ही 'नामदान' कहलाती है, इसलिये 'सुरति' से वो नाम दिया जाता है। केवल पारस ही लोहे को सोना बना सकता है, दूसरे पत्थर नहीं हैं वो। इसलिये साहिब कह रहे हैं - सदगुरु ही आपके अन्दर यह सत्ता दे देगा।

संत तो ग्यारहवें दरवाजे का भेद जानने वाला, चौथे लोक का रमण करने वाला होता है। समस्त इन्द्रियाँ, मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार पर जिसका पूर्ण नियंत्रण है। ग्यारहवाँ दरवाजा खोल चुका है, वो है संत 'सद्गुरु'। साहिब ने इस तरह ग्यारहवें द्वार का रहस्य दिया, चौंका दिया सबको। साधारण नहीं अमरलोक की बात कही, तीन लोकों से पूरे हटकर। पूरे समीकरण बदल दिये भक्ति क्षेत्र के। खलबली मच गई: लोगों के पुराने जितने व्यापार-धंधे थे धार्मिक, उन पर असर पड़ने लग गया। उन्होंने देखा ओह! ये कबीर की शिक्षा का अनुकरण करने से लोग हमारी चाल में नहीं आएंगे। बादशाह सिकन्दर लोभी को भ्रमित किया, फिर शेख तकी को भ्रमित किया। पंडित-पुजारियों ने। बावन कसनी देनी पड़ीं साहिब को।

आपको सच बता रहा हूँ मेरी बातों की थोड़े समय में ही नकल होगी। मैंने बहुत से कथा वाचकों के समीकरण बदल दिये हैं, यह अहंकार में नहीं कह रहा हूँ। उन्हीं ने मेरी लय में अभी बातचीत करना प्रारंभ कर दिया है कई चीजें बदल-बदल कर। उनके पहले के प्रवचन देखना और मेरे प्रवचन बाद के प्रवचन देखना तो आपको भिन्नता मिलेगी। नकल बड़ी जबरदस्त होती है।

***अकह नाम गुरु बिन नहीं पावे, पूरा गुरु अकह समझावे। ***

गुरु अपनी आध्यात्मिक 'सुरति' द्वारा, चेतन सूरति द्वारा मन और माया को अलग कर देता है। दूसरा हृदय प्रकाशित कर देता है, आध्यात्मिक शक्ति द्वारा! जब ये हृदय प्रकाशित होता है तो आंतरिक विकारों की पहचान मिलती है। काम- क्रोध- लोभ-मोह आदि समझ में आने लगते हैं।

नाम होय तो शीश नमावे, नहि तो ये मन बाँध नचावे।

तीसरी बात; इस प्रक्रिया में एक पूर्ण सद्गुरु 'नाम' से आपके अन्दर आध्यात्मिक शक्ति जो परम सत्ता है उसको प्रकट कर देता है। ये तीन प्रक्रिया एक-साथ होना ही 'नामदान' है। 'गुप्त नाम सो कहा न जाई, लिखा न जाई, पढ़ा न जाई। बिन सदगुरु नाही कोई पाई।' ...आदि शब्दों से साहिब ने इंगित किया कि जब तक सच्चे 'नाम' की प्राप्ति नहीं करते तब तक इस संसार सागर से किसी भी कीमत में पार नहीं हो सकते। इसीलिए सहज मार्ग इसी कारण हुआ कि सुरति से 'नाम' देकर सद्गुरु स्वयं आपके अन्दर के सब काम कर देगा। सभी कार्य संचालित होते जायेंगे। आप आश्चर्य करेंगे कि आपके अन्दर बदलाव कैसे आया। आप कैसे बदल गए, आपकी वृत्तियाँ कैसे बदल गई। आपने कोई साधना और ध्यान नहीं किया। पर, काग पलट हँसा कर दीन्हा।

जब लग सार नाम न पाये। तब लग जीव भव भटका खाये।।

मेरे साहिब-बन्दगी सत्संगियों को मैं यही विस्वाँस दिला रहा हूँ तुम भव-सागर से पार हो गए; तुम्हें अब इसकी चिंता नहीं करनी है। नाम सुमिरन से बस हृदय प्रकाशित होता रहेगा, सद्गुरु दर्शन मात्र से सुमिरन भी होता रहेगा। काल की फाँस और ज़हर को 'नाम' रूपी तलवार पल में ही काट देती है। काल की दुनिया का जंजाल जो विष के स्वभाव का है उसे नाम रूपी अमृत बुझा देता है।

आगे और स्पष्ट करते हुए कह रहे हैं कि सत्यपुरुष सुखधाम है। सत्यलोक रूपी सत्यपुरुष ही अविचल और सदा-सदा के दुःखों को नष्ट कर सुखधाम दाता हैं, सुख का सागर हैं। सत्यपुरुष सत्यनाम ही सत्य सुकृत रूप 'सद्गुरु' है जो अविगत, अलख, अनाम स्वरूप है। इसी कारण सद्गुरु अजर है, आवागमन से परे है, निःस्वादी है, निष्कामी, निर्मोही और अनादि है। सद्गुरु सदैव ही क्रोध रहित, बैर रहित, त्रिगुणों से परे गुणातीत निष्कलंक है। सद्गुरु का नाम कोई 'देह नाम' नहीं अपितु सत्यपुरुष-रूप, इस मृत्यु लोक में अकह 'नाम' में समाया 'ध्यान' है। इसी कारण जो व्यक्ति सद्गुरु से शब्द ग्रहण करता है, वह हंस होकर जन्म-मरण के संशय से मुक्त हो जाता है।

ईश्वर क्या है? जब चेतन ब्रह्म में माया का मिश्रण होता है तब इसकी संज्ञा ईश्वर है। भगवान क्या है? 'भग' गर्भद्वार को कहते हैं। 'वान' चलाने वाला - करने वाला। प्रजापति ब्रह्मा। 'लिंग' को भगवान कहा भग को वाहन करने वाला। जैसे इक्कावान यानि इक्का (टांगा) को चलाने वाला। कह रहे हैं - भूमि-अवतार, निराकार स्वरूप है।

पाप-पुण्य स्वप्न, वेद-वेदान्त स्वप्न, बोलना-आवाज़ करना आदि भी स्वप्न है। चन्द्र, सूर्य आदि जगत के पदार्थों का जो आभास हो रहा है, ये भी स्वप्न है। स्वर्ग और नरक स्वप्न, ओहंग और सोहंग स्वप्न, ये पिंड और ब्रह्माण्ड स्वप्न रूप हैं। इसलिये 'आत्मा' शब्द भी भ्रमांक है। संतों ने इस चेतन सत्ता को जो शरीर में रहती है, उसे हँसा कहा। तुलनात्मक रूप से यदि हम पृथ्वी के हंस पक्षी को देखें तो एक लाजवाब जीव है हंस। हंस का रूप कितना सुन्दर है, कबूतर से थोड़ा बड़ा है। पूर्ण धवल सफेद है। खानपान भी लाजवाब है। एक पक्षी होते हुए भी गन्दगी में कभी चोंच नहीं डालता हंस। मोती चुगता है। दूध और पानी मिलाकर दे दो तो पानी छोड़ कर दूध ग्रहण कर लेता है; इतना पारखी है हंस। चरित्र इतना उच्च कि यदि हँसनी मर जाए तो कभी दूसरी हँसनी के पास हंस नहीं जाता है। वदू होकर पूरा जीवन व्यतीत करता है। एक पक्षी का इतना उच्च चरित्र; इसीलिये तो कहते हैं किसी पति-पत्नी के बारे में, भाई इनकी जोड़ी हँसों जैसी है। किसी ने कभी कहा क्या कि कौओं जैसी जोड़ी है।

साहिब ने इसलिए इस चेतन सत्ता की संज्ञा को 'हँसा' कहा। जब ये चेतन सत्ता अमरलोक पहुँचती है तो इसके साथ 'मन' नहीं होता, शुद्ध अपने मूल रूप में पहुँचती है। क्योंकि 'हँसा' एक भ्रमांक अवस्था में आत्मा है। अज्ञान अवस्था में है तो इसी लिए आपको समझाने की आवश्यकता पड़ रही है। जब आप उस हंस बोध को प्राप्त हो जाते हो तो वहाँ पर आपको हँसा की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।

सद्गुरु के गुप्त नाम की अक्षय ऊर्जा ही मोक्षदायनी है। परमपुरुष के गुप्त नाम से, उसमें लीन सद्गुरु ही आत्मा को उसका बोध कराने में समर्थ है। सद्गुरु से सार-नाम पाकर ही 'आत्मा' 'मन' के बंधनों को समझेकर परम-आनन्द का मार्ग पकड़ती है। सुरति रूप कमलपुष्प में ही सद्गुरु का वास है; उसी में सदा विश्राम है। सुरति-कमल में ही अजपा- जाप की डोर से सद्गुरु परमपुरुष में लीन रहते हैं। सद्गुरु भक्त भी सुरति-कमल से जुड़कर अमृत के सागर को पा लेता है। सीधे अष्टम-चक्र से जोड़कर सद्गुरु आत्मा की जाग्रत कर देते हैं और 'मन' के भ्रमजाल से 'आत्मा' अपने को दूर कर लेती है। यही है आत्म-जाग्रति।

हाँ! आत्मा के लिए कम-से-कम दुनिया के जितने भी मत-मतान्तर, तीर्थ मार्ग और धर्म हैं, एक बात स्वीकार कर रहे हैं कि 'आत्मा' अमर है। साहिब कबीर ने 'आत्मज्ञान' की ही युक्ति संसार को दी है।

मैंने दो साल तक बिना भोजन के 'जीकर' देखा है। बिना सोये जीकर देखा है। मैं 'जी' लिया। बस एक विचार था, 'आत्मा' को भूख ही नहीं लगती है, फिर भूख कैसी?' आत्मा तो सोती-जागती नहीं तो सोना कैसा? आदमी दो दिन नहीं सोये तो पागल हो जाता है। क्यों? बस, वो, सोचता है कि मैं सोया नहीं। मैं तो बस यही सोचता रहा कि हूँ ही 'आत्मा', तो किसी भी चीज़ की ज़रूरत कुछ भी नहीं।

सच्ची भक्ति कैसे करें? एक बात याद रहे कि प्रेम ही भक्त है। प्रेम है - सुरति लगाना। हमारी सुरति कहीं रहती है, जहाँ हमारा प्रेम हो, लगन हो। लोभी की सुरति धन में रहती है, क्योंकि उसे धन से ही प्रेम है। कामी की सुरति विषय-विकारों में रहती है क्योंकि उसे विषयों से ही प्रेम है। इसी तरह 'सद्गुरु में सुरति लगाना ही साहिब से प्रेम करना है, सच्ची परमात्मभक्ति करना है। सत्यपुरुष को तो कभी देखा नहीं, इसलिये उसकी सुरति मनुष्य नहीं कर सकता। 'सद्गुरु' हमारे सामने है और वही साहिब का प्रतिनिधि है।

जब सत्यपुरुष के नाम की शक्ति मनुष्य में आन समाती है तब कालरूपी कसाई नहीं रोक सकता। सद्गुरु से परमपुरुष शक्ति पाते ही सोलह गणों की शक्ति शिष्य में आ जाती है।

  1. ज्ञान,
  2. विवेक,
  3. सत्य,
  4. संतोष,
  5. प्रेमभाव,
  6. धीरज,
  7. प्रचार से दूरी,
  8. दया,
  9. क्षमा,
  10. क्षल,
  11. निष्कर्मा,
  12. त्याग,
  13. वैराग्य,
  14. शांति,
  15. करुणा,
  16. मित्रभाव (समता)।

ध्यान क्यों किया जा रहा है? यह जानने के लिए कि मैं क्या हूँ? गुरु आत्मा और मन को अलग कर देता है। किसी कीमत पर यह काम अपनी ताकत से नहीं हो सकता है। मन ने ऐसे उलझा दिया है कि आत्मा कुछ समझ नहीं पा रही है। मन कहता है कि रोटी खानी है तो आत्मा कहती है कि यही मेरी इच्छा है। इस तरह मन ने आत्मा को अपने पीछे लगा रखा है। आत्मा सभी इच्छाओं में, कल्पनाओं में घूम रही है। जितने कर्म मन कर रहा है, सभी उलझन वाले हैं। जब भी कोई चाहे कि उससे निकलें तो यह नहीं निकलने दे रहा है। इसकी पकड़ बड़ी दूर तक है। धन- दौलत दे देगा, सिद्धियाँ-शक्तियाँ दे देगा, पर अपने से आगे नहीं जाने देगा। पक्का गुरु आपको बाहर निकाल देगा।

कोटि जन्म का पथ था, गुरु पल में दिया पहुँचाय।।

तब एक संतुष्टि मिलती है। जैसे काँटा लगा हो तो निकालने पर आराम मिलता है। ऐसे ही मन का काँटा गुरु निकाल देता है। फिर आप चाहकर भी जगत के पदार्थों में रम नहीं पायेंगे। जगत के पदार्थ आपको रोमांचित नहीं कर पायेंगे। ऐसे पर ही कहा

सतगुरु मोर शूरमा, कसकर मारा बाण।
नाम अकेला रह गया, पाया पद निर्माण।।
नाम पाय सत्य जो बीरा, संग रहूँ मैं दास कबीरा।।

सच मानना, अभी बार-बार चिताकर कह रहा हूँ, जब यहाँ से चला जाऊँगा तो दुनिया पछताएगी, क्योंकि सत्य है- जो वस्तु मेरे पास है, ब्रह्माण्ड में कहीं भी नहीं है।

वेद-शास्त्र आदि भी ध्यान के लिए कह रहे हैं और सच्चे संत भी ध्यान के लिए बोल रहे हैं। ऐसा क्यों? इस तथ्य को लोग कम समझ पा रहे हैं। दिव्य-दृष्टि ध्यान के अन्दर है, केवल सुरति को संभालना है। जब हमारा समग्र ध्यान एकाग्र हो जायेगा तो दिव्य-दृष्टि खुल जायेगी। इसका अर्थ है हमारी दिव्य-दृष्टि हमारी सुरति है। इसलिये सिद्धान्त रूप से दुनिया के सभी मत-मतान्तर, योग संस्थान, ध्यान बता रहे हैं।

ध्यान ही वेद शास्त्र कहते हैं, ध्यान ही संत बखाना।

यही ध्यान एकाग्र होकर 'सुरति' या दिव्य-दृष्टि बनती है। इसलिये कहा -

सुरति संभाले काज है, तू मत भरम  भूलाय।
मन सय्याद मनसा लहर में, बहत कतहू न जाय।।

सूरति बड़ी विशेष चीज है, यही आत्मा है। मैं कह रहा हूँ यदि आप आत्मा का नज़दीकी रूप देखना चाहते हैं तो ध्यान से देख लो।

सरति में रच्यो संसारा। सुरति का खेल है सारा।।

ध्यान के भीतर बड़ी क्षमतायें हैं। यही ध्यान मन के अधीन है। इसलिए 'आत्मा' मन के अधीन है। चाहे-अनचाहे सदैव मन का चिंतन होता रहता है। जैसा चिंतन मन करवाता है उसका प्रभाव पड़ता है, उसमें आत्मा शामिल होकर रम जाती है। कभी भी ध्यान में देशना, मन बड़ी बारीकी से आपके ध्यान की खींच कर ले जाता है। ध्यान ही उलझा है ध्यान को ही मन ने उलझा कर रखा है। यहीं कारण है कि सब चीज, जीवन का हर कार्य ध्यान के माध्यम से हो रहा है। ध्यान हट जाए कुछ नहीं हो सकता। ध्यान मन वश के अधीन है, इसलिए आत्मा मन के अधीन आ गई।

आत्मा का ही दिव्य रूप सुरति, मन द्वारा ध्यान को भटकाने के कारण भ्रमों में फँसी है। जैसे काँच के महल में रहने वाला कुत्ता शीशे में अपनी ही परछाई देखकर दूसरा कुत्ता होने के भ्रम में भौंकता हुआ प्राण गँवा देता है। उसने खुद के विरुद्ध ही अपनी ताकत लगाई। ऐसे ही भ्रमवश आत्मशक्ति का विनाश हो रहा है।

'समझे पड़े जब ध्यान धरे।' आत्म कल्याण से परे जितनी ऊर्जा लगा रहे हो, फिजूल हैं। केवल आत्म-साक्षात्कार के लिए यह जीवन मिला है, पर सभी शरीर की जरूरतों के लिए ही सावधान हैं। क्योंकि शरीर की आवश्यकतायें ही समझ रहे हैं, आत्मा को समझने की फुर्सत ही नहीं है। इसी से मन के वश में हैं। जो घूमने का शौकीन है फिजूल ही घूमता रहता है। आत्म-कल्याण की ओर ध्यान होना चाहिए। जब भी मौक़ा मिले सद्गुरु के नाम-भजन में लग जाना चाहिए। एक ने मुझसे पूछा कि नाम-भजन किस समय करना चाहिए? मैंने समझाया, कभी भी करते रहना चाहिए। वो बोला कैसे करें? मैंने कहा कि यदि समय न मिले तो चलते-फिरते भी कर सकते हैं, लेटे-लेटे भी कर सकते हैं। पर नाम-भजन का बहाना करके सोते नहीं रहना है। यह तो मैंने उनके लिए जो बैठकर न कर सकें। यह तो शौक से होना चाहिए; बैठने की औपचारिकता या दिखावा न हो। जीवन भक्तिमय हो जाने से, ज्ञान और वैराग्य आता है और नीचे विषयों में आसक्त सुरति ऊपर शून्य में एकाग्र हो जाती है। बिना वीर्य के गर्भ रहने के अचरज की भांति सुरति ज्ञानमय हो जाती है। क्योंके वह, तो है ही दिव्य, केवल विषयों में आसक्त कर मन ने उसे अज्ञान के आवरण में ढक दिया है। मन रूपी हाथी मानता नहीं है और सुरति को साथ लेकर घूमता रहता है। यदि जीव रूपी महावत के पास ज्ञान का अंकुश ही नहीं है तो वो बेचारा कुछ नहीं कर पाता है। यही ज्ञान रूपी अंकुश देकर सत्गुरु जीव के साथ हो जाता है। वाणी है-

फिर कहाँ है परमात्मा? कह रहे हैं कि यदि सच्चे खोजी बनकर खोजोगे तो एक पल की तलाश में मिल सकता हूँ। मैं तो हर स्वाँस में समाया हुआ हूँ। सहज-सरल बात कह रहे हैं कि स्वाँसों में ध्यान और सुरति समाई है। ध्यान के बिना ही स्वाँस व्यर्थ जा रही है। स्वाँसों में ही आत्मा का वास है और आत्मा में ही परमात्मा का वास है। संतों ने इसीलिए बार-बार समझाया कि परमात्मा कहीं बाहर नहीं, हमारे अन्दर ही है। स्वाँस से ध्यान करने पर ही सुरति संभलेगी। वाणी है-

खोजी होय तुरत मिल जाऊँ, एक पल की तलाश में।
कहहिं कबीर सनो भाई साधो, सब स्वाँसों की स्वाँस में।।

परमात्मा को अपने हृदय में ही पा लेना है। जिन्हें यह भेद मालूम नहीं होता, वे ही बाहर भटकते रहते हैं।

कहे कबीर भेदी लया, पल में देत लखाय।।

स्वाँसों को ध्यान में साधना ही मन की एकाग्रता है, यही सुरति को साधना है। यही है- परम पुरुष अपने ही उर पायो।।

जैसे-मृगा नाभि बसे कस्तूरी, वन वन खोजत धाये।। मनुष्यों ने स्वाँसों को केवल जीवन और शरीर ही समझा है। मनुष्य जन्म पाकर भी स्वाँसों के महत्व को नहीं जाना है जिससे सुरति भटक रही है। मृगा की नाभ की कस्तूरी के समान ही हम अपनी स्वाँस की महक को समझ रहे हैं। साहिब ने संसार को सुरति-योग का रहस्य दिया। सुरत के अन्दर अनन्त ब्रह्माण्ड हैं। सुरति की ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया। साहिब परमपुरुष ने ब्रह्माण्ड का सृजन किया। सुरति विज्ञान को कोई समझ सुरति का बहुत बड़ा विज्ञान विश्व को दिया है। सुरात के द्वार नहीं पाया।

सुरति और निरति

स्वाँसों का सामान्य प्रवाह नाभि की ओर है। वायु ऊपर से आकर नीचे नाभि में समाती है और दस प्रकार से शरीर में रहकर कार्य करती है। इसी को निरति कहते हैं। निरति माया के साथ उलझी है, स्वाँस के साथ इन्द्रियों में उलझी है। शरीर में सार ही स्वाँस हैं। स्वाँसों को ऊर्ध्वगामी बनाना है अर्थात नाभि की तरफ जाने वाले स्वाँसों के प्रवाह को शीश से ऊपर की ओर ध्यान द्वारा ले जाना है। स्वाँस से सवा हाथ ऊपर स्वाँसों को खींचने का प्रयास ध्यान में करना है। फिर ऊपर से नीचे नाभि की ओर जाने से रोककर नासिका से बाहर छोड़ना है। इसी क्रिया से निरति को माया और इन्द्रियों से मुक्त कर अधर ध्यान में लेना होता हैं। इस सहज-सतत प्रक्रिया पर ध्यान देने से ही स्वाँसों ऊर्ध्वगामी होकर सुरति से मिलेंगी। सुरति का यही दूसरा हिस्सा निरति शरीर से मुक्त होकर जब सुरति में समायेगा तो बहुत बड़ी ताकत हो जाएगी।

शीश से ऊपर अधर में सुरति और निरति दोनों का एक हो जाना ही अलौकिक अनुभूति है। जैसे दौड़ने के लिये दोनों टाँगों को समान महत्व है। एक टाँग से दौड़ नहीं पायेंगे गिर जायेंगे, दोनों की जरूरत है। काम करने के लिए दोनों हाथों की जरूरत है। एक हाथ से ज्यादा काम नहीं कर पायेंगे। दोनों हाथों से भारी वजन भी उठा सकते हैं। इसी तरह सुरति और निरति का लौकिक और अलौकिक दोनों कार्यों में समान महत्व है। दोनों स्वाँस और ध्यान के साथ है।

सूरति और निरति का मेल नहीं हो रहा है, तभी तो आत्मा का साक्षात्कार नहीं है। यह बहुत बड़ा रहस्य है। क्योंकि स्वाँस शून्य से नाभि में चक्कर काट रही है, इसे ऊपर की ओर पलटना है: तभी सुरति और निरति का मेल हो पायेगा। इस स्वाँस को ही शीश से सवा हाथ ऊपर शून्य की ओर ले जाना है। अभी तो यह आदत में नहीं है, सद्गुरु शब्द पर चलकर धीरे-धीरे आदत हो जाने से सहज हो जाता है।

मनुष्य का नारायण चोला मामूली नहीं है। पूरा ब्रह्माण्ड हमारी सुरति में है, ध्यान में है। हम बाहर भटकते रहकर निरति को स्वासों के साथ इन्द्रियों में उलझाये हैं। मन के इसी खेल के कारण बाहर परमात्मा को ढूँढ रहे हैं। ध्यान से अन्तर्मुखी होकर ही भीतर के रहस्यों को जान सकते हैं, आत्म-कल्याण कर सकते हैं। याद रहे कि सुरति के द्वारा श्वांस ऊपर की ओर चलेगी। इसलिए वाणी है-

सकल पसारा मेट कर, मन पवना कर एक
उलटी तानों सुरति को, तहाँ देखों पुरुष अलेख।।

एक संत किसी धर्म की निंदा करने नहीं आता: वो एक 'सत्य' इस संसार में स्थापित करने आता है। वो बाहर भटक रहे अज्ञानियों को समझाता है-

वस्तु कहीं ढूँढे कहीं, केहि विधि आवे हाथ।
कहे कबीर भेदी लिया, तरत लखावे बाट।।

सद्गुरु रूपी भेदी साथ होगा, तब ही अन्दर के इस खजाने तक पहुँच पायेंगे। 'खावता, पीवता, सोवता, जागता, रहे सद्गुरु समाई। कहे कबीर सो भक्त रहे सुरति माहि।' रज-वीर्य से बना शरीर पंच भौतिक तत्वों से युक्त है, इसे अधर्म कहा, क्योंकि शरीर की वृत्तियाँ गन्दी हैं, अच्छी नहीं हैं। इसी शरीर में सुरति और निरति, स्वाँसों में मिलकर इन्द्रियों में भटक रही है। मन ने सुरति को बाहर भटका रखा है, ध्यान में नहीं आने देता है। जब इस मन को सद्गुरु चरण में लगा देंगे तो फिर सुरति को भटका नहीं पायेगा। सदगुरु ही अपने शिष्य को ध्यान में आत्मज्ञान कराने, सुरति से मिलाने में समर्थ है। क्यों सदगुरु तीनों गुणों और पाँच तत्वों से परे है, वह तो सदा सुरति ध्यान में ही है।

तीनों गुण ते न्यारा खेलै। मनुआ सत्य सुमिरन मेलै।।
श्वाँस सुरति एक डोरी लावे। अजर अमर होई लोक सिधावै।।

पवन को एकाग्रता के डंडे से घेरा, फिर उलटा कर दिया। शीश और आकाश के बीच ध्यान किया और स्वाँसों को एकाग्रता से पलटा। इससे जो स्वाँसें नाभि में आ रही थी, वो ऊपर की ओर चलने लगेगी, अष्टम चक्र में चलने लगी। धीरे-धीरे सुरति सुषुम्ना में समाने लग जाती है। ऐसी अवस्था में मनुष्य डर जाता है। मन डराता है कि अब तो मर गए, कहीं गलत दिशा में तो नहीं जा रहे। और यहीं पर एकाग्रता भंग करना चाहता है। यदि एकाग्रता भंग हुई तो फिर स्वाँस नीचे आ जाती है और सारा खेल खत्म हो जाता है। मन ध्यान को रोकता है, 10 वें द्वार की ओर नहीं जाने देता है। साहिब ने चेताया है

सुषुम्ना मध्ये बसे निरंजन, मुँधा दसवाँ द्वार।
ताके ऊपर मकरतार है, चढ़ सम्हार सम्हारा।।

सत सदगुरु सहज मार्ग देते हैं। परमपुरुष (परमात्मा) में लीन सद्गुरु स्वयं की सुरति से गुरु नाम की ताकत गुप्त सारनाम अपने शिष्य का देते हैं। सार-नाम पाकर ही आत्मा मन के बंधनों को समझ कर परमधाम के मार्ग पर जाती है। जैसे सीपी स्वाति-बूँद को पाकर उस पानी बूँद से मोती पैदा करती है। इसी तरह पारस सुरति सद्गुरु के पास है। सद्गुरु ही गुप्त सार-नाम दे सकता है अर्थात उस नाम में समाया उर हीं सदगुरु है। ध्यान सुमिरन में मन सदैव बाधक बनकर खड़ा है। पर सद्गुरु ध्यान सुमिरन से ही अंकुश लगाये रखना होगा। सद्गुरु नाम की छोड़ने और भूलने वाला मनुष्य मनुष्य मन के ही शिकंजे में आ जायेगा। शिष्य-गुरु-सत्यनाम की त्रिवेणी धारा ही सुषुम्ना को भेदकर अमरलोक रूपी संगम बनेगा।

स्वाँस, सुरत और नाम एक करके स्वाँसों को ऊर्ध्वमुखीं पलटा जाता है तो सुषुम्ना खुल जायेगी। नासिका के दोनों ओर की स्वाँसों को इसप्रकार सम करके ऊपर तरफ ले जाने के सतत ध्यान से ही सुषुम्ना खुलती है। सहज मार्ग में ग्यारहवें द्वार से जो सद्गुरु द्वारा बताया गया मार्ग है, कोई भी सीधे सार-शब्द को सुरति और निरति में समाकर अमरलोक को जाता है। अमर तत्व जो परमपुरुष का ही अंश है, उसी तत्व को सद्गुरु शब्द के साथ सुरति से मथकर पार ले जाते हैं। आकाश का वर्णन करते हुए साहिब ने समझाया है कि नासिका का दाहिना स्वर सुरति का द्वार है। इसी स्वर से ऊपर जाने पर सुरति कमल-तत्व की झलक मिलती है। जिस नाल से सुरति जाती है वह नाल सुषुम्ना बहुत टेढ़ी और कठोर है। मध्य कपाट (ललाट) अर्थात दसवाँ द्वार निरंजन (धर्मराय) का स्थान है, वही उसका रखवाला है। इसी नाल में दाहिने कमल को सुरति पाती है, यहीं से आगे को ध्यान सुरति-कमल है। यहीं से सुरति बिना आँखों के आत्म-तत्व को देख लेती है। इसी आत्म-तत्व का मूल-शब्द मैंने तुम्हें दिया है। विहँगम डोरि तो मूल शब्द में ही है। उस नित्य (अकल) कमल का स्वरूप ही श्वेत है, उसी को रूप-रहित ज्योति कहा है। अकल (नित्य) कमल के भीतर की लाल आभा सुरति के प्रेम से ही होती है जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। कमल के भीतर जो प्रकाश है, वहीं से मूल-शब्द की झंकार होती है उसी की झींगुर ध्वनि से तुम धन्य हो जाओगे। अक्षय कमल रूपी वृक्ष का ठिकाना मकरतार ही है। उस गुप्त कमल की आभा जिसमें साठ सूर्यों का प्रकाश है, वर्णनातीत है। सुरति से ध्यान करके उस कमल में समाने पर ही आत्मरूप दिखाई देगा, वहीं नि:अक्षर नाम अर्थात सत्य- शब्द का वास है।

अरिष्ट- कमल और अकह-कमल दोनों के मुख जुड़ने पर मूल- शब्द की गुँज का अनुभव होता है। यही निज सुमिरन और अजपा-जाप है, निज-अमृत है। निजूअमृत ही, सुरति का आहार है, वहाँ कोई दुःख-संतप शेष नहीं रहता।

जगत का समस्त जाल-पसारा और देह मूल सुरति के कारण ही हमारे अनुभव में प्रत्यक्ष है। स्थूल- सूक्ष्म-कारण-महाकारण-ज्ञान-विज्ञान छै: शरीरों की चार अवस्थाओं जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरिया में सुरति से ही हमें बोध हो रहा है। सुरति मन के साथ बँधी होने के कारण ही भिन्न- भिन्न शरीरों में अवस्थाओं के कारण तीनों लोक में सत्य प्रतीत हो रही हैं। इस मिथ्या को जानने साहिब ने निःअक्षर-शब्द में सुरति लगाने का भेद बताया है।

सात-सुरति नालों का वर्णन करते हुए साहिब ने समझाया कि मूल-नाम से हंस बनाकर ही सद्गुरु सुरति को शब्द में समाते हैं। सत नामों से सृष्टि-देह में समाई सुरति को समेट कर विहँगम रीति से मूल- नाम द्वारा हंसों का निर्वाण सद्गुरु करते हैं। (1) सिंधनाल, (2) पुहुप नाल (3) अमीनाल, (4) सुरति नाल, (5) अग्रनाल, (6) सोहंग नाल ्र (7) अजर नाल का विचार-भेद बताकर आत्म-हंस को काल-निरंजन के दशम द्वार का ज्ञान सद्गुरु कराते हैं। इसके बाद ही निज-सुरति में समाकर सद्गुरु निज मूल-नाम से कालपुरुष का भ्रम मिटाते हैं।

इन सातों सुरति खजाने को परखने वाला विशेषज्ञ केवल सद्गुरु ही है। सुरति से निरति को एक करके सत्य- शब्द तक ले जाने वाला सद्गुरु ही जीव मुक्ति के ज्ञान का दाता है।

सद्गुरु बड़ा सुनार है, परखे वस्तु भंडार।
सुरतिहि निरति मिलाइ के, मेटि डार खुटसार।।
सदगुरु साँचा शब्द है, काया के गुणवान।
जीवन मुक्त शब्दहि मिले, महपूरुष के ज्ञान।।

सुरति रूप कमलपुष्प में ही सद्गुरु का वास है, उसी में उनका सदा विश्राम है। सुरति-कमल में ही अजपा-जाप की डोर से सद्गुरु निज परमपुरुष धाम में ही रहते हैं। सद्गुरु भक्त भी सूरति-कमल में पहुँचकर अमृत के सागर में डूब जाता है। कबीर साहिब ने विचार दिया कि संत सदा विवेकपूर्ण ही बोलते हैं।

साहिब कबीर ने वर्णन से पूरे अर्थात अकथ-कथा कह समझाया कि स्वाँस-सार परमपुरुष से ही प्रकाशित है। बिना नाल अथवा बिना किसी आधार का सुरति-कमल अनुपम है जिसमें परमपुरुष का स्वरूप समाया है। इसीलिये चेताया कि स्वाँस-स्वाँस में प्रभु का सुमिरन कर लो।

धर्मदास मैं कहौ बुझाई। अकथ कथा कुछ कही न जाई।।
आदि अन्त को नाहि निवासा। स्वाँसा सार पुरुष परकाशा।।

स्वाँसों को व्यर्थ मत गँवाओ क्योंकि स्वाँस और सुरति के मध्य ही परमात्मा है। मन रूपी निरंजन स्वाँसों को सुरति में समाने से रोकता है, स्वाँसें खाली जा रही है।

तीन लोक का मोल हर स्वाँस का है। स्वाँसों को सुरत में लगकर ही मन रूपी पवन को घेरकर उल्टा चलाया जा सकता है। स्वाँस-पवन को शीश से सवा हाथ ऊपर अधर में ले जाकर ध्यान से जन्म-मरण के भ्रम का ज्ञान होगा। शीश और अधर के बीच सुरति में स्वाँस से ध्यान करने पर देह में भी आकाश के समान ही लगेगा। इसी से सुषुम्ना नाड़ी रूप डोर पलट कर अधर में ले जावेगी। यही पवन को पलट कर शून्य में घर करना कहा गया है। साहिब ने चेताया कि स्वाँस पवन रूप मन को स्वयं की साधना-चेष्टा से अधर-सुरत में रोकना सम्भव नहीं है। पूर्ण गुरु अर्थात सद्गुरु की कृपा से ही स्वाँसों को सुरति के साथ जोड़ा जा सकता है।

खेल ब्रह्माण्ड का पिण्डध में देखिया,
जगत की भरमना दूर भागी।
बाहर भीतरा एक आकाशवत,
सूषम्ना डोर तहाँ पलट लागी।।
पवन को पलटकर शून्य में घर किया,
घर में अधर भरपूर देखा।
कहे कबीर गुरू पूरे की मेहर से,
त्रिकुटी मध्य दीदार देखा।।

साहिब के इस सद्गुरु ज्ञान का सत्संग के बिना और पूर्ण- गुरु की कृपा के बिना आत्मज्ञान नहीं होगा। स्वाँस (निरत) और सुरति (आत्मा) के अन्तर-जोड़ को जाने बिना परमात्मा को नहीं जाना जा सकता।

निरत और सुरत को जोड़ने से ही परमात्म दर्शन होगा। सद्गुरु कोई धातु की मूर्ति नहीं है, वह तो साकार-निराकार से परे निरत-सुरति के मेल साक्षात हैं। अपने अन्दर, अपने हृदय में झाँकने, अपने भीतर परमात्मा को पाने की बात तो सब करते हैं, पर उपाय कोई नहीं बताता। इसी कारण मनुष्य जहाँ-तहाँ भटककर धर्म मान रहे हैं। सद्गुरु और शब्द-नाम के स्वाँस-स्वाँस में समाने पर अपने अन्दर ही परमात्मा को पाने का उपाय साहिब ने दिया।

कितने तपसी तर कर डारे, कया डारी गारा।
ग्रह छोड़ भये सन्यासी, तऊ न पावत पारा।।

स्वाँस और सुरति के मध्य रहकर सद्गुरु ही परमात्मा को खुड़ा कर स्वयं हट जाता है। वाणी है-

बिन सतगुरु बाँचे नहीं, कोई कोटिन करे उपाय।
स्वाँस स्वाँस जो सुमिरता, इक दिन मिलिया आय।।

स्वाँस को ही 'सोहं' कहते हैं। स्वाँस और सुरति के बीच में ही 'आत्मा' का रहस्य है। नाम या शब्द का सम्बन्ध आत्मा से है। मूल-नाम या सच्चे नाम का अनुभव आत्मा को सुरति और निरति के द्वारा ही होता है।

शब्द और सुरति में अन्तराल (दूरी) के समाप्त होते ही परमपुरुष से मिलन का मार्ग मिलता है। जिसने सद्गुरु ज्ञान से इस दूरी को देख लिया वही आत्मज्ञानी है। सद्गुरु से मिलन जरूरी है।

सबद सुरति के अन्तरे, अल्ल्ख पुरुष निर्बान ।
लखने हारा लखि लिया, जा को है गुरु ज्ञान ||

सत्यपुरुष तो विदेह रूप देह में ही हैं। उस स्वरूप को सुरति से देखा जा सकता है क्युकी अनंत लोक में रमे पुरुष का कोई रंग रूप तीन लोको में नहीं है

देहि माहि विदेह है साहिब सूरत स्वरूप। 
अनंत लोक में रमि रहा, जा के रंग न रूप।।

संसार की भौतिक सुख-सुन्दरता में असारता को भूलकर मस्ती में जहाँ-तहाँ फिर रहे हैं। संसार में ही ध्यान लगा है। स्वयं की बुद्धि और काम, क्रोध, मोह, लोभ से भरी चतुराई नहीं छूटती है। इस चतुराई की सुरति से धोकर सद्गुरु शब्द से जोड़ने पर ही मुक्ति मिलेगी।
आत्म ज्ञान के बिना जीव के अज्ञान में फँसी व्यथित आत्मा के कारण मनुष्य का हृदय भी अधीर है। जब तक सुरति को अपने साथ जोड़ने वाला सद्गुरु नहीं मिलता तब तक दुःख से छुटकारा नहीं मिलेगा।

बिरह बड़ो बैरी भयो हिरदा धरै न धीर।
सुरत-सनेही न मिलै, तब लग मिटै न पीर।।

जिस प्रकार पानी में नमक मिलते ही घुल जाता है फिर उसे अलग नहीं किया जा सकता। इसे प्रकार जब सुरति का मिलन सत्य-शब्द से हो जाता है तब कालपुरुष सुरति को शब्द से अलग नहीं कर सकता। कालपुरुष को मौन होना पड़ता है।

सृष्टि के प्रारम्भ में ही जीवों की करुण पुकार पर परमपुरुष द्वारा ज्ञानी पुरुष (कबीर साहिब) को भेजकर जीवों की मुक्ति का मार्ग दिया। सत्यकबीर ने जीवों को समझाया कि जब तुम्हें मनुष्य देह मिले तो मूल शब्द से सुरति लगाना। परमपुरुष का गुप्त नाम सुमिरन ही सहायक होगा जो सद्गुरु सुरति से ही मिलेगा। मानव देह पाकर सुरति सत्यशब्द में समाने से ही हंस होकर सत्यलोक जाओगे। मनुष्य देह पाकर जीवन में जिस प्रकार की आशा धारण करोगे शरीर का अंत होने पर वैसा ही दूसरा वास स्थान मिलेगा। अर्थात् तुम जीवन में जिस आशा से सदा प्रेरित रहोगे वैसा ही दूसरा जीवन मिलेगा। तुम्हारी सुरति जगत में खोई रहेगी। जैसे कि तुम्हें जब जीव बनकर कष्ट हुआ तभी आर्त होकर पुकारा। ऐसे ही काल निरंजन तुम्हें जगत में जीव-अवस्थाएँ देता रहेगा। यदि सद्गुरु शब्द पाकर भी तुम काल के भ्रमों में फँसकर परमपुरुष को भूलोगे तो काल तुम्हें खायेगा।

जब मृत्यु का समय पास आता है तो जीव को अपनी देह से और लगाव बढ़ जाता है। तन की इस प्रीति के कारण मरणासन जीव अन्य किसी को पहचानने में असफल होता है। देह के इस लगाव के कारण बहुत दुःखी होता है। मनुष्य अपने निज कर्मों से प्रेरित होकर ही सदा नई देह पाता है। जिस प्रकार सुनार स्वर्ण आभूषणों को गलाकर अपनी इच्छा अनुसार पुनः उन्हें बनाकर सरवारता है। उसी प्रकार जीव यह देह पाकर उसी में अपनी सुरति रखकर पुनः देह पाता है। जीवन की अवधि पूर्ण होने के समय प्राण-वायु ऊपर आकाश की ओर दौड़ती है। इस अवस्था में अधर लोक और शरीर के मध्य निरत रूप में समस्त वायु जीव को कर्म अनुसार संचित होकर खींचती है। जीव जिस प्रकार जाग्रत और स्वप्न अवस्था के भ्रमों में भटकता है ऐसे फिर संचित कर्मानुसार अंत में फल को प्राप्त करता है।

स्वर्ग और नरक सब स्वप्न अवस्था के समान ही हैं। केवल इच्छा रहित भक्ति करने से उच्च श्रेणी स्वर्ग मिल जाता है। इस प्रकार की निज-साधना भक्ति से स्वर्ग, नरक और मध्य स्थानों में, सावधि वास मिलता है। यदि सुषुम्ना में पहुँचकर सब नाड़ियाँ एक होकर मिल जाती हैं तो उत्तम और मध्यम लोक वास का फल प्राप्त होता है। यदि जीवन में काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार के भेद में ही मनुष्य रहा है तो अधोगति की निचली योनियाँ ही मिलेंगी। इसी विधि से जीव स्वर्ग और नरक के एवं जीवन के सुख-दुःख भोगते हैं। स्वर्ग, नरक, अधर में रहने की कर्मफल अवधि समाप्त होने पर जीव पुनः मृत्युलोक अर्थात इस जगत में जन्म लेता है। कर्मबंधन की व्यवस्थाओं के तहत ही जीव नरक खानियों के सुख-दुःख में आता-जाता है। जीवन के अंत होने पर केवल सुरति ही शेष रहती है जो तन मिलने पर पुनः शरीर रूप प्रकट होती है।

हम ध्यान करते हैं तो मन रूकावट डालता है, वो जानता है कि यदि ध्यान ठहर गया तो सारी लूट समझ में आ जायेगी। इसलिए मन तुरन्त सुरति को चुपके से दुनिया के झंझटों में पहुँचा देता है, एकाग्र नहीं होने देता। एकाग्रता से ध्यान द्वारा ही मन-माया का छल समझ में आने लगता है। जगत में रहकर हर आदमी की सुरति कुंद है। इस सुरति में ही सब कुछ है। बस इसे अंकुरित करने की आवश्यकता है।

सुरति अंकुरित होती है, गुरु की सुरति से। इसी कारण हमारे शास्त्रों में भी गुरु का ध्यान करने को कहा गया है। कहीं पर परमात्मा का ध्यान करने नहीं कहा गया। हम उसी का ध्यान कर सकते हैं, जिसे हमने कभी देखा हो। जिसे हमने देखा नहीं है, उसका ध्यान नहीं कर पायेंगे; इसलिए परमात्मा का ध्यान सम्भव नहीं, क्योंकि उसे कभी देखा नहीं। अतः हमें मन-माया को जानने उसके बंधनों को तोड़ने सद्गुरु का ही ध्यान करना चाहिए। वास्तव में सद्गुरु ही परमात्मा का प्रतिनिधि है, परमात्मा उसमें से प्रकट होगा।

ध्यान मूलम् गुरु रूपम्, पूजा मूलम् गुरु पादकम्।
मंत्र मूलम् गुरु वाक्यम्, मोक्ष मूलम् गुरु कृपा।

परमात्मा का ध्यान करने नहीं कह रहे हैं, गुरु का ध्यान करने को कह रहे हैं। कहा है गुरु के ध्यान से बड़ा और मूल ध्यान कोई नहीं है। गुरु की पूजा से बढ़कर कोई पूजा नहीं है। गुरु के शब्दों गुरु-वाक्य से बड़ा कोई मंत्र नहीं है। गुरु- कृपा ही मोक्ष का मूल है, गुरु कृपा से ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है। कितनी महत्वपूर्ण, आत्मज्ञान प्राप्ति की शिक्षा शास्त्र दे रहे हैं। परमात्मा की कृपा की बात नहीं कर रहे, गुरु कृपा को महत्व दे रहे हैं। संतों को यही शिक्षा कबीर साहिब ने दीं -

हरि कृपा जो होय तो, नहों होय तो नाहिं।
कहै कबीर गुरू कृपा बिन, सकल बुद्धि बह जाहिं।।

जिन स्थितियों में हम गुरु का दर्शन नहीं कर पाते हैं, उन स्थितियों में हमें गुरु का ध्यान करना चाहिए। सम्भव हो सके तो गुरु का दर्शन करके सीधे ये आध्यात्मिक शक्तियाँ लेनी चाहिए। यदि ऐसा सम्भव न हो सके तो फिर उसका विकल्प 'ध्यान' है। यह ध्यान सुरति है अमूल्य चीज है। हमारी सुरति जितनी देर तक जिसमें रम जाती है, हम भी उतनी देर के लिए वैसे ही हो जाते हैं

साहिबर ने चेताया कि 'नाम' और 'ध्यान' के बल पर ही आत्मा काल की दुनिया से छूटकर अपने सही घर, मूल घर वापस जा सकती है। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि हम जिस भी किसी चीज का स्पर्श करते हैं उसकी शक्तियाँ, उसके गुण हमारे अन्दर आ जाते हैं। यदि हम किसी गन्दी वस्तु को पकड़ेंगे तो गन्दगी के कण ही हमारे हाथ में लगेंगे। इसी तरह हम जिस किसी का भी ध्यान करते हैं, उसकी वृत्तियाँ, उसके गुण, इसकी शक्तियाँ भी हमारे अन्दर आ जाती हैं। गुरुजनों का ध्यान करने से बहुत तेज शक्तियाँ मिलती हैं। सद्गुरु का लगातार ध्यान करने से मन के अस्तित्व ही खत्म हो जाता है।

लोग सीधी परमात्मा का ध्यान करने भक्ति से शक्ति लेने का प्रयत्न करते हैं। हाँ, परमात्मा के पास बड़ी अद्भुत शक्तियाँ हैं, लेकिन आदमी तो परमात्मा को जानता-पहचानता ही नहीं है। उसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती, इसलिए उसका ध्यान नहीं किया जा सकता। कल्पना करके वैसा स्वरूप तैयार नहीं किया जा सकेगा जो वो है। वो तो शब्दातीत है, अक्षरातीत है, वाणी से परे है, इसलिए उसका ध्यान करके उसके गुण और शक्तियाँ लेना संभव नहीं है। परमात्मा का ध्यान ब्रह्मा भी नहीं कर सकता। ऋषियों ने भी परमात्मा का ध्यान उत्तम नहीं माना है। गुरु का ध्यान ही उत्तम माना है।

एक सद्गुरु बिना परिश्रम के आदमी को बदल सकता है। यह बदलाव भाई बन्धु, माता-पिता नहीं कर सकते हैं, पर गुरु यह बदलाव कर देता है। गुरु में अद्भुत सुरत शक्ति है जिससे वो एक क्षण में इन्सान को बदल सकते हैं। महापुरुषों के शरीर से अद्भुत रश्मियाँ निकलती हैं जो मानव को अन्दर से बदलकर उसमें रूहानियत का संचार कर देती हैं। महापुरूष अपनी सुरति के खेल से आध्यात्मिक शक्तियों का संचार कर देते हैं। नाम-दान देते समय अपनी सुरति से शिष्य के अन्दर परमात्मा की अद्भुत रश्मियाँ (परमात्मतत्व) छोड़कर आत्मा को चेतन कर देते हैं।

जब हम सद्गुरु का ध्यान करते हैं तो भी हमें परमात्मा की अद्भुत ताकत मिलती है। क्योंकि परमात्मा सद्गुरु सुरति में है इसलिए सद्गुरु ध्यान के संसर्ग से हमें परमशक्ति मिलती है। हमें, सब संशय छोड़कर सुरति को सद्गुरु शब्द में एकाग्र करना ही, मन-माया से मुक्ति का मार्ग है।

तुलसी साहिब (हाथरस वाले) कह रहे हैं कतार (डोर) की तरह सद्गुरु से सुरति बाँधे रही। जैसे ऊँट एक कतार में चलते हैं और एक के पीछे दूसरा आगे के ऊँट की पूँछ में अपनी सुरति की डोरी बाँधे हुए एक सीध में चलता है। ऐसे ही तुम भी सद्गुरु में अपनी सुरति बाँधो। सद्गुरु की सुरति मूल धाम ही जा रही है, इसलिए ऊँट की कतार की तरह उसमें अपनी सुरति को समा दो। यदि तुम सद्गुरु में इस तरह सुरति को दृढ़ कर दोगे तो हृदय में इस सार को बिठा लो कि तुम भी वहीं समाओगे। यही एक विधि है जिससे काल का दाँव नहीं चल पाता है। अन्य सब स्थितियों में वह मार गिराता है। योगी बहुत तपस्या, संयम आदि करता है, पर इस मार्ग में उनकी दुर्दशा हो जाती है। जो कोई इस बात को समझे वही विचार कर सकता है कि सद्गुरु के बिना ज्ञान विवेक नहीं मिलता।

कबीर साहिब समझाते हैं कि हर समय सद्गुरु के शब्द में सुरति लगाये रखो। नाम को छोड़कर कहीं चित्त को मत भटकने दो तब देखोगे कि अपना परमपुरुष दरबार पास में ही है।

साहिब ने यह गूढ़ रहस्य उजागर किया है - कि सुरति से ही इस सृष्टि-संसार की रचना जान पड़ रही है। सूरति करने पर ही इस भवसागर से पार जाया जा सकता है। सरति का ज्येष्ठ अंश परमपुरुष से इस हेतु भयो है इस कारण सुरति की डोर सदा परमपुरुष से जुड़ी है। परमपुरुष ने विहंग सुरति देकर इस सृष्टि की समस्त रचना भी कालपुरुष को सौंप दी। परमपुरुष की इच्छा से ही मूल शब्द की शिक्षा या ज्ञान प्रकट किया गया है। सूर्ति और शब्द यद्यपि परमपुरुष से ही उत्पन्न हैं। परन्तु सुरति संसार के लोभ में भटक कर प्रसन्न है। सुरति-निरति से ही इस देह का सुख और आनन्द है। सरति संभालने से ही इस जगत के समस्त दुःख-द्वंद्व समझ में आते हैं। सुरति और निरति को संभाल कर एकाग्र करने पर स्वरूप आत्मा अर्थात् साहिब को देखा जा सकता है। सुरति से समस्त प्रकाश और सब कुछ है। सदगुरु से मिल मूल नाम में ही बिहंग सुरति समाकर अपना मूल घर पाती हैं।

हमारी देह पिण्ड में समस्त शक्तियाँ कालपुरुष से मन-बुद्धि-चित्त रूप में जुड़ी हैं। निर्जन रूप मन ने सूरति से इन्हीं में बाँध रखा है। सुरति में दिव्य शक्तियाँ भरी पड़ी हैं, मन उन्हें पाने नहीं देता। अष्टम चक्रे में समाने पर सुरति से मिलन होता है। सप्तम चक्र तक कहीं भी सुरति है तो वह काल के भीतर है। सुरत तत्व से सुर्ति चैतन्य हो जाती है। सब तरफ से ध्यान हटाकर मन-पवन एक कर दो। सदगुरु के ध्यान से सूरत-तत्व आ जाता है। राजा जनक के गुरु अष्टावक्र जी ने जनक से कहा अब तुम्हारी, यह धन-दौलत, सेना मेरी हैं, तन मेरा है और मन भी मेरा है। इस सब के बाद राजा जनक में जो बचा वो आत्म-मिलन हुआ।

गुरु के पास जो तत्व होंगे उन्हीं की अनुभूति होगी। मन, सूरत को जागने नहीं देता। मन इच्छायें करता है, कर्म करता है, सूरति उसी में उलझी रहती है। मन भटका कर अमल कराने लग जाता है। गुरु अपनी सूरति से जागत कर देता है। हर पल सुरत् (ध्यान) सुधारना है। आत्मा का नजदीकी रूप सूरति है। गुरु के ध्यान से अनूठी विशिष्ट शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं। पहले बहुत कठिन लगेगा किन्तु सरत विकसित करने, प्राणवायू पकड़ने का सूत्र सदगुरु देता है।

सुरति की असीम दिव्य शक्तियों का वर्णन करते हुए संत दादू दयाल जी कह रहे हैं सुरति-सार की संधि की गति विरले ही जान पाए हैं। सुरति की गति को अन्तर्यामी और अनामी ही जान सके। क्योंकि सुरति अकथनीय नज़रों से भरी है। सत्य-शब्द में सुरति है और सुरति में ही शब्द है किन्तु दोनों पहुँच से परे उस आगोचर-अदेश्य मुलधाम के हैं। कैसे कहूँ यह तो उस स्त्री के सुख के समान है जो आपने प्रीतम को पाकर मन ही मन मुस्कान से भर जाती है। ऐसे ही अपने सतगुरु प्रेम में तब देख पाया जब मेरी सुरति उनमें ही ठहर गई। यह योग-ज्ञान और तुरियातीत अवस्था भी नहीं कही जा सकती। यह तो अकथनीय निज कहानी है।

परमपुरुष ने कालनिरखन को सुरति से बिसरा दिया है, गिरा दिया है। सदगुरु जीव को सुरत्ति से ही तो बँधते हैं। जब भी शिष्य सद्गुरु में सुरति लगाता है सद्गुरु तक पहुँचती है। यदि सद्गुरु सुरति से गिरा दें तो भक्त चाह कर भी सुरति नहीं कर सकता। निरंजन भी आध्यात्मिक आनंद नहीं ले पा रहा है। निरंजन ने कबीर साहिब से दीक्षा की प्रार्थना की थी पर उसे दीक्षा नहीं मिली। निरंजन को परमपुरुष की सुरति से वंचित रहने का श्राप मिला है, यह बहुत बड़ी सजा है; उसे 17 (सत्रह) चीकड़ी (असंख्य) युगों तक त्रिलोक का राज्य मिला है। मन में निरंजन अशांत शांत है क्योंकि उसने परमपुरुष का आनन्द अनुभव किया। उस आनन्द से श्राप के कारण वंचित है। वह उस सुख-आनन्द को चाह रहा है। सभी आनन्द चाह रहे हैं।

सदगुरु से सुरति पाकर आप अन्दर से शांत हैं, यह एक अलौकिक शांति है। निरंजन के माया-जाल में फँसे संसार के लोगों को यह आनन्द नहीं मिलेगा। मन के पास यह नहीं है। इसलिए सदगुरु भक्त प्रार्थना करते हैं कि चाहे जो सजा देना सुरति से मत गिराना।

सूरति और निरति दोनों शब्द में समा जाती हैं तो अहंकारी मन समाप्त हो जाता है। दीन भाव आ जाता है। तब सबमें परक ही आत्मा दिखाई देने लगती है।

सुरति की असीम अध्यात्मक शक्ति का वर्णन रविदास जी की भक्त मीरा ने जानकर किया है। जो पहले श्री कृष्ण जी की भक्ति में दीवानी थी। भक्ति में दीवानी मीरा कहती हैं कि हृदय में तीर के घाव की तरह कष्ट वह सहती रही है। मीरा को रात-दिन न तो नींद आती है और न ही अन्न-जल सुहाता है। तन के भीतर विरह की ऐसी अग्नि जल रही है कि पूरी रातें जागते हुए ही व्यतीत होती हैं। यही अभिलाषा है कि सत्य मार्ग का ऐसा कोई भेदी (सद्गुरु) मिले जो इस जगत और मूल देश को पहचानता-जानता हो। उससे अपनी दशा कहे। ऐसा भेद जानने वाला मिल जाये तो चौरासी की खानी में बारम्बार भटकने से बच सके। मीरा ऐसे मूल घर का भेदी खोजती भटकती रही पर कोई उसे नहीं बता रहा था। मीरा कहती हैं भटकते हुए अंत में संत रविदास मिले और उन सद्गुरु ने वह सुरति प्रदान की। तब मीरा ने जाना कि वह तो सुरति से आकाश के शून्य अधर में समाई है। सद्गुरु से सुरति लगाकर जब भी मीरा अमरमूलधाम का सुमिरन करती तो पल-पल नेत्रों में जल भर जाता है। तब मीरा जानी कि अपना सत्य प्रीतम मिल गया और हृदय की तड़फ अश्रु बनकर निकल रही है जिससे कष्ट का निवारण हो गया। मीरा ने इस सृष्टि में व्याप्त भक्त को 'खाक' (व्यर्थ) कह त्याग दिया और अपने मूल घर को जान लिया। मीरा ने क्षर-अक्षर से परे निःअक्षर शब्द सदगुरु सुरति से पाकर और अपनी सुरति-निरति लगाकर अपनी प्यास को बुझाया।

इतना विकासशील मनुष्य ब्रह्माण्डों को जानकर भी यह नहीं देख रहा है कि आत्मा को बाँधने वाला कौन है। इस संसार में जीव को बाँधने वाला कौन है। मनुष्य सामूहिक तत्व 'आत्मा' तक नहीं पहुँच रहा है कि कैसी है 'आत्मा'। आत्मा का आदर्श (Ideal) रूप है। 'ध्यान', 'एकाग्रता' यह नजदीकी रूप है। साहिब कबीर ने 'सुरति' पर बहुत शब्द बोले।

सुरति संभाले काज है, तू मत भरम भुलाय।
मन सैय्याद मनसा लहर में, बहत कतहूँ न जाय ।।

जैसे अनाम और फरार हुए बड़े अपराधियों को जाँच में साक्षियों द्वारा हुलिया बताये जाने पर एक संभावित चेहरा पुलिस बनाती है। जब अपराधी की तस्वीर की 90% आकृति बताये अनुसार मिलती है तो उसे आसपास के थानों में भेज देते हैं कि इस शक्ल का आदमी मिले तो सूचित करे। इसी तरह एक रेखाचित्र के माध्यम से अपराधी तक पहुँचा गया। इसी तरह 'आत्मा' जो अनाम है, अरूप है, प्रत्येक जीव मात्र में है, उसी से जीवन है। केवल आत्मा ही सृष्टि में सत्यस्वरूप है जिससे सकल जगत चैतन्य लग रहा है। उस आत्मा का नजदीकी माध्यम केवल 'एकाग्र ध्यान' है, सुरति है। सुरति शरीर में सात-रूपों में है इसीलिए आत्मा की शक्ति शरीर संचालन में खोई हुई है। आत्मा स्वयं को नहीं जान पा रही है कि उसका मूल घर कहाँ है। मनुष्य इसी कारण असंतुष्ट है, अशांत है। हमने एक कल्पना बनाई है कि 'आत्मा' प्रकाशित गोला होगी, ऐसा कुछ नहीं है।

सुरति फँसी संसार में, ताते पड़ गयो धूर
सूरति बाँध अस्थिर करो अठो पहर हजूर ।।

अर्थात पूरा सुरति की दिव्य शक्ति का खेल है।
प्रथम अमी सुरति है जो आनन्द का अनुभव कराती है,
दूसरी मूल सुरति है जो शरीर को चेतन कर रही है,
तीसरी चमक सुरति है यह मूल एकाग्रता रूप है। जब भी हम बुद्धि का काम करते हैं तो खास ध्यान लगात चमक सुरति हैं, यह चमक सुरति का ही उपयोग है। कभी कह रहे हैं कि शरीर-सेहत का ध्यान रखना अर्थात इस ओर ध्यान देना, एकाग्र होना।
चौथी शून्य सुरति जो हमें शांत रखती है संतोष कराती है,
पंचम ज्ञान सुरति, जो बताती है कि कौन सा काम उचित है और कौन-सा काम अनुचित है। अर्थात बुद्धि से निर्णय करवाती है।
छठी अनुभव मुरति (ठाँव-ठाँव रस चाखे) जो बाहरी और आन्तरिक इन्द्रियों को क्रियाशील करने में लगी है।
सप्तम हृदय सुरति जो पूरे शरीर को ऊर्जा पहुँचाती है। इससे स्पष्ट है कि शरीर में सारे कार्य सुरति रूप आत्मा से हो रहे हैं।

कह रहे हैं- कि ब्रह्म, जीव और प्राण तीनों हमारी काया में बताये गए हैं। शरीर में इनका सही-सही ठिकाना कोई पारखी ही पहचान पाया है। देह में इनके स्थान को किसी संत के सत्संग में दिये साक्षी शब्दों से ही जाना जा सकता है। शरीर से प्राण निकलने और जिस अंतिम समय की बात संत कहते हैं, में उस समय का हाल बता रहा हूँ। उदाहरण देकर अर्थात नकल से असल बात समझाता हूँ। जैसे पतंग को आकाश में चढ़ाने के लिए डोरी देते-देते वह ऊपर बढ़ जाती हैं, पर जैसे ही उड़ाने वाला डोर को चरखी के पिंड में लपेट लेता है। इसी प्रकार सुरति को ब्रह्माण्ड में से रोम-रोम के प्राण खींचते हैं और सिमट कर नाभि में आ जाती हैं। नाभि के तेजयुक्त स्थान से ध्यान द्वारा खींचकर ऊपर ले जाने पर स्वाँसा-वायु तालु स्थान पर पहुँचती है। इस ताल स्थान (भँवरकुआँ) जब निरति की डोरी खिंचकर पाँचों-तत्व अंड (ब्रह्माण्ड) में आते हैं तो मानो शरीर के प्राण ही ऊपर खिंचव आते हैं। यहीं कालपुरुष कानों पर आसन जमा कर कानों के ही रास्ते फिर प्राणों को अन्दर तत्व में समाता है। इसी अवस्था में साधक का काल से बचने, सद्गुरु सुरति से जुड़ना होता है। क्योंकि सद्गुरु सदा सुरति के साथ होते हैं, इसलिए जिसके पास सद्गुरु का सत्यनाम है बेचारा काल उससे दुःखी होकर डोरी की छड़ देता है। जब जीव सदगुरु की सुरति करता है तो काल अलग होकर डोरी छोड़ देता है। जो सद्गुरु की सुरति नहीं करता उन्हें भूल जाता है उस घर में काल का नगाड़ा बजने लगता है। जिसके हृदय में सत्य की लगन लगी है, सद्गुरु का अनुरागी है उसके पास काल नहीं आता है। काल सुरति की डोरी से छड़ाने के अनेक प्रयास करता है, वो अपनी 'सुरति से उसकी सुरति को उलझाता है। जिस प्रकार कोटा मछली को फँसाकर बाहर ले जाता है, वैसा ही प्रयत्न काल करता है। पर जब, जीव दृढ़ता से विश्वास के साथ सदगुरु की सुरति करता है तो सुरति सद्गुरु में समाने लगती है। ऐसे में सद्गुरु की सुरति शिष्य की सुरति को मजबूती से पकड़ कर काल के सिर पर जूती मारती है और काल को भागना पड़ता है।

कह रहे हैं कि जो मन को पहचान कर सदगुरु से प्रीति करते हैं, ठिकाने उनमें सुरति लगाते हैं, ऐसे लोग बिना किसी देरी के अपने मूल ठिकाने पर पहुँचे जाते हैं। काम, क्रोध आदि सब शत्रु सहज में ही उनके वश में हो जाते हैं। जो इस तरह का योग करते हैं, उनके घट में सदा उजाला ही रहता है, कभी अज्ञान का अँधेरा नहीं होता। दूसरी ओर कठिन योग-साधना से मन बस में नहीं आ सकता है। ऐसे योगी जनम-जनम तक ठगे जाते हैं। इसलिए हे योगियों! ज्ञान और भक्ति का विचार करके भक्ति का सहज मार्ग पकड़ भवसागर से पार हो जाओ। मन की लहरों को समझो, वो तुम्हें अपने में बहा रही हैं, ज्ञान की कमान पर उसे कसो। इस ज्ञान पर विचार करो कि तीन-लोक में उसी का पसारा है। केवल सदगुरु ही कालपुरुष से न्यारा है क्योंकि वो चौथे लोक का रहने वाला है। यदि तुम यह ज्ञान विचार करके सद्गुरु शरण में चले जाओगे तो निश्चय ही तुम्हारा कल्याण हो जाएगा। फिर तुम्हें संसार सागर में कभी नहीं भटकना पड़ेगा। तुम अमरलोक में जाकर उन्हीं की शब्द और सुरति की भक्ति में सदा रहो, वही इस जगत् के दीन-दयाल हैं दु:ख मिटाने वाले हैं।

परम पुरुष की सत्य भक्ति कैसे करें

सुनो धरमदास भक्तिपद ऊँचा। तहाँ कोई संतजु बिरिला पहुँचा॥
दया गरीबी होय अधीना। प्रेम भाव सु साधु चीन्हा ॥
साधु सन्त सेवे दिन राती। परसे नाहीं जाति अज्ञाति॥
प्रीति सहित सुरति लौ लाबे। साधु मिले तो साधु कहावे॥
मन निरमल करि साधुहिं सेवे। भक्ति पदारथ सो जन लेवे ॥
भक्त हीन दुर्लभ है भाई। शिर साटे कोई लेह बनाई ॥
भक्ति मुक्ति मूल है सारा। तन मन धन मुक्ति परिवारा॥

साहिब कह रहे हैं कि भक्ति पद बहुत ऊँचा है; वहाँ विरले संतजन ही पहुँच पाते हैं। दया, दीनभाव, प्रेम-भाव आदि के द्वारा ही साधु को पहचाने और उनकी दिन-रात सेवा करे। वो जाति-पाति के चक्कर में न पड़े और प्रेम के साथ सद्गुरु में सुरति लगाए। मन को निर्मल करके संत-सदगुरु की सेवा करे। वो भक्ति-पदार्थ को ले पाता है। यह भक्ति बड़ी दुर्लभ है। अहंकार का त्याग किये बिना यह प्राप्त नहीं होती है। यही भक्ति सच्ची-मुक्ति का मूल है।

भक्ति भाव तोसे कह्यौ, सुनु धरमदास सुजान।
ऐसी भक्ति जो करे, पावे पद निरवान॥

कह रहे हैं कि तुमसे सच्ची भक्ति का भाव कहा। जो कोई ऐसी भक्ति करे, वो ही निर्वाण पद को प्राप्त करता है।

गुरु-भक्ति क्यों करें? क्या पड़ी है गुरु-सेवा की? सीधा परमात्मा (परम-पुरुष) की भक्ति कर लेते हैं। आखिर गुरु-भक्ति के लिए क्यों बोला गया?

शिष्य को ऐसा चाहिए, गुरु रिझाय आपा खोई ।।

समझें। वो परमात्मा निर्द्वन्द्व है, मायातीत है, व्योमातीत है। उसकी तरंगें आपको नहीं समझा सकती हैं। वो आपको नहीं समझा सकता है। आप उसे नहीं समझ सकते हैं। जबकि गुरु माया में है, मन में है, इंद्रियों में है, इसलिए वो आपको समझा सकता है, आप उसे समझ सकते हैं। वो माया में रहते हुए भी माया से परे है। पर वो इसमें रह रहा है, इसलिए वो आपको ठीक से समझा सकता है, पर पूरमात्मा (परम-पुरुष) आपको समझाने में सक्षम नहीं है। आप परम-पुरुष को समझ सकने में सक्षम नहीं हैं। इसलिए उसकी भक्त करना चाँद पर पत्थर फेंकने की तरह है। साहिब ने तो धर्मदास से कहा कि परम-पुरुष की भक्ति का कोई मतलब नहीं है, कोई लाभ नहीं है। बेकार है उसकी भक्ति करना।

जैसे सूर्य को आप स्थूल आँखों से नहीं देख सकते हैं। अँधेरा छा जाएगा। पर चंद्रमा की तरफ देख सकते हैं। उस में जो प्रकाश है, वो भी सूर्य का ही है, पर वो सौम्य है। इस तरह गुरु सहज है। गुरु में वो सत्य सत्ता चेतन है।

सत्य पुरुष की आरसी, संतान केरी देह 
लखा जो चाहे अलख को, इन्हीं में लख लेह

इसलिए गुरु-भक्त बोली।

क्या है भक्ति योग

भक्त का मतलब ही है--विषयों का त्याग। वही भक्त है, जो भग न भोगे। यानी संभोग न करे। अष्ट प्रकार के मैथुन हैं, उनसे दूर रहे। लेकिन कलयुग में मनुष्य भक्ति नहीं कर पा रहा है। पर संत कह रहे हैं कि चिंता मत करो, सद्गुरु पार कर देगा। योग में गुरु का इतना महात्म नहीं है। तो आप कहेंगे कि भक्ति का खण्डन है। नहीं।

भक्ति स्वतंत्र सकल गुण खानी। बिनु सत्संग न पावे प्राणी ॥ पर भक्ति आसान नहीं है इस तरह ये तीन मार्ग बताए। अब संतों का मार्ग इस तीनों से परे है। आओ, संत-मार्ग को समझते हैं।

क्या है संतों का सहज-मार्ग,

संतत्व की धारा सहज-मार्ग की ओर जा रही है। वो है शरणागति। साहिब कह रहे हैं कि आपको कुछ नहीं करना है; सद्गुरु पार कर देगा।

योग-मार्ग में योग का महात्म है, गुरु-कृपा का नहीं;
ज्ञान-मार्ग में ज्ञान का महात्म है, गुरु-कृपा का नहीं; भक्ति-मार्ग में भक्ति है, गुरु-कृपा का नहीं।
पर संतत्व की धारा में, संत-मार्ग में केवल गुरु-कृपा का महात्म है। शिष्य को केवल गुरु की शरणागत में रहना है। सारा काम गुरु का है। साहिब कह रहे हैं-

तीन लोक नव खण्ड में, गुरू से बड़ा ना कोय 
कर्ता करे ना कर सके गुरु करे सो होय

गुरु ही सब करेगा। साहिब की वाणियाँ गुरुत्व को स्थापित कर रही है

कबीर हरि के रूठते, गुरु की शरणी जाय।
कहे कबीर गुरु रूठते, प्रभु नहीं होत सहाय ||
कबीर ते नर अँध हैं, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठोर हैं, गुरु रूठे नहीं ठोर ।।

क्या अन्य जगह यह बात मिलती है ! नहीं, इतना महात्मा गुरु का कहीं नहीं मिलेगा । यदि योग-काल में जाते हैं तो गुरु-शिष्य की लड़ाई भी होती रही है, पर संतत्व की धारा बोल रही है -

गुरु गूँगे गुरु बाँवरे, गुरु के रहिये दास ।
जो गुरु भजें नरक में, तो रखिये स्वर्ग की आस ।।

...तो शरणागति की बात आई । शरणागति बहुत बड़ी चीज होती है। जो जिसकी शरण में जाता है, वो उसकी रक्षा करता है....... पक्का करता है। देखो, विभीषण रामजी की शरण में गया था । युद्ध में रावण ने विभीषण पर शक्ति चलायी तो रामचन्द्र जी ने आगे होकर उसे अपने ऊपर लिया था। अगर आप सदगुरु की शरण में आ जायेगे तो फिर सदगुरु की ताकतें आपकी रक्षा करेंगी । तब आपको अपने कल्याण का प्रयत्न करने की जरूरत नहीं रहेगी ।

जो सतगुरु की शरण हो ताकी । तेहि कुछ यत्न रहैं नहिं बाकी ।।
ताते शरणागत सब परहैं । शरण गहे ते जीव उबरहै ।।
शरणागत कह सब गुण आवै । ज्ञान भक्ति तेहि माहिं समावै ।।

संत रविदास जी कह रहे हैं कि सत्य नाम के सुमिरण के बिना संसार में जो कुछ भी इंसान करता है, वो सब भ्रम है, भक्ति नहीं है। दान देना भक्ति नहीं है, ज्ञान की बातें करना भी भक्ति नहीं है, जंगल की गुफा में जाकर बास करना भी भक्त नहीं हैं। भक्ति कोई हँसी मजाक नहीं है। इसके कहीं इन चीज़ों के आस-पास भी नहीं है। इंद्रियों का साधना भक्ति नहीं है, योग करना भी भक्ति नहीं है, आहार को कम कर देना भी भक्ति नहीं है, बैराग्य धारण कर लेना भी भक्ति नहीं है। ये सब तो कर्म की बातें हैं जो वेदों में वर्णित हैं। सिर मुँड़ा लेना, माला पहनना आदि भी भक्ति नहीं है। यह सब तो कलाकारों का काम है। जब तक अपने मुख से अपनी महिमा गा रहा है, जो-जो कर रहा है, उसका बखान कर रहा है, तब तक भक्ति नहीं हैं। ये सब कर्म हैं। जब तक आपा नहीं खोया, तब तक भक्ति नहीं है। जब सद्गुरु से नाम मिलता है तो रिद्धि-सिद्धियों को भी गँवा देता है। तब कोई आशा नहीं रहती है। ऐसे में सब निधि मिल जाती है, प्रभु साथ में हो जाते हैं।

तुलसी साहिब कह रहे हैं कि वेद, शास्त्र आदि भला किसकी पूजा में लगा रहे हैं! परमात्मा के अंश का ही सारा पसारा है; वही परमात्म-अंश देह को धारण कर रहा है। शब्द ब्रह्म को सभी घट में बताया जा रहा है; उस परमात्मा को पिण्ड और वैराट रूप में बताया जा रहा है। जो अन्दर है, वही बाहर है: फिर इसी में आत्मा है, यह भी बताया जा रहा है। फिर भी यदि कोई पत्थर की पूजा करे तो वो अज्ञानी ही तो कहा जाएगा। वो तो चेतन परमात्मा को छोड़कर जड़ परमात्मा की पूजा में लगा है; धर्म के सहारा लेकर कर्म में लगा है। यदि कोई सार-तत्व की बात कहता है, तो उसकी वाणी पर विचार नहीं करता है, उसकी निंदा करके खुश होता है। शास्त्र, पुराण आदि तो आत्मा की बात कह रहे हैं।

पलटू साहिब कह रहे हैं कि जो सदगुरु का सच्चा भक्त है, वही अमोलक आत्मज्ञान के खजाने को पायेगा। वो अंदर में गोता मारकर उस आत्मज्ञान के खजाने को ढूँढकर ले आयेगा। आत्मज्ञान रूपी खजाने को पाकर फिर वो मुस्त हो जायेगा। ऐसे संत के घर में सब रिद्धियाँ-सिद्धियाँ भी पानी भरती हैं। वे राजाओं के भी राजा हो जाते हैं, उन्हें फिर किसी दूसरी वस्तु की चाह नहीं रहती। सब उसकी पूजा करते हैं। पलटू साहिब कह रहे हैं लेकिन दूसरी ओर पाखण्डी भेषधारी सच्चे गुरु की भक्ति बिना कंगाल ही रह गया, वो आत्मज्ञान रूपी खजाने को नहीं पा सका, क्योंकि उस खजाने को तो वही पा सकता है, जो सद्गुरु का सच्चा भक्त है।

पलटू साहिब कह रहे हैं कि संतों ने विचार किया कि जो सबसे बड़ा है उसी की पूजा की जाए। ज्ञान रूपी दीपक साथ में लेकर वे सब जगह ढूँढने लगे। उन्होंने 33 करोड़ देवताओं को देखा और उनमें से तीन (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) को खोज कर निकाला। फिर तीन में भी विष्णु और शंकर जी सही लगे, पर मुक्ति का एक ही द्वार मिला, जिसमें हरि (विष्णु जी) को चूना। फिर उन्होंने ज्ञान रूपी दीपक से देखा कि हरि तो गुण (सतगुण, रजगुण और तमगुण) के बीच हैं, पर संत इन गुणों से भी परे हैं। अब फैसला भक्त करे कि पूजा किसकी की जाए! पलटू साहिब समझा रहे हैं कि पूजा तो उसी की होनी चाहिए, जो सबसे बड़ा है। यानी संतों से बड़ा इस ब्रह्माण्ड में कोई भी नहीं है।

आध्यात्मिक भक्ति

एक 'संत' सद्गुरु के आनन्द में और ऋषि-योगियों के आनन्द में जमीन-आसमान का अंतर है। योगी, सिद्ध, ऋषि, सन्यासी (ब्रह्मचारी) स्वर्ग-वैकुण्ठ धामों के लाखों-करोड़ों वर्षों की अवधि के आनन्द सदा अखण्डनीय मोक्षधाम के लिए है किसी अवधि विशेष के लिए नहीं। योगियों का सारा आनन्द शरीर की सूक्ष्म कोशिकाओं के जागरण से होता है जिनमें सुषुम्ना नाड़ी का आनन्द सबसे बढ़कर है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि शरीर-छूटने के साथ ही योगी-ऋषि-सिद्ध-ब्रह्मचारी-सन्यासी सभी का ब्रह्माण्डीय भ्रमण का आनन्द भी समाप्त हो जाता है। केवल सूक्ष्म रूप 'आत्मा' परलोकों का फल-भोगती है, स्वर्गादि मिलते हैं। निराकार-मन (निरंजन) की भक्ति कर्म बंधन से मुक्त नहीं है, कर्म ही है, और कर्मफल अनिवार्य है। कर्म की कमाई है जिसका उच्च से उच्चतर सावधि फल निर्धारित है।

सद्गुरु की 'आध्यात्मिक भक्ति' में कोशिकाओं और सुषुम्ना नाड़ी को जाग्रत करने की कठिनतम साधना-कमाई नहीं करना पड़ती है। सदगुरु से 'नाम' दीक्षा और सद्गुरु में विश्वास व समर्पण से 11वें द्वार के पार होकर तीन-लोकों से परे 'सत्य' मोक्षधाम में हंस' आत्मा समा जाती है। सद्गुरु स्वयं भवसागर से पारकर ले जाते हैं। इसीलिये संत-सम्राट कबीर साहिब ने कहा- जिस दिन तुम्हारा योग-साधना का सूक्ष्म शरीर नष्ट हो जाएगा, उस दिन तुम्हारी सुघुम्ना नाड़ी भी समाप्त हो जायेगी। तब तुम अपने ध्यान को किस स्थान पर रोकोगे।' वाणी है

सिद्ध साध् त्रिदेव आदि लै, पाँच शब्द में अटके ।
मुद्रा साध रहे घट भीतर, फिर ओंधे मँह लटके ।।
पाँच शब्द और पाँचों मुद्रा, सोई निश्चय कर माना।
उसके आगे पूरण पुरुष पुरातन तिनकी खबर न जाना ।।

योग की पाँच-मुद्राओं में मनुष्य जीवन की चार-अवस्थाओं व तुरियातीत स्थिति में कालपुरुष (मन) छ: प्रकार के शरीर में क्रियाशील रहता है-(1) स्थूल शरीर,
(2) सूक्ष्म शरीर,
(3) कारण शरीर,
(4) महाकारण शरीर,
(5) ज्ञानदेही और
(6) विज्ञान देही।
साहिब इसी भेद को समझ रहे हैं कि मन-रूप तीन लोकी के स्वामी निरंजन की कठिन भक्तियों में त्याग और वरण दोनों ही *कर्म' हैं; स्वयं ही तपस्या करना है। इसके विपरीत 'सत्यभक्ति के दाता 'सद्गुरु' त्रिगुणों से रहित रहकर मोक्षधाम ले जाते हैं। सत्य-भक्ति या सद्गुरु-भक्त में सत्यवचन, मादक नशों से दूर रहना, शाकाहारी होना, चरित्र से उत्तम, ईमान की कमाई से जीवन-यापन करना, किसी प्रकार की चोरी-संग्रह से मुक्त रहना और किसी प्रकार का जुआ नहीं खेलना जैसे 'गुण' स्वयं आ जाते हैं।

जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति का पक्कामात्र मार्ग सद्गुरु से 'नाम' प्राप्त होने पर 'आध्यात्मिक भक्ति' है। मन-सकूप निरंजन की सुरति से चार प्रकार की मुक्ति प्राप्त होती हैं:

  • स्सामीप्य मुक्ति' निर्वाण मार्ग से,
  • सारूप्य मुक्ति' अधोर मार्ग से
  • सालोक्य मुक्ति' वाम मार्ग से,और
  • सायुज्य मु्सि' अलख पुरुष भक्ति से (निरंजन में समाने)।
    सभी धर्म मत-मतांतरों के सार को परख लो, यही पाओगे कि चारों मुक्तियों के जीवन मरण क्रम से कालनिरंजन ने जीवों को वश में कर रखा है।

सद्गुरु से प्राप्त अकह गुप्त 'नाम' की 'आध्यात्मिक शक्ति' से मोह-मोह रहित होकर काम-क्रोध से सतत; उबर जाओगे। दु:ख-सुख के भी संशय नष्ट होकर पाप-पूर्ण के कर्म नहीं रहेंगे। चित्त के सभी संग्रह होकर भीतिक सम्पन्नता और धन मिंव्या लगने लगेगा। इसी जीवन में 'आत्मा' अर्थात् 'नाम' के स्वरूप को जान लोगे। ऐसे सद्गुरु 'शब्द' के गुरुमुखा जीत ही इस सृष्टि रूपी भवसागर से पार होसे हैं। इसी को पंचमी-मुक्ति या 'मोक्ष' कहा है, संतों ने।

सूरति-निरति को 'नाम' में समाये रखकर 'सदगुरु' वचनों को ही गुरुमुख बनकर माने। परमपुरुष विदेह रूप कमल में वास करते हैं। सुरति भी विदेह-शब्द रूप पुरुष में है। अमरलोक में सम्पूर्ण विदेह पुरुप ने मुरति से ही रचे हैं। निरंजन को भी सुर्ति-शब्द से ही उत्पन्न किया है। परमपुरुष शब्द के साथ 'सुरति' विदेह मुक्ति की डोरी रूप है। इसी कारण 'सुरति' शब्द में ही समाई है। निरंजन भी सुर्ति को एकाग्र करके 'मन' रूप समाया है। शब्द को सुरति से बाँध कर ही भवसागर से निकालने सद्गुरु जीवों को पुकारते हैं। विदेह नि:अक्षर शब्द में जिसका वास है, वही 'सद्गुरु' है। जो सुरति-स्वरूपी होकर शिष्य में प्रवेश करते हैं। यह 'आध्यात्मिक शक्ति' अन्यत्र किसी धर्म-गुरु में नहीं होती इसीलिये मैं विनप्रपूर्वक साहिब-बन्दगी सत्संग में सत्य-भक्तों से कहता हूँ- 'जो वस्तु मेरे पास है, ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है?'

संसार के मायाजाल में भी 'सद्गुरु के नेत्रों' में सुरति की अग्र-झलक दिखेगी। ऐसे पूर्ण गुरु के विदेह 'शब्द' की गहन गहराई में उतरकर ही शब्द का प्रकाश उतरेगा (विदेह 'नाम' (नि:अक्षर नाम) में ध्यान मग्न रहने से सुरति 'शब्द' में समाने पर शरीर मृतक समान हो जाता है। इस प्रकार जीते जी इस 'आध्यात्मिक शक्ति' से आत्मस्वरूप पाकर शीतलता और तपन का आभास नहीं रहता। जन्म-मरण की शंका समाप्त हो जाती है। चलते-फिरते सद्गुरु शब्द के सुमिरण से शरीर के अचेत होने का ध्यान रखने की जरूरत नहीं रहती। स्वयं ही चैतन्यता रहती है। सुरति विदेह-शब्द के साथ जुड़ जाने से सांसारिक मोह के पिता-माता-बहन-भाई-पुत्र-पुत्री-बंधु-बाँधवी की ममता का बंधन नहीं रहता। मकान-सम्पत्ति और आभूषण का लोभ छूट जाता है। भूख-प्यास को मिटाने के लिए स्वाद की इच्छा नहीं रहती। ऊँच-नीच का विचार समाप्त हो जाता है। धर्म-अधर्म से ऊपर उठकर इनसे न्यारे हो जाते हैं। दु:ख-सुख सब समान हो जाता है, 'आध्यात्मिक शक्ति' के 'सद्गुरु' भक्त का। ऐसी अवस्था होने पर विदेह रूप को जान जायेगा। इस काया-पिण्ड (शरीर) को सीप के समान जानकर शब्द-रूप स्वाति को अन्दर आने दो। जब सीप को स्वाति बूँद मिल जायेगी तो मुक्ता ही उत्पन्न होंगे। अर्थात् सीप रूप देह में स्वाति रूप विदेह-शब्द (नाम) समाने पर शरीर का संचालन मन से नहीं होता। मन से 'सुरति' निकल कर सत्य-शब्द (नाम) के संग हो जायेगी तो विकारों की प्रवेश नहीं हो सकेगा। साहिब की वाणी से यह स्पष्ट होता है

मन से 'सुरति' को मुक्त रखने पूर्ण-सद्गुरु का आश्रय चाहिए। सद्गुरु की सुरति रखते-रखते एक दिन शिष्य सदगुरुमय ही जाता है, शरीर स्थूल है, सृष्टि स्थूल है जो दिखाई देती है, किन्तु इनके भीतर जो सूक्ष्म तत्व है वह दिखाई नहीं देता। शरीर में आसक्ति होने पर वह तत्व विषय-भोगों की ओर प्रवृत्त होता है।

संतत्व केवल समर्पण की बात कहता है। संतत्व की मान्यता है कि आत्मा कहीं अन्यत्र नहीं है उसे खोजना नहीं है। यह देह तो आत्म-प्राण ही है, पर वह 'मन' के बंधन में केवल विस्मृत हो गई हैं, उसे पुन: स्मृति में लाना है। इसके लिए मात्र सुरति ही पर्याप्त है और कुछ नहीं करना है। 'सुरति' ही 'आध्यात्मिक शक्ति' का स्रोत है जो सद्गुरु 'नाम' दान से शिष्य में जाग्रत करता है। परमपिता जिसे संतत्व की धारा में परमपुरुष अथवा सत्यपुरुष कहा है उसी के मानव रूप 'सद्गुरु' का हम अपने अन्दर स्थान बना लें, यही पर्याप्त है। सद्गुरु की सुरति रखी तो सदगुरुमय हो जाओगे काल के बंधनों से मुक्ति हेतु सद्गुरु की अनुकम्पा और सुरति ही लक्ष्य हो तो फिर कोई बंधन नहीं रहेगा।

आत्मा का स्वरूप ही आनंद है, वह उसका कोई गुण नहीं, वरन उसका 'स्वरूप' ही है। आत्मा को आनंद कहीं से लेना नहीं है क्योंकि आत्मा स्वयं ही आनंदमयी है। परमात्म सत्ता की दृष्टि से जो आत्मा है, अनुभूति की दृष्टि से वही आनंद है। 'आध्यात्मिक शक्ति' में आत्मा' की अनुभूति निहित है।

स्वर्गादि के सुख आत्मानंद नहीं है, वह आनंद का मिथ्या आभास है, आनंद नहीं। तीनों लोकों का स्वर्ग-नरक, जन्म-मरण का बंधन सच्चिदानंद नहीं क्षणिक सुख श्रम है। यह चौरासी लाख योनियों की अनंत यात्रा का दुखद चक्र है।

सद्गुरु शब्द अर्थात सार-शब्द (नाम) जिसने जान लिया अर्थात सुरति में उतार लिया तो 'मन' में बस जाएगा। 'सार सबद मन वासी।' जैसे-जैसे तुम 'गुरु' (सद्गुरु) को अपने भीतर बसाओगे, उसकी वाणी को अपने भीतर गूँजने दोगे तो तुम चकित हो जाओगे। चमत्कार यह होगा कि नाम-भजन द्वारा 'सुरति' से तुम्हारे भीतर की सुप्त-शक्तियाँ जाग्रत होकर 'आध्यात्मिक ऊर्जा' तुम्हारे भीतर प्रविष्ट होने लगेगी। तुम्हारे भीतर जो 'शब्द' सोया पड़ा है, जन्मों-जन्मों से, वह जाग उठता है। तुम जीवन्त हो जाते हो।

सोई शब्द निज सार है, जो गुरु दिया बताय।
बलिहारी वा गुरुन की, सीष वियोग न जाय।।

सद्गुरु अपनी 'सुरति' से शिष्य के भीतर पड़े सार-शब्द आत्मा के नाम को ध्वनित कर देते हैं; फिर तुम्हें अपनी स्मृति से भागने भी नहीं देता। हर चेष्ट करता है कि तुम्हारे भीतर जो चेतना दबी पड़ी है वह बीज की तरह फूट जाये, अंकुरित हो जाए।

असत्य को [जन्म-मृत्यु को] जन्मों-जन्मों तक पचाया है। असत्य कड़वा है, जहर है लेकिन जन्म-जन्मांतर का अभ्यास खूचिकर हो गया है, प्रिय लगने लगा है। जिसे जहर मीठा लगने लगे उसे अमृत कड़वा लगेगा क्योंकि असत्य से सत्य बिल्कुल उल्टा है। इसलिये शुरू-शुरू में सत्य कड़वा लगता है। इसलिये कबीर साहिब कठोर मालूम होते हैं, विपरीत लगते हैं जगत के धर्मवालों को। इसलिये सद्गुरु तीर की तरह चुभ आता है। यह चुभन तुम्हारी गलत आदतों का परिणाम थी जैसे 'आध्यात्मिक शक्ति' से मिटा दिया, आत्मनभूति में बदल दिया। मन की सुरति से सद्गुरु सुरति में बदल दिया, यह सुरति योग है।

सूरत कलारी भई मत्तवारी, पी गई मधवा बिन तौले ।

आज के धोखाधड़ी के युग में हजारों गुरु, संत और सदगुरु होने का ढोंग रचकर 'सिद्गुरु' के वर्णित लक्षणों का दिखावा कर रहे हैं। सद्गुरु 'लक्षणां' धारण कर दिखाते नहीं हैं, उनकी आध्यात्मिक आभा से यह लक्षण फूट पड़ते हैं। हृदय आलोकित हो उठता है। पुष्पों की सुगंध धारण नहीं करनी पड़ती; सुगंध स्वयं ही फूट पड़ती है, गुलाब, चमेली, केवड़ा से। इसलिये, सद्गुरु की कोई पूर्ण तस्वीर नहीं खींच पाता है। ऊपर-ऊपर के लक्षण लिखे जाते हैं सद्गुरु अध्यातम के, भीतर की तस्वीर नहीं उतार सकते। बाहर-बाहर की बातें होती हैं दुनिया के धर्म-गुरुओं के पास। जानने वाले, जिज्ञासू लोग कठिनाई में पड़ जाते हैं।

केवल लक्षणों पर मत जाना, हंसों के वेष में बहुत बगुले खड़े हैं साधु बनकर। तुम बुद्धि के घेरे में बँधकर रहोगे और बगुला तुम्हें फाँस लेगा। हृदय की सुनना मुक्त-भाव से तो सदगुरु जरूर मिल जायेगा।

सदगुरु सदा मौजूद है। प्यासा कोई हो, सरोवर सब में मौजूद है। वस, सदगुरु सदा मौजूद है। प्यासा कोई हो, सरोवर सब में मौजूद ह, बस सजग आँख और बड़ी गहरी प्यास चहिए तो सदगुरु को खोज लिया। उसकी आधी आध्यात्मिक यात्रा पूरी हो गई, तुम्हारा एक हाथ परमात्मा के हाथ में पहुँच ही गया। सद्गुरु से 'नाम' दान पाकर तो सुरति परमात्मा से ही मिल गई। सद्गुरु की सुरति से शिष्य की सुरति का योग(जुड़ना) ही आध्यात्मिक शक्ति है।

जिसकी आत्मा का सदगुरु सुरति से साक्षात्कार हो गया वह तो तुरियातीत अवस्था और विज्ञान-देही से पार निकल गया। इसी सुरति-योग की 'आध्यात्मिक शक्ति' से परमपुरुष अर्थात सर्वशक्तिमान परमेश्वर से अभेद होना होता है।

सच्चे संत बारम्बार मानवता को चेताते रहे हैं कि इस जीवन के रहते संसार के भटकावों से निकलें और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करें। इसकी जाना तो जीवन-मरण के चक्र से निकल सकोगे जो अंतिम सत्य, निजधाम है। मनुष्य योनि पाकर भी जो इसे न जान सका, वह खाली आया और खाली गया। उसने जन्म गंवाया और भिखारी की तरह मरा। कबीर साहिब से अध्यात्म का सत्य नाम पाकर सेठ धर्मदास अध्यात्म के सम्राट बन गए। इसलिये साहिब ने उनको 'धनी धर्मदास' कहा। शिष्य होकर धनी धर्मदास ने अक्षत धन पा लिया; नाम भजन और सुरति का धन। वह जीवित रहते अमरलोक के शाश्वत रहस्य को पाकर 'आत्मा' को जानकर गए। फिर मरना नहीं होगा केवल शरीर त्यागना होगा। फिर मृत्यु नहीं है। दुनिया में सब लोग बाहर से जुड़े हैं, मृत्यु बाहर से ही तोड़ती हैं। जैसे ही हम भीतर से जुड़ गये, फिर मृत्यु हमें नहीं तोड़ सकती।

आध्यात्मिकता और धार्मिकता सदगुरु में पूर्ण समर्पण से ही मिलेगी। समर्पण का अर्थ है 'मैं' भाव की अकड़ छोड़ना, यह भाव रखना कि अब तेरी मर्जी! जो करवाये, जैसा करवाये, तु ही करने वाला है। मैं करता नहीं हूँ, तू कर्ता है, तेरा जीवन, तेरी मौत, तेरी हार, तेरी जीत। तेरा सौन्दर्य, तेरी कुरूपता, सब तेरा। बुरा भी तेरा, भला भी तेरा। ऊँचाई की तरफ जो चलता है, उसे अकेला हो जाना पड़ता है। भीड़ ऊँचाई पर उठने का विचार नही करती। भीड़ तो भीड़ है, भेड़चाल उसकी शैली है। इसीलिये पुजारी और कथावाचकों के पास अंत्याधिक भीड़ इकट्टी होती है। संतों के पास अकेले ही जाना पड़ता है। सारी भीड़ के साथ जाने वाला लकीर का फकीर है आत्मज्ञानी नहीं।)

आध्यात्मिकता का अर्थ होता है, अकेले जाने की सामर्थ्य अपने पर इतना भरोसा कि अकेला भी जी सकूँगा। ऐसा व्यक्ति ही सद्गुरु को 'आध्यात्मिक शक्ति' का आधार मानता है। वह पहले अनुभव प्राप्त करता है, फिर मानता है। यह बड़े साहस का सफर है। सद्गुरु ऐसा 'सत्य' है जो शिष्य के रोम-रोम में रम जाता है। इसमें भ्रम की कोई आशंका नहीं रहती।

मिटो ताकि पा सको। 'दिल का हुजरा साफ कर, जानां के आने के लिए।' कई लोग नाम-दान के पश्चात सद्गुरु के सूक्ष्म रूप, ज्योतिर्मय स्वरूप, अथवा परमात्मा की झलक तो पाना चाहते हैं, लेकिन 'समर्पण' जैसी कीमत नहीं चुकाना चाहते। फिर जो झलक मिलेगी तो वो मन के खेल की होगी। परमात्मा तो एक अनुभव है, एक सत्ता है, जो पूरे प्राण पर फैल जाता है, रोम-रोम में समा जाता है। यह एक अनुभूति है, जैसे प्रेम की अनुभूति होती है, ऐसी ही यह अनुभूति है।

जब सदगुरु से पहचान होती है तब गुरु और शिष्य में भेद नहीं रहता। 'सुरति' का अर्थ हमारी अपनी ही पहचान, हमारा अपना स्मरण, हमारी अपनी याददाश्त है। बस, सदगुरु की सुरति से मिलन और झलक से 'आत्मा' (सुरति) मन से अलग अपने स्वरूप को पा लेती है। अरबों मील प्रति सेकेण्ड की गति से शिष्य की 'सुरति' को सद्गुरु तीन-लोकों से पार निज-लोक ले जाने में समर्थ हैं। रहस्य का ग्यारहवा महाद्वार खुलने लगता है। 'जब पहिचान होत तुमसे, सुरति सुरति से मिलावत।'

मीरा खाक खलक सर डारी में अपना घर जानी।।

जब निर्णय करने की वाणी समझ में आ जाती है तो झट और खोटे शब्द अपने आप ही लज्जित हो जाते हैं। सद्गुरु के निर्णायक शब्द सबके हितकारी होते हैं, जो इन्हें ग्रहण करता है वही सुख पाता है। सदगुरु को मारशब्द 'नाम' ही निर्णायक है जिससे जीवात्मा के 'मोक्ष' का लक्ष्य परा होता है। 'सद्गुरु' एक समय जगत में एक ही होता है जिसके सार-शब्द के आश्रित होकर सेवा-सिमरन से निज का कार्य सिद्ध होता है। निर्णायक 'नाम' शब्द के बिना द्वंद्व समाप्त नहीं होगा और द्वंद्व की उलझनों में पड़-पड़ कर मरना होगा। मायावी दुनिया के झगड़ों में रहना पड़ेगा। जहाँ भी झगड़ा है, द्वंद्व है वहां कभी 'गुरुमत' नहीं होता।

सार-नाम की महिमा का उल्लेख कबीर साहिब ने अपनी वाणी में किया है जो विदेह और जीवन्त नाम है। वो 'शब्द बावन अक्षरों से परे लोक (अमरलोक) की वस्तु है जो इस ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है। सार-नाम के संबंध में केवल कबीर-सागर में उल्लेख है, किसी अन्य धर्मग्रंथ में नहीं है।

भक्ति साहिब की बहुत बारीक है,
शीश सौपे बिना नाहीं मिले।

सत्य-भक्ति की प्राप्ति सदगुरु को अपना शीश (अहम/मैं) सौंपे बिना नहीं होगी। आनन्द इस संसार की किसी वस्तु/पदार्थ में नहीं है। आनन्द केवल आपके 'ध्यान' के अन्दर है। आपका ध्यान ही आपकी 'आत्मा' है। यह केवल निरोकार 'मन' का खेल है जो आपको आनन्द की अनुभूति संसार की वस्तुओं/पदार्थों में करवा रहा है ताकि आप पलभर के लिए भी इसके (मन के) मायावी संसार से विमुख न हो सकें। साहिब ने संसार में किसी नये धर्म की स्थापना नहीं की बल्कि 'सत्य' को ही संसार का सबसे उत्तम और उत्कृष्ट धर्म माना। साहिब ने सम्पूर्ण मानव जाति को 'सत्य' और 'अहिंसा' का सर्वोत्कृष्ट पाठ पढ़ाया और 'सत्य' की अर्थात सत्यपुरुष की सहज प्राप्ति के लिए मानव जाति को एक पूर्ण 'सद्गुरु' की शरणगत होने का सन्देश दिया। इस संसार में विरले जीव ही सच्चे 'साहिब' की कृपा और 'महिमा' को जान-पहचान पाते हैं।

हेलिकॉप्टर में उड़ने की क्षमता है; हवाई जहाज में भी उड़ने की क्षमता है: किन्तु कोई व्यक्ति यदि आपसे कहे कि वो हेलिकॉप्टर में बैठकर या हवाई जहाज में बैठकर 'चाँद' पर पहुँच गया, तो क्या आप उस व्यक्ति की बात को सच मानेंगे? नहीं मानेंगे। क्यों सच नहीं मानेंगे? क्योंकि आप जानते हैं कि हेलिकॉप्टर, हवाई जहाज उड़ तो सकता है, मगर किसी कीमत पर 'चाँद' तक नहीं पहुँच सकता। इसी प्रकार जब कोई गुरु कहता है कि 'पाँच-शब्दों' (सोहंग-सत्-ज्योति निरंजन-ओंकार-रंकार) को या 'सतनाम' की 'कमाई' के द्वारा जीवात्मा को 'अमरलोक' की प्राप्ति हो जायेगी, तब मैं जान जाता हूँ कि उस गुरु ने अभी तक 'मन' (निरंजन) के सच्चे स्वरूप को जाना ही नहीं है; अभी तक 'आत्म-तत्व' को छुआ नहीं है।

इस दुनिया में बहुत 'पंथ' हैं, मत हैं जो 'अमरलोक' मोक्ष की बात कर रहे हैं। आप लोग भ्रमित नहीं होना। मैं जानता हूँ कि उन पंथों/मतों के गुरु-जन को 'अमरलोक' की यथार्थ अनुभूति नहीं है। वे केवल कबीर साहिब की वाणियाँ पढ़कर अपनी समझ के अनुसार अमरलोक की व्याख्या कर रहे हैं। कुछ कह रहे हैं कि अमरलोक में 'अनहद धुनें' हो रही हैं; कुछ कह रहे हैं कि अमरलोक में 'दूध' की नदी बह रही हैं; कुछ कह रहे हैं कि अमरलोक में 'फलों के बाग' हैं इत्यादि। आपको सच बता रहा हूँ। अमरलोक में ऐसा कुछ भी नहीं है। 'परमपुरुष ही सत्यलोक' है वहाँ जैसे सूर्य, चंद्र, नदी, पहाड़ बाग-बगीचे नहीं हैं। अरूप आत्मा परमपुरुष की अंश' परमपुरुष में ही विलीन होकर आनंद के सागर में समा जाती है। समुद्र जल की बूँद समुद्र में गिरकर समुद्र ही हो जाती है।

आत्मानंद सद्गुरु के ध्यान से ही संभव है क्योंकि उनकी सत्ता मिलने पर ही हमारी सुरति मूल (ध्यान-आत्मा) बैंधन मुक्त है, चैतन्य है, जैसे ही आप उनका ध्यान करोगे तो सुरति शुद्ध होकर आत्तमा का स्वरूप यानि भूल-आनन्द प्राप्त करेगी। मूल आनन्द की तरफ जायेगी सदगुरु की सुरति। वस्तु कहीं ढूँढे कहीं वाली बात है। मजा आत्मा में है, ढूँढ, बाहर रहे है।

सुरति की सत्य-शब्द से पहचान खो गई है। सदगुरु रूप भेदी साथ होगा तो बतायेगा कि आपकी सुरति कहाँ खो गई है; किस प्रतीति में फस गई है। केवल बतायेगा ही नहीं सूरति को आत्मानन्द से जोड़ देगा. वाणी है-

वस्तु कही ढूँढे कहीं, केहि विधि आवे हाथ।
कहै कबीर सब पाईय जब भेदी लीजै साथ।।
भेदी लीन्हा साथ करि, दीन्ही वस्तु लखाये।
कोटि जनम का पथ था पल में पहँंचा जाय ।।

जब तक सुरति संसार के माया-जाल में भटक रही है, वेद के पढ़ने से भेद नहीं पायेगी। सद्गुरु से गुप्त भेद पाकर ही सुरति एकाग्र होने पर आत्मस्वरूप की पहचान होगी। बड़े वक्ताओं, गुरुओं को देख-सुनकर निर्णय करना कठिन हो रहा है कि यथार्थ में आत्मज्ञानी कौन है। आदमी उलझ जाता है, समझ नहीं पाता है।

मुझे इस माया संसार में रहकर और परम-लोक में आत्मा कैसी है, दोनों तरह से आत्मा का बोध है। स्वर्ग-लोक में 'आत्मा' कैसी है, मैं जानता हूँ। शरीर में आत्मा कैसे रह रही हैं, मैं जानता हूँ। शरीर में रहकर आध्यात्मिक व्यवहार करना बड़ा कठिन है, परं मुझे इसका भी ज्ञान है। मैंने इस शरीर में रहकर आत्मनिष्ठ रहना जाना है। मैं भोजन नहीं खाता था। मन कहता था कि खाओ, नहीं तो कमजोर हो जाओगे। मैं कहता था कि आत्मा कभी कमजोर होती है क्या! ओ मुरख मन, आत्मा को भोजन से क्या लेना। मैं नहीं खाता था।

जब एक बार मैंने अपनी सारी जायदाद भाइयों के नाम की तो माँ ने कहा कि तु अपने पास भी कुछ रख। वो बोली कि इनके तो बच्चे हैं, बुढ़ापे में देख लेंगे, पर तेरा तो पैसा ही काम आयेगा। यानी, माँ खैर चाहती थी। मैंने कहा -- माँ एक बात सुन, मैं कभी बूढ़ा नहीं होऊँगा।

में अपने शिष्यों से कहता हूँ कि अगर यह शरीर नहीं रहा तो भी आप लोगों से मुलाकात करने आ जाऊँगा। जब भी चाहे, मिल लूँगा। फिर, इस शरीर को छोड़ने के बाद एक साकार आधार देकर जानो चाहता हूँ। वो दूर की बात है।

गुरु समाना शिष्य में शिष्य लिया कर नेह बिलगाय बिलगे नहीं, एक रूप दो देह

शिष्य ने मेरी सुरति धारण की है तो वो मुझसे अलग नहीं है। तो मैंने कहा कि बूढ़ा नहीं होना है। अब माँ कहती कि देखो कहता था कि बूढ़ा नहीं होना, बाल भी सफेद हो रहे हैं, दाढ़ी भी सफेद हो रही है। पर सामने नहीं कहती थी

आप अपने अन्दर महसूस करते होंगे कि सबसे अलग हैं। यदि विरोध होगा तो वो लाजिमी है, उसमें भी वजन है। वे लोग आध्यात्मिक तक नहीं रचे हैं। वे जहाँ तक पहुँचे हैं, जहाँ तक जानते हैं वो बोल रहे हैं। हम निंदा नहीं कर रहे हैं। मैं केवल आध्यात्मिक शक्ति एवं सत्य की बात कर रहा हूँ। 'मन' के भौतिक जगत में मिलने वाले सुख-दु:ख की जानकारी दे रहा हूँ आत्मा और उसके निजघर की चेतना दे रहा हूँ।

..हमारे पूर्वजों ने योग-शक्ति द्वारा अत्यंत गहरी कोशिकाओं को जगाया। इस अन्दर की शक्ति को उन्होंने कुछ भी गलत नहीं कहा। कपिल मुनि ने सारख्य-योग में जो अपने अनुभव लिखे, कुछ भी गलत नहीं था। अद्वैत दर्शन में गौडपाद ने जो अपने अनुभव लिखे, बौद्ध दर्शन में बुद्ध के जो भी अनुभव हैं और योग-दर्शन में पातञ्जलि के जी अनुभव हैं कुछ भी असत्य नहीं है। पर वो सब आत्मज्ञान की आध्यात्मिक शक्ति नहीं है। यही अन्तर और भक्ति का लक्ष्य मैं दुनिया के लोगों को बता रहा हूँ।

वर्तमान में अध्यात्म क्षेत्र में बिना कोई आत्म-अनुभव के पारिवारिक उत्तराधिकार, धनबल और बाहुबल के आधार से गुरु गद्दी पर बैठकर संत और सदगुरु बन रहे हैं। संतमत में कोई भी उक्तानुसार संत या सदगुरु पद से विभूषित होने का अधिकारी नहीं है। कलियुग के आध्यात्मिक भक्तिकाल में केवल 32 संत- सद्गुरु उत्पन्न हुए जो सहजता सरलता से ईमान की कमाई से भ्रमण करते हुए 'सत्य'धर्म चेतना जगाते रहे। अन्य धर्म क्षेत्र में दौलत, शैहरत और औरत (अय्याशी) का प्रवेश है। मैं अपने सत्संगी शिष्यों से कहता हूँ कि आपको विचार आता होगा कि सत्यलोक कैसा है, हंस कैसे हैं। सच्चाई यह है कि आप सब सत्यलोक को जानते हैं, वो घर ही आपका है। आप परमपुरुष को जानते हो। निरंजन(कालपुरुष)ने इस सृष्टि को सत्यलोक की नकल पर बनाया है। अन्तर यही है कि सत्यलोक में भौतिक-तत्व नहीं है, वहाँ हंस आनंद के सागर में विलीन होकर आनंदस्वरूप है। निरंजन की इस सृष्टि की मृत्युलोक में रहकर सब जीव आनंद ढूँढ रहे हैं। वहाँ अविरल आनंद है, यहाँ इन्द्रिय-भोग का आनंद है। सत्यलोक स्वत: रमणीक-सौन्दर्यमय है, यहाँ सजाया गया है, पर पूर्ण सौन्दर्य और रमणीकता बन नहीं पाई। आत्मा को भ्रमित करने के लिए महाअंधकार के नीचे सूर्य, चन्द्र, तारामंडलों से प्रकाश युक्त आकाशगंगाएँ बनाने में निरंजन की महाशक्ति लगी है। 'हँस' जो सत्यपुरुष के अंश हैं, निरंजन-काल की इस सृष्टि की आत्मा हैं जिन्हें 84 लाख योनियों में 'जीव बनाया गया है। यही भ्रम का कारण और अंधकारमय महाशून्य के नीचे अवकाशीय तत्वों का अज्ञान है। सबको इस भौतिक-सृष्टि में कर्मानुसार, फल मिलता है, हर जन्म में मिलता है, हर तत्व को मिलता है। जब आत्मा सद्गुरु शरण में सत्यलोक के अपने निज हंसस्वरूप का बोध पाती है तब अनुभव होता है कि 'मन' ने उसे किस भ्रम में उलझाया हुआ है। जब यही जीवात्मा मोक्ष प्राप्त कर 'हंस' रूप सत्यलोक में प्रवेश करती है तो परमपुरुष को देखकर आश्चर्य नहीं करती। वहाँ सब उसे अपना ही लगता है। जैसे जगत में मनुष्य जब जाग्रत अवस्था से सोने के समय स्वप्न अवस्था में जाता है तो स्वप में जो कुछ भी घटित होता है सब वास्तविक लगता है। आत्मा जब सत्यलोक में पहुँचती है वहाँ लगता है कि वह झूठे स्वप्न-संसार से वापस आकर अपने निजघर में है। ठीक वैसे ही जैसे हम रात को निद्रावस्था में स्वप्नों के झूठे अनुभवों से निकलकर प्रात: उठने पर अपने घर में अनुभव करते हैं। आत्मा का यही सहज अनुभव, शिष्य को सद्गुरु से 'नाम' प्राप्त होने पर 'मन' के भ्रम समझ में आने से होता है।

सृष्टि की एक ही अलखपुरुष है काल निरंजन (मन) और एक ही नारी है 'आद्यशक्ति'। संसार का एक ही विधान है 'कर्म' और 'कर्मफल'। काल-निरंजन के ही दस-अवतार रूप हैं। द्वापर में राजा जालंधर की पत्नी वृन्दा के पतिव्रत धर्म के कारण जालंधर को मारना सम्भव नहीं था। श्रीविष्णु ने जालंधर का रूप रखकर वृन्दा का सतीत्व नष्ट किया तब श्रीकृष्णे ने जालंधर को मारा। संसार-सृष्टि का यही कर्मविधान है। सत्यलोक स्वयं सत्यपुरुष का ही स्वरूप है, वहाँ कर्म और कर्मफल नहीं हैं, कोई अवतार और तत्व नहीं हैं, रचना और विनाश नहीं है। इस कारण सत्यलोक में समाया कोई विरला संत ही 'सत्य' का अनुभव कराने में समर्थ है। मनुष्य किसी भी तरह स्वयं की योग-साधना, धर्म-ग्रन्थों, वेद-शास्त्रों के शब्द ज्ञान या नामों से उस नि:अक्षर-अकथ 'सत्य' को नहीं जान सकता।

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साहिब ने 'मन' से छूटने और मोक्ष प्राप्त करने सद्गुरु शरण में जाना बताया है। सद्गुरु का गुप्त विदेह 'नाम' पाकर सुमिरन और कृपा से ही सद्गुरु आत्मा का साक्षात्कार कराता है। यही गुरु-शब्द प्रकट होकर दीन-हीन को भी मिल जाता है। सिमरन का वैज्ञानिक महत्व है। सिमरन से आत्मा सद्गुरु के पास होती है क्योंकि सद्गुरु का चिंतन शिष्य को सद्गुरु का तदरूप बनाता है। आदमी सतत जिसका चिंतन करता है, उसका तदरूप हो जाता है।

अब मैं दुनिया वालों से जो कहने जा रहा हूँ, उससे बड़ा विवाद उत्पन्न होगा, बहस होगी, लोग मुझे बड़ा घमण्डी अभिमानी कहेंगे। मेरा एक

वाक्य पहले ही लोगों को ऐसा सोचने विवश कर चुका है, जो है 'जो वस्तु मेरे पास है, ब्रह्मांड में कहीं नहीं है।' यह बात मैंने बड़े सहज-सरल भाव से कही, घमंड से नहीं। क्योंकि सत्यपुरुष में समाया कोई एक ही अपने स्वयं के अनुभव से इशारों में बता सकता है। वो अकह 'नाम' वेद-शास्त्र और धर्मग्रंथों में नहीं है। भाषा-अक्षरों में लिखे गए परमात्मा के सरब नाम आकाश में समा अलख-निरंजन के नश्वर 'नाम' हैं। आकाश के प्रकाश रूप शून्य में ही समस्त सृष्टि के ब्रह्मांड हैं जो ईश्वर तत्वों से बने हैं। आकाश स्वयं पांचवाँ तत्व है, जो नश्वर है, तो उसमें समाया परमात्मा कैसे अनश्वर होगा! अनश्वर तो केवल एक परमपुरुष है जो त्रिलोक सृष्टि से परे है। शून्य सृष्टि के लोकों और अंधकारमय नश्वर ब्रह्मांडों में कहीं नहीं है, 'अकह-नाम' तो स्वयं अक्षय परमलोक महाशून्य से परे सत्यलोक है। इसलिये सत्यलोक के सत्यपुरुष का 'नाम' है। इस सत्य को बोलकर और योग-मुद्राओं के 'नाम' जाप से प्राप्त न किया जा स्कता।

अब मैं जो कहने जा रहा हूँ वो यह कि मैं इस ब्रह्मांड में खुद को किसी से बड़ा नहीं समझता। ....'इस ब्रह्मांड में कोई मुझसे बड़ा नहीं है।' मैं यह भी घमंड से या कोई विवाद का विषय बनने के लिए नहीं कह रहा हूँ। इस वाक्य को भी पूर्व की भाँति सहज-सरल भाव से 'नाम' की भाँति ही समझना होगा। वाक्य का पहला अंश 'मैं इस ब्रह्मांड में खुद को किसी से बड़ा नहीं समझता' .....हम सब मनुष्यों में और समस्त जीव-योनियों में एक ही 'आत्मा' का वास समान रूप से है। किसी भी शरीर में 'आत्मा' ही जीव रूप में है। (आत्मवतन सर्वभूतेषु)

यही एक सत्य समस्त धर्मशास्त्र, वेद-पुराण कह रहे हैं। यहां सब कह रहे हैं कि काल निरंजन और सब जीवों में एक ही परमपुरुष अक्षर चेतन रूप 'आत्मा' का वास है।... तो एक शरीर-रूप 'मैं' भी इस ब्रह्मांड में सबके समान हूँ, किसी से बड़ा नहीं हूँ। फिर वाक्य का अंश 'इस ब्रह्मांड में कोई मुझसे बड़ा नहीं है।' क्योंकि मैं आत्मा का जलवा जानता हूँ। इस दुनिया के लोग शरीर पर पहने हुए कपड़ों की संख्या, शरीर की बनावट, सुंदरता, गोरापन-कालेपन, रंगों, मांस-बल-ताकत की इज्जत कर रहे हैं। धन-संपदा से मान-सम्मान दे रहे हैं। मैं जात-पात, बलवान, कमजोर, ऊंच-नीच, पद, धन, सुंदर-कुरूप के आधार पर मनुष्यों को नहीं देखता। सब समान रूप से 'स्वयं' को जानने अर्थात अपने आत्मस्वरूप को पाकर परम 'सत्य' को प्राप्त करने के अधिकारी हैं। सब उस परमपुरुष में समाने अर्थात 'आत्मा' के निज घर का मोक्ष प्राप्त करने के अधिकारी हैं। सद्गुरु शरण में आने पर और गुप्त अकह 'नाम' पाकर एक परमपुरुष की भक्ति करने के सभी अधिकारी हैं। जैसे एक पी.एच.डी. अगर कहे कि पहले या बाद में किए पी.एच.डी. से बड़ा हूँ तो व्यवहार संगत नहीं। एक बूँद समुद्र में मिली अगर कहे कि पहली मिली बूँद से विशेष हूँ तो यह भी तर्क संगत नहीं। इसी तरह मैं उस अनित्य सत्य को जानता हूँ जिसके बाद न ही कोई गया न ही जाएगा। यही मेरा तर्क एवं निष्कर्ष है।

त्रिकाल में जो भी आए और बार-बार पाप-पुण्यों के कर्मजाल में कर्मफल भोगने विवश हुए उन्हें मैंने अपने से बड़ा नहीं माना। क्यों? क्योंकि मैंने उस एक को पाया और उसमें समाया जो अनश्वर है, जो कभी जन्म-मरण के चक्र में अवतार नहीं लेता। साहिब ने भी यही कहा-

कबीर एक न जानिया, तो  जाना सब जान 
कबीर एक ना जानिया, तो सब जाना जान अजान।।

संसार में सभी, सृष्टि रचने वाले किसी अलख को भगवान, खुदा, गॉड, ईश्वर, परमात्मा मानकर उनके पुत्र, पैगम्बर, अवतारों, उनकी चीजों-स्थानों-बलिदानों-जीवन के घटनाक्रमों, उनके परिवारजनों, चरित्रों आदि की भक्ति, साधना, पूजा, ध्यान, व्रत, तीर्थ आदि करके मुक्त की अभिलाषा कर रहे हैं। मन अनेकों भगवान-देवों-देवताओं की आराधरना, भक्ति इच्छाओं की पूर्ति, शरीर के भौतिक सुखों के लिये सब कर रहे हैं। परेशानी-दुःखों से मुक्ति की कामना और भौतिक सुखों को पाने का धर्म सब 'गुरु' संत-महात्मा बनकर सिखा रहे हैं। मैं इन सब धर्म-कर्म-अनुष्ठानों-साधनाओं-योग से परे केवल 'आत्मा' के ज्ञान अर्थात अध्यात्म की शक्ति के एक 'नाम' की सद्गुरु-भक्ति पर निर्भरता का आग्रही हूँ। इसी कारण कह रहा हूँ, 'इस ब्रह्मांड में कोई मुझसे बड़ा नहीं है।'

सत्यलोक में स्वर्गों जैसी श्रेणियाँ नहीं हैं। उत्तम-मध्यम-कनिष्ठ कर्मफल के मुक्त स्थान नहीं हैं, नरक नहीं हैं, जन्नत व की अप्सरायें और मदिरा जैसे तुच्छ सुख सत्यलोक में नहीं हैं। काल निरंजन स्वयं तो तीन-त्रिलोक के सर्वोच्च स्थान पर है, किन्तु आत्माओं को एक निश्चित अवधि के लिए, साधक-तपस्वी-योगी-मुनि-ऋषि आदि हुए सबने तीन-लोक तक की श्रेणीवार स्वर्ग और नरक का विधान है। त्रिकाल में जितने भी सिद्ध-बात कही। निराकार निरंजन तक की बात व कही। प्रथम बार कबीर साहिब ने दुनिया को समझाया कि ये तीन-लोक कालपुरुष के अधीन हैं। यहाँ हर चीज 'समय' (काल) के अधीन है और एक अवधि बाद हर चीज नाश हो जाता है।

अमरलोक में आत्मा 'हंस' बनाकर सदगुरु द्वारा कर्मफलों से पूर्णतः मुक्त कर ले जाई जाती है। अमरलोक में 'आत्मा' जो परमपुरुष की ही अंश है उसी में समाकर पूर्णतः को प्राप्त हो जाती है। निरंजन की सृष्टि में आत्मा जन्म-जन्मांतरों में कभी भी अपने निज-स्वरूप को प्राप्त नहीं होती। इसीलिए गण-गंधर्व-ऋषि-मुनि-देवों और पैगम्बरों का शरीर पाकर भी आत्मा निरंजन की व्यवस्था के अधीन असंतुष्ट ही रहती है। सत्यलोक पाने के बाद आत्मा को निराकार निरंजन के लोकों और अवतारों की कोई स्मृति शेष नहीं रहती। सद्गुरु तीन-लोकों की निरंजन व्यवस्था के देवों-भगवानों से ध्यान हटाकर परमपुरुष के गुप्त 'नाम' से जोड़ते हैं। उसी सत्यनाम को सदगुरु अपनी सुरति से शिष्य को देकर सुमिरण हेतु देते हैं। इस तरह 'सुरति-योग' से भक्त मन पर नियंत्रण कर सहज ही आत्मअनुभव प्राप्त कर लेता है।

भक्ति भाव अन्तर चले, बाहर होत सो कर्म ।
भक्ति भेष भूषण नही, भेष चिन्ह जग भर्म।।
भक्ति तदन्तर प्रेम है, बाहर से क्या काम।
रोम रोम भीना रहे, निशिदिन आठो याम।।

भक्ति-भाव अपने अन्तर की शक्ति 'आत्मा' का स्पंदन है, अध्यात्म की लगन है। मैं अपने पिता की लगन और सच्चाई के सिद्धान्त पर गरीबी से समझते के साथ भजन-प्र प्रार्थना से प्रभावित रहा। मैं बहुत छोटी आयु से ही पिता की धोती पकड़ कर उनका भजन सुनता था। चार वर्ष की आयु में ही मैं पिता जैसा भजन जाप करने अपने गाँव गोदरमऊ (भोपाल) की सूनी जगह में जाकर बैठता। मुझे बचपन से ही संसार स्वप्नवत लगता था। जब पिताजी परिवार को लेकर गोदरमऊ गाँव से भोपाल के बैरागढ में रहने आए, तब मेरी आयु 8 वर्ष थी। भोपाल एक छोटा नगर और बैरागढ एक शरणार्थी ग्राम था। मैं अपने भाई-बहनों में सबसे अधिक स्वस्थ देह का हष्ट-पुष्ट बालक था। गरीब परिवार के भरण-पोषण के लिए पिता मुझे भी दूध खरीद कर बेचने भेजते थे। मैं सबेरे पाँच बजे से 10 मील दूर तक जाकर दूध खरीद कर लाता, फिर बचन के बाद जो बचता उसका मक्खन-दही बनाते। इससे रोज मुझे दूध भी पीने मिल जाता जिससे शरीर ताकतवर बनता चला गया। स्कूल नियमित रूप से जाता, पढ़ने में भी लगन था। इस तरह बहुत छोटा उम्र से पिता का सहयोग परिवार के पोषण में करता रहा। भाई-बहनों की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली क्योंकि पिताजी बीमार हो गए, उनका देहांत हो गया। मुझसे बड़ा भाई खराब संगत में रहकर बिगड़ गया था, कोई जिम्मेदारी नहीं निभाता था।

सन 1968 में मैंने 17-18 वर्ष की आयु में भारतीय सेना में नौकरी कर ली। सेना में बड़े कठिन कामों की जिम्मेदारी आगे बढ़कर लेता था। कभी मांसाहारी नहीं रहा। मैं बाल ब्रह्मचारी हूँ। चार वर्ष की आयु से पिता जी जाप-भजन सीखा था जो सेना की सेवा में भी जारी था। मुझे 'नाम' सिमरन और आत्मा में रहने की लगन थी। मैं प्रकृति से कविता लेखक और भाषा शिक्षक था। सेना में ही एक साथी रविशंकर ने कहा, 'मधु तुमको एक गुरुदेव से मिलवाता हूँ, वह तुम्हें ब्रह्मांडों की यात्रा कराने में समर्थ हैं।' मैं इस साथी के साथ, उत्तरप्रदेश के गौंडा जिले में तहसील तरबगंज के ग्राम इवेलिया (चंदापुर) स्वामी गिरधरानंद जी परमहंस की कुटिया में गया। वहीं छोटा-सा आश्रम था जिसमें स्वामी जी एक खटिया पर दरी और नीचे जमीन पर फट्टी-चटाई बिछाकर रहते थे। आश्रम में गृहस्थी का केवल एक मटका, एक थाली-लोटा और एक पतीली (भगोनी) थे। मैंने स्वामी जी को निहारा और उनसे ही दीक्षा ग्रहण की। मेरे गुरुदेव 'सत्य' भक्ति में लीन थे।

सेना की नौकरी में जब भी छुट्टी मिलती मैं घर भोपाल नहीं आकर गुरुदेव की सेवा में ही रहता। पहले पूरा वेतन माँ और भाई-बहनों के पोषण हेतु भेज देता था। गुरुदेव से दीक्षा लेने के बाद जब भी छुट्टी आता कुछ वेतन की राशि लाता और आश्रम में भोजन आदि की व्यवस्था में लगाता। गुरुदेव के पास पहले से जो सेवादार था कुछ कर नहीं पाता था। गुरुदेव का सिद्धांत था कि जो भी साधक आते सत्संगी लोग आते उन्हें भोजन कराते थे। दाल, बाटी, चटनी का भोजन पत्तलों पर खिलाया जाता। मैं जब तक छुट्टी में गुरुदेव की सेवा में रहता तो भोजन बनाता और सब आगंतुकों, सत्संगियों को भोजन बनाकर खिलाता था। मेरे हाथ का बना भोजन सभी को बहुत स्वादिष्ट लगता था। मैं गुरुदेव के कपड़े धोकर उन्हें स्नान कराता और हाथ-पैरों की मालिश कर देता। जब तक मैं वहाँ रहता गुरुदेव को 'प्रसन्न' रखता और सत्संगियों को भी भोजन बनाकर खिलाता। गुरुदेव कहते थे, 'तुम नाम से ही नहीं वास्तव में 'मधु' हो।'

मेरे गुरुदेव ने सब सेवादारों और सत्संगियों से कहा, 'तुम सब मधु से सत्संग प्रवचन सुनो। मुझसे सत्संग में प्रवचन कराने के साथ ही गुरुदेव ने सत्संगियों को मेरे चरण स्पर्श करने, और बंदगी करने को कहा। इससे पुराने और मुझसे बड़े गुरुभाई सोचते यह तो छोटा है और गुरुदेव इसके पैर छूने कहते है.

गुरुदेव कठोरता से कहते, 'इसकी ही बंदगी करो और कृपा माँगो।' गुरुदेव ने मुझे ही उनका उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। मैं बड़े आत्मा विश्वास से बात करता और सत्यलोक, परमपुरुष और निरंजन का भेद पूरा अनुभव से बताता. गुरुदेव नें मुझे अमरलोक तक की यात्राएं कराईं थी। परमपुरुष का साक्षात्कार कराया था।

मैं सेना की सेवा में रहकर भी आत्मलीन रहता था। मैंने भोजन खाना छोड़ दिया, सोचा जब मैं 'आत्मा' ही हूँ तो बाहरी भोजन की क्या आवश्यकता। केवल पानी लेता। फिर सोचा पानी में तो सभी तत्व हैं, जिनसे शरीर को भोजन की पूर्ति होती है तो, मैंने पानी-पीना भी छोड़ दिया। शरीर की और ध्यान देना उसकी सफाई पर ध्यान देना छोड़ दिया। मैं विशेष चैतन्य रहने लगा। प्रज्ञा में रहने लगा। केवल वायु पर निर्भर हो गया। मेरी स्थिति से मेरी यूनिट के सब लोग वाकिफ थे। मुझे सेना से भोजन-सामग्री के स्टोर में ड्यूटी पर लगा दिया। मैं सेना के लोगों को प्रवचन देता था, भिन्न-भिन्न पंथों को मानने वाले ही सेना में होते थे। सब लोगों को मोक्ष-भक्ति और सत्यलोक की जानकारी अच्छी तो लगती पर सेना के खान-पान के कारण रुचि कम ही लोग लेते थे। मैंने वायु को बाधक मानकर 'आत्मा' को वायु से भी मुक्त रखने स्वरस पर नियंत्रण किया। अधरे-ध्यान में ही सुरति को बनाये रखता। शरीर में रहकर आत्म-धर्म का पालन करना बड़ा कठिन है। मैं शीश से सवा हाथ ऊपर रहता था, एक पल भी नहीं सोता था। सोना-जागना तो मन की वृत्ति है। तब मैं नहीं जानता था, मेरी माँ की शक्ल क्या है। मैं नहीं जानता था मेरे कितने भाई हैं। मुझे सुबह-शाम का भी मालूम नहीं था। मैं मन को सोचने का समय ही नहीं देता था। यह मेरा घमंड नहीं है, अपितु मैं 'मन' का मास्टर हूँ।

सेना के साथियों ने एक दिन कहा, 'तुम अपने शरीर का भी ध्यान नहीं रखते, देखो पैरों पर कितना मैल चढ़ गया है।' मैंने पैर हाथ में लेकर देखा तो सचमुच बहुत मैल चढ़ गया था। मैं शरीर बनकर और शरीर का आश्रित रहकर नहीं रहा। शरीर को अपना घोड़ा मानकर उस पर सवारी करता हूँ।
बिना भोजन, पानी, वायु का उपयोग किये मैं दो वर्ष लगातार रहा।

एक दिन स्वयं आद्यशक्ति (माया) आकर मेरे सामने खड़ी हो गई। माया बोली, 'तुम संसार के परिचालन की प्रकृति तत्वों में बाधक बन रहे हो।... तुम भोजन, पानी, वायु तत्वों पर नियंत्रण कर बाँध रहे हो इससे सृष्टि संचालन में बाधा उत्पन्न हो रही है।... या तो तुम शरीर की आवश्यकताओं को पूरा करो अथवा शरीर छोड़ दो... यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो मैं तुम्हें मार डालूँगी। तुमसे पहले कभी भी किसी ने ऐसा तप नहीं किया, केवल इच्छापूर्ति और मनोकामनाओं को पूरा करने या स्वर्ग पाने की घोर तपस्या-भक्ति सबने की है। मेरी इन अनुभव की बातों पर दुनिया के लोग विश्वास नहीं करेंगे। साहिब पर भी इसीलिए तो विश्वास नहीं किया था। आकाशीय अवतारों की कथाओं से परे संसार के लोग इस प्रकार 'सत्य' के अनुभवी पर विश्वास नहीं करते।'

एक दिन सेना का एक साथी हर्षद कुमार राजपूत रोटी खा रहा था। मैंने उससे कहा, 'यह रोटी तुम नहीं खा रहे की।' तो वह बड़ा ठहाका मारकर हंसा। उसने सोचा, 'यह (मैं) तो पागल हो चरक है, बहकी-बहकी बात कर रहा है।' मन-माया के चमत्कारों की ही दुनिया कायल हैं। मैंने विचार किया, 'अरे! गहराई में दुनिया वालों से बात नहीं करनी है। साहिब ने ही निरंजन को वचन दिया है कि उसकी सृष्टि में व्यवधान नहीं डालेंगे। जो जीव सदगुरु शरण में रहेंगे उन्हीं को सत्यलोक ले जाएँगे, निरंजन के भक्तों को विवश नहीं करेंगे।'

मेरे गुरुदेव ने उनके देहावसान कर सत्यलोक जाने के 20 वर्ष पूर्व ही मुझे 'नामदान' देने का अधिकारी बना दिया। मैंने 1970 में सेना में ही पहले नीर सिंह राठीर को 'नाम' दीक्षा देकर शिष्य बनाया। मैंने नीरसिंह से कहा कि इस दुनिया में सबसे बड़ा पंथ अगर कोई है तो वो है। नीरसिंह मेरी बात सुनकर मुस्कुराया और बोला, 'यह क्या कह रहे हैं, गुरुदेव! आपका न तो कोई पंथ है, न कोई संगत है, मैं पहला व्यक्ति हूँ, जिसने आपको गुरु धारण कर नामदीक्षा प्राप्त की हैं। न तो आपका कोई पंथ है, न ही आपके भक्ति-मार्ग को कोई जानता है। मैं आपका इकलौता सत्संगी हूँ और आप कह रहे हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा पंथ मेरी है।' मैंने कहा, 'नीर सिंह सत्य-भक्ति भाव अपने अंदर रखो और देखते चलो, साहिब तुम्हें खुद ही हमारी कही हुई बात पर भरोसा करवा देंगे। जो वस्तु मैंने तुम्हें दी है, वो वस्तु ब्रह्मांड में कहीं नहीं है।'

धीरे-धीरे सेना में ही मेरे अनेक 'नामी' शिष्य हो गए। मैंने सेना के अपने शिष्यों और मुझमें कभी भी कर्तव्यों के प्रति उदासीनता नहीं आने दी। मैंने कभी अपने गुरु होने का दिखावा सेना के मेरे अधिकारियों के आदेश का पालन करने में नहीं आने दिया। मैं सूबेदार पद से सेवानिवृत्त हुआ। आज भी सेना के अनेक पदाधिकारी और फौजी मेरे शिष्य हैं। इंजीनियर, कर्नल, डॉक्टर, वकील, जज, धनवान, गरीब सभी वर्ण-जातियों के अब तक ~20 लाख शिष्यों में एक ही भक्ति-भाव दिखेगा जो आंतरिक है, कोई बाहरी दिखावा और आडंबर नहीं।

सेना में रहते हुए मेरे साथ रहे, मेरे शिष्य शिवदास ने बहुत निर्धन होते हुए भी, रॉझड़ी (जम्मू) की उसकी खेती की जमीन आश्रम बनाने को दी। मेरा पहला छोटा आश्रम रॉझड़ी में बना जो आज सत्संग सेवादारों के सहयोग से एक बड़ा भव्य आश्रम है। दूसरा बड़ा आश्रम मेरे गुरुदेव की कुटिया के स्थान पर उत्तर प्रदेश के गौंडा जिले में हवेलिया का है। मेरे गुरुदेव स्वामी गिरधरानंद परमहंस का कहना था, 'मधु, यह भक्ति कठिन है। तुम्हें मुक्त की आकांक्षा लोगों में उत्पन्न करना है। तुम्हें स्वयं दुनिया वालों के पास सत्य-मार्ग सत्संग करके भक्ति-भाव जगाना पड़ेगा। 'नाम' लेने के बाद भी कठिनाइयों और काल के भ्रमों में फंसे होने के कारण सब-लोग तुम्हारे पास नहीं आ सकेंगे, निरंजन उन्हें खींचेगा। मधु, तुम खुद अधिक से अधिक आश्रम देश में बनाकर शिष्यों को दर्शन देने और सत्संग देने जाना।' मेरे गुरुदेव के शब्द पालन में ही रात-दिन भ्रमण करके कठिन परिश्रम से प्रदेशों में स्थान-स्थान पर सत्संग कर आश्रम बनवा रहा हूँ। 212 आश्रम अब तक बन चुके हैं। 30 दिनों में इतने आश्रमों में माह में एक दिन सत्संग करने और नए स्थानों पर जाना, जरा सोचें कितना कठिन है। किसी भी शरीर के लिए असाध्य है, मैं शरीर बनकर नहीं जिया। लगन मेरे गुरुदेव से मुझे मिली, उनके एक हाथ की तीन उंगलियां कट गई थीं। उनका शब्द था, 'मधु, कभी आराम से नहीं बैठना, चारों तरफ पाखंडियों का जाल है।'

मैं जीवन में केवल तीन व्यक्तियों से प्रभावित हुआ हूँ - मेरे गुरुदेव से, मेरी माँ से और मेरे पिताजी से। मैंने गुरु दीक्षा लेने से पहले आत्मा के गुण में जीना सीखा। मैंने मनुष्यों के जीवन और अपने अंदर 'मन' की चालाकियों के तमाशों को देखकर सीखा। इसलिये बार-बार कहता हूँ-

चश्मे दिल से देख तू,क्या क्या तमाशे हो रहे।
दिल सता क्या हैं तेरे, दिल सताने के लिए।
एक दिल लाखों तमन्ना, उस पे भी भारी हवस।
फिर जगह है कहाँ, जाना को आने के लिए।।

हे मन के वश में रहने वाले मनुष्य! तुम सदगुरु के शब्द -- सार को ग्रहण कर गुरुमुख बनो। गुरुवाणी का सत्य का संदेश मानकर ग्रहण करो। जिस आत्म-तत्व को मुनि और ब्रह्मज्ञानी आदि ढूंढ रहे हैं, उस तत्व को गुरु चरणों में आकर प्राप्त करो। सदगुरु की भक्ति से लगन लाओ। प्रथम तो अपने दिल में दया का भाव और दीनता लाओ, झूठ और हंसी को छोड़ दो। फिर आत्मा को पहचान कर परमात्मा को जानो और सदा उसके अनुरागी रहो। शब्द की प्रीति और शब्द की कसौटी पर हमेशा रहकर विरह-बैराग में रहो। जहाँ तक उस शब्द का अर्थ निकलता है, वहाँ तक पहुँचो और उसी में रमे रहो। साहिब कह रहे हैं कि जो इस आंतरिक भक्ति-भाव की लगन में रहेगा, उसके ऊपर काल का प्रभाव नहीं पड़ सकता। सदगुरु का शब्द सदा रक्षा करेगा।

सद्गुरु के 'नाम' सत्य में लगन लगाने से ही परमपद मिलता है। जीव कर्म-प्रधान है। कर्मों के संचय से ही मन उसे वहीं ले जाता है जिसका जीव ध्यान करता है। सब जीव-शरीर स्वप्न ही हैं, इनमें प्रकृति के ही भेद छिपे हैं। शरीर में लिप्त होकर कोई भी इससे बाहर नहीं जाता। आत्मा रूपी 'हंस' इन्हीं शरीरों में लिप्त होकर अपना स्वरूप भूली है। फिर भी, आत्मा का मूल स्वरूप कभी नहीं बदलता। जिस प्रकार वर्षा के बादल सूर्य को ढक लेते हैं, उसी प्रकार माया, 'आत्मा' को ढक तो सकती है किन्तु उसके स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं कर सकती है।

भवसागर अत्यंत कठिन है, उसे पार करने के लिए सत्य 'नाम' की आध्यात्मिक-शक्ति ही चाहिये। यदि भवसागर की तीव्र धारा दिखाई नहीं पड़ी तो बार-बार मृत्यु ही होगी। शरीरों से मुक्ति कभी नहीं होगी। जिसमें से उत्पन्न हुए ऐसे गर्भ में फिर समाना होगा। विकारों के रहते अपना मूल रूप नहीं जानोगे।

आत्म रूप हंस कौन है और सत्यपुरुष का अमरधाम कहाँ है? इसी रहस्य को अज्ञान में फंसे मनुष्यों को 'सद्गुरु' पुनः-पुनः संसार में बताते हैं। केवल सद्गुरु आध्यात्मिक-शक्ति से सत्यमार्ग पर ले जाते हैं। कौन-सा शब्द अंतर में आत्मसात होकर सब दुःखों को दूर करने वाला है, यह समझना होगा। यह भली-भाँति जान लेना चाहिये कि सब आचार्य और धर्म-प्रवर्तक केवल अपने-अपने धर्ममत की व्याख्या करते हैं। ऐसे किसी गुरु से आत्म-कल्याण नहीं होगा जो केवल धर्मशास्त्रों के आधार पर निर्मित किसी धर्ममत का ज्ञान रखता हो। इसीलिए साहिब कबीर ने कहा कि कोई विवेकी जिज्ञासु ही उनके सत्य-शब्द को ग्रहण करता है। कोई विवेकी संत ही उनकी वाणी का पारखी होकर धारण करता है।

कोई एक हंस विवेकी होवे।
सत्य शब्द जो गही विलोवे।।
कोटि में कोई संत विवेकी।
जो मम बानी गहे परेखी।।

सत्य का राही एक चित्त होकर गुरु के शब्द में लीन रहता है। वह सत्यमार्ग के लिए साधारणजन और राजा में कोई फर्क नहीं रहता। जिससे भी मिलता है अपनेपन से ही मिलता है और दुविधा का भाव मिटा है। क्यों कि सत्यमार्गी के अंदर भक्ति-भाव मिल रहा होता है। सद्गुरु ही सत्य का मार्ग, मोक्ष का मार्ग देकर गुप्त 'नाम' से भक्तों को सुरक्षा देकर भयमुक्त बनाते हैं। ऐसी 'आध्यात्मिक शक्ति' अन्य कहीं मिलना संभव नहीं है। साहिब वाणी में समझा रहे हैं-

चार पदार्थ इक मग माहीं।
बिन सदगुरु कोई पावत नाहीं।।

कह रहे हैं मेरे इस एक ही पथ पर जाने से काम-अर्थ, धर्म और मोक्ष बिना कोई साधना और तपस्या किये मिल जाते हैं। केवल सदगुरु की आज्ञा पर चलने, शब्द के पालन मात्र से धन मिलेगा। धन अभाव के कारण कोई कार्य नहीं रुकेगा अर्थात जीवन के कार्यों हेतु साहिब कृपा से पर्याप्त धन होगा। तीसरा धर्माचरण से युक्त जीवन रहेगा। चौथा सबसे उत्तम, मनुष्य देह के लाभ, 'मोक्ष' सदगुरु ही प्रदान करेंगे। यदि मनुष्य मन-माया के इस देह धर्म को जानकर सदगुरु, सत्य 'नाम' को अपने अंदर का धर्मभाव नहीं बनाता तो पछताना ही पड़ेगा। मनुष्यों को अपनी 'आत्मा' के गुणों के समान उसी के अनुरूप धर्म-आस्था में प्रवृत्त होने से 'सत्य' का बोध होगा।

सद्गुरु से 'नाम' पाकर आत्मा का आनंदमयी स्वरूप ही अंतर में भक्ति-भाव उत्पन्न करता है। इसी को साहिब ने कहा 'पारस सुरतिसंत के पासा।' हम 'सुरति-शब्द अभ्यास' नहीं बोल रहे हैं। आप बस सद्गुरु शब्द का ध्यान (सुरति) रखना तो भक्त-भाव में चेतन रहोगे। 'नाम' को पाकर भय-रहित हो जाओगे। जब गुरु की दया होती है तभी 'हंस' अमरलोक में जाता है। परमपुरुष का 'नाम' ही स्वयं परमपुरुष को प्रकट करने की इच्छा से अमरलोक रूप हुए। यही अकह सार-नाम सद्गुरु देता है, इसलिये निरंजन उसे अपने शीश पर पाँव रखने देता है। जो भी मनुष्य इस 'नाम' से सुरति जोड़ लेता है, उसे काल का भय नहीं रहता।

आत्मा का कौन-सा देश है? संतत्व की धारा ने आकर सर्गुण-निर्गुण नाम-सत्य पर उस नाम में समाया। गुरु सत्य हो, 'सद्गुरु हो' और नाम पाने वाला मनुष्य 'शिष्य' होकर सचे हृदय से सद्गुरु में पूर्ण विश्वास से समर्पित हो। सद्गुरु और नाम को भूलने वाला मनुष्य ही मन के शिकंजे में आएगा। सद्गुरु ही नियमों का पालन करने की भी शक्ति देने वाला है। सद्गुरु के ध्यान सुमिरन से ही 'मन' पर अंकुश लगेगा। तभी शिष्य भी 'सत्य' होगा। इस तरह ऊपर आत्म-भक्ति का अध्यात्म बताया। इसलिए कहा कि तीनों सत्य मिलने पर 'आत्मा' का अमरलोक में वास होगा।

सद्गुरु द्वारा, कर्मफलों से पूर्णतः मुक्त कर आत्मा को हंस बनाकर, अमरलोक ले जाया जाता है। इस तरह सृष्टि की रचना और विनाश के परे पूर्णतः मुक्त होकर अविनाशी आत्मा अपने अंशी आनंदमयी स्वरूप प्राप्त कर लेती है। क्योंकि अमरलोक ही आत्मा का निज घर है। निरंजन की सृष्टि में जीव-शरीरों में आत्मा जन्म-जन्मसांतरों में कभी भी अपनी शक्ति को प्राप्त नहीं होती है। इसीलिए गण-गंधर्व-ऋषि-मुनि और देवों में शरीर पाकर भी आत्मा कालनिरंजन की व्यवस्था के अधीन असंतुष्ट ही रहती है। 'सत्य' अमरलोक पाने के बाद आत्मा को निरंजन के लोकों और देवों-देवियों की कोई स्मृति शेष नहीं रहती; इसे ऐसा नहीं लगता कि वो पहली बार अमरलोक में है। इसीलिए सद्गुरु तीन-लोकों की निरंजन व्यवस्था के देवों-भगवानों से 'सुरति' (ध्यान) हटाकर परमपुरुष के गुप्त-नाम की सुरति से जोड़ते हैं। उसी सत्यनाम को सद्गुरु स्वयं शिष्य में प्रवेश कर सुमिरण हेतु देते हैं।

'सुरत' ही आत्मा की शक्ति है। सुरति से ही सद्गुरु मनुष्य को पुनः उत्पन्न करता है, आत्मा को उसकी विस्मृत शक्ति का स्मरण कराता है। ऐसी सत्यपुरुष शक्ति से युक्त सत्यभक्ति करने वाले भक्त को फिर सत्यधाम जाने से कालपुरुष नहीं रोक सकता। सद्गुरु के शरणागत हुआ शिष्य विश्वास से भरा हुआ रहेगा। यही सुरक्षा और विश्वास मैंने अपने शिष्यों को दिया है।

पुरुष शक्ति जब आन समाई। फिर न रोके काल कसाई।।

साहिब ने बड़े निराले देश - निज सत्यलोक की राह और युक्ति बताई, जहाँ जन्म नहीं है, मृत्यु नहीं है। वहाँ भूख नहीं है, प्यास नहीं है। मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार नहीं है।

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मुक्ति भेद मैं कहों विचारी

भक्ति भक्ति सब जगत बखाना।
भक्ति भेद कोई बिरला जाना॥

मैं बार-बार सुचेत करता हूँ और मैं बढ़ाईवश नहीं कहता। जो वस्तु मेरे पास है वह ब्रह्मांड में कहीं नहीं है।

दुनिया में धर्म-प्रधानों-मुखियाओं ने संतों और 'सद्गुरु' को भी नहीं छोड़ा, कठोर शारीरिक यंत्रणाएँ दीं। यही काल-निरंजन का धर्मजाल है। इसीलिए संतों ने समझाया-

  1. पहला राम : दशरथ का बेटा [रामायण और रामचरित मानस आदि में जिसके जीवन का वर्णन है।]।
  2. दूसरा राम : घट-घट में बैठा अर्थात निराकार [सभी धर्मशास्त्रों में जिसका निर्गुण वर्णन है 'ब्रह्म']
  3. तीसरा राम : बिन्दु-राम अर्थात जो सबकी उत्पत्ति का कारण है 'ब्रह्मा'।
  4. चौथा राम : निरालम्ब राम अर्थात 'सत्यपुरुष' [कबीर साहिब और सच्चे संतों की। वाणी में जिसका उल्लेख है।]

निराकार (निर्गुण) भक्ति को सर्वोच्च ज्ञान-भक्ति संसार के लोगों ने मानी है। निराकार (निरंजन) परमात्मा है; साहिब सत्यपुरुष नहीं।

सारा संसार, निराकार को परमात्मा मानकर 'मन' के अनुमान से ईश्वर और भगवनों की भक्ति में ही 'मुक्ति' जान रहा है। साहिब 'सत्यपुरुष' तो शब्द-प्रकाशी स्वरूप है, ज्योतिस्वरूप नहीं है। आकाशीय पिता अथवा बेचूना खुदा नहीं है। परमात्मा और आत्मा शब्दों को संतों ने भ्रामक कहा है। परमसत्ता को संतों ने साहिब 'त्रिभुवन से परे' कहा, ऐसे ही उसकी अंश चेतन-सत्ता को 'हंस' कहा है। महापुरुषों ने भी अपने नाम के साथ परमहंस लगाया। सच्चे 'संत' उसी परमसत्ता 'साहिब' में मिलकर उसी का 'हंस' रूप हो गये होते हैं। उनमें और साहिब में तनिक भी भेद नहीं होता, इसीलिए परमहंस होते हैं। जब चेतन सत्ता अपने लोक पहुँचती है तो उसकी संज्ञा है - हँस। जब चेतन सत्ता, सद्गुरु कृपा से वहाँ पहुँच साहिब में समाती है और फिर उसी का रूप होकर हँसों के कल्याण हेतु वापिस आती है तो उसकी संज्ञा है - परमहंस या संत सद्गुरु। वे काल की दुनिया में रहते हैं, पर उसका कुछ भी प्रभाव उन पर नहीं पड़ता। ऐसे संत सदगुरु जब चाहें तो शरीर से, प्राणों से और मन से बाहर निकल जाते हैं। इसलिए वे संसार में रहते हुए भी आजाद होते हैं और दूसरों को भी निरंजन के दायरे से आजाद कर ले जाते हैं।

जब हंस 'मन' में मिला तो उसे 'आत्मा' कहा, जब उसमें प्राण मिले तो उसे 'जीव' कहा। जीव में मिला प्राण ही दस वायु के रूप में शरीर में है। [1] अपान, [2] उदान, [3] प्राण (हृदय), [4] सर्वतन व्यान, [5] समान, [6] किरिकिल, [7] नाग, [8] धनंजय, [9] देवदत्त और [10] सबल, ये दस महाप्राण हैं। इनमें ही सुरति फँसी है। जीव-शरीर में इन दस महाप्राणों की श्रृंखला में बाँधकर कालनिरंजन ने माया में उलझाया है, इसे ही 'जीवात्मा' कहा है। अपान वायु, गुदा स्थान पर है जो मल को बाहर करती है। उदान वायु कलेजे पर है यह अपान वायु को ऊपर चढ़ने से रोकती है। प्राण-वायु हृदय में वास करती है। सर्वतन व्यान वायु पूरे शरीर को शक्ति देती है। समान वायु जोड़ों को क्रियाशील रखती है। किरिकिल वायु नासिका में रहकर ट्रैफिक संचालक है अर्थात छींक द्वारा रुकी हुई वायुओं को राह देती है। नाग वायु कंठ को स्वस्थ रखती है। धनंजय वायु भुजाओं और सीने को बलिष्ठ बनाती है। देवदत्त वायु नेत्रों को स्वस्थ रखने पलकों को उठाती-गिराती हैं। सबल वायु आलस्य और गर्मी के प्रभाव को कम कर सब वायुओं को शुद्ध करती है। इस तरह 'जीव' शरीर रूपी पिंजड़े में आकर समा गया जो 'जीवात्मा' कहलाया। इस तरह 'हंस' को माया के बंधन में फँसाया गया है।

निरंजन मन+आत्मा+प्राण+जीव साथ रहते हुए भिन्न-भिन्न शरीरों में परिवर्तित होते रहते हैं। यह निश्चित प्रक्रिया है, इसी से अधिभौतिक और अधिदैविक सृष्टि का क्रम चलता है। धर्मशास्त्रों के गुरु इसी में परमात्मा और अध्यात्म मानते हुए मन को ज्ञान का मूल, प्राण को क्रिया का मूल और वाक् को अर्थ (Matter) का मूल कहते हैं। यही शास्त्रगुरु प्राणवान पदार्थ को 'सत्' कहते हैं और भिन्न-भिन्न प्राणों के स्वरूप (सामूहिक) को देव बताते हैं।

अमरलोक और जीव-सृष्टि के उपरोक्त मूल आधारों पर ही साकार, निराकार और आध्यात्मिक भक्ति की शक्तियों का भेद समझ में आएगा।

अनेक कुकर्मों और जीवों को बंधन में कर सताने के कारण परमपुरुष ने कालनिरंजन की 'सुरति-नाल' तोड़ दी। श्राप दिया कि वह कभी परमपुरुष का ध्यान नहीं कर पाएगा और अमरलोक नहीं आ पाएगा। परमपुरुष ने कालनिरंजन को मिटाने का भी सोचा, पर 17 चौकड़ी संख्या युग राज करने का वरदान-शब्द कट जाता इस कारण मिटाया नहीं। यह श्राप दिया कि हर दिन एक लाख जीवों को निगलेगा तो भी पेट नहीं भरेगा। सवा-लाख 'जीव' हर दिन उत्पन्न करेगा। इसी कारण 'मन' रूप काल-निरंजन दिन-रात कभी शांत नहीं है, चलायमान रहकर कामनाओं से भरकर जीवों को नचा रहा है। चैतन्य नहीं लेता, सदा असंतुष्ट रहता है। असंख्य युगों से निरंजन और आद्यशक्ति के शिकंजे में जीव फँसा है।

साहिब ने बड़े प्यारे शब्दों में कहा-

विष अमृत रहत इक संगा।

मैं एक बात और बताता हूँ। संतों के प्रति मेरा दुष्टिकोण क्या है? संतों के प्रति मेरी सोच क्या है? संतों के प्रति बड़ी ऊँची सोच है। आपको राय देता हूँ कि बचना, क्योंकि अधिकतर चाहे सब साहिब का रूप हो गये, पर अधिकतर सभी पहले निरंजन की ही भक्ति करते थे। गुरु नानक देव जी की वाणी में निरंकार, निरंजन देखकर भी भ्रमित हो सकते हैं। क्योंकि वाणी उन्होंने तब लिखी थी, जब वे निरंजन की पूजा करते थे। जो इस से आगे बहुत कम लोग जानते हैं। यही बात बाकी संतों से जुड़ी हैं।

पर मैंने कभी निरंजन की भक्ति नहीं की है। यहाँ हम अलग हैं। अब मीराबाई पहले तो 'मेरे तो गिरिधर गोपाल' ही कह रही थी। आधा आदमी की तो खिचड़ी ही निकल जाएगी। वो भ्रमित हो जायेगा।

अध्यात्म का भटकाव संतों की शैली से ही आया। सूरदास बार-बार गिरिधर कह रहे हैं। इसलिए सतर्क होने के लिए कह रहा हूँ।

तो सब समान हैं। एक इंच का भी अंतर नहो है। इस तरह एक स्थान पर पहुँचकर गुरु-शिष्य की पहचान भी नहीं है। फिर ढूँढना चाहोगे तो भी नहीं मिलेंगे। द्वेष ही नहीं है। किसी में 0.001 प्रतिशत भी अंतर नहीं है। इसलिए राग-द्वेष नहीं है।

सदा आनन्द होत है वा घर, कबहुँ न होत उदासा।।

एक बात और बताता हूँ। जितना कुरान-शरीफ को मैं जानता हूँ, कोई नहीं जानता है। किसी भी मौलवी से पूछो तो हजरत मुहम्मद साहिब की सात आसमानों की यात्रा के विषय में ठीक जानकारी नहीं है। बात होती है तो वो अटक जाते हैं। क्योंकि वो खुद वहाँ गये नहीं हैं। उन्हें सही में पता नहीं है। मैं तो जाता रहता हूँ। मैं पूछता हूँ कि कैसे गये, तो कहते हैं कि फरिश्ते ले गये। नहीं, वो शब्द ले गया, गुरु का मूल रूप ले गया। यह कोई मौलवी नहीं जानता है, क्योंकि खुद कभी गया नहीं है। रूट ही नहीं है उनके पास।

इसी तरह मैं कहता हूँ कि जितना बाइबिल का मैं ज्ञाता हूँ, कोई नहीं है। वो तो कल्पना कर रहा हैं कि आकाशी पिता। मैं सही में जानता हूँ, जो ईसा-मसीह की वाणी में लिखा है। मैं यह कोई अहंकार से नहीं कर रहा हूँ।

जिस बुद्ध के अष्टांग योग से भिक्षु बात कर रहे हैं, जिस आत्मतत्व के बारे में बुद्ध ने बात की है, उसे मैं जानता हूँ; पर वो नहीं जानते हैं। वो किताबी बात कर रहे हैं, मैं आँखों देखी बात कर रहा हूँ। तभी तो साहिब भी कह रहे हैं-

तेरा मेरा मनुवा, कैसे इक होई रे ।
तू कहता कागज की लेखी, मैं कहता आँखन की देखी।।

जो मूल रूप आत्मा का मुझे वहाँ दिख रहा है, वही यहाँ भी दिख रहा है और निरंजन (निराकार) भी साफ़-साफ़ दिख रहा है। आपके गाँव का कोई ठग हो और किसी दूसरी जगह जाकर पंडा बन जाए तो आप तो पहचान लोगे न! इस तरह मुझे ज्ञान हैं। मुझे साफ़-साफ़ दिख रहा है। पर इसका साक्षी कोई नहीं है। इसलिए कह रहा हूँ कि यकीन करना।

आत्मा ने अपना रूप ही नहीं खोया है। जैसी वहाँ है, वैसी यहाँ है। समान है बिलकुल भी, आप भी देख सकते हैं।

निरंजन ने बीज कैसे बनाया? कुत्ते के अन्दर जो बीज है, वही बीज इंसान के अन्दर है। दोनों समान हैं। वैज्ञानिक यहाँ चौंक जायेगा। जैसा गर्भद्वार मिला, वैसा शरीर होगा। कुत्ता, मुर्गी, मच्छर आदि सब के शुक्राणु समान हैं। कोई आज तक यह बात नहीं कहा। मैं कह रहा हूँ। सिद्ध करता हूँ। जर्सी गाय है। उसे नया करते हैं तो इंजेक्शन लगाते हैं। सूअर का शुक्राणु गर्भद्वार में डालते हैं।

जैसा साँचा मिलेगा, वैसा ही बनेगा। गोल-गोल आइसक्रीम क्यों बनी? क्योंकि गोल साँचे में डाला। यदि चौड़े साँचे में डाला तो चौड़ी आइसक्रीम बनेगी। आइसक्रीम वैसी ही बनी, जैसा साँचा मिला। इसी तरह से 84 लाख योनियों में घुमाया जा रहा है।

आदमी और जानवर का भी मेल बना रहे हैं। यानी साँचा अंदर वाला। पूँछ भी होगी। साँचे में फँसा कुत्ते का शुक्राणु भी बंदर ही बनेगा। जैसा साँचा मिला, उसी के अनुरूप जीव-जंतुओं में अंतर है। पर वैज्ञानिक नहीं समझ पा रहे हैं। क्योंकि उनका मामला वहाँ नहीं है। बड़े उदाहरण मिलते हैं।

अमरीष ऋषि रीछ की संतान है। पर इंसान हुआ। स्त्री को रीछ ले गया था। रीछ स्त्री को संभोग के लिए रखता है। पैर चाटकर अपंग करता है। कुत्ता भी स्त्री को सूँघने आता है। कुत्ते की सूँघने की शक्ति तेज है। हनुमान जी की मनुष्य की आकृति है, पर वानर जैसे हुए। आगे चलो तो काफी मिलता है। काकभुशुण्डी को देखो, शरीर कौवे का था, पर ज्ञान इंसान का। अतीत को देखें, तो भी उदाहरण सामने आ रहे हैं। घटोत्कच्छ में शुक्राणु भीम का था, पर राक्षसी से पैदा हुआ था, इसलिए आकृति वैसी बनी। इस तरह से वंश परम्परा चली है। यह तर्क है।

गुप्ता जी का शुक्राणु था। बाप का वीर्य खाया। ब्लड की खुराक मिली। खून से ही वीर्य बना। शुक्राणु को सगुण में आने के लिए खुराक से बना। यहीं से वंश परम्परा चली। केवल खून बीर्य से मिली। वीर्य खून का रिश्ता हुआ।

...तो आत्मा की शरीर से गठान है। क्या गठान दिख सकती है? कैसे आत्मा शरीर बनी, यह देखा जा सकता है क्या? बिलकुल! बताता हूँ। आत्मा आज्ञाचक्र तक अपने रूप में है। वहीं से श्वासा के माध्यम से यह नीचे नाभि तक आ रही है। यानी चेतन श्वासा ले रहा है। यहीं से श्वासा लेने के काम शुरू हुआ और शरीर बना ।वहीं से नीचे तक पहुँचा रहा है । वो चेतन वहाँ बिना शरीर के बैठा है। पर श्वासा लेकर चेतन शरीर बन गया।

जड़ चेतन है ग्रंथि पड़ गई। यद्यपि मिथ्या छूटत कठिनई।

निकलेगी भी इसी तरह से। जिस तरह से फँसी, उसी तरह से निकलेगी। तभी तो कहा--

इड़ा पिंगला सुषुम्ना करे, अर्द्ध  औ उर्द्ध विच ध्यान लावे ।
कहैं कबीर सो संत निर्भय हुआ, जन्म औ मरण का भ्रम भानै।।

आत्मा मन कैसे बनी? मन भी सुषुम्ना में बनी। मन के संदेश सुषुम्ना से आए। यहीं से आत्मा ने अनुकरण शुरू किया। यहीं से मन भी बनी। अब यह गठान इतनी तगड़ी हो गयी है कि छूट नहीं पा रही है।

तो जानना दो तरह से हुआ। हम आत्मा का भी थोड़ा जानने का प्रयास करें। आत्मदेव क्या कर रहा है? यह कोई चीज है। देखते हैं कि आत्मा के गुण क्या हैं? आत्मा का स्वरूप क्या है? किसी की भी पहचान होती है कि उसका स्वरूप क्या है?

पहले देखते हैं कि आखिर आत्मा सतलोक जाती है या नहीं? शास्त्रों का प्रमाण दूँगा। आत्मा सतलोक कैसे जाती है, इस पर धर्मदास जी ने सवाल किया।

करनी योग कि रहनी वासा। कैसे पाऊँ लोक निवासा।।

साहिब से पूछा कि कुछ करके जाना है या आप पार करेंगे?

हमारा पंथ क्रियायोग पर भरोसा नहीं कर रहा है; कर्मयोग पर भी नहीं। उस परमे-तत्व की प्राप्ति मन, बुद्धि आदि से भी नहीं हो सकती है। इनके द्वारा प्राप्ति नहीं कर सकते हैं। आत्मा सतलोक कैसे जाती है, इसे स्थापित करता हूँ। पहली बात कि मैं जिन लोकों की बात करता हूँ, ज्ञान है, फर्जी नहीं है। 21 लोकों में कर्मभूमि कहीं भी नहीं है, कर्म-लोक कहीं भी नहीं है। सभी भोग लोक हैं। कर्म केवल पृथ्वी पर होता है। यदि देवता चाहते हैं कि हम भी इंसान बनें तो कारण है। स्वर्गादि लोकों में कर्म नहीं है। वहाँ पर किये हुए कर्मों का फल भोगने जाता है। यहीं से कर्म हो रहे हैं। देव-लोक में भी कर्म नहीं है। यहीं से उसकी प्राप्ति होती है। इस चोले को नारायण चोला बोला गया तो कुछ कारण है। शास्त्रों में भी कहा गया कि बहुत कुछ भरा पड़ा है इसमें। इसमें कई सिस्टम हैं। जानने की बातें हैं।

या घट भीतर सात समुद्र, या ही में नदिया नारा।
या घट भीतर सूरज चंदा, या में नौ लख तारा।
या घट भीतर तीन लोक है, या ही में सिरजनहारा।...

ये सब बातें कहीं गलत नहीं हैं। इसका मतलब है कि खजाना भरा पड़ा है। नारायणी चोला ऐसे ही नहीं कहा। बड़ी खूबियाँ हैं इसमें। आपको भी शंका होगी कि सतलोक कैसे जायेंगे। पर आपने भरोसा किया है कि जायेंगे। यह बड़ी बात है। आप कहते हैं कि आपकी कृपा से जाना है। कुछ सिस्टम है क्या? हमने दो सिस्टम बताए सतलोक जाने के। यहाँ पर साहिब कह रहे हैं-

या तो कुछ करनी करे, या गुरु पार उतारनहार।

या तो लगा रहे भजन में। या तो गुरु पर पूरा भरोसा करके होगा। यदि दोनों में एक भी नहीं है तो खाली है, कुछ नहीं है पास। बंदा सतलोक जायेगा।

बरसात में पतंगे कहाँ से आ जाते हैं? पहले क्यों नहीं आते हैं? बरसात में ही क्यों निकलते हैं, बाकी मौसम में क्यों नहीं आ रहे हैं? कुछ कहते हैं कि उनके घर में पानी गया। नहीं, वो ऐसी जगह घर बनाते हैं कि पानी जायेगा ही नहीं। तिरछा बनाकर रखा होता है। बया बड़े मजबूत आले बनाती है। कितना इल्म है कि छः महीने पहले फाल्गुन में नया घोंसला बनाती है।... तो पतंगे क्यों निकल आते हैं? एक बरसात गिरने के साथ पूरों को पंख आ जाते हैं। ये सब चींटियाँ हैं। 1000 किस्म की चींटियाँ हैं। अलग-अलग किस्म के चींटे हैं। जैसे किन्नू, संतरा, मौसमी मिलते-जुलते हैं। इनकी तासीर मिलती है। तो बड़ी कैटेगरी है। इस तरह चींटियों की भी बड़ी कैटेगरी है। एक बरसात गिरने के साथ ही बाहर आ जाते हैं।

इस तरह मौत के समय एक ताकत आती है, एक शक्ति मिलती है, एक अलग शरीर मिलता है। मुझे कोई शंका नहीं है। मेरे नामी को पक्का भरोसा है कि सतलोक जायेगा। बड़े भरोसे से यह बात बोलता हूँ।

एक बात और बोलता हूँ कि भूत-प्रेतों का इलाज हमारे सिवा कहीं नहीं है। वो बड़े ताकतवर हैं। भूत यमराज के छोटे भाई हैं। पर यहाँ से नाम लेकर वो भाग जाते हैं। फिर टिकते नहीं हैं। आपका भरोसा उधार का नहीं है; इसके पीछे वज़न है। पूरे सृजन का एक सिस्टम है। मौत के समय एक शरीर मिलता है, जो हजारों मील सफर करता है। सभी ने जिंदगी में कभी-न-कभी रूहानी सफर किये हैं। कभी ऐसा सपना भी देखा है कि सच लगा था। पर आपने उसे सपना मान लिया था। सभी कभी-न-कभी उड़े हैं। यह उड़ना सपना नहीं है, पर रूहानी सफर है। आपके शरीर के अन्दर छः शरीर हैं। पूरे काम करते हैं। मौके-मौके पर कर लेते हैं।

तब उस समय एक शरीर मिलता है। उसे अन्तवाहक शरीर कहते हैं। उससे सेकंड में अरबों मील चल सकते हैं। जहाँ इच्छा होगी, वहीं चल लेता है। जहाँ चाह है, वहीं चले जाओगे। इसी सिद्धांत से तो मैंने आपको भक्ति में लगाया हूँ। कोई विश्वासघात नहीं किया है, मुक्ति का रास्ता ठीक-ठीक दिया है। पहली बात है कि भरोसा करना। उस समय आपका जहाँ ध्यान होगा, वहीं चले जाओगे। जैसे मैं सब आश्रमों में जाता हूँ, उसका एक जरिया है। ट्रेन में बैठकर दिल्ली जाता हूँ और फिर कभी जहाज में बैठकर आगे का सफर करता हूँ। फिर नाम-दान देकर फ्लाइट पकड़ता हूँ और किसी दूसरी जगह पहुँच जाता हूँ। यह पूरी सेटिंग है। तो मैं जा रहा हूँ तो एक जरिया है?

सुरति जात न लागे बारा।

हर लोक में जाने का सूत्र है। भाई, लोग जानते हैं कि पाप-कर्म करने से नरक में जाते हैं और पुण्य करने से स्वर्ग लोक में जाते हैं। जिंदगी-भर इंसान पुण्य करता है और स्वर्ग में जाने का रास्ता बनाता है। आप भी सतलोक जाने का रास्ता बना रहे हैं। आप मॉस नहीं खा रहे हैं, दारू नहीं पी रहे हैं, नियमों का पालन कर रहे हैं, शुभ कर्म कर रहे हैं, एक ही भक्ति पकड़े हैं। यह है रास्ता बनाना। क्यों नहीं पी रहे हैं दारू? भय है। ताकि भक्ति कुंठित न हो जाए। आपको नफरत तो है ही। शास्त्रों को भी देखें तो कह रहे हैं-

अंतमत: सागत: ।।

जहाँ इच्छा होगी, वहीं जाओगे। जहाँ इच्छा होगी, वहीं जाओगे।

जाकी अस लाग रहे जहँवा, कहैं कबीर पहुँचाऊँ तहँवा ।।

अगर सतलोक जाना है तो आपको परमार्थी जीवन जीना होगा।

अगर दिन भर टी.वी. देख रहे हैं और कह रहे हैं कि सतलोक जाना है। तो शंका समझना। फिर आपका ध्यान अटकेगा। कहीं न अटके। सब फजूल है। दुनिया में मजा नहीं ढूँढना है।

सुरति रहे अलगान।।

किसी भी चीज का आपको आकर्षण न लगे। उदासीन रहनु, मजा न ढूँढना। किसी से प्रेम न करना। दुनिया में जहाँ प्रेम होगा, वही जाओगे।

उदासीन जग रहो गुसाई।।

पर सुरति रखना। रोटी खानी है, काम करने हैं। पर अन्दर की रुचि उनमें न हो। वो साहिब में हो। दुनिया में रुचि न रखना। देखो, साहिब एक बात कह रहे हैं-

कामी का गुरु कामिनी, लोभी का गुरु दाम।
कबीर का गुरु संत है, संतों का गुरु नाम॥

जिसका जिसमें ध्यान है, वही उसका गुरु है। वहीं जाओगे।

रात-दिन हाय माया, हाय माया लगी हुई है। एक था सेठ। बड़ा लालची। बड़े पाप किये। माया पाप ही करवाती है। पर एक दिन तो सबको यहाँ से जाना है। उसका शरीर भी छूटा। वहाँ पहुँचे तो यमराज ने चित्रगुप्त से कहा कि इसका खाता निकालो। जब बही निकाली तो बड़े पाप थे। हजारों साल नरक में रहना था। पर उसने एक साधु को भोजन खिलाया था, जिसके लिए उसे 100 साल स्वर्ग में जाना था। सेठ से पूछा गया कि पहले कहाँ जाना चाहते हो? सेठ ने कहा कि जहाँ चार पैसे का फायदा हो, पहले वहीं भेज दो। यह है लालच। आप किसी में मोह न रखना। झूठी दुनिया है। सावधान रहो। यह भी नहीं कह रहा हूँ कि जंगल में जाकर रहो। फर्ज पूरे करो, घर में रहकर भक्ति करो।

सहजो जग में यूँ रहो, ज्यों जिभ्या मुख माहिं।।

जहाँ प्रेम है, वहीं जाओगे और वो एक जगह होगी। इसलिए दिल में गुरु के प्रति ही प्रेम रखना। दिल के उस कोने में एक ही चीज रहेगी।

कबीर मन तो एक है, भावे जहाँ लगाये।
भावे गुरु की भक्ति कर, भावे विषय कमाय।।

प्रेम एक ही होता है। कहीं भी लगा तो दूसरी जगह नहीं लग पायेगा। हम भी कह रहे हैं कि साहिब के अलावा कहीं न लगाना।

एक म्यान में दो खड़ग, देखा सुना न कान।

साहिब को पकड़े रहो, क्योंकि प्रेम एक है, एक ही जगह टिकेगा। मैं फिल्म नहीं देखता हूँ। छोटे थे तो कहीं गाँव में मूक फिल्में आती थीं पूरे गाँव को दिखाते थे। तब सिनेमा हॉल नहीं थे। पर अब सिनेमा हॉल भी फेल हो रहे हैं, क्योंकि सीधी फिल्में टी.वी. पर आ रही हैं। सिनेमा हॉल कम होते जा रहे हैं। तो एक बार किसी सिनेमा हॉल के बाहर पोस्टर लगा था, वहाँ लिखा था- पति, पत्नी और वो। ये फिल्म वाले भी निराले हैं। उन्हें आदमी का मनोरंजन करके धन लेना है।

तो साहिब, आप और वो नहीं चाहिए। फिर गड़बड़ है।

साहिब ने कहा-

मैं चितवत हूँ तोहि को, तू चितवत है ओहि।
कहैं कबीर कै से बने, तोहि मोहि बिच ओहि।।

तो मैंने कहा कि यह तो साहिब का दोहा है। चितवत है--देखना। यानी तू उधर देख रहा है। इसलिए-

खेलना हो तो खेलिए, पक्का होके खेल।।

गुरु में ही ध्यान रखना।

मैं मैली पिय अति उजला, कै से मिलना होय।।

संतों ने सांसारिक भाव में भी समझाने की कोशिश की। इसलिए दुनिया में रहते हुए भी वो सुरति साहिब में लगी रहें तो पहुँच जायेगा। ऐसा शरीर प्राप्त होता है जो अरबों मील सेकंड में चलता है। वहीं जाओगे, जहाँ चिंतन है।

हिंदू धर्म बोल रहा है कि बालब्रह्मचारी रहे। पर यदि बालब्रह्मचारी नहीं रह सकते हैं तो शादी कर लो। प्राथमिकता इस बात की है कि शादी न करो। अगर नहीं हो सकता है तो शादी कर लो, देख लो कि क्या है गृहस्थ आश्रम। 25-50 साल तक रहकर देख लो कि क्या है सांसारिक जीवन। फिर 50 साल के बाद वानप्रस्थ हो, जाओ। यह हमारा सनातन धर्म बोल रहा है। यानी अब विषय न करो। स्त्रीसंग नहीं करना है। क्योंकि स्त्रीपन खत्म हो गया। 50 के बाद खून भी कम बनेगा। 40 किलो अनाज खाने से 1 किलो खून बनता है। 40 किलो अनाज 3 महीने में आदमी खाता है। 1 किलो खून से ढाई तोला वीर्य बनता है। दूध वाला हिसाब है। एक बार संभोग में ढाई तोले वीर्य नष्ट होता है। 50 साल के बाद खून ही इतना बनेगा कि शरीर चल सके। इसलिए मना किया। साल तक वानप्रस्थ रहो। फिर एक रात पति-पत्नी उठना; एक दूसरे को अलविदा कहकर विपरीत दिशा में 100 कि. मी. दूर अज्ञात में चले जाना। अब रोटी कहाँ से खायेंगे? समाज को कहा कि ऐसे सन्यासी को भोजन खिलाना। अब प्रभु में लीन रहना। उठते-बैठते प्रभु का ही चिंतन करना। आज वो समय नहीं रह गया है। इसलिए घर में रहकर भक्ति करो। मोह-ममता न रखो। जिस घर में आप रह रहे हैं, एक रात भी रखने को डरेंगे। एक लड़का अपनी माँ को लाया, कहा कि डॉक्टर ने सुई लगाई, तबसे शरीर काम नहीं कर रहा है। मैंने कहा कि सेवा करो। वो कुछ दिन बाद फ़ोन किया, कहा कि या तो माँ की ठीक करो या मुक्ति देना क्या है? यानी वो सीधा कह रहा है कि मार डालो, सेवा नहीं कर सकता हूँ। वो 10-12 दिन में ऊब गया। माँ ने तो इतना पालन-पोषण कर बड़ा किया था।

तो जहाँ इच्छा होगी, वहीं जाओगे। इसलिए कहा-

चाह  मिटी चिंता मिटी, मनवा बेपराह।
वो ही शाहनशाह है, जिसको नाहिं चाह।।

वो पार है। हमेशा तैयार रहें। जहाँ ध्यान है, वहीं जाओगे। इस निर्मल आत्मा ने मन जाने कितने चोले धारण किये, छोड़ दिये। कभी देखता हूँ कि बूढ़ी स्त्रियाँ हैं, क्रीम, पाउडर लगाए हुए है। फजूल में हैं।

हाड़ जरे जस लाकड़ी, केश जरे जस घासा...

तभी तो साहिब कह रहे हैं-

संतो यह जग बौराया।।

साहिब वाणी में समझाकर कह रहे हैं--

काल खड़ग सिर ऊपरे, काल गहे है केश।
न जाने कब मारसी, क्या घर क्या परदेस।

इसलिए जिंदगी का भरोसा नहीं करना। अकाल मौतें हो रही हैं।

एक गुरुमुख बंदा था। वो दो महीने मेरे पास नहीं आया। मैंने कहा कि क्या बात थी? कहा कि इन दो महीनों में 55 बार श्मशान में गया हूँ। कहा कि मुर्दे ही फूँकता रहा। वो बोला कि उनमें 4-5 बूढ़े थे, बाकी सब नौजवान थे। 10 प्रतिशत बूढ़े और 90 प्रतिशत जवान मर रहे हैं। अकाल मृत्यु हो रही है। यह अच्छी बात नहीं है। इसलिए भक्ति में रमना। मन के कहने पर न चलना। सुरति जोड़े रखना। यह जीवन बेशकीमती है। जितना इसे दुनिया में घुमाओगे, आत्मा कुंद होती जायेगी।

कबीर मन तो एक है, भावे जहाँ लगाय।
भावे गुरु की भक्ति कर, भावे विषय क माय॥

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मौत के बाद

इसान जीवन में बड़े मित्र बनाता है, बड़े अपने बनाता है। हरेक यह चाहता है कि ऐसा मित्र हो जो अंत तक साथ निभाए। जीवन-साथी में भी तो यही चाहता है कि बीच में धोखा न दे, अंत तक निर्भाए। मित्रों से भी यही चाहना होती है। एक सहारा ही तो चाहता है न। पर इंसान यह नहीं सोचता है कि जब इस संसार से चलना होगा तो आगे के लिए भी कोई सहारा बना लिया जाए, जो आगे भी हमारे साथ चल सके। क्योंकि यह तो हर कोई समझता ही है कि ये संसार के मित्र इस संसार तक ही साथ निभा सकते हैं।

आप विचार करें कि अब तो 100 साल भी नहीं कहा जा सकता है। यूँ कह लें कि 50 साल तक के जीवन के कई साथ ढूँढ़े जाते हैं, पर आगे के लम्बे सफ़र के बारे में कोई कुछ नहीं सोचता है। वहाँ का कोई साथी नहीं बनाता है। कोई भी सदगुरु रूपी उस आगे के सफ़र के साथी की तरफ ध्यान नहीं देता है।

जब भी मृत्यु होती है तो पहले कपाट में प्राणों को इकट्टा किया जाता है। दो-ढाई घण्टे इसमें लगते हैं। फिर वहाँ से यमराज के पास ले जाया जाता है। वहाँ उसका लिखा देखा जाता है। उसे भी दिखाया जाता है। उसकी एक रील बनी होती है। जीवन में कितना कुछ याद रहता है। यानी दिमाग़ में एक चित्त की रील है, जिसमें सब कैद होता है। यही चित्त की रील वहाँ दिखाई जाती है। यदि किसी को मारा तो सचित्र क्लिप वगैरह में धीमी चाल में दिखाया जाता है; बताया जाता है कि देख ले, यह सब किया है। वहाँ कोई खाते वाली किताब लेकर नहीं बैठा है। यमराज। चित्त की रील में सब कुछ फिट है। कहाँ पाप किया, कहाँ पुण्य किया, सब उसमें है। इस तरह कर्मानुकूल शरीर की प्राप्ति होती है। यदि पाप किये तो फिर नरक में कुछ देर के लिए भेजकर चौरासी में फेंका जाता है। इसलिए महापुरुषों ने जगाया कि गर्भ में किये हुए कौल को याद कर और पाप कर्मों से दूर होकर सद्गुरु की शरण ग्रहण कर।

और इस घोर कलियुग में जहाँ बहुत कम संत इसे जानते हैं। सक्षम सद्गुरु का दिया नाम दान हमारे शरीर में सदा विद्यमान सोई हुई चेतन आत्मा को जगा देता है। इस नाम दान के पश्चात् एक दिव्य शक्ति सदगुरु शिष्य के साथ कर देते हैं। ध्यान अर्थात् नाम भजन करते-करते, करते-करते बहुत जल्दी मनुष्य जीते जी मरने" का साक्षात अनुभव कर लेता है। कभी-कभी विशेष कृपा का सदगुरु शिष्य को अल्पावधि में ही यह प्रयोग करना सिखा देते हैं। जीवन और मृत्यु के पार जाता है। सभी डॉक्टर कहेंगे कि मर चुका है। परन्तु शिष्य मर कर देख रहा है। जान करके मृत्यु में उतर रहा है। अन्तर केवल इतना है कि उसे अपने शरीर में पुनः लौटने की स्वतंत्रता है। यह किस प्रकार घटता है। परलोक यात्रा क्या जीते जी संभव है? इस सत्य को जाना जा सकता है। इसमें कोई शक नहीं है। जो मृत्यु से गुजर जाए वह मृत्यु के रहस्य को जान जाता है। उसके लिए मृत्यु एक घटना मात्र है। असंभव ब्रह्म के रहस्य को जानने का मनुष्य जीवन एकमात्र मौका है। यह अवसर चूका तो चूका! और शुरू हो गया चौरासी लाख योनियों का अनंत चक्र! मनुष्य को अपने जीवन में मृत्यु के बाद आने वाली घटनाओं को जानना चाहिए। उसे इसके लिए सूद्गुरु की शरण में बिना एक पल भी गंवाए जाना चाहिए। इसमें अगर देर की तो हो सकता है आज कल करते-करते यह अवसर चूक जाए। न जाने कब जिन्दगी की शाम हो जाए।

पर यह नाम दुनिया में प्रचलित सहस्त्रों नामों से परे है। यह एक सजीव वस्तु है। यह नाम देना कोई शब्द बताना नहीं है, आत्मा को चेतन करना है। गुरु सच्चा नाम देकर एक पल में आत्मा को चेतन कर देता है। वो अपनी मुरति में परमात्म-तत्व लाकर शिष्य के भीतर छोड़ता है। यही नाम कहलाता है। इस नाम के बिना कोई भी जीव संसार-सागर से पार नहीं हो सकता। इसी के विषय में मैं बार-बार सतके करता हूँ कि जो वस्तु मेरे पास है, वो ब्रह्माण्ड में किसी के पास नहीं है।

वासुदेव कृष्ण ने कहा- है अर्जुन! छह तरह के खोटे कर्म करने वाले लोग प्रेत-योनि को प्राप्त होते हैं।

  1. जो गोत्र-वध करते हैं यानी अपने भाई, चाचा, शरीक आदि का वध करते हैं।
  2. जो गौ-हत्या करते हैं। गौ तो परमार्थी जीव है। इसे माता भी कहा गया, क्योंकि 'जिसका पीजिए दूध, उसको कहिए माई'। इसलिए गौ-हत्या बहुत बड़ा पाप है।
  3. जो आदमी ताकत से किसी की ज़मीन छीन लेता है।
  4. जो किसी महापुरुष की हत्या करता है। यह बहुत बड़ा पाप है, क्योंकि उस महापुरुष न जाने कितनों का कल्याण करना था।
  5. जो किसी की स्त्री को जबरन ताकत से अगवा करता है; उसके साथ कुकर्म करता है। यह घोर पाप है।
  6. जो किसी को ज़हर खिलाकर मारता है।

जो कोई भक्त नहीं है, जिनके पास कोई आन्तरिक शक्ति नहीं है, जिनकी चेतना अच्छी नहीं है, उन्हें ही शिकार बनाती हैं, प्रेतात्माएँ। इसलिए जो सदगुरु की शरण में है, जिनके पास सदगुरु का सच्चा नाम है, उनकी सुरति चेतन है, उन्हें वो कुछ नहीं कर सकती हैं। मैंने आपके जिस्म को कुछ नहीं दिया; मन को भी कुछ नहीं दिया। मैंने आपकी आत्मा को कुछ दिया। इसी से आपकी रूह चेतन हो गयी। अब भूत-प्रेत आपके सामने टिक नहीं पा रहे हैं। आप लोगों से आप बहुत ऊँचे उठ गये हैं। अन्य पंथों के लोग गुरु से नाम लेने पर भी वहम में हैं, ग्रहों को भी मना रहे हैं, हत्या के रोग से भी पीड़ित हैं; पर आप सब वहमों से दूर हो गये हैं, क्योंकि आप महसूस कर रहे हैं कि कोई बहुत बड़ी ताकत आपको सुरक्षा कर रही है। यही है सच्चा नाम। इसलिए तो मैं बार-बार कहता हूँ कि जो वस्तु मेरे पास है, वो ब्रह्माण्ड में किसी के पास नहीं है।

दुनिया हत्या के रोग से छूटने के लिए सयानों के पास जाती है। पर नहीं! कुछ नहीं कर पाता है, सयाना। हत्या एक बार आकर फिर इतनी आसानी से (सयानों के कहने से) नहीं जाती है। पर दुनिया लगी रहती है; लोग समझ नहीं पाते हैं कि ये लोग छल-कपट से अपना धन चला रहे हैं।

यह स्मरण रखना है कि चित्त जितना कम स्पंदित और आंदोलित हो, उतना ही अच्छा है। ऐसे कर्म, ऐसे विचार या ऐसी वाणी के प्रति सचेत होना होता है, जो चित्त की झील पर लहरें पैदा करें और जिससे विभोक्ष उत्पन्न होता हो।

इस सारे प्रयोजन में सद्गुरु की शक्ति शिष्य के साथ रहती है। वास्तविकता तो यह है कि सेदगुरु केवल बांह ही नहीं पकड़ता, वह चेतना का शक्ति पुंज है। भजन और सुरति जब संध जाती है तो चित्त एक ऐसी क्रांति से गुजरता है जिसकी साधारणत: हमें कोई कल्पना भी नहीं हो सकती थी। उस परिवर्तन से बड़ा कोई परिवर्तन मनुष्य-जीवन में नहीं है। वह क्रांति अमूल्य है और उसके द्वारा सारा ही जीवन रूपांतरित हो जाता है। अंधे को अनायास आँख मिल जाने के प्रतीक से ही उसे समझाया जा सकता है।

इस क्रांति के द्वारा व्यक्ति स्वयं में प्रतिष्ठित होता है और अनिर्वचनीय आलोक का अनुभव करता है। इस आलोक में वह अपने सच्चिदानंद स्वरूप को जानता है। वह सद्गुरुमय ही हो जाता है। काल के बंधन कट जाते हैं और आमरतत्व के दर्शन होते हैं। मुन- माया विलीन हो जाते हैं और सत्य से मिलन होता है। वह सद्गुरुमय ही हो जाता है। आत्मा अपने निजधाम अमर लोक में लौट जाती है। फिर वह सभी बंधनों से स्वृतेत्र है। उसके सभी दुःखों का अंत हो जाता है। परमानन्द का जीवन पुन: प्रारंभ होता है। उसकी शुरुआत इस अनुभूति के बाद ही होती है। उसके पूर्व हम काल के बंधन में मुक्ती के ही समान हैं। जीवन-सत्य को जो नहीं जानता है, उसे जीवित कहना बहुत अधूरे अर्थों में ही सत्य होता है।

इसलिए सद्गुरु मधुपरमहंस जी जैसे सतपुरुषों को कभी भी समझा नहीं जाता; हमेशा इन्हें गलत ही समझा जाता है। जिनको आप समझ लेते हैं- समझ लेना, वो कैरोसीन की कंदील हैं। अपने घर में जलाई-बुझाई, अपने हाथ से बत्ती नीची-ऊँची की। जब जैसी चाही, वैसी की। जिनको आप समझ पाते हैं, समझ लेना कि घर के मिट्टी के दीए हैं। जिनको आप कभी नहीं समझ पाते, आँखों चौंधिया जाती हैं, हज़ार सवाल उठ जाते हैं, मुश्कিল पड़ जाती है तो समझना कि सूरज उतरा है।

इसलिए कबीर साहिब जी को हम अभी तक नहीं समझ पाए, न दादू दयाल जी को, न गुरु नानक देव जी को, न मधु परमहंस जी को। इनमें से हम किसी को नहीं समझ पाते। इस तरह के व्यक्ति जब भी पृथ्वी पर आते हैं, हमारी आँखें चौंधिया जाती हैं, जब वह हट जाते हैं- जब आँख के सामने नहीं रहते तब हम अपने-अपने मिट्टी के दीए जलाकर समझने की कोशिश करते हैं।

समय आने पर आप देखेंगे कि सतगुरु मधु परमहंस जी संतमत अथवा भक्त को खुला (open) कर डालेंगे। संसार में सदुगुरु भक्ति का ही बोलबाला होगा तथा बाकी सब भक्तियाँ फीकी पड़ जाएँगी। आपके सुरति योग पर शास्त्र लिखे जाएँगे। आपको सारा संसार पूजेगा। सतगुरु मधु परमहंस जी को संतों के सम्राट, अमरधाम सम्राट, परम पुरुष युगपुरुष अथवा कलयुग का मुक्तिदाता आदि माना जाएगा।

धनी धरमदास खोजते थे। तीर्थ जाते साधु-संग करते। खूब सांत्वना बटोरते थे। फिर मथुरा में सौभाग्य से कबीर साहिब से मिलना हो गया। कबीर साहिब ने तो झंझावात की तरह सब झकझोर दिया। मूर्ति पूजा मूढ़ता मालूम होने लगी। कर्मकांड अज्ञान मालूम होने लगा। पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन, अंध विश्वास लगने लगे। चोट ऐसी पड़ी कि धरमदास तिलमिला गए। मथुरा छोड़कर भाग गए। अपने घर बाँधवगढ़ वापस चले गए। आदमी, कबीर साहिब जैसा होना चाहिए। जिसे कभी भूल न पाएं। घर में पूजा-पाठ करते, शास्त्र सुनते लेकिन सभी व्यर्थ लगता।

सदुगुरु ने ऐसी चोट मारी कि नींद लेना मुश्किल हो गया। उदास रहने लगे, चिंता से भरे रहने लगे और फिर यह भी चिंता पकड़ी कि एक ज्ञानी के पास से भाग आया। कमजोर हूँ, कायर हूँ। फिर उनकी तलाश में जाना ही पड़ा काशी में जाकर उन से मिले।

आगम का अर्थ होता है, जहाँ बुद्धि की गति न हो। जहाँ तक बुद्धि की गति है वहाँ तक तो गुरु की ज़रूरत भी नहीं है, वहाँ तक तो तुम्हारी बुद्धि ही गुरु है। दसवां द्वार तो योग द्वारा भी खुल सकता है, जहाँ बुद्धि हारती, थकती, ठहर जाती, ठिठक जाती है, जहाँ से आगे चलने से बुद्धि इन्कार कर देती वहीं से गुरु की ज़रूरत है। इसलिए बुद्धिमान आदमी अक्सर गुरु से वंचित रह जाते हैं। उन्हें यह भ्रांति होती है कि उनकी बुद्धि सदा उनके काम आती रहेगी। उन्हें यह भ्रांति होती है कि जहाँ तक बुद्धि ले जाती है बस वहीं तक यात्रा है। उसके आगे कुछ है ही नहीं। जो आदमी कहता है, ईश्वर नहीं है। वह क्या कह रहा है? वह यह कह रहा है कि मेरी बुद्धि के बाहर है। और जो मेरी बुद्धि के बाहर है वह हो कैसे सकता है? मेरी बुद्धि के भीतर जो है, वही है। मेरी बुद्धि कसौटी है अस्तित्व की।

जैसे साहिब की भक्ति की तरफ मुड़ोगे, निरंजन का जोर बढ़ता जाएगा। वो जानता है। निरंजन को यह तकलीफ नहीं है कि आपको नाम मिला। वो जानता है कि आपको नाम मिला, पार हैं। पर वो आपको एक सीमा में रखना चाहता है। वो चाहता है कि आप इतना आगे न बढ़ सकें, इतनी शक्तियाँ न पा सकें कि दूसरों को भी इस भक्त में जोड़ सकें। किसी-न-किसी तरह निरंजन आपके काम खराब करेगा।

नामदान के समय ही सद्गुरु एक जीवन्त शक्ति शिष्य के साथ कर देते हैं। मनुष्य के भीतर स्थित दिव्य शक्तियों के जागरण की प्रक्रिया का यह एक महत्वपूर्ण भाग है। केवल सक्षम सद्गुरु ही ऐसा कर सकते हैं। यह शक्ति हर समय मार्गदर्शन और सहायता करती है। 'नाम' की अद्भुत शक्ति आत्म-साक्षात्कार की कुंजी है। भटकी और बंधनयुक्त आत्मा की परमपिता से पुनर्मिलन का मार्गदर्शन है 'नाम'।

साहिबर की वाणी से स्पष्ट समझ आ रहा है कि सार-शब्द (नाम) देह के अन्दर का विषय नहीं है। सच्चा नाम तो शीश से ऊपर अधर जपने का गुप्त शब्द है। पूरे सच्चे गुरु के बिना उसका दर्शन संभव नहीं है। वो 'नाम' तो परमपुरुष के असंख्य सूर्य प्रकाश के समान है। उस गुप्त 'नाम' को जाने बिना काल वश में नहीं आता है। कालपुरुष अन्य किसी से डरता ही नहीं है। कबीर साहिब ने परमपुरुष से वो 'नाम' जगत में लाकर स्वयं ही मूल-मंत्र के रूप में दिया है। स्वयं उनके मुख से वर्णन करके बताया है कि सत्यनाम की बिना आवाज की धुन जिस अधर में होती है उसे कोई विरला ही जान पाता है। सद्गुरु के सिवा सत्यनाम किसी को दिखने वाला नहीं है क्योंकि वो लिखने में नहीं आता और कहने-सुनने से परे है। न तो वो लिखा हुआ है न ही लिखने में आता है। जिसके पास वो 'नाम' होता है उसे काल खुद ही माथा नवाता है। वो अमर चंदन-वन है। उसे ग्रहण करते ही विष पीना भी अमृत हो जाता है। उस अमर 'नाम' का स्वाद मिल जाने के बाद रोग और मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। सत्यनाम के पास संत यमराज से शंका रहित होकर निडर रहता है। सोहं शब्द में ही' निःअक्षर का वास है उससे भी पृथक होकर सद्गुरु का शिष्य 'सत्य' को देखता है। जिसकी सुरत 'नाम' में लग जाती है वह संत ही भाग्यवान है। रात-दिन सत्यनाम में समाई सुरत से ही अभय होकर मुक्ति का अमर पट मिलता है। जो सत्यनाम का अमर रस पीता है उसी का मत अमर और ऊँचा है। क्षर-अक्षर से भिन्न नि:अक्षर को समझने वाला ही सच्चा भजन करने वाला कहलाता है। इसलिए कुटिल चतुराई छोड़कर सब कोई सत्यनाम ही चित में रखें। सत्य मूल 'नाम' कोई नहीं पाता है; वृक्ष की शाख और पत्तियों को ही सबने पकड़ रखा है। हे धर्मदास! आदि मूल नाम की ही आस करो मैंने यह रहस्य तुम्हें बताया है। सद्गुरु ही काल की फाँस-बंधनों को काटने में समर्थ है क्योंकि मूल गुप्त नाम अमूल्य है।

कह रहे हैं जो जानते नहीं हैं अज्ञान से भरे हैं वे कैसे जानेंगे। जिज्ञासु ही जानकर विचारते हैं। सृष्टि रचना के बाद से कितने राम जी जैसे तपस्वी हो गए उन्होंने इस जगत को भ्रम में ही डाला है कितने मुरलीधर कान्हा हो चुके, वो भी अंत नहीं पा सके। मत्स्य और कच्छप रूप ब्रह्मा भी अनेकों हो गए, वामन अवतार भी होकर अनेक नाम रखे। कितने ही निष्कलंक बोध प्रवर हुए पर सृष्टि के परे का 'नाम' नहीं पाया। वनवासी होकर एकांत में बसने वाले कितने ही सिद्ध-साधक और सन्यासी भी पार नहीं पा सके। अनेकों मुनिजन और गोरखनाथ जैसे योगेश्वर हो चुके हैं वे भी सत्य को नहीं पा सके। सब पंचतत्व सृष्टि ही जान सके हैं। सृष्टि से परे अमर नाम की गति को ब्रह्मा-शिव, सनक-सनंदुन भी नहीं पा सके और हरि कर तीन लोकों में ही रम गए। ऐसे सत्य 'नाम' की अपार गति को भला मनुष्य बिना सद्गुरु के कैसे जान सकता है। वो अमर 'नाम' तो इस सृष्टि से बाहर का गुप्त मूल 'नाम' है जो परमपुरुष में समाया सद्गुरु से ही मिलता है।

भक्ति भेद और सारतत्व का वर्णन करते हुए साहिब की वाणी है कि सुमिरन ही भक्ति की शक्ति है। सार-शब्द का ध्यान सुमिरन करने से सहज ही अमरलोक का मार्ग प्रशस्त होता है। सुमिरन की शक्ति से ही सब कर्म कट जाते हैं। सद्गुरु नाम की प्राप्ति और सुमिरन से जन्म-जन्म के सांसारिक कर्म कट जाते हैं। सहज ही दिव्य ज्ञान का प्रकाश-भक्त में समा जाता है। नाम सुमिरन ऐसा सार-तत्व है जिससे काल-कराल का व्यथा और ताप से मुक्ति हो जाती है।

सार शब्द का सुमिरन करिहै। सहज अमरलोक निस्तरिहै।

मैंने आपके जिस्म को कुछ नहीं दिया; मन को भी कुछ नहीं दिया। मैंने आपकी आत्मा को कुछ दिया। इसी से आपकी रूह चेतन हो गयी। अब भूत-प्रेत आपके सामने टिक नहीं पा रहे हैं। अन्य लोगों से आप बहुत ऊँचे उठ गये हैं। अन्य पंथों के लोग गुरु से नाम लेने पर भी वहम में हैं, ग्रहों को भी मना रहे हैं, हत्या के रोग से भी पीड़ित हैं; पर आप सब वहमों से दूर हो गये हैं, क्योंकि आप महसूस कर रहे हैं कि कोई बहुत बड़ी ताकत आपकी सुरक्षा कर रही है। यही है सच्चा नाम। इसलिए तो मैं बार-बार कहता हूँ कि जो वस्तु मेरे पास है, वो ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है।

भूत पिशाच सब होय नियारा। अद्भुत नाम सदा रखवारा॥

वो नाम 24 घंटे चेतन है। आपको बचायेगा। जब तक वो आपके अन्दर है, प्रेतात्मा के प्रवेश लेने का तो सवाल ही नहीं उठता। यदि आप नाम-भजन कर रहे हैं तो फिर तो आपके नज़दीक आने से भी डरेंगी प्रेतात्माएँ क्योंकि ऐसी स्थिति में उन्हें करंट पड़ती है और उन्हें भागना पड़ जाता है। प्रेतात्माओं के पास बड़ा ज्ञान है, उन्हें पता चला जाता है कि फलाने आदमी के पास कुछ ताकत हैं। वो तब तंग करने नहीं आ सकती हैं।

नाम के बाद कोई भी ताकत आपका कुछ नहीं बिगाड़ पायेगी; बस केवल नियमों का पालन करना। साहिब पूरा-पूरा मदद करेगा, क्योंकि 'सुमिरन पाय सत्य वो बीरा, संग रहूँ मैं दासे कबीरा।' साहिब कह रहे हैं कि जिसे नाम मिल जाता है, मैं उसके साथ हो जाता हूँ।

पेज 238 यह संसार तो मुरदों का गाँव है। यहाँ कोई भी अमर नहीं है। सब एक दिन मर जाते हैं। यहाँ आने वाले बड़े-बड़े पीर, पैगंबर, योगी आदि में से कोई भी काल से बच नहीं पाता है। राजा भी मर जाते हैं, उनकी प्रजा भी चली जाती है। जीवन देने वाला वैद्य भी मर जाता है और रोग भी मर जाता है। चौदह भुवन के स्वामी भी एक दिन चले जाते हैं। इसलिए किसी से कोई आशा रखना बेकार है। नौ नाथ, चौरासी सिद्ध, अठासी हजार ऋषि-मुनि आदि कोई भी हो, काल ने न किसी को छोड़ा और न छोड़ता है। 33 करोड़ देवता भी काल के जाल में हैं। पर एक सत्य नाम है, जो अनन्त है। वो रहता है। उसके सिवा अन्य कुछ भी नहीं रहता है। इसलिए अन्य जगहों में मत भटको।

कह रहे हैं कि सदगुरु का नाम रक्षा करता है। इस नाम से तन के रोग भी मिट जाते हैं। समस्त पापों का नाम से नाश हो जाता है। काल भी इस नाम को देखकर दूर ही रहता है। बुरी नज़रें, जादू-टोना, मोहन, वशीकरण आदि शक्तियाँ भी इस नाम के आगे नहीं टिक पातीं और उलटा इन्हें चलाने वाले पर चल जाती हैं। सद्गुरु के सच्चे नाम की महिमा कहाँ तक कही जाए, इस नाम से काल का फंदा टूट जाता है और जीव चौरासी के बंधन से आजाद हो जाता है।

सतगुण-विष्णु जी, रजोगुण-ब्रह्मा जी और तमोगुण शिव जी साहिब खोजियों से कह रहे हैं कि जो विचारहीन, विवेकहीन, मूर्ख मनुष्य हैं, वे इस बात को नहीं समझेंगे, इसलिए आप इस बात पर विचार करो। यानी तीन लोक के स्वामी विष्णु जी कहे जाते हैं, पर वो नाम (साहिब) तो इनसे परे है। आगे कह रहे हैं कि रामचंद्र जैसे न जाने कितने तपस्वी हो गए, न जाने कितने कृष्ण भी हो गए, पर कोई भी उस परम का भेद न पा सका। फिर कितने ही मत्स्य अवतार हो गए, कितने ही कच्छप अवतार भी हो गए, कितने ही वामन अवतार भी हो गए, कितने ही बुद्ध और निष्कलंकी भी आए, पर इनमें से कोई भी उस नाम को न जान सका। इस तरह कितने सिद्ध, साधक और सन्यासियों ने जंगलों में उस साहिब की खोज की, कितने ही गोरख जैसे भी आए, पर कोई भी उस नाम को न जाना। कह रहे हैं कि ब्रह्मा जी, शिवजी, सनकादि भी जिस नाम (साहिब) को न जान सके, उस साहिब को मानव मनुष्य अपनी ताकत से कैसे जान सकता है!

जो नाम का प्रेमी साधक होता है, वो बेकार में नहीं बोलता है। वो तो नाम के सुमिरन में ही मस्त रहता है। वो जो बोलता है, वो सत्य ही बोलता है, कभी भी असत्य बात नहीं बोलता है। वो लड़ाई झगड़ों से दूर रहकर गुरु के चरणों में ही ध्यान रखता है। वो नाम में इस तरह समाया रहता है कि पल भर के लिए भी उसे नहीं छोड़ता है। वो बेकार शब्द नहीं बोलता है, उतना ही बोलता है, जितना आवश्यक हो। ऐसा नाम का प्रेमी तीन लोक में तत्ववेत्ता होता है।

साहिब कह रहे हैं कि मैं निःशब्द शब्द का भेद बताकर हंस को कर्म फाँस से मुक्त कर देता हूँ। वो फिर पाप-पुण्य को आशा छोड़कर कर्म धर्म से उदास ही रहता है। वो फिर नाम में ही लौ लगाकर उसी में समाया रहता है। तीर्थ, व्रत आदि कर्मों से वो परे ही रहता है, उसका सारा भ्रम समाप्त ही जाता है। वो फिर सहज योग ही करता है, कर्म योग नहीं करता। धन और यौवन की आशा को त्यागकर कनक और कामिनी के प्रति उदास ही रहता है। वो मन को मारकर दुख-सुख से परे हो जाता है और उसके दिल में वैराग्य उत्पन्न हो जाता है।

सद्गुरु मधु परमहंस जी कहते हैं कि आत्मा का नजदीकी स्वरूप है- ध्यान या सुरति अर्थात् एकाग्रता (Concentration)। जब प्राणी ध्यान में जाता है व एकाग्र होकर अपने अन्तरात्मा की दुनिया में पहुँच जाता है, तो वह इस दुनिया के मायावी रूप को भूलकर अपने आप में अवस्थित हो जाता है, यही आत्मा है। यह अन्तरात्मा की वह अवस्था है, जिसमें जीव परम आनन्द की अनुभूति करता है। आत्मा सभी छोटे-बड़े जीवों (चींटी से लेकर हाथी तक) में मौजूद है। "आत्मवतन सर्वभूतेषु" परन्तु मनुष्य को छोड़कर अन्य जीव उसकी अनुभूति नहीं कर पाते क्योंकि उनमें विवेक-बुद्धि नहीं होती। मनुष्य भी अपनी बाह्य इन्द्रियों- आँख, कान, नाक, मुँह व त्वचा, से इसकी अनुभूति नहीं कर सकता बल्कि इस हेतु उसे अपने अन्दर की दुनिया में अपने अंतर्गत उतरना होगा। सद्गुरु मधु परमहंस जी यह भी कहते हैं कि "यह आत्मा बड़ी निर्मल है, पवित्र है, अजर और अमर है, चैतन्य है, स्त्री अथवा पुरुष नहीं है, हल्की अथवा भारी नहीं है। इसका कोई रंग रूप नहीं है। नित्य है, अजन्मा है अर्थात् जन्म व मरण से परे है। यह निःतत्व है अर्थात् पृथ्वी-जल-अग्नि-वायु और आकाश तथा इनकी 25 प्रकृतियाँ इसमें नहीं है। यह कायातीत है। मन-बुद्धि-चित्त और अहँकार आदि भी नहीं हैं। यह कोई इच्छा नहीं करती क्योंकि यह दो मन का कार्य है, न कोई निर्णय करती है, न ही चित्त की तरह याद करती है और न यह अहँकार की तरह कोई क्रिया ही करती है। यह अविनाशी है और किसी भी देश, काल व अवस्था में इसका विनाश नहीं होता। यह अविकारी है और हर्ष-विषाद, सुख-दुःख, ईर्ष्या-राग-द्वेष, काम-क्रोध-मद-लोभ-मोह आदि से परे है। यह न्यूनाधिक नहीं होती अर्थात् न इसमें कुछ बढ़ाया जा सकता है और न ही इससे कुछ निकाला जा सकता है। इसे

  • शस्त्र काट नहीं सकते
  • अग्नि इसे जला नहीं सकती
  • वायु शोषित नहीं कर सकती
  • आकाश विलोम नहीं कर सकता; और
  • न ही जल इसे गला सकता है।

इसे सर्दी-गर्मी नहीं लगती। यह भूत और भविष्य नहीं है केवल वर्तमान है। यह कुछ खाती-पीती नहीं। न पहनने के लिए वस्त्र और न रहने के लिए कोई मकान अथवा महल आदि इसे चाहिए। यह किसी भी वस्तु के लिए किसी पर आश्रित नहीं है क्योंकि इसे कुछ चाहिए ही नहीं यह पूर्ण है। इसका कोई सगा-सम्बन्धी भी नहीं है। इसकी कोई जाति, वर्ण, धर्म आदि नहीं है। यह छल-कपट-धोखाधड़ी, बेईमानी, चोरी, आदि विकारों से परे है। यह परमपुरुष का अंश है और आनन्द से परिपूर्ण है।" गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी कहा है

ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुखराशी।

अब एक सवाल यहाँ पर उठा कि आत्मा इतनी सहज और सरल होते हुए कैसे अपने को भूल गई? क्यों मन की चालाकियों को नहीं समझ पा रही है? और क्यों मन की हाँ में हाँ मिलाकर सभी कार्य मन के अनुसार करती जा रही है? क्या मन ने इसे बाँध रखा है? वास्तव में देखा जाय तो आत्मा को किसी ने बाँधा नहीं है बल्कि यह स्वयं ही मन के बंधन में बँध गई है। आपा को आपा बाँध्यो। आत्मा अभी भी सहज और सरल तथा अपने सभी गुणों से सम्पन्न है। हाँ इतना अवश्य है कि मन ने आत्मा के ऊपर भ्रम का पर्दा डाल दिया है, संशय का ओढ़ावन ओढ़ा दिया है, जिससे आत्मा का स्वरूप कुछ समय के लिए ढक गया है जैसे ही भ्रम का पर्दा अथवा संशय का ओढ़ावन हटेगा, यह आनन्दमयी आत्मा पुनः प्रकट हो जायेगी, जैसे सूरज के ऊपर बादल आ जायें तो सूर्य की रोशनी कुछ समय के लिए नहीं पता चलती, परन्तु सूर्य तो सदैव प्रकाशमय रहेगा। उसे कौन छिपा सकता है? कौन ढाँक सकता है? कोई नहीं। जैसे ही बादल सूर्य के ऊपर से हटेंगे सूर्य का प्रकाश जग को दिखाई पड़ने लगेगा, जैसे एक कुत्ता काँच के मकान में अपने प्रतिबिम्ब को देखकर कोई दूसरा कुत्ता समझ लेता है और अपने स्वभाववश दूसरा कुत्ता समझकर भौंकने लगता है व लगातार भौंकते-भौंकते मार जाता है.

अब प्रश्न उठता है कि, यदि स्वयं ही भ्रम में फँस गई है तो मन बीच में कहाँ से आ गया? कैसे मन के चंगुल में आ गई? वास्तव में जब परमपुरुष ने आद्यशक्ति के साथ हंस आत्मायें निरंजन के पास भेजी थीं तो आद्यशक्ति से यह कहलवा भेजा था कि दोनों (मन और आद्यशक्ति) मिलकर सत्य सृष्टि करे। परन्तु मन ने आद्यशक्ति को समझा बुझा कर अपने वश में कर लिया और दोनों ने मिलकर इन हंस आत्माओं के सहयोग से सत्यसृष्टि न करके मैथुन सृष्टि कर डाली और इन हंस आत्माओं को 84 लाख योनियों के शरीरों में डाल दिया। तब से ये हंस आत्मायें निरंजन (मन) द्वारा रचे हुए तीन लोकों में 84 लाख योनियों में कर्मानुसार शरीर धारण कर रही हैं। मन ने यहाँ पर इन आत्माओं को आनन्द देने का धोखा देकर 84 लाख योनियों के शरीरों में बाँध दिया है। मन के द्वारा दिये गये इसी भ्रम व प्रलोभन के कारण इन आत्माओं को इन शरीरों से स्नेह हो गया है और इन्हीं शरीरों के सुख के लिए लगातार काम कर रही हैं। जैसा कि ऊपर कहा भी जा चुका है। इस प्रकार ये जीव-आत्मायें मन के बंधन में माया रूपी शरीर की गठान से बँधी हुई हैं और उन्हें अपने धाम (सत्यलोक) को वापस जाने के लिए जरा भी फिक्र नहीं है।

यहाँ तक कि इस शरीर के सभी नौ द्वार (दो आँख, दो कान, दो नाक, एक मुँह, मल द्वार और मूत्र द्वार) रात दिन बराबर खुले रहते हैं। यदि आत्मा चाहती तो शरीर से निकलकर भाग सकती थी परन्तु मन ने शरीर के सम्बन्ध (मेरे भाई, मेरी माँ, मेरा बाप) रूपी नशे को उसे पिला दिया है। इस नशे का वह बहुत आदी हो चुकी है जो उसे शरीर से बाहर निकलकर नहीं मिल पायेगा। जैसे एक ज्योतिषी एक पिंजड़े में बंद तोते को लेकर सड़क पर बैठा अपनी दुकान चला रहा है। लोगों को उनका भविष्य बताता है। जैसे ही कोई ग्राहक आता है तो, वह पिंजड़े से तोते को निकालता है। तोता पास में रखे हुए 25-30 लिफाफों में से एक लिफाफा निकालकर ज्योतिषी को देकर पिंजड़े में अपने आप वापस चला जाता है। यदि तोता चाहता, तो आकाश में उड़ सकता था परन्तु वह आकाश में नहीं उड़ता। उसे ज्योतिषी ने अफीम खिलाकर-खिलाकर नशे का आदी बना दिया है। यह अफीम उसे बाहर आकाश में तो मिलती नहीं है अतः वह आकाश में न उड़ कर पिंजड़े में ही वापस चला जाता है। यही हाल आत्मा का भी है।

अब प्रश्न उठता है कि कैसे आत्मा को मन और माया की जकड़न से छुड़ाया जाय? सद्गुरु मधु परमहंस जी कहते हैं कि जैसे एक रोगी को हमें रोग से मुक्त करने के लिए एक चिकित्सक के पास ले जाना पड़ता है तो चिकित्सक पहले रोगी से रोग के लक्षण जानने का प्रयत्न करता है। फिर लक्षण जानने के बाद दवाओं का पर्चा (Prescription) रोगी तैयार करता है। रोगी को दवायें देता है और रोगी दवाओं को खाकर रोग मुक्त होता है। इसी प्रकार आत्मा को इस बंधन से मुक्त करने के लिए यह जानना आवश्यक है कि आत्मा को किसने बाँधा और किससे बाँधा। उपरोक्त चर्चा में यह स्पष्ट हो गया है कि आत्मा को मन ने माया रूपी रस्सी से बाँधा है। अतः हमें आत्मा को इस गठान को, उसके बंधन को काटने के लिए सद्गुरु रूपी वैद्य के पास जाना होगा। "सद्गुरु वैद्य वचन विश्वासा'

यह नाम तो "विदेह नाम" ध्वनि रहित आवाज (Soundless) sound) है, यह मुकात्मक है, जिह्वा पर नहीं आता है।

सो तो शब्द विदेह। जिह्वा पर आवे नहीं।।

यह नाम" तो सबसे न्यारा है, अमोलक है, सजीव है, सार है, आदि है, नित्य है, जिसे कोई बिरला सद्गुरु ही जानता है। इतना ही नहीं, यह सार नाम स्वयं सत्यपुरुष है। "सार नाम सत्य पुरुष कहाया। इसी सार-नाम से परमपुरुष ने अमरलोक की रचना की और यही सार नाम मानव को भवबंधन से मुक्ति दिलाने वाला है। "सार नाम से लोक बनाया, सार नाम हँसन मुक्ताया।'' इसी सार-नाम की डोर को पकड़ कर प्राणी अमरलोक जायेगा।
"दास कबीरा ले आये संदेशवा, सार शब्द गहि चले वो देशवा।"

यह "सार नाम" केवल संत सद्गुरु के पास है, तथा यह किसी अन्य महात्मा या गुरुओं के पास नहीं है। इसी आदि नाम के सुमिरन से जीव काल पुरुष को भी जीत लेता है। निःअक्षर बिन काल न जीते, यज्ञ दान केता कर लीजे। प्राणी चाहे जितना यज्ञ-दान आदि कर ले, परन्तु निःअक्षर नाम के बिना सब व्यर्थ है। इसीलिए कबीर साहिब जी धर्मदास को सलाह दे रहे हैं कि मन कर्म और वचन से तुम "सार नाम" को ग्रहण करके उसी का सुमिरन करो व उसी में निवास करो अर्थात् हर पल नाम का सुमिरन करते रहो। इसी में तुम्हारा कल्याण है। काल की सीमा से मुक्त होने का अन्य कोई रास्ता नहीं है। योग, यज्ञ, तप व दान आदि कालपुरुष के द्वारा बनाये हुये नियम हैं।

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अब प्रश्न है कि विदेह-नाम के प्राप्त होने से जीव कैसे मुक्ति प्राप्त करेगा? इस विदेह- नाम के प्राप्त होते ही सद्गुरु अपनी ताकत से जीव के पुराने कर्म काट देते हैं। इस प्रकार वह पुराने कर्म के बंधनों से, सद्गुरु की कृपा से मुक्त हो जाता है और भविष्य में, जो भी गलत कार्य सद्गुरु द्वारा बताये गये नियमों के विरुद्ध चलकर करेगा, तो उन कार्यों के लिए उसे सजा मिलेगी। इस प्रकार सद्गुरु से "नाम" की प्राप्ति जीव को अमरलोक जाने की गारंटी मिल जाती है। हाँ यह यह आवश्यक है कि वह विश्वास के साथ नाम" को पकड़े रहे। कुछ महात्माओं ने अनहद शब्द को ही नाम" मान लिया। यहीं पर उनसे भूल हो गई, क्योंकि अनहद शब्द भी तीन लोक की सीमा के अन्दर आता है। कबीर साहिब जी ने पूंछू मुद्धाओं की विस्तार से की है, उन्हें नकारा नहीं है, परन्तु वह यह स्वीकार करते हैं कि ये धुनें उनका लक्ष्य नहीं हैं, क्योंकि इन धुनों से प्राणी को तीन लोकों से मुक्ति नहीं मिलने वाली है। कबीर साहिब जी यह भी कहते हैं कि जो प्राणी सार शब्द पा लेता है, वह उसका हो जाता है और उसे फिर काल पुरुष द्वारा बनाये नियम, जप, तप और आचार-विचार आदि पालन करने की जरूरत नहीं है।

कबीर साहिब कहते हैं कि सभी प्राणी इस दुनिया में कालपुरुष द्वारा रचे गये योग, जप, तप, नियम आदि भ्रम के कारण अपना रहे हैं फिर भी उनका मन निर्मल नहीं है-मलिन है, जिसके कारण कोई बल मद में भूला हुआ है, कोई धन मद में, कोई रूप मद में तो कोई बुद्धि मद में, भूला हुआ है। कोई काम के वशीभूत है, कोई क्रोध के वशीभूत है, कोई लोभ, कोई मोह और कोई अहँकार के प्रभाव में है। यही नहीं मन मलिन होने के कारण लोग इन्द्रियों के भी वशीभूत हैं और उनकी रूप (आँख की), रस (जिह्वा की), गन्ध (नाक की), शब्द (कान के), और स्पर्श (त्वचा) से होने वाले सुख के कायल हैं। वे भ्रमवश यह नहीं समझ पा रहे हैं कि ये तो काल निरंजन की अनुभूतियाँ हैं, आत्मा की नहीं और इस प्रकार व्यर्थ ही जीवन गरवाँ रहे हैं। वह सार शब्द, जिसकी छाया में वास्तविक आनन्द की अनुभूति होती है, से बिलकुल बेखबर हैं। यह सार शब्द तो सबके घट के भीतर है, आत्मा में समाया हुआ है परन्तु वह प्रकट नहीं है, आत्मा में गुप्त रूप से मौजूद है। केवल उसे प्रकट करने की जरूरत है। जैसे बीज में सूक्ष्म रूप में पेड़ समाहित है, केवल उसे अंकुरित करना है। अंकुरित करने के लिए उपयुक्त भूमि, पानी की सिंचाई व सूर्य की रोशनी (प्रकाश) आदि की जरूरत पड़ती है। अतः यदि बीज को जमीन में गाड़ने के बाद उसे उचित सिंचाई व सूर्य का प्रकाश आदि मिलता रहे, तो बीज अंकुरित हो जाता है। उसी प्रकार सार शब्द को सजीव करने के लिए एक सद्गुरु की कृपा की आवश्यकता है, जो अपनी सुरति की ऊर्जा से उसे (सार शब्द को) जगा दे। सदगुरु अपनी सुरति प्राणी की सुरति में मिलाकर, मन को नजरअंदाज करते हुए, उसे (सुरति) ऊर्जा प्रदान करते हैं, जिससे सुरति चैतन्य हो जाती है और इसी से आत्मा पर पड़ा हुआ अज्ञान का आवरण नष्ट हो जाता है। तब वह चैतन्य हो जाती है। प्राणी अपनी ताकत या कोशिश से उसे सजीव नहीं कर सकता, क्योंकि उसमें इतनी शक्ति ही नहीं है। वह तो सद्गुरु की आध्यात्मिक ऊर्जा से ही चैतन्य हो सकती है, अन्यथा नहीं। "बिन सद्गुरु पावे नहीं, कोई कोटिन करे उपाय।" इससे स्पष्ट है कि सद्गुरु की कृपा से ही वह सुरति सजीव हो सकती है और जीव भवसागर से पार हो सकता है।

चलो सखी वा देश चलिये, जहाँ पुरुष को ठाई।
हंस हिरंबर चंवर हरत हैं, तन की तपन बुझाई।
कहे कबीर सुनो भाई साधो, शब्द सुनो चितलाई।
नाम पान पांजी सो पावे, सो वा लोकै जाई।।

साथ ही यहाँ पर यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस नाम का दान वही सद्गुरु दे सकता है, जो स्वयं तीन लोक से बाहर, चौथे लोक-अमरलोक पहुँचा हुआ हो और वहीं से इस "सार नाम" को लाया हो। तभी तो इस नाम की इतनी महिमा है। यह "नाम" (सार शब्द) जो स्वयं परमपुरुष हैं, जीव को निर्मल करके संसार सागर से परे अमर 'लोक (सत्यलोक) ले जाते हैं।

सदगुरु मधु परमहंस जी कहते हैं कि "जो वस्तु मेरे पास है वह ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है।" यह बात मैंने दम्भ से या अतिशयोक्ति से नहीं कही है। जैसे कोई दूकानदार कहता है कि जो मिर्ची मेरे पास है, कहीं नहीं मिल सकती। यह अमूक जगह से आई है।.... तो मैं भी जिस वस्तु की बात कर रहा हूँ, वो इस संसार में नहीं है, तीन लोक में कहीं भी नहीं है। मैं चौथे लोक की वस्तु की बात कर रहा हूँ। जब भी "नाम" रूपी वस्तु मिलती है, 46 तीन चीजें आपमें आ जाती हैं। तीन चीजें शर्तियाँ होती हैं जिसे मैं "नाम" देता हूँ।

(1) आत्मा और मन अलग हो जाते हैं।
(2) हृदय प्रकाशित हो जाता है, जिससे अन्तर में विद्यमान काम-क्रोध-लोभ-मोह और अहँकार स्पष्ट दिखाई पड़ने लगते हैं।
(3) एक शक्ति आपमें निरूपित कर देता हूँ, जो आपको पूर्ण सुरक्षा प्रदान करती है।

सद्गुरु 'साहिब' जी आगे स्पष्ट करते हैं कि 'मैने इस वस्तु का अनुभव एक या दो पर नहीं, लाखों शिष्यों पर किया है। इसलिए इसमें कोई संशय नहीं है, पक्की बात है।' 'नाम' प्राप्ति के बाद मेरा हर शिष्य बदल जाता है, वह बदला हुआ लगेगा। इस वस्तु के आने से मन की दुनिया समाप्त होने लगती है और आत्मा का रूप समझ में आने लगता है।'

वास्तव में एक सदगुरु शरीर धारण किये हुए भी शरीर नहीं होते। वे तो परमपुरुष के तद्रूप होते हैं। "लखा जो चाहो अलख को इनही में लख लेय।'' साहिब जी कहते हैं कि कभी भी व किसी भी हालत में "नाम" का सहारा मत छोड़ना और सतत सुमिरन करते रहना।

एक सद्गुरु से "नाम-दीक्षा" पाकर शिष्य मन और माया की पकड़ से बाहर हो जाता है। अब उसके शरीर पर रोग नहीं लगेंगे। अब उसके ऊपर नवग्रह का जोर नहीं चलता। भूत व प्रेत उसके पास नहीं आयेंगे, यहाँ तक कि यदि आप किसी गैरनामी के पास बैठे हैं, और उस पर भूत या प्रेतों का प्रकोप है, तो उसके पास से भी वे भाग जायेंगे, क्योंकि "नाम" का करन्ट उन्हें बुरी तरह लगता है, जिसे प्रेतबाधायें सह नहीं पातीं और भाग जाते हैं। उस पर जादू- टोना-जंत्र-मंत्र- तंत्र आदि असर नहीं डालेंगे मारन-मरण-सम्मोहन-वशीकरण मंत्र इत्यादि उसको प्रभावित नहीं करेंगे। "नाम" सुरक्षा कवच की तरह हर प्रकार की बाधाओं से उसकी रक्षा करेगा। इस प्रकार सार नाम" इस लोक में उसे सुखी रखेगा और अन्त में यम का फंदा काट कर उसे अमरलोक पहुँचा देगा। इसी "सारनाम" की बदौलत ही कालपुरुष भी अपना सिर झुका लेता है, "नाम होय तो माथ नमावे।" पर इसके लिए जरूरी है कि उसने सार नाम पर पूर्ण विश्वास कर रखा हो।

इस ब्रह्माण्ड में 14 लोक हैं। इस मानव तन में भी 14 लोक हैं, "यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे" और प्रत्येक लोक में एक देवता, उसके स्वामी के रूप में विराजमान है। ये सभी अपने-अपने क्षेत्र के अधिकारी हैं। निरंजन (मन) सहस्रसार में निवास कर रहा है, जो सभी देवताओं का प्रधान है। ये सभी देवता, सच्चे नाम के बिना, प्राणी को भ्रमित करते रहते हैं और आत्मा को अपना स्वरूप नहीं पहचानने देते हैं, जिससे आत्मा संसार-सागर में ही डूबती-उतरती रहती है और मुक्ति पाकर परलोक नहीं जा पाती। कहने का अभिप्राय यह है कि केवल सच्चे सद्गुरु के प्राप्त होने के बाद ही उनसे सच्चा "सार नाम" प्राप्त हो सकता है, अन्यथा नहीं।

सदगुरु से सच्चा "नाम" प्राप्त होने के बाद, मनुष्य अपने आप को पहचान लेता है और अपनी आत्मा को पहचान लेता है। अब अपना आत्मरूप जानकर न हम मनुष्य हैं, न देवता हैं, न गृहस्थ, न वनवासी, न क्षत्री, न ब्राह्मण, न वैश्य, न शूद्र हैं। न हम स्वर्ग लोक जाते हैं और न नरक लोक जाते हैं। न हम जीतते हैं, न किसी से हारते ही हैं। जब हमने अपनी आत्मा को ही पा लिया, तो हम अमर हो गये।

भक्ति भेद और सार-नाम के विषय में चर्चा करते हुये सद्गुरु मधु परमहंस जी कह रहे हैं कि सुमिरन ही भक्ति की शक्ति है। सुमिरन की शक्ति से अमरलोक का मार्ग प्रशस्त होता है, और सहज रूप में दिव्य ज्ञान का प्रकाश भक्त में समा जाता है। भक्त को काल-कराल की व्यथा और ताप से मुक्ति मिल जाती है तथा अन्त में, सत्यलोक पहुँच जाता है। जिस तरह मन, माया में रमा हुआ है, माया के विषय में ही सोचा करता है, उसी तरह सार-शब्द में सुरति लगाये रखना चाहिए। तभी आप ब्रह्माण्ड की सभी बाधाओं को पार करके सत्यलोक पहुँच जायेंगे।

साहिब जी कहते हैं कि "सुरति" मन और माया के द्वारा बनाये हुए संसार में घूम रही है इससे यह शिथिल हो गई है और परमपुरुष से दूर होती रही है। यदि इस सुरति को हम समग्र एकाग्र कर लें-हमें परमपुरुष के निरंतर दर्शन होते रहेंगे अतः सुरति का एकाग्र करना हमारी प्रमुख आवश्यकता है।

अब प्रश्न उठता है कि ध्यान किसका करे। साहब जी कहते हैं कि इस अथवा ध्यान को अपने इष्ट (परमपुरुष) अथवा सद्गुरु की लौ को तो सुरति में लगाने पर ही स्थिर हो सकती है। वह कहते हैं कि परमपुरुष हमने कभी भी अपनी आँखों से देखा नहीं है अतः उनका कौन-सा स्वरूप हम अपने ध्यान में बैठायेंगे? जाहिर है कि वह काल्पनिक रूप ही होगा जो कि सही नहीं और ध्यान में बाधा आयेगी। दूसरे परमपुरुष परम तेजस्वी और अत्यधिक ऊर्जा पूर्ण हैं तो उनके तेज एवं ऊर्जा को हम अपनी आँखों से सहन नहीं कर पायेंगे। परन्तु वही तेज व ऊर्जा जब सद्गुरु के माध्यम से प्राप्त होती है तो वह हमारे जज्ब करने योग्य बन जाती है। जैसे समुद्र का जल खारा होता है वह पीने योग्य नहीं होता परन्तु वही जल जब वाष्पीकृत होकर वर्षा के रूप में बरसता है तो वह शीतल शुद्ध एवं स्वास्थ्यवर्धक होता है। अतः स्पष्ट है कि हमें सद्गुरु की ही पूजा एवं ध्यान भजन करना चाहिए। शास्त्र भी यही कहते हैं -

ध्यान मूल गुरु रूपम्, पूजा मूलं गुरु पादकम्।
मंत्र मूलं गुरु वाक्यम्, मोक्ष मूलं गुरु कृपा।।

सभी देवी-देवताओं की पूजा करने से ध्यान खण्डित होगा तथा समग्र एकाग्र नहीं हो पायेंगे। अतः ध्यान का पूर्ण लाभ नहीं मिल पायेगा। इतना ही नहीं एक सद्गुरु सदैव परमपुरुष की सुरति में ही रहते हैं अतः उनको मनुष्य समझना हमारी बहुत बड़ी भूल है। यह वैज्ञानिक तथ्य भी है जिसका ध्यान हम करेंगे तो उसी के गुण हममें आ जायेंगे। यदि हम दुर्वासा ऋषि के विषय में बात करेंगे तो उनका क्रोध पूर्ण स्वभाव ही तो हमारे मानस पटल पर अंकित होगा। और हमारे स्वभाव में भी क्रोध की छाया दृष्टिगोचर होने लगेगी। अतः एक सद्गुरु जो परमपुरुष की सुरति में हमेशा रहते हैं तो उनमें परमपुरुष के गुण हमेशा विद्यमान रहेंगे और जब हम उनका ध्यान भजन करेंगे तो हममें भी परमपुरुष की ऊर्जा अक्ष होकर पहुँचेगी।

अब प्रश्न उठता है कि ध्यान करते समय क्या करे? सद्गुरु का ध्यान करते समय निम्न बिन्दुओं का पालन करें -

  1. कमर सीधी करके बैठे इससे रीढ़ की हड्डी सीधी रहती है जिससे सुषुम्ना नाड़ी खुलेगी।
  2. ध्यान करते समय हिले-डुले नहीं;
  3. ध्यान शीश से सवा हाथ ऊपर और अधर के बीच गुरु मूर्ति पर ध्यान लगाये क्योंकि शीश से सवा हाथ ऊपर ही अष्टम चक्र में सद्गुरु का वास है। "अधर आसन किया अगम प्याला पिया।"
  4. श्वास, नाम और सुरति साथ-साथ रहें।
  5. सुमिरन करते समय मन पर नजर रखें ताकि मन एकाग्र रह सके।
    केवल सद्गुरु द्वारा दिये गये शब्द को अन्तरचक्षुओं से देखते हुए सुमिरन करें।

अर्थात् इड़ा और पिंगला में लय करने पर सुषुम्ना नाड़ी खुल जाती है। फिर शीश के सवा हाथ ऊपर (अष्टम चक्र में) सूरति को स्थिर करने पर साधक जन्म व मरण के भ्रम में न पड़ कर निर्भय हो जाता है।

इस प्रकार यदि सुरति लगाते समय उपरोक्त बिन्दुओं का ध्यान रखे तो सुरति समग्र एकाग्र हो जायेगी।

तन थिर मन थिर वचन थिर सूरति निरति थिर होय।
कहे कबीर ता पल को कल्प न पावे कोय ।।

तन कैसे स्थिर हो? इस तन में नौ नाड़ियाँ और दस प्राण हैं। यह प्राण वायु से संचालित होते हैं। जब हम नासिका से श्वास लेते हैं तो श्वास के साथ आक्सीजन आती है जोकि नाभिदल में आती है। नाभिदल में यह 10 प्राणों में विभक्त होकर नाड़ियों द्वारा विभिन्न अंगों में भेजी जाती है जो शरीर को ऊर्जा देती है और कार्बनडाइऑक्साइड नासिका से बाहर आती है। ऊर्जा खर्च होने पर आक्सीजन भी खर्च होती है जैसे गाड़ी में पेट्रोल खर्च होता है। और कार्बनडाइऑक्साइड के रूप में दूषित गैस धुएँ के रूप में बाहर निकलती है। इसी प्रकार श्वासों द्वारा आक्सीजन की सप्लाई से शरीर के सभी अंग काम कर रहे हैं। यदि यही आक्सीजन नाभि में न आकर ऊर्ध्वमुखी हो जाय और सुषुम्ना में जाने लगे जो सुमिरन द्वारा होता है, तो सुषुम्ना खुल जायेगी। इस दशा में आक्सीजन बर्बाद नहीं होती बल्कि सुषुम्ना के खुल जाने पर सुषुम्ना सारे शरीर की कोशिकाओं को चैतन्य कर देती है और वायू के नाभिदल में न जाने से शरीर को प्राणों द्वारा विभक्त आक्सीजन नहीं मिल पाती जिससे शरीर की क्रियायें बन्द हो जाती हैं और तन सीज हो जाता है।

अब, मन को स्थिर कैसे करें। मन में सुरति समाई हुई है। जब सुमिरन के दौरान श्वास ऊर्ध्वमुखी हो जाती है-तो सुरति चैतन्य हो जाती है। सुरति के चैतन्य होने पर मन कमजोर हो जाता है, यह शून्य अवस्था में रहता है अतः अवसर पाकर यह फिर एक्टिव होने लगता है और कोशिश करता है कि ध्यान लगने न पावे। इस प्रकार मन और सुरति भी स्थिर हो जाते हैं।

निरति श्वास में समाई हुई है। जब श्वास ऊर्ध्वमुखी हो जाती है तो सुरति और सुषुम्ना के चैतन्य होने पर निरति का वश नहीं चलता और वह भी स्थिर हो जाती है। यही नहीं जब हम सुमिरन करते हैं तो श्वास के साथ सुरति और शब्द को भी जोड़कर ध्यान करते हैं। इससे सुरति के साथ निरति भी एकाग्र हो जाती है क्योंकि निरति तो पवन का ही रूप है। इस प्रकार जो स्थिति बनती है, उसका एक क्षण कल्पों की साधना के बराबर है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सुषुम्ना को आक्सीजन की सप्लाई मिलने से पहले वह चैतन्य नहीं थी। वह तो पहले भी चैतन्य थी जैसे मोबाइल का स्विच बंद के दिया जाय तो समय बताने वाली घड़ी फिर भी चलती रहती है और उस स्थिति में भी मोबाइल से समय की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इसी स्थिति में भी मोबाइल से समय की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इसी प्रकार पहले भी सुषुम्ना चैतन्य थी जैसे यदि मनुष्य चाहे तो वह केवल जल व पवन का सेवन करके जीवित रह सकता है परन्तु उस दशा में वह कोई शारीरिक कार्य नहीं कर सकता। शारीरिक कार्य अथवा श्रम साध्य कार्य करने हेतु उसे ठोस आहार की आवश्यकता पड़ेगी। साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि श्वास के ऊर्ध्वमुखी होने पर तन सीज तो हो जाता है लेकिन वह सुषुम्ना से ऊर्जा मिलने से निर्जीव नहीं होता।

सद्गुरु मधु परमहंस जी कहते हैं कि यह सुरति बड़ी लाजवाब चीज है। इसमें परमपुरुष (साहिब) का वास है। इसे संसार में न घुमाना। सुरति महामंत्र है। इसलिये इसे पकड़ लेना। "जो कछू है सो सुरति है। ताहि कहूँ समझाय।" यह सुरति नाम के बिना अंधी है। जैसे एक छुरी से फल, सब्जियाँ आदि काटते हैं और उन्हें काटते-काटते वह कुंद हो जाती हैं। इसी तरह यह सुरति मन के साथ घूमते-घूमते कुंद हो गई है। "अंधी सुरति नाम बिन जानो।'' यह सुरति एक सद्गुरु के नाम से चैतन्य हो जाती है। नाम रूपी यह तत्व गुरु की सुरति में है। "पारस सुरति संत के पासा।" सदगुरु उसी सुरति से नाम देता है। नाम के द्वारा सदगुरु उस परमसत्ता का आपको दे देता है। वही "नाम" (शब्द) आपको संसार सागर से पार करता पर यह तभी संभव है जब हमारी सुरति समग्र रूप से एकाग्र रहे। इस सुरति को अपने सदगुरु के चरण कमल में समर्पित करके उन्हीं का सुमिरन करे तो यह एकाग्र हो जायेगी।

क्षण सुमिरे क्षण बीसरे यह तो सुमिरन नाय।
आठ पहर भीना रहे सुमिरन सोई कहाय।।

अर्थात् सदैव अनवरत रूप से श्वासों में सुमिरन चलता रहे। इसका यह अर्थ नहीं कि अपना काम-काज न करें। सद्गुरु मधु परमहंस जी कहते हैं कि आप अपना काम करें लेकिन श्वासों में उनके द्वारा दिये गये शब्द का सुमिरन अनवरत रूप से करते रहें। "ठाढ़े बैठे पड़े उताने कहे कबीर हम उसी ठिकाने।" किसी भी स्थिति में हों यदि सुमिरन बराबर चलता रहा तो परमपुरुष आपके पास होंगे। "खावता पीवता सोवता जागता कहे कबीर रहे मुझ माही।" सबे सयाणा- कबीर की वाणी।

सत्य भक्ति का अर्थ है, 'सत्य की भक्ति करना।' सन्तों ने 'सत्य' को ही "सत्यपुरुष" माना है। अतः सत्पुरुष की भक्ति करना ही सत्यभक्ति का मुख्य उद्देश्य है। कबीर साहिब जी की भाँति सद्गुरु मधु परमहंस 'साहिब' जी ने भी किसी जाति, वर्ण अथवा धर्म आदि को महत्व नहीं दिया है। बल्कि सभी वर्ण व जाति के मनुष्यों को 84 लाख योनियों में आवागमन के चक्र से मुक्ति दिलाना ही "सत्य भक्ति" का लक्ष्य माना है। उन्होंने "सत्य भक्ति" धारा के अन्तर्गत "साहिब बन्दगी" पथ की नींव डाली।
कबीर साहिब ने अपने जीवन काल में यह भी बता दिया था कि वे अगली बार जन्म क्षत्रिय से सत्य-भक्ति का डंका पीटते हुए भारत को ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को परा-भक्ति की राह दिखायेंगे। साहिब का शब्द है-

जम्बू द्वीप थान बैठाई। देहि पान तब पंथ चलाई ॥।
कोटि वाणी हम तिन कहुँ दीन्हा। जगत जीव कहूँ निर्मल कीहा।॥

इसमें कोई संदेह नहीं है कि साहिब बन्दगी के प्रमुख सद्गुरु मधु परमहंस जी महाराज संत-सम्राट सद्गुरु हुजुर श्री कबीर साहिब जी महाराज के ही रूप हैं। ....वर्तमान में भी अतीत की वो घटनाएँ दोहराई जाने के कारण इसी सच्चाई की ओर इशारा कर रही हैं। इतिहास अपने को दोहराता है। सदगुरु कबीर साहिब जी महाराज की तरह सद्गुरु मधु परमहंस जी महाराज को भी पाखण्डियों से भारी विरोध झेलना पड़ रहा है।

पहले की भांति आज भी पाखण्डियों ने साहिब जी के साथ कई कहानियाँ गढ़ दी हैं। कुछ ने उन्हें मुसलमान बनाया है तो कुछ ने उग्रवादी, जबकि कुछ अन्य नयी कहानियाँ तैयार करने में लगे हुए हैं। पाखण्डियों ने अखनूर, खौड़, सारी आदि जगहों पर साहिब-बन्दगी के केवल आश्रम ही नहीं जलाए बल्कि सदगुरु जी को अपमानित करने तथा कई अन्य तरीकों से उन्हें मार डालने का षड़्यन्त्र भी रचा। दो बार उन्हें ज़हर भी दिया गया, एक बार ज़िन्दा जलाने का प्रयास भी किया गया, कई बार अन्य-अन्य तरीकों से मार डालने का प्रयास किया गया।

जलाता आ रहा है कुटिया कबीर की कौन!
आज भी बेशरम लगा इसी होड़ में कौन!
तलाश में निकला तो पाये कुछ चोर।
चुरा पाखण्ड जो थे बेच रहे शहर के सब ओर॥

वास्तव में इसमें किसी को क्या दोष दिया जाए, क्योंकि यह सब मन करवाता है। संसार में मन (काल-पुरुष) ने अपनी भक्ति का प्रचार किया हुआ है, वो साहिब की सच्ची भक्ति नहीं होने देना चाहता, क्योंकि वो जानता है कि यदि ऐसा हुआ, यदि जीव सच्चे संत सद्गुरु की शरण में पहुँच गये तो वे उसके चंगुल से छूटकर अमर-लोक चले जायेंगे। इसलिए हर सच्चे संत का विरोध होता आया है। साहिब तो अपना कार्य करने के लिए आये हैं और उन्हें यह कार्य करना ही है। ये सांसारिक बाधाएँ उन्हें कैसे रोक सकती हैं......। साहिब और साहिब के संतों के कारण ही तो दुनिया के जीव कष्टों में भी सुख की नींद सो रहे हैं। निरंजन ने तो जीवों को अनेक कष्ट देने थे, पर सच्चे संत ही जीवों को इस कष्ट से बचाकर रखते हैं। सोचो, यदि संत इस संसार में अवतरित न होते तो क्या होता! फिर ऐसा ही होता-

आग लगी संसार में, झर-झर गिरे अंगार।
संत न होते जगत में, तो जल मरता संसार॥

इसलिए जब तक साहिब और साहिब के संत काल-पुरुष के देश में रहते हैं, तब तक जीव सुख और शांति का अनुभव करते रहते हैं, और जो जीव उनकी शरण में आ जाते हैं, वे काल-पुरुष के इस कष्ट भरे संसार से सदा के लिए छूटकर अपने सही घर अमर-लोक चले जाते हैं।

॥कलियुग में जीव में इतनी सामर्थ्य ही नहीं है। वह मन और माया-जनित विषय वासनाओं में डूबा हुआ है। वह स्थूल इन्द्रियों - आँख, नाक, कान, मुख व त्वचा के द्वारा प्राप्त होने वाले सुखों - रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्श को भोगने में लगा हुआ है। साथ ही सूक्ष्म इन्द्रियों - मन, बुद्धि, चित्त और अहकार से पीड़ित है, जिनके कारण वह जीवन-पर्यन्त संसार सागर में डूबता-उतराता रहता है और अपने आत्म-कल्याण के विषय में कुछ करना तो दर, सोच भी नहीं पाता। परिणाम स्वरूप वह, जो नहीं करना चाहिये, उसे करता है और जो करना चाहिये, उसे नहीं करता। इस पंथ की यही विशेषता है कि सद्गुरु अपनी विशेष क्षमता के बल पर "नाम दीक्षा" के समय तक, उसके द्वारा किये हुये कर्मों के फलों को काट देते हैं, और भविष्य में ऐसे कर्मों को न करने के लिए उसे आगाह करते हैं। यदि फिर भी उसने ऐसे कार्य किये तो फिर उसे सज़ा मिलेगी, यह सज़ा भी बड़ी कठोर होगी यानि इससे माफी नहीं मिलेगी। 'साहिब' जी कहते हैं "मैंने नाम-दीक्षा देते समय आपके आत्म-कल्याण के लिए जो कुछ भी करना था, कर दिया, अब आपको उसे सम्हालकर रखना है। आपको मोक्ष पाने का, सत्यलोक जाने की गारंटी दे दी है, अब उसे सम्हाल कर रखना आपकी जिम्मेदारी है। हाँ, सद्गुरु आपको ऐसी ताकत दे देंगे कि आप गलत काम को कर ही नहीं पायेंगे और यदि गलत कार्य करेंगे तो आपको 'साहिब जी' सज़ा देंगे।"।

कहने का तात्पर्य यह है कि इस पथ से सद्गुरु "नाम दीक्षा" के समय इतनी ताकत आपमें भर देंगे कि आप अपने पहले वाले गलत व्यक्तित्व से पूर्णतया बदल जायेंगे। यह कार्य सद्गुरु की कृपा से संभव होता है। शिष्य के द्वारा किये गये कार्यों से संभव नहीं है। अन्य पंथों या धर्मों में ये सभी कार्य शिष्य को स्वयं करना है। सद्गुरु "नाम-दीक्षा" के समय शिष्य में तीन काम करते हैं- (1) शिष्य के मन और आत्मा का विलगिकरण कर देते हैं।
(2) हृदय प्रकाशित कर देते हैं, और। (3) उसमें एक शक्ति निरूपित कर देते हैं, जो सदैव उसके साथ रहती है और उसका पग-पग पर मार्गदर्शन करती है। जब कभी वह गलत कार्यों को करने के लिए उद्यत होता है, तो वह शक्ति उन कार्यों को करने से रोकती है।

आइये, देखें उसमें बदलाव कैसे आता है? जब शिष्य में मन और आत्मा अलग-अलग हो जाते हैं तो उसे मन की क्रियायें समझ में आने लगती हैं, मन की ताकत समझ में आ जाती है। मन की वृत्तियाँ - काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार समझ में आ जाती हैं। आत्मा के ये सब दुश्मन स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ने लगते हैं कि जिससे शिष्य को उन्हें नियंत्रित करने में सहायता मिलती है। अतः मन भी समझ में आने लगता है और शिष्य उस पर अंकुश लगाने लगता है। मन पर अंकुश लगने के बाद आत्मा की अनुभूति होने लगती है। आत्मा तो निर्मल है, पवित्र है। उसमें कोई विकार नहीं है। अतः मन के नियंत्रित हो जाने पर अज्ञान का आवरण, जो आत्मा पर उसने (मन ने) डाल रखा था, वह हट जाता है और आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो जाती है। अब मन अपनी मनमानी नहीं कर पाता। इसी प्रकार जब शिष्य का हृदय प्रकाशित हो जाता है, तो अंतस में व्याप्त अज्ञान का अँधकार समाप्त हो जाता है, उसमें ज्ञान का प्रकाश आ जाता है। फिर उसे अच्छे-बुरे का आभास होने लगता है। परिणाम यह होता है कि मनुष्य जो कुछ समय पहले तक चोरी, ठगी, बेईमानी, जालसाजी, झूठ बोलने आदि में लगा हुआ था, अब ये बुराइयाँ नियंत्रित हो जाती हैं। उसमें पहले से बहुत बदलाव आ जाता है। अतः उसे अब दुनिया में मज़ा नहीं आता। इन्द्रियाँ जो अपनी-अपनी इच्छाओं को पूरा कराने के लिए मन पर दबाव डालती थीं, अब शांत हो जाती हैं। मन की वृत्तियाँ - काम-क्रोध-लोभ-मोह व अहंकार आदि अपनी तीव्रता नहीं दिखा पाते। इस तरह अन्य लोगों की तरह अब उसके स्वभाव, व्यवहार व विचारों में विकार नहीं दिखाई पड़ते।

इतना ही नहीं, जब सद्गुरु शिष्य के अन्दर एक शक्ति दे देते हैं तो वह शक्ति सदैव मनुष्य का मार्गदर्शन करती हैं और, जब कभी वह कोई गलत कार्य करना चाहता है, तो वह शक्ति उसे ऐसा करने से रोकती है। अब वह गलत कार्य चाहकर भी नहीं कर पाता और यदि उसने उस शक्ति की अवहेलना करके गलत काम कर भी दिया तो बाद में उसे बहुत पछतावा होता है और भविष्य में ऐसा गलत कार्य न करने की प्रतिज्ञा भी करता है। इस तरह मनुष्य अपने अंदर इस अदृश्य शक्ति की उपस्थिति महसूस करता है और धीरे-धीरे उसमें बदलाव की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। अंत में एक स्थिति यह आती है कि मनुष्य आचार, व्यवहार व विचारों में पूर्ण बदलाव महसूस करता है। यह कार्य, सद्गुरु की कृपा से ही संभव हो सका, मनुष्य अपने आप नहीं कर पाता था। अब उसकी आत्मा चैतन्य है, अब वह होश में है और दुनिया में रहते हुये भी दुनिया से अलग है। एक प्रकार से आप महात्मा हो गये।
परिणाम यह होता है कि इस प्रकार के शिष्य जीवन पर्यन्त मन और माया के जाल में फँसे रहते हैं। वे 'नाम-दीक्षा' पाने के बाद भी दुनियादारी करते रहते हैं। अतः अंत में 84 लाख योनियों में ही कर्मानुसार भ्रमण करते रहते हैं और संसार-सागर से पार नहीं हो पाते यानि मुक्ति नहीं प्राप्त कर पाते। इस पथ में अपनाये गये सहज-मार्ग की विशेषता यह है कि संसार सागर से मुक्ति पाने हेतु आपको दैनिक कार्यकलापों के साथ ही सद्गुरु द्वारा दिये गये 'नाम' का सुमिरन करते रहना है, अलग से कोई क्रिया करने की आवश्यकता नहीं है जैसे जप, तप, दान, पुण्य, हवन-यज्ञ, सांगीतिक-कथा पाठ, पूजा-पाठ, अखंड-पाठ, चालीसा, अनुष्ठान-संस्कार, देवी का जगराता आदि विशेष पूजन-भजन आदि नहीं करना है तथा मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर अथवा संसार के किसी भी तीर्थ स्थान जैसे बद्रीनाथ, केदारनाथ, रामेश्वरम, मक्का-मदीना, यरूशलम आदि-इत्यादि स्थान नहीं जाना हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि अपनी दिनचर्या के साथ ही अपने हृदय में सद्गुरु द्वारा दिये गये 'नाम' महामंत्र का सुमिरन करना है बस, यानि किसी भी स्थिति में हो, अपने हृदय में 'नाम' सुमिरन बराबर करते रहें जैसे आप कार्यालय जा रहे हैं तो रास्ते में, कार्यालय अथवा व्यापार या व्यवसाय स्थल पर कार्य कर रहे हैं तो वहाँ कार्य करते हुए, कहीं गाड़ी द्वारा या पैदल जा रहे हैं तो इस दौरान अपने मन को सदगुरु के 'नाम' सुमिरन में लगाये रखें, बस। कबीर साहिब जी कह रहे हैं -

खावता, पीवता, सोवता, जागता, कहे कबीर रहे मुझ माहीं।

साथ ही, यदि हो सके, तो नाम-सुमिरन हेतु सुबह-शाम या जब भी समय मिले बैठें, तो यह बहुत ही अच्छा रहेगा। फिर भी यदि किसी कारणवश आप इस प्रकार बैठकर ध्यान भजन नहीं कर पाते हैं तो कोई बात नहीं, तो फिर अपने मन को संसार में नहीं घुमाना, उसे सांसारिक विषय-वासनाओं में नहीं उलझाना, यानि मन पर नियंत्रण रखना। हाँ, इतना ज़रूरी है कि अपने गुरु के प्रति दिल में श्रद्धा अवश्य बनाये रखना।' साहिब जी' कहते हैं कि जैसे किसान भूमि को पानी से सींचता है, तो खेत में फसल अपने आप विकसित हो जाती है। भूमि यह कार्य स्वयं करती है। अतः श्रद्धा रूपी जल में कमी मत आने देना।' नाम' की ताकत अपने आप कार्य करती चलेगी। वह ताकत खुद ही आपमें बदलाव लाएगी । साथ ही यह भी ध्यान में रखें कि मन को ध्यान भजन में लगाने से आपको कई लाभ प्राप्त होंगे। एक तो, विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा करने अथवा तीर्थ स्थानों का भ्रमण करने से आप में भ्रम पैदा होगा, जिससे आपकी भक्ति दूषित होगी क्योंकि किसी एक देवी या देवता की आराधना में एकाग्रता नहीं आ पायेगी। मन सभी देवी-देवताओं में घूमता रहेगा। फिर जब सूदगुरु की पूजा करने से सभी देवी-देवताओं की पूजा शास्त्रों में मानी गई है, तो फिर सभी देवी-देवताओं को पूजा करने से क्या लाभ? कबीर साहिब जी कह रहे हैं-

देबी देवल जगत में,
कोटिन पूजे कोय।
सद्गुरु की पूजा किये,
सब की पूजा होय॥

दूसरा लाभ यह है कि जब मन ध्यान भजन में लगा रहेगा, तो मन अपनी नकारात्मक वृत्तियों में उलझने से बचा रहेगा, जिससे उसमें सकारात्मक सोच आयेगी और आपमें सद्गुणों, सद्विचारों का प्रस्फुटन होगा।

सारांश यह है कि "साहिब बन्दगी" पथ, भक्ति क्षेत्र में एक अनूठा पथ है, जिसमें सभी जाति, रंग, वर्ण व भेद (Cast, Colour, Class, Critic) के लोगों का समान रूप से आदर है। किसी के साथ कोई भेद नहीं है। इस पथ में "नाम-दीक्षा" प्राप्त करने हेतु किसी प्रकार का दान, अथवा शुल्क या सहयोग राशि इत्यादि नहीं देना पड़ता। इस पथ में भक्ति केवल सद्गुरु के प्रति समर्पण की भक्ति है और किसी अन्य देवी-देवता अथवा प्रेत, जंत्र-मत्र आदि को मानने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि एक सद्गुरु भक्ति से सभी देवी देवताओं की भक्त हो जाती है। इस कलिकाल में कोई भी व्यक्ति अपनी कोशिशों अथवा कमाई से इस संसार-सागर से पार नहीं हो सकता, बल्कि सद्गुरु की कृपा से ही यह कार्य संभव है। इस पथ में सद्गुरु "नाम-दीक्षा" के समय मंत्र देते हैं, वह तीन लोकों में पर औौधे लोक-सेतलोक की वस्तु है। यह नाम नामी के अन्दर पलभर में बदलाव लाता है और उसमें सांसारिक विषय वासना, मन व माया की दुप्रवृत्तियों पर नियंत्रण प्राप्त करने की यह मंत्र शक्ति देता है। परिणामस्वरूप उसमें सदगुण, सद विचार और सद्व्यवहार आदि स्वतः आ जाते हैं। अंत में वह संसार सागर से मुक्ति प्राप्त कर परमपुरुष के लोक चला जाता है, जहाँ से उसे पुनः नहीं आना है। इस प्रकार ह 84 लाख योनियों में जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है जोकि अन्य धर्मों अथवा पंथों में संभव नहीं है।

जप तप संयम साधना, सब सुमिरन के माहिं।
कबीर जानत संत जन, सुमिरन सम कछू नाहैं॥

सुमिरन का बड़ा महात्म्य है। वाणियों में आया। यह गौर करने की चीज़ है। जितनी देर आप सुमिरन कर रहे हैं, उतनी देर दिव्य अनुभूतियाँ कर रहे हैं। जैसे शरीर का सिस्टम है। आपको केवल भोजन खाना है; बाकी का काम खुद-ब-खुद होता है। इस तरह जितनी देर सुरति की, उतनी देर ज्ञानावस्था में हैं। ध्यान में बैठे समय कुछ अनुभूतियाँ लाजवाब होती हैं; दिव्य संदेश मिलते हैं। उस समय का इंतज़ार करना। एक लगन के साथ बैठना; ऊबना नहीं। थोड़ी देर में अनुभव करते जायेंगे कि विचारों में परिवर्तन आ रहा है। आप अपने अस्तित्व को अनुभव करते जायेंगे। चलते-फिरते भी सुमिरन कर रहे हैं तो बाहरी चिंतन रुक जाता है। तब अंदर की स्थिति का ठीक-ठीक पता चलता जायेगा। ध्यान को खंडित करने वाली चीज़ों का पता चलता जायेगा। अब काम, क्रोध आदि की पारख मिलती जायेगी और फील करते जायेंगे। आपको ये क्रिया करते हुए मिलेंगे। आप अनुभव करेंगे कि कोई ताक़त आपको ये क्रिया करते हुए मिलेंगे। आप अनुभव करेंगे कि कोई ताक़त आपको लक्ष्य से हटाना चाहती है। यह आभास मिलता जायेगा। आप पढ़ने लगेंगे। फिर खुद ही सावधान रहने लगेंगे।

खावता पीवता सोवता जागता, कहैं कबीर सो रहे माहिं।।

साहिब की वाणी में वज़न है। कुछ ने नहीं समझा तो उलटवासियां कह दीं। नहीं, साहिब ने सीधा कहा, सहज कहा। तो शर्त एक है कि जैसे शराब का नशा है, ऐसे ही नाम का भी नशा है। जो पहले शराब पीता है, कड़वी लगती है, अटपटी लगती है, लेकिन जब मस्तिष्क की कोशिकाएँ नशे की आदी हो जाती हैं तो वो तलाश करता रहता है। इस तरह सुमिरन है। मन दुनिया की चीज़ों में रमा है, सुमिरन में बँधना नहीं चाहता है, नाना संकल्प-विकल्पों में घूमना चाहता है। आत्मा की भी आदत बन चुकी है। यह उलझी है। इसलिए धीरे-धीरे सुमिरन की आदत डालें। साहिब ने मन के अंग पर, माया के अंग पर, सुमिरन के अंग पर बड़े शब्द कहे हैं। अगर देखें तो सुमिरन का बड़ा महात्म्य कहा है। सुमिरन बाहरी और आंतरिक दोनों आनंद देने वाला है। स्वाभाविक मन का फ्लू बन चुका है कि साइकिल पर बैठा है, तो भी चिंतन किये जा रहा है; खा रहा है, तो भी चिंतन किये जा रहा है। जब लगातार चिंतन कर सकते हैं तो सुमिरन क्यों नहीं कर सकते!।

कबीर मन तो एक है, भावै जहाँ लगाय।
भावै गुरु की भक्ति कर, भावै विषय कमाय।।

जैसे एकाग्र होते जायेंगे, बुद्धिमान होते जायेंगे, भौतिक क्षमता बढ़ती जायेगी। जो भी काम करें, ध्यान से करें। तब वो अच्छा होगा। जो भी काम हड़बड़ाहट में करेंगे, ठीक न होगा। जहाँ सावधानी हटी, वहीं दुर्घटना है।

उसको काल क्या करे, जो आठ पहर हुशियार।।

हमेशा चिंतन रहो। ध्यान भंग क्यों होता है? यह ध्यानभंग क्या है? बाहर की चीज़ में चला गया तो भंग हो जाता है। दुनिया की किसी भी चीज़ में चला गया, आप वहीं पर हैं। जहाँ भी ध्यान हटा, वहीं गलती होगी। साहिब ने सुरति के अंग पर बोला।

सुरति संभाले काज है, तू मत भरम भूलाय।
मन सथ्याद मनसा लहर में, बहत कतहूँ न जाय।।

मन बुरी तरह ध्यान को भटकाता है। परमात्मा तक पहुँचने में मन ही की रुकावट है। कभी सोचते हैं कि सुमिरन करें। तहदिल से करना चाहते हैं। जब करना चाहते हैं तो अचानक ध्यान कहीं और चला जाता है। पर

नहीं, यह एक ही मन है, एक ही जगह लगेगा। इसलिए-

तलक विषयों से यह दिल, दर हो जाता नहीं।
तलक साधक विचारा, चैन सुख पाता नहीं।
कर नहीं सकता है जो, एकाग्र अपनी वृत्तियाँ।
सको सपने में भी परमात्म नजर आता नहीं।।

अंदर से बाहरी विषयों से रुचि हटानी है। उसी का तो खेल है।

खावता पीवता सोवता जागता, कहैं कबीर सो रहे माहिं।।

कैसा बोल रहे हैं।

आठ पहर बीना रहे, समिरन सोई क हाय।।

कोई जंगल में नहीं जाना है। जंगल में गये, तो भी है तो दुनिया ही। कैसे रहना?

अगर परमारथी बनना है तो जरूर ऐसे ही रहना होगा। सिर्फ आगे बढ़ना है। आपको संकेत मिलते जायेंगे। पूरा काम गुरु बना देता है। जब पूरी एकाग्रता सिमटती है तो सुरति जाग जाती है। इसलिए इसका महात्म्य कहा गया। भुलाना है अपने को

मिटा दे अपनी हस्ती को, अगर कुछ मरतबा चाहे।
कि दाना खाक में मिलकर, गुले गुलजार होता है।।
सहजो जग में यूँ रहो, ज्यों जिह्वा मुख माहिं।

अगर परमार्थी बनना है तो जरूर ऐसे ही रहना होगा। सिर्फ आगे बढ़ना है। आपको संकेत मिलते जायेंगे। पूरा काम गुरु बना देता है। जब पूरी एकाग्रता सिमटती है तो सुरति जाग जाती है। इसलिए इसका महात्म्य कहा गया। भूलाना है अपने को

मिटा दे अपनी हस्ती को, अगर कुछ मरतबा चाहे।
कि दाना खाक में मिलकर, गुले गुलजार होता है।।

माँ बेटे की उँगलियाँ पकड़ चलाती है। वो बैलेंस बनाती चलती है। पर इसमें बच्चे का भी रोल है। बच्चे को अपनी टाँगों को स्टैंड करने के लिए एक इच्छा चाहिए। यदि वो जिद्द करके टाँगें स्टैंड न करे तो नहीं जा सकता है। इस तरह से शिष्य का एक भाव चाहिए। जब स्वाँसा धीरे-धीरे शीश से सवा हाथ ऊपर चलती हैं तो जीरों बन जाता है। फिर जीरो पलट जाता है। यह हैं सुषुम्ना के अंदर से जाना। कोई गेट नहीं है। यह जीते-जी मरने की स्थिति होती है।

जीवत मरिये,
भवजल तरिये।।

सिस्टम फीड कर दिया है। जहाँ भल होने वाली होगी, पूरी मदद करते चलेगी। जिंदगी के कई मौकों पर आपने अनुभव किया होगा कि एक अज्ञात सत्ता साथ जुड़ी है। जहाँ आपका बस नहीं चल पाता है, वहाँ वो चुपके से मदद करके निकल जाती है। आपके भरोसे के पीछे अनुभव है। साहिब सबको अनुभव करवाता है; कहता है कि घबरा मत, साथ हूँ। आप अपना काम करते चलें। जहाँ नहीं होगा, वहाँ साथ देगा। वो खुद करता चलेगा। जहाँ आप सतर्क नहीं हैं, वहाँ वो ताक़त आकर मदद कर जाती है। कभी वो प्रत्यक्ष अनुभूति देकर चला जाता है

द्वारे धनी के पड़े रहो, धक्का धनी को खाय।
धनी गरीब निवाज है, जो धर छाड न जाय।।

साहिब से कुछ न माँगना फिर आपकी आदत बिगड़ जाएगी। अगर साहिब सूखी रोटी दे तो नमक न माँगना। हो सकता है कि उस दिन नमक नुक़सान करने वाला हो। चुपचाप रखा लेना; उफ न करना; कहना कि तेरी रज़ा।

जीवन का सौंप दिया, सब भार तुम्हारे हाथों में।
है जीत तुम्हारे हाथों में, है हार तुम्हारे हाथों में।

यह है समर्पण

ना सुख हाल में मजा है, ना दुख हाल में मजा है।
जिस हाल में तू राखे, उस हाल में मजा है।।

मैं तो मानता हूँ कि मेरे बंदे में बड़ी ताक़त है। आप अपने में मुझे देखोगे। अंदर मथोगे तो मैं नज़र आऊँगा। मेरी हाज़िरी पाओगे। एक ने फ़ोन किया; कहा कि नाराज नहीं होना, आजकल मैं अपने को साहिब समझता हूँ। मैंने कहा कि तेरा दिमाग तो ठीक है न? कहा, हाँ। मैंने कहा कि फिर ठीक है। मैंने पूछा कि कैसे कह सकते हो? उसने कहा कि जो भी काम करता हूँ, आप ही आप लगते हो। मैंने कहा कि सुन, अगर तूने यह कहना था कि आपसे भी बड़ा हो गया हूँ, तो भी बुरा नहीं मानना हम समाना जानते हैं। आँखों से हृदय देखना जानते हैं। आप चाल-चलन में, व्यवहार में अपने अंदर मुझे पाते होंगे। कुछ भी गलती करके चैन नहीं आता हीगा। वो शक्ति जताती है कि यह ठीक नहीं किया। आप किसी को पीड़ा नहीं देना चाहते हैं। आप पाप नहीं करना चाहते हैं। यह ज्ञान दिया; यह परिवर्तन किया। इसी का नाम है-नाम-दान। योग वाले कह रहे हैं कि साधन कर; हम कह रहे हैं कि गुरु का दर्शन और सेवा।

गुरु का दर्शन देख देख जीवां।।
पूरब में हरि को वासा। पश्चिम अल्लह मुकामा।।
दिल में खोजो दिल में खोजो, यहीं करीमा रामा।।

हिंदू-मुसलिम में भेद है। हिंदू उसे पूर्व में बताते हैं और मुसलमान पश्चिम में। साहिब कह रहे हैं कि वो तो अपने अंदर है।
कह रहे हैं कि आपकी कृपा से संसार तर जाता है; फिर आप मुझपर जीवों का भार देकर अपने धाम वापस क्यों जा रहे हैं? जिसके घट में दिव्य ज्ञान नहीं होगा, वो कैसे उस लोक में जाएगा। मैं तब मानूँगा, जब सारे संसार का कल्याण हो जायेगा। साहिब ने कहा क तुम संशय क्यों कर रहे हो? तुम अपने हंस का कल्याण करो, अन्य जीवों की चिंता छोड़ दो। संसार का भार तो सद्गुरु पर है और वे ही सृष्टि का कल्याण करेंगे। जिस पर सद्गुरु कृपा की दृष्टि डालेंगे, उसका हंस काल के हाथ में नहीं जा सकता है। जबसे यह सृष्टि बनी है, तबसे अनन्त हंसों को सतलोक पहुँचाया गया है। इसलिए तुम शंका मत करो और अपने हंस का कल्याण करो। यानी सद्गुरु को ही पार उतारने वाला कह रहे हैं। इसलिए अपनी भक्ति करने को नहीं बोल रहे, बल्कि सद्गुरु की भक्ति के लिए बोल रहे हैं।

सद्गुरु सत्यलोक में निवास करते हैं। प्रभु सतगुरु में ही निवास करते हैं जो सतगुरु के चरणों में प्रीत करता है, उसकी महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता है। जो सतगुरु और शब्द को एक करके जानता है, उसके डर से काल भी भय मानता है। जिसका पास आत्मज्ञान होता है, उसका काल कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। हे धर्मदास! तुम संसार से उदासीन होकर रहो।

साहिब कह रहे हैं कि वाणी द्वारा समझाया जाने वाला और वाणी से परे - दोनों जान जब एक हो जाते हैं तब आत्म-ज्ञान आ जाता है। जब जीव सत्य शब्द में ही समाकर रहता है, तब कहीं भी हो, उसी लोक में होता है। जब शत्रु-मित्र दोनों एक समान समझने लग जाता है, और सत्य और झूठ दोनों को एक ही करके मानता है अर्थात जब सांसारिक सत्य और झूठ दोनों मिट जाते हैं तब घट में दिव्य-ज्ञान उत्पन्न हो जाता है। इसके आगे साहिब जी ने धर्मदास को काल की कारागरी और भुल भुलैया बताई।

साहिब कह रहे हैं कि यह काल स्वयं ही गुरु बनकर बैठ जाता है और स्वयं ही चेला बन जाता है। फिर खुद ही अपनी भक्ति करता है और खुद ही दिखता है। स्वयं ही स्वर्ग और नरक में जीवों को भरमाता है और स्वयं ही हृदय में ज्ञान उत्पन्न कर मुक्ति देता है। स्वयं ही दाता है और स्वयं ही उसका भोग करने वाला है। करने वाला और नहीं करने वाला भी स्वयं ही है। स्वयं ही जन्म और मरण की क्रिया चलाता है और स्वयं ही मृत्यु प्रदान करके जीवों को रुलाता है। स्वयं ही संसार की उत्पत्ति करता है और स्वयं ही आशाओं में फँसा देता है। फिर स्वयं ही सबका काल बन जाता है। स्वयं ही कुल और स्वयं ही जाति बनाता है। स्वयं ही मूर्ति, पत्ते, डाल, बेल आदि में निवास करता है। यह स्वयं ही गुरु बनकर बैठ जाता है और स्वयं ही चेला बन जाता है।

। पर वास्तव में मुख किसे कहें? क्योंकि सबमें एक ही ब्रह्म समाया हुआ है। वो स्वयं ही मूर्ख है और स्वयं ही ज्ञानी होकर संसार को समझाता है। स्वयं ही स्वयं में समाया हुआ है। अर्थात शरीर भी स्वयं है और मन भी स्वयं है। स्थूल रूप में शरीर है और सूक्ष्म में मन है। सूक्ष्म मन हरेक शरीर में समाया हुआ है। स्वयं ही सुमिरन करता है; स्वयं ही जप, तप आदि स्थापित करता है। स्वर्ग और नरक में भी खुद ही वास करता है। यह बाजीगर की तरह अनेक तमाशे करता है। स्वयं ही खेल खेलता है और स्वयं ही उस खेल में भ्रमित होता है। सब जगह खुद ही समाया हुआ है। स्वयं ही मन रूप बनकर सबमें बैठा हुआ है और स्वयं ही अवतरित होकर संसार को अपना दूसरा रूप दिखाता है। यह विधाता ऐसा खेल खेलता है, जिसे कोई समझ नहीं पाता है।

कह रहे हैं कि जब ब्रह्म रूप जान लिया जाता है तो सब संसार अंत हो जाता है। आत्मज्ञान हो जाने पर सब कर्म, धर्म का नाश हो जाता है। फिर उसे खोजने के लिए कहीं आना-जाना नहीं है। तब सब धर्म समाप्त हो जाते हैं। तब कर्मों का भ्रम भी समाप्त हो जाता है और जीव एक नाम में ही विश्वास करता है। एक नाम को छोड़कर और कहीं नहीं जाता। वो तीर्थ, व्रत आदि कुछ नहीं मानता है। क्योंकि वो ब्रह्म (निरंजन) स्वयं ही तीर्थ है, स्वयं ही देवता है और स्वयं ही अपनी सेवा करने वाला है। स्वयं ही सबकी महिमा का बखान करता है और स्वयं ही दूसरों की निंदा करता है।

कह रहे हैं कि स्वयं ही युद्ध करवाकर देवताओं और राक्षसों का संहार करता है। इसी ने स्वयं ही पांडवों को ज्ञान सुनाकर महाभारत का युद्ध भी करवाया। यह स्वयं ही अहंकार रूप है; स्वयं ही राजा है और स्वयं ही प्रजा है। स्वयं ही चाकर बनकर सेवा करता है और स्वयं ही पंडित बनकर वेद पढ़ाता है। वेद और पुराण भी यह स्वयं ही है। स्वयं ही पोथी भी है और स्वयं ही उसमें से अपनी कथा कहता है। छः शास्त्र भी स्वयं ही है और स्वयं ही वाद-विवाद करके ज्ञान सुनाता है। स्वयं ही जीतता है और स्वयं ही हारता है। स्वयं ही तारता है और स्वयं ही तरता है।

कह रहे हैं कि जिस पर सद्गुरु की दया हो जाती है, वो ही सत्य शब्द को पाता है। जो अगम भेद को पा लेता है, वो जान जाता है कि सद्गुरु ही सत्य है, बाकी सब झूठ है। जो सद्गुरु की महिमा जान जाता है, वो सत्य लोक में पहुँच जाता है। हे धर्मदास! यही ज्ञान तुम आगे सबको देना। अगर किसी को झूठा ज्ञान दोगे तो वो सत्य-लोक में नहीं पहुँचेगा।

अगर अपने जीव का कल्याण करना चाहते हो तो जीवों को सत्य का ज्ञान देना। जो तुम्हारा शब्द सुनेगा, वो उस लोक में निवास कर लेगा। जिसके घट में सत्य शब्द होगा, वो संसार से प्रीत समाप्त करके, अमर काया को पाकर अमर-लोक में चला जाएगा। दूसरी ओर जो सद्गुरु की शरण में नहीं आएगा, उसका मानव-चोला रूपी मूल धन बेकार हो जायेगा।

जब मन कहँ परबोधहूँ, सकल भर्म मिट जाय।
एक नाम क हँ सेवहूँ, आवागमन मिट जाय।।

मन को जान लेने से सब भ्रम मिट जाते हैं। एक नाम का सुमिरन करने से आवागमन दूर हो जाता है।

साहिब ने कहा कि अब तुम्हें ज्ञान हुआ है। जब सार शब्द (सार नाम) पा लेता है तब सब कुछ धोखा, सब कुछ भ्रम मात्र लगता है। योग, यज्ञ, तप आदि सब धोखा है। दान, पुण्य आदि भी सब धोखा है। जितने भी कर्म संसार में किए जा रहे हैं, सब धोखा है। जितने भी ज्ञान हैं, वो भी सब धोखा है। शास्त्र, वेद, पुराण आदि भी सब धोखा है। ज्ञान सुनाना, समझना आदि भी धोखा है। जैसे सगुण है, वैसे ही निर्गुण भी है। दोनों धोखा है। जब दोनों मिट जायेंगे तो आदि ब्रह्म से परिचय हो जायेगा। साहिब आगे कह रहे हैं-

कह रहे हैं कि तुम्हें शब्द दिया है, वो तुम हंसों को देना। सार-शब्द के सुमिरन से सहज में ही अमर-लोक की प्राप्ति हो जाती है।

सुमिरन से सारे कर्म पल में कट जाते हैं, यम की त्रास मिट जाती है, दिव्य ज्ञान का प्रकाश आ जाता है, सारा धोखा मिट जाता है और जीव सहज में ही सत्य-लोक में चला जाता है। गुरु धोबी की तरह है, शिष्य कपड़े की तरह है और सुमिरन साबुन की तरह विकारों की सारी मैल को दूर करने वाला है। उससे हृदय में ज्ञान का प्रकाश हो जाता है और सारे कर्म, भ्रम मिट जाते हैं। ज्ञान रूपी दीपक का प्रकाश हो जाने से अज्ञान के अंधकार का नाश हो जाता है और जीव सत्यलोक में जाकर समा जाता है। वहाँ दूसरा भाव नहीं है, सब एक ही है। आगे कह रहे हैं-

कह रहे हैं कि काल-पुरुष ने पाँच तत्व का पिंजरा बनाया और स्वयं उसमें समा गया। इसमें मन राजा हुआ, जिसने जीव की बुद्धि को पकड़ लिया। यह स्वयं अपने रूप को नहीं जान पा रहा है, जिसके कारण आवागमन में आ गया है। वास्तव में न इसे कहीं आना है और न कहीं जाना है, पर मन के भ्रम से यह नाना शरीरों में जाकर जन्म-मरण के क्रम में बँध गया है। यह मन स्वयं ही ज्ञानी है, स्वयं ही मूर्ख है और स्वयं ही ब्रह्म रूप भी है। यह सारा पसारा मन का ही है। मन से ही पाप और पुण्य का विस्तार है। मन ही काम, मोह आदि उत्पन्न करता है और तृष्णा आदि विकारों को भी उत्पन्न करता है। पूज्य स्थल में भी मन ही है और पूजने वाला भी मन ही है। स्त्री और पुरुष दोनों मन ही जानो। मन ही बाप है और मन ही बेटा है; मन ही राजा है और मन ही प्रजा है। अर्थात यह सबमें समाया हुआ है।

यह मन बड़ी शातिर चीज़ है। कुछ कहते हैं कि सत्पुरुष की मालूम था, तरकालदर्शी था तो क्यों पैदा किया? आत्माएँ क्यों दीं? एक बेटा नालायक निकलता है, तभी भी बाप कुछ-न-कुछ दे ही देता है न! निरंजन को मिला क्या है? सत्यलोक इस ब्रह्माण्ड से अनृत्त गुणा बड़ा है। जैसे समुद्र से एक बूंद दे दी, वैसा ही है। फिर श्राप मिला है कि ध्यान नहीं कर सकता है। अगर ध्यान करता तो पूरी ताक़त ले लेनी थी। इसी कारण आप मेरा ध्यान नहीं कर पाते हैं। जिसका भी ध्यान चाहो, कर सकते हो, पर मेरा ध्यान नहीं कर पाओगे। यह बहुत बड़ा कौतुक है।

अलख पुरुष की आरसी, संतन केरी देह।
लखा जो चाहे अलख को, इनहीं में लख लेह।।

आप परम रोशन हैं। आपकी आत्मा जान रही है। मन को कुछ नहीं दिया है मैंने। जो दिया, आत्मा को टच किया है। आपकी आत्मा से संबंध किया है। क्या दिया, मन भी नहीं जानता है। मन विरोध कर सकता है।

मन को श्राप मिला कि ध्यान नहीं कर सकता है। इसलिए पूर एकाग्र हो जायेंगे, तब मैं मिलूँगा। मन से चाहोगे तो नहीं हो पायेगा, क्योंकि मन को वर्जित है। मन पकड़ भी नहीं पाएगा। जब एकाग्र हो जायेंगे, तब मैं मिलूँगा। यह कितना कौतुक है! आँखों में महापुरुष की आत्मा का वास है। वहाँ से रूह को कुछ मिलता है। आप बार-बार मेरे पास क्यों आते हो? वो चीज़ लाती है।

मन अशांत है। क्यों? क्योंकि उसने परम-पुरुष का आनंद अनुभव किया है। यह सुख चाह रहा है। सभी चाह रहे हैं। आप अंदर से शांत हैं। एक आलौकिक शांति है। यह बाकी में नहीं देख रहे हैं। मन के पास यह नहीं है। इसलिए दुनिया के लोगों के पास भी नहीं है। इसलिए मन सुख ढूँढ रहा है। यह पूरे ब्रह्मांड का नाश करके सतलोक के पास जाता है; कहता है कि द्वार खोलो और मुझे अंदर आने दो; अपनी आत्माएँ भी वापस ले लो पूरी; मुझे राज्य नहीं करना है। वहाँ से आवाज़ आती है-हे निरंजन! जाओ, तुमने 17 चौकड़ी असंख्य युग का राज्य माँगा; मैंने दिया। इसलिए जाओ और फिर से दुनिया बनाओ। तब तुम्हें राज्य करना-ही-करना है।

एक बार निरंजन ने कबीर साहिब से कहा कि मुझे भी दीक्षा कै दो। साहिब ने कहा कि नहीं, तुम्हें नहीं देनी है। तुम्हें दे दूँगा तो पूरा ब्रह्मांड खत्म हो जायेगा। क्योंकि तुम निर्मल हो जाओगे। निरंजन साहिब की बड़ी कद्र करता है। कहा कि जिस छल से तुमने जीवों को बाधा हुआ है, वो छल तुम फिर नाम लेने के बाद नहीं कर पाओगे। इसलिए फिर सारी आत्माएँ वापस अमर-लोक में चली जायेंगी। इसलिए तुम्हें नाम नहीं दूँगा।

अब निरंजन को यथार्थ आनंद नहीं मिल रहा है तो यह इंद्रियों से आनंद ले रहा है। पर आध्यात्मिक आनंद नहीं ले पा रहा है। साहिब ने यही तो सज़ा दी। यह बहुत बड़ी सज़ा है।

सुरति से गिराना ना, चाहे जो भी सजा देना।।

मन को नापने का पैमाना ही इंद्रियों से है। जितनी इंद्रियाँ काबू में होंगी, उतना ही मन नियंत्रण होगा। मन गुरु-सेवा में बाधक है। यह दुनिया का मंजा चाहता है।

दिलां दा मरहमी कोई न मिलया, जो मिलया सो गरजी।
कहैं कबीर आकाश फटा है, क्योंकर सीये दरजी।।

मन सुख चाहता है। यह तलाश में है। बिना आत्मा के सहयोग के कोई भी काम नहीं होने वाला है। इसलिए इसे बाधा है। फ। का

साहिब कह रहे हैं कि मन की बात कहाँ तक की जाए, यह सारा झूठा पसारा मन का ही है। यह ब्रह्म सब घट में समाया हुआ है, जो न कहीं आता है और न कहीं जाता है। मन ही वेद, पुराणों की कथा सुनाता है; मन ही शुभ घड़ी आदि का विचार करता है; मन ही योग, जप, तप आदि के भाव लाता है; मन ही यज्ञ, दान आदि कर्म करता है। जब सद्गुरु की प्राप्ति हो जाती है तो वो मन के सारे कर्म छुड़ा देता है।

कह रहे हैं कि जब तक घट में सत्य शब्द नहीं आता, जीव पाखण्ड में ही जीता है और पाखण्डी जीव की मुक्ति नहीं हो सकती है.....चाहे कितना ही उपाय क्यों न कर ले। जप, तप, ज्ञान, नियम, धर्म आदि में जीव लिपटा रहता है, इतना कष्ट सहता है, पर फिर भी पाखण्ड में उलझे होने से मुक्ति नहीं पाता है। दूसरी ओर जिसके घट में शब्द (नाम) आ जाता है, वो निर्वाण पद की प्राप्ति कर लेता है।

कह रहे हैं कि यह सार नाम स्वयं सत्य-पुरुष ही है, इसलिए बिना नाम के सब झूठ ही समझो। नाम के अलावा किसी को भी सत्य नहीं समझो। सगुण और निर्गुण दोनों को एक ही समझो। पर सत्य नाम निर्गुण और सगुण दोनों से न्यारा है। जो इस नाम को जान जाता है, वो हमारा जैसा ही हो जाता है। यह नाम कहने में नहीं आता है; बड़ा ही अद्भुत है। बिना सद्गुरु के इसकी थाह नहीं पाई जा सकती है।

धर्मदास जी विनती करते हुए साहिब से कह रहे हैं कि आपने दर्शन देकर मेरा जन्म सफल कर दिया। मुझे एक संशय है, सो बताओ। यह काल तो बड़ा ही कठिन है। जीते-जी इसका भेद पाकर ही जीव सतलोक में जा सकता है। पर जीते-जी इसका भेद पाया नहीं जाता। फिर जीव सतलोक कैसे जाए? बिना उस लोक के देखे शंका ही रहती है। इसलिए आप दया करें, जिससे मैं काल को पहचान सकूँ। बिना उसे जाने तो पार नहीं हुआ जा सकता है। यह संसार-सागर बड़ा कठिन है। काल के इसमें बड़े फंदे हैं; जीव कैसे छूट सकता है! मुझे इसके फंदे से छुड़ाओ, ताकि मैं आगे संसार में पंथ चला सकूँ।

साहिब ने तब धर्मदास से कहा कि जितने भी कर्म संसार में हैं, सब काल का व्यवहार है। जितने भी 10 अवतार हुए, सबको काल ने छल लिया, सबको मसल दिया। मीन, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बौद्ध, म्लेच्छ आदि सब काल के गाल में समा गये। काल का भेद किसी ने नहीं पाया। काल के वश में होकर ही योगी जागता है; काल के कष्ट सुनकर ही साधु वियोगी होकर फिरता है; काल के वश में होकर ही मनुष्य पाप करता है; काल के वश होकर ही पुण्य भी करता है; चारों युग काल के वश में हैं; काल के वश में होकर ही मनुष्य भक्ति भी करता है। हे धर्मदास! काल का भेद कोई नहीं जानता है। यह काल अलख निरंजन है, जो गुप्त होकर मन रूप में सबके साथ रह रहा है।

जब मन शब्द (सार नाम) में स्थिर हो जाता है तो काल का बस नहीं चल पाता है। वो कुछ नहीं कर पाता है।

जब साधक पूर्ण एकाग्र होकर सत्य शब्द में स्थिर हो जाता है। तब काल से छट जाता है। उसी सत्य शब्द से काल डरता है, अन्यथा कितने भी उपाय कर लो, कितने भी शब्दों की या पाँच मुद्राओं की भी साधना कर लो। यह काल नहीं छोड़ता है। 25

इस नाम के बारे में कहा नहीं जा सकता है। जब ज्ञान आ जाता है तो स्वयं समझ आ जाती है। तब अंदर में प्रकाश हो जाता है। और काल का अँधकार मिट जाता है। जब गुरु की प्राप्ति हो जाती है, तो आनंद मिलता है। तब संसार स्वप्नवत् लगने लगता है; तब ऊँच-नीच का भेद मिट जाता है। जब सतगुरु की दया हो जाती है तो सत्य और असत्य का भेद भी मिट जाता है और नाम में समा जाता है।

जब आत्मा अमर-लोक में जाती है तो यह नहीं लगता है कि निराला है परम-पुरुष। लगता है कि यह तो अपना ही घर है; मैं यहीं रहता था। आपकी आत्मा परम-पुरुष को जानती है। सिर्फ विस्मृति आ गयी है। वासुदेव ने अर्जुन से कहा कि मैंने यह कथा तुमसे पहले सूर्य की सुनाई थी, फलाने ऋषि को भी सुनाई थी। तब अर्जुन ने कहा कि आप तो इस युग में हुए हैं जबकि सूर्य तो पुरातनकाल से हैं, फलाना ऋषि तो त्रेतायुग में हुआ था। तब वासुदेव ने कहा कि तेरे और मेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं, पर अंतर यह है कि तुम्हें वो सब याद नहीं हैं जबकि मुझे वो सब याद हैं।

पारस सरति संत के पासा।।

सद्गुरु ने शरीर को, मन को कुछ नहीं दिया, सुरति को दिया। शायद आपका मन भी समझ न पाए कि क्या दिया, पर आप बदल जायेंगे। यह प्रक्रिया है--नाम-दान।

सतगुरु मोर अंगरे, चनरे मोरी रंग डारी।।

इस तरह मुक्ति भी दिलाई। इसलिए गुरु के समान कोई दाता नहीं है। आप माता-पिता को शारीरिक तौर पर हितैषी मान रहे हैं। पर गुरु का रिश्ता उस लोक तक भी है। वो नाम देकर काल से सुरक्षित कर देता है। यह है-- भवसागर से पार उतरना। वो निर्मल हो जाता है।

नाम तेरे प्रताप के भये आन के आन।।

मैं जो भी बात करता हूँ, सही होती है। झूठ से सावधान हूँ। 1 माँस खाने से सेहत ख़त्म हो जाती है, झूठ बोलने से अक्ल ख़त्म हो जाती है। झूठे लोग अपने में ही उलझे रहते हैं। उनकी बातों में एक बात नहीं होती है। यहाँ पर जो पाबंदियाँ हैं, नानी का दूध याद आ जाता है। साहिब के मार्ग में आना कोई बच्चों का खेल नहीं है। मेरा आदमी नाम लेकर झिझकेगा, भयभीत हो जायेगा।

सतगुरु सत्य नाम पाए बिना मनुष्य तन अँधकार से भरा है। अज्ञान रूपी अंधकार में रहकर ही मानव भी बार-बार काल का आहार बनता है। सद्गुरु को मनुष्य तन पाकर मूल नाम को ग्रहण कर लेते हैं, वे ही सद्गुरु कृपा से क्षय पाते हैं। सार-शब्द को सुरति और निरति में समाकर एकाग्र होने पर परमपुरुष का दर्शन होती है। अगम सार-तत्व को श्वास से मथकर अधर में स्थिर करने पर निरति रूप सत्यकबीर कहा गया है। इसीप्रकार निरति में शब्द धारण की आशा लिए सुरति में नाम ग्रहण करना अनिवार्य है। सुरति और निरति से नेह बाँधने से नाम प्रकट होकर विदेह हंस रूप हो जाओगे। इसे को साहिब ने गुरु का शिष्य में समाना और शिष्य का गुरु में समाकर एक होना कहा है।

सूरति का काया में द्वार और आत्म-तत्व का स्थान बताते हुए अगम भेद पाने की प्रक्रिया साहिब ने समझाई है श्वास को नासिका के दाहिने तरफ अथोात चन्द्रद्वार से ऊपर ले जाना और वापस लाना लाना सुरति बैठाना है। नासिका के दोनों स्वरों को साधकर अथ्थात एक घाट चन्द्र द्वार से ऊपर ले जाओ। नासिका का दाहिना घाट ही चन्द्र का वास है। बायीं तरफ सूर्य का प्रकाश है। यही दोनों स्वर साधकर चन्द्र द्वार से ही बाहर निकालें। इसी सुरति संयोग से नासिका की नाल पर चित्त रखें। इसीप्रकार चन्द्र द्वार से आना-जाना रखकर सद्गुरु शब्द को सुरति में समाये रहो। सुरति को दाहिनी स्वर से ही ऊपर चढ़ाओ तब ही शब्द की डोर पकड़ में आएगी। शब्द डोर पकड़ कर ही अगम पथ (अधर) में जाकर बैठो। इसी प्रकार से यम का फांस कटेगा और परमपुरुष लोक पाकर चौरासी से मुक्ति मिलेगी। दाहिने स्वर से आना-जाना करके ही सोहं सुरति अगुवाई करेगी। सुरति से आत्म-तत्व को मथकर अधर में वास करने पर साहिब सद्गुरु आगे निजधाम को ले जाते हैं।

अमर तत्व (आत्मा) जो साहिब का ही अंश है, उसी तत्व को सद्गुरु शब्द के साथ सुरति से मथकर भवजल पार उतरो।

सुरति से आत्म-तत्व देखने की विधि बताते हुए साहिब ने वर्णन किया है। दोनों नेत्रों के मध्य त्रिकुटी जिसे तीसरा तिल या तीसरा नेत्र स्थान भी कहा गया है वहीं आत्म-तत्व की वास है। दाहना स्वर साधकर 3सा त्रिकुटी स्थान से श्वास को आकाश की ओर चढ़ाओ। त्रिकुटी के मध्य स्थित आत्म-तत्व को सुरति से देखते हुए इसे ही मथकर ऊपर को चढ़ी।ुरति डोर से बार-बार जोड़कर तत्व को मथकर चलाने से ऊपर का कपाट खुलेगा। कपाट से ऊपर ही सुमेरू है जो आकाश का द्वार है। इसी द्वार से सुरति को ऊपर ले जाने पर अगम का भेद पाओगे। त्रिकुटी के आगे ससरू ठिकांने पर ही आकाश का मार्ग जुड़ा है। सुमेरू से चार आँगुंल आगे है धर्मदास यही तुम निज करके जानो।

आगे आकाश का वर्णन करते हुए साहिब समझाते हैं। सुमेरू से सुरति कमल आगे स्वयं को ही देख लेता है अथवा प्राप्त हो जाता है। स्वर से ऊपर जाने पर निरंजन (धर्मराय) का स्थान है। दाहिना स्वर सुरति का द है।पुरति कमल जब सुमेरू से आगे बढ़ती है वहीं से उसे विहंगम डोर मिल जाती है। सरति कमल का रूप एक चन्द्र आभा जैसा है। इसी कमल में तत्व की झलक मिलती है और सूरति वहीं चढ़ाकर आनंद की अनुभूति होती है। वहाँ सद्गुरु शब्द की डोर सुरति के संयोग से चढ़कर देखो। जिस नाल से सुरति जाती है वह नाल सुषुम्ना बहुत टेढ़ीं और कठोर है, मध्य ललाट (कपाट) में धर्मराय (निरंजन) ही उसका रखवाला है। इसी नाल में दाहिने कमल को सुरति पाती है फिर उसके आगे का पुनः ध्यान लगाती है। यही आगे का ध्यान सुरुति-कमल का लेखा स्थान है। फिर तो सुरति बिना आँखों के ही आत्म तत्व को देख लेती है। नाल के कमल स्थान का भेद बताते हुए साहिब कहते हैं कि वहाँ सुई की नोक के आकार का द्वार बना है। उसी द्वार के तिल प्रमाण का वहाँ दरवाजा खुलता है। इसी तिल के दरवाजे पर दो घाट हैं। सोहं सुरति से बड़े संभाल कर चढ़ने पर उस तिल का दरवाजा खुलता है। नासिका की उसी नाल में सुरति से शब्द को पकड़ कर किवाड़ के बाहर निकलते हैं। सुरति कमल के पॅँखुड़ी रूप द्वार तिल को जानकर सुर्ति को उसी में समाना है। वहीं सुरति को अपनी पहचान मिलती है। कबीर साहिब ने समझाया है धर्मदास! सद्गुरु को साथ लिये बिना इस भेद को नहीं पाया जा सकता है, यह निश्चित जानो।

सूरति कमल के आगे बताते हुए कह रहे हैं कि तुम से कुछ भी गोपनीय नहीं रखा है। सुरति कमल से निकल कर आगे चित्त में गहराई से विहंगम डोर पकड़ो। यह विहंगम डोर दाहिनी दिशा की तरफ हैं जिसका भेद तुम्हें समझाकर कहता हूँ। सुरति कमल के एक योजन आगे अक्षय वृक्ष की अवर्णनीय, सुवास है। दवन मरुआ गुलाब चमेली बेल के वास-सुवास से युक्त प्रकाश है। इस प्रकाश में ही वो सुवास समाई है।

अक्षय वृक्ष के अंगों में केवल श्वेत स्वरूप रंग ही दिखेगा। इस सफेद स्वरूप प्रकाश के रंग का अर्थ ही अगम भेद है ऐसे अद्भुत प्रकाश क जो कोई देख लेता है वह रोगों और मृत्यु से मुक्त हो जाता है। विहंगम डा उसी श्वेत प्रकाश से आकार अ-कल में अथ्थात कभी खत्म न होने वाले आज की कला में समाई है। वहाँ पर ध्वनि भी घोर झींगुर शब्द गुँजार जैसी होती है। इसी शब्द गुँज के दाहिने स्वर पर विहंगम डोरि का स्थान है। यही मेरा निज भेद तुम्हें बताता हूँ। वहाँ अर्ध कमल उपरि मुखी है मूल शब्द उच्चारित होता है। यह मूल शब्द काल रहित रहकर गुंजायमान होकर मृूल शब्द को सुरति रखकर ही उस शब्द को ग्रहण किया जा सकता है। यही मूल शब्द मैंने तुम्हें दिया है उसी की डोर पकड़ कर आगे जाना है। विहंगम डोरि तो मूल शब्द में ही है झींगुर ध्वनि उठते ही तुम धन्य होकर जागोगे । वह नित्य (अकल) कमल का स्वरूप ही श्वेत है, मी की ज्योति को रूप रहित कहता हैं। अकल कमल में छत्तीस पॅँखुड़ी जिनमें झिलमिलाते मोतियों का वर्णन नहीं किया जा सकता। इन्हीं मोतियों युक्त पँखुड़ियों से चारों दिशाओं में ज्योत की चमक फैल रही है। छत्तीस पँखुड़ी के प्रत्येक मुख विस्तार से स्वत: राग उचार हो रहा है। उसी कमल के भीतर की लाल आभा उठकर चमकती है। इस आभा का प्रकाश दीपक के समान होता है जो सुरति के प्रेम से प्राप्त होता है। कमल के भीतर की का वर्णन नहीं किया जा सकता है, तुम्हें उस अलख का दर्शन ही होगा। कमल के भीतर जो प्रकाश हो रहा है वहीं मूल-शब्द की झंकार होती है। इसी कमल के भीतर मोती-हीरा-लाल-जवाहरों के प्रकाश रूपों में कबीर का सत्य मिलेगा। वहीं मोतियों की झालर ऊपर सजी हैं जहाँ भीतर मूल शब्द स्थित है। अक्षय कमल रूपी वृक्ष का ठिकाना मुकर तार ही है जिसमें गुप्त कमल प्राप्त होने का निदान है। उस गुप्त कमल की आभा वण्णनातीत है जिसमें साठ सूर्यों का प्रकाश है। उस कमल के ऐसे अद्भुत प्रकाश का मर्म नहीं जाना जा सकता है। अरिष्ट कमल का भेद न्यारा है जिसमें पहुँचकर समस्त प्रकाश देखोगे। उसी स्थान का सुरति से ध्यान करके उसमें गुप्त होकर समाना है। ऐसे जो उस गुप्त स्थान में समाकर बैठता है उसी को आत्म रूप दिखाई देगा। वहाँ अनगिनत सूर्य कमल प्रकाश है वहीं नि:अक्षर सत्य का वास है।

अरिष्ट कमुल और अकह कमल दोनों के मुख जुड़ने पर मूल शब्दू की घोर ध्वनि की गँज का अनुभव होगा। यहीं मूल शब्द की गुँजार और संकार सुनाई देगी। यही निज सुमिरन और अजपा जाप है। अपने ही लोक पहुँच कर कोई संताप शेष नहीं रहता। वहाँ अमृत की धार ही बरसती है, सुरति नाल में यही आहार है। जीवित रहते ही साधक अपने मूल में समाकर आत्मस्वरूप को पा जाता है। यही सद्गुरु कृपा है।

परमपुरुष जो विदेह है उसी के नि:अक्षर शब्द रूप से सत्यलोक है। वही गुप्त नाम है। इसी का छाया रूप सृष्टि, पंच तत्व त्रिलोक विस्तार है। गुप्त सार शब्द में अमरलोक समाया हुआ है। सद्गुरु से गुप्त नाम पाकर ही निःअक्षर की जानकारी होने पर शिष्य सत्यलोक पहुँचता है। सद्गुरु की दया कृपा से कोई जीवित रहते भी सारशब्द पर बैठकर सत्यलोक पहुँच सकता है। उसी अमर शब्द से सब प्राणी बने हैं और परम शब्द से निज लोक मिलता है। सदगुरु से गुप्त सार नाम ही निजलोक का परमिट है। यही मूल नाम हंसों को उबारने वाला है। बोलने में नहीं आने वाले नाम अक्षर से ही तुम नि:अक्षर में समाओगे। जो इस निःअक्षर नाम को धारण कर लेता है वह सदगुरु का हो जाता है।

सत्गुरु शब्द को चित्त में रखकर सब भ्रम छूट जाते हैं। मन ने भ्रम के परदे से ढक रखा है। इसलिए हम सब मेरे-तेरे के मोह से बँधे हैं। जब सत्यनाम की चौकी बैठ जाती है तो इन भ्रमों से छुटकारा मिल जाता है। इसलिए सद्गुरु "नाम" रूपी टिकिट लेने का बखान करते हैं। भक्ति ज्ञान ही नाम का सूखा है। बिना नाम के कोई भी भवसागर से पार नहीं उतर सकता। कोई भी नाम को धारण किये बिना साधु नहीं हो सकता है। कोई कितना भी वेद पुराण और विद्या पढ़ ले अमर नाम के बिना कुछ भी प्रमाण नहीं है। इसका प्रमाण देते हुए साहिब ने कहा है - कि पवन योग साधकर योगेश्वर गोरखनाथ का आवागमन नष्ट नहीं हो सका। नाम का ज्ञान नहीं होने से उन्हें मरकर भवसागर में आना-जाना पड़ा। योगेश्वर व्यास देवर जी ज्योतिष के सिरमोर बने, लगन शोधकर पल क्षण का विचार किया। उन्होंने भी अमर नाम को चित्त में धारण नहीं किया और सम्पूर्ण लग्न-मूहूर्त को जीवन का सार मान लिया। इन सब भ्रमों को नष्ट करने वाले सद्गुरु के मिलने से ही अपना निजधाम मिलता है। आत्मा को अमरलोक पाने का अन्य कोई मार्ग नहीं है।

केवल सद्गुरु ही सार-शब्द देकर जीव को भव बंधन से छुड़ाते हैं। इस जगत के जीवों की मुक्ति की चिंता बस सद्गुरु ही करते हैं। देवी-देवता तो मन की कामनाओं और इच्छाओं की पूर्ति के संकल्प-विकल्प की पूजा भक्ति हेतु मन के ही रूप हैं जगत की पीड़ा देखकर सद्गुरु के आँसू भी निकल पड़ते हैं। जगत के भ्रमों में फँसा जीव मनुष्य तन पाकर भी सद्गुरु से मिलन की चाह में नहीं रोता है। कोई-कोई सत्यनाम का खोजी और शब्द विवेकी ही सद्गुरु की चाह में बेचैन होता है। मन तो सत्यनाम से सद्गुरु शब्द से सदा ही दूर करता है। मन सुरत् को खींचकर सतत स्मृतियों में ले जाता है नाम ध्यान में लगने ही नहीं देगा। शिष्य समस्त संद्कम करते हुए सुरत को सदगुरु नाम के स्मरण लगाये रखे तभी मन से बुच सकता है। जीवन कर्म छोड़ने को सदगुरु नहीं कहते हैं। चलते-फिरते और यात्रा में रहकर भी सुरत के ध्यान में रहें। कर्म करते हुए सद्गुरु ध्यान में रहे तो यह शिकायत नहीं रहेगी कि मन से कैसे दूर रहें। सही तो मन की तरंगों को मारना है, यही भजन है।

मनुष्य के पास सब कर्म करने को समय है, बस भजन के लिए समय नहीं है। खुद तो मन की तरंग में रहना चाहते हैं और चाहते हैं कि भजन भी गुरु ही कर ले। मन यही तो करने को विवश कर रहा हैं, भटका रहा है। मन को बड़े-बड़े ऋषि-मुनि-अवतार भी वश में नहीं कर सके। केवल युग पुरुष होकर जीवन-मरण के चक्र में रहे। हमें मन को झिड़क, सावधान होकर सुरत में सद्गुरु छवि के साथ रहना होगा। इसलिए कहता हूँ -

मन की तरंग मार ले, हो गया भजन,
आदत बुरी सुधार ले बस हो गया भजन।
आया है तू कहाँ से, जाना है कहाँ,
इतना सा बस विचार ले, तो हो गया भजन

जीवन कर्म में इतनी सी सावधानी हो तो मुक्ति का मार्ग है। यदि चौबीसों घण्टे मन की तरंग से सावधान रहकर सुरत और सद्गुरु स्मरण में रहना आ गया तो समझ लो भजन हो गया। अलग से कोई समय निर्धारित करने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। यदि लगातार मन की तरंग को नहीं मन की तरंग मार ले, हो गया भजन। आदत बुरी सुधार ले, बस हो गया भजन। आया है तू कहाँ से, जाना है कहाँ। इतना सा बस विचार ले, तो हो गया भजन। जीवन कर्म में इतनी सी सावधानी हो तो भक्ति का मार्ग है। यदि चौबीसों घण्टे मन की तरंग से सावधान रहकर सुरत और सद्गुरु स्मरण में रहना आ गया तो समझ लो भजन हो गया। अलग से कोई समय निर्ध्रित करने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। यदि लगातार मन की तरंग को नहीं मारा तो कितना भी समय निर्धारित कर ध्यान में बैठें, कोई लाभ नहीं होगा। आदत बनाना होगा, आदत सुधारनी होगी तो स्वतः भजन होने लगेगा। सूरत में सदगुरु की छवि को निहारने की आदत से ही सतत् भजन होगा; फिर मन का वश नहीं चलेगा। यही मोक्ष का मार्ग है जो अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगा।

मन माया की इस सृष्टि में तीनों लोकों में आत्मा की मुक्ति नहीं है। हमारा मूल धाम कहाँ है, हम कहाँ से आये हैं। हमें कहाँ जाना है। मन के लोकों में रहना या मोक्ष पाकर आवागमन से मुक्ति पाना है, इतना विचार लो तो भजन हो जावेगा। आदत में आया यही विचार अंतिम स्वाँसा के साथ रहेगा।

मन (इच्छा), बुद्धि, चित्त और अहँकार (कर्म) तो मन के रूप हैं। इसलिए इनसे तीन लोकों के स्वामी मन की ही पूजा होगी। मन संसार के अनेकों ठिकानों पर ले जाकर उसकी ही पूजा भक्ति कराता रहेगा। अतः मन को सद्गुरु शरण में बाँधकर सूरत सथिर करना ही भजन हैं। त्रिलोकी नाथ मन को आठों पहर विचार में रखना होगा तभी भक्ति मार्ग पर सफलता मिलेगी। इसके लिए सद्गुरु शब्द का पालन करना अनिवार्य है। मन मुख नहीं, गुरुमुख बनना होगा।

हमारे पिण्ड में जितनी भी शक्तियाँ हैं, काल निरंजन से जुड़ी हैं। मन-बुद्धि-चित्त और अहँकार से युक्त देह, आत्म-शक्तियों को जकड़े हुए है। सद्गुरु द्वारा दिये गये मूलनाम की चाबी से ही यह दिव्य शक्तियाँ से ऊपर अध्यात्मक शक्तियाँ खुलती हैं। मन, पवन-रूप में साँसों में समाया हुआ है। यह साँसें ही निरत हैं जिन्हें अष्टम चक्र में बाँधकर सद्गुरु सुरत को नाम की शक्ति से जाग्रत करते हैं। इस प्राण रूपी निरत को (साँसों) ध्यान में लगाकर एक करने पर ही मन-पवन को बस में किया जा सकता है। सप्तम चक्र तक कहीं भी ध्यान है तो वह काल के भीतर ही रहेगा। निरत को सदगुरु के ध्यान में लगाकर सुरत को पाया जाता है। मन-बुद्धि-चित्त-अहँकार में तात्विक भिन्नता नहीं है इसलिए संसार में कोई बुद्धिमान नहीं है। सभी मन के शिकंजे में हैं। ब्रह्मा-विष्णु-महेश-देव-ऋषि-मुनि भी काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहँकार के शिकंजे में आते हैं। अच्छे-बुरे और पाप-पुण्य के कर्म मन की प्रेरणा से ही होते हैं। केवल यह मान लेने से मैं आत्मा हूँ, धर्मज्ञान नहीं है।

स्वाँस और सुरति के मध्य में ही परमात्म है। कबीर साहिब ने यही चेताया कि स्वाँस-स्वाँस में प्रभु का सुमिरन कर लो, स्वाँसों को व्यर्थ न गँवाओ। इन स्वाँसों का कोई भरोसा नहीं है कब अंतिम स्वाँस हो जाए। स्वाँस का आना-जाना किस पल से हो कि नहीं हो, कब रूक जाए कुछ पता नहीं है। यह जीवन साँसों पर निर्भर है। एक-एक साँस अनमोल है, तीन लोकों का मोल हर साँस का है। इन स्वाँसों को साध कर आत्मा को पाया जा सकता है। मन रूपी निरंजन स्वाँसों को सुरत में समाने से रोकता है, यह खाली जा रही है।

स्वाँस स्वाँस प्रभु सुमिरले, वृथा स्वाँस न खोय।
ना जाने किस स्वाँस में आवन होय न होय।।

कहता हूँ कही जात हूँ, कहूँ बजाय ढोल।
स्वाँसा खाली जात है तीन लोक का मोल।।

फिर कह रहे हैं - स्वाँसों को सुरत में लगाकर ही मन रूपी पवन को देरकर उलटा चलाया जा सकता है। इसप्रकार स्वाँस पवन को शीश से सवा हाथ ऊपर अधर में ले जाकर ध्यान से जन्म-मरण के भ्रम का ज्ञान होगा। इसी क्रिया से देह रूप पिण्ड में ब्रह्माण्ड का खेल दिखेगा और जगत का भ्रम टूटेगा। शीश और अधर के बीच सुरत में स्वाँसा से ध्यान करने पर देह में भी आकाश के समान ही लगेगा। इसी से सुषुम्ना नाड़ी रूपी डोर पलटकर अधर में ले जावेगी। यही पवन को पलटकर शून्य में घर करना है। साहिब ने चेताया - कि स्वाँसा-पवन रूप मन को स्वयं की साधना चेष्टा से अधर-सुरत में रोकना सम्भव नहीं है। पूरे गुरु अर्थात सद्गुरु के नाम की कृपा से ही स्वाँसों को सुरति के साथ जोड़ा जा सकता है।

खेल ब्रह्माण्ड का पिण्ड में देखिया, जगत की भरमना दूर भागी।
बाहरा भीतरा एक आकाशवत, सुपुप्ना डोर तहाँ पलट लागी।।

पवन को पलटकर शुन्य में घर किया, धर में अधर भरपूर देखा।।
कहे कबीर गुरु पूरे की मेहर से, त्रिकुटी मध्य दीदार देखा।।

बिना सद्गुरु के कुछ भी नहीं हो सकेगा। हृदय कभी गुरु की ताकत के बिना प्रकाशित नहीं हो सकता। गोस्वामी तुलसीदास ने भी रामायण में गुरु की इसी महिमा को कहा:

गुरु बिन भव निधि तरई न कोई।
विरंचि शंकर सम होई।।

ब्रह्म राम ते नाम बड़, वरदायक वरदानि।
रामचरित सतकोटि में, लिया महेश जिय जान।।

आमजन ही नहीं, धर्म और धर्म ग्रंथों में रुचि रखने वाले सत्संगी भक्तों ने भी यह समझ लिया कि किसी भी पंथ-धर्म के ज्ञाता को गुरु मान लो। किसी भी परलोकवासी सिद्धपुरुष को गुरु रूप में पूजने लगे और मुक्तदाता मान लिया। संतों की वाणी, गीता, रामायण आदि शास्त्रों में वर्णित गुरु महिमा को समझा ही नहीं गया। भक्ति क्षेत्र में भी पीठों और गद्दियों पर विराजित और शास्त्र-प्रवचनकर्ताओं ने भोले-भाले जनमानस को छला है। गुरु बनने वाले और गुरु-दीक्षा लेने वाले दोनों ने ही पूर्ण सद्गुरु की महत्ता या गुण तत्वों को धर्म से हटा दिया। शास्त्रों के अवतार चरित्रों का तर्कपूर्ण, संगीतमय बखान और मंचों पर लीलाओं को प्रदर्शित करने वाले गुरुओं को संत व सद्गुरु माना जाने लगा है। कबीर साहिब से पहले किसी भी वेद, शास्त्र व ग्रंथ आदि में संत और सद्गुरु शब्द ही नहीं था। वेद-गीता-रामायण में वर्णित सद्गुरु या पूर्ण गुरु जो परमपुरुष या परमतत्व में समाया हो, को विसरा दिया गया है। मन-आत्मा-प्राण-स्वाँसा-देह-ब्रह्माण्ड और मोक्ष के आध्यात्मिक ज्ञान के बजाय मनुष्यों को बाहरी आडंबरों की पूजा भक्तियों के ज्ञान में उलझा दिया गया है। निज आत्म स्वरूप के ज्ञान से वंचित कर आम गुरुओं ने मनुष्यों को शरीर के जीवन-मरण-भोग-कर्म और कर्मफलों के धर्म तक सीमित कर दिया है।

आज कोई भी राम-भक्त, गोस्वामी तुलसीदास के इस तत्व ज्ञान का सत्संगी नहीं है कि ब्रह्मा और शिव-शंकर के समान होने पर भी पूर्ण गुरु के बिना कोई भवसागर के पार नहीं होगा। कोई भी कबीर साहिब के इस सद्गुरु ज्ञान का सत्संगी नहीं बनना चाहता है कि पूर्ण गुरु की दया-कृपा के बिना आत्म ज्ञान नहीं होगा। एक पूर्ण गुरु की शरण में स्वाँसा (निरत) और सुरति (आत्मा) के अंतर-जोड़ को जाने बिना परमात्मा को नहीं जानेगा। साहिब ने कहा—

स्वाँस सुरति के मध्य में कबहूँ न न्यारा होय। ऐसा साक्षी रूप है, सुरति निरति से जोय॥

स्वाँस और सुरत को जोड़ने से ही परमात्म दर्शन होगा। सद्गुरु कोई धातु की मूर्ति नहीं, वह तो साकार-निराकार से परे स्वाँस-सुरत के मध्य साक्षात् है। सद्गुरु के नेत्रों में परमात्म ऊर्जा है, उनके नेत्रों के ध्यान से ही भक्त की त्रिकुटी में आत्मा जाग्रत होगी। इसलिए साँस और सुरति के मध्य सद्गुरु नयनों को लाने का योग करना ही एकाग्र भक्ति का मंत्र है। इसी एकाग्र ध्यान से मन की चंचलता या मन की तरंगों को वश में करना साध्य है। अन्य किसी भी प्रकार की भक्ति या ध्यान से मन कभी भी वश में नहीं आएगा। आत्म-प्रकाश का सृजन किसी काल्पनिक मूर्ति से संभव नहीं है। सद्गुरु जिस गुप्त मूल नाम को दीक्षा द्वारा देकर जाग्रत करता है, वही सद्गुरु के ध्यान से आत्मरूप में मिलता है। यज्ञ-व्रत-तप-तीर्थ-सन्यास और योग भक्ति से सद्गुरु भक्ति सरल है, सत्य है। प्रत्येक गृहस्थ भी सद्गुरु शब्द और नियमों का पालन करके मोक्ष पाने का अधिकारी हो जाता है। इसके विपरीत कठिन तपस्या के लिए सन्यासी बनकर गृह त्याग कर भी कोई मन के बंधनों से मुक्त नहीं होता। साहिब ने यही चेताया।

ऐसी आत्मा जो पंच तत्व रहित है, अभौतिक है, अनश्वर है, चैतन्य रूप है, दोष रहित है, कैसे शरीरों में बँधी, किसने बाँधा है? यह पक्का है कि यह संसार काल का देश है। आत्मा यहाँ बड़े क्रूर बंधनों में है। इसीलिए आत्मा अपने गुण-स्वभाव के विपरीत होने से असंतुष्ट है। जो कुछ दुनिया में हो रहा है वह सब अनित्य है। सभी भूल-भुलैया में हैं। इतना बुद्धिजीवी मनुष्य इस पहलू को नहीं समझ पा रहा है। बंधनों को भलीभाँति नहीं देख-समझ पा रहा है कोई भी।

प्रत्येक देह में रहने वाली आत्मा ही परमपुरुष का रूप है। सत्यनाम के सुमिरन और सद्गुरु कृपा से ही आत्म स्वरूप मिलेगा।

सुमिरन से सुख होत है, सुमिरन से दुःख जाये। कहे कबीर सुमिरन किये, साई माहिं समाये॥

देह में मन ने आत्मा को जकड़ा है। साहिब ने कहा—हे निरंजन! जिसको मैं नाम दूँगा तेरी सब ताकत धरी रह जाएगी। नाम के बाद क्रिया से शक्ति का अनुभव होता है जो आप नाम-दीक्षा के समय नहीं थे। नाम के समय सबसे मुख्य चीज़ यह थी कि आपको होश में कर दिया। नाम के बाद दिन-प्रतिदिन मजबूती आएगी। आप जगत से न्यारे लगने लगेंगे। साहिब ने यही कहा—

मन ही निरंजन सबै नचाई। नाम होय तो माथ नवाई॥ काग पलट हँसा कर दीना। ऐसा पुरुष नाम मैं दीना॥

नाम के बाद आप में ऋद्धि-सिद्धि शक्तियाँ भी हैं। आप सक्षम हो चुके हैं, बस सदा सतर्क रहना। निरंजन ने साहिब से कहा है कि मैं भी सत्यलोक वाली बातें बोलूँगा। साहिब ने निरंजन से कहा—मेरे नामी पर तेरा जोर नहीं चलेगा। सत्यनाम पाए बिना आत्मा अनात्म कर्म कर रही है। दुःख क्या है? आत्मा शरीर के धर्म का पालन कर रही है, मन के वश होकर। मनुष्य सुख की प्राप्ति और दुःख की निवृत्ति के लिए कर्म कर रहा है। संसार में शुभ और अशुभ दो ही कर्म हैं, दोनों बंधनकारक हैं। जीवन पच-पच्चीसी लागी। ठगी, कत्ल, व्यभिचार, सांसारिक काम शरीर के हैं। विविध प्रकार के कर्म मनुष्य शरीर के सुख के लिए कर रहा है। इन भौतिक कर्मों से सुख नहीं मिलने वाला है। कोई सुख स्थायी नहीं है। युवा सोचते हैं कि आगे सुख मिलेगा, बूढ़े अतीत को याद करके दुःखी हैं।

कहे कबीर सुनो भाई साधो, रूई लपेटी आग है। यह संसार झाड़ और झंखड़, उलझ-पुलझ मर जाना। यह संसार नाव कागज की, बूंद पड़े गल जाना। रहना नहीं देस बिराना है॥

देह का रोम-रोम मन की आज्ञा में है। मन का बहाव ही भौतिकता की तरफ है, आत्मा की तरफ नहीं जाने देगा। आत्मा तो संकल्प-विकल्प से रहित है। मन ही पहले संकल्प करता है, वही बुद्धि रूप में निर्णय करता है। मन ही चित्त रूप में वस्तु-स्थल-दृश्य बतलाता है, फिर वही कार्य रूप में अहंकार है। आत्मा में संकल्प-विकल्प नहीं हैं। मनुष्य की काया का नक्शा कहाँ से मिला? शरीर निरंजन की शक्ल पर बना है। शरीर के कारण आत्मा मुँह, आँखें, कान, नाक, हाथ-पैर आदि सभी हिस्सों को अपना महसूस करती है। फिर भी आत्मा मनातीत, व्योमातीत कैसे है? आत्मा की हमारे जैसी भौतिक इंद्रियाँ नहीं हैं, वह निःतत्व है। निरंजन ने शरीर अपनी ही नकल पर बनाया है। शरीर माया का है, उसके अंदर आत्मशक्ति है। शरीर का जलवा या नूर ही आत्मा से है। शरीरों में रहते-रहते आत्मा अपने आप को भूल गई है। शरीर का संचालन मन कर रहा है, आत्मा कुली की तरह ढोने लगी है। आत्मा को जानने से बड़ा कोई काम और कोई ज्ञान नहीं है। आत्मा के ज्ञान के लिए कार्य करना ही प्राथमिक कर्तव्य है।

गरुड़ पुराण में आत्मज्ञान की बात है। आत्मा शरीर छोड़ने के बाद भी शरीर की तलाश में रहती है, इसलिए घर में गरुड़ पुराण कराते हैं। मृत शरीर को जलाकर नष्ट करने और अस्थियों को गंगा आदि पुण्य नदियों में इसीलिए विसर्जित किया जाता है। फिर आत्मा को यह ज्ञान दिया जाता है कि अब छोड़ा हुआ शरीर शेष नहीं है। यही ज्ञान समझाते हुए कागभुसुण्डि जी ने कहा—

सुनो तात यह अकथ कहानी। समझत बने न जाय बखानी॥

आत्मा ने खुद को शरीर मान लिया है, भ्रम की गाँठ है। मन शातिर है, वायु-तत्व, स्वाँसा में आत्मा की शक्ति को कैद कर शरीर संचालन कर रहा है। इसी स्वाँसा को साधकर सुरत से अधर में जोड़कर मन को निर्बल बनाना है। नाम की प्रक्रिया से सद्गुरु अपने शिष्य को मन से दूर करने की यही शक्ति प्रदान करते हैं।

अपने हृदय को दर्पण बनाकर जब सभी दुविधाएँ छूट जाती हैं, तो शिष्य पक्का बैरागी हो जाता है। दशम द्वार से ऊपर शून्य में स्वाँसों को ले जाकर सद्गुरु शब्द अमृत मिलता है। दुनिया के सुख-दुःख की कीचड़ को धोकर सुषुम्ना का त्रिवेणी रूपी घाट भी छूट जाता है। इस प्रकार तन और मन का सच्चा ज्ञान हो जाने पर निर्वाण-पद देखने की क्षमता मिल जाती है। अष्टदल कमल से शून्य अधर ध्यान में योगी अपने आप को पा लेता है। इंगला और पिंगला स्वाँसा सम होकर सुषुम्ना में समाकर त्रिवेणी संगम बन जाता है। इसी त्रिवेणी में स्व-ब्रह्म तत्व विचार से बंकनाल में रहकर और मन की चालाकी से सतर्क रहकर शून्य में चढ़ना सद्गुरु देते हैं। शून्य के मानसरोवर की गहराई में जाकर नहाने से संसार के दुःख और मैल छूट जाते हैं। अलख आत्मस्वरूप अर्थात स्व-दर्शन होकर आत्मा की आँखों से परमपुरुष को देखोगे। इस स्थिति में आने पर समस्त अहंकार (कर्म) और दम्भ का नाश हो जाएगा। ऐसे अपने शरीर रूपी घट में प्रकाश का चौक बनाकर सत्यनाम की पूजा करो। सत्यपुरुष के अकह नाम के अलावा अन्य किसी देव को ध्यान में मत लाओ। सोहं रूपी स्वाँसा को ही चंदन, तुलसी, पुष्प जानकर चित्त से अन्य सब कुछ भुला दो। श्रद्धा रूपी पालना और प्रीत की धूप देकर सद्गुरु के नित्य-सत्य (नूतन) नाम रूप का ही सुमिरन करो।

धरती पर जो भी है उसमें कोई भी मुक्त नहीं हुआ है। शरीरधारी कभी मुक्त नहीं है। इसका मतलब है कि हम सब जन्म लिये जा रहे हैं। बार-बार जन्म क्रम में आ रहे हैं। संभव है कि अनंत जन्म भक्ति भी की होगी। कई बार स्वर्ग-नरक की प्राप्ति की होगी। चौरासी का क्रम भी पूरा किया होगा। चार खानि की योनियों में घूमे होंगे, पर मुक्त न हुए। क्योंकि जो मुक्त हो गया, उसका जन्म नहीं होता। अर्थात, आप मुक्त नहीं हो पाए थे, तभी तो जन्म हुआ न।

सार-नाम पाकर ही मुक्त होकर सत्लोक जाओगे। फिर हँसा (जीवात्मा) कभी जीवन-मरण के चक्र में नहीं आवेगा। इसका तात्पर्य है कि सद्गुरु शरण में जाए बिना भवसागर से पार होने के लिए स्वयं की कोशिश सफल नहीं होती है। हमारी अपनी साधनाओं-क्रियाओं की ताकत हमें मुक्ति नहीं दिला सकती है। करोड़ों प्रयास भी कोई करे, पर मूल-नाम के बिना मुक्त नहीं हो सकता है। सद्गुरु के अलावा मोक्ष पाने का अन्य कोई मार्ग नहीं है।

कबीर साहिब ने मन के भ्रमजाल और आत्मा के बंधनों को समझाया है। बड़े-बड़े भक्त चले गए जिन्होंने सगुण में निर्गुण की कल्पना कर ली। किस-किस की बात कहें, कोई बचा नहीं। मच्छेंद्रनाथ, गोरखनाथ, दत्तात्रेय, व्यास जैसे महायोगी योगेश्वर कोई नहीं बचा। सब काल-मन की फाँस में फँस गए। हव्वा कहाँ से आई यह तो खुद आदम को पता नहीं था। तब न हिंदू था, न मुसलमान, न माता का रज था न पिता का बिंदु। तब न गाय थी, न कसाई था, फिर किसने बिस्मिल्लाह कहकर जीव-वध का फरमान सुना दिया? तब न कोई कुल था न देह, न जाति थी। तब स्वर्ग और नरक की उत्पत्ति किसने कर दी? वास्तव में मन की कल्पित बातें कोई समझ नहीं पाता है। निरंजन द्वारा सब की बुद्धि भ्रमित है, जिसके कारण इंसान धर्मों में बाँट दिया गया। मन, संसारी जीवों को माया में बहाकर ले जाता है। मन रूपी यम ही माया रूप सब में समाया हुआ है। तीन लोकों में मन ही जीव-संग आता-जाता रहता है। अपनी माया से उसने तीन-लोकों में सबको बाँधा हुआ है। लोग आत्मा रूप अमृत से अनजान हैं। लोग अमृत-तत्व को नहीं जानते हैं और विषय-वासनाओं में डूब रहे हैं। यदि मनुष्य इच्छाओं को मार दे तो मन भी काबू आ जाएगा, फिर बार-बार मरना नहीं।

सत्यपुरुष ने निरंजन को सत्रह चौकड़ी असंख्य युग जीवात्माओं पर त्रिलोकों में राज करने का वचन दिया है। इस प्रकार कालपुरुष रूप निरंजन जीवों में मन बनकर रहने को विवश है। इसीलिए मन सदैव असंतुष्ट है, दुखी है, कभी चैन नहीं पाता, निर्मल नहीं होता। जन्मों-जन्मों की भक्ति के पुण्य हृदय में समाकर आत्मा के खाते में जाते हैं। इन्हीं पुण्यों के संचय से मानव तन पाकर जीव सद्गुरु शरण में आता है। तब सद्गुरु मन को नियंत्रित करने में सहायक होता है। तब सद्गुरु से आत्मा को जो मिलता है, वह मन के प्रतिकूल मिलता है। सद्गुरु कृपा से मन पर नियंत्रण ही आत्मानुभव का मार्ग प्रशस्त करता है। इसी से जीवात्मा सत्य और असत्य की पहचान करने में सक्षम होती है, अन्यथा मन से मुक्त होना असंभव है। निरंजन अर्थात त्रिलोकों के विधाता को 17 चौकड़ी असंख्य युगों के राज में अब तक केवल 4 असंख्य चौकड़ी युग ही व्यतीत हुए हैं।

केवल 4 असंख्य चौकड़ी युग हो चुके हैं अर्थात अरबों बार सृष्टि का विनाश हो चुका है। यह गणना विज्ञान के लिए भी अकल्पनीय है। विज्ञान तो वर्तमान में केवल सृष्टि की आकाशगंगाओं के विस्तारित होने और ग्रह नक्षत्रों के नष्ट होने और बनने की प्रक्रिया का ही पता लगा रहा है। आत्मा और मन के मूल को जानना विज्ञान के क्षेत्र से बाहर का विषय है; जो केवल आध्यात्म का विषय है।

तीन-लोकों से परे अमरलोक ही मोक्षधाम है। अमरलोक स्वयं परमपुरुष है, हँसात्मा उसी का अंश होने से उसमें समाकर ही पूर्ण आनंद को प्राप्त होती है। परमपुरुष का ही अंश हँसा तीन लोकों में आत्मा और अलग-अलग योनियों में जीवात्मा संज्ञा हो जाती है। सद्गुरु ही गुप्त नाम आत्मा को देकर हँस बनाते हैं जिससे आत्मा के सब भ्रम छूट जाते हैं। सत्यनाम पाए बिना कोई मनुष्य भवसागर से पार नहीं होगा। केवल विद्या, वेद-पुराण पढ़कर कोई भी सत्यनाम का प्रमाण नहीं पा सकता है। बिना सार-नाम पाए कोई मनुष्य साधु कहलाने का भी अधिकारी नहीं है। संसार में प्रचलित कोई भी 'नाम' सत्य नहीं है; पार लगाने वाला नहीं है। जन्म-जन्म के पुण्यों से युक्त कोई व्यक्ति ही मूल नाम पाता है। सत्यपुरुष का भगवान रूपों में अवतार नहीं होता है।

परमपुरुष ने स्वयं को ही प्रकट करने हेतु प्रथम शब्द उच्चारा, उसी विदेह शब्द के अद्भुत प्रकाश को अमरलोक कहा गया है। परमपुरुष स्वयं ही प्रकाशित अमरलोक में समाया है। वही निःअक्षर में समाया शब्द अमरलोक का सत्यनाम है। तीन लोकों का विस्तार तो बाद में हुआ है जिसमें शापित निरंजन का समस्त मायाजाल है। जिसे निःअक्षर शब्द का परिचय मिल जाता है, वही सत्लोक (परमपुरुष) में समाता है। सार-शब्द में समाकर जीवित ही अमरलोक की पहचान हो जाती है। उस अमरलोक में एक हँस का रूप सोलह सूर्यों के समान है। उस लोक का नाम अक्षरों में नहीं कहा जा सकता, अकह नाम है। उस लोक की शोभा बखानी नहीं जा सकती है। उसी शब्द से प्रत्येक प्राणी है और वही शब्द अमरलोक जाता है। वही अकह शब्द जीवात्मा को उबारकर हँस बनाता है। परमलोक में हँस बनकर ही आत्मा समाती है, वही परमपुरुष अंश सम्पूर्ण आनंद में विलीन हो जाता है। कह रहे हैं—

जीवन घड़ी की सुई की तरह आगे बढ़ रहा है। सभी लोग शरीर के लिए जी रहे हैं। सब भौतिक सुखों के लिए ही जीवन जी रहे हैं। आत्मा के लिए कोई नहीं जी रहा है। एक सद्गुरु ही आत्मज्ञान की ओर ले जाता है क्योंकि वही शरीर-मन और आत्मा का ज्ञाता है।

जिसे सद्गुरु नाम (शब्द) मिल जाता है उस पर मन की वृत्तियों और प्रवृत्तियों का जोर नहीं चलता। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और उनकी प्रवृत्तियाँ समाप्त हो जाती हैं। हम यही कह रहे हैं कि यदि मेरे 'नाम' रूपी बाण से मारा हुआ मन फिर काम, क्रोध आदि में लिप्त कर वश में कर ले, तो मैं सत्य की कमान ही नहीं पकडूंगा।

केवल शरीर के लिए नहीं जीना, व्यर्थ जीवन का समय न गवायें। मुक्ति पाने का रास्ता मनुष्य जीवन में ही है। ऐसा न हो कि—'दिवस बिताया खाय के, रैन बिताई सोय॥' साहिब ने चेताया है—

परमपुरुष का स्वरूप प्रकट प्रकाश ही अमरलोक या अक्षयलोक नामक गुप्त निवास है। परमपुरुष का सार-रूप स्वाँसा ही उनके निवास का प्रकाश है। अमरलोक के समग्र द्वीप पुष्प रूप निर्मित हैं और वे ही सरोवर स्वरूप हैं। इन सबमें अष्टदल कमल निरंतर खिले रहते हैं। ऐसे सोलह शब्द-पुत्रों को परमपुरुष ने इच्छा-शब्द रूप निर्मित किया। इनमें कुछ प्रकट रूप हैं और कुछ गुप्त प्रभाव के हैं। अमरलोक का पुहुप नामक द्वीप ही परमपुरुष स्थान है, जिसमें सत्रह शंख कमल दल पंखुरी की शोभा है और नौ-सौ शंख द्वीपों का समूह काया है। इनमें तेरह शंख अपार सुरंगे हैं। अमरलोक का यह स्वरूप तीन लोकों का स्वामी और काल नहीं जानता है।

सद्गुरु शब्द को चित्त में रखकर सब भ्रम छूट जाते हैं। मन ने भ्रम के परदे से ढक रखा है। इसलिए हम सब मेरे-तेरे के मोह से बँधे हैं। जब सत्यनाम की चौकी बैठ जाती है तो इन भ्रमों से छुटकारा मिल जाता है। इसीलिए सद्गुरु नाम रूपी टिकिट लेने का बखान करते हैं। भक्ति ज्ञान ही नाम का सखा है। बिना नाम के कोई भी भवसागर से पार नहीं उतर सकता। कोई भी नाम को धारण किये बिना साधु नहीं हो सकता है। कोई कितना भी वेद-पुराण और विद्या पढ़ ले, अमर नाम के बिना कुछ भी प्रमाण नहीं है। इसका प्रमाण देते हुए साहिब ने कहा है—कि पवन योग साधकर योगेश्वर गोरखनाथ का आवागमन नष्ट नहीं हो सका। निज नाम का ज्ञान नहीं होने से उन्हें मरकर भवसागर में आना-जाना पड़ा। योगेश्वर व्यास जी ज्योतिष के सिरमौर बने, लगन शोधकर पल-क्षण का विचार किया, उन्होंने भी अमर नाम को चित्त में धारण नहीं किया और सम्पूर्ण लग्न मुहूर्त को जीवन का सार मान लिया। इन सब भ्रमों को नष्ट करने वाले सद्गुरु के मिलने से ही अपना निजधाम मिलता है। आत्मा को अमरलोक पाने का अन्य कोई मार्ग नहीं है।

केवल सद्गुरु ही सार-शब्द देकर जीव को भव-बंधन से छुड़ाते हैं। इस जगत के जीवों की मुक्ति की चिंता बस सद्गुरु ही करते हैं। देवी-देवता तो मन की कामनाओं और इच्छाओं की पूर्ति के संकल्प-विकल्प की पूजा भक्ति हेतु मन के ही रूप हैं। जगत की पीड़ा देखकर सद्गुरु के नेत्रों से आँसू भी निकल पड़ते हैं।

जगत के भ्रमों में फँसा जीव मनुष्य तन पाकर भी सद्गुरु से मिलन की चाह में नहीं रोता है। कोई-कोई सत्यनाम का खोजी और शब्द विवेकी ही सद्गुरु की चाह में बेचैन होता है। मन तो सत्यनाम से, सद्गुरु शब्द से सदा ही दूर करता है। मन सुरत को खींचकर सतत् स्मृतियों में ले जाता है, नाम ध्यान में लगने ही नहीं देगा। शिष्य समस्त सत्कर्म करते हुए सुरत को सद्गुरु नाम के स्मरण में लगाये रखे तभी मन से बच सकता है। जीवन कर्म छोड़ने को सद्गुरु नहीं कहते हैं। चलते-फिरते और यात्रा में रहकर भी सुरत के ध्यान में रहें। कर्म करते हुए सद्गुरु ध्यान में रहें तो यह शिकायत नहीं रहेगी कि मन से कैसे दूर रहें। मन की तरंगों को मारना है, यही भजन है।

मनुष्य के पास सब कर्म करने का समय है, बस भजन के लिए समय नहीं है। खुद तो मन की तरंग में रहना चाहते हैं और चाहते हैं कि भजन भी गुरु ही कर लें। मन यही तो करने को विवश कर रहा है, भटका रहा है। मन को बड़े-बड़े ऋषिमुनि-अवतार भी वश में नहीं कर सके। केवल युग पुरुष होकर जीवन-मरण के चक्र में रहे। हमें मन को झिड़क, सावधान होकर सुरत में सद्गुरु छवि के साथ रहना होगा। इसलिए कहता हूँ—

मन की तरंग मार ले, हो गया भजन। आदत बुरी सुधार ले, बस हो गया भजन॥ आया है तू कहाँ से, जाना है कहाँ। इतना सा बस विचार ले, तो हो गया भजन॥

जीवन कर्म में इतनी सी सावधानी हो तो भक्ति का मार्ग है। यदि चौबीसों घण्टे मन की तरंग से सावधान रहकर सुरत और सद्गुरु स्मरण में रहना आ गया तो समझ लो भजन हो गया। अलग से कोई समय निर्धारित करने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। यदि लगातार मन की तरंग को नहीं मारा तो कितना भी समय निर्धारित कर ध्यान में बैठें, कोई लाभ नहीं होगा। आदत बनानी होगी, आदत सुधारनी होगी तो स्वतः भजन होने लगेगा। सूरत में सद्गुरु की छवि को निहारने की आदत से ही सतत् भजन होगा; फिर मन का वश नहीं चलेगा। यही मोक्ष का मार्ग है जो अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगा।

मन-माया की इस सृष्टि में तीनों लोकों में आत्मा की मुक्ति नहीं है। हमारा मूल धाम कहाँ है, हम कहाँ से आये हैं, हमें कहाँ जाना है? मन के लोकों में रहना है या मोक्ष पाकर आवागमन से मुक्ति पाना है, इतना विचार लो तो भजन हो जावेगा। आदत में आया यही विचार अंतिम स्वाँसा के साथ रहेगा।

हमारे पिण्ड में जितनी भी शक्तियाँ हैं, काल निरंजन से जुड़ी हैं। मन-बुद्धि-चित्त और अहंकार से युक्त देह, आत्म-शक्तियों को जकड़े है। सद्गुरु द्वारा दिये गये मूलनाम की चाबी से ही ये दिव्य शक्तियाँ और ऊपर की आध्यात्मिक शक्तियाँ खुलती हैं। मन, पवन-रूप में साँसों में समाया हुआ है। ये साँसें ही निरत हैं जिन्हें अष्टम चक्र में बाँधकर सद्गुरु सुरत को नाम की शक्ति से जाग्रत करते हैं। इस प्राण रूपी निरत को (स्वाँसों) ध्यान में लगाकर एक करने पर ही मन-पवन को वश में किया जा सकता है। सप्तम चक्र तक कहीं भी ध्यान है तो वह काल के भीतर ही रहेगा।

निरत को सद्गुरु के ध्यान में लगाकर सुरत को पाया जाता है। मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार में तात्विक भिन्नता नहीं है, इसलिए संसार में कोई बुद्धिमान नहीं है। सभी मन के शिकंजे में हैं। ब्रह्मा-विष्णु-महेश-देव-ऋषि-मुनि भी काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार के शिकंजे में आते हैं। अच्छे-बुरे और पाप-पुण्य के कर्म मन की प्रेरणा से ही होते हैं। केवल यह मान लेने से कि "मैं आत्मा हूँ", धर्मज्ञान नहीं है।

स्वाँस और सुरति के मध्य में ही परमात्मा है। कबीर साहिब ने यही चेताया कि स्वाँस-स्वाँस में प्रभु का सुमिरन कर लो, स्वाँसों को व्यर्थ न गँवाओ। इन स्वाँसों का कोई भरोसा नहीं है कब अंतिम स्वाँस हो जाए। साँस का आना-जाना किस पल रुकेगा, कुछ पता नहीं है। यह जीवन साँसों पर निर्भर है। एक-एक साँस अनमोल है, तीन लोकों का मोल हर साँस का है। इन स्वाँसों को साध कर आत्मा को पाया जा सकता है। मन रूपी निरंजन स्वाँसा को सुरत में समाने से रोकता है, यह खाली जा रही है।

स्वाँस स्वाँस प्रभु सुमिर ले, वृथा स्वाँस न खोय। ना जाने किस स्वाँस में, आवन होय न होय॥ कहता हूँ कहि जात हूँ, कहूँ बजाय ढोल। स्वाँसा खाली जात है, तीन लोक का मोल॥

फिर कह रहे हैं—स्वाँसों को सुरत में लगाकर ही मन रूपी पवन को घर कर उलटा चलाया जा सकता है। इस प्रकार स्वाँस-पवन को शीश से सवा हाथ ऊपर अधर में ले जाकर ध्यान से जन्म-मरण के भ्रम का ज्ञान होगा। इसी क्रिया से देह रूप पिण्ड में ब्रह्माण्ड का खेल दिखेगा और जगत का भ्रम टूटेगा। शीश और अधर के बीच सुरत में स्वाँसा से ध्यान करने पर देह में भी आकाश के समान ही लगेगा। इसी से सुषुम्ना नाड़ी रूपी डोर पलटकर अधर में ले जावेगी। यही पवन को पलटकर शून्य में घर करना है। साहिब ने चेताया—कि स्वाँसा-पवन रूप मन को स्वयं की साधना चेष्टा से अधर-सुरत में रोकना सम्भव नहीं है। पूरे गुरु अर्थात सद्गुरु के नाम की कृपा से ही स्वाँसों को सुरति के साथ जोड़ा जा सकता है।

खेल ब्रह्माण्ड का पिण्ड में देखिया, जगत की भरमना दूर भागी। हरा भीतरा एक आकाशवत, सुषुम्ना डोर तहाँ पलट लागी॥ पवन को पलटकर शून्य में घर किया, धर में अधर भरपूर देखा। कहे कबीर गुरु पूरे की मेहर से, त्रिकुटी मध्य दीदार देखा॥

बिना सद्गुरु के कुछ भी नहीं हो सकेगा। हृदय कभी गुरु की ताकत के बिना प्रकाशित नहीं हो सकता। गोस्वामी तुलसीदास ने भी रामायण में गुरु की इसी महिमा को कहा—

गुरु बिन भव निधि तरइ न कोई। जौ विरिंचि संकर सम होई॥ ब्रह्म राम ते नामु बड़, बरदायक बरदानि। रामचरित सतकोटि महँ, लिय महेस जियँ जानि॥

स्वाँस और सुरत को जोड़ने से ही परमात्म दर्शन होगा। सद्गुरु कोई धातु की मूर्ति नहीं, वह तो साकार-निराकार से परे स्वाँस-सुरत के मध्य साक्षात् है। सद्गुरु के नेत्रों में परमात्म ऊर्जा है, उनके नेत्रों के ध्यान से ही भक्त की त्रिकुटी में आत्मा जाग्रत होगी। इसलिए साँस और सुरति के मध्य सद्गुरु नयनों को लाने का योग करना ही एकाग्र भक्ति का मंत्र है। इसी एकाग्र ध्यान से मन की चंचलता या मन की तरंगों को वश में करना साध्य है। अन्य किसी भी प्रकार की भक्ति या ध्यान से मन कभी भी वश में नहीं आएगा। आत्म-प्रकाश का सृजन किसी काल्पनिक मूर्ति से संभव नहीं है। सद्गुरु जिस गुप्त मूल नाम को दीक्षा द्वारा देकर जाग्रत करता है, वही सद्गुरु के ध्यान से आत्मरूप में मिलता है। यज्ञ-व्रत-तप-तीर्थ-सन्यास और योग भक्ति से सद्गुरु भक्ति सरल है, सत्य है। प्रत्येक गृहस्थ भी सद्गुरु शब्द और नियमों का पालन करके मोक्ष पाने का अधिकारी हो जाता है। इसके विपरीत कठिन तपस्या के लिए सन्यासी बनकर गृह त्याग कर भी कोई मन के बंधनों से मुक्त नहीं होता। साहिब ने यही चेताया।

प्रत्येक देह में रहने वाली आत्मा ही परमपुरुष का रूप है। सत्यनाम के सुमिरन और सद्गुरु कृपा से ही आत्म स्वरूप मिलेगा।

सुमिरन से सुख होत है, सुमिरन से दुःख जाये। कहे कबीर सुमिरन किये, साई माहिं समाये॥

सद्गुरु मानव देह प्राप्त जीव को इस संसार सागर से निवृत्ति का भरपूर ज्ञान देता है। अंकुरी जीव अर्थात जिसमें अनेक जन्मों के पुण्य हृदय में संचित हैं। फिर भी कुसंगति के कारण दबे हैं। सद्गुरु शरण मिलने पर ऐसे अंकुरी जीव सत्य की ओर आकर्षित होकर सत्संग में आ जाते हैं। अमर गुप्त नाम केवल अंकुरी जीव को ही मिलता है। सद्गुरु यदि उस मूल सत्यनाम को भाषा-अक्षर शब्दों में जुबान से कहें तो पूरा जगत आकर्षित हो जावेगा। यदि उस 'सत्य' को प्रकट कर दें तो काल-निरंजन ही नष्ट हो जावेगा। परमपुरुष ने निरंजन को 17 चौकड़ी असंख्य युग तक जीवों पर त्रिलोक में राज करने का वचन दिया है। यदि निरंजन ही नष्ट हो गया तो फिर परमपुरुष का शब्द कट जाएगा। इसी कारण संसार में जो भी सुख-दुःख है वह मन ही भोग रहा है। स्वर्ग और नरक की प्राप्ति मन को ही होती है, आत्मा सुख-दुःख से परे है क्योंकि आत्मा तत्वों में नहीं है। संसार में सब काल-मन की ही पूजा कर रहे हैं और उसी का आहार बन रहे हैं। सद्गुरु सार-नाम को प्रकट करके नहीं बोलता जो हृदय में छिपा रखा है। सद्गुरु शरण में आया मनुष्य ही नाम दीक्षा पाकर आत्मा और मन को देख पाता है। इसीलिए कहा—

सत्यपुरुष ने निरंजन को सत्रह चौकड़ी असंख्य युग जीवात्माओं पर त्रिलोकों में राज करने का वचन दिया है। इस प्रकार कालपुरुष रूप निरंजन जीवों में मन बनकर रहने को विवश है। इसीलिए मन सदैव असंतुष्ट है, दुखी है, कभी चैन नहीं पाता, निर्मल नहीं होता। जन्मों-जन्मों की भक्ति के पुण्य हृदय में समाकर आत्मा के खाते में जाते हैं। इन्हीं पुण्यों के संचय से मानव तन पाकर जीव सद्गुरु शरण में आता है। तब सद्गुरु मन को नियंत्रित करने में सहायक होता है। तब सद्गुरु से आत्मा को जो मिलता है, वह मन के प्रतिकूल मिलता है। सद्गुरु कृपा से मन पर नियंत्रण ही आत्मानुभव का मार्ग प्रशस्त करता है। इसी से जीवात्मा सत्य और असत्य की पहचान करने में सक्षम होती है, अन्यथा मन से मुक्त होना असंभव है। निरंजन अर्थात त्रिलोकों के विधाता को 17 चौकड़ी असंख्य युगों के राज में अब तक केवल 4 असंख्य चौकड़ी युग ही व्यतीत हुए हैं।

केवल 4 असंख्य चौकड़ी युग हो चुके हैं अर्थात अरबों बार सृष्टि का नाश हो चुका है। यह गणना विज्ञान के लिए भी अकल्पनीय है। विज्ञान तो वर्तमान में केवल सृष्टि की आकाशगंगाओं के विस्तारित होने और ग्रह नक्षत्रों के नष्ट होने और बनने की प्रक्रिया का ही पता लगा रहा है। आत्मा और मन के मूल को जानना विज्ञान के क्षेत्र से बाहर का विषय है; जो केवल आध्यात्म का विषय है।

तीन-लोकों से परे अमरलोक ही मोक्षधाम है। अमरलोक स्वयं परमपुरुष है, हँसात्मा उसी का अंश होने से उसमें समाकर ही पूर्ण आनंद को प्राप्त होती है। परमपुरुष का ही अंश हँसा तीन लोकों में आत्मा और अलग-अलग योनियों में जीवात्मा संज्ञा हो जाती है। सद्गुरु ही गुप्त नाम आत्मा को देकर हँस बनाते हैं जिससे आत्मा के सब भ्रम छूट जाते हैं। सत्यनाम पाए बिना कोई मनुष्य भवसागर से पार नहीं होगा। केवल विद्या, वेद-पुराण पढ़कर कोई भी सत्यनाम का प्रमाण नहीं पा सकता है। बिना सार-नाम पाए कोई मनुष्य साधु कहलाने का भी अधिकारी नहीं है। संसार में प्रचलित कोई भी 'नाम' सत्य नहीं है; पार लगाने वाला नहीं है। जन्म-जन्म के पुण्यों से युक्त कोई व्यक्ति ही मूल नाम पाता है। सत्यपुरुष का भगवान रूपों में अवतार नहीं होता है।

सद्गुरु से मूल गुप्त नाम पाए बिना कोई भी अमरलोक नहीं जा सका। योग और तप से सैकड़ों वर्ष जीने, कहीं लोप कहीं प्रकट होने और वरदान देने, आश्रय देने की शक्तियाँ आ जाती हैं। अपने तप और योग साधना से ऐश्वर्य तथा सिद्धियाँ पाकर भी कोई अमर काया नहीं प्राप्त कर सकता है। अमरता केवल अमर-शब्द अपने घट में समाने पर ही प्राप्त होगी। इस अमर मूल शब्द की महिमा केवल कबीर साहिब ने बखानी है। यह अमर मूल-शब्द अपने ही घट में समाया ग्रंथ है, दुनिया के शास्त्रों में नहीं मिलेगा। साहिब ने कहा है—

परमपुरुष ने स्वयं को ही प्रकट करने हेतु प्रथम शब्द उच्चारा, उसी विदेह शब्द के अद्भुत प्रकाश को अमरलोक कहा गया है। परमपुरुष स्वयं ही प्रकाशित अमरलोक में समाया है। वही निःअक्षर में समाया शब्द अमरलोक का सत्यनाम है। तीन लोकों का विस्तार तो बाद में हुआ है जिसमें शापित निरंजन का समस्त मायाजाल है। जिसे निःअक्षर शब्द का परिचय मिल जाता है, वही सत्लोक (परमपुरुष) में समाता है। सार-शब्द में समाकर जीवित ही अमरलोक की पहचान हो जाती है। उस अमरलोक में एक हँस का रूप सोलह सूर्यों के समान है। उस लोक का नाम अक्षरों में नहीं कहा जा सकता, अकह नाम है। उस लोक की शोभा बखानी नहीं जा सकती है। उसी शब्द से प्रत्येक प्राणी है और वही शब्द अमरलोक जाता है। वही अकह शब्द जीवात्मा को उबारकर हँस बनाता है। परमलोक में हँस बनकर ही आत्मा समाती है, वही परमपुरुष अंश सम्पूर्ण आनंद में विलीन हो जाता है। कह रहे हैं—

जीवन घड़ी की सुई की तरह आगे बढ़ रहा है। सभी लोग शरीर के लिए जी रहे हैं। सब भौतिक सुखों के लिए ही जीवन जी रहे हैं। आत्मा के लिए कोई नहीं जी रहा है। एक सद्गुरु ही आत्मज्ञान की ओर ले जाता है क्योंकि वही शरीर-मन और आत्मा का ज्ञाता है।

केवल शरीर के लिए नहीं जीना, व्यर्थ जीवन का समय न गवायें। मुक्ति पाने का रास्ता मनुष्य जीवन में ही है। ऐसा न हो कि—'दिवस बिताया खाय के, रैन बिताई सोय॥' साहिब ने चेताया है—

इस संसार सागर से पार होने के लिए सद्गुरु शरण में विस्वांस और समर्पण ही एकमात्र मोक्ष द्वार है। देख-समझ कर ही गुरुमार्ग पर चलना चाहिए; स्वयं को मिटाने वाला भाव गुरु भक्ति में होना चाहिए। स्वयं की बुद्धि-तर्क को मारकर गुरु-शब्द पर चलने वाला ही गुरुमुख कहलाता है। जीवित रहते हुए भी मरकर अमरलोक देखने वाले ऐसे ही सद्गुरु भक्त होते हैं। ऐसे ही सद्गुरु भक्त संत संसार में रहते हुए भी अमरलोक के सुख-सागर में समाये रहते हैं। इस प्रकार सद्गुरु अपने भक्त को जीते-जी अपने स्वरूप में एकाकार कर देता है।

मन-वचन-कर्म से सत्यनाम का सुमिरन करने वाले की आशा से ही सत् का वास होता है। ऐसे मानव देह रखकर जो नित्य आशा करता है अंत समय वह सत्य में समाता है। जगत में आकर जीव परमपुरुष को भूल जाता है। उसे वारम्बार काल ही खाता है। जीव देह में आकर सत्ज्ञान भूल जाता है और यमराज को ही पुरुष जानकर सुमिरन करता है। वेद-पुराण भी समझा-समझाकर यही ज्ञान देते हैं कि निराकार से प्रेम करो। सुर-नर-मुनि और तैंतीस करोड़ देवी-देवता भी सबको निरंजन की डोर से ही बाँधते हैं। जीव सद्गुरु शरण में आकर ही इस मायाजाल और यम की फाँस को पहचान पाता है।

कबीर साहिब ने पूरे ब्रह्माण्डों की व्याख्या कर जानकारी दी है। आपको यह जानकारी नहीं होगी कि ब्रिटेन में कबीर साहिब की वाणी पर शोध (रिसर्च) हो रहे हैं। करोड़ों डॉलर से इंग्लैंड में वैज्ञानिकों ने 'कबीर रिसर्च सेंटर' बनाया है। उन्होंने देखा कि कबीर की वाणी में बड़ा विज्ञान भरा पड़ा है। पूरे ग्रह, नक्षत्र, ब्रह्माण्डों का साहिब ने विवरण दिया है। उस विवरण के आगे कोई भी वैज्ञानिक खोज बहुत छोटी है। सृष्टि की संरचना कैसे है, कौन संचालन कर रहा है, कहाँ तक शून्य है और कहाँ महाशून्य है, सात स्वर्ग और सात पाताल के 14 लोकों के अतिरिक्त महाशून्य और सात आकाश है. ऐसे 21 लोको का विवरण साहिब ने दिया है।

बताया कि 'अचिंत के आगे सत्लोक बखानौ, तीन असंख्य योजन पहचानौ।' कह रहे हैं ब्रह्माण्ड के ऊपर अचिंत लोक हैं। 14 लोकों का वर्णन वेदों में है, यहाँ तक ही ऋषि-मुनियों की उपलब्धियाँ हैं। वितल, सुतल, महातल, रसातल और पाताल सात लोक पैर के तलों से जँघाओं तक की काया में हैं। इसके बाद हैं—सिद्ध लोक (मूलाधार पर), ब्रह्म लोक (इन्द्रिय पर, यहाँ ब्रह्मा का वास है), तीसरा विष्णु लोक (नाभि पर), चौथा शिव लोक (हृदय पर), पाँचवाँ शक्ति लोक (कण्ठ पर), छठा आत्मलोक (आज्ञा चक्र पर) और सातवाँ निरंजन लोक (सहस्रसार पर) है। इन 14 लोकों के बाद शून्य और सात महाशून्य या महाआकाशों की दूरी गणना कर साहिब ने बताई। इन्हें ही अंतरिक्ष विज्ञान शून्य आकाश के पश्चात अब घोर अंधकार का महाशून्य मान रहा है। विज्ञान की सूक्ष्म गणना से आज वैज्ञानिक यह तो मान चुके हैं कि अंतरिक्ष अनंत, अद्भुत और असीमित है। जिस ब्रह्माण्ड में हमारी पृथ्वी स्थित है उसका सूर्य ही पृथ्वी से 13 लाख गुना बड़ा तारा है। ऐसे भी तारे हैं जो सूर्य से भी कई गुना बड़े हैं। पृथ्वी मण्डल की आकाशगंगा में ही करीब 400 से 500 अरब तारे हैं। ऐसी लाखों आकाशगंगाएँ हैं। इनकी दूरियाँ अरबों-खरबों के आँकड़ों में नापें तो भी सारे मापने के यंत्र बेकार साबित हो जायेंगे। इतने विशाल ब्रह्माण्डों में हमारी आकाशगंगा का सूर्य एक छोटे बिंदु के समान है। हमारे सौर-परिवार में नौ ग्रह हैं और उनमें हमारी पृथ्वी एक है जिसपर हम मनुष्य अरबों जीवों के बीच रहते हैं। सोचें, इतनी बड़ी कायनात में हमारा क्या वजूद है।

भारतीय संख्या गणना में करोड़, अरब, खरब, पद्म के बाद शंख और महाशंख अंतिम गणना है। फिर सौ शंख के बाद एक असंख्य गिना जाता है। कबीर साहिब ने आकाशीय शून्य के 14वें निरंजन लोक शून्य से सात असंख्य योजन ऊपर 'अचिंत लोक' बताया है। अचिंत लोक से तीन असंख्य योजन ऊपर सोहंग लोक आता है। सोहंग से पुनः पाँच असंख्य योजन ऊपर मूल सुरति लोक है। सुरति लोक से तीन असंख्य योजन ऊपर जाने पर अंकुर लोक। इसी क्रम में फिर इच्छा लोक, वाणी लोक और फिर सहज लोक है। इस तरह सात महाआकाश लोकों की गणना साहिब ने बताई। महाशून्य के उन लोकों की तुलना में निरंजन लोक एक छोटी सी जगह है। महाशून्य के ये सात लोक इतने बड़े हैं कि प्रत्येक में हमारी सृष्टि की करोड़ों सृष्टियाँ समा सकती हैं। महाशून्य के सातवें सहज पुरुष लोक अर्थात सातवें महाआकाश तक भी प्रलय है। निरंजन और प्रकृति के नौ मुकाम भी यहाँ तक हैं। सहज पुरुष लोक अर्थात सातवें महाशून्य से एक असंख्य योजन ऊपर अमरपुरुष का अमरलोक या सत्यलोक साहिब ने बताया है। अमरलोक ही परमसत्य है जहाँ मोक्ष होकर आत्माएँ हँस बनकर सुखसागर में रहती हैं। मोक्ष का अर्थ ही है सत्यपुरुष में समाकर उसी की अंशी बन जाना, जैसे बूँद समुद्र में समाकर समुद्र ही बन गई।

सद्गुरु रूप कबीर साहिब ने ही आकर प्रथम बार सद्गुरु सत्य और अमरलोक परमपुरुष का सत्यज्ञान संसार को दिया है।

परमपुरुष से शापित और अमरलोक से निष्कासित निरंजन ही त्रिलोकों का विधाता है।

ऋषियों, तपस्वियों, ज्योतिष के गणितीय ज्ञान और विज्ञान की खोजें व शोध कोई भी सत्यलोक एवं जीवात्मा के मूल को जानने में समर्थ नहीं है। इनसे मनुष्य को धार्मिक अज्ञान और भवसागर को जानने का अवसर अवश्य मिलता है। वे शास्त्री और धर्म ठेकेदार जो दृश्य संसार के पृथ्वी, सूर्य आदि नव ग्रहों और तत्वों को भगवान ईश्वर बताकर पूजा-उपासना कराते हैं, मनुष्यों को अज्ञान के अंधकार में ही धकेलते हैं। तीनों लोक और सातों महाशून्य अर्थात साकार-निराकार नाशवान हैं। निरंजन लोक तक केवल सामीप्य, सालोक्य, सारूप्य और सायुज्य स्वर्ग ही हैं। तीन लोक में ही घोर नरक रूपी गर्भ स्थान हैं। ये सभी कर्मफल और जन्म-मरण के कर्म-बंधन स्वरूप हैं। ये सभी कर्मफल भोगने के लिए निरंजन द्वारा जीवों को बंधन में रखने हेतु वेद-विधान हैं। अल्प और दीर्घ अवधि के लिए जीवात्मा को पुण्य-पाप कर्मों के अनुसार मृत्युलोक और परलोक में आना-जाना होता है।

निरंजन लोक वैकुण्ठ से आगे किसी दिव्य-दृष्टि सिद्ध पुरुष और ब्रह्मा-विष्णु-महेश त्रिदेवों की पहुँच नहीं है। निरंजन स्थान की दूरी साहिब कबीर ने 18 करोड़ 60 हजार असंख्य योजन मात्र बताई है। जिस निराकार-निरंजन को पूरी दुनिया ने परमात्मा माना है, उसके लिए साहिब ने कहा—

मन ही सरूपी देव निरंजन, तोहि रहा भरमाई। है हँसा तू अमरलोक का, पड़ा काल वश आई॥ पाँच पच्चीस तीन का पिंजड़ा, जा में तोहि राखा भरमाई॥

निरंजन ही मन रूप सब जगत और जीवों में समाया निराकार है। देह रूप सृष्टि में वही दिव्यस्वरूप है और वही विकराल रूप है। मन रूप निरंजन किसी भी दशा में सुरति को आत्मा की ओर नहीं जाने देता। वह अपनी सृष्टि में आत्मा को जीव बनाकर ही राज करता है।

सत्यपुरुष ने स्वयं को सत्यलोक-स्वरूप प्रकट कर सोलह शब्द उच्चारे। इन शब्दों से ही शब्द-रूप सोलह पुत्र उत्पन्न हुए। सत्यपुरुष का पाँचवाँ शब्द पुत्र निरंजन हुआ। निरंजन को ही निराकार, नारायण या मन आदि नामों से जाना जाता है। संसार में अलख निरंजन ही अद्वैत ब्रह्म, परमेश्वर, राम, कृष्ण, करीम-कादर, हरि-हरि करोड़ों नामों से भगवान ईश्वर और परमात्मा के रूप में याद किये जाते हैं।

निरंजन ने अमरलोक में 70 युग भक्ति करके पहले मानसरोवर, फिर मानसरोवर में 70 युग भक्ति करके अपना अलग देश माँगा। फिर 64 युग तप करके जीव बीज आद्या शक्ति द्वारा मिला। निरंजन ने अमरलोक से पृथक पंच-तत्व लोक बनाकर धोखा दिया और आद्या शक्ति सहित आत्माओं को निगल कर बंधक बना लिया।

इसी कारण सत्यपुरुष ने निरंजन को श्राप देकर अमरलोक में रहने और पुनः अमरलोक में आने से 17 चौकड़ी असंख्य युगों के लिए वंचित कर दिया है। अब शापित कालपुरुष निरंजन स्वयं अमरलोक जाने से वंचित होकर आत्माओं को भी मोक्ष प्राप्त करने सत्यलोक नहीं जाने देता है। शून्य में बनाये तीन लोकों का राजा (स्वामी) काल निरंजन है। आत्माओं को निरंजन की माया से मुक्त कर अमरलोक ले जाने की शक्ति व सामर्थ्य केवल सद्गुरु को है। यही भेद व रहस्य सद्गुरु रूप कबीर साहिब ने आकर संसार को बताया है। सद्गुरु एवं सत्यनाम की पहचान साहिब ने संसार को दी है। मन रूप समाये, शापित काल निरंजन को पहचान देते हुए साहिब ने चेताया है—

मन पाँचो के वश पड़ा, मन के वश नहिं पाँच। जित देखूँ तित दो लगी, जित भागूँ तित आँच॥

अर्थात शापित निरंजन स्वयं पंच तत्वों से बनाये त्रिलोकों के वश में है। पाँचों तत्वों की सृष्टि स्वयं निर्मित हो रही है और स्वयं नष्ट हो रही है। ऐसे ही युग-युगान्तरों के कल्प-कल्पान्तरों की प्रवृत्ति और निवृत्ति के जाल में स्वयं मन रूप निरंजन विवश है। रचना और विनाश के पंच-तत्वों में जीवात्माओं की अमरता स्वयं काल-निरंजन का भी काल-फाँस है। काल बना निरंजन स्वयं सत्यपुरुष का शब्दपुत्र होकर भी अपने ही कुटिल विधान के कारण कर्म और कर्मबंधन के संचालन से मुक्त होने में असमर्थ है। केवल जीवात्मा सद्गुरु शरण में जाकर निरंजन-काल के कर्मबंधन से मुक्त होकर मोक्ष पाने की अधिकारी है। साहिब ने चेताया।

सत्यलोक में मन नहीं है—बुद्धि और चित्त नहीं है, अहंकार (कर्म) नहीं है। माया के प्रपंच नहीं हैं। बता रहे हैं—क्षुधा-तृष्णा नहीं, सुख-दुःख नहीं है। गर्मी-ठण्ड, शीतोष्ण नहीं है। आधि-व्याधि, पुण्य-पाप, कर्म-अकर्म आदि वहाँ नहीं हैं। ऊँच-नीच, कुल-आश्रम, मर्यादा, वर्ण-रंग से परे है। धर्म-अधर्म, संयम-आचार की जरूरत नहीं है, वहाँ कोई बाहरी आचरण नहीं है। वह देश तीन लोक से न्यारा है।

यह संसार काल का देसा, कर्म का जाल पसारा। कहत कबीर सुनो भाई साधो, अमरलोक है न्यारा॥

भाइयों! इसी तरह आत्मा अमरलोक में प्राण नहीं है, पवन नहीं है, माया नहीं है। सुबह और शाम, सुख और दुःख से परे है वह देश। वहाँ जाकर जीव अचल-अमर हो जाता है। वहाँ प्रकृति नहीं है। कई निर्गुण शब्दों में साहिब ने उस देश का उल्लेख किया—'अवधु बेगम देस हमारा'। आप अगर गर्मी में एक एयरकंडीशन कमरे में पहुँच जाते हैं तो वहाँ गर्मी नहीं लगती, उसे शून्य किया गया है। वैक्यूम के कारण कमरे का वातावरण ठण्डा हुआ। इसी तरह परमपुरुष लोक में, आत्मा के देश में प्रलय नहीं है, विनाश नहीं है। माया नहीं है, पाँच भौतिक तत्व नहीं हैं। उसका उल्लेख वेद-कितेब ने नहीं किया, इनसे परे है। चौरासी लाख जीव-जन्तु और सृष्टि वहाँ नहीं हैं। नाद-धुनें भी नहीं हैं। किसी शास्त्रज्ञ की किताब में मैंने पढ़ा कि सत्लोक में बड़ी प्यारी धुनें बज रही हैं। नहीं-नहीं, जहाँ धुनें हैं वहाँ सत्लोक हो ही नहीं सकता।

वाह! वहाँ क्रियाएँ भी नहीं हैं। मनुष्य यहाँ क्रियाएँ कर रहा है ये भी पंच भौतिक तत्वों का खेल है।

पवन न पानी पुरुष न नारी।

अमरलोक में स्त्री भी नहीं है, पुरुष भी नहीं है। पवन भी नहीं है। पानी भी नहीं है।

स्वयं के प्रयास और साधना से आम मनुष्य सुषुम्ना नाड़ी खोलने में समर्थ नहीं है। सद्गुरु द्वारा दिये गये गुप्त नाम के उलटे जाप से ही यह संभव है। सद्गुरु नाम के स्वाँसों में उलटे जाप अर्थात साँसों को ऊपर कपाट की तरफ चलाने पर सुषुम्ना नाड़ी खुल जाती है। जब सुषुम्ना से साँस कपाट की तरफ चलती है तो पूरे शरीर की चेतना सिमट कर कपाट पर आ जाती है। पूरे शरीर में सन्देश भी सुषुम्ना ही पहुँचाती है, दिमाग तो संवाहक मात्र है। मनुष्यों में सुषुम्ना नाड़ी बन्द पड़ी है। जैसे मोबाइल फोन बन्द करने के बाद भी समय के अनुसार चलता रहता है और खोलने पर सही समय बताता है। इसी प्रकार सुषुम्ना नाड़ी बन्द तो है पर उसके खोलते ही कपाट में चेतना आ जाती है। शरीर परमचैतन्य हो जाएगा, जो केवल स्वाँस में सद्गुरु ध्यान के मूल नाम सुमिरन से संभव है। गृहस्थ जीवन के साथ सद्गुरु शब्द का पालन और गुप्त नाम ही सत्य भक्ति का भेद है।

कबीर साहिब ने शिष्य धर्मदास को पवन से जीवों के सृजन का रहस्य बताया। कूर्म जी के मुख से पवन की उत्पत्ति हुई है। चार स्तरीय लोकों से आए पवन का भेद कोई विरला संत पाया है। कूर्मजी के शीश का वर्णन करते हुए बताया कि कोई साधु संत पुरुष ही जान पाते हैं कि पृथ्वी लोक में माया आठ तरह से समाई है। आठ दिशाएँ ही इसकी पहचान हैं, यही माया के आठ शीश हैं। चार दिशाएँ और इन दिशाओं के चारों कोने आठ शीश माने गये हैं। इनके अलावा निरंजन ने कूर्मजी से तीन शीश छीन लिए और तीन कूर्मजी के पेट में ही रह गए। इन्हीं चौदह शीश से चौदह भुवन कालपुरुष ने बनाये हैं। यही कालपुरुष के चौदह यम और मनुष्य देह में स्थित चौदह देवता हैं। ये ही कालपुरुष का गुण-स्वभाव रूप हैं।

महाआकाशों और शून्य में समाई पवन में कालपुरुष ने हँस-आत्माओं से जीवों का सृजन किया है। जीवों की स्वाँस ऊपर की ओर उठकर अधर में समाती है। परमपुरुष के वचन और पारस रूप नाम अंश होने के कारण जीवाणु का अधर में स्वाँस से मिलन हमारी कामभावना उठने पर होता है। यही स्वाँस हमारे माया शरीर के बाएँ भाग को जागृत करके काम का वेग मन में लाती है। नाभि से अधर में जाकर फिर स्वाँसा नाभि में ही आती है। इसी क्रम के साथ बिंदु-जीव अधर से पेट में तीन मुखों की तरफ दौड़ पड़ते हैं। वसंत ऋतु आने पर प्राणियों के पेट में पुनः स्वाति-पवन पहुँचती है। यही वसंत ऋतु पवन नारी तन में समाने पर बायाँ कमल-दल खुलता है और कामभावना उत्पन्न होती है। स्वाति-बूंद की शक्ति मिलने पर शिव-शक्ति का मिलन होता है अर्थात प्राणी के रक्त-अंश में, वीर्य बनने के पूर्व ही जीव-बिंदु समा जाते हैं। स्वाति पवन द्वारा बिंदु को ग्रहण कर लेने पर स्वाँस वायु बाँझ नहीं रहती। इस प्रकार पवन की उत्पत्ति बताते हुए स्वाति पवन से जीवों का प्राणी रक्त में रोपण होकर सम्पुष्ट होने का वर्णन किया। इसी स्वाति पवन का रसपान करने वाले जीवात्मा को, जो परमपुरुष का अंश है, कालपुरुष ग्रस नहीं सकता। साहिब के इस भेद को विचारने वाला ही सद्गुरु (जौहरी) का लाल है।

हे धर्मदास! जो विचार तुमसे कह रहा हूँ उसको समझना, यह भेद न्यारा है। जीव-बिंदु स्वयं ही दौड़ जावे तो स्वाति-पवन उसको छू भी नहीं सकता, पुनः शून्य होकर रह जाएगा। इस भेद को चित्त में समा लो। मैंने जो पवन भेद तुमसे कहा है "नाम" तो इससे भी न्यारा है। पवन भेद का जो वर्णन मैंने किया है उसी में काल का पसारा है। ऐसी पच्चीस पवनों के बाहर सत्य शब्द-सार है।

सुमरन भक्ति की शक्ति है, सार शब्द का ध्यान। सुमरन करने से सहज ही अमरलोक का मार्ग प्रशस्त होता है। सुमरन की शक्ति से ही सब कर्म कट जाते हैं। सद्गुरु नाम की प्राप्ति और सुमरन से जन्म-जन्म के सांसारिक कर्म कट जाते हैं, तो सहज ही दिव्य ज्ञान का प्रकाश भक्त में समा जाता है। नाम सुमरन ऐसा सार तत्व है जिससे काल-कराल की व्यथा और ताप से मुक्ति हो जाती है। भक्तों को सुख और सन्तोष का आनन्द अनुभव होता है। भक्ति भेद और सारतत्व का वर्णन करते हुए साहिब ने चेताया कि—

सार शब्द का सुमरण करिहै। सहज़ अमरलोक निस्तरिहै।। सुमरन का बल ऐसा होई। कर्मकाट सब पल में खोई।। जाके कर्म काट सब डारा। दिव्य ज्ञान सहजै उजियारा।। तत्व सुर सुमरन है भाई। जातै काल की तपन बुझाई।।

गुरु सेवा क्यों? गुरु के चरणों में प्रणाम और सेवा से महायज्ञ का फल प्राप्त हो जाता है। गुरु के चित्र के आगे माथा झुकाना ही मात्र भक्ति नहीं है। भक्ति के तत्वों को समझना होगा। गुरु के जीवित रहते केवल गुरु और उनके बाद 'शब्द' ही सर्वोपरि है। साहिब जी ने कहा गुरु के शब्द के पालन में ही आज मैं परमार्थी संत-आश्रमों के निर्माण और सत्संग कर रहा हूँ। गुरु दीक्षा में शिष्य सच्चे दिल से तन-मन-धन गुरु को देता है। तन-मन-धन गुरु क्यों लेता है? ये तीनों चीजें आत्मा के लिए अवरोध हैं, कोढ़ हैं। आत्मा इनके ही कारण शरीर धर्म का पालन करने लगी है। धन का मोह खतरनाक है, इसके जाने से आदमी पागल हो जाता है। पुत्र के जाने से इतना कष्ट नहीं होता है जितना धन के जाने से होता है। सद्गुरु इन तीनों से हटाकर ही शिष्य को आत्मा बनाता है। आदमी की सोच भी मन है, फैसला भी मन है, क्रियाएं भी मन हैं। गुरु में विस्वांस रखो, गुरु के ध्यान सुमरन से ही रोग दूर होंगे और भक्ति प्राप्त होगी। इसीलिए कहा—

गुरु का कथन मान सब लीजै। सत्य असत्य विचार न कीजै।।

सद्गुरु के सत्यनाम सुमरन से दीन-हीन ही नहीं पतित भी भवसागर से पार हो जाते हैं। सद्गुरु से मूल नाम पाए बिना स्वयं की साधना भक्ति से राजा-रंक-ऋषि-मुनि कोई परमधाम को नहीं पाते।

सुमरन का वैज्ञानिक महत्व है। सुमरन से आत्मा परमात्मा के पास होती है क्योंकि सद्गुरु भी परमात्मलीन है और सद्गुरु का चिंतन शिष्य को उसका तदनुरूप बनाता है। आदमी जिसका चिंतन करता है उसका तदनुरूप हो जाता है।

सुमरन से सुख होत है, सुमरन से दुःख जाए। कहे कबीर सुमरन किए, साई माहिं समाए।।

सत्यलोक की बात की जाती है तो शिष्यों को विचार आता होगा कि जाकर देखें कि सत्यलोक कैसा है, हँस कैसे हैं! सच्चाई यह है कि आप सब सत्यलोक को जानते हो, वह घर ही आपका है, परमपुरुष को जानते हो। निरंजन ने इस दुनिया को सत्यलोक की नकल पर बनाया। अन्तर यही है कि वहाँ हँस आनन्दमय हैं, यहाँ आनन्द ढूँढ रहे हैं। वहाँ अविरल आनन्द है, यहाँ इन्द्रिय भोग आनन्द है। वहाँ रमणीक ही है, यहाँ सजाया गया है पर कुछ बन नहीं पाया। आत्मा को भ्रमित करने के लिए निरंजन को बहुत शक्ति लगानी पड़ रही है। यही आश्चर्य है कि आत्मा इसे अपना मान रही है। सब एक-सा ही महसूस कर रहे हैं। सबको यह विचार आता है कि यह शरीर क्या है, कैसा है? हर घमण्ड कमजोर को ही दिखाया जाता है। सबको यहाँ कर्म अनुकूल फल मिलता है, हर जन्म में मिलता है। जब आत्मा मोक्ष प्राप्त करती है तो परमपुरुष को देखकर आश्चर्य नहीं करती, सब उसे अपना ही लगता है। क्योंकि वही आत्मा का मूल है। ज्ञान की तरंगें और सन्देश सबको आत्मा से आता है।

स्वांसों में यदि सुमरन समा लें तो कभी भी सुरत से अलग नहीं होंगे। स्वांस के ऊपर जाने और बाहर जाने को सुरत से जोड़ना ही आत्मसाक्षी रूप है। स्वांस-स्वांस में प्रभु का वास है किन्तु सुमरन को सुरत-निरत से जोड़ना होगा। स्वांस का सुरत से अलग होने के कारण ही आत्मा पर मन का कब्जा है।

स्वांस सुरत के मध्य में कभी न न्यारा होय। ऐसा साक्षी रूप है सुरत निरत से जोय।।

एक लक्ष्य है, एक कारण, एक मुद्दा है स्वांस-स्वांस के मध्य में ही सार है। स्वांस के मध्य में प्रभु ही विराजते हैं। स्वांस व्यर्थ न खोएं। न जाने कब स्वांस वापस ही न आए। स्वांसों को नाम सुमरन में नित्य लगा दें, जीवन में कभी कोई बाधा नहीं आएगी। सब कर्म करते हुए तो हनुमान के रोम-रोम से राम का सुमरन इसी रीति से होता था। यह कठिन भक्ति नहीं है; यज्ञों, तीर्थों, जप-तप से सहज है, कुछ खर्च नहीं होगा, कोई कष्ट नहीं होगा। सभी स्वांसों को व्यर्थ गवाँ रहे हैं। जिनके मध्य आत्मा का वास है उन्हीं स्वांसों की ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। सभी मन की बाहरी भक्तियों में और कर्मों में जीवन गवाँ रहे हैं।

मनुष्य यदि मोक्ष चाहता है तो एक सत्यनाम खोजकर चित्त में बैठाना होगा। ऐसा अद्भुत नाम जो तीन लोकों के जन्म-मरण और कर्तापन से न्यारा है, अमर है। वह अनश्वर अमर धाम का परमपुरुष का नाम है जो अक्षरों के नामों से परे है। निःअक्षर गुप्त नाम है जो केवल सद्गुरु भाषा में ही पाया जा सकता है। इसी सत्य गुप्त नाम के सुमरन से जीव का कल्याण होकर भवसागर से पार जाता है। घोर अन्धकार और विषयों की कालफाँस गले में पड़ी है जो नाम के सुमरन से पल में कट जाएगी। इस संसार में विष रूपी कामवासनाओं की बेल फैली है, यही काल का स्वभाव है। नाम के अमृत से ही इस संसार के विषय विकारों से छुटकारा मिलेगा। मूल नाम के बिना संसार में सभी सुर-नर-मुनि आवागमन में, जल के बिना मछली के समान मृत्यु को प्राप्त हो गए। कोई संसार के पाखण्ड भरे व्यवहार में फँस गया, कोई तीर्थ-व्रत-नियम आचारों में ही उलझकर रह गए। योग और सगुण के भक्ति गीतों में मगन होकर बिना मूल नाम के कोई आत्म मोक्ष नहीं जान सका। सत्-रज-तम तीन गुणों की भक्ति में ही संसार में मनुष्य आत्म ज्ञान को भुला हुआ है।

सत्यलोक में स्वर्गों जैसी श्रेणियाँ नहीं हैं। उत्तम-मध्यम-कनिष्ठ कर्मफल के मुक्ति स्थान नहीं हैं। निरंजन स्वयं तो तीन लोकों के सर्वोच्च स्थान पर है किन्तु आत्माओं को एक अवधि के लिए श्रेणीवार स्वर्गों और नरक का विधान है। निरंजन के जीव लोक में आत्माओं को चार खानि की चौरासी लाख योनियों में जन्म-मरण के आवागमन से बाँधा गया है। अमरलोक में आत्मा "हँस" बनकर और सद्गुरु द्वारा कर्मफलों से पूर्णतः मुक्त कर ले जाई जाती है। अमरलोक-परमपुरुष में ही आत्मा अंशरूप से पूर्ण में समा जाती है। सृष्टि की रचना और विनाश के क्रम से पूर्णतः मुक्त होकर अविनाशी परमपुरुष में ही अपना आनन्दमयी अनश्वर स्वरूप प्राप्त कर लेती है। निरंजन की सृष्टि में आत्मा जन्म-जन्मांतरों में कभी भी अपने निज स्वरूप को प्राप्त नहीं होती। इसीलिए गुण-गन्धर्व-ऋषि-मुनि और देवों में शरीर पाकर भी आत्मा निरंजन की व्यवस्था के अधीन असन्तुष्ट ही रहती है। सत्यलोक पाने के बाद आत्मा को निरंजन के लोकों और देवों-देवियों की कोई स्मृति शेष नहीं रहती। क्योंकि अमरलोक ही उसका निज घर है। इसीलिए सद्गुरु तीन लोकों की निरंजन व्यवस्था के देवों-भगवानों से ध्यान सुरत हटाकर परमपुरुष के गुप्त नाम की सुरत से जोड़ते हैं। उसी सत्यनाम को सद्गुरु स्वयं शिष्य में प्रवेश कर सुमरन हेतु देते हैं। इसीलिए शिष्य का सद्गुरु में पूर्ण समर्पण ही सत्य भक्ति है।

सद्गुरु आपको केवल परमात्मा को पाने का रास्ता भर नहीं बताता, न ही सद्गुरु आपको कोई योग क्रिया में उलझाता है। वह आपके अन्दर उस दिव्य सत्ता को प्रकट कर देता है। यह है सद्गुरु का कार्य, यह है 'नाम'।

कोटि जनम का पंथ था, गुरु पल में दिया लखाय।

करोड़ों जन्मों का पथ खत्म कर पल में पहुँचा देता है। अर्थात् गुरु आपके अन्दर की वह पूरी क्षमता स्वयं आप में ही जाग्रत कर देता है।

पारस में अरू संत में बड़ो अन्तरो जान। पारस तो कंचन करे, वो कर ले आप समान।।

कबीर साहिब ने चेताया—यह मानव असाधारण है, इसे साधारण मत समझना। देवता लोग भी इस मानव तन की चाह रख रहे हैं। वे चाहते हैं कि काश मानव तन मिले क्योंकि इस तन के अन्दर असीम क्षमतायें हैं। आप शरीर की शक्तियाँ जगायें अच्छी बात है। आप योग करें खराब नहीं है, लेकिन उसमें ही मग्न (Concentrate) नहीं हो जायें। यह पर्याप्त नहीं है। जब तक आत्मिक शक्तियाँ नहीं जगेंगी आप संसार सागर से पार नहीं हो सकते हैं। आत्मिक शक्ति योगी नहीं जगा सकता। आत्मिक शक्ति बाहरी उपासना करने वाला नहीं जगा सकता। आत्मिक शक्ति एक पूर्ण सद्गुरु ही जगा सकता है, यह रहस्य बताया साहिब ने। इसलिए कबीर साहिब ने अपनी वाणी में पूर्ण सद्गुरु का दर्जा ईश्वर से भी ऊपर कहा है। जब तक मनुष्य को पूर्ण सद्गुरु की प्राप्ति नहीं होती है, तब तक उस अमरलोक की प्राप्ति हो ही नहीं सकती। इसलिए ये क्षमतायें हमें एक अदद गुरु के द्वारा ही प्राप्त हो सकती हैं। इसी पंक्ति में बाकी संतों ने भी आकर उस देश की बात कही। यदि आप संतों की वाणी का रिसर्च करें, अध्ययन करें तो पायेंगे कि उन्होंने उस अमरलोक की बात की है। साहिब के ही नक्शे कदम पर चले हैं। जो-जो बातें कहीं उनका अनुकरण किया है। विस्तार में अनुकरण किया है।

सार शब्द सत्पुरुष कहाया। यह सार शब्द परमपुरुष परमात्मा है। वह परमपुरुष ही सार शब्द है। इसका मतलब है 'सार शब्द' मालिक है। सारा शब्द परमात्मा है। सृष्टि में जब सब कुछ शुद्ध चेतन स्वरूप था, तब सब कुछ उसी में निहित था।

जब हम रहल रहल नहिं कोई। हमरे माहिं रहल सब कोई।।

आइए, हम देखते हैं इस 'नाम' के विषय में जिसे एक पूर्ण सद्गुरु देता है। उस परमसत्ता को अपनी 'सुरति' की मंथनी से आप में प्रगट करती है, बस वही है 'नाम'। अब वह नाम क्या करता है? नाम आपका हृदय निर्मल कर देगा। नाम आपको संसार सागर से पार कर देगा। यह 'नाम' आत्मा को किस सिद्धान्त से इस संसार सागर से पार करता है, आइये हम पहले देखें। आत्मा लखि (देखि) नहीं जा रही है, आत्मा जानी नहीं जा रही है। आत्मा का पता नहीं चल रहा है। तभी तो आदमी आत्म-साक्षात्कार प्राप्ति की चेष्टा कर रहा है। सीधी सी बात है, हमारी आत्मा बंधन में है। पंच भौतिक तत्वों में आत्मा समाकर अपने को शरीर मान रही है। आत्मा अपने को मन मान रही है। व्यक्तित्व का शरीर और इसमें छिपा मन 'आत्मा' नहीं है।

पंच भौतिक तत्वों, पच्चीस प्रकृति, मन आदि की क्रियाओं में इनके बीच कहीं हमारी आत्मा खो गई है। इन दोनों अर्थात् मन और माया ने मिलकर हमारी आत्मा को बाँधा है। साहिब ने अपनी वाणी में इस मन पर एकाग्र होकर काफी शब्द कहे।

तेरा बैरी कोई नहीं तेरा बैरी मन। जीव के संग मन काल रहाई। अज्ञानी नर जानत नाहीं।।

इसका मतलब है किसी ऐसी ताकत के शिकंजे में हैं और हम अपने मूल देश, अपने Origin स्थान को नहीं जान पा रहे हैं। साहिब चेता रहे हैं—

चल हँसा सत्लोक, छोड़ो ये संसारा। यह संसार काल का देशा, कर्म का जाल पसारा।।

यह संसार कालपुरुष का देश है, हम सब एक बेगानी दुनिया में जी रहे हैं। संसार नाशवान है, पाँच तत्वों से बना है। यह तन अच्छा नहीं है। शरीर के सुखों के लिए हम सब चेष्टा कर रहे हैं। कहा—

आत्मा को बहुत जोरदार तरीके से बंधन में रोका गया है। भाईयों, संसार का कोई भी पदार्थ आत्मा के उपयोग का नहीं है। आत्मा का विषय नहीं है। जब यह आत्मा परमात्मा का अंश है, तो जरूर इस आत्मा के पास ईश्वरीय शक्तियाँ भी हैं। साहिब वाणी में कह रहे हैं—

हँसा तू तो सबल था, अटपट तेरी चाल। रंग करंग ते रंग लिया, अब क्यों फिरत बेहाल।।

यह आत्मा जरूर शातिर शक्तियों के आधीन है, इसकी शक्ति दब गई है। शक्ति तो है, आत्मा की शक्ति कहीं कम नहीं हुई है। आत्म शक्तियाँ मन से सम्मोहित होकर दबी हैं। यह मन आत्मा का प्रबल शत्रु है। आत्मा की शक्तियों का ह्रास मन के सम्पर्क के कारण हुआ। आत्मा बन्धन में है, इसमें कहीं शंका नहीं है। साधारण विचार करने से भी इस बात का पूरा खुलासा होता है कि यह आत्मा बँधी हुई है। यह बन्धन मन का है, यह बन्धन विरोधी शक्तियों का है। इसलिए आत्मा पर इनका खुमार है, नशा है।

काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार और इनकी पच्चीस प्रकृतियाँ मन-बुद्धि-चित्त की शक्तियाँ हैं। ये माया कहलाती हैं। मन का रूप बड़ा विकृत है। इसी मन से सावधान रहने कहा साहिब ने—

मन जीव को भरमावे सोई। मन का कहा न कीजै कोई।। मन ही आहे काल कराला। जीव नचाये करे बेहाला।।

इसीलिए आत्मा अपने वजूद को नहीं समझ पा रही है। हम सब चाहते भी हैं कि मन को समझें, पर मन की शक्तियाँ बड़ी प्रबल हैं।

तेरा बेरी कोई नहीं, तेरा बेरी मन।

नाम विदेह कोई विरला पाई। 'सार-शब्द' या 'सार-नाम' हर किसी गुरु के पास नहीं मिलेगा। 'सार शब्द सत्पुरुष कहाया', सार-नाम खुद मालिक है। जब सद्गुरु नाम देता है तो परमात्मा को ही मिला देता है। परमात्मा ही शिष्य में हाजिर हो जाता है जो सबके अन्दर ही है। जिस समय गुरु नाम देता है परमात्मा को प्रकट कर देता है। गुरु की महिमा गोविन्द से बड़ी ऐसे ही नहीं कही गई—

गुरु हैं बड़े गोविन्द से, मन में देख विचार। हरि सुमरै सो वार है, गुरु सुमरै सो पार।। कबीरा हरि के रूठते, गुरू की शरणी जाय। कहे कबीर गुरू रूठे, हरि न होत सहाय।।

यह सार नाम बड़ा ऊँचा है, जब यह आएगा तभी मन की पूरी स्थिति का पता चलेगा।

नाम बिना हृदय शुद्ध न होई। कोटिन भाँति करे जो कोई।।

चाहे कोई कितनी भी चेष्टा कर ले, इस मन को नाम की ताकत के बिना कभी नहीं जीत सकता। जिस दिन गुरु नाम देता है, परमात्मा को शिष्य में प्रकट कर देता है।

कोटिन जन्म का पंथ था, गुरु पल में दिया लखाय।

'नाम' इतनी निराली चीज है, पूर्ण गुरु आप में पैदा कर देता है। इसी नाम की रोशनी में मन के परिवार के समस्त शत्रु जो आपके अन्दर निवास करने वाले हैं, छटने लगते हैं। काम-क्रोध-लोभ-मोह-मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार आदि सब पकड़ में आने लगते हैं, समझ आने लगते हैं।

जा घट नाम न संचरै, ताको जान मसान। जैसे खाल लुहार की श्वाँस लेत बिन प्राण।।

जैसे अग्नि को हवा देने वाली लुहार की धौंकनी की खाल बिन प्राणों के साँस लेती है, इस तरह जिसके पास सार-नाम नहीं है वह शरीर भी व्यर्थ ही साँसें लेता है, बेकार शरीर है।

गुरु नानक देव जी ने तो बड़ी बुलन्द बात कही—'नाम बिना विष्टे का कीड़ा।' ओह! नाम बिना आदमी किसी भी काम का नहीं है।

नाम बिना पापी सो कहिए, नाम बिना मूरख सो रहिए। ऊँच वही जो नामहिं जाना, बिना नाम सब नीच बखाना।।

बिना नाम सब नीच हैं, नाम के बिना दिल शुद्ध ही नहीं हो सकता। नाम के बिना मन काबू में ही नहीं आ सकता है। चाहे कितना भी कोई पोथियाँ पढ़ डाले, कितने भी कोई शुभ कर्म कर डाले, मन को जीत नहीं पाएगा।

आपकी आत्मा में सभी चीजें परिपूर्ण हैं। मन तब गुलाम-सेवक बन जाता है, अभी मन स्वामी है पर सार-नाम के प्रवेश होते ही मन दास बन जाता है। नाम के बाद आपको भ्रमित नहीं कर पाएगा, आपको किसी भी आवेग में नहीं ले पाएगा। क्रोध आने के साथ ही आपको नजर आएगा। ऐसे नजर नहीं आ रहा है, क्रोध का वेग अपना काम करके भाग जाता है। नाम के बाद आप क्रोध को देख पाते हैं। 'काम' का वेग आने से पहले समझ में आ जाएगा, आप बच जाएंगे। पत्थर कहीं से आ रहा है आपकी तरफ, आपने देख लिया, आप इधर-उधर होकर अपने को बचा लेंगे। लेकिन पत्थर आता दिखाई नहीं दिया तो चोट लगने के बाद पता चलेगा, ओह! यह तो पत्थर लग गया। बस इसी तरह पूरी दुनिया को मन के पत्थर पड़ रहे हैं और समझ में नहीं आ रहे हैं क्योंकि नजर नहीं आ रहा है।

मन को कोई देख न पाये, ये नाना नाच नचाये।

सार-नाम की आध्यात्मिक शक्ति जब गुरु के द्वारा मिलती है, तो आत्मा बब्बर शेर की तरह मन पर भारी पड़ने लगती है। सद्गुरु आपके अन्दर शक्तियों का सृजन कर देता है, मथ देता है। जब ये शक्तियाँ आप में उद्गमित होती हैं, उत्पन्न होती हैं तो बस कहीं आपसे दूर कुछ भी नहीं है।

**नाम मिला तो सब मिला अन्तर रही न हेत।**
**मनसा वाचा-कर्मणा साहिब सदगुरु एक।।**।

**सत्य शब्द सत पुरुषहि जानी। नाम बिना सब झुठ बखानी।।**
**निर्गुण सर्गुण ते नाम नियारा। जो चीन्हें सो हँस हमारा।।**

**तुमको बिसर गई सुध वा घर की। महिमा अपन जनाई हो।।**
**चर्म दृष्टि का कुलफा देके। चौरासी भरमाई हो।।**

**चलो चलो सब कोई कहे। पहुँचा बिरला कोय।।**
**एक कनक अरु कामिनी। दुर्गम घाटी दोय।।**

**सात दीप प्रति प्रकर्मा, सार शब्द बिन मिटे न भ्रमाँ।।**

सहज-मार्ग क्या है? पूरी जिम्मेदारी गुरु की है। आपकी मोह-माया हटती जाएगी, आपके अंदर के विकार समाप्त होते जायेंगे, एक चौकीदार आपकी सुरक्षा के लिए खड़ा रहेगा हमेशा। 'मेरा हरि मोको भजे, मैं सोऊँ पाँव पसार।।' वाली बात हो जाएगी। यह है सहज-मार्ग। तुम्हें कुछ नहीं करना है। यह है भृंग मता।

गुरु को कीजे दण्डवत्, कोटि कोटि प्रणाम। कीट न जाने भृंग को, करिले आप समान।।

जो आपको कह रहा है कि कुछ कर, कमाई कर, समझना कि वह संत नहीं है, संत वेश में कोई पाखण्डी है, जिसे यथार्थ ज्ञान कुछ नहीं है, केवल किताबों से पढ़कर सुना रहा है। संत तो सक्षम होता है, पर वह अक्षम है। संत आँखों देखी वाली बात करता है, वह किताबों वाली बात कर रहा है। संत यथार्थ में अमरलोक से होकर आते हैं, उसने कभी अमरलोक सपने में भी नहीं देखा है। यदि सपने में भी देखा होता तो जान जाता कि अपनी ताकत से नहीं देखा, कोई दिखा गया। यह पक्की बात है कि सपने में भी अमरलोक नहीं देखा जा सकता है। फिर वहाँ पहुँचना तो बड़ी दूर की बात है। इसलिए जिसके पास भृंग मते वाली थ्योरी नहीं है, वह आपका बहुत बड़ा बैरी है क्योंकि आपको धोखे में रखे हुए है। इस बात को अपने दिल में गहराई से उतार लेना कि वह आपका सर्वनाश करने पर तुला है जो कह रहा है कि कुछ कमाई कर, कुछ साधना कर, तभी कुछ होगा। क्योंकि उस पाखण्डी को पता नहीं है कि—

ना कुछ किया ना करि सका, ना करने योग शरीर। जो कुछ किया साहिब किया, भया कबीर कबीर।।

जो कमाई करने को कह रहा है, इसका सीधा सा मतलब है कि वह कहना चाह रहा है कि उसने भी अपनी कमाई से ही सब कुछ हासिल किया है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि वह कभी अमरलोक गया ही नहीं है। उसका गुरु भी संत नहीं हो सकता है। यदि होता तो वह ऐसी बात नहीं करता। कहीं से भी उसका मत संत-मत नहीं है, कहीं से भी उसका मत भृंग-मत नहीं है। वह एक झूठा है जो अपने साथ-साथ आपको भी भवसागर में डुबाने में लगा हुआ है। उसका मुद्दा केवल धन कमाना हो सकता है, आपकी मुक्ति नहीं।

शरीर से कैसे निकलें

यह पूरा ब्रह्माण्ड इस शरीर के अन्दर विद्यमान है पर पता नहीं चल रहा है। यह कौतुक है। साहिब कह रहे हैं—

जहँ जाना तहँ निकट है, रहा सकल घटपूर। बाहरी गवे गुमान से, ताते पड़ गयो थूर।।

कह रहे हैं कि सारे घट परिपूर्ण हैं। कहीं ये किताबी बातें तो नहीं हैं? नहीं, इनमें रहस्य है। यह रहस्य महापुरुषों की वाणी से झलकता है। साहिब कह रहे हैं—

कर्म और धर्म संसार सब करत है, पीव की परख कोई संत जाने।।

बाहरी तौर पर उसकी खोज दुनिया कर रही है पर उसकी परख कोई संत ही जानता है क्योंकि दुनिया उस परम पुरुष का भेद ही नहीं जानती है और काल पुरुष को ही परम पुरुष मान कर उसे पूज रही है। फिर सबका खोजने का तरीका भी सही नहीं है।

वस्तु कहीं ढूँढ़े कहीं, केहि विधि आवे हाथ। कहे कबीर भेदी लिया, पल में देत लखात।।

वस्तु कहीं पर हो और ढूँढ़े कहीं और तो कैसे मिलेगी! पर जब भेदी मिल जाता है तो पल में बता देता है। वह कह रहे हैं—

सुरति और निरत मन पवन को पलट कर 
गंग और यमुन घाट आनै।
कहैं कबीर सो संत निर्भय हुआ, जन्म औ मरण का भ्रम भानै।।

यह सुरति कहाँ पर है? यह निरति कहाँ पर है? देखते हैं। कुछ लोग सुरति और निरति की व्याख्या मनमाने तरीके से कर रहे हैं। वे कह रहे हैं कि सुरति सुनने की ताकत को कहते हैं और निरति देखने की ताकत को। सुरति और निरति में बड़ा अन्तर है। हमारी चेतन शक्ति की दो अवस्थाएँ हैं, दो अंग हैं, दो रूप हैं। एक है—सुरति। इस सुरति में ही देखने, सुनने और समझने की शक्ति है। आप देखना कि सुनना और समझना सब ध्यान से ही होता है। ध्यान हट जाए तो कुछ भी संभव नहीं है। ये ताकतें हमारे ध्यान के अन्दर निहित हैं। फिर जो हमारी चेतना का दूसरा अंग निरति है, वह क्या चीज है? यह निरति हमारी चेतना का वह अंग है जिससे हमारे शरीर के पूरे अंग क्रियाशील हो रहे हैं। यही तो फँसी है।

पाँच को नाथ कर, साथ सोहं लिया। अधर दरियाव का सुख माने

पाँच प्राण हैं और पाँच उपप्राण हैं। अपान, समान, उदान, प्राण, व्यान। पाँचों को साथ ले लिया। मूल श्वांसा साथ ली। भाइयो, ये कैसे साथ ले लिये? इड़ा और पिंगला को लय कर लिया। ये दोनों लय होने के साथ ही सुषुम्ना नाड़ी खुल जाती है। इड़ा चंद्र नाड़ी कहलाती है, पिंगला सूर्य नाड़ी। दोनों ही लय हो जाती हैं।

इड़ा पिंगला सुषुम्ना सम करे ।। अर्द्ध और उर्द्ध विच ध्यान लावै।।

इड़ा व पिंगला दोनों को समान कर दिया और पिंगला में इड़ा लय कर दी, सुषुम्ना नाड़ी खोल दी। पाँचों प्राण सुषुम्ना में समा गये। पाँचों को नथ लिया। 'साथ सोहं लिया।' सोहंग जीव को भी कहते हैं। इस निरति को भी सोहं कहते हैं अर्थात् ऊर्ध्वमुखी कर दिया।

गंग और यमुन के घाट आने 

ये क्या हैं गंगा-यमुना? गंगा बाईं नाड़ी और यमुना दाईं नाड़ी को कहते हैं। इन दोनों का घाट सुषुम्ना का सिरा है।

कहैं कबीर सो संत निर्भय हुआ, जन्म औ मरण का भ्रम भानै।।

सुषुम्ना में लय होने से जन्म और मरण के भ्रम टूट जाते हैं। इस देह में खेल ही पूरा केवल नाड़ियों और स्वांसों का है। पवन का पूरा खेल है। साधक की इस अवस्था में सत्य का आभास होने लगता है। इस सुषुम्ना का जिक्र वाणियों में आ रहा है—

इड़ी पिंगला सुखमन बझे, आपे अलख लखावे। उसके ऊपर साचा सतगुरु, अनहद शब्द सूरति समावे।।

आखिर यह सुषुम्ना नाड़ी बड़ी कोमल नाड़ी है। जब निद्रा अवस्था में साधक पहुँचता है तो एक नाड़ी में प्रवेश करता है—कंठ की बाईं तरफ। इस मानव तन के अन्दर बड़ा कौतुक है। वह नाड़ी रोम से एक हज़ार गुणा बारीक है। उसमें प्रवेश करता है और स्वप्न की दुनिया में पहुँच जाता है। तीसरे तिल का उल्लेख भी वाणियों में आता है—

खसखस के दाने के अन्दर, शहर खुदा का बसता है। कसरत करे ऐनों के तिल में, वहीं से उसका रस्ता है।।

यह सुषुम्ना नाड़ी अत्यंत सूक्ष्म नाड़ी है। इस नाड़ी में पहुँचते ही एक ध्यानावस्था बन जाती है। पर साधक वहाँ कैसे जाए? साहिब वाणी में कह रहे हैं—

पाँच को नाथ कर, साथ सोहं लिया। सुरति और निरति मन पवन को पलट कर, गंग औ यमुन के घाट आने।।

सुरति और निरति को पलटें कैसे? समस्या गंभीर है। कई लोग आकर कहते हैं कि महाराज, जब ध्यान करते हैं तो मन नहीं टिकता है।

सुखमन मध्ये बसे निरंजन, मूँधा दसवां द्वारा।।

यह सुरति पर सवारी करके ही तो मन जाता है। सुरति की ताकत के बिना मन की मूवमेंट नहीं हो सकती है। यह सुषुम्ना नाड़ी अत्यंत स्पन्दनशील है। पूरे शरीर की चेतना इसी के द्वारा आ रही है। यह परम चेतन है पर यह सुप्त अवस्था में है। इसके अन्दर ब्रह्माण्डीय खेल भरे पड़े हैं। यह जाग जाए तो बड़े रहस्य बता देगी।

क्यों भटका फिर रहा है तू तलाश-ए-यार में, रास्ता शाह रग में है दिलबर पे जाने के लिए। पर मुर्शिद-ए-कामिल से मिल, सिदक औ सबूरी से तकी, वो तुम्हें देगा फहम, शाहरग में जाने के लिए।।

जब हम सुषुम्ना नाड़ी में आगे चलते हैं तो मन उसी अवस्था में मूर्छित होता है और तभी तुरीया अवस्था बनती है। जीव जब मन से पूरा निकल जाता है, तब तुरीयातीत अवस्था बनती है। बड़े रहस्य हैं। पर मन तुरीया में जाने नहीं देता है। मन और माया की कोशिश है कि हर इंसान को इस जाग्रत अवस्था में रखकर भौतिक चीजों में उलझाकर रखे। वर्तमान में जो भी आप देख रहे हैं, सब सपना है। जैसे हम सब नींद में कुछ देखते हैं, सत्य लगता है। पर होता नहीं है सत्य। पर यह निद्रा अवस्था का खेल है। निद्रा अवस्था के कारण जो भी दृश्य देखे, वे सब नित्य और सत्य लगते हैं। पर वे हैं भ्रमात्मक, हैं असत्य। उनका आभास कब होता है, जब हम जाग्रत अवस्था में आते हैं। तब हम जान जाते हैं कि वह तो स्वप्न था। इस तरह वर्तमान में जो कुछ भी हम अनुभव कर रहे हैं, वास्तव में यह सब भी स्वप्न है। इसीलिए संसार को तत्ववेत्ताओं ने, ज्ञानियों ने स्वप्नवत कहा। साहिब भी कह रहे हैं—

जगत है रैन का सपना।।

यह दुनिया एक स्वप्न है और नानक देव जी भी वाणी में कह रहे हैं—

यों सुपना पेखना, जग रचना तिम जान। इसमें कछू सांचो नहीं, यह नानक सांची मान।।

वो अवस्था के कारण से सच लगता है पर है नहीं। इसी तरह जाग्रत अवस्था भी अज्ञानमयी है। यह इड़ा पिंगला नाड़ी के संयोग से है। हालांकि शरीर की नौ नाड़ियाँ काम करती हैं, जिसमें इड़ा पिंगला प्रमुख होती हैं। तुरीया में सुषुम्ना नाड़ी प्रमुख होती है। पर क्या यह अमर है? नहीं। जब गोरखनाथ से साहिब की गोष्ठी हुई तो कहा—

इड़ी विनशे पिंगला विनशे, विनशे सुखमन नाड़ी। कहैं कबीर सुनो हो गोरख, कहाँ लगाइहौ ताड़ी।।

क्योंकि गोरखनाथ भी सुषुम्ना में प्रवेश लेते थे। कुछ कहते हैं कि योगी लोग छठे चक्र तक जाते हैं और संत लोग सातवें चक्र का भेद प्राप्त करते हैं। नहीं, संत लोग आठवें चक्र से प्रारंभ होते हैं। इस काया के अन्दर सात चक्र हैं। मूलाधार चक्र गुदा स्थान पर है; स्वाधिष्ठान चक्र शिश्न इन्द्री पर, जहाँ ब्रह्मा जी का वास है; मणिपूरक चक्र नाभिदल में; अनहद चक्र हृदय में; विशुद्ध चक्र कंठ में, जहाँ आदि शक्ति का वास है; आज्ञाचक्र, जहाँ आत्मा का वास है; सहस्रसार चक्र, जहाँ निरंजन का वास है। यहीं से सुषुम्ना का प्रारंभ होता है। ये सात चक्र हैं। योगी लोग प्राणों का निरोध छह चक्रों तक करते हैं। वे भृकुटी के मध्य में आकर एकाग्र हो जाते हैं। योगेश्वर सप्तम चक्र तक जाते हैं और संतों ने आठवें की बात की। गुरु नानक देव जी कह रहे हैं—

आठ अटाकी अटारी मजारा, देखा पुरुष न्यारा।

अष्टम चक्र शीश से सवा हाथ ऊपर है।
इस तरह सुषुम्ना नाड़ी भी हमें नित्य की तरफ नहीं ले जा सकती है। पर हाँ, वह रास्ता है, पराकाष्ठा नहीं है। साहिब ने जब गोरखनाथ से बात की तो गोरखनाथ सुषुम्ना नाड़ी पर ही केंद्रित हो रहे थे। तो साहिब ने कहा—

इड़ा विनशे पिंगला विनशे, विनशे सुखमन नाड़ी। कहैं कबीर सुनो हो गोरख, तब कहाँ लगाइहो ताड़ी।।

अर्थात् इड़ा पिंगला तो नाशवान हैं ही, पर सुषुम्ना भी नाशवान है। आँखें भी नाशवान हैं पर काम तो ले रहे हैं। गुरु का दर्शन भी इन्हीं आँखों से कर रहे हैं। इसी तरह महापुरुषों ने सुषुम्ना नाड़ी से कार्य लेने की बात की पर यहीं तक सीमित नहीं रहना है। वह नष्ट हो जाएगी।

जब-जब इड़ा पिंगला में लय होने लगती है तो साधक को यूँ लगता है कि उसकी श्वांसा बंद हो गयी। बहुत से लोग यहाँ डर जाते हैं। जब भी स्वांस इड़ा पिंगला से लेते हैं तो श्वांसा नाभि दल में पहुँचती है। जब भी सुषुम्ना नाड़ी खुलेगी, स्वांस ऊर्ध्वमुखी हो जाएगी। स्वांस नाभि में गिरती है तो शरीर चेतन हो जाता है क्योंकि स्वांस में आत्मा का वास है। इसलिए स्वांस को भी सोहं कहा, जीव को भी सोहं कहा, माया को भी सोहंग कहा।

आइए, हम देखते हैं कि जब यह ऊर्ध्वमुखी हो जाती है तो कपाट चेतन हो जाता है। यही जब नाभि में आती है तो देही चेतन हो जाती है क्योंकि इसके अन्दर आत्मा का वास है।

स्वांस सुरति के मध्य में, कभी न न्यारा होय। ऐसा साक्षी रूप है, सुरति निरति से जोय।।

आओ, जीते-जी मरने की बात बताता हूँ।

मरते मरते जग मुआ, मरन न जाना कोय। ऐसी मरनी न मरा, बहुरि न मरना होय।।

भाईयो, आत्मा को यमराज कैसे पकड़ लेता है! आत्मा तो पकड़ में आने वाली नहीं है। उसका कोई गला नहीं है, उसकी कोई टाँग नहीं है, उसका कोई नाक नहीं है कि रस्सी बाँध कर ले जाये। आओ, बताता हूँ कि यमराज कैसे पकड़कर ले जाता है। हमारे शरीर की ऊर्जा है प्राण। हमारे शरीर की ऊर्जा है स्वांस। हम सब स्वांस ले रहे हैं। साहिब ने कहा—'सोहं से कर प्रीत।।'।
स्वांस को सोहं कहा। इसमें अपना ध्यान लगाना।

स्वांस सूरति के मध्य में, कभी न न्यारा होय। ऐसा साक्षी रूप है, सुरति निरति से जोय।।

दुनिया सोहं सोहं जपने लग गयी। जो हम स्वांस ले रहे हैं

वह नाभि तक जाती है। वहीं से 10 वायुओं में बदलती है। आज्ञाचक्र में बैठकर आत्मा स्वांस ले रही है और नाभि तक पहुँचा रही है। एकाग्र होकर देखना, तब पता चलेगा कि एक चेतना स्वांस ले रही है। क्यों? क्योंकि आत्मा ने अपने को शरीर माना। प्राणों के बिना शरीर का संचालन नहीं है। इसलिए लगातार आत्मा यह काम कर रही है। यमदूत आत्मा से छेड़छाड़ नहीं करता है। वह प्राणों को पकड़ता है और खींचता ले जाता है तो आत्मा पीछे जाती है, कहती है कि कहाँ ले जा रहे हो प्राण! गाय ऐसे घर से कहीं नहीं जाती, लेकिन बछड़े को आगे करो तो उसके पीछे-पीछे हो लेती है। इस तरह आत्मदेव प्राणों के पीछे चलने लगता है। इस तरह यमदूत मारता है। यह है मौत। वह धीरे-धीरे प्राण खींचता है। जैसे बाहर होते हैं, शरीर ठंडा हो जाता है। आत्मा को नहीं पकड़ पाता है। इस तरह आत्मा भ्रमवश जाती है। यह काम जीते-जी खुद करो। इसी को साहिब ने कहा—

मरते मरते जग मुआ, मरन न जाना कोय। ऐसी मरनी न मुआ, बहुरि न मरना होय।।

इसका मतलब है कि हमारे शरीर का खेल प्राण से चल रहा है। हम ऊपर से लेकर नाभि में पहुँचा रहे हैं। यहाँ मत पहुँचाओ।

पवन को पलट कर, शून्य में घर किया। कहें कबीर गुरु पूरे की मेहर से, त्रिकुटी मध्य दीदार देखा।।

यह स्वांस पलट दी जाती है। कैसे? सुरति से। इसलिए सुमिरन के लिए कहा—

जप तप संयम साधना, सब सुमिरन के माहिं। कबीर जानत संतजन, सुमिरन सम कछु नाहिं।।

अरे हा रे पलट, ज्ञान भूमि के बीच चलत हैं उलटी श्वांसा।। स्वांस सुरति के मध्य में, कभी न न्यारा होय।।

अर्थात् स्वांस और ध्यान के बीच में साहिब मिल जाएंगे।

ऐसा साक्षी रूप है, सुरति निरति से जोय।।

सुरति को निरति से जोड़ लो। वह मिल जाएंगे। जैसे स्वांस पलट दी ध्यान से। आगे कह रहे हैं—

स्वांस सुरति इक डोरी लाय। अजर अमर होय लोक सिधाय।। सुरति और निरति मन पवन को पलट कर, गंग औ यमुन के घाट आने।।

तीन चीजों को पलटना बोल दिया। अब हमारी निरति कहाँ है? हमारी निरति का अंश श्वांसा में मिला। श्वांसा कहाँ है? नौ नाड़ियों में गयी। नौ नाड़ियाँ कहाँ हैं? इड़ा, पिंगला, मलवाहिनी आदि हमारे शरीर की नाड़ियाँ अधोमुखी हैं। एक नाड़ी है ऊर्ध्वमुखी, वह है—सुषुम्ना। बाकी आठों नाड़ियों का झुकाव शरीर की तरफ नीचे है। इन्हीं में स्वांस दौड़ रही है और श्वांसा में आत्मा का वास है। इसलिए आत्मा नाड़ियों में रम करके शरीर में रम गयी है। जब सुषुम्ना खुलती है तो पूरी पवनें उठकर सुषुम्ना में आती हैं। अब एक सवाल उठा कि तीनों को कैसे पलटें?

सुरति औ निरति मन् पवन को पलट कर।।

निरति तो नाभिदल से पूरे शरीर में समा गयी। सभी चक्रों में आई। सुरति जाग्रत में आँखों में रहती है। लेकिन आप देखना कि जागता-सोता हुआ आदमी भी वहाँ होता है जहाँ उसकी सुरति चली गयी। फिर वहाँ कुछ दिखाई कम पड़ेगा जहाँ उसका शरीर होगा। अब जहाँ सुरति चली गयी, वही दृश्य दिखेंगे। आपका ध्यान अगर घर में चला गया तो घर का दरवाजा दिखने लगेगा, घर का आंगन दिखने लगेगा। इसका मतलब है कि हमारी सुरति मन के बीच में है। मन माया में और पंच भौतिक तत्वों में रमा हुआ है। तीनों को मोड़ना है।

सुध कर हँसा सुध अपने देश।। सुरति से भाले काज है, तू मत भरम भुलाय।। भाइयो—ताको काल क्या करे, जो आठ पहर हुशियार।।

आप अपने में आत्मनिष्ठ हो जाओ।

पलट वजूद में अजब विश्राम है, होय मौजूद तो समझ आवै।।

जब सुरति एकाग्र हो जाती है आप स्वयं रोशन हो जायेंगे, चेतन हो जायेंगे। मन सुरति को लेकर दौड़ रहा है, इसलिए अन्दर की दुनिया में जाना मुश्किल हो रहा है। चार चीजें काबू नहीं आ रही हैं। ये हैं—सुरति, निरति, मन तथा स्वांस। इसलिए साहिब कह रहे हैं—

सुरति औ निरति मन पवन को पलट कर, गंग औ यमुन के घाट आने।

अब इन चारों को कैसे काबू करें?

सुरति के दंड से घेर मन पवन को, फेर उलटा चले। अधर दरियाव विच ध्यान लावै। कहैं कबीर संत निर्भय हुआ, जन्म औ मरण का भ्रम भानै।।

महायोगेश्वरों में साहिब का स्थान उत्तम है। जैसे नदियों में गंगा का स्थान उत्तम है, इस तरह ज्ञानियों में साहिब का स्थान बहुत उत्तम है। जैसे सौरमंडल में सूर्य का स्थान सभी नक्षत्रों, तारों से उत्तम है, इसी तरह ज्ञानियों में साहिब का स्थान बहुत उत्तम है।

तो आइए, हम देखें कि ये काबू नहीं आ रहे हैं—न मन, न सुरति, न निरति, न श्वांसा। स्वाभाविक हमारी श्वांसा का प्रवाह नाभि की ओर है। साहिब कह रहे हैं कि चारों को पकड़ना और मनुष्य चारों की साधना नहीं जान पा रहा है। बिना इन चारों को साधे सुषुम्ना नाड़ी नहीं खुलेगी और जब तक सुषुम्ना नाड़ी नहीं खुलेगी तब तक अन्दर की दुनिया उसे पता भी नहीं चलेगी। पर जब वह खुल गयी तो ब्रह्माण्ड के पूरे रहस्य, ब्रह्माण्ड के परे खेल दिखेंगे। अब सुरति का रुझान बाहरी दुनिया में है। सुरति भागती रहती है। इनको विधि पूर्वक पकड़ना होगा। आप देखते हैं कि आपके न चाहने के बावजूद भी सुरति जगत के पदार्थों की तरफ भाग जाती है। कभी आप फैसला करके बैठते हैं कि आज मैंने ध्यान ठीक से करना है, एकाग्र होना है। अगले पल क्या होता है कि आप सो जाते हैं, आप हताश हो जाते हैं या आपका ध्यान कहीं और निकल जाता है। आप बैठे रहते हैं केवल। इसका मतलब है कि ध्यान पर बिलकुल भी कंट्रोल नहीं है। जब आप ऐसे ही बैठे हैं, एकाग्र नहीं हैं तो आपको कुछ भी मिलना नहीं है। जब कुछ नहीं मिला तो अरुचि आती है। क्यों नहीं मिला?

वाह, वही बात हुई। एक बार एक मौलवी साहब से गुरु नानक देव जी की गोष्ठी हो रही थी। काफ़ी देर बातचीत हुई। बाद में मौलवी साहब ने कहा कि भाई नानकशाह जी, अभी हम नमाज अदा करेंगे। नानकदेव जी ने कहा कि मौलवी साहब, हम भी नमाज अदा करेंगे। दोनों बैठ गये, नमाज करने लगे। एकाग्र हुए। 10-15 मिनट बाद जब उठे तो नानक देव जी ने कहा कि मौलवी साहब, आप तो ध्यान में घोड़ी बाँध रहे थे। मौलवी साहब चौक गये क्योंकि जो मन का निग्रह करना जानते हैं वे किसी की मानसिकता में भी प्रवेश कर सकते हैं, घट में भी। गुरु नानकदेव जी ने चक्र शोधन से उनके अन्तःकरण में प्रवेश करके देखा कि इनका चिंतन क्या हो रहा है। मौलवी चौका, कहा—नानकशाह जी, आपको कैसे पता चला कि मैं क्या सोच रहा था? सही बात है, मेरी घोड़ी है, उसने अभी-अभी बच्चा दिया है। जब मैं नमाज कर रहा था तो मेरा ध्यान उस तरफ था। मैं सोच रहा था कि बच्चे को दूध पिलाना है। मैं सचमुच घोड़ी को बाँध रहा था। मेरा ध्यान उसी तरफ था।

इसका मतलब है कि जब भी आप ध्यान में बैठते हैं तो आपका चिंतन इस प्रकार होता है। जिन-जिन चीज़ों में आपका चिंतन होता है, आपकी सुरति, आपकी आत्मा उनमें चली जाती है। मनुष्य उनमें रम जाता है, उनमें लय हो जाता है। यह चिंतन आप खुद नहीं कर रहे हैं।

यह चिंतन मन की देन है। मन सुषुम्ना में बैठा है। यहीं से तरंगें दे रहा है शरीर को। इसलिए शरीर का संचालक मन है। आत्मा नहीं है, आत्मा तो ऊर्जा दे रही है। इसलिए पकड़ी जा रही है। संचालक मन है।

सुखमन मध्ये बसे निरंजन, मूँधा दसवां दूवारा।।

यहाँ से तरंगें देता है। जब वह तरंगें देता है तब हमारा मस्तिष्क क्रियाशील होता है। मस्तिष्क स्वयं नहीं चल रहा है। इस तरह पूरा शरीर चल रहा है। यहाँ से वह फौरन याद दिलाएगा कि फलाने ने यूँ कहा था। यहीं से इच्छाओं की तरंगें देता है। तरंग के आने मात्र से मस्तिष्क सोचने लग जाता है—लड़की का विवाह करना था। बस, आपका ध्यान उधर गया तो स्वांस फिर नाभि में आ जाएगी और शारीरिक चेतन अवस्था बरकरार रहेगी। इस तरह आत्मदेव को ऊपर नहीं जाने दे रहा है।

सुखमन मध्ये बसे निरंजन, मूँधा दसवां दुवारा।।

इस तरह वह भजन नहीं करने दे रहा है। उसको डर है कि अगर आप चेतन होकर निकल गये तो बाकी को भी निकाल लोगे। अगर आपके पास 1 करोड़ रूपया है तो आप हजार रूपया भी चूल्हे में डालना चाहोगे क्या? नहीं न! इस तरह निरंजन एक जीव भी छोड़ना नहीं चाहता है। इस दुनिया को चलाना है उसने। तो भाइयो, ये काबू नहीं आते हैं। इनकी एक विधि है।

जहूँ जाना तहूँ निकट है, रहा सकल भरपूर। बाहरी गर्व गुमान ते, ताते पड़ गयो धूर।।

अब सुरति कैसे पकड़ें? चारों चीजें काबू नहीं हो रही हैं। कबीर साहिब की गोरखनाथ से गोष्ठी हुई तो गोरखनाथ ने पूछा—

  • काया मध्ये सार क्या? साहिब ने कहा— काया मध्ये स्वासा सार।। गोरखनाथ ने फिर पूछा—कहाँ से श्वांसा उठत है, कहाँ को जाय समाय? कहा—

शून्य से श्वांसा उठत है, नाभिदल में आय।।

फिर पूछा — हाथ पाँव इसके नहीं, कैसे पकड़ी जाय?
साहिब ने कहा— हाथ पाँव इसके नहीं, यह सुरति से पकड़ी जाय।।

पक्का, यह सुरति से पकड़ में आएगी। सुरति अगर एकाग्र है तो श्वांसा कहीं से भी टस-से-मस नहीं हो सकती है। जब तक श्वांसा चलेगी तो उसका रास्ता बना हुआ है। वह शून्य से नाभि में ही आएगी।

प्राण धरेत जीवेशू

स्वांस स्वांस प्रभु सुमिर ले, वृथा स्वांस न खोय। न जाने किस स्वांस में, आवन होय न होय।।

श्वांसा सुरति से पूरी कंट्रोल में आ जाएगी।

ऊँची तानो सुरति को, तहाँ देखो पुरुष अलेख।।

साहिब की वाणी में बड़े रहस्य हैं। यह सुरति दुनिया में घूम रही है। इसे आज्ञाचक्र से अष्टमचक्र में ले जाना है। यह कैसे? गुरु के ध्यान से ताकत मिल जाती है। सुरति एकाग्र हो जाएगी। गुरु कृपा से ही सम्भव हो पाएगा।

सुरति से मन लाइए, ज्यों गागर पनिहार। हाले डोले सुरति में, कहें कबीर विचार।।

माताएँ-बहनें रेगिस्तान में जब पानी भरने जाती हैं तो कुएँ बहुत दूर-दूर होते हैं। आपस में बातचीत करती हैं पर अपना ध्यान घड़े पर ही रखती हैं। सिर पर घड़ा, घड़े के ऊपर घड़ा, उस पर भी घड़ा। हाथ ऊपर नहीं पहुँच सकता है। सुरति से घड़ा रोका हुआ है। इसका मतलब है कि सुरति में पकड़ने की ताकत भी है। सुरति एकाग्र होगी तो उस पर श्वांसा चलेगी। दोनों चीजें एक होंगी।

स्वांस सुरति के मध्य में, कभी न न्यारा होय।।

इन दोनों के बीच में।

ऐसा साक्षी रूप है, सुरति निरति से जोय।।

अब निरति कैसे काबू आएगी? श्वांसा में निरति है। निरति सिमटती जाएगी। स्वांस जहाँ जा रही है, निरति उसी के साथ जाएगी। जो एक क्रिया शरीर में चल रही है, यही तो है निरति। अब यह निरति एकाग्र हो जाएगी। जब निरति स्वांस के साथ चली तो यह कंट्रोल हो गयी। जैसे निरति कंट्रोल हो जाएगी, शरीर खाली लगेगा। साधक को ऐसा लगेगा कि मेरा शरीर ही नहीं है। साधक को ऐसा आभास होगा कि मैं देही नहीं हूँ क्योंकि शरीर का आभास निरति की शक्ति से है। निरति स्वांस में है और स्वांस नौ नाड़ियों में आकर शरीर में बिखर गयी। अब धीरे-धीरे श्वांसा सिमटती जाती है। जैसे आदमी टाँगों पर चलता है, यदि टाँगें बाँध दीं तो चल ही नहीं पाएगा। इस तरह सुरति भी बँध गयी, निरति भी बँध गयी, पवन भी बँध गयी तो मन बँध जाएगा। अब मन समझ में आने लगेगा। रहस्य यहाँ है। ऐसे कोई कितनी भी कोशिश करे मन को नहीं जान पाएगा। पर यहाँ मन समझ में आ जाएगा। जैसे मकड़ी अपनी तार पर चलती है, इस तरह सुरति पर स्वांस चलती है। सुरति अत्यंत मकरतार की तरह है। अष्टम चक्र में जुड़ी तो उसी पर स्वांस का आना-जाना होता है।

मकरतार के भेद को, जानत संत सुजान।।

धीरे-धीरे स्वांस ऊपर जाने लगती है। चारों चीजें इकट्ठा हो जाती हैं। यह किससे हुई? सुरति से। इसलिए कह रहे हैं—

सुरति के दंड से, घेर मन पवन को।।

सुरति के डंडे से हुआ यह सब। यहीं पर साहिब कह रहे हैं—

तन थिर मन थिर वचन थिर, सुरति निरति थिर होय। कहैं कबीर उस पलक को, कल्प न पावे कोय।।

शरीर भी स्थिर हो गया, मन भी स्थिर हो गया, संकल्प-विकल्प भी स्थिर हो गये, सुरति और निरति भी स्थिर हो गयी। वह एक पल कल्पों की साधना से भी अधिक हो जाता है। कल्पांतर की साधना भी उस पल की तुलना नहीं कर सकती है। साधक अपने अन्दर बड़ी दिव्य अनुभूतियाँ अनुभव करने लगता है। धीरे-धीरे स्वांस सिमटती जाएगी। इड़ा पिंगला में लय हो जाती है। सुषुम्ना नाड़ी से श्वांसा ऊपर जा रही है। जितनी शरीर की ऊर्जा या चेतना थी श्वांसा में थी। स्वांस ही सिमटती गयी तो पूरी ऊर्जा ऊर्ध्वगामी हो गयी।

अर हा रे पलट, चार अंगुल में आय जाय सो योगी है।।

अब यह श्वांसा सिर्फ चार अंगुल तक चलती है। ऊपर की तरफ श्वांसा चलती जाएगी।

पवन को पलट कर, शून्य में घर किया।।

यह शून्य में घर किया। उलटा चला। केवल स्वांस ही बन जाओ। केवल स्वांस बनने का मतलब है कि श्वांसा में स्थायी निवास ले लो। स्वांस ऊपर की ओर चलने लगी तो चारों चीजें इकट्ठा हो गयीं। साधक को ऐसा लगेगा कि मेरी श्वांसा खत्म हो रही है। ऐसा आभास होगा कि अभी मर रहा हूँ। अब यहाँ मन ध्यान को बाँटेगा। इस समय ध्यान दुनिया की चीजों में नहीं जाएगा। एक चीज की तरफ जाएगा। यहाँ भी मन क्रियाशील है। मन डराएगा कि मृत्यु हो रही है, स्वांस ख़त्म हो रही है। कभी-कभी साधक खुद चाहता है कि उसकी स्वांस नाभि में आए। खुद ध्यान करता है, खुद कल्पना करता है। जैसे उसका ध्यान और स्वांस नीचे आई, पूरा खेल खत्म हो जाता है। यहाँ मन की जीत हो गयी। यदि साधक यहाँ नहीं डरता और अपना ध्यान अष्टम चक्र पर टिकाए रखता है, पूर्णतः आत्मनिष्ठ हो जाता है और आन्तरी दुनिया देखता है। यह क्रिया जीते-जी मरने की क्रिया कहलाती है।

जीवत मरिए भवजल तरिए।। मरते मरते जग मुआ, मरण न जाना कोय। ऐसी मरनी न मुआ, बहुरि न मरना होय।। जा मरने से जग डरे, मेरे मन आनन्द। कब मरहूँ कब पाऊँ, पूर्ण परमानन्द।।

यह है 'मृत्युमाअमृतगम्य।।' मृत्यु के अन्दर से होकर अमृतत्व की तरफ चलना है। 'तमसोमाज्योतिर्गमय।।' यह क्या है? कपाट के अन्दर अन्धकार भरा पड़ा है। और जब तक आप इस अन्धकार के अन्दर हैं, तब तक मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि समझ में नहीं आयेंगे। अँधेरे में कोई भी चीज़ परखी नहीं जाती है। जैसे आप इस अन्धकार से बाहर निकलते हैं तो आगे प्रकाश है। यह है—'मृत्युमाअमृतगम्य'। यह मृत्यु से अमृतत्व की तरफ कैसे चलना है? श्वांसा को शरीर से निकालना है, यह है जीवत मरना। इस तरह मृत्यु के अन्दर से निकलकर अमृतत्व की तरफ चलना है। वाह, इस शरीर में बड़े रहस्य भरे पड़े हैं। अब साधक धीरे-धीरे सिमटता जाता है। यहाँ आपके मन की एक जीरो बन जाएगी। यहाँ साहिब कह रहे हैं—

नुकते के हेर फेर से खुदा से जुदा हुआ। नुकता पलट कर एक किया तो खुद खुदा हुआ।।

पूरा मामला ही वहाँ रुक जाता है—न मन, न बुद्धि, न चित्त, न अहंकार। ये सब सिमट गये। ध्यान रहे कि यहाँ पर भी मन एक्टिव है। यहाँ पर आपके मन में कल्पना आएगी कि आखिर शरीर कैसा होता है! आपमें रोमांच और रहस्य आएगा। आप दोबारा शरीर का सिस्टम देखना चाहोगे। मन यहाँ विवश करेगा, कहेगा कि तुम ख़तरनाक रास्ते की तरफ चल रहे हो, तुम्हारी सब चीजें सीज़ हो चुकी हैं, तुम अज्ञानमय रास्ते पर हो, यह तुम्हारी साधना उचित नहीं है, यह तो मौत हो रही है, तुम गफलत में हो, तुम्हारी तो शून्य अवस्था में मौत हो रही है। मन बहुत ताकतवर है, मन बड़ा चालाक है। किसी-न-किसी तरह से भ्रमित करके आपको ध्यान से हटा देगा। साहिब कह रहे हैं—

कोई कोई पहुँचा ब्रह्म लोक में, धर माया ले आई।।

मन यहाँ से भी वापस कर सकता है। मन बहुत ही तेज़ चीज है।

मन को मार गगन चढ़ धाय।।

मन को मारकर चलना है। स्वांस को वापस नहीं आने देना है। स्वांस उलटी चलने लगेगी तो शरीर शून्य होता जाएगा। इसमें एकाग्रता भंग नहीं होनी चाहिए। आपको लगेगा कि हाथ भारी हो गया है। उठाना चाहोगे तो नहीं उठेगा। आप देखना कि मुर्दा भारी हो जाता है। आपको लगेगा कि हाथ-पाँव भारी हैं, शरीर भारी हो गया है, निर्जीव हो गया है। मन डराएगा, कहेगा कि उठ, नहीं तो हाथ-पाँव काटने पड़ेंगे। वह बहुत चालाक है। वह कहेगा कि हाथ तो उठा। नाड़ियाँ रुक गयी हैं, ब्लड का संचालन रुक गया है, तू कर क्या रहा है! टाँग तो हिला। जैसे आपने हिलाया तो वायु नीचे आ जाएगी और एकाग्रता समाप्त हो जाएगी। बस, मन की बात नहीं माननी है। बिलकुल मरने वाली बात होगी। धीरे-धीरे लगेगा कि गले तक का शरीर काम नहीं कर रहा है। क्योंकि स्वाँस वहीं चल रही है। नीचे का शरीर लगेगा कि है ही नहीं। डटे रहना। धीरे-धीरे अब लगेगा कि माथा भी नहीं है। अब भय लगता है कि डूब गये। अंधकार में खो गये। ऐसा लगेगा कि हमेशा के लिए मर गये हो। मन फौरन शरीर की याद दिलाएगा। आत्मा छटपटाने लगती है कि शरीर कहाँ है। फिर बल लगाकर शरीर में वापस आएगा और कहेगा कि हाय, बच गये।

सहज जनि जानो साईं की प्रीत।। जीवत मरिए भवजल तरिए।।

सुषुम्ना में बड़ा अँधेरा है। समझ में नहीं आता है कि क्या करें। इसलिए—

कितने तपसी तप कर डारे, काया डारी गारा। गृह छोड़ भये सन्यासी, तउ न पावत पारा।।

मन हताश करता है, कहता है कि इतने दिन से लगे हैं, अँधेरा-ही-अँधेरा मिलता है। छोड़ यार! नहीं, लगे रहना है। अभी बाहर नहीं हुए हैं। यह है मौत से अमरत्व की तरफ चलना। अब लगेगा कि स्वाँस शरीर से सवा हाथ ऊपर चल रही है। स्वाँस से ही तो निकलना है। अब यहाँ मन भी थोड़ा काबू आ जाता है। क्योंकि वह स्वाँस से ही क्रियाशील है।

सुरति के दंड से घेर मन पवन को।।

यह मन और पवन को घेरना हुआ।

फेर उलटा चले।।

यह है—उलटा चलना। धीरे-धीरे शून्य हो जाओगे। वह पलटेगी तो लगेगा कि मर गया। यह है जीते जी मरना।

जा मरने से जग डरे, मेरे मन आनन्द। कब मरहूँ कब पाइहूँ, पूरन परमानन्द।।

एक ने कहा कि अगर ऐसा हुआ कि फिर शरीर में नहीं आए तो? मैंने कहा कि तू फिर जा ही नहीं पाएगा। इसलिए पक्का इरादा हो कि मरना-ही-मरना है। अगर आप यह सोचकर ध्यान में बैठे कि अभी उठकर रोटी बनानी है तो वहाँ भी रोटी बनाते रहोगे। अगर सोचोगे कि उठकर नहाना है तो फिर वहाँ नहाते ही रहोगे। निश्चित होकर बैठना।

...तो वह शून्य पलटनी है। जब शून्य पलटने लगती है तो जो व्यक्तित्व है, जो आपको ध्यान है कि मेरा भाई है, मेरे माता-पिता हैं, मेरे बच्चे हैं, यह पूरी स्मृति खत्म होने लग जाती है। जगत का आभास समाप्त होने लगता है और ऐसा लगने लगता है कि अभी शरीर की अनुभूति खत्म हो गयी है, मेरा आपा भी जा रहा है। यह है—अहम से निकलना। यह अहंकार कोई घमंड ही नहीं है। 'मैं हूँ', यह अनुभूति भी अहंकार है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, काम, क्रोध आदि इनकी अनुभूति भी अहंकार है। इस अवस्था में अभी अनुभूति है। यही है—अहंकार। अहंकार से निकलकर के ही निजरूप की तरफ जाना है। मैं मन हूँ, मैं बुद्धि हूँ, यहाँ तक यह आभास तो होता है। शरीर भी नहीं होता है। स्वाँस भी नहीं रह जाती है अभी। लेकिन इस बिंदु पर यह आभास है। इसलिए यहाँ भी भ्रम है। यहाँ से भी मन स्लिप कर सकता है। बस, आप एकाग्र रहना। वह पलट जाएगी। जैसे आपका ध्यान हो या न हो, आपके कदम बढ़ते चलते हैं। आपने एक लक्ष्य लिया है कि मुझे बाजार तक जाना है। बाजार तक कुछ भी सोचते हुए जा रहे हैं, कदम अपने गंतव्य की तरफ जा रहे हैं। इस तरह स्वाँसा मंजिल की तरफ चलने लगती है। धीरे-धीरे वह पलट जाती है। जब पलट जाता है तो यह तन छूट जाता है। अद्भुत, विशाल ब्रह्माण्ड अपने अन्दर दिखने लगता है। अपने स्वरूप को भी देखने लगता है। साधक को पूरी बात समझ में आ जाती है कि कैसे शरीर बन जाता हूँ, आत्मा कैसे प्राणों में समा जाती है, कैसे मन में समाती है, मन को कैसे ग्रहण करती है, शरीर और इंद्रियों में आत्मा कैसे प्रविष्ट होती है, चिंतन कैसा होता है। यहाँ पर यह पूरा ज्ञान हो जाता है। यहाँ पर साधक यह समझ जाता है। यहाँ पर यह सुरति निकली। लेकिन मन के ही दायरे में है। क्योंकि—

तीन लोक में मनहिं विराजी।।

साहिब कह रहे हैं कि तीन लोक में मन ही विराजमान है। मन की ही हुकूमत है। ज्ञानी, पंडित आदि कोई नहीं जान पा रहा है। साहिब ने ईसाइयत क्यों नहीं बोला? क्योंकि उस समय हमारे देश में ईसाइयत स्थापित नहीं हुई थी। तो अब यह काम आसान हो जाता है। तैरना तो हाथ चलाना है। हाथ चलाना पानी को काटना है। यह एक कला है। डूबने वाला भी हाथ ही चलाता है। पर वह हाथ चलाकर डूब जाता है। इस तरह साधक ठीक से साधन को नहीं समझ पाता है तो उसे कुछ हासिल नहीं होता है। इसलिए गुरु के सान्निध्य के बिना साधन करना बहुत बड़ी त्रुटि है। पूर्ण सद्गुरु होना चाहिए।

यह घट मंदिर प्रेम का, मत कोई बैठो धाय। जो कोई बैठे धाय के, बिन सिर सेती जाय।।

इस प्रेम के मंदिर में बिना सद्गुरु के नहीं जाना चाहिए। मन उलझा देगा।

एक बार पानी में तैरने की कला आ गयी तो बस, वे हाथ स्वाभाविक चलने लगते हैं। तब चाहोगे कि डूबूँ, तब भी नहीं डूब पाओगे। इस तरह अन्दर की दुनिया में नहीं भी जाना चाहोगे, तब भी जाना पड़ेगा। तब मन आपको भ्रमित नहीं कर पाएगा। आत्मा शरीर में वापस आती है तो भी शरीर में रमती नहीं है। वह विदेह हो जाता है। उसको मार्ग मिल जाता है।

बनत बनत बन जाई। प्रभु के दुवारे लगे रह भाई।।

बच्चे लोग देखना कि लकीरें खींचते रहते हैं। वे लिखना चाहते हैं। उनसे लिखना नहीं बन रहा है। जो आप लिख रहे हैं, वह भी तो लकीर ही है। पर उससे वह ठीक से नहीं बन रही है तो कहीं कॉपी पर कहीं दीवार पर लिख रहा है। जब उसे लिखना आ जाता है तो फिर नहीं लिखता है लकीरें। अब शब्द लिखना शुरू कर देता है। इस तरह साधक जब तक नहीं जान पाता है, वह केवल लकीरें खींचता है। कभी अँधेरा मिलता है, कभी कुछ। हताशा मिलती है, तंग पड़ जाता है। पर जब आभास आ गया आंतरिक जगत का तो फुर्सत नहीं होती है। फिर वह अंतर्मन करता है। अब जब भी बैठा, उसे पता चल गया कि कैसे निकलना है।

जहूँ जाना तहूँ निकट है।।

जैसे तैरने वाला छलाँग लगाकर तैरना शुरू कर देता है। वह डूबता नहीं है। क्योंकि उसे तैरने की कला आ गयी है। इस तरह अब जब भी चाहता है, अन्तर में चला जाता है। उसे पता चल गया। कभी-कभी उसके बाद भी थोड़ी त्रुटि हो जाती है। आप किसी गाँव में जा रहे हैं। एक बार गये। दोबारा जाने में भी थोड़ी मुश्किल आती है। पता तो है कि कहाँ है। पर कभी-कभी रास्ता भटक जाते हैं आप। लेकिन जब लगातार आते-जाते हैं तो आपको तो यह भी पता चलता है कि इस गाँव से फलाने गाँव का मोड़ कहाँ आता है, रास्ते में खड्डा कहाँ-कहाँ पर है, कौन-सी चीज़ कहाँ पर है और रास्ते की दूरी कितनी है, सड़क कैसी बनी हुई है, कौन-कौन सी बीच में पुलियाँ आती हैं, कौन सी नदियाँ आती हैं। आपको सब बोध हो जाता है। सब आपके चित्त में समा जाता है। अब जब आप उस गाँव में जाते हैं तो पूरे भरोसे से जाते हैं। यदि कोई पूछे तो आप उसे भी गाइड करते हैं। इस तरह साधक को आभास मिलने लगता है।

चिता तो सत्य नाम की, और न चितवे दास। जो कुछ चितवे नाम बिन, सोई काल की फाँस।।

स्वासा खाली जात है तीन लोक का मोल

स्वाँस और सुरति के मध्य में ही परमात्मा है। कबीर साहिब ने यही चेताया कि स्वाँस-स्वाँस में प्रभु का सुमिरन कर लो, स्वाँसों को व्यर्थ न गवाँओ। इन स्वाँसों का कोई भरोसा नहीं है कब अंतिम स्वाँस हो जाए। स्वाँस का आना-जाना किस पल से हो कि नहीं हो, कब रुक जाए कुछ पता नहीं है। यह जीवन साँसों पर निर्भर है। एक-एक साँस अनमोल है, तीन लोकों का मोल हर साँस का है। इन स्वाँसों को साध कर आत्मा को पाया जा सकता है। मन रूपी निरंजन स्वाँसा को सुरत में समाने से रोकता है, यह खाली जा रही है।

स्वाँस स्वाँस प्रभु सुमिरले, वृथा स्वाँस न खोय। ना जाने किस स्वाँस में आवन होय न होय।।

कहता हूँ कहि जात हूँ, कहूँ बजाय ढोल। स्वासा खाली जात है तीन लोक का मोल।।

फिर कह रहे हैं—स्वाँसों को सुरत में लगाकर ही मन रूपी पवन को घेरकर उलटा चलाया जा सकता है। इस प्रकार स्वाँस पवन को शीश से सवा हाथ ऊपर अधर में ले जाकर ध्यान से जन्म-मरण के भ्रम का ज्ञान होगा। इसी क्रिया से देह रूप पिण्ड में ब्रह्माण्ड का खेल दिखेगा और जगत का भ्रम टूटेगा। शीश और अधर के बीच सुरत में स्वाँसा से ध्यान करने पर देह में भी आकाश के समान ही लगेगा। इसी सुषुम्ना नाड़ी रूपी डोर पलटकर अधर में ले जावेगी। यहीं पवन को पलटकर शून्य में घर करना है। साहिब ने चेताया—कि स्वाँसा-पवन रूप मन को स्वयं की साधना चेष्टा से अधर-सुरत में रोकना सम्भव नहीं है। पूरे गुरु अर्थात सद्गुरु के नाम की कृपा से ही स्वाँसों को सुरति के साथ जोड़ा जा सकता है।

खेल ब्रह्माण्ड का पिण्ड में देखिया, जगत की भरमना दूर भागी। बाहरा भीतरा एक आकाशवत, सुषुम्ना डोर तहाँ पलट लागी।।

पवन को पलटकर शून्य में घर किया, धर में अधर भरपूर देखा। कहे कबीर गुरु पूरे की मेहर से, त्रिकुटी मध्य दीदार देखा।।

बिना सद्गुरु के कुछ भी नहीं हो सकेगा। हृदय कभी गुरु की ताकत के बिना प्रकाशित नहीं हो सकता। गोस्वामी तुलसीदास ने भी रामायण में गुरु की इसी महिमा को कहा—

गुरु बिन भव निधि तरइ न कोई। जों विरंचि संकर सम होई।।

ब्रह्म राम ते नामु बड़, वरदायक बरदानि। रामचरित सतकोटि महँ, लिय महेस जिय जानि।।

आमजन ही नहीं धर्म और धर्म ग्रन्थों में रुचि रखने वाले सत्संगी भक्तों ने भी यह समझ लिया कि किसी भी पंथ-धर्म के ज्ञाता को गुरु मान लो। किसी भी परलोक वासी सिद्धपुरुष को गुरु रूप में पूजने लगे और मुक्ति दाता मान लिया। संतों की वाणी, गीता, रामायण आदि शास्त्रों में वर्णित गुरु महिमा को समझा ही नहीं गया। भक्ति क्षेत्र में भी पीठों और गद्दियों पर विराजित और शास्त्र-प्रवचन कर्ताओं ने भोले-भाले जनमानस को छला है। गुरु बनने वाले और गुरु-दीक्षा लेने वाले दोनों ने ही पूर्ण या सद्गुरु की महत्ता या गुण तत्वों को धर्म से हटा दिया। शास्त्रों के अवतार चरित्रों का तर्कपूर्ण, संगीतमय बखान और मंचों पर लीलाओं को प्रदर्शित करने वाले गुरुओं को संत व सद्गुरु माना जाने लगा है। कबीर साहिब से पहले किसी भी वेद शास्त्र व ग्रंथ आदि में सन्त और सतगुरु शब्द ही नहीं था। वेद-गीता-रामायण में वर्णित सद्गुरु या पूर्ण गुरु जो परमपुरुष या परमतत्व में समाया हो, को विसरा दिया गया है। मन-आत्मा-प्राण-स्वाँसा-देह-ब्रह्माण्ड और मोक्ष के आध्यात्मिक ज्ञान के बजाय मनुष्यों को बाहरी आडम्बरों और पूजा भक्तियों के ज्ञान में उलझा दिया गया है। निज आत्म स्वरूप के ज्ञान से वंचित कर आम गुरुओं ने मनुष्यों को शरीर के जीवन-मरण-भोग-कर्म और कर्मफलों के धर्म तक सीमित कर दिया है।

आज कोई भी राम-भक्त, गोस्वामी तुलसीदास के इस तत्व ज्ञान का सत्संगी नहीं है कि ब्रह्मा और शिव-शंकर के समान होने पर भी पूर्ण गुरु के बिना कोई भव सागर के पार नहीं होगा। कोई भी कबीर साहिब के इस सद्गुरु ज्ञान का सत्संगी नहीं बनना चाहता है कि पूर्ण गुरु की दया-कृपा के बिना आत्म ज्ञान नहीं होगा। एक पूर्ण गुरु की शरण में स्वाँसा (निरति) और सुरति (आत्मा) के अन्तर-जोड़ को जाने बिना परमात्मा को नहीं जानेगा। साहिब ने कहा—

स्वाँस सुरति के मध्य में कबहुँ न न्यारा होय। ऐसा साक्षी रूप है, सुरति निरति से जोय।।

स्वाँस और सुरत को जोड़ने से ही परमात्म दर्शन होगा। सद्गुरु कोई धातु की मूर्ति नहीं, वह तो साकार-निराकार से परे स्वाँस-सुरत के मध्य साक्षात् है। सद्गुरु के नेत्रों में परमात्म ज्योति है, उनके नेत्रों के ध्यान से ही भक्त की त्रिकुटी में आत्मा जाग्रत होगी। इसलिए साँस और सुरति के मध्य सद्गुरु नयनों को लाने का योग करना ही एकाग्र भक्ति का मंत्र है। इसी एकाग्र ध्यान से मन की चंचलता या मन की तरंगों को वश में करना साध्य है। अन्य किसी भी प्रकार की भक्ति या ध्यान से मन कभी भी वश में नहीं आएगा। आत्म-प्रकाश का सृजन किसी काल्पनिक मूर्ति से सम्भव नहीं है। सद्गुरु जिस गुप्त मूल नाम को दीक्षा द्वारा देकर जाग्रत करता है, वही सद्गुरु के ध्यान से आत्मरूप में मिलता है। यज्ञ-व्रत-तप-तीर्थ-सन्यास और योग भक्ति से सद्गुरु भक्ति सरल है, सत्य है। प्रत्येक गृहस्थ भी सद्गुरु शब्द और नियमों का पालन करके मोक्ष प्राप्ति का अधिकारी हो जाता है। इसके विपरीत कठिन तपस्या के लिए सन्यासी बनकर गृह त्याग कर भी कोई मन के बंधनों से मुक्त नहीं होता। साहिब ने यही चेताया—

कितने तपसी तप कर डारे, काया डारी गारा। गृह छोड़ भये सन्यासी, तऊ न पावत पारा।।

अपने अन्दर में झाँकने, अपने हृदय, अपने भीतर ही परमात्मा को पाने की बात तो सब करते हैं पर उपाय कोई नहीं बताता। इसी कारण मनुष्य जहाँ-वहाँ भटक कर धर्म मान रहे हैं। आत्मज्ञान को यथार्थ में पाने का सत्संगी बनने और एक पूर्ण गुरु की तलाश करने की शिक्षा ही मनुष्यों को नहीं मिलती है। कबीर साहिब ने बहुत सरल तरीके से सद्गुरु और शब्द नाम के स्वाँस-स्वाँस में सुमिरन से अपने अन्दर ही परमात्मा को पाने का उपाय दिया। याद रहे शरीर के किसी भाग में ध्यान रोक कर अन्दर जाने वाले 'अन्दर' को सन्तों ने अन्दर ही नहीं बोला। स्वाँसों की इसी साधना को वेदों से आगे का भेद कहा है। स्वाँस और सुरति के मध्य रहकर सद्गुरु ही परमात्मा को खड़ा कर स्वयं हट जाता है। यही कहा—

बिन सतगुरु बाँचे नहीं, कोई कोटिन करे उपाय। स्वाँस स्वाँस जो सुमिरता, इक दिन मिलिया आय।।

सद्गुरु सत्य ही सूक्ष्म वेद हैं। सुषुम्ना नाड़ी को भी सूक्ष्म वेद कहा है—

सूक्ष्म वेद भेद जो पावे, अजर अमर होय लोक सिधावे।।

सद्गुरु महत्ता की मान्यता है कि जितने वेद हैं, निरति तक ले जाते हैं, यही 'नेति-नेति' का भावार्थ है, आगे विराम लग जाता है। साहिब ने कहा—

वेद हमारा भेद है, हम वेदन के माहिं। जौन वेद में हम बसैं, वेदहु जानत नाहिं।।

ताके आगे भेद हमारा, जानेगा कोई जानन हारा। कहै कबीर जानेगा सोई, तिस पर कृपा सतगुरु की होई।।

प्रत्येक देह में रहने वाली आत्मा ही परमपुरुष का रूप है। सत्यनाम के सुमिरन और सद्गुरु कृपा से ही आत्म स्वरूप मिलेगा—

सुमिरन से सुख होत है, सुमिरन से दुःख जाये। कहे कबीर सुमिरन किये, साई माहिं समाये।।

ऐसी आत्मा जो पंच तत्व रहित है, अभौतिक है, अनश्वर है, चैतन्य है, दोष रहित है—कैसे शरीरों में बँधी, किसने बाँधा है? यह पक्का है कि यह संसार काल का देश है। आत्मा यहाँ बड़े क्रूर बंधनों में है। इसीलिए आत्मा अपने गुण-स्वभाव के विपरीत होने से असंतुष्ट है। जो कुछ दुनिया में हो रहा है वह सब अनित्य है। सभी भूल-भुलैया में हैं। इतना बुद्धिजीवी मनुष्य इस पहेली को नहीं समझ पा रहा है। बंधनों को भली-भाँति नहीं देख-समझ पा रहा है कोई भी।

बहु बंधन से बाँधिया एक विचारा जीव। जीव विचारा क्या करे जो न छुड़ावे पीव।।

जब तक बंधनों से छुड़ाने वाला नहीं मिलेगा, आत्मा विवश है।

कहिंता नर बहुते मिले गहिंता मिला न कोय। धनवंता तेहि जानिये जेहि नाम गहिंता होय।।

देह में मन ने आत्मा को जकड़ा है। साहिब ने कहा—हे निरंजन! जिसको मैं नाम दूँगा तेरी सब ताकत धरी रह जाएगी। नाम के बाद क्रिया से शक्ति का अनुभव होता है जो आप नाम-दीक्षा के समय नहीं थे। नाम के समय सबसे मुख्य चीज़ दी कि आपको होश में कर दिया। नाम के बाद दिन-प्रतिदिन मजबूती आएगी। आप जगत से न्यारे लगने लगेंगे। साहिब ने यही कहा—

मन ही निरंजन सबै नचाई। नाम होय तो माथ नवाई।। काग पलट हँसा कर दीना। ऐसा पुरुष नाम मैं दीना।।

नाम के बाद आप में ऋद्धि-सिद्धि शक्तियाँ भी हैं। आप सक्षम हो चुके हैं, बस सदा सतर्क रहना। निरंजन ने साहिब से कहा है कि मैं भी सत्यलोक वाली बातें बोलूँगा। साहिब ने निरंजन से कहा—मेरे नामी पर तेरा जोर नहीं चलेगा। सत्यनाम पाए बिना आत्मा अनात्म कर्म कर रही है। दुःख क्या है? आत्मा शरीर के धर्म का पालन कर रही है, मन के वश होकर। मनुष्य सुख की प्राप्ति और दुःख की निवृत्ति के लिए कर्म कर रहा है। संसार में शुभ और अशुभ दो ही कर्म हैं, दोनों बंधन कारक हैं। जीवन पाँच-पच्चीसी लागी। ठगी, कत्ल, व्यभिचार, सांसारिक काम शरीर के हैं। विविध प्रकार के कर्म मनुष्य शरीर के सुख के लिए कर रहा है। इन भौतिक कर्मों से सुख नहीं मिलने वाला है। कोई सुख स्थायी नहीं है। युवा सोचते हैं कि आगे सुख मिलेगा। बूढ़े अतीत को याद करके दुःखी हैं।

कहे कबीर सुनो भाई साधो, रूई लपेटी आग है। यह संसार झाड़ और झंखाड़, उलझ-पुलझ मर जाना है। यह संसार नाव कागज की, बूँद पड़े गल जाना है। रहना नहीं देश विराना है।

गुरु नानक देव जी ने भी कहा— नानक दुखिया सब संसार।।

तन धर सुखिया कोई न देखा। जो देखा वह दुखिया। वाटई वाट सबै कोई दुखिया, क्या तपसी क्या बैरागी।।

देह का रोम-रोम मन की आज्ञा में है। मन का बहाव ही भौतिकता की तरफ है, आत्मा की तरफ नहीं जाने देगा। आत्मा तो संकल्प-विकल्प से रहित है। मन ही पहले संकल्प करता है, वही बुद्धि रूप में निर्णय करता है। मन ही चित्त रूप में वस्तु-स्थल-दृश्य बतलाता है, फिर वही कार्य रूप में अहंकार है। आत्मा में संकल्प-विकल्प नहीं हैं। मनुष्य की काया का नक्शा कहाँ से मिला? शरीर निरंजन की शक्ल पर बना है। शरीर के कारण आत्मा मुँह, आँख-कान-नाक-हाथ-पैर आदि सभी हिस्सों को अपना महसूस करती है। फिर भी आत्मा मनातीत, व्योमातीत कैसे है? आत्मा की हमारे जैसी भौतिक इन्द्रियाँ नहीं हैं, वह निःतत्व है। निरंजन ने शरीर अपनी ही नकल पर बनाया है। शरीर माया का है उसके अन्दर आत्मशक्ति है। शरीर का जलवा या नूर ही आत्मा से है। शरीर में रहते-रहते आत्मा अपने आप को भूल गई है। शरीर का संचालन मन कर रहा है, आत्मा कुली की तरह ढोने लगी है। आत्मा को जानने से बड़ा कोई काम और कोई ज्ञान नहीं है। आत्मा के ज्ञान के लिए कार्य करना ही प्राथमिक कर्त्तव्य है। साहिब ने कहा—

हँसा तू तो सबल था, अटपट तेरी चाल। रंग कुरंग ते रंग लिया, अब क्यों फिरत बेहाल।।

गरुड़ पुराण में आत्मज्ञान की बात है। आत्मा शरीर छोड़ने के बाद भी शरीर की तलाश में रहती है, इसलिए घर में गरुड़ पुराण कराते हैं। मृत शरीर को जलाकर नष्ट करने और अस्थियों को गंगा आदि पुण्य नदियों में इसीलिए विसर्जित किया जाता है। फिर आत्मा को यह ज्ञान दिया जाता है कि अब छोड़ा हुआ शरीर शेष नहीं है। यही ज्ञान समझाते हुए कागभुसुण्डि जी ने कहा—

गोस्वामी जी ने यही कहा— सुनो तात यह अकथ कहानी, समझत बनै न जाइ बखानी।

ईस्वर अंस जीव अविनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी।।

शरीर के सभी दरवाजे खुले हैं पर आत्मा नहीं निकल पा रही है। साहिब ने कहा—

इन्द्रि द्वार झरोखा नाना, तहें देवा कर बैठे थाना।। विषयन देखि कपाट उघाड़ी। चौदह देव या इन्द्र विराजे धमा चौकड़ी लागी।। जप तप नियम संयम अपारा। योगी यति न पावत पारा।।

आत्मा ने खुद को शरीर मान लिया है, भ्रम की गाँठ है। मन शातिर है, वायु-तत्व, स्वाँसा में आत्मा की शक्ति को कैद कर शरीर संचालन कर रहा है। इसी स्वाँसा को साधकर सुरत से अधर में जोड़कर मन को निर्बल बनाना है। नाम की प्रक्रिया से सद्गुरु अपने शिष्य को मन से दूर करने की यही शक्ति प्रदान करते हैं।

ज्ञान-गुदड़ी में साहिब ने मन और देह का रहस्य समझाया है। मन रूपी अलख पुरुष ने गहन विचार के साथ चौरासी लाख योनियों के धागे में आत्मा को बाँधा है। इन चौरासी लाख धागों की गुदड़ी रूपी शरीरों को पाँच तत्व और तीन गुणों से युक्त बनाया है। परमपुरुष से वरदान प्राप्त इस समर्थ अलख-निरंजन ने सृष्टि रचना के खेल संचालन की गुदड़ी में जीव, ब्रह्म और माया को बुना है। शरीरों में आत्मा को सुरति के धागे, शब्द रूपी सुई में डालकर बुद्धि (Brain) डिबिया बनाकर ज्ञान को जोड़ा है। शरीर रूपी गुदड़ी में काम-क्रोध-लोभ-मद और पच्चीस प्रकृतियों को भी धागे में पिरोकर सिया है। साहिब कह रहे हैं सब संत इस काया गुदड़ी के विस्तार और श्रृंगार को ध्यान से देखें। नेत्र रूपी दो सूरज और चाँद के पैबंद भी इस शरीर गुदड़ी में लगे हैं। सद्गुरु की कृपा पाकर जाग जाओ और देखो इस शरीर गुदड़ी को ज्ञान विचार से दाग न लगने दो। व्यर्थ मत गँवाओ। जो भी इस गुदड़ी की रचना पर विचार करेगा उसे ही इसके बनाने वाले से भेंट होगी, वही जानेगा।

हृदय रूपी झोली से क्षमा रूपी खड़ाऊँ पहनकर लगन रूपी छड़ी निकाली, अटल भक्ति से मेखला के समान अडिग रहकर सुरति की सुमिरनी से सत्यप्रेम का प्याला पियो। इस तरह मन रूपी काल-कलह का नाश होकर ममता-मोह से छुटकारा मिलेगा। सद्गुरु जब सच्चा नाम देते हैं तो इस जगत को ही जंजीर से बाँध देते हैं। शिष्य मुक्त होकर दशम द्वार से निकलकर ग्यारहवें द्वार की पहचान पा जाता है। पाँचों तत्वों, राग-त्याग-वैराग और तिलक आदि के विधानों से मुक्ति मिल जाती है। सद्गुरु के मिलने से मन खुद चकमक के समान मूल ब्रह्म अग्नि प्रकट करने में सहायक हो जाता है।

साहिब इस शरीर रूपी गुदड़ी को सुविचार के साबुन से धोने और कुविचारों के सब मैल को कैसे धोना समझा रहे हैं। कह रहे हैं—सहज आसन में धीरज की धुनी से ध्यान को सत्य के सिंहासन पर स्थिर करो। सद्गुरु यही धीरज और ध्यान रूप जोग-कमण्डल हाथों में देकर सुरति की नाभि से जोड़ देते हैं। विवेक की माला बनाकर और देह को धर्मशाला मानकर सदा दया रूप होकर जीवों की सेवा में रहो। मन को मृगछाला की तरह रखकर देह को अपनी वैशाखी बना लो। मन के जोर को खत्म कर उसे अपनी दया पर निर्भर कर दो। स्वाँसों को जनेऊ बनाकर अन्तर की शुद्धता से नाम का अजपा-जाप करने वाला ही भेद को जानेगा। इसी तरह संशय, शोक के भ्रम और पाँच-पच्चीसी प्रकृतियों पर विजय प्राप्त कर नष्ट कर दिया जाता है।

अपने हृदय को दर्पण बनाकर जब सभी दुविधाएँ छूट जाती हैं तो शिष्य पक्का बैरागी हो जाता है। दशम द्वार से ऊपर शून्य में स्वाँसों को ले जाकर सद्गुरु शब्द अमृत मिलता है। दुनिया के सुख-दुःख की कीच को धोकर सुषुम्ना का त्रिवेणी रूपी घाट भी छूट जाता है। इस प्रकार तन और मन का सच्चा ज्ञान हो जाने पर निर्वाण-पद देखने की क्षमता मिल जाती है। अष्ट दल कमल से शून्य अधर ध्यान में योगी अपने आप को पा लेता है। इंगला और पिंगला स्वाँसा सम होकर सुषुम्ना में समाकर त्रिवेणी संगम बन जाता है। इसी त्रिवेणी में स्व ब्रह्म तत्व विचार से बंकनाल में रहकर और मन की चालाकी से सतर्क रहकर शून्य में चढ़ना सद्गुरु देते हैं। शून्य के मानसरोवर की गहराई में जाकर नहाने से संसार दुःख और मैल छूट जाते हैं। अलख आत्मस्वरूप अर्थात् स्व दर्शन होकर आत्मा की आँखों से परमपुरुष को देखोगे। इस स्थिति में आने पर समस्त अहंकार (कर्म) और दम्भ का नाश हो जाएगा। ऐसे अपने शरीर रूपी घट में प्रकाश का चौक बनाकर सत्यनाम की पूजा करो। सत्यपुरुष के अकह नाम के अलावा अन्य किसी देव को ध्यान में मत लाओ। सोहं रूपी स्वाँसा को ही चन्दन, तुलसी, पुष्प जानकर चित्त से अन्य सब कुछ भुला दो। श्रद्धा रूपी पालना और प्रीत की धूप देकर सद्गुरु के नित्य-सत्य (नूतन) नाम रूप का ही सुमिरन करो।

शरीर रूपी इस गुदड़ी को इसमें स्थित अलेख-अलख आत्मा ने स्वयं ही पहन रखा है। इसी प्रकट देह को आत्मा ने अपना भेष मान लिया है। इस देह गुदड़ी के जाल से कबीर रूपी सद्गुरु साहिब ने जब मुक्त कर दिया तो समस्त सुर-नर-मुनि भी इस मनुष्य देह (गुदड़ी) की चाह करने लगे। सत्संगति में रहकर सदा सद्गुरु की दया से ही सब कुछ मिल जाता है। सत्यनाम के स्वाँसों में सुमिरन का यही ज्ञान देकर सद्गुरु भक्तों की इस गुदड़ी रूपी देह को प्रकाशित कर देते हैं। सोहं, स्वाँस को कहते हैं। स्वाँस और सुमिरन का महत्व ही ज्ञान गुदड़ी से बताया है। स्वाँस और सुरति के बीच में ही रहस्य है। यही ज्ञान गुदड़ी से समझाया है कबीर साहिब ने—

**अलख पुरुष जब किया विचारा। लख चौरासी धागा डारा।।**
**पाँच तत्व से गुदड़ी बीनी। तीन गुनन से ठाढ़ी कीनी।।**
**ता में जीव ब्रह्म अरु माया। समरथ ऐसा खेल बनाया।।**
**सब्द की सुई सुरति के डोरा। ज्ञान के डोभन सिरजन जोरा।।**
**सीवन पाँच पचीसी लागी। काम क्रोध मोह मद पागी।।**
**काया गुदड़ी के विस्तारा। देखों संतों अगम सिंगारा।।**
**चाँद सूरज दोउ पैबंद लागे। गुरु प्रताप सोवन उठि जागे।।**
**अब गुदड़ी की करू हुसियारी। दाग न लगे देखु विचारी।।**
**जिन गुदड़ी को कियो विचारा। तिन ही भेटे सिरजनहारा।।**
**सुमति के साबुन सिरजन धोई। कुरमति मैल सब डारो खोई।।**
**धीरज धूनी ध्यान को आसन। सत कोपीन सहज सिंहासन।।**
**जोग कमण्डल गहि लीना। युगति फावरी मुरसिद दीन्हा।।**
**सेली सील विवेक की माला। दया की टोपी तन धर्मशाला।।**
**मतंगा मत बैसाखी, मृगछाला मनहिं की राखी।।**
**निश्चय धोती स्वास जनेऊ। अजप जपै सो जानै भेऊ।।**
**लकुटी लौ की हिरदा झोरी। छिमा खड़ाऊँ पहिरि बहोरी।।**
**मेहर भगति मेखला सुरति सुमिरनी। प्रेम पियाला पीवे मौनी।।**
**उदास कुबरी कलह निबारी। ममता कतिया को ललकारी।।**
**जगत जँजीर बाधि जब दीन्ही। अगम अगोचर खिड़की चीन्ही।।**
**तत्त तिलक दीन्हें निरबाना। राग त्याग बैराग निधाना।।**
**गरु गम चकमक मनसा तूला। ब्रह्म अगिनि परगट करि मूला।।**
**संसय सोग सकल भ्रम जारी। पाँच पच्चीसों परगट मारी।।**
**दिल दरपन करि दुविधा खोई। सो बैरागी पक्का होई।।**
**सुन्न महल में फेरा देई। अम्रित रस की भिच्छा लेई।।**
**दुःख सुख मेल जगत के भावा। तिरबेनी के घाट छुड़वा।।**
**तन मन सोधि भयो जब ज्ञाना। तब लख पायो पद निर्वाना।।**
**अष्ट केवल दल चक्कर सूझे। योगी आप आप में बुझे।।**
**इंगला पिंगला के घर जाई। सुखमन सेज जाय ठहराई।।**
**ओअं सोहँ तत्त विचारा। बँक नाल का किया सम्हारा।।**
**मन को मारि गगन चढ़ि जाई। मानसरोवर पेठि अन्हाई।।**
**छूटे कलमल मिले अलेखा। इन नैनन साहिब को देखा।।**
**अहँकार अभिमान बिडारा। घट का चौका करि उजियारा।।**
**अनहद नाद नाम की पूजा। सत्त पुरुष बिन देव न दुजा।।**
**हित कर चँदन तुलसी फूला। चित्त कर चाउर संपुट भूला।।**
**सरधा चँवर प्रीति कर धूपा। नूतन नाम साहिब कर रूपा।।**
**गुदड़ी पहिरे आप अलेखा। जिन यह प्रगट चलायो भेषा।।**
**सत्त कबीर बकस जब दीन्हा। सुरनर मुनि सब गुदड़ी लीन्हा।।**
**गहै निरन्तर सद्गुरु दाया। सत्संगति में सब कछू पाया।।**
**कहे कबीर सुनो धर्मदासा। ज्ञान गुदड़ी करो प्रकासा।।**

सार नाम ही सत्य पुरुष है

संत सद्गुरु जो नाम शिष्य को देते हैं, वह ऐसा नाम नहीं है, जो संसार के लोगों ने समझ लिया है। धर्मदास जी भी साहिब से पूछ रहे हैं—

धर्मदास कहै सुनो गोसाई। पुरुष नाम कहऊ समुझाई।। सहस्रनाम जो वेद बखाना। नेति नेति कह बहुरि निदाना।। कौन नाम को सुमिरन करई। कैसे सदा पुरुष चित धरई।। कैसे आवागमन मिटाई। क्षर निहअक्षर कह समुझाई।।

कहा कि वेदों में जो हज़ारों नाम हैं, यह नाम उनमें से कोई है या फिर कोई और! आप जिस नाम के सुमिरन के लिए कह रहे हैं, वह कौन-सा नाम है, मुझे समझाकर कहिए, जिससे मेरा आवागमन मिटे। साहिब कह रहे हैं—

सुन धर्मनि तुम हंस पियारे। तुम्हरो काज सकल हम सारे।। सुमिरन आदि मैं तुम्हें सुनावों। सकल कामना तोर मिटावों।। नाम एक जो पुरुष को आही। अगम अपार पार नहिं जाही।। वेद पुराण पार नहिं पावै। ब्रह्मा विष्णु महेश्वर धावै।। आदि कहौं तो को पतिआई। अंत कहौं तो परलै जाई।। आदि अंत में वासा होई। निहअक्षर पावै जन सोई।। अक्खर कह सब जत्त बखाने। निहअक्षर को मर्म न जानै।।

वेद, पुराण भी इस नाम का भेद नहीं जानते हैं।

दुनिया तो 52 अक्षर की सीमा वाले नामों को ही जानती है। आज के महात्मा लोग भी यही नाम दे रहे हैं। ये सब नाम तो वेदों में दिये गये हज़ारों नामों में से हैं, पर साहिब कह रहे हैं—

नाम पार वदन नहिं पावा। नेति नेति कह सब गुहरावा।।

ऐसे तो सभी को 15-20 नाम पता होते हैं। यदि इन नामों में से कोई होता तो फिर संतों को सद्गुरु की महिमा गाने की ज़रूरत नहीं थी। फिर तो किसी बच्चे से भी नाम लिया जा सकता था।
कैसा है यह नाम? फिर वाणी से समझा रहे हैं—

कहो न जाई लिखो न जाई। बिन सतगुरु कोउ नाहीं पाई।। सतगुरु मिलै तो अगम लखावै। हंस अमी पीवत घर आवै।। अंक री जीव कहे निब्बाना। पावत हंस लोक पहिचाना।। सुरतिवंत पावै निज वीरा। संग रहौं मैं दास कबीरा।। जो कोई हंसे प्रवाना लेई। अग्र नाम सतगुरु कहि देई।। बिन सतगुरु कोई नाम न पावै। पूरा गुरु अकह समझावै।। अकह नाम वह कहा न जाई। अकह कहि कहि गुरु समझाई।। समुझत लोक परै पुनि चीन्हा। जाते लोक होइ लवलीना।। हरदम सुमिरै चित्त लगाई। लोक दीप में जाइ समाई।। अजर अमर होइ लोक सिधावै। चौरासी बंधन मुक्तावै।। आवागमन ताहि नहिं भाई। जरा मरण का बीज नसाई।।

वह नाम कहने में नहीं आता है; वाणी का विषय नहीं है। वह लिखने में भी नहीं आता है। वह अकह है। बिना सद्गुरु के उसे कोई नहीं पा सकता है। पूरा गुरु होगा, वही समझा सकता है। उसी नाम को पाकर जीव चौरासी के बंधन से छूटकर अमर-लोक में जा सकता है।

यह नाम और सद्गुरु का इतना गहरा संबंध क्यों है? क्योंकि यह नाम अलौकिक है और इसे केवल सच्चे संत-सद्गुरु से ही प्राप्त किया जा सकता है। यदि यह नाम सांसारिक नामों में से कोई होता तो फिर संतों ने सद्गुरु की इतनी महिमा नहीं गानी थी। यह नाम पोथियों में नहीं मिलेगा। क्योंकि यह नाम 52 अक्षर से परे एक सजीव वस्तु है।

गुरु सजीवन नाम बताए। जाके बल हँसा घर जाए।।

आजकल के झूठे संत जो नाम दे रहे हैं, उनसे हमारी आत्मा अमर लोक में नहीं जा सकती है, क्योंकि ये नाम तो वाणी का विषय हैं, 52 अक्षर की सीमा में आ जाते हैं। इन्हें हम भी जानते हैं। इस तरह ये नाम तो सबके पास हैं। तभी तो साहिब सतर्क कर रहे हैं—

कोटि नाम संसार में, तिनते मुक्त न होय। मूल नाम जो गुप्त है, जाने बिरला कोय।।

कह रहे हैं कि संसार में करोड़ों नाम प्रचलित हैं, पर उनसे आप मुक्त नहीं हो सकते हैं। जो सच्चा नाम है, वह गुप्त है; उसे कोई बिरला संत ही जानता है।

एक बार सिकन्दर अपने मंत्री और सेना सहित कहीं जा रहा था। जंगल का रास्ता था। उसके सैनिकों ने आगे जाने से इनकार कर दिया। फिर वहीं जंगल में पड़ाव डालना पड़ा। वहाँ पास में किसी साधु का आश्रम था। उसका मंत्री वहाँ आश्रम में गया और साधु से दीक्षा ले ली। सिकन्दर के पूछने पर उसने सारी बात बता दी। सिकन्दर ने कहा कि मैं भी जाता हूँ। वह भी गया; प्रणाम किया, पर साधु ने सिकन्दर को दीक्षा नहीं दी। वह वापस आ गया। मंत्री ने सिकन्दर से पूछा कि दीक्षा मिली? सिकन्दर ने कहा कि नहीं। फिर सिकन्दर ने मंत्री से कहा कि तू ही मुझे बता कि साधु ने क्या दीक्षा दी; कौन-सा मंत्र बताया? मंत्री ने कहा कि अभी नहीं बताऊँगा; कुछ दिनों बाद बता दूँगा।..... सोचा, यह भूल जाएगा।

घर वापस आने पर सिकन्दर फिर उससे कहता है कि बता क्या कहा था साधु ने। मंत्री भी टालता है; कहता है, थोड़ी मोहलत और दो।
थोड़ी देर बाद सिकन्दर ने फिर कहा कि बता, क्या कहा था। मंत्री ने सोचा, यह तो पूछकर ही रहेगा; कहा—कल बताऊँगा। अगले दिन दरबार लगा था। मंत्री ने सेनापति से कहा कि बादशाह को कैद कर लो। सेनापति बेचारा कुछ नहीं कर पाता है। मंत्री फिर कहता है, ओ सेनापति! तुमने सुना नहीं, यह मेरी आज्ञा है, बादशाह सिकन्दर को कैद कर लो। सेनापति फिर चुपचाप बैठा रहता है। तीसरी बार मंत्री यह बोलने ही जा रहा होता है कि सिकन्दर को गुस्सा आ जाता है; वह सेनापति से कहता है—सेनापति! मंत्री को कैद कर लो। सेनापति फौरन आता है और मंत्री को कैद कर लेता है।

तब मंत्री कहता है कि मैंने दो बार सेनापति को आज्ञा दी, पर सेनापति ने आपको कैद नहीं किया। आपके एक ही बार कहने पर सेनापति ने मुझे कैद कर लिया, क्योंकि वास्तव में इस आदेश के हकदार आप ही हैं। इसी तरह जो चीज़ उस साधु ने मुझे दी, वह चीज़ साधु ही दे सकता है; मैं वह आपको नहीं बता सकता। अगर बताऊँगा भी तो उसका कुछ लाभ नहीं होगा। बादशाह सिकन्दर को ज्ञान हो गया, समझ आ गयी।

जो सच्चा नाम है, वह केवल संतों के पास है। वह वाणी का विषय नहीं है। वह कहने-सुनने या पढ़ने-लिखने में भी नहीं आता। वह 52 अक्षर से परे सजीव वस्तु है। संतों के बिना इस सजीव नाम को नहीं पाया जा सकता। चन्दन अपनी महक स्वयं दूसरों तक पहुँचाने में सक्षम नहीं होता। हवा ही चन्दन की महक को ले जाकर दूर-दूर तक बिखेर देती है और सारा वातावरण सुगन्धित हो जाता है। सागर अपना जल स्वयं किसी को नहीं दे पाता। बादल जब सागर के जल को ऊपर ले जाकर बरसाते हैं तो पत्ता-पत्ता हरा हो जाता है, पपीहे प्रसन्न हो जाते हैं, मोर नाचने लगते हैं। साहिब कहते हैं कि इसी तरह संतों के बिना परमात्मा भी पंगु है।

संत-सद्गुरु परमात्म-तत्व को लाकर शिष्य के भीतर छोड़ते हैं। यही 'नाम' कहलाता है। इस नाम के बिना कोई भी जीव संसार-सागर से पार नहीं हो सकता। यही नाम अर्थात् स्वयं परमात्मा जीव को इस संसार-सागर से परे अमर-देश में ले जाता है।

पहली बार जब साहिब धरती पर आए तो 100 साल रहकर वापस गये। पर एक भी जीव को नहीं ले जा सके। परम-पुरुष ने पूछा कि कोई भी जीव नहीं लाए? कहा—नहीं। परम-पुरुष ने पूछा—क्यों? कहा कि जिसे सुबह समझाता हूँ, शाम को भुला देता है। जिसे शाम को समझाता हूँ, वह सुबह भुला देता है। तब परम-पुरुष ने कहा कि यह लो गुप्त वस्तु (नाम)। जिस घट में यह वस्तु दे दोगे, उस पर काल का जोर नहीं चलेगा।

इस तरह नाम रूप में सद्गुरु स्वयं मालिक साथ में कर देता है, जिसके कारण जीव को स्वयं कमाई की कोई ज़रूरत नहीं रहती, वह स्वयं ही शरीर छूटने के बाद अनल पक्षी की तरह अपने घर की तरफ चल पड़ता है।

काया नाम सर्बहिं गुण गावै, विदेह नाम कोई बिरला पावै। विदेह नाम पावेगा सोई, जिसका सद्गुरु साँचा होई।।

पाँच तीन यह साज पसारा, न्यारा शब्द विदेही हो। पाँच कहो तो छठवें हम हैं, आठ कहो नौ आई हो।।

पाँच तीन अधीन काया, न्यारा शब्द विदेह हो। मुक्ति माहिं विदेह दरशै, गुरु मता निज एह हो।।

छिन इक ध्यान विदेह समाई। ताकी महिमा बरनी न जाई।।

सत्य नाम बिन सुरति अँधी

मैंने अपने शिष्य के मन को कुछ नहीं दिया है, जो दिया आत्मा को दिया है। आपकी आत्मा से सम्बंध किया है; क्या दिया, यह मन नहीं जान पायेगा। मन तो विरोधी शक्ति है। आपकी आत्मा जान रही है, आप परम प्रकाशमय हैं। जब शिष्य मेरी सुरति करेगा, मुझमें ध्यान लगायेगा, तब मैं मिलूँगा। मन से चाहेगा तो नहीं हो पायेगा क्योंकि मन वर्जित है। मन पकड़ भी नहीं पायेगा। निरंजन को श्राप मिला है कि ध्यान नहीं कर सकता। इसी कारण मेरे शिष्य भी मेरा ध्यान नहीं कर पाते। जिसका भी ध्यान चाहो, कर सकते हो, पर मेरा ध्यान नहीं कर पाओगे। यह बहुत बड़ा कौतुक है। कभी-कभी निरंजन मेरे रूप में भी मेरे शिष्यों को ध्यान में मिलेगा। भ्रमित करने की कोशिश करेगा। सब कुछ बना लेगा पर आँखें नहीं बना सकेगा। क्योंकि दृष्टि में आत्मा का वास है।

बन्दगी में सबको नेत्रों में देखने कहता हूँ। सद्गुरु के नेत्रों से आपकी आत्मा को कुछ मिलता है। मेरे भक्त मेरे पास बार-बार क्यों आते हैं, वह सुरति लाती है जो मैंने शब्द के साथ आत्मा को दी है।

 कबीर भेदी भक्त से मेरा मन पतियाय।। 
सीढ़ी पावै सबद की निर्भय आवै जाय।।
भेदी जानै सबै गुन, अनभेदी क्या जान ।।
के जाने गुरु पारखी, के जा के लागा बन।।
पिउ परिचय तब जानिये, पिउ से हिलमिल होय।
पिउ की लाली मुख पड़े, परगट दीसै सोय।।

ऐसे मुमुक्षु भक्त की तलाश सद्गुरु को भी रहती है जो सत्य-शब्द की सीढ़ी का भेद जानकर स्वाँस-स्वाँस में सद्गुरु संग रहता है। जिसने भेद को जान लिया है वह स्वाँस-सुरति के गुणों को जानता है। जो स्वाँसों के मूल्य से अनजान है वह सुरति को कैसे जानेगा। सद्गुरु तो इस दुनिया का पारखी है वह सब भेद जानता है, उनके अलावा वह जानेगा जिसे भेद को जानने की लगन लगी है। सद्गुरु से मिलन होने पर परमपिता का परिचय मिल सकेगा। सद्गुरु से सत्य-शब्द की सुरति मिलने पर ही परमात्मा आप में प्रकट हो सकेगा।

उलटि समाना आप में, प्रगटी जोति अनंत। साहिब सेवक एक संग, खेलैं सदा बसंत।।

हम बासी उस देस के, जहूँ सत्य पुरुष की आन। दुख सुख कोइ व्यापै नहीं, सब दिन एक समान।।

हम बासी उस देस के, जहूँ नहीं मास बसंत। नीझर झरे महा अमी, भीजत हैं सब संत।।

संसय करौं न मैं डरौं, सब दुख दिये निवार। सहज सुन्न में घर किया, पाया नाम अधार।।

झिलिमिलि खेलौं सबद से, अंतर रही न रेख। समझे की मति एक है, क्या पंडित क्या सेख।।

नींव बिहूँना देहरा, देह बिहूँना देव। तहाँ कबीर बिलंबिया, करै अलख की सेव।।

कबीर साहिब ने समझाया है कि निरति के संग शरीर में आत्मा को भटका कर मन अपने ही गीत गाता है। तब मन के अलावा कोई गुरु जाना ही नहीं जा सकता। जब सद्गुरु मिल जाता है तब मन का कोई गाना रह ही नहीं जाता, भाता ही नहीं है बाहरी गीत। सुरति, सत्य शब्द की दिव्य संगति पाकर सैकड़ों सूर्यों की कतार जैसा अनंत तेज प्रकाश देखकर कौतुक से भर जाती है। आत्मा के निज घर जहाँ किसी की पहुँच नहीं है, वहाँ की झिलमिलाती अद्भुत ज्योति में कबीर पुरुष की बन्दगी करता है। वहाँ पाप, पुण्य और छूत-अछूत का भ्रमजाल नहीं है। सुरति के सच्चे नाम में समाने के बाद न तो समुद्र बचता है, न सीप बचती है न ही स्वाति बूँद की आशा रहती है। शून्य-शिखर में दिव्य-प्रकाश के मोती ही उत्पन्न होते हैं। इस देह पिण्ड से निरति को समेट कर सुरति शब्द में समाती है तो इस परदेश रूप संसार में केवल शरीर रहता है। शरीर की इन्द्रिय मुँह के बिना ही सुरति उस शब्द रूपी सागर में अमृत पीकर इस संसार रूपी देश को भूल जाती है।

संत दरिया कह रहे हैं कि सद्गुरु साहिब को पाकर सहज ही में सम्पूर्ण पाप कट गए और हृदय में भरपूर सुख-शान्ति समा गई है। सद्गुरु से सुरति तत्व पाकर यह दुखमय शरीर भूलकर शून्य में सत्य-शब्द में ध्यान से मन शुद्ध हो गया। इस प्रकार शून्य के स्नान से मन और शरीर की तपन-अग्नि शीतल हो गई है, सब दुखों का अंत हो गया है।

पाँच तत्त गुन तीन के, आगे भक्ति मकाम। जहाँ कबीर घर किया, तहँ दत्त न गोरख राम।।

सुर नर मुनि जन औलिया, यह सब उरली तीर। अलह राम की गम नहीं, तहँ घर किया कबीर।।

गुन इन्द्री सहजै गये, सतगुरु करी सहाय। घर में नाम प्रगट भया, बकि बकि मरै बलाय।।

मैं लागा उस एक से, एक भया सब माहिं। सब मेरा मैं सबन का, तहा दूसरा नाहिं।।

साहिब उस सत्य-भक्ति और परमधाम की बात समझा रहे हैं जो पाँच तत्व और तीन गुणों से परे है। वह मुकाम तीन लोकों से परे है वहाँ दत्तात्रेय और गोरखनाथ जैसे योगेश्वरों, सुर, नर, मुनि और औलियाओं की पहुँच नहीं है। इतना ही नहीं तीन लोकों के स्वामी राम और रहीम भी परमधाम के इस पार तीन लोकों के ही धनी हैं। कबीर का घर वहाँ है जहाँ इन्द्रियों और गुणों से मुक्ति होकर केवल सद्गुरु सहायक होते हैं। स्वयं में ही वह प्रकट होकर 'मैं' उस एक में समा जाता है। दूसरा कोई कुछ नहीं रह जाता सब कुछ एक ही हो जाता है, वहाँ कबीर का घर है। निज सुरति वही है जो परमपुरुष में ही समा जाती है।

इंसान सुख चाहता है। कोई व्यंजन खाने में मिठाई-नमकीन में मजा लेता है, कोई संगीत में मजा लेता है, कोई दूसरी स्त्री में मजा ढूँढता है। चोर को चोरी में मजा आता है, शराबी को शराब में और जुआरी को जुए में मजा आता है। दृश्य भी कभी कोई सुन्दर लगता है तो कभी कोई दूसरा दृश्य। मनुष्य का ध्यान भटकता रहता है। सदैव किसी एक चीज़ में मजा नहीं आता। किसी भी बाहरी आनंद में संतुष्टि क्यों नहीं होती? क्योंकि मूल आनंद आत्मा में है। सुरति बाहर रहने से अशुद्ध रूप से आनन्द प्रतीत हुआ, क्योंकि संसार का कोई भी मजा इसे स्थायी आकर्षण नहीं दे पायेगा। आनन्द तो भीतर है, बाहर केवल प्रतीत हो रहा है। दुनिया में जो मजा है, वह केवल प्रतीत हो रहा है, जो अनित्य है। जैसे स्वप्न में रसगुल्ला या बर्फी खाया, स्वप्न में राजा बन गये अथवा किन्हीं डरावनी मुसीबतों में घिर गये तो यह प्रतीत हुआ, वास्तव में था कुछ भी नहीं। जागने पर लगा कि कुछ भी था ही नहीं।

बचपन में पूरा आनन्द माँ में प्रतीत हुआ, माँ के बिना कुछ भी नहीं सुहाता था। फिर बालक हुआ तो खेल में बाहर रहने में मजा प्रतीत होने लगा, माँ के बुलाने पर भी नहीं छोड़ा जाता खेल। युवा हुआ पढ़ाई या अन्य रूचियों में आनन्द आने लगा। इसका अर्थ है माँ में था ही नहीं मजा। धुन में ही मजा है, जहाँ भी धुन लगेगी वहीं मजा आएगा पर वह आनंद शुद्ध नहीं होगा। आत्मा स्वयं ही आनंदमयी है उसे शरीर के बाहरी आनंद की ज़रूरत नहीं है। आत्मबंधन के लिए मन सुरति को संसार के बाहरी आनन्द में भटका रहा है।

आत्मानन्द सद्गुरु के ध्यान से ही सम्भव है क्योंकि उनकी सुरति मिलने पर ही हमारी सुरति मूल आनन्द की तरफ जायेगी। सद्गुरु की आत्मा बंधन मुक्त है, चैतन्य है, जैसे ही आप उनका ध्यान करोगे तो सुरति शुद्ध होकर आत्मा का स्वरूप यानी मूल आनन्द प्राप्त करेगी। 'वस्तु कहीं ढूँढे कहीं' वाली बात है। मजा आत्मा में है, ढूँढ बाहर रहे हो। सुरति की सत्य-शब्द से पहचान खो गई है।

एक आदमी नदी पर स्नान करने गया। पेड़ के नीचे कपड़े रखे और जल की ओर निहारा। जल में उसे एक हार दिखाई पड़ा, मोतियों का हार। उसने नदी में कूद कर गोता लगाया पर हार हाथ में नहीं आया। शायद भूल हो गई, सोचकर बाहर आया। फिर जल शांत हुआ तो हार दिखा। फिर कूदा, पर फिर खाली हाथ लौटना पड़ा। सोचा, पानी में जाने कहाँ खो गया है, हार। अंत में थककर कपड़े पहने और वापस चल दिया। रास्ते में एक महात्मा मिल गये, उन्हें बात बताई और नदी पर ले आया। महात्मा ने पानी में देखा तो जान गये यह तो केवल प्रतीत हो रहा है यहाँ पर, फिर ऊपर देखा तो पेड़ पर हार लटक रहा था। उस आदमी ने भी ऊपर देखा तो बड़ा खुश हुआ; पेड़ पर चढ़ा और हार ले आया।

तो, इस तरह सद्गुरु रूपी भेदी साथ होगा तो बतायेगा कि आपकी सुरति कहाँ खो गई है, किस प्रतीति में फँस गई है। केवल बतायेगा ही नहीं सुरति को आत्मानन्द से जोड़ भी देगा।

मनुष्य स्त्री और संतान में आनंद प्रतीत कर रहा है। जब स्त्री बूढ़ी या बीमार हो गई और पुत्र कुपुत्र निकला तो प्रतीत होने वाला मजा निकल गया उनमें से भी। बाहर का मजा तो अंत में कष्ट ही देगा। जिन-जिन चीजों में मजा ढूँढा, या तो वे चीजें समाप्त हो गईं या फिर उनसे अब मजा नहीं मिल रहा।

लार ग्रन्थियों की ताकत खत्म हो गई तो खाने का मजा नहीं रहा। आँखें कमजोर पड़ गईं तो दृश्य का मज़ा नहीं रहा। कानों ने सुनना बंद कर दिया तो संगीत-शब्दों का मज़ा भी नहीं रहा। विषय-भोग में भी मज़ा नहीं रहता। सूँघने की शक्ति कम हो गई तो खुशबू का मज़ा भी समाप्त हो गया। अब मन के संग लगी सुरति बेचारी क्या करे, कहाँ से मज़ा ले। अंत में एक शरीर से छूट कर दूसरे शरीर के साथ मजों में फँस गई।

मनुष्य तन पाकर ध्यान को ठीक जगह नहीं लगाया, इसलिए जन्मों-जन्मों से यही हाल होता रहा है। यदि धुन गुरु चरणों में, गुरु-शब्द में लगा दे तो मूल आनन्द नित्य आनन्द मिल जाय। सुरति और आत्मा एक ही है, बस मन ने शरीर-इन्द्रियों के आनन्द में बाँध लिया है। आत्मा परमानन्द से पूर्ण है इसमें आनन्द को आहुत नहीं करना है। कहीं से लाना नहीं है; हाँ मन से हटा कर उसे अपनी पहचान कराना है। आत्मसुरति ने शरीरों को ही अपना घर समझ लिया है।

वृहदारण्यक उपनिषद में याज्ञवल्क्य जी ने मैत्रेयी से कहा कि पति के लिये पति प्यारा नहीं लगता, स्वयं के लिए प्यारा लगता है। पति के लिए पत्नी प्यारी नहीं लगती, अपने लिए ही लगती है। पुत्र के लिए पिता प्यारा नहीं लगता, अपने लिये लगता है। ब्रह्म के लिए ब्रह्म प्यारा नहीं लगता, अपने लिये प्यारा लगता है। सबके लिए सब प्यारे नहीं लगते, अपने लिए ही सब प्यारे लगते हैं। तो, जिस आत्मा के लिए सब इतने प्यारे लगते हैं, वह आत्मा ही प्रेमपूर्ण है, इसलिए तू उसी को देख, उसी को सुन, उसी को जान। कबीर साहिब कह रहे हैं—

..जैसे मृगा नाभि कस्तूरी, खोजत मूढ़ फिरे चौगाना। व्याकुल होय मनहि मन सोचे, यह सुगन्ध कहाँ बसाना।। गुरु प्रताप निज रूप दिखानो, सो आनन्द नहिं जात बखाना। कहे कबीर सुनो भाई साधो, उलटि के आपमें आप समाना।।

सुरति रूप आत्मा स्वयं को कैसे पहचाने; हम जो भक्ति देख रहे हैं, लोग आज विष्णु जी की, कल किसी माता की, परसों गणेश और शिव की भक्ति करते हैं। जगह-जगह हाथ जोड़ने को बड़ी भक्ति मान रहे हैं। भक्ति की मुख्य धातु है—भरोसा और ध्यान। साकार-निराकार भक्ति में भी किसी एक इष्ट में विश्वास और ध्यान आवश्यक है। इष्ट का भक्ति-ध्यान छोड़कर बंदा किसी ओझा-स्याने के पास चला गया तो वहीं भक्ति निरर्थक हो गई, खत्म हो गई। अन्दर से आपकी आत्मशक्ति खत्म हो जायेगी। जिन्दगी में घटनायें होंगी, दुख-सुख रहेगा। ओझा, सयाने, ज्योतिषी के पास जायेंगे तो भ्रमित होकर भरोसा टूट जायेगा, भक्ति नष्ट हो जायेगी। जब पक्का विश्वास अपने इष्ट में होगा, हृदय से विश्वास अपने प्रभु में होगा तो यह अन्दर उतर जाएगा। सपने में भी हो तो भरोसा रहेगा। आप भटकते फिरे तो दिमाग (Brain) बुद्धि तक ही अटके रहोगे। भक्ति विश्वास हृदय में उतर जाये यह भरोसा सद्गुरु सत्संग से मजबूत होगा। इसलिए नित्य भ्रमण करता हूँ भक्तों के पास जाकर स्वयं सत्संग करता हूँ कि शिष्य परेशान होकर भटकें नहीं। "बिन सत्संग विवेक न होई।" भक्ति का विवेक बना रहे और ध्यान हर समय साहिब में हो इसलिए बाहरी भक्तियाँ वर्जित की हैं। कबीर साहिब ने कहा है—

जगत भिगत में वैर है, चारो युग परमान।। चारों युग परमान, वैर ज्यों मुस बिलाई। नेवला भुवंगम वैर, कंवल हिम कर अधिकाई।। हस्ती के सिंह बैर, बैर है दूध खटाई। भैंस घोड़ से बैर, चोर पहरू से भाई।। पाप पुण्य में बैर, अग्नि अरु पानी। संतन यही विचार, जगत की बात न मानी।।

भगत और जगत के लोगों में वैर है। जैसे चूहे और बिल्ली में वैर है, नेवला और सर्प में वैर, भैंस और घोड़े में वैर है, दूध और खटाई में वैर है। चोर और पहरेदार में वैर है। पाप और पुण्य में वैर है। अगिनि और पानी में वैर है। ये सब साथ नहीं रह सकते। इसी प्रकार संतों के विचारों के अनुरूप जग के लोग बात नहीं मानते, साथ नहीं चल पाते हैं। इंसान का स्वयं पर नियंत्रण नहीं है इसलिए कुछ का कुछ कर रहे हैं। संतजन मन की गुलाम दुनिया की बात नहीं मानते।

जगत की नजर में भगत गया, भगत की नजर मे जगत गया।

तत्व का बोध बड़ा बारीक है, तत्वज्ञानी ही तत्व का बोध कराता है।

क्या हुआ वेदों को पढ़ने से ना पाया भेद को। आत्मा जाने बिना तो ज्ञानी कहलाता नहीं।।

जब तक सुरति संसार के माया-जाल में भटक रही है वेदों के पढ़ने से भेद नहीं पायेगी। सद्गुरु से गुप्त भेद पाकर ही सुरति एकाग्र होने पर आत्म ज्ञान की पहचान होगी। बड़े वक्ताओं, गुरुओं को देखकर निर्णय करना कठिन हो रहा है कि यथार्थ में आत्मज्ञानी कौन है। आदमी उलझ जाता है, समझ नहीं पाता है। बाहरी भक्ति का स्वरूप ही ऐसा है—कथायें सुनाना, नाचना-गाना होता है। ये सब क्या है? कबीर साहिब कह रहे हैं—

नाचना कूदना ताल का पीटना, रांडिया खेल है भक्ति नाहिं।

मैं दिल्ली में सत्संग कर रहा था। एक लड़की खड़ी होकर कहने लगी, महाराज! आप कह रहे हैं कि नाचना-गाना भक्ति नहीं है, तो भक्त मीरा ने भी नाच गाने में मग्न होकर कृष्ण जी को मोहित किया था। मुझे शौंक है, आपने तो मेरा दिल ही तोड़ दिया। लड़की का सवाल पैना था। मैंने समझाया कि मीरा तब तक नाची थीं, जब तक यह सिखाया हुआ जानी कि सखियों की तरह नाच ले, कृष्ण जी प्रसन्न हो जायेंगे। साहित्यकार भी गुमराह करते हैं। जब मीरा ने संत रविदासजी से दीक्षा लेकर अन्तर्मुखी हो गई तो बाद में नाच-गान नहीं रहा। सूरदास भी सगुण उपासक थे, पर बाद में अन्तर्मुखी हुए। सगुणोपासक रहते जो गाया वह भी है और आत्मानुभव होने पर जो गाया वह भी है। 42 ग्रंथ हैं सूरदासजी के, साहित्यकार वर्गीकरण नहीं कर पाये।

कबीर साहिब ने शिष्य धर्मदास से कहा कि संतों की संगति में सत्य-भक्ति प्राप्त करो। सत्य भक्ति का भेद गुप्त है जो संसार में प्रचलित सब भक्तियों से न्यारी है। कहा—सुरति लगाय सुनो मम वाणी। छान लेहु जस जिभ्या छानी।

संतों की वाणी कानों से नहीं सुरति से सुनी जाती है। हे धर्मदास! जैसे जिभ्या भोज्य पदार्थ छानने का काम करती है, ऐसे ही मेरी बातों में सार-तत्व को समझ लेना।

सूक्ष्म गति अति भारी झीनी। ताहि दुनिया कम ही चीह्नी।।

बहुत बारीक अति सूक्ष्म तत्व है जिसे दुनिया में विरले जन ही जान पाते हैं।

शून्य शिखर न तत्व न मूला। कारण सूक्ष्म नहिं अस्थूला।। आदि ब्रह्म नहीं ओंकारा। नहीं निरंजन नहिं अवतारा।।

कह रहे हैं मैं उस सुरति की बात कह रहा हूँ जब शून्य और तत्वों का कोई अस्तित्व नहीं था। ब्रह्म और ओंकार नहीं था, अलख निरंजन के कोई अवतार नहीं थे। तुम शरीर में समाई मन रूप निरंजन की सुरति से उस परमपुरुष को नहीं जान पाओगे। कहा—

पुरुष कहों तो पुरुषहि नाहीं। पुरुष हुवा आपा भू माहिं।। शब्द कहो तो शब्दहि नाहीं। शब्द होय माया के छाहीं।। दो बिन होय न अधर अवाजा। कहो कहा यह काज अकाजा।।

यदि उस सत्ता को 'पुरुष' कहा जाए तो वह पुरुष नहीं है क्योंकि पुरुष तो स्वयं प्रकृति से हुआ है। यदि उसे 'शब्द' कहा जाए तो वह शब्द भी नहीं है, क्योंकि शब्द भी माया से ही उत्पन्न होता है। आवाज दो के बिना नहीं होती, इसलिए जहाँ द्वैत आ गया, वहाँ माया है। साहिब कबीर कह रहे हैं—

जाप मरे अजपा मरे, अनहद भी मर जाय। सुरति समानी शब्द में, वाको काल न खाय।।

अनहद धुनें अगोचरी मुद्रा साधकर योग-भक्ति में होती है। चाचरी, भूचरी, अगोचरी, उनमुनि, खेचरी योग मुद्रायें लोग किस सिद्धान्त से करेंगे, पता ही नहीं है। स्टेमिना चाहिए, ब्रह्मचर्य चाहिए योग में, ब्रेन को नियंत्रित करना होता है। आयु का भी दायरा है। वृद्धों के लिए अलग है, परिश्रम करने वालों के लिए अलग-अलग क्रियायें हैं। इसलिए पूर्वजों ने कहा योग कर सकते हो तो निर्गुण उपासना में आओ। यदि नहीं कर सकते तो सगुण-भक्ति ही कर लो।

कबीर साहिब ने संसार की सगुण-निर्गुण भक्ति उपासनाओं का भेद बताकर समझाया कि सभी मनुष्य कठिन साधना भक्ति नहीं कर सकते। यह भी कि स्वयं की साधना-भक्ति से मोक्ष कभी नहीं मिलेगा। केवल सद्गुरु की सार-सुरति मिल जाने से सामान्य मनुष्य भी सद्गुरु शरण में रहकर मोक्ष अमरधाम पायेगा।

सार नाम गुरु बिन नहीं पावे।
बिन सद्गुरु निज लोक न जावे।।

सुरति को साधने संत पलटू साहिब सहज मार्ग बताते हुए कह रहे हैं कि - मैं सब कुछ छोड़कर केवल गुरु में ही ध्यान लगाता हूँ। मैं ब्रह्मा-विष्णु-महेश त्रिदेवों की पूजा और मूर्ति चित्त में नहीं लेता। मेरा प्यारा सद्गुरु ही मेरे घट के अन्दर रहता है और मैं उसी को शीश नवाता हूँ। मैं काशी-करवत लेकर प्राण नहीं दूँगा और न पंचकोसी परिक्रमा करने जाऊँगा। प्रयाग और अन्य तीर्थों में जाकर सिर नहीं कटाऊँगा। फिर न मैं अजपा-जाप करता हूँ और न त्रिकुटी में ध्यान करता हूँ। मैं कठिन पद्मासन में बैठ अनहद धुनें भी नहीं सुनता हूँ। मैं सब मंत्र-जाप छोड़कर केवल गुरु का सुमिरन करता हूँ। गुरु की छवि ही मेरे हृदय में समाई हुई है और उन्हीं के ध्यान में मग्न रहता हूँ। मैंने तो गुरु के साथ ही प्रेम की बाजी लगाई हुई है। यदि मैं जीत गया तो उन्हें पा लूँगा और यदि हार गया तो भी उनका ही कहाऊँगा। वाणी है—

सकल तज गुरु से ही ध्यान लगैहौं।।
ब्रह्मा बिस्नु महेस न पूजिहौं, न मूरत चित लैहौं।
जो प्यारा मोरे घट मँह बसतु है, वाही को माथ नवैहौं।।

न कासी में करवत लैहौं, ना पंचकोस में जैहौं।
प्राग जाय तीरथ नहिं करिहौं, जगर न सीस कटैहौं।।
अजपा और अनाहू न साधौं, त्रिकुटी ध्यान न लैहौं।
पदम आसन खींच न बैठौं, अनहद नहिं बजैहौं।।
सबही जाप छोड़ि के साधो, गुरु का सुमिरन लैहौं।
गुरु मूरत हिरदय में छाई, वाही से ध्यान लगैहौं।।
पलटू प्रेम की बाजी, गुरु ही से दाँव लगैहौं।
जीतों तो मैं गुरु को पावौं, हारों तो उनकी कहैहौं।।

सद्गुरु के मिलन से इस देह रूपी घर में आनन्द की सुहावनी लहर समा जाती है। सुरति-निरति को एकाग्र कर देखने पर ऐसा प्रतीत होता है जैसे सद्गुरु शीश के ऊपर सिंहासन लगाये बैठे हैं। साधु संगत के पुण्यों से ही गुरु के दर्शन मिले हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे अब पूरा शरीर सद्गुरु की सुरति से ही भर गया है। उनके मिलन से दुर्लभ अमृत विचार झरने लगते हैं। बिना मंत्र और जाप के ही उनकी सुरति से सहज ही त्रिकुटी में बसा आत्मस्वरूप दिखने लगता है, मन का वश नहीं रहता। कबीर साहिब के शिष्य धर्मदासजी कहते हैं कि जो जीव साहिब अर्थात सत्यपुरुष की अगम-अगाध गति को पा लेता है वह उसी में समा जाता है। सद्गुरु शरण में आकर अगम प्रभु को पहचान लेता है।

आज सुबेलो सुहावनो, सतगुरु मेरे आये।
चन्दन अगर बसाये, मोतियन चौक पूराये।।
सेत सिंघासन बैठे सतगुरु, सुरति निरति करि देखा।
साध कृपा ते दरसन पाये, साधु संग बिसेखा।।
घर आँगन में आनन्द होवै, सुरति रही भरपूर।
झरि झरि पड़े अमीरस दुर्लभ, है नेड़े नहिं दूर।।
द्वादस मध्य देखि ले जोई, बिच है आपै आपा।
त्रिकूटी मध तू सेज निरखि ले, नहिं मंतर नहिं जापा।।
अगम अगाध गती जो लखि है, सो साहिब को जीवा।
कहे कबीर धरमदास से, भेंटि ले अपनो पीवा।।

बाहर के द्वार बन्द करके, अन्दर के खोलने हैं। जब तक कर्म और ज्ञानेन्द्रियों से कार्यों में व्यस्त हों, अन्दर की दुनिया नहीं देख सकते। आँखें खुली हैं तो चाहे-अनचाहे बाहरी दृश्य ही दिखेंगे। नौ-द्वारों को पूरा बन्द करना है तो कैसे करोगे? आँख बन्द कर ली तो क्या बन्द हो गई? नहीं। कान बन्द कर लिये तो क्या बन्द हो गये? नहीं। आप देखें कि वायु का घनत्व है। कभी कटोरी में पानी डालकर घुमाओ तो भी नहीं गिरता है। ढक्कन खुला है तो भी नहीं गिरता है। क्योंकि वायु का घनत्व है। इसका अर्थ हुआ स्वयं वायु का ही ढक्कन है। इस तरह शरीर में वायु का ढक्कन लगा है। कर्म-ज्ञानेन्द्रियाँ स्वाँसा से चेतन हो रही हैं। स्वाँसा हम वायुमण्डल से ले रहे हैं। हम वायुमण्डल में रह रहे हैं, इसलिए हमें स्वाँसा ढूँढना नहीं है। ढूँढना होता तो अधिकतर को मर जाना था।

वायुमण्डल से शरीर में पहुँचकर अंगों में 10 वायुएँ बन जाती हैं और अलग-अलग कार्य करती हैं। वायु के कारण शरीर के सभी द्वार खुले हुए हैं। मनुष्य काम कर रहा है, यह वायु का खेल है। प्राणों पर चेतन अवस्था आश्रित है। प्राण वायु लेकर नाभि में पहुँचा रहे हैं। जब ये प्राण वायु उलट कर नासिका की इड़ा-पिंगला से ऊपर खींचेंगे तब सुरति-निरति एक होकर सुषुम्ना नाड़ी खुलती है। तब नीचे स्वाँसा का नाभि की तरफ आना-जाना बन्द होता है। धीरे-धीरे उन्मुनि (मूर्छित) अवस्था बनने लग जाती है। इसे साहिब ने कहा—

बाहर के पट बन्द कर, अन्दर के पट खोल।
अष्ट कमल दल चक्कर सोधे, योगी आप आप में बोले।।

यदि पूरी वायु समेट कर सुषुम्ना में प्रवेश कर गए तो समझना कि बाहर के द्वार बन्द हुए। फिर आन्तरिक खेल है। इस तरह कर्म-ज्ञानेन्द्रियों को निश्चेत कर दिया। हमारे संत-ऋषि-मुनियों ने ब्रह्माण्डों का रहस्य बताया, यह भी बताया सब नाशवान है। इसकी सत्ता स्थाई नहीं है। यह संसार पानी का बुलबुला है, यह नश्वर है, दृढ़ नहीं है। आज खगोल विज्ञान ने अन्तरिक्ष में नई उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं, उनका प्रमाण सबके सामने है। विज्ञान ने ऊपर पहुँचकर आकाश से अन्तरिक्ष की गतिविधियों को देखा। धरती और अन्य ग्रहों के चित्र खींचकर वैज्ञानिक उपग्रह भेज रहे हैं। धर्मशास्त्रों में ब्रह्माण्डों, तीन लोक, चौदह लोक, 21 भुवन आदि बातें जो कही गई हैं वे सही हैं, कपोल-कल्पित नहीं हैं। हरेक धर्म की अलग-अलग पुरानी आधारहीन मान्यतायें विज्ञान ने दूर कर दी हैं। जैसे सूर्यदेव अपने रथ में घूमकर धरती का चक्कर लगा रहे हैं, ऐसी मान्यतायें अंधविश्वास सिद्ध हो चुकी हैं। फिर भी आज की वैज्ञानिक प्रगति से युगों पहले कबीर साहिब जैसे संतों ने ब्रह्माण्डों का रहस्य कैसे बताया? किस तरह लोक-लोकान्तरों की बातें शास्त्रों में आईं? कहाँ तक मनुष्य ने परमात्म तत्व की खोज की? कहाँ तक अनुभूतियाँ पाईं? किस प्रकार ऊपर की यात्राएँ कीं? कह रहे हैं कि 'यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे।' जैसे पिण्ड में (देह में) देख रहे हैं, वैसा ही ब्रह्माण्ड में है। वैज्ञानिकों की पकड़ से ये चीजें दूर हैं, विज्ञान केवल ब्रह्माण्ड के भौतिक तत्वों का विश्लेषण करके बता रहा है।

हमारे पूर्वज आन्तरिक साधना कर रहे थे, वे बाहरी मान्यताओं में नहीं उलझे थे। अन्तर में अनुभव इकट्ठा किये, नई-नई जानकारियाँ प्राप्त कीं। जिन चीजों का वर्णन उन्होंने किया, शास्त्रों में उल्लेख है, क्या शरीर की कर्म-ज्ञानेन्द्रियों से वहाँ पहुँचा जा सकता है? नहीं, अन्तरिक्ष में इतनी दूरी है कि कल्पना नहीं की जा सकती है। असंख्य योजन दूरियाँ बताई गई हैं, गणना से परे हैं। वैज्ञानिक यदि एक सेकेण्ड में एक करोड़ मील चलने वाला वाहन बना दे, तो भी अन्तरिक्ष की दूरी तय नहीं की जा सकती है। यह कल्पनातीत है, इसलिए वैज्ञानिक चुप हैं। कभी सुनते हैं कि दूसरे ग्रह से एलियंस आ रहे हैं। ये अन्य ग्रहों के सिद्ध-मानव हैं। इनका उल्लेख धर्मशास्त्रों में संत-ऋषियों ने किया है। हमारे पूर्वजों ने आखिर यह ज्ञान कैसे दिया था? हरेक आदमी के अन्दर छह शरीर हैं। आन्तरिक शरीरों की अवस्थाओं से ब्रह्माण्डों का रहस्य मिलता है। प्रज्ञ और महाप्रज्ञ अवस्था शरीर की ही है जिनसे ब्रह्माण्डों में घूमा जा सकता है।

कबीर साहिब ने कहा - 'खेल ब्रह्माण्ड का पिण्ड में देखिया।'

मीरा कह रही हैं - 'मीरा मनमानी सुरति सैल असमानी।' मीरा बाई को झूठ कहने की जरूरत नहीं थी, उन्होंने आसमान में घूम कर देखा।

संत नाभा जी कह रहे हैं - 'नाभा नभ खेला।' कि आकाश में जाकर खेल देखे, झूठ नहीं बोल रहे हैं, स्व-अनुभूति से कहा है। संतों के शब्दों को पढ़ते हैं, देखते हैं तो ये रहस्य मिल रहे हैं। आत्मा शरीर में किन सिद्धान्तों से कार्य कर रही है, इंसान निर्णय नहीं कर पाता है। कभी कुछ लोग अपने लगते हैं; लगता है कि इनसे कोई सम्बंध रहा है। कुछ बच्चे पूर्व जन्म की बातें बोलने लगते हैं। कुछ इंसानों का आचरण अटपटा लगता है। जीने का तरीका देखते हैं तो इंसान भौतिक तत्वों में जीता रहता है जो शरीर की जाग्रत अवस्था भर है। जाग्रत अवस्था में कुछ अनुभूतियाँ होती हैं। जब नींद में पहुँच जाते हैं दूसरी अवस्था हो जाती है। सोये आदमी को देखें तो पता चलता है कि स्थूल इन्द्रियाँ तब काम नहीं करती हैं। उसे बाहरी चीजों का पता नहीं चलता है। आँखें, कान, नाक, सब हैं। सोये आदमी के पास बैठकर कोई बात करें तो उसे समझ नहीं आती है।

हमारे पूर्वज कहीं ऐसी अवस्थाओं में पहुँचे जहाँ शरीर से निकल कर वायु-वेग से करोड़ों गुणा अधिक तेज चलते हैं। इसीलिए सुरति-निरति का रहस्य बताकर कबीर साहिब ने आन्तरिक द्वार खोलने का भेद दिया।

कबीर काया अथाह है, कोई बिरला जाने भेद।।
यह काया है समरथ केरी। काया की गति काहू न हेरी।।

नाम दान का दिन

जब आप नाम-दान लेने आ रहे हो तो एक बात जान लेना कि आज आपका नया जन्म होने जा रहा है। आज तक जीवन में जो कुछ भी छल-कपट किया, पाप-कर्म किये, भूल जाओ, क्योंकि तब अज्ञान में थे, पाप-पुण्य का इतना बोध नहीं था। वैसे पाप होना नहीं चाहिए, पर पूर्व संस्कारों से बुद्धि मलिन हुई और इस कारण पाप हुए। खैर, अब आप अज्ञानी नहीं रहेंगे। पाप-पुण्य का बोध आपको हो जाएगा, इसलिए अब कुछ गलत नहीं करना। सात नियम आपको बताए जायेंगे, जिनपर आपको दृढ़ता से चलना होगा। चिंता मत करें, आपको नाम की ताकत का सहयोग मिलेगा। कहीं गफलत में होंगे तो वह ताकत आपको रोकेगी, समझायेगी, पर उसे अनदेखा नहीं करना। यदि उसे अनसुना करके जानबूझकर गलत किया तो माफी नहीं मिलेगी। सजा साथ-साथ मिलेगी। सत्य बोलना, माँस न खाना, नशा न करना, चरित्रवान रहना, हक की कमाई खाना, जुआ नहीं खेलना और चोरी नहीं करना।

तो आपको पहले ये नियम बताए जायेंगे। आप एक विश्वास के साथ नाम लेने आ रहे हैं तो और जगहों पर आपका विश्वास नहीं होना चाहिए क्योंकि जिसकी सभी में आस्था है, समझो कि उसकी किसी में आस्था नहीं है, इसलिए वह नास्तिक है। आप आस्तिक होकर आएँ। पूरे विश्वास के साथ आएँ। इसलिए यदि आपने कोई डोरे, ताबीज, ग्रहों वाली अंगूठियाँ आदि पहन रखी हैं तो वे सब उतार आएँ, एक पूरे विश्वास के साथ समर्पित भाव से आएँ। 'एक नाम को जानकर दूजा देई बहाय।।' समझ लें कि आप सही जगह जा रहे हैं।

मैंने बार-बार कहा है कि जो वस्तु मेरे पास है, ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है। इस बात को दिमाग जल्दी नहीं मानता है। आप विश्वास रखें। ऐसे ही सब कुछ नहीं कहा। पर मैंने कभी यह नहीं कहा कि मैं ही साहिब हूँ, मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ। मैंने तो साहिब के लिए कहा। अपना नाम लेना ही नहीं है। पता है, दुनिया डर रही है। खैर, अभी तो साहिब पर्दा करके चल रहा है। जिस दिन पर्दा हट जायेगा, सब साहिब में लय हो जायेंगे। लय हो जायेंगे सब। आपको ऐसे ही सब कुछ छोड़कर आने को नहीं कहा है। इसके पीछे कोई रहस्य है।

तो फिर नाम-दान के समय आपसे एक चीज़ माँगूँगा—विश्वास। विश्वास है क्या? आप कहेंगे—हाँ, है। इसी विश्वास के बदले आपको नाम दूँगा। याद रहे, इसी विश्वास के बल पर आपको पार करना है। इसलिए सही में करना विश्वास। विश्वास क्या—

गुरु को अखंड ब्रह्म कर माने। गुरु को नहीं मानुष कर जाने।।

फिर मैंने आपसे आपका तन, मन, धन—तीनों लेने हैं; कहूँगा कि सच्चे दिल से आँख बंद करके दो। पता है, ये क्यों लूँगा? क्योंकि ये तीनों ही आत्मा पर बीमारी हैं। आत्मा भूल से इन्हें मेरा-मेरा कह रही है। इसलिए—

तन मन दिया तो भल किया, सिर का जासी भार।
जो कछु कहै सो मैं दिया, बहुत सहे शिर मार।।

बस, आप आँख बंद करके सच्चे दिल से दे देंगे। यदि सच्चे दिल से नहीं देंगे तो समझ लेना कि मैं भी सच में नहीं लूँगा। तो जब आप अपना तन, मन, धन—तीनों मुझे सौंप देंगे तो फिर बाद में मैं आपका तन आपको वापिस कर दूँगा, कहूँगा—जाओ! घर में माता-पिता होंगे, बाल-बच्चे होंगे, उनकी सेवा करना, पर आज से इसे मेरा मानकर कोई भी गलत काम नहीं करना। आप तो मुझे सौंप चुके होंगे, पर मैं आपको वापिस कर दूँगा। फिर इसी तरह धन भी आपको वापिस कर दूँगा, कहूँगा कि इससे कोई गलत काम नहीं करना, किसी पर झूठा मुकद्दमा भी नहीं करना। फिर आपका मन मैं आपको वापिस नहीं करूँगा, कहूँगा कि इसे मेरे पास ही रखना।

इसके बाद फिर आपको शीश पर अपना हाथ रखकर एक-एक करके कान में मंत्र दूँगा और आपकी आत्मा को उस एक पल में मन से अलग करके आज्ञा चक्र पर एकाग्र कर दूँगा। आपकी आत्मा को अपने में समाहित करके फिर छोड़ दूँगा। इससे जो गुरु-अंश आपके साथ टच हो जायेगा, वह कभी समाप्त नहीं होने वाला। नाम रूप में साहिब खुद साथ खड़ा हो जायेगा।

नाम पाय सत्य जो बीरा। संग रहूँ मैं दास कबीरा।।

बस, यहाँ पर अपना नया जन्म समझना। फिर आपको खोलकर नाम और मंत्र—दोनों समझा दिये जायेंगे। ध्यान में बिठाकर अभ्यास भी करवा दिया जायेगा।

नाम लेने के बाद आप सुबह-शाम नाम-भजन में बैठना। वैसे तो खाते-पीते, सोते-जागते हर समय लगे रहना। पर बैठते समय पहले ५-७ मिनट गुरु-मंत्र करना यानी आपने गुरु को याद करके बुला लिया। अब जो नाम बताया गया, उसका स्वाँसों में सुमिरन करते हुए शीश से सवा हाथ ऊपर ध्यान को एकाग्र करके जैसे बताया, वैसा करना। इस भ्रम में नहीं पड़ना कि यह नाम अभी तो जपने में आ रहा है। जैसे तार पर बिजली चलती है, ऐसे ही इसके द्वारा आध्यात्मिक किरणें आपके अंदर आयेंगी। जो नाम आपको दिया, वह कहने-सुनने में आने वाला नहीं है। वह आपके साथ है। 'सार नाम सत्पुरुष कहाया।।' वह खुद परम-पुरुष है, जिसे प्रकट कर दिया। तो इस भ्रम में न पड़कर नाम का सुमिरन करना, क्योंकि इसी से ध्यान एकाग्र होगा। वैसे कभी भी बैठ सकते हो और सच पूछो तो आधी रात का समय बड़ा सुंदर है, क्योंकि उस समय में मिल भी जाऊँगा। 'देखा देखी सब कहें, भोर भये गुरु नाम। अर्धरात को जागसी, खानाजाद गुलाम।।' छः महीने तक गुरु पूरा-पूरा आपके साथ होगा। इस बीच यदि उसे पा लिया तो पा लिया अन्यथा बाद में थोड़ी मुश्किल होगी। इसलिए जमकर ध्यान करना—पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ। यदि नाम या मंत्र भूल जाओ तो किसी भी नामी से पूछ सकते हो। पर याद रहे, अपनी पत्नी से नहीं। यदि उससे पूछा तो फिर भाई-बहन का रिश्ता हो जायेगा। किसी दूसरे गैरनामी के सामने नाम (शब्द) को प्रकट नहीं करना अन्यथा बुरी हालत हो जायेगी। नामी से आप कुछ भी समझ सकते हैं। यदि आन्तरिक दुनिया में कोई रुकावट आए तो उसके लिए मैं हर समय उपलब्ध हूँ, पूछ सकते हो।

७ विश्वास (नियम): १) नेहमी सत्य वचन बोला. २) कोणत्याही प्रकारची नशा किंवा व्यसन करू नका. ३) शाकाहारी भोजन घ्या. ४) मन, वचन आणि कर्माने चरित्रवान रहा. ५) प्रामाणिकपणाच्या कमाईनेच आपले पालन-पोषण करा. ६) शरीर व मनानेही चोरीपासून दूर रहा. ७) जुगार, सट्टा खेळण्याला पाप समजा.

ध्यान करते समय...

आत्मा के पास एक वाचिक ज्ञान है, एक परा। एक तो क्रियाओं को देखकर, मानव समाज को देखकर सीख लेते हैं, वह बुद्धि से समझा जाता है। पर एक, जो स्वतः ही हमारे अंदर ज्ञान है, वह सही ज्ञान है। कभी-कभी आपके अंदर ज्ञान के भावों का उद्गम होता है। यह क्या है? यह ज्ञान आपमें है। आत्मा ज्ञान का स्रोत है, क्योंकि परमात्मा का अंश होने के कारण यह ज्ञानमयी है। कभी आप देखते हैं कि आप किसी के विचारों को सुनना चाहते हैं। कोई आत्मा के नजदीक पहुँच जाता है। उसे चाहे कोई नहीं बताया, पर ऐसे विचार उठने लगते हैं। 'सबकी गठरी लाल है, कोई नहीं कंगाल।' यह ज्ञान स्वतः ही उठने वाला है, यह कहीं प्रगट है तो कहीं गुप्त। यह शिक्षित, अनपढ़, अमीर, गरीब सबमें परिपूर्ण है, इसलिए केवल जगाने की ज़रूरत है।

गुरु उर्जा हृदय को प्रकाशित करती है। गुरु नाम दान के समय अपनी सुरति देता है। पर शिष्य का भी सहयोग चाहिए। रहनी बोल रहे हैं—'नाम सत्य गुरु सत्य, आप सत्य जो होय। आपको भी सत्य होना होगा।' वाणपति जागसी, काह करे तसकरा। यदि घर का मालिक जाग रहा हो तो चोर क्या कर सकता है! 'उसको काल क्या करे, जो आठ पहर हुशियार।' हमेशा सुरति में रहना, चेतन रहना, चुपचाप बैठकर देखना कि मन क्या कर रहा है। मन अचेतन अवस्था पसंद करता है। यह परेशान करेगा। यह थकान अनुभव करायेगा। मन को ऊब होती है। जब भी आप ध्यान में बैठते हैं तो पाँच बातों को ध्यान में रखें। ध्यान के पाँच सूत्र बोलता हूँ।

पहला तो मेरुदण्ड सीधा रखना। मेरुदण्ड का सीधा संबंध मस्तिष्क से है। इसलिए कमर झुकी न हो। शास्त्रानुकूल भी कमर झुकाकर बैठने से आयु कम होती है। इससे पेट दब जाता है, आंतें दब जाती हैं। ध्यान में भी इसका ध्यान रखें। दूसरा यह ध्यान रखना कि मन इधर उधर तो नहीं जा रहा है।

सुमिरन मन की रीत है, भावे जहाँ लगाय।
भावे गुरू की भक्ति कर, भावे विषय कमाय।।

यह फ्री नहीं रह सकेगा। जैसे आँख खुली है तो कुछ न कुछ दिखेगा। ऐसे ही मन कहीं न कहीं लगेगा। इसलिए—

चिंता तो गुरू नाम की, और न चितवे दास।
जो कछु चितवे नाम बिन, सोई काल की फाँस।।

जब भी ध्यान में बैठें तो कोई हरकत न हो। अगर हरकत हो रही है तो वह ध्यान नहीं है फिर। साहिब ने सरल शब्दों में कहा—मन की तरंग मार लो, हो गया भजन...! इसलिए ध्यान सूत्र का दूसरा सिद्धांत है कि मन एकाग्र रहे। आपको सोच होगी कि इसे वश में कैसे करें! मन के चार रूप हैं—मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार का निग्रह ही ध्यान है, क्योंकि इनके बाद जो बचा, वही आत्मा है।

मन की तरंग मार लो, हो गया भजन....

कोई भी इच्छा नहीं करना, इच्छा मन का रूप है। इसलिए दूसरा काम यह हो। यह मन इच्छाओं में घुमाना चाहेगा, पर नहीं करना। कभी कहेगा कि बच्चों को इस स्कूल में ले जाना है, कभी कहेगा कि उसके पास जाना है, कभी कहेगा कि कुछ खा लेते हैं, कभी इच्छा होगी कि कुछ और काम कर लेते हैं। ध्यान में बैठे हुए किसी इच्छा पर चिंतन नहीं करना। तीसरा कोई भी निर्णय नहीं लेना। इच्छा होती है तो आप उसपर कुछ निर्णय लेने लगते हैं। नहीं लेना। कोई फैसला करना ही नहीं है, चाहे कितना भी कहे मन। गुरु को समर्पित होना भी यही है। फिर चौथा कुछ भी याद नहीं करना। यह मन बहुत कुछ याद करायेगा। यह चित्त का काम है। इस चित्त को पकड़ना। कुछ याद नहीं करना, गुरु के अलावा। बस, आप गुरु को समर्पित हो रहे हैं, यह गुरु की तौहीन समझो कि उनके अलावा कुछ और याद आ रहा है। फिर पाँचवाँ कोई क्रिया नहीं करना। हिल-डुल नहीं हो। कभी टाँगें कहेंगी कि थक गयी हैं, कभी शरीर कहेगा कि आराम कर लेते हैं, नहीं मानना।

इच्छा पर नियंत्रण करो तो बुद्धि आ जाती है। बुद्धि पर नियंत्रण करो तो चित्त आ जाता है। कहीं किसी का चेहरा सामने आ जाता है, उसकी आकृति दिखने लगती है। उसने कहीं २ महीने पहले आपको गाली दी, वह याद आने लगता है, क्रोध उत्पन्न होने लगता है, बुद्धि प्लानिंग करने लगती है कि बदला कैसे लें। देखा, इतनी चीजें एक साथ आ गयीं। आप उलझ गये और ध्यान कहीं का कहीं चला गया।

मानत नहीं मन मोरा साधो, मानत नहीं मन मोरा....

मन बहाए जा रहा है। कहीं कल्पनाओं में, कहीं इच्छाओं में। इच्छा करनी है तो भी आत्मा का साथ चाहिए। आत्मा के बिना कुछ नहीं हो सकता। चित्त भी आत्मा के सहयोग बिना कुछ याद करने में सक्षम नहीं। इसलिए समझ आ गया तो मन को काबू करना मुश्किल नहीं है। मन की क्रिया स्वाभाविक नहीं है। आत्मा के साथ के बिना कुछ नहीं हो सकता। स्वाँसा खुद नहीं चल रही है। आप ले रहे हैं, लेने के लिए एक क्रिया कर रहे हैं। वह कोई ले रहा है। आँखों के पीछे बैठ कोई चेतन ले रहा है। बस, जब आप इन पाँच बातों को देख लेंगे, मन वश में हो जाएगा और आप गुरु को समर्पित हो जायेंगे। तब ही आपका ध्यान जम सकेगा। ध्यान में यह मत सोचना कि अब यह दिखे, अब उड़ूँ, अब चाँद दिखेगा, अब सूर्य दिखेगा। यह भी मन का खेल है। आप बस देखना कि यह मन कहाँ जा रहा है। मन को पकड़ना है, उसे ही मारना है। इसे ही कहते हैं 'मैं' को मारना। जब 'मैं' मर गई तो समझो मन मर गया। इस मन को मारकर ही तो उस दुनिया में जाना है। जब मन के चारों रूपों—मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को हरकत नहीं करने दोगे तब वह पल आ जायेगा, जिसके लिए आप ध्यान करते हैं।

कलि में केवल नाम आधार

इस भवसागर से पार होने के लिए नाम चाहिए। नाम एक सच्चा सूत्र है, इस संसार-सागर से पार होने का। गुरु ग्रन्थ साहब में श्री गुरु नानक देव जी ने बखान किया है—'नानक नाम जहाज़ चढे सो उतरे पार।'

साहिब ने तथा संतों ने भी नाम की महिमा को कहा। इतनी बात जिज्ञासुओं को समझ में आ रही है; आदमी समझ चुका है कि नाम की ज़रूरत है। पर संसार-सागर से पार होने के लिए यह नाम कैसा, यह समझ नहीं आई। लोगों ने सोचा, शायद ५२ अक्षर वाला है यह नाम। वह जो आत्मा को पार करने का सूत्र है, वह वाणी में नहीं आता। आख़िर कैसा है वह? पार कैसे करेगा? यदि वह ५२ अक्षर समूह का होता तो गुरु के पास जाने की ज़रूरत क्या थी! तब तो हम पोथियों में, ग्रन्थों में देखकर जप सकते थे। पर नहीं! यह वह नाम नहीं है। साहिब चेता रहे हैं—

कोटि नाम संसार में, तिनते मुक्ति न होय।
मूल नाम जो गुप्त है, जाने बिरला कोय।।

दुनिया में करोड़ों नाम हैं, एक दो नहीं। हम उनसे मोक्ष पद की प्राप्ति नहीं कर सकते। वह गुप्त नाम है, जो संसार-सागर से पार करेगा। आखिर गुप्त नाम की प्राप्ति होगी कैसे? कह रहे हैं 'गुप्त नाम बिन गुरु नहीं पावे। पूरा गुरु अकह समझावे।।' एक पूर्ण गुरु के द्वारा ही वह मिल सकता है, वरना अन्य कोई कतई नहीं दे सकता। वह लिखने, बोलने में नहीं आ सकता, निःअक्षर गुप्त है। उस नाम के द्वारा ही हम काल की सीमा, जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो सकते हैं। इसके अलावा कोई सूत्र नहीं। 'जब लग सार नाम नाहिं पावे। तब लग जीव भव भटका खावे।।' जब तक सच्चे नाम की प्राप्ति नहीं होगी, आत्मा पार नहीं हो सकती।

सत्ययुग सत त्रेता तप, द्वापर पूजा चार।
कलि में केवल नाम आधार, सुमिर सुमिर भव उतरो पार।।

सतयुग में मानव सत्य के माध्यम से संसार-सागर के पार होता था। त्रेता में यज्ञ, तप का महत्व हो गया। द्वापर में मुक्ति के लिए लोग पूजा-अर्चना करने लगे। कलयुग में इनके द्वारा नहीं होगा पार। कलयुग में नाम के द्वारा ही पार हो सकता है। तो यह नाम वैसा नहीं है जैसा हमने सोच लिया है। लोग सोचते हैं कि कोई भी एक नाम जपो तो वह पार कर देगा। नहीं! साहिब कह रहे हैं—'जब लग सार नाम नहिं पावे। तब लग जीव भव भटका खावे।' जब तक सार नाम प्राप्त नहीं होगा, आत्मा को नहीं छोड़ेगा काल। इस भवसागर से छुटकारा हम केवल नाम की ताक़त से ही पा सकते हैं। यह नाम फिर है कैसा? जिस नाम की इतनी महिमा कही गयी, कहाँ मिलेगा? स्पष्ट संकेत मिल रहा है—'सार नाम संतगुरु से पाए। तब हंसा सतलोक सिधाए।।' कह रहे हैं, यह नाम एक पूर्ण गुरु ही बता सकता है। देखते हैं, कहाँ है यह नाम! आपने वाणियों में एक बात सुनी होगी कि परमात्मा आपमें है। नाम धातु क्या है? चीज़ क्या है? कैसा तत्व है, जो पार करेगा। 'सार शब्द चीज़ क्या।'

एक बार सार शब्द का महात्म बताने वाले किसी पंथ के लोग मुझे मिले। मैंने सार शब्द के बारे में पूछा तो कहा—गुरु जी ने बोला है कि बताना नहीं है। मैंने एक सवाल और किया, कहा—सार शब्द तो कहा ही नहीं जा सकता। फिर तुम कह रहे हो कि कहा है, बताना नहीं है। आख़िर तुमने किसे समझ लिया है सार शब्द! तुमने अपने मुख से खुद कहा, नहीं बताने को कहा है, पर वाणियाँ तो कह रही हैं कि लिखा न जाए, पढ़ा न जाए, कहा न जाए और तुम कह रहे हो—कहा है, नहीं बताना। आओ, तुम्हें बताता हूँ। साहिब वाणी में खुलासा कर रहे हैं—'सार शब्द सत्तपुरुष कहाया।' वह परम-पुरुष ही सार शब्द है। यानी सार शब्द मालिक है। इसकी पुष्टि हो रही है। मैंने कहा—कहीं भूल हो रही है तुमसे। यह नाम अक्षरों वाला नहीं है। 'गुरु सजीवन नाम बताए, जाके बल हंसा घर जाए।'

वास्तव में जो सच्चा नाम है, वह केवल संतों के पास है; वह वाणी का विषय नहीं है; वह कहने-सुनने या पढ़ने-लिखने में भी नहीं आता; वह 52 अक्षर से परे, सजीव वस्तु है। संतों के बिना इस नाम को नहीं पाया जा सकता। चन्दन अपनी महक स्वयं दूसरों तक पहुँचाने में सक्षम नहीं होता; सागर अपना जल स्वयं किसी को नहीं दे पाता। हवा ही चन्दन की महक को ले जाकर दूर-दूर तक बिखेर देती है और सारा वातावरण सुगंधित हो जाता है। बादल जब सागर के जल को ऊपर ले जाकर बरसाते हैं तो पत्ता-पत्ता हरा हो जाता है, पपीहे प्रसन्न हो जाते हैं, मोर नाचने लगते हैं। साहिब कहते हैं कि इसी तरह संतों के बिना परमात्मा भी पंगु है। सत-सद्गुरु परमात्म-तत्व को लाकर शिष्य के भीतर छोड़ते हैं, यही नाम कहलाता है। इस नाम के बिना कोई भी जीव संसार-सागर से पार नहीं हो सकता। यही नाम अर्थात् स्वयं परमात्मा जीव को इस संसार-सागर से परे अमर-देश में ले जाता है। 'कोटि जन्म का पथ था, गुरु पल में दिया पहुँचाय।'

यह नाम रक्षा भी करेगा। अपने एक शब्द में साहिब कह रहे हैं—'सतगुरु शब्द सहाई।'
नाम से भूत-प्रेत नहीं लगेंगे, ग्रह आपको सता नहीं पायेंगे। नाम की हाज़री में कोई चीज़ पास नहीं आ पायेगी। एक महात्मा को टी.वी. पर देखा; जब उन्होंने हाथ ऊपर उठाया तो मैंने देखा, तीन अंगूठियाँ पड़ी थीं। वाह! मैंने सोचा, यह तो खुद ही ग्रहों से डर रहे हैं, फिर शिष्यों को अभय पद कैसे देंगे! साहिब कह रहे हैं, ग्रहों का प्रभाव नहीं पड़ेगा, जादू भी नहीं चलेगा किसी का। नाम कवच की तरह रक्षा करेगा। इहलौकिक और पारलौकिक दोनों सुख नाम देगा। 'नानक दुखिया सब संसार। सुखी सो जिहि नाम आधार।।' 'जो सुख को चाहो सदा, जो शरण नाम की लेह।' जिस दिन नाम की ताकत आ जाती है, इहलौकिक और पारलौकिक, दोनों तरह की शक्तियाँ आप में आ जाती हैं। लोगों ने तो नाम को जीविका का साधन बना लिया, जिसमें सारा संसार उलझ गया। लाखों लोग आज नाम दे रहे हैं। पर साहिब चेता रहे हैं—

कोटि नाम संसार में, तिनते मुक्ति न होय।
मूल नाम जो गुप्त है, जाने बिरला कोय।।

कहैं कबीर सुमिरन किये साई माहिं समाय

सुमिरन से सुख होत है, सुमिरन से दुख जाय।।

क्या सच में सुमिरन से सुख की प्राप्ति होती है?

कहैं कबीर सुमिरन किये, साई माहिं समाय।।

क्या सच में केवल सुमिरन से हम परमात्म-तत्व की प्राप्ति कर सकते हैं? केवल सुमिरन से परमात्म-तत्व की प्राप्ति होती है। जितनी देर सुमिरन कर रहे हैं, उतनी देर आप आत्मनिष्ठ हैं, उतनी देर आपका मन पर नियंत्रण है, उतनी देर आप आत्मा के नज़दीक हैं।

जप तप संयम साधना, सब सुमिरन के माहिं।
कबीर जानत संत जन, सुमिरन सम कछु नाहि।।

जप, तप, संयम, साधना आदि सब सुमिरन में आते हैं। एक बालक था। उसके बाप ने कहा कि तू माता को परेशान करता रहता है, कभी खोया खाना, कभी दही खाना, कभी बर्फी खाना। तू ऐसा किया कर कि तू दूध पी लिया कर; उसी में सब कुछ आ जाता है; सब उसी से बनती हैं। इस तरह सुमिरन के अन्दर सब आ जाता है। सुमिरन के समान कुछ भी नहीं है।

सुमिरन से सुख होत है, सुमिरन से दुख जाय।।

क्या यथार्थ में सुख की प्राप्ति होती है? जब भी सुमिरन कर रहा है, शांत है, चिंतन पर नियंत्रण है। कुछ अन्य विचार उत्पन्न नहीं होते हैं। सब कंट्रोल होता है। तो स्वाभाविक है कि शांति मिलेगी। सुमिरन एक अनूठी चीज़ है।

राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कमति ऊबारी।।
कहूँ लग करौं मैं नाम बढ़ाई। राम न सकहिं नाम गुण गाई।।

रामायण में भी सुमिरन का महत्व है। गुरु नानक देव जी कह रहे हैं—'नानक जो निशि दिन भजे, रूप राम तेहि जान।' जितनी देर सुमिरन में है, आत्मा के नज़दीक है, उतनी देर आप एकाग्र हैं।

सकल रोग की औधध नाम।।

क्या सही में सब रोगों की औषधि है यह नाम? इस पर नज़दीकी से कोई नहीं जाता है। सही में यह बहुत बड़ी औषधि है।

'सबै रसायन मैं किया, नहीं नाम सम कोय।।'

यह सर्व रोगों की दवा है। जब कोई कहता है कि पेट में दर्द है, तो मैं कहता हूँ कि नाम-भजन करना। कोई कहता है कि सिर-दर्द है, कोई उपाय नहीं मिल रहा है तो मैं उसे भी कहता हूँ कि नाम-भजन करना। कोई कहता है कि भूत-प्रेत तंग कर रहे हैं तो उसे भी कहता हूँ कि नाम करना। तो कभी वह सोचता है कि जिस भी काम के लिए जाओ, यही कहते हैं कि सुमिरन करना। एक ही बात कहते रहते हैं। साफ़ तो कह रहे हैं—

सुमिरन से सुख होत है, सुमिरिन से दुख जाय।
कहैं कबीर सुमिरन किये, साई माहिं समाय।।

मीडिया ने जहाँ लोगों को चेतन किया है, वहीं बहुत नुकसान भी किया है—आजकल ग्रह-नक्षत्रों का खेल देखकर कई लोग गण्डमूल आदि पहनने लग गये हैं। सब इन्हीं में उलझ रहे हैं। एक चीज़ और है, कोई चौकी लेता है तो कहते हैं कि इसमें फलाना बाबा आया है। मैं कहता हूँ कि यह बात ९९.९९९९ प्रतिशत गलत होती है। यानी १० लाख में १ आदमी होगा। बाकी गलत होता है। उदाहरण देता हूँ। फलांवाला में एक औरत का बंदा चला गया। वह गुम हो गया। लोग कहने लगे कि रुड़ (बह) गया दरिया में। घर के लोग तो रो-धोकर चुप बैठ गये। पर सयाने कहाँ चुप बैठने वाले थे! उनका तो सगा था। सयाने आए, कहने लगे कि हत्या मनाओ। वे हत्या मनाने लगे। अब उसकी औरत चौकी लेने लगी। आसपास के लोग आने लग गये। ४० साल हो गये। बाबा की डेहरी बन गयी। उसके भतीजे की कहीं डोडा में पोस्टिंग हुई। उसने पहचान लिया। वह मंदिर में था। उसने देखा कि बाप से शक्ल मिल रही है। उसने तहकीकात की तो वही निकला। बूढ़ा घर आया तो कहा कि कौन-सी हत्या मना रहे हो? जिंदे आदमी की हत्या मनाने लग गये! औरत को कहा कि तू कौन-सा नाटक कर रही है? सयानों को कहा कि कौन-सी हत्या आती है, मैं तो यहाँ जिंदा हूँ? यह मामला काफी दिन चला। इस तरह से बातें होती हैं। यह काम जोर-शोर से चल रहा है।

अमृतसर से एक का फोन आया, कहा कि मैं आपका सेवक बोल रहा हूँ। मैंने कहा कि क्या बात है? कहा कि ज़रूरी बात है। मैंने कहा कि जल्दी कर, समय नहीं है। वह बोला कि मेरा भाई है, वह गुरु का काम करता है। बड़े चेले हैं। मेरी बात होती थी, मानता नहीं था। उसे गुरु का घमण्ड भी है। मैंने उसे चार किताबें दीं। अनुरागसागर वाणी पढ़कर उसे कुछ समझ आई है; वह आपसे बात करना चाहता है। आधा घण्टा समय दो। मैंने कहा कि ५ मिनट में लपेट दूँगा, अधिक समय नहीं है। वह बोला कि थोड़ा समय दे दो। मैंने कहा कि रजवाड़ा लेकर आना। कहा कि इतनी दूर नहीं आयेगा। मैंने एक-दो जगह और बताई। आखिर में अमृतसर तय हुआ। मैंने कहा कि वहाँ समय भी होगा मेरे पास। ४-५ घण्टे समय होता है। तो वे ४-५ काली-काली दाढ़ियों वाले आए। मैं जान गया कि ये जवान बन रहे हैं। एक औरत भी थी। सब गोल-मटोल थे। अब बात हो रही थी। शंकाएँ दूर कीं। इतने में औरत चौकी लेने लगी। मैंने कहा—सुन! यह क्या कर रही है? सुमिरन को आवाज़ दो, कहा कि पकड़ इसकी चुटियाँ और बाहर कर। मैंने कहा कि तू यहाँ कौन-सा नाटक कर रही है? यहाँ भूत आता नहीं है। दूर से ही भाग जाता है। वह है भी लंबी-चौड़ी। उसे देखकर वह चुप हो गयी। मैं कहना चाहता हूँ कि यह क्या था! लंबी-चौड़ी औरत देखकर भूत भाग गया क्या? फिर वहीं पर मैंने उन्हें बताया कि यह नाटकबाजी है। मैं मनोवैज्ञानिक भी हूँ। मेरे पास भूत वाले, बीमार, पागल आदि ही आ रहे हैं। मुझे पागल भी बनावटी लगे, भूत वाले भी। पर बीमार सही होते हैं, जो सही में बीमार होते हैं।

....तो सुमिरन करना। मैं सबको यह उपाय बताता हूँ। साहिब कह रहे हैं—

कहैं कबीर सुमिरन किये, साई माहिं समाय।।

क्या सही में परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है? हाँ! यह बात फर्जी नहीं है। इसमें वज़न है। यह सुमिरन साधारण नहीं समझना। यह मामूली काम नहीं है। सुमिरन से पक्का सुख मिलता है। नहीं तो चिंतन करता रहता है; उसी का सुख-दुख आता रहता है। सुमिरन करता है तो परमात्मा की किरणें आती हैं। सुमिरन से हृदय प्रकाशित हो जाता है। हम सांसारिक भाव में भी देखें तो जो भी सोचते हैं, उसका असर दिमाग़ पर पड़ता है। किसी ने अपमान किया तो दुखी हो गये। चिंतन से दुखी हो गये। कुछ गलत किया तो सोचने लगे; लज्जा आ गयी। सोचने से शर्म आ गयी। यानी चिंतन का असर हम सब पर पड़ता है। तो प्रभु का चिंतन करेंगे तो कुछ तो होगा न! हम उसका रूप हो जायेंगे। गुरु नानक देव जी ऐसे नहीं कह रहे हैं—

'नानक जो निशि दिन भज, रूप राम तिहि जान।।'

सुमिरन परमात्मा तक जाने का संसाधन है। इससे परमात्मा में समा जायेंगे। एक चील के ऊपर जुएँ होती हैं। उनकी औकात नहीं है कि आसमान में उड़ें। पर चील के अन्दर बैठकर वे आसमान में भी उड़ लेती हैं। साहिब कह रहे हैं—

मुझमें गुण एकौ नहीं, जान लेय सिर मौर।
तेरे नाम प्रताप ते, पाऊँ आदर ठौर।।

सुमिरन से इहलौकिक और पारलौकिक—दोनों वस्तुएँ मिल जाती हैं। सुमिरन बहुत कुछ देता है। साहिब कह रहे हैं—

'साई माहिं समाय।।'

इससे बड़ी बात क्या है?

सत्य नाम निज औषधि, सतगुरु देई बताय।
औषधि खाय अरु पथ रहै, ताकी वेदन जाय।।

चलते-फिरते भी नाम करना।

पिंड ब्रह्मांड और वेद कितेबै, पाँच तत्त के पारा।
सत्त लोक जहुँ पुरुष विदेही, वह साहिब करतारा।। —दादूदयाल जी

जो वस्तु मेरे पास है ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है।

जो वस्तु मेरे पास है, वह ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है। यह बात अहंकार से नहीं बोल रहा हूँ। इसमें कहीं भी अहंकार की बात नहीं है। यह अलग बात है कि लोग अपनी समझ से इसका कैसा भी अर्थ लगाएँ। पर यह बात बड़े गहरे विश्वास के साथ बोल रहा हूँ। मैं अहंकार से नहीं बोल रहा हूँ। अहंकार से बड़ा परहेज करता हूँ। मेरा मानना है कि जैसे शरीर को कैंसर खा जाता है, इसी तरह अहंकार ज्ञान को खा जाता है। कितना भी ज्ञानी हो, अहंकार उसे ख़त्म कर देगा। इसलिए मैं अहंकार से नहीं बोल रहा हूँ। यह बात सत्य बोल रहा हूँ। मैं इस बात की पुष्टि कर सकता हूँ।

सत्य मानना, मैं अहंकार से नहीं बोल रहा हूँ। मैं यह बात विचार करके बोल रहा हूँ, मैं यह बात विवेक से बोल रहा हूँ, मैं यह बात ज्ञान से बोल रहा हूँ। मैं इन शब्दों को प्रमाणित कर सकता हूँ।

हम अपने आस-पास में नाना मत-मतान्तर देख रहे हैं। अगर ईमानदारी से देखें तो पता चलेगा कि ७० प्रतिशत मांस, शराब का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि वे भक्ति की बात भी कर रहे हैं, हालांकि वे संत-मत की बात भी बोल रहे हैं, पर उनका खान-पान ठीक नहीं है, उनकी आचार-संहिता भी ठीक नहीं है, कर्म से भी वे उत्तम नहीं हैं। बहुत डाउन हैं वे। आप खान-पान में भी बेहतरीन हैं और कर्म से भी बड़ा अन्तर है। वे छल, कपट, धोखा आदि कर रहे हैं, लेकिन आपकी जिंदगी एक स्थिर जिंदगी है। आप चाहकर भी गलत नहीं कर पाते हैं। जैसे ही करने जाते हैं, एक शक्ति आपको सतर्क करती है, आपको सावधान करती है। यह प्रासंगिक बदलाव हरेक नामी की जिंदगी में दिखाई देता है। और फिर सुरक्षा के मामले में भी आप लाजवाब हैं। ज्ञान के मामले में भी आप परम-ज्ञानी हैं। क्या करने योग्य है, क्या नहीं करने योग्य है, यह भी आपको समझाने की ज़रूरत नहीं है। जैसे ही आप कोई ग़लती करने जाते हैं, अन्दर से एक प्रेरणा मिलती है, आपको वह ताकत चेतन करती है, बताती है कि यह न किया जाए। यह ज्ञान आपके पास है। आप महसूस करते हैं। भक्ति-क्षेत्र में आप अनूठे हैं। जब आप अन्य मत-मतान्तरों की तरफ देखते हैं तो एक बात का पता चलता है कि कभी वे भैरो को मानते हैं, कभी काली जी को मानते हैं, कभी कुछ करते हैं। इसका बोध मिलता है, इसकी जानकारी मिलती है। वे भ्रम में हैं; वे अनिश्चित हैं। आपको इसका ज्ञान है कि दुष्टात्माएँ कैसे व्यवधान डालती हैं। आपको इसका बोध हो जाता होगा।

आप भक्ति में मजबूत हैं। आप दुनिया से निराले हैं। दुनिया का हरेक आदमी मन के नशे में है, मन की पकड़ में है। हरेक को मन, जैसे चाहे, नचाता है, पर आप मुक्त हैं। आपके ऊपर मन का ज़ोर नहीं चल पाता है। साहिब कह तो रहे हैं—

'नाम होय तो माथ नमावे। ना तो यह जग बाँध नचावे रे।।'

निःसंदेह इस मन का कोई ज़ोर आपपर नहीं चल रहा है। मन बेबस है। पूरी दुनिया को यह नचा रहा है। एक नशा-सा मन का सबके ऊपर है। माया का एक नशा-सा सबके ऊपर छाया है। पर आप मन की पकड़ से आज़ाद हैं। मन का नशा छाता है तो काम, क्रोध आदि जाग्रत होते हैं। ये चीजें आपमें भी हैं, पर आपके पूरे कण्ट्रोल में हैं। ये चीज़ें आपका कुछ नहीं बिगाड़ पा रही हैं। आपमें आध्यात्मिक शक्ति भरपूर है। आपके पंथ में लाजवाब शक्तियाँ हैं। आप मन, कर्म, वचन से किसी को पीड़ा नहीं देने वाले, अन्दर से शांत और सुखी हैं। एक ताकत आपको प्रेरित कर रही है। आप पूरे सुरक्षित हैं। भूत-प्रेत आपके पास नहीं आ पा रहे हैं। आपके पास आना तो दूर, यदि आप किसी ऐसे गैरनामी के पास बैठकर नाम करेंगे जिसके पास में भूत होगा तो वहाँ से भी भाग जायेगा। आपपर कोई जादू, टोना, सिद्धि ताकत प्रभाव नहीं डाल पा रही हैं।

मेरा मानना है कि साहिब एक बात की अनुभूति दिलाता है। जीवन में एक बार, दो बार या कई बार, पर दिलाता है। यह काम साहिब खुद करता है। एक बार धर्मदास जी उदास हो गये। साहिब अपनी जगह धर्मदास को देकर जा रहे थे। धर्मदास ने कहा कि काल-पुरुष में जान है; सबको भ्रमित कर दिया; मुझसे कैसे होगा? लोगों को भक्ति में कैसे जोड़ूँगा? साहिब ने कहा कि चिंता मत कर।

'पुरुष शक्ति जब आन समाई। तब नहीं रोके काल कसाई।।'

कहा कि जब परम-पुरुष की ताक़त आकर समायेगी तो काल कुछ नहीं कर पायेगा। जिस दिन नाम मिलता है उस दिन परम-पुरुष की ताकत आकर समाती है। तब काल का ज़ोर नहीं चलता है।

आप इन बातों पर मनन करें। इनमें से कितनी बातें आपके साथ में हो रही हैं। यह आपसे बेहतर कोई नहीं जान सकता है। आपके साथ में एक ताक़त है, यह मेरी वाणी से अधिक आप स्वयं जान सकते हैं। मुझे आपको कुछ समझाने की ज़रूरत ही नहीं है। मेरी वाइब्रेशन ही आपको समझा देगी। सत्संग में बैठकर उलटी गिनती गिनूँगा तो भी समझ आ जायेगी और आप कभी बोर भी नहीं होंगे। वाणी से समझाना तो एक बहाना है। रावण का दिल बदला ही नहीं—राम जी थे। दुर्योधन का दिल बदला ही नहीं—कृष्ण जी थे। पर साहिब कह रहे हैं—

'सतगुरु मोर रंगरेज, चुनरि मोरी रंग डारी।।'

यह काम बड़ा मुश्किल है। इस पंथ में आने में रुकावटें हैं। निरंजन रुकावटें डालता है। मेरे लिए लोग जो-जो भी कह रहे हैं, अच्छा ही कह रहे हैं, ठीक ही कह रहे हैं। केवल अपनी शैली बदल रहे हैं। मैं सब चीज़ सकारात्मक लेता हूँ। मैं नकारात्मक में जाता ही नहीं हूँ।
कुछ लोग कह रहे हैं कि इसके पास हिप्नोटिज्म है। इससे उच्चाटन किया जाता है। सही तो कह रहे हैं। जो वस्तु मेरे पास है, वह किसी के पास नहीं है। पर वे हिप्नोटिज्म कह रहे हैं। संतों के शरीर से अध्यात्म किरणें निकलती हैं; वे जगाती हैं। तो उन्हें यह हिप्नोटिज्म लग रहा है। फिर दूसरा कह रहे हैं कि धर्म बदल देता है। यह भी सही है। दुनिया निरंजन के धर्म का पालन कर रही है, मैं परम-पुरुष के धर्म की ओर ले चल रहा हूँ। मैं कुछ भी नकारात्मक नहीं ले रहा हूँ। मैं उनकी बातों को ठीक-ठीक मान रहा हूँ।

तो आपका बदलाव मामूली नहीं है। आप दुनिया से निराले हैं। आपके खोटे कर्मों को निकाला गया है। अगर गुरु चेले की ग़लती बोलने में झिझक रहा है तो समझना कि वह गुरु मर चुका है। मैं उदण्ड नहीं हूँ, पर आप यह नहीं सोचना कि आप ग़लती करें और मैं कुछ न कहूँ। यह नहीं सोचना—

गुरु कुम्हार शिष्य कुंभ है, गढ़ि गढ़ि काढ़े खोट।
अन्तर हाथ सम्हार दे, बाहर बाहै चोट।।

आपमें जो बदलाव है, वह मामूली नहीं है। आप दुनिया से निराले हैं। जो काम आपसे नहीं संभलने वाला होता है, उसमें एक ताक़त आकर आपको मदद दे जाती है। वह एहसास करवाती है कि साथ में हूँ। मैंने जो कहा कि जो वस्तु मेरे पास है, वह ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है, प्रमाणित करता हूँ। पूर्ण गुरु आपको बदल देता है, दिव्य-दृष्टि खोल देता है। १०वाँ द्वार खुलता है तो चाँद, तारे आदि नज़र आते हैं, पर जब ११वाँ द्वार खुलता है तो मन नज़र आता है।

वो दिव्य-दृष्टि खुलेगी तो काम, क्रोध दिखेगा। अन्यथा कितनी भी तपस्या करना, यह मन काबू में नहीं आयेगा, यह समझ नहीं आयेगा। कपिल मुनि, पाराशर ऋषि आदि ने कम तप नहीं किया था। पर नहीं हो सका मन काबू में। इसलिए—

'नाम होय तो माथ नमावे। ना तो यह मन बाँध नचावे।।'।

जब पूर्ण गुरु एक ताक़त रोपित कर देता है तो अन्दर का पूरा खेल दिखने लगता है, अपने अन्दर के शत्रुओं को साधक समझने लगता है, मन समझ में आ जाता है। मैंने बार-बार कहा है कि जो वस्तु मेरे पास है वह ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है। यह सुन एक ने मुझसे कहा कि जो आप कहते हैं कि जो पॉवर मेरे पास है, किसी के पास नहीं, इसे प्रमाणित करो। मैंने उससे कहा कि मैं पॉवर नहीं बोल रहा हूँ, वस्तु बोल रहा हूँ। शब्दों की तरफ ध्यान दो। जैसे कोई दुकानदार कहता है कि जो मिर्ची मेरे पास है, कहीं नहीं मिल सकती। वह कहता है कि यह फलानी-फलानी जगह से आई है। तो मैं जिस वस्तु की बात कर रहा हूँ, वह भी इस संसार की नहीं है, तीन लोक में कहीं नहीं है। वह चौथे लोक की वस्तु है। जब वह वस्तु मिलती है तो तीन चीज़ें आ जाती हैं। मैंने अपनी इस चीज़ का अनुभव एक-दो पर नहीं, बल्कि लाखों लोगों पर किया है। इसलिए इसमें कोई संशय नहीं है, पक्की बात है। तीन चीजें शर्तिया होती हैं। जिसे भी मैं नाम देता हूँ, तीन चीजें पक्की हो जाती हैं—

१. आत्मा और मन अलग हो जाते हैं।
२. संसार का आकर्षण समाप्त हो जाता है।
३. एक पूर्ण सुरक्षा मिल जाती है।

असर सामने है। मेरा हर नामी नाम पाकर बदल जाता है। इंसान मन तरंग में नाच रहा है। मन प्रबल है। पर मेरे नामी के साथ अब ऐसा नहीं हो पा रहा है। नाम पाने के बाद मेरा हर नामी चेतन हो जाता है। अन्य पंथों के लोगों के साथ मेरे नामी की तुलना की जाए तो उनका अपने ऊपर कोई होल्ड नहीं मिलता है, कोई आध्यात्मिकता नहीं मिलती है। मेरे नामी अपने को सबसे अलग पाते हैं, उन्हें अपने अन्य साथी बेवकूफ़ लगते हैं, उनकी हरकतें पागलों वाली लगती हैं, क्योंकि उनके मूड का कोई पता नहीं होता कि कब अच्छे बन जाएँ और कब गंदे। कब मूड खराब हो जाए, कोई पता नहीं। यानी मन पर कोई होल्ड नहीं होता, इसलिए पागल।

मेरे नामी का मन पर होल्ड होता है, क्योंकि नाम के साथ मैं मन से उसकी आत्मा का बिलगीकरण कर देता हूँ, दोनों को अलग कर देता हूँ, जिससे मन समझ में आने लगता है। यह काम दुनिया में सबसे कठिन है, जो कोई नहीं कर सकता है। जब मन समझ आने लग जाता है तो दुनिया फीकी लगने लग जाती है, उसका आकर्षण समाप्त होने लग जाता है। फिर तीसरा हर नामी को लगता है कि उसके साथ में एक सबल संरक्षक है, हरेक को वह संरक्षक अनुभव होता है। सच है, यह जो वस्तु मेरे पास है, ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है। इस वस्तु से मन की दुनिया समाप्त होती जाती है और आत्मा का रूप समझ आने लग जाता है।

ध्यान क्यों किया जा रहा है? यह जानने के लिए कि मैं क्या हूँ? गुरु आत्मा और मन को अलग कर देता है। किसी कीमत पर यह काम अपनी ताकत से नहीं हो सकता है। मन ने ऐसे उलझा दिया है कि आत्मा कुछ समझ नहीं पा रही है। मन कहता है कि रोटी खानी है तो आत्मा कहती है कि यही मेरी इच्छा है। इस तरह मन ने आत्मा को अपने पीछे लगा रखा है। आत्मा सभी इच्छाओं में, कल्पनाओं में घूम रही है। जितने भी कर्म मनुष्य कर रहा है, सभी उलझन वाले हैं। जब भी कोई चाहे कि इससे निकलें तो यह नहीं निकलने दे रहा है। इसकी पकड़ बड़ी दूर तक है। धन-दौलत दे देगा, सिद्धियाँ-शक्तियाँ दे देगा, पर अपने से आगे नहीं जाने देगा। एक अदब गुरु आपको बाहर निकाल देगा।

मन की पहली ताकत है—अज्ञान। मन आत्मा में ऐसे घुल-मिल गया है कि बड़ा झमेला हो गया है। आत्मा यह झमेला लिए-लिए घूम रही है, इसे समझ नहीं पा रही है। चाहे कोई करोड़ों उपाय भी कर ले, इस झमेले को समझ नहीं सकता है, मन की सीमा से बाहर नहीं जा सकता है।

गुरु यथार्थ में आत्म रूप दिखाता है। हंस की चोंच में गुण है। वह दूध पीता है। अगर उसमें पानी मिला हो तो वह उसे छोड़ देता है, केवल दूध-दूध पी जाता है। यदि पाव दूध में पाव पानी मिलाकर दे दिया जाए तो वह पूरा दूध पी लेगा और पूरा पानी छोड़ देगा। यह काम और कोई नहीं कर सकता है। केवल हंस। ऐसे ही पूर्ण सद्गुरु की सुरति में यह ताकत है कि आत्मा और मन को अलग कर सकता है। यह काम गुरु पल में कर देता है। फिर आत्मा दुबारा मन में नहीं समा सकती। चाहकर भी नहीं। जैसे—

दूध को मथ घृत न्यारा किया, पलट कर फिर ताहिं में नाहिं समाई।।

दूध से घी बना लिया तो फिर दूध नहीं हो सकता। यदि दही को मथ मक्खन निकाल लिया तो फिर चाह कर भी उसमें नहीं समा सकता। जब पूर्ण गुरु आत्मा को मन से अलग कर देता है तो फिर आत्मा मन में नहीं समा सकती है।

कितनी भी ताकत लगा ले कोई, यह काम नहीं कर सकता है।

कोटि जन्म का पथ था, गुरु पल में दिया पहुँचाय।।

तब एक संतुष्टि मिलती है। जैसे काँटा लगा हो तो निकालने पर आराम मिलता है। ऐसे ही मन का काँटा गुरु निकाल देता है। फिर आप चाहकर भी जगत के पदार्थों में रम नहीं पायेंगे। जगत के पदार्थ आपको रोमांचित नहीं कर पायेंगे। ऐसे पर ही कहा—

सत्तगुरू मोर शूरमा, केसर मारा बाण।
नाम अकेला रह गया, पाया पद निर्वाण।।

यह काम पल में किया। फिर तीसरा, एक संरक्षक भी साथ हो गया। हर पल के लिए एक ताकत साथ में दे देता है। तभी तो कहा—

जब मैं था तो गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाहीं।
प्रेम गलि अति साँकरी, तामें दो न समाहिं।।

जो आप अपने को महसूस कर रहे हैं, यही धोखा है। यह आपा ही आसक्त है। यह पूरा खत्म हो जाता है। क्यों?

गुरु समाना शिष्य में, शिष्य लिया कर नेह।
बिलगाए बिलगे नहीं, एक रूप दो देह।।

गुरु आपको अपने समान कर देगा। आप अपनी दुनिया ही भूल जाओगे। साहिब की वाणी में वजन है—

नाम पाय सत्य जो बीरा, संग रहूँ मैं दास कबीरा।।

सच मानना, अभी बार-बार चेताकर कह रहा हूँ, जब यहाँ से चला जाऊँगा तो दुनिया पछताएगी, क्योंकि सत्य है—जो वस्तु मेरे पास है, ब्रह्माण्ड में कहीं भी नहीं है।

डांकिनी शाकिनी बहु किलकारें, जम किंकर धर्मदूत हंकारे।
सत्य नाम सुन भागे सारे, जब सतगुरु नाम उचारा है।।

मेरे शिष्य को पूर्ण सुरक्षा मिलती है।

गुरु को शीश पर राखिये लीजै आज्ञा मान।
कहै कबीर ता दास को तीन लोक डर नाहीं।।

मेरा शिष्य 'नाम' धारण करने के बाद पूर्ण सुरक्षित है। 'नाम' से होश में होकर 'मन' की वृत्तियाँ नियंत्रण में हैं। 'इन्द्री पसारा रोक ले सब सुख तेरे पास।' मैं यथार्थ में बोल रहा हूँ, अहंकार से नहीं बोल रहा, मैंने अपने शिष्य को 'नाम' देकर बदल दिया है। सच मानना, अभी बार-बार चेताकर कह रहा हूँ, जब यहाँ से चला जाऊँगा, तो दुनिया पछतायेगी। क्योंकि, यह सत्य है—"जो वस्तु मेरे पास है, ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है।"

मैं धर्मशास्त्रों को जितना ठीक से समझता हूँ उतना उनके शास्त्री-गुरु नहीं जानते हैं, वे केवल अध्ययनशील हैं। मैं वहाँ जाता हूँ जो धर्मशास्त्र बता रहे हैं। मैंने स्वर्ग और नरक लोक देखे हैं। मैं शास्त्र गुरुओं से गोष्ठि कर सकता हूँ, वे वहाँ गए नहीं हैं। मेरे सत्यलोक जाने के रास्ते में शास्त्रों में बताये स्थान पड़ते हैं। आपको मेरी बातें अटपटी लगेंगी। मैंने नर्क भी देखे हैं, ७ नर्क हैं। स्वर्गों में भी जाता हूँ।

जगत के गुरु-गुरु में भेद है—"माता पिता गुरु आज्ञा मानो।" प्रथम गुरु माता-पिता हैं—वे पूज्य हैं, मान्य हैं। मेरे माता-पिता के परिवार में मुझसे छोटा भाई ऊधमी था, क्रोधी था। जब वह १०-१२ साल का था उसे माँ ने रोटी के बेलन से मारा तो वह हाथ पर बेलन झेल कर रोकता रहा। हाथ बहुत जख्मी हो गए, पर छोटे भाई ने माँ से कुछ नहीं बोला, रोका भी नहीं। छोटे भाई का दोष यह था कि उसने किसी लड़के को मारा था और उसके पिता ने मेरी माँ से शिकायत की थी। मुझे छोटे भाई के जख्मी हाथ देखकर बुरा लगा, मैंने उससे पूछा तुमने माँ को मारने से रोका क्यों नहीं, कारण क्या था? छोटे भाई ने बताया मोहल्ले का वह लड़का बदमाश है, सबको तंग करता है, उसने किसी लड़की को छेड़ा और मारा था। उसे मना करने पर उसने मेरे छोटे भाई से भी झगड़ा किया तो छीना-झपटी में वह लड़का गिर गया और हाथों में चोट लग गई। मेरे छोटे भाई ने माँ को कुछ नहीं बताया और मारने से रोका भी नहीं, वह माँ का बड़ा सम्मान करता था। तो मेरा छोटा भाई भी माँ का भक्त था। मेरी माँ बहुत उदार, सफाई पसंद और न्याय प्रिय थीं। माँ ही बच्चे को अच्छी सुरक्षा और प्रारम्भिक शिक्षा देती है।

दूसरी गुरु है दाई—माँ के पेट से सर्वप्रथम दाई ने बच्चे को बाहर निकाला, साफ किया, उसके कान-नाक-सिर-हाथ-पैर सीधे कर बाहर के वातावरण के योग्य बनाने सुरक्षित किया। इसलिए दूसरी गुरु "दाई माँ" है।

तीसरा गुरु—जिसने जन्म-समय और ग्रह-योगों के आधार पर योनि-वर्ण-राशि देखकर नामकरण किया।

चौथा गुरु—विद्या दान और भाषा ज्ञान देने वाला है।

पाँचवाँ गुरु—विवाह कराने और दाम्पत्य धर्म बताने वाला है।

छठवाँ गुरु—कुल गुरु है, जिसने मर्यादा, धर्म-अधर्म, तीर्थ, कुल देवता पूजा का ज्ञान दिया। और

सातवाँ गुरु—जिसने जन्म, मृत्यु, जीव, सृष्टि सबका भेद बताकर आत्मज्ञान के आध्यात्म द्वारा परमात्मा से जोड़ा। स्वर्ग, नरक और मोक्षधाम का भेद बताया। सांसारिक देह परिवर्तन की मुक्तियों और मोक्ष में अन्तर बताया। परमात्मा-तत्व का ज्ञान दिया। इसलिये सबका, जो जीवन में सहायक होकर सत्कर्म की ओर ले जाने वाले हैं, उन गुरुजनों का हमेशा आदर-सत्कार करें।

एक शिष्य मोहित रस्तोगी ने पूछा—सांसारिकता में रहते हुए मानव क्यों सांसारिक सुखों और विषयों की ओर चल पड़ता है? वह मानव जीवन के प्रथम और अंतिम सत्य स्थाई-मोक्ष के लक्ष्य को क्यों भूल जाता है, साहिबजी? साहिब-बन्दगी! मोहित रस्तोगी: मन के कारण क्योंकि संसार 'मन' की रचना है और संसार में अर्थात 'माया' में रमा हुआ है। इसलिए 'मन' सबको अपने लक्ष्य से भटका देता है, भुला देता है।

शिष्य अर्जुन कंगोत्रा ने पूछा—साहिब जी! मुझे सब कुछ पता होने के बाद भी डरता हूँ, मुझे समझ नहीं आता। मुझे इतना भी पता है कि जब से मैंने 'नाम' लिया है तब से कोई मेरी रक्षा करता है। फिर भी 'मन' मुझे डरा लेता है।

....मैं हमेशा कहता हूँ 'मन' के पास हर कला है, तुम्हारे ध्यान को बाँटने की। यह डर का भाव मन का है, आत्मा का नहीं। कभी भी 'मन' के भाव पर चित्त मत धरो, उसे हटा दो। परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है, सुमिरन से 'मन' का भाव 'डर' दूर हो जाता है। फिजूल की चिंता नहीं, सुमिरन करो।

हर मनुष्य में अचानक कहीं से 'मन' आकर क्षुद्रता लाता है, अहंकार खड़ा हो जाता है। यह हमला सब पर हो रहा है; बुद्धिमान, सिद्ध-साधक-योगी-तपस्वी पर भी हो रहा है।

जन्म से मृत्यु तक केवल भौतिक शिक्षा ही सब मनुष्यों को मिलती है। केवल भौतिक जीवन सिखाया जाता है, कुछ भी आध्यात्मिक नहीं है। "सैय्याद के काबू में हैं सब जीव बिचारे। गुरु मुख होय भवजल तरिय।" गुरु शब्द पालन साहिब का प्रथम सिद्धान्त है 'मन' के हमलों से बचने के लिये। मनुष्य जो कुछ भी कर रहा है, वह सब 'मन' ही कर रहा है। काम रूप जीव ब्रह्म मन माया। सुषुम्ना के अन्दर बैठकर 'मन' ही आपको मस्तिष्क द्वारा संदेश भेजकर संचालित कर रहा है।

'मन' ही हसे, मन ही रोय, मन ही जागे, मन ही सोय। मन ही लेवे, मन ही देवे। कहत कबीर सुनो भाई साधो जगत बना है मन से। इसलिये कहा—चिंता तो सत्यनाम की और न चितवे दास, जो कुछ चितवे 'नाम' बिन वही काल की फाँस।

जैसे जीरा, हींग की गंध को खत्म कर देता है, ऐसे ही 'नाम' मन का जोर खत्म कर देगा। जैसे सब्जी में हींग के मिश्रण से मक्खी नहीं बैठेगी; ऐसे ही 'नाम' मिलते ही निरंजन (मन) का पावर न्यूट्रल (खत्म) कर दिया।

शिष्य धर्मिन्दर निर्वान ने बताया—साहिबजी! आपने हमें एहसास करवा दिया कि आप 'नामी' के साथ चलते हैं। साहिब जी एक्सीडेंट में कल बच गया। चोट आई पर अन्दर से हिम्मत बहुत मिली।

....सच तो यह है कि कालपुरुष 'नामी' का कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। यदि कुछ दुःख मिलता भी है तो उसे साहिब की रजा मानना, घबराना नहीं। कालपुरुष मेरे नामी को दुःखी नहीं कर सकता है, वह कष्ट देने में सक्षम नहीं है! क्योंकि सत्गुरु की ताकत साथ में खड़ी है वह बचाती चलेगी। यदि कहीं कष्ट हुआ तो ज़रूर शिष्य गलत चला होगा, तभी सजा मिली; पर यह सजा भी मैं ही दूँगा।

सच से बड़ा कोई तप ही नहीं है और झूठ से बड़ा कोई पाप नहीं है। जिस हृदय में सच नहीं वहाँ साहिब नहीं आते, इसलिये सच की पालना बहुत ज़रूरी है। मेरा नामी मजाक में भी झूठी बात नहीं कहे। किसी को यह वादा भी मत करना कि कल या परसों आपके पास आऊँगा/आऊँगी। यदि शरीर छूट गया तो फिर नामी होकर भी अमरलोक नहीं जा पाओगे; पुनः जन्म लेना पड़ेगा वादा निभाने के लिए। इसलिए हर 'नामी' ऐसा कहे कि यदि साहिब की मौज हुई तो आऊँगा।

एक जन्म नहीं, अनेक जन्मों तक भी; यदि किसी कारण से किसी का दुबारा जन्म हो जाये, यह 'नाम' भुक्ति तब भी नष्ट नहीं होगी। जैसे माता-पिता अपने बच्चों का कल्याण ही चाहते हैं, इसी तरह गुरुजन भी अपने शिष्य का कल्याण चाहते हैं। सद्गुरु से बढ़कर इंसान का भला चाहने वाला कोई दूसरा हो नहीं सकता। माता-पिता भी जिसके समतुल्य नहीं हो पाते हैं। सद्गुरु की शरण में आकर जीव चिन्तामुक्त हो जाता है। शरणागति बहुत बड़ी चीज़ है। विभीषण राम जी की शरण में गया था। युद्ध में रावण ने विभीषण पर शक्ति का इस्तेमाल किया तो रामजी ने उसे आगे होकर अपने पर ले लिया था। जो जिसकी शरण में जाता है, वह उसकी रक्षा करता है; पक्का करता है।

जो सद्गुरु की शरण में हैं, उन्हें अपने कल्याण की भी कोशिश करने की जरूरत नहीं है, साहिब खुद कर लेगा। शरणागति में भक्ति भी खुद आ जायगी, ज्ञान भी आ जायेगा। जैसे जब तक बच्चा माँ की शरण में रहता है, तब तक माँ उसकी बहुत देखभाल करती है। अपने हाथों से उसे खिलाती है, नहलाती है, पहनाती है, सब चीजों का ध्यान रखती है। रोता है तो चुप भी कराती है। जब बच्चा बड़ा हो जाता है तब इतना ध्यान नहीं रखती। फिर तो खाना बनाकर आगे रख देती है, पर अपने हाथों से खिलाती थोड़े ही है। इसी तरह जब तक व्यक्ति गुरु की शरण में हो तब तक गुरु को उसकी चिंता रहती है। ज्ञानी जीव की चिंता गुरु को ज्यादा नहीं रहती, इसलिये ज्ञानी होकर भी गुरु के आगे छोटे बनकर जाना चाहिये ताकि गुरु को बराबर हमारा ध्यान रहे।

जब बच्चा माँ के पेट में रहता है तो वहाँ एक नाड़ी से जुड़ा रहता है। उसी नाड़ी द्वारा माँ सीधा बच्चे को खून से पोषण करती है। माँ ने जो-जो खाया उससे जो खून बना वह बच्चे में आया। सब जीवों का शरीर इस तरह माँ के पेट से पोषित हुआ। इसी प्रकार गुरु के पास जो कुछ है, शिष्य में आयेगा; पक्का आयेगा; जिससे शिष्य पूर्ण सुरक्षित है। क्योंकि जिस दिन से शिष्य 'नाम' लेता है, एक नाड़ी गुरु से जुड़ जाती है। आपको कहीं भी कष्ट होगा तो मेरी नस दुखेगी।

जिस तरह माँ जानती है कि बच्चा क्यों रो रहा है। कभी-कभी बच्चा भूख से रोता है, कभी कष्ट में पड़कर रोता है। कभी ऐसे भी रो लेता है कि माँ उसे उठाये। माँ को चिंता है, वह बच्चे की पुकार सुनकर जान जाती है कि क्यों रो रहा है। भूख से जो रोना है, वह अलग है; किसी आफत के कारण रोना है वह अलग है। माँ को ज्ञान है; इसलिये वह सब काम छोड़कर भागती है बच्चे के पास और चुप कराती है। इसी तरह आप जिस हाल में भी गुरु की याद करते हैं, गुरु को पता चल जाता है। इसलिये जब भी शिष्य किसी मुसीबत में है, मुझे याद करते हैं तो पाते हैं कि कोई शक्ति आई और अचानक मुसीबत टल गई। यही बात साहिब कबीर ने कही—

लाख कोस जो गुरु बसै, दीजै सुरति पठाय।
शब्द तुरी असवार है, पल आवै पल जाय।।

सच तो यह है कि जिस दिन से सद्गुरु नाम मिलता है, साहिब खुद आपके साथ हो जाता है। इसलिये साहिब रक्षा भी करता है; पूरी-पूरी मदद करेगा।

मेरे शिष्य सुखदेव भारद्वाज ने पूछा—साहिबजी! मैं जानना चाहता हूँ कि 'नाम' लेने से आपने जो सुरक्षा हमें प्रदान की है... क्या हमारे घर में जो गैरनामी हैं क्या उनको भी उसका फायदा मिलेगा? साहिब जी... मेरे घर में मम्मी, पापा नामी हैं... भैया भाभी ने 'नामदान' नहीं लिया। मेरा भतीजा कई बार बीमार हो जाता है तो लोग वहम में डाल देते हैं उन्हें... हम तो इन सब पर यकीन नहीं करते... क्योंकि हमें अपने साहिब जी पर पूरा यकीन (भरोसा) है... जो वस्तु आपने हमें दी है वह इस ब्रह्माण्ड में कोई नहीं दे सकता साहिब जी आपने हमें दुनिया से निराला कर दिया है। ....कृपा कर बतायें कि हमारे घर के गैर-नामी भी सुरक्षित हैं, हमें आपके द्वारा दी गई 'नाम' की ताकत के साथ?....

सभी शिष्यों से कहता हूँ कि यदि आप सोचें कि—"मैं कुछ भी न करूँ तो क्या साहिब करायेगा?... हाँ करायेगा, ज़रूर करायेगा।"

एक दृष्टांत बताता हूँ—

एक महात्मा सत्संग कर रहे थे कि प्रभु की इच्छा के बिना कुछ भी नहीं होता है; सब उसकी कृपा से होता है। एक सत्संगी बन्दा वहाँ बैठा था—उसने कहा कि हम खाना नहीं खाएं तो क्या प्रभु खिलायेगा? महात्मा ने कहा ज़रूर खिलायेगा। उस बन्दे ने उस दिन से खाना छोड़ दिया; सोचा, देखता हूँ प्रभु कैसे खिलाता है। एक पूरा दिन खाना नहीं खाया तो उसकी पत्नी ने कहा—खाना खाओ। प्रभु पहले दिन पत्नी में बैठकर खिलाने लगा पर उस बन्दे ने भी जिद पकड़ी थी; कहने लगा—नहीं, मैं नहीं खाता। दूसरे दिन भूख बढ़ी। घर में खाने की महक आ रही थी; मन भी करने लगा, इसलिये उसने सोचा, यहाँ तो मन कर रहा घर में, पर मैं देखता हूँ कि प्रभु कैसे खिलाता है। जाकर जंगल में बैठ गया। ..गाँव में किसी की शादी थी सारे पकवान बने थे। शादी के घर वालों ने देखा कि एक आदमी वहाँ जंगल में सुबह से बैठा हुआ है; सोचा इसे भी खाना खिला देते हैं। दो आदमी खाना लेकर उसके पास गए और उससे खाने को कहा। यह था प्रभु का करना। पर, वह बंदा भी बड़ा जिद्दी था, कहा—मुझे भूख नहीं है। वे खिलाने वाले कहने लगे—भाई, तू सुबह से भूखा बैठा हुआ है, खा ले। लेकिन, जब वह बंदा नहीं माना तो उन्होंने यह सोचकर कि जब भूख लगेगी, तो खुद खा लेगा, खाना वहीं पेड़ के नीचे रख दिया और चले गए। जब खाने की महक आने लगी तो उसने सोचा कि यहाँ बैठा रहूँगा तो मन नहीं मानेगा। यह सोचकर वह दूसरे पेड़ के नीचे जाकर बैठ गया। संयोग से दो चोर रात को बारह बजे चोरी करके आए और वहीं बैठकर अपना-अपना हिस्सा बाँटने लगे। इतने में खाने की महक आई; वे भूखे भी थे, पर जैसे ही वे खाने लगे, एक में प्रभु ने बैठकर बोला—मत खाओ, इसमें जहर भी हो सकता है। हो सकता है किसी ने रखा हो। दूसरे ने कहा—सच है; ढूँढो यहाँ कोई है तो नहीं। फिर वह बंदा वहाँ पेड़ के नीचे बैठा दिखा। चोरों ने सोचा—यह बंदा यहाँ क्यों बैठा हुआ है..? पकड़ कर उसे लाए और कहने लगे—बड़े चालाक निकले, हमें जहर खिलाकर सारा माल हड़प लेना चाहते थे। उस बंदे ने कहा—नहीं, मुझे कुछ नहीं पता, मैंने कोई जहर नहीं रखा। एक ने कहा—तो फिर खा ले। उस बंदे ने कहा—मैं नहीं खाता। दूसरे चोर ने कहा—पक्की कोई बात है। मारे दो तमाचे और ठूँस दिया लड्डू उसके मुँह में। फिर पहले चोर ने धीरे से कहा—पूड़ी भी खिलाओ। बंदा कहने लगा—पूड़ी नहीं खानी मुझे। फिर पड़े तमाचे और पूड़ी भी खिला दी। फिर हलवा, फिर मिठाई; सब कुछ खिला दिया। दूसरे दिन बंदा महात्मा के पास आया और चरणों में गिर पड़ा; कहा कि सच है वह प्रभु जब चाहे खिला के छोड़ता है। चाहे हम नहीं खायें वह तब भी खिला देगा। पहले वह सीधे तरीके से काम करता है, फिर डंडे-सोटे मारकर खिला देगा।

आप अपना सर्वस्व साहिब पर छोड़कर देखना। यदि आप में विश्वास नहीं है, छल-कपट है तो फिर नहीं होगा ऐसा। साहिब की भक्ति में अपना सर्वस्व भुला कर देखना। आप सद्गुरु को अपना सहारा बना लो, जीवन का सब भार सौंप दोगे तो साहिब को करना पड़ जायेगा।

साहिब जी ने भक्त को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करने हेतु दुनिया के सम्प्रदाय समूहों के भक्तों से कहा—

भक्ति साहिब की बहुत बारीक है, शीश सौंपे बिना भक्ति नाहीं। होय अवधूत सब आश तन की तजै, जीवता मरै सो भक्ति पाहीं।। नाचना कूदना ताल को पीटना, राँडिया खेल है भक्ति नाहीं। रैनदिन तार निर्धार सो लागी रहै, कहै कबीर तब भक्ति पाहीं।।

सच्चे 'नाम' का रहस्य दुनिया नहीं समझ पाई। सभी 'नामदान' (दीक्षा) देने लगे, सभी संत बन गये, इसलिये नाम का रूप अलोप हो गया। सच्चा 'नाम' के स्रोत कबीर साहिब जी थे, उनके द्वारा ही संतों का सृजन हुआ। इसी के आगे तुलसीदास, गुरु रविदास जी, गुरु नानकदेव जी, पलटू साहिब, दादू दयाल जी, दरिया साहिब, गरीब दास जी आदि संतों ने नाम का भेद संसार को दिया। साहिब जी से पहले भी संसार में लाखों नाम प्रचलित थे, पर उनसे जीव मुक्त नहीं हो सकता। ऐसे तो सभी को 15-20 नाम पता होते हैं, फिर संतों को 'सद्गुरु' की इतनी महिमा गाने की क्या जरूरत थी? संतों ने तो गुरु को गोविन्द से भी बड़ा बताया है।

सच्चा 'नाम' वाणी का विषय नहीं है। यह 52 अक्षरों में आने वाला नाम नहीं है। जो उच्चारण का विषय हो गया वह सच्चा नाम नहीं है, वह आत्मबोध नहीं करा सकेगा; किसी प्रकार से आत्मबंधनों से मुक्त नहीं कर सकेगा।

एक सद्गुरु ही शिष्य के अन्दर परमात्म-तत्त्व उत्पन्न करके रक्षा करता है। सच्चा 'नाम' गुप्त है। जो 'नाम' सद्गुरु देता है वही परमसत्ता है। 'सार शब्द सत्पुरुष कहाया,' इसलिये 'कोटि जनम का पथ था, गुरू पल में दिया पहुँचाये।'

सद्गुरु में विश्वास और हृदय में सत्य 'नाम' के ध्यान से ही घट-घट में समाये 'राम' अर्थात् 'आत्मा' का दर्शन होगा; यही सबसे बड़ा सुरक्षा-कवच है। जब सद्गुरु सानिध्य में स्वयं अनुभव प्रकट होगा तब ही 'आत्म-देव' पहचाना जा सकेगा। स्वयं में आत्मा को पाने पर ही संसार का पसारा और भय-संशय असार हो जावेगा। सब झूठा जंजाल लगने लगेगा। निःअक्षर राम वाला 'नाम' सब घट में होकर भी सबसे न्यारा है। वही जीव के भीतर आत्मरूप है। वही नाम सद्गुरु 'नाम' के निरन्तर ध्यान में समाया है। स्वयं आत्मा को जब जीव देख लेता है तब अपने आपको ही पाकर सब में समा जाता है, समदृष्टि हो जाता है। वाणी है—

अलख नाम घट भीतर देखो। हृदय माहिं करो विवेको।। घट घट राम बसे हैं भाई। बिना ज्ञान नहीं देत दिखाई।। अनुभव ज्ञान प्रगट जब होई। आतमराम चीन्ह है सोई।। आतमराम चीन्ह जब पावा। सकल पसारा मेट बहावा।।

अजर पुरुष एके रहै, अजर लोक अस्थाना। कहे कबीर सर्वांग जो, ताहि पुरुष को जाना।।

परमपुरुष (साहिब) को सृष्टि, मन, प्राण, जीवों के विस्तार और विनाश से कोई सम्बन्ध नहीं है। परमपुरुष तो अपनी हँस (आत्मा) को इस निरंजन सृष्टि से मुक्त कराने सद्गुरु को भेजते हैं। जो सद्गुरु की ओट (शरण) में आ जाता है फिर उसे कालपुरुष कभी नहीं सता सकता।

संत दादू दयाल, पलटू साहिब, महाकवि मलिक मोहम्मद जायसी, सुकरात आदि सुन्दर-सुडोल-रूपवान नहीं थे, पर सच्चे परमात्म पुरुष थे। दुनिया के लोग हृष्ट-पुष्ट, सुडोल, भौतिक साधनों के वैभव युक्त गुरुओं को महात्मा-अध्यात्मज्ञानी समझ कर आकर्षित होते हैं। ऐसे गुरु अपना प्रचार भी बड़े नाटकीय तरीकों से करते हैं जिससे धर्म के नाम पर लाखों लोग अपना धन लुटाने उनके पास पहुँच जाते हैं। शास्त्रों के शब्द विश्लेषण की कला, वाकपटुता के साथ अवतारों की चरित्र-कथाओं को सुनकर लोग उन्हें धर्म-अध्यात्म का ज्ञाता मानकर पूजने लगते हैं।

सत्य और आत्मज्ञान से संसार के लोगों को दूर करने काल निरंजन ने भिन्न-भिन्न प्रकार के धर्ममतों और धर्मस्थानों का जाल फैलाया है। सब तरफ काल निरंजन सृष्टि के मायाजाल की कल्पना ही जीवों का भगवान है। जिसे सच्चा-समर्थ गुरु मिल गया उसे गुरु में ही परमात्म दिखेगा। गुरु चरणदास की शिष्या संत सहजो बाई ने बड़े सुन्दर तर्क से काल्पनिक भगवान को मानने से इन्कार किया—

हरि को तजूँ गुरु को न बिसारूँ। गुरु के सम हरि को न निहारूँ।। हरि ने जन्म दिया जग माहीं। गुरु ने आवागमन छुड़ाई।। हरि ने पाँच चोर दियो साथा। गुरु ने लई छुड़ाय अनाथा।। हरि ने कुटुम्ब जाल में घेरी। गुरु ने काटी ममता बैरी।। हरि ने रोग भोग उरझायो। गुरु जोगी कर सबै छुड़ायो।। हरि ने कर्म भर्म भरमायो। गुरु ने आत्म रूप लखायो।। हरि ने मोसे आप छिपायो। गुरु दीपक दे ताहि दिखायो।। चरनदास पर तन मन वारूँ। गुरु न तजूँ हरि को तजि डारूँ।।

कह रही हैं कि भगवान ने तो पाँच-चोर काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहँकार साथ देकर कर्म-भर्म में भरमाया और सद्गुरु ने ही कृपा करके ज्ञान की ज्योति देकर अनाथ को बचाया है। कितनी सटीक और बड़ी बात कही भक्त सहजो बाई ने कि सद्गुरु ने ही पूर्ण सुरक्षित कर बचा लिया। भगवान (हरि) ने तो कर्मों और भ्रमों के जीव-बंधनों में और जन्म-मरण के चक्र में डाल कर अलोप हो गए।

काल-निरंजन ही दानव-असुर होकर जीवों को सताता है और देवत्व या सुर बनकर ऋषि-मुनि-तपस्वियों के कार्य सिद्ध करता है। पुनः-पुनः अवतार होकर रक्षक बन जाता है और असुरों का संहार करता है। जीवों को लीलायें दिखाकर अपनी महिमा दृढ़ करता है कालपुरुष (मन)। रक्षक होने की कलायें-लीलायें दिखाकर अनन्तकाल से जीवों का भक्षण करता आ रहा है। कार्तिक और माघ माह का पुण्य कहा है। प्रत्येक जीव के स्वाँसा की समय-सीमा बाँधी है। ऐसे कालपुरुष की सत्ता को अमरलोक का ज्ञाता कोई विरला (संत) ही जानता है। सत्य-शब्द के बिना कोई नहीं बचता। सार-शब्द के बिना सभी यम के मुँह में जा रहे हैं। कष्ट और भय के कारण जीव पाप-पुण्यों की तरफ जाता है। सद्गुरु-शरण में जाकर ही मनुष्य-तन में जीव कालपुरुष के सब भ्रमजाल को भेदकर सच्चे 'नाम' से पार होता है।

लाभ की आशा में ही बाँधकर यम जीवों को खाता रहता है। यम की इस चाल को जीव जान ही नहीं पाता और 68 तीर्थों, 12 राशियों, 27 नक्षत्रों, 7 वार एवं 15 तिथियों के धर्म-कर्म में उलझा रहता है। चारों युगों और 84 लाख निकृष्ट योनियों का सृष्टि चक्र इसीलिये कालपुरुष (निरंजन-मन) ने बनाया है। प्रथम सत्ययुग से यही व्यवहार करता हुआ कालपुरुष यमों के द्वारा जीवों को अपना आहार बना रहा है।

सद्गुरु ज्ञानी होकर 'साहिब' स्वयं जीवों को उबारने सत्ययुग से ही इस मृत्युलोक में सहायक हैं। जीवों के दारुण दुःख, यातना का आभास होने पर सत्ययुग से ही सद्गुरु ज्ञानी को परमपुरुष (साहिब) ने सत्य 'नाम' देकर जीवों को चेताने भेजा। सत्यपुरुष की आज्ञा से उनकी सीख को शीश पर धारण कर सद्गुरु ज्ञानी सृष्टि में आये और 'सद्गुरु' नाम का मुक्ति-पथ दिया।

सहज सत्य के साथ चलने में दुनिया के लोगों को बहुत कठिन लगता है। गुप्त सार-नाम क्षर-अक्षर से परे है। इसलिये साहिब जी ने कहा— "नाम नाम सब जगत बखाना, नाम भेद कोई विरला जाना।"

भ्रम और निराशा का एक उदाहरण बताता हूँ। एक प्रोफेसर थोरूराम जी का लड़का जो एम.टेक. की परीक्षा दे रहा था, अपनी माँ के साथ मेरे पास आया। उसके हाथ में प्लास्टर चढ़ा हुआ था। उसकी माता ने कहा—गुरु जी, लड़के के हाथ में फ्रैक्चर हो गया है, परीक्षा आ रही है, साल खराब हो जायेगा, कुछ कृपा करो। मैंने पहले हाथ देखा, उँगलियाँ चल रही थीं पर अँगूठा काम नहीं कर रहा था। मैं जान गया, तकलीफ क्या है। मैंने लड़के से कहा—भाई प्लास्टर उतारकर आओ। लड़के ने दिल में सोचा—बड़ा जाहिल गुरुजी है। मैं मानस पढ़ लेता हूँ। उसने सोचा—एक्स-रे करवा कर आया हूँ और ये कह रहे हैं प्लास्टर खोलो। वह बोला—गुरुजी, इसमें एक फ्रैक्चर है। आदमी थोड़ा चालाक भी होता है। मैंने कहा—मुझे पता है भाई, जाओ तुम प्लास्टर खोलकर आओ। वह बोला—गुरुजी, थोड़ी हड्डी यहाँ से टूट गई है। मैंने फिर कहा—मुझे पता है, तुम जाओ उसे खोलकर तो आओ। अब भी वह वही तर्क दे रहा था, बोला—गुरुजी, 3000/- रुपये लगे हैं। मैंने कहा—भाई मैं समझ रहा हूँ, तू जा पहले इसे खोलकर आ। लड़का बड़ी मुश्किल से यानी बेमन से गया। दिल में सोचता हुआ—क्या जाहिल गुरुजी है, एक्स-रे किया हुआ प्लास्टर तुड़वा रहा है। फिर वह प्लास्टर कटवाकर आया। मुझे मालूम था यह क्या बात है, मैंने सिर्फ अँगूठे को पकड़ा और खींचकर चटकाया। इतना करके उससे कहा—हाथ घुमा। उसने ऐसा ही किया और बोला—ठीक हो गया। वह लड़का कलम नहीं पकड़ सकता था, इसको डॉक्टर फ्रैक्चर कहेगा; पैसा जो लेना है। मैंने लड़के से पूछा—भाई कैसे हो? बोला—गुरु जी, बिलकुल ठीक। कितनी देर में? 'मिली सेकंड' में। मैंने पूछा—सच बोल, पहले तू क्या सोच रहा था? गुरु तो पढ़े-लिखे नहीं लग रहे हैं। पूरी तरह दिल की किताब खोल कर बोल। बोला—हाँ गुरु जी, ये-ये बातें आईं दिल में। मैंने कहा—जा अब परीक्षा दे।

ऐसे ही सच्चा 'नाम' तो मन पर शिकंजा कसता है। मन और माया की पूरी प्रक्रिया (System) जाम कर देगा।

सद्गुरु मेरा सूरमा, कसके मारा बाण। नाम अकेला रह गया, पाया पद निर्वाण।।

इतनी बड़ी 'नाम' ताकत की गारंटी शिष्य को मिलती है निर्वाण की, मोक्ष की। व्यक्ति अनात्म चीजों में परमत्व की खोज करता है, क्योंकि उसे भ्रमित किया गया है। सद्गुरु से मिला 'नाम' रक्षा करता है। इस निःअक्षर गुप्त नाम से तन के रोग और समस्त पापों का नाश हो जाता है। काल इस सत्यनाम को देखकर दूर ही रहता है। बुरी नजर, जादू-टोना, सम्मोहन, वशीकरण आदि शक्तियाँ भी सद्गुरु-शब्द के आगे टिक नहीं पातीं; उलटा उन्हें चलाने वाले पर ही प्रतिघात करती हैं। विषधर नाग, वीर-बैताल आदि दूर से ही पछताकर रह जाते हैं। साहिब जी की वाणी है—

सत्गुरु शब्द सहाय हूँ सा, सत्गुरु शब्द सहाई। निकट गए तन रोग न व्यापै, प्राप ताप मिट जाई।। राग द्वेष छल छिद्र न दरपै, सन्मुख नहिं ठहराई। विषधर मन में करे पछतावा, काल रहे अरधाई।। बीर बैताल बाण गलि जाई, याम के कोट ढहाई। अठवन पठवन दृष्टि न लागै, उलटि ताहि धरि खाई।। मोहन वशीकरण उच्चाटन, मारन मन पछताइ। सत्गुरु शब्द कहत हौं महिमा, उलटि चला चटकाई।। जहाँ लगि काल कालिका के गुण, सबही रहे उरझाई। कहहिं कबीर छूटे यम बँधन, सुकृत लाख दोहाई।।

आत्म सुरक्षा के लिए 'मन' रूप अहंकार से सद्गुरु शिष्य को मुक्त कर देते हैं। मनुष्य सबमें एक समान 'आत्मा' पहचानने के लिये यह समझे कि वह परमपुरुष (सत्य) का अंश है और उससे भिन्न नहीं है। भक्त को मान-बड़ाई की चाह छोड़कर यह समझना चाहिए कि वह दूसरों से छोटा है, बालबुद्धि है। ये दो अहंकार तो मनुष्य के कल्याण के लिए, आत्मज्ञान के लिए हैं। मनुष्य अपने शरीर का मान करके, शरीर को ही सत्य मानकर ज्ञान, बल, सुन्दरता, धन, कुल-जाति का अहंकार करता है। ऐसे अहंकार मनुष्य के लिये 'मन' के आधीन रखकर भव-बंधन के कारण बनते हैं। ये अहंकार अवगुणों की जड़ हैं। रावण एक महान विद्वान पंडित और चक्रवर्ती सम्राट था, परन्तु अपने अहंकार (मन) के कारण उसका विनाश हो गया।

मन की वृत्तियों और प्रकृतियों की विकट स्थितियों पर विजय पाना सद्गुरु की शरणागति के सिवा अन्य कहीं सम्भव नहीं है। शिष्य को अपनाकर सद्गुरु 'नाम' की ताकत उसकी आत्मा को दे देते हैं। यही है— "सद्गुरु शब्द सहाई।" जिस दिन से मनुष्य को सद्गुरु से 'नाम' मिलता है, उसी दिन से वह 'नाम' जीव की सुरक्षा इन शत्रुओं अर्थात् 'मन' की अंतर-शक्तियों से करता है। 'नाम' मनुष्य-देह के अन्दर 'मन' की शक्तियों से लड़ने के विरुद्ध सत्-शक्तियाँ उत्पन्न कर देता है। 'नाम' आसुरी शक्तियों से लड़कर बंधन में फँसी 'आत्मा' का बचाव करता है। 'नाम' मनुष्य के अन्दर विवेक, ज्ञान, क्षमा, संतोष और दीनता को उत्पन्न करके मन की शैतानी शक्तियों को परास्त करता है। विवेक रूपी राजा के बहादुर सरदार ज्ञान, क्षमा, संतोष, दीनता; मोह रूपी राजा के सरदारों काम-क्रोध-लोभ-अहंकार को उनकी अवगुणी सेना सहित पराजित कर देते हैं।

काल निरंजन का ही रूप 'मन' बहुत जालिम है। कुछ न कुछ इच्छाएँ-कामनाएँ करके 'आत्मा' की शक्ति को उन्हें पूरा करने में उलझाये रखता है। मन के नेटवर्क से बिना सद्गुरु के बच पाना सम्भव नहीं है। साकार-निराकार भक्तियों में भी 'मन' के इन शैतानी रूपों का वर्णन है। भगवान श्रीकृष्ण ने युद्धक्षेत्र के मध्य गीता-उपदेश करते हुए 'मन' को निग्रह करने अर्जुन से कहा। अर्जुन ने हाथ जोड़कर सिर झुका कर प्रार्थना की—हे जनार्दन! समुद्र का मंथन कठिन ही नहीं असम्भव है, फिर भी आप कहें तो मैं प्रयास कर सकता हूँ।....आकाश को भेदना असम्भव है, फिर भी प्रयास कर सकता हूँ।.. वायु की गाँठ बाँधना असम्भव है, फिर भी आपकी आज्ञा होने से प्रयत्न कर सकता हूँ।..परन्तु मन का निग्रह किसी भी हालत में मुझसे नहीं हो सकता है, इसके लिए आज्ञा न करें।

मन तो बाज पक्षी की तरह जीव रूपी पक्षी का शिकार करता ही रहता है। इसलिये कहा— "मानत नहीं मन मोरा साधो, मानत नहीं मन मोरा।"

सच्चे 'नाम' की आध्यात्मिक-शक्ति मिलने के बाद 'मन' के कर्मों को करवाने वाले काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार स्पष्ट दिखाई पड़ने लगते हैं। इस कारण 'आत्मस्वरूप' की रक्षा होती है, आदमी स्वयं को जानने लगता है। कोई पाप कर्म नहीं कर पाता। जैसे ही कोई हीन कर्म का विचार आता है तो 'नाम' की शक्ति विचार बदल कर सतर्क होने के लिए प्रेरित कर देती है। हीन भावना से मुक्त होकर आचार, विचार, व्यवहार आदि शुद्ध हो जाते हैं। ऐसे व्यक्ति को कोई मूर्ख नहीं बना सकता, इसके विपरीत 'नामी' व्यक्ति को दुनिया के लोग मूर्ख लगते हैं। एक 'नामी' व्यक्ति जानता है कि दुनिया के लोग शरीर और मन के व्यक्तित्व में भूले हैं। सबको अपने व्यक्तित्व का अहंकार मात्र है। मेरा शिष्य आत्मनिष्ठ होकर हृदय में निवास करता है। मन द्वारा संचालित मस्तिष्क (Brain) का दास मेरा शिष्य नहीं रहता। संसार के लोगों के आचार-व्यवहार उसे अविवेकपूर्ण लगने लगते हैं।

जैसे कमरे के बाहर का तापमान 45 डिग्री सेल्सियस है और कमरे में एयरकंडीशनर लगा है, तो आप कमरे में ही रहना गर्मी से बचने के लिए पसन्द करेंगे। कमरे से बाहर भीषण गर्मी में आने का आपका मन नहीं करेगा। जैसे एक वैज्ञानिक जब हाइब्रिड बीज तैयार करता है, तो पहले स्वस्थ बीजों को छाँटता है। फिर दवायें इत्यादि छिड़क कर उन बीजों को संवर्धित व परिवर्धित करता है। इन हाइब्रिड बीजों पर न तो मौसम का असर पड़ता है और न कीड़े-मकोड़े ही उनको नुकसान पहुँचाते हैं। इस प्रकार उच्च कोटि के इन बीजों का मूल्य भी बढ़ जाता है। इनसे अच्छी कोटि की भरपूर फसल भी होती है। इसी प्रकार, सद्गुरु भी शिष्यों को नामदान देने से पहले उनका परीक्षण करते हैं; फिर 'नामदान' देकर उनकी सुरति को मन और माया के प्रभाव से सुरक्षित कर देते हैं। इस तरह एक गुणवान मानव बन जाता है।

बिना सत्य 'नाम' पाये मनुष्य लोहार की धौंकनी के चमड़े की तरह मसान ही है। जीता जागता हुआ एक गुणहीन मनुष्य है। उसका जीवन व्यर्थ ही चला जाता है, जीवन-मृत्यु के चक्र में बँधा हुआ। बिना सत्य 'नाम' पाये मनुष्य एक जीवित प्राणी होकर भी मुर्दे के समान है।

एक बार शिष्य धर्मदास जी उदास हो गये, क्योंकि कबीर साहिब अपनी गद्दी का उत्तराधिकारी उन्हें बनाकर जा रहे थे। धर्मदास जी ने कबीर साहिब से कहा कि कालपुरुष बहुत शक्तिशाली है; उसने सभी प्राणियों को भ्रमित करके सृष्टि के जाल में रखा है। मैं उन्हें कैसे समझाऊँगा, कैसे विश्वास दिलाकर भक्ति और 'नाम' से जोड़ूँगा? यह काम मुझसे नहीं हो सकेगा। तब, कबीर साहिब ने समझा कर कहा—धर्मदास तुम चिंता मत करो— "सार नाम सत्पुरुष कहाया।" पुरुष शक्ति जब आन समाई तब नहिं रोके काल कसाई। हे धर्मदास! तुम्हारे पास जो नाम है वह सबसे न्यारा है, अमोलक है, सजीव है, अनादि है, नित्य है। यह 'सार नाम' स्वयं सत्यपुरुष है। इसी सारनाम से परमपुरुष ने अमरलोक प्रकट किया और यही 'सारनाम' मानव को भवबंधन से मुक्ति दिलाने वाला है। "सारनाम से लोक बनाया, सार नाम हँसन मुक्ताया।" इसी सारनाम की डोर पकड़कर प्राणों के जगत से मनुष्य अमरलोक जायेगा।

दास कबीर ले आये संदेशवा, सार शब्द गहि चलो वा देशवा।

'नाम' प्राप्त होने के बाद जीव पर कालपुरुष का वश नहीं चलता। जैसे समुद्र अपना जल स्वयं दूसरों को नहीं दे पाता। जब मेघ समुद्र जल अपने में भरकर दूर-दूर तक पृथ्वी पर चारों तरफ बरसा देते हैं, तब उसी समुद्र जल से प्राणियों का जीवन सुखदायी होता है, खेतों में फसलें लहलहा उठती हैं, पेड़-पौधे हरे-भरे हो जाते हैं। उसी प्रकार परमपुरुष की सत्ता को एक पूर्ण आध्यात्मिक गुरु (संत सद्गुरु) जीव तक अपनी पारस सुरति से पहुँचाते हैं। "पारस सुरति संत के पासा।" वही संत भृंगमता कहा जाता है— "भृंगमता होइ जेहि पासा सोई गुरु सत्य धर्मदासा।" 27 लाख कीट-कीड़ों की योनि में एक भृंगा होता है जो बिना मादा के अपना 'शब्द' सुनाकर दूसरे कीट को अपने जैसा बनाकर अपना वंश चलाता है। इसी प्रकार एक पूर्ण आध्यात्मिक गुरु में जीन्स (Spiritual Genes) होते हैं। सद्गुरु अपने शिष्य को नाम-दीक्षा देते समय उसमें अपनी आध्यात्मिक सुरति से शिष्य की सुरति में अंतरित (Transmit) करते हैं।

एक सद्गुरु से नाम-दीक्षा पाकर शिष्य मन और माया की पकड़ से बाहर हो जाता है। उसके शरीर पर अब मन-माया का जोर नहीं चलता। आत्मा (सुरति) अब स्वयं को जानकर अपनी शक्ति का गलत उपयोग 'मन' को नहीं करने देती है। जो मनुष्य सार-शब्द पा लेता है वह उस 'शब्द' का ही हो जाता है। उसे फिर कालपुरुष के बनाये नियम जप-तप-तीर्थ-व्रत आदि की जरूरत नहीं रहती है। साहिब जी ने चेताया कि—

शब्द विदेह नाम सर्वोपरि, सब घट रहा समाई। कहे कबीर अबकी जो बूझे, अमरलोक चलि जाई।।

त्रिदेवों को मनुष्यों के मोक्ष और अमरधाम से कुछ भी वास्ता नहीं है। त्रिदेवों को तो सृष्टि के निर्माता निरंजन (कालपुरुष) का पता नहीं है। क्योंकि आद्यशक्ति (माया) को तीनों पुत्र सौंप कर निरंजन सृष्टि में मन रूप समा गया। जिस निरंजन को परमपुरुष ने शापित करके सत्यभक्ति से वंचित कर दिया, उसे ही वेदों से ब्रह्मा ने जाना कि सृष्टि का निर्माता और विधाता कोई पुरुष है; आद्यशक्ति (माँ) नहीं। इसलिये वेदों में एक परब्रह्म (परमात्मा) का ही उल्लेख हुआ, जो स्वयं सृष्टिकर्ता निरंजन है। वेदों से आगे केवल साहिब सद्गुरु ने इस संसार में आकर सत्यपुरुष (अमरलोक) का भेद बताया, जिसे वेदों ने नेति-नेति कहकर असमर्थता जताई। कारण स्पष्ट है कि काल-निरंजन सत्यपुरुष-अंश हँस (आत्माओं) को किसी भी दशा में अमरधाम का ज्ञान नहीं होने देना चाहता है। काल निरंजन ने हँसों (आत्माओं) को जीव बनाकर भिन्न-भिन्न योनियों में बाँधे रखने का जाल रचाया है। आद्यशक्ति को प्रकृति रूप शरीरों में रखने का विधान बनाया। विधाता के रूप में कालपुरुष ही शरीरों में बैठकर सभी कर्म करता है। वही स्वर्ग-नरक और योनियों के सुख-दुःख का निर्णय यमों और अवतारों द्वारा करवाता है। इस प्रकार आकाश (अंतरिक्ष), पृथ्वी और पाताल की पूरी सृष्टि का ईश्वर स्वयं निरंजन ही होने से वह आत्मा का रक्षक नहीं बल्कि बंधनों में रखने वाला है। निरंजन सृष्टि के मायाजाल से मुक्ति दिलाकर मोक्ष देने वाला केवल साहिब सद्गुरु आत्मरक्षक हैं।

मनुष्यों को सद्गुरु ज्ञान ही मोक्षदायी है और सांसारिक पंचतत्व त्रिगुणी हृदय दोषों से रहित है। त्रिदेवों सहित समस्त देवगण सांसारिक पंचतत्व से युक्त होने के कारण आत्मरक्षक और मुक्तिदाता नहीं हैं। पंच तत्वों और तीन गुणों से परे होने के कारण साहिब सद्गुरु ही सत्यधर्म के दाता हैं। जीवात्मा के देह-बंधनों को भक्तों के समक्ष उजागर कर आत्मा को पहचान कराने वाला ही साहिब सद्गुरु होता है। वही मन-माया के जाल को काटकर शिष्य को सत्यनाम की डोर से बाँधने में सक्षम है। सद्गुरु अपने भक्त के 'मन' को वश में करते हैं, तभी भक्त की आत्मा का शरीर पर प्रभुत्व हो पाता है।

शिष्य का 'मन' सद्गुरु की शरण में बँध जाने पर उसके चित्त को फिर लोभ, मोह, अहंकार आदि नहीं भाते। मुक्ति का मार्ग खुलने से सुख और दुःख का प्रभाव खत्म हो जाता है। जीवन रसमय होकर संशय विहीन हो जाता है। सत्य-भक्त जानते हैं कि शून्य में स्थित समस्त ब्रह्माण्ड पंचतत्व से बने हैं और नश्वर हैं। वेद और ब्रह्मा के ज्ञाता और भक्त नहीं जानते कि आकाश से आगे कितने शून्य और महाशून्य (अंधकार) के बाद सत्यपुरुष धाम है। ब्रह्मा और शेष भी नहीं जानते कि शून्य किस विधान से महाशून्य में विलीन है और महाशून्य कहाँ तक है। जिस प्रकार आत्मा रूप हँस जीव-देह पाकर भटक रहे हैं, उसी प्रकार देवादि और त्रिदेव भी विदेह पाकर भटक रहे हैं; विषयमयी और संशय में हैं। आद्यशक्ति ने शिव को भी विराट् प्रलय तक संसार में देह धारण करने का वरदान दिया है, अमरता का नहीं। सद्गुरु से मोक्ष का 'नाम' प्राप्त कर अमर होने का विधान केवल मनुष्य देह में ही प्राप्त है। साहिब सद्गुरु ही मनुष्यों को 'सत्य' अमरलोक ले जाने में समर्थ और आत्म-रक्षक हैं।

सत्य 'नाम' मिलने के बाद मेरे शिष्य सब चाह और चिंता से मुक्त होकर सुरक्षित अनुभव करते हैं। उनमें पहले के जीवन और आज के जीवन में बहुत अंतर है। पहले मन जो चाहता था करवाता था, अब नहीं करवा सकता है। मन की सब चालाकी और हरकतें सब समझ में आती हैं, दिखाई देती हैं हर 'नामी' को। 'मन' मालिक नहीं रहा, सत्य की ऊर्जा सदा जगाये रखती है। 'आत्मा' मन से मुक्त होकर, शरीर में रहते हुए भी हाइब्रिड बीज की तरह हो गई। अब किसी प्रकार का गलत खान-पान हो तो 'नाम' की चेतना तुरन्त रोक देती है। सब सत्य-भक्तों को सद्गुरु के सत्यनाम की ऊर्जा सदा जगाये रखती है। अंकुरी 'नामी' व्यक्ति को 'मन' द्वारा खराब नहीं किया जा सकता—वे हाइब्रिड हो गये। 'नामी' व्यक्ति को पल-पल संकेत मिलता रहेगा, मन के हथियार—काम, क्रोध, लोभ, मोह का वश नहीं चलता। इसीलिये वाणी है—

गुरु पारस गुरु परस है, गुरु अमृत की खान। शीश दिये जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान।। ....कबीरा तो भी सस्ता जान।

मनुष्य जन्म एक चौराहा है। इस जन्म से सब दिशाओं में मार्ग जाते हैं। अनन्त सम्भावनायें मनुष्य के लिए अपना द्वार खोले खड़ी हैं। मनुष्य जो होना चाहे हो सकता है। पशुओं का भाग्य होता है, जिसे कोई बदल नहीं सकता। कुत्ता, कुत्ते की तरह ही जियेगा और कुत्ते की तरह ही मरेगा। मनुष्य का ऐसा भाग्य नहीं है। मनुष्य तो अनंत बीजों की भाँति पैदा होता है, जिस बीज पर श्रम करेगा वे ही फूल उसमें खिलेंगे। शरीर के लिए जियेगा तो शरीर का ही रहेगा। संसार के कर्मों से संसार के सुख-दुःख के फल ही मिलेंगे। हम प्रतिपल अपने प्रत्येक विचार, अपने प्रत्येक कृत्य से स्वयं का निर्माण कर रहे हैं।

धर्म के क्षेत्र में भी मनुष्य ही अपने मार्ग का नियंता है। जिस मार्ग को चुनेगा, धर्म का वह मार्ग उसी लोक को पहुँचावेगा। धर्म की भिन्न-भिन्न आस्थाओं के अलग-अलग मार्ग हैं। देह और उसमें बैठा 'मन' आत्मा का तत्त्व नहीं है। मनुष्य देह में कोई भेद नहीं है, सब मिट्टी के खिलौने हैं। देह तो पशुओं के पास भी है। इसलिये साहिब कबीर ने कहा—

माटी कहे कुम्हार से तू क्या रौंदे मोय। एक दिन ऐसा आयेगा मैं रौंदूँगी तोय।।

साहिब-बंदगी सत्संग मनुष्य को चेतना का साक्षात्कार पाना बताता है। केवल जिज्ञासा शांत करना नहीं, मुमुक्षु की दृष्टि पाना बताता है। और सबसे बड़ी बात सद्गुरु का आश्रय है। ये तीनों दुर्लभ हैं; अलग-अलग भी और एक साथ मिलें तो, परमपिता का अनुग्रह ही है। मोक्ष फिर आपके करीब ही है।

संत आश्रय सबसे न्यारे। देखें पण्डा पुजारी मौलवी सारे। जीवन्त परमपिता की पूजा। सत्संग ऐसा मिले न दूजा।।

मनुष्य यदि नहीं पहचाने तो यह उसका अज्ञान है; गलत मार्ग का श्रम-साधना और बीज कनेर के फूल ही देगा।
त्याग और वरण (भोग) दोनों ही कर्म हैं, मन की तपस्या है जो स्वयं करना है। इसके विपरीत सत्य-भक्ति जिससे मोक्ष प्राप्त होता है, उसके दाता सद्गुरु हैं। एक सद्गुरु संत ही गुप्त 'नाम' देकर शिष्य के सब पूर्व कर्म और पाप हर लेता है। सत्य-भक्त स्वयं की योग-साधना और ध्यान से पार नहीं होता अपितु सद्गुरु संत स्वयं में शिष्य की 'आत्मा' को समाकर (बंद करके) निरंजन लोक से पार ले जाता है। जीवात्मा सदा के लिए नश्वर लोकों और कर्मफल-भोग से मुक्त होकर अक्षय अमरलोक पहुँच जाती है।

मनुष्य होने से सत्य की खोज शुरू होती है, यह मनुष्य होने का रहस्य है। मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? कहाँ मुझे जाना है? ये प्रश्न एक मानव में ही उठ सकते हैं। मनुष्य होने के पूर्व जो अचेतन था, वह चेतन बनता है। इसी को संसार के महाभारत के संघर्ष में भुलाने का भ्रमजाल काल-निरंजन ने रचा है। कोई कृष्ण ही एक युग में गुरु बनकर इस माया-जाल के महाभारत के किसी अर्जुन को इसे जानने की जिज्ञासा उत्पन्न करता है। इसीलिये कालपुरुष ने अपनी माया (आद्यशक्ति) से सृष्टि में सबके साथ तमोगुण अर्थात् अंधकार-आलस्य और रजोगुण अर्थात् कर्म-उपद्रव-कामनाओं की प्रधानता की है; 'सत्' की नहीं। इसलिये वही व्यक्ति सात्विक है, जिसमें तम और रज गुण की अति नहीं है। जो न तो अति गृहस्थ है और न अति सन्यस्त। इसलिये सभी महात्मा सात्विक नहीं हैं, राजसिक हैं या तामसिक भी हैं। वे सिखाते हैं कि—यह छोड़ो, वह छोड़ो; यह व्रत ले लो, वह कसम ले लो या ब्रह्मचर्य धारण करो। कुछ न कुछ करने की धर्म-शिक्षा ही देते हैं। स्वयं भी कर्म में ही लगे हैं, भक्तों को भी कर्म में ही लगाते हैं। कर्म से मुक्ति की ओर कोई नहीं ले जाता है। यह तो कालपुरुष 'मन', बुद्धि, चित्त और अहंकार रूप है जो सबको अपने वश में रखता है। 'आत्मा' को शरीर के तम, रज, और सत्व कर्मों के बंधनों में रखकर कर्मफल का निर्धारण करता है।

तामसी व्यक्ति भाग्य की बात करेगा, अपने को मेहनत से बचाने के लिए। राजसी व्यक्ति भाग्य की बात करेगा, अपने को कर्म में डालने के लिए; वह अपने कर्म का बचाव करेगा, भाग्य से। सात्विक व्यक्ति कहेगा जो होगा सो होगा; जो होना है वह होता है, उसे सब स्वीकार है। कालपुरुष ने इन्हीं गुणों के स्थायित्व और विकास के लिये त्रिदेवों द्वारा तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं, जिन्न, प्रेतात्माओं आदि के पूजा-विधान की रचना कराई है। सभी लोग जीवन में सरलतापूर्वक ये सभी कर्म-धर्म में उलझे मनुष्यों को देखते हैं। सत्य के जिज्ञासु मनुष्य सभी सद् तथा असद् कर्मों से हटकर सद्गुरु संत की खोज करते हैं।

अमरलोक या मोक्षधाम किस प्रकार इस अनित्य और नश्वर त्रिलोकों के माया-जाल से अलग है; इसको आसानी से समझा जा सकता है। देव-दानवों का संघर्ष, मोह-क्रोध-लोभ-काम, जय-पराजय, मान-अपमान; तपस्या से ब्रह्मा-विष्णु-शिव के वरदान, उन वरदानों से मद और फिर विनाश के उपाय। क्या ये अक्षय-अमरधाम या परमपुरुष के कार्य हैं? ये कदापि मोक्ष प्रदाता सत्यधर्म के अंग नहीं हो सकते हैं। ये तो नाना प्रकार के पंथ-धर्म-कर्म हैं जो अनंत जन्म और मृत्यु के चक्र में डालने वाले जीवन-संघर्ष का ही पथ-प्रदर्शन करते हैं।

योगी, यति, तपस्वी, सेवड़ा, सन्यासी भिन्न-भिन्न मत-मतांतरों में उलझ कर आपस में लड़ते रहते हैं। संसार कर्मों के विषय-भोग की लिप्सा के कारण, शरीर में फँसी आत्मा, नरक की पीड़ा में जाने से भयभीत है; इसीलिये असंतोष बना रहता है। सद्गुरु शब्द 'नाम' जो आत्मा के समान ही गुप्त है, एक सद्गुरु संत ही देकर चेतन करता है। मनुष्य सद्गुरु कृपा से प्राप्त उस 'नाम' से ही कर्मबंधनों से छूटने का मार्ग पाता है।

जोगी जती तपी सन्यासी, आप आप में लड़िया। कहे कबीर सुनो भाई साधौ, सबद लखै सोई तरिया।।

सारा संसार और समस्त ब्रह्माण्ड मन का माया-जाल है, इनका नष्ट होना निश्चित है। तीनों लोकों को अपने अधीन करने वाला रावण भी पृथ्वी पर ही जन्म लेता है। वह भी शिव की कठोर भक्ति करके ही वरदान पाता है। राम और कृष्ण भी इसी पृथ्वी पर जन्म लेकर लीलायें करते हैं। कितनी सभ्यतायें और नगर बने, फिर नष्ट हो गए। भारत में सिन्धु, मोहन-जोदड़ो और हड़प्पा सभ्यतायें एवं द्वारका नष्ट हो गए। पश्चिम में 'टॉलिमी युग' सभ्यता का 'अलेक्जेंड्रिया' नगर ईसा पूर्व पहली सदी में डूब गया। यूनान के सम्राट सिकन्दर ने स्वयं को 'सूर्य पुत्र' बताकर मिश्रवासियों के दिलों में स्थान बना लिया था। पृथ्वी पर जन्मी इन शक्तियों की किसी भी धर्म-आस्था से 'मोक्ष' के पथ का किसी प्रकार कोई सम्बन्ध नहीं रहा।

सत्यलोक का पथ और धर्म किसी ने नहीं बताया। संसार में केवल एक सद्गुरु संत जो परमात्मलीन हो, मनुष्य को 'सत्य' का ज्ञान कराने में समर्थ है। यह साहिब जी के सत्य-पथ की सद्गुरु-संत कृपा ही है कि नाना पंथों का सार और वेद-किताबों का भेद दुनिया को बताते हैं।
शास्त्रों और धर्म-मतों को पढ़ने, सुनने, भाषा, तर्क-वितर्क से परमात्मज्ञान तथा मुक्ति नहीं होगी। परमात्मानुभव प्राप्त एक संत-सद्गुरु का संग ही एकमात्र उपाय है। कबीर साहिब ने समाधि की सहज रीति समझाते हुए कहा—

साधो सहज समाधि भली। गुरु प्रताप जा दिन से जागी दिन दिन अधिक चली।। आँख न मूँदों कान न रूँधूँ, तनिक कष्ट नहीं धारूँ। खुले नैन पहिचानों हँसि-हँसि, सुन्दर रूप निहारूँ।। सबद निरंतर से मन लागा, मलिन वासना त्यागी। उठत बैठत कबहुँ न छूटे, ऐसी तारी लागी।।

ऐसी सहज-सुरक्षित भक्ति सद्गुरु कृपा से मिल जाती है कि भक्त स्वयं में परमात्म दर्शन कर सके। सगुण-निर्गुण का भेद मिटाकर आठों पहर अपने अन्तर (हृदय) में सब दिखाई देता है। बस, सद्गुरु चरणों में सच्चा विश्वास और समर्पण चाहिये; गुरु ही शिष्य को पात्र बनाकर सब कुछ देता है। केवल वेद-शास्त्र के ज्ञाता जिन्हें परमात्मानुभव नहीं है, साहिब संतों को नहीं जान सकेंगे। कबीर साहिब को नहीं जान सकेंगे। 'कबीर' शब्द ही परमपुरुष (साहिब) द्वारा अमरलोक से भेजे गए ज्ञानी 'सद्गुरु' का तद्रूप है। इसीलिये मैं कहता हूँ— "जो वस्तु मेरे पास है, ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं है।" क्योंकि साहिब संत ही जान सके—

अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड में बंदी छोड़ कहाय। सो तो पुरुष कबीर है, जननी जनी न माय।।

किसी भी प्रकार की क्रिया, फल की आकांक्षा लिये रहती है। हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है और निश्चित फल अवश्य मिलता है। इसी से चौरासी लाख योनियों की बार-बार यात्रा होती है। कालपुरुष के घेरे से निकलना सम्भव नहीं होता। महर्षि अष्टावक्र ने किसी भी प्रकार का अनुष्ठान (समाधि) बाधक ही बताया है। यम-नियम, आसन, मुद्रा, प्राणायाम साधने को नहीं कहा। क्रिया ही मुक्ति में बाधा बन जाती है। जैसे मकड़ी स्वयं जाल बुनती है और उसी में स्वयं को फँसाती है, उसी प्रकार कालपुरुष के बंधन में 'आत्मा' उलझी है।

आत्म-अनुभव का प्रकाश किसी काल्पनिक प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति से मिलना सम्भव नहीं है। सद्गुरु जिस गुप्त मूल 'नाम' को दीक्षा द्वारा अपनी सुरति से देते हैं, वही सद्गुरु के ध्यान से शिष्य को आत्मरूप में मिलता है। 'सत्य' पथ सद्गुरु का ध्यान ही है जो सीधा 'आत्मा' से जोड़ता है; यह सुरति योग है। यह व्रत-तीर्थ-जप-तप-साधना और सन्यास से सहज है, सरल है। प्रत्येक गृहस्थ भी सद्गुरु-शब्द और नियमों का पालन करके पूर्ण सुरक्षा का अनुभव करते हुए मोक्ष पाता है। इसके विपरीत कठिन तपस्या के लिए सन्यासी बनकर गृह-त्याग से भी कोई मन के बंधनों से मुक्त नहीं होता।

कितने तपसी तप कर डारे, काया डारी गारा। गृह छोड़ भये सन्यासी, तऊ न पावत पारा।।

अपने अन्दर ही परमात्मा को पाने की बात तो सब करते हैं पर उपाय कोई नहीं बताता। इसी कारण मनुष्य यहाँ-वहाँ भटक कर धर्म मान रहा है। आत्मज्ञान किसी को नहीं मिलता। एक पूर्ण गुरु की तलाश करने की शिक्षा मनुष्यों को कहीं नहीं मिलती है। साहिब जी ने बहुत सरल तरीके से 'सद्गुरु' और 'नाम' के स्वाँस-स्वाँस में सुमिरन का उपाय 'आत्मस्वरूप' को पाने हेतु दिया। ध्यान रोक कर शरीर के अन्दर किसी भाग में एकाग्र करने नहीं कहा। 'स्वाँस और सुरति के मध्य' रहकर शीश से सवा-हाथ ऊपर के सद्गुरु को ध्यान का माध्यम बनाने कहा। इसी को अन्तर में जाना कहा। सद्गुरु ही परमात्मा को खड़ा करके स्वयं हट जाता है, शिष्य को भटकने नहीं देता; मन द्वारा उत्पन्न भ्रमों से सुरक्षा करता है। इसी सुरति-योग को वेदों से आगे स्वाँसों की साधना और स्वसंवेद कहा—

सूक्ष्म वेद भेद जो पावे, अजर अमर होय लोक सिधावे।

मन-आत्मा-प्राण-स्वाँसा-देह-ब्रह्माण्ड और मोक्ष के आध्यात्मिक ज्ञान के बजाय मनुष्यों को बाहरी आडम्बरों की पूजा-भक्तियों में उलझा दिया गया है। निज आत्मस्वरूप के ज्ञान से वंचित कर सांसारिक गुरुओं ने मनुष्यों को शरीर के जीवन-मरण-भोग-कर्म और कर्मफलों के धर्म तक सीमित कर दिया है। सगुण-भक्ति में भी आज कोई राम-भक्त, गोस्वामी तुलसीदास के इस तत्त्व-ज्ञान का सत्संगी नहीं है कि ब्रह्मा और शिव शंकर के समान होने पर भी पूर्ण गुरु के बिना भवसागर से पार होना सम्भव नहीं है। गोस्वामी जी ने कहा—

गुरु बिन भव निधि तरइ न कोई। जौ विरंचि संकर सम होई।।

ब्रह्म राम ते नाम बड़, वरदायक वरदानि। रामचरित सतकोटि महँ, लिय महेस जिय जानि।।

सांसारिक धर्म जगत में मग्न धर्म अनुयायी कबीर-साहिब की इस सीख के सत्संगी नहीं बनना चाहते कि 'सद्गुरु' की दया-कृपा के बिना आत्म-ज्ञान नहीं होगा। एक पूर्ण गुरु की शरण में स्वाँसा (निरति) और सुरति (आत्मा) के अन्दर के जोड़ को जाने बिना परमात्मा को नहीं जाना जा सकेगा।

स्वाँस सुरति के मध्य में कबहुँ न न्यारा होय। ऐसा साक्षी रूप है, सुरति निरति से जोय।।

स्वाँसों को सुरति में लगा कर ही 'मन' रूपी पवन (निरति) को घेर कर उलटा चलाया जा सकता है। इस प्रकार स्वाँस पवन को शीश से सवा हाथ ऊपर अधर में ले जाकर सद्गुरु में ध्यान एकाग्र करने से जन्म-मरण के भ्रम का ज्ञान हो जावेगा। इसी क्रिया से देह रूप पिण्ड में ब्रह्माण्ड का खेल दिखेगा और जगत का भ्रम टूटेगा। शीश और अधर के बीच सुरति में ध्यान करने पर देह में भी आकाशवत् लगेगा। इसी से सुषुम्ना नाड़ी रूप डोर पलट कर अधर में ले जावेगी। यही पवन को पलट कर शून्य में घर करना है। स्वाँसा रूप मन-पवन को स्वयं की साधना-भक्ति से अधर सुरति में रोकना सम्भव नहीं है। पूरे गुरु अर्थात् सद्गुरु के 'नाम' समर्पण से ही स्वाँसों को सुरति से जोड़ा जा सकता है। वाणी है—

खेल ब्रह्माण्ड का पिण्ड में देखिया, जगत की भ्रमना दूर भागी। बाहेर भीतर एक आकाशवत्, सुषुम्ना डोर तहाँ पलट लागी।। पवन को पलट कर शून्य में घर किया, घर में अधर भरपूर देखा। कहे कबीर गुरु पूरे की मेहर से, त्रिकुटी मध्य दीदार देखा।।

सिद्धियों से कामनायें उत्पन्न होती हैं। कामना से मोह उत्पन्न होता है। मोह से लोभ उत्पन्न होता है। लोभ से वासना उत्पन्न होती है। इन सब की पूर्ति की कमी से क्रोध उत्पन्न होता है। इसलिये सिद्धि प्राप्त मनुष्य की शरण में आने वाले हर व्यक्ति में भी यही दोष उत्पन्न होना स्वाभाविक परिणाम है। यही सब संसार में चल रहा है। यह भी सत्य है कि सभी मनुष्यों का प्रारब्ध या पुण्यों की पूँजी सद्गुरु शरण तक पहुँचने की नहीं होती।

संत-सद्गुरु के सत्संग-स्थलों (संत आश्रम) पर चेतना की एक धारा प्रवाहित होना सुनिश्चित है। वह सत्संग स्थान एक ऊर्जावान स्थल बन जाता है; 'सत्य' खोजने का तीर्थ बन जाता है। सद्गुरु स्थान में बार-बार साहिब संत के प्रकाश वचनों से हरेक में भक्ति-ज्ञान उतरेगा ही, चाहे कोई धर्म-शास्त्रों से पूर्णतः अज्ञानी हो। हरेक सद्गुरु भक्त संसार के बंधनों से गुरु-स्थान में मुक्त अनुभव करता है। सद्गुरु शिष्य की चेतना का अंतरिक्ष मार्ग स्वतः ही बनता है। भूमि व स्थान का प्रभाव पड़ता है। जो भूमि पुण्य-कर्मों वाली, ऋषि-तपस्वियों की साधना का स्थल रही हो, वहाँ बैठने या रहने पर मनुष्य में सात्विक भाव उत्पन्न होने लगते हैं। जो भूमि खून-हिंसा, अधर्म का स्थान रही हो, वहाँ मनुष्य के बैठने या खड़े होने से वैसे ही विचार-भाव उत्पन्न होने लगते हैं।

दुनिया में लोग नाशवान और अनित्य पदार्थों को ही भक्ति और आस्था का साधन बनायेंगे तो विरोधी ताकतों की सिद्धियाँ ही पायेंगे। विरोधी ताकतें ही खड़ी होंगी। 'आत्मा' के अनुकूल कुछ भी नहीं है, आत्मा का उत्थान करने वाली कोई चीजें नहीं हैं। सभी ने इन्हीं भौतिक तत्त्व शक्तियों को परमात्मा की भक्ति मान लिया है।

निरंजन ने बीज रूप पाँच-शब्दों 'सत्-ओंकार ज्योति निरंजन-सोहं-ररंकार' से देह-पिण्ड की रचना की है। उन शब्दों का स्थान भी शरीर में रख दिया जिनसे निराकार की योग-साधना का विधान है। उन शब्दों को ही संतों ने काया-नाम कहा है।

जीवात्मा को सत्यपुरुष से दूर रखने के लिए काल-निरंजन ने जीवों को अपनी भक्ति में लगाने के लिए काया-नाम के प्रगट शब्द गुरु-मंत्र के रूप में दिये। इसी कारण सभी लोग जीव-काया नाम के सिमरन से अपने अन्दर खोज करने लगे। त्रिदेव और ऋषि, मुनि, सिद्ध-साधक, पीर-पैगम्बर-औलिया सभी इन शब्दों में उलझ गये। निरंजन (मन) ने इन काया-नामों की भक्ति से ऋद्धि-सिद्धियों की शक्तियाँ, चार तरह की मुक्ति के स्वर्ग आदि प्रदान कर दिये। इन सबकी प्राप्ति के देवी-देवता-भगवान भी उत्पन्न कर दिये। इस तरह पूरी दुनिया में साधक और भक्तगण किसी न किसी माध्यम से निरंजन (मन) की ही भक्ति कर रहे हैं।

योग-साधना में साधक शरीर के किसी न किसी बिन्दु पर ध्यान केन्द्रित करने लगे। आत्म-ज्ञान का मार्ग मनुष्यों को मिलने ही नहीं दिया गया। प्रत्येक युग और काल में एक सद्गुरु संत ने ही निरंजन काल के इस माया-चक्र 'काया' से जीवात्मा को अलग करके निजधाम अमरलोक भेजा।

तीन लोक प्रलय तक आई, चौथा लोक अमर है भाई।

तीन लोकों की सृष्टि में रहने वाली हर जीवात्मा काल के शिकंजे में है। जितने भी धर्म हैं उनका इशारा निराकार परमात्मा की ओर है। पर साहिब कबीर ने कहा— "यह संसार शैतानी ताकत के हाथ में है।" 'सैय्याद के काबू में हैं सब जीव विचारे।' यह पहला संदेश साहिब जी ने दिया तो विरोध हुआ। होना ही था; स्वाभाविक है। जब भी नवीन संस्कृति का सृजन होता है तो पहले विरोध होता है, फिर खामोशी होती है, फिर लोग अनुकरण करते हैं। पहले निकोलस कोपरनिकस ने कहा कि धरती घूम रही है तो बड़ा विरोध हुआ; उसे तो फाँसी पर ही चढ़ा दिया गया। अब तो वैज्ञानिक कह रहे हैं कि सूर्य भी घूम रहा है पर उसकी गति कम है। 2.5 इंच एक साल.

में चल रहा है। जैसे सौर मण्डल का परिवार है, ऐसे अनेक सूर्य-मण्डल हैं। उनके भी परिवार हैं। अब वैज्ञानिक भी प्रमाणित कर रहे हैं। धर्म कहते हैं कि सूर्य अपने सफेद रथ पर सवार होकर चलता जा रहा है, रथ में नौ घोड़े जुते हैं। (प्रतीकात्मक ही सही पर है तो भ्रामक)

अनादिकाल से 'आत्मा' काल के दायरे में है। कहीं पितरलोक, कहीं बैकुण्ठ लोक, कहीं ब्रह्म लोक और अंत में निरंकार (मन) यानी निर्जन लोक। ...फिर के डार दे भ्रमाहिं। पुनर्जन्म होगा ही कभी न कभी। साहिब जी स्पष्ट कह रहे हैं— ब्रह्मादि शिव सनकादिक सब काल के ही गुण गा रहे हैं। 'देव निरंजन सकल शरीरा।'

अगर देह रूप में देखना चाहते हो तो जितने भी पुरुष हैं, निरंजन का रूप हैं और आद्यशक्ति रूप स्त्रियाँ हैं। यही स्थूल रूप है।

मन ही आहे काल कराला। जीव नचाये करे बेहाला।। जीव के संग मन काल रहाई। अज्ञानी नर जानत नाहीं।।

मनुष्य देह के अन्दर आठ कोने, अष्टदल कमल अन्तःकरण के बीच 'मन' घूमता रहता है।

(1) उत्तर-दल पर 'मन' जब जाता है तो भक्ति भाव, परमार्थ, दया की भावनायें आती हैं। मनुष्य पौन घंटा शांत रहेगा; (2) जब मन दक्षिण-दल पर जाता है तो गुस्सा आयेगा; आप कभी कभी कहते हैं कि मूड ठीक नहीं है। बिना बात लड़ने लग जाते हैं... पता नहीं चलता, बहुत क्रोध आयेगा। (3) पश्चिम-दल पर 'मन' बैठेगा तो दिल में विषय-विकार उत्पन्न होंगे। (4) पूर्व-दल पर 'मन' रहेगा तो हँसी-मजाक करोगे। हँसी वाली बात नहीं हो फिर भी हँसी आयेगी। (5) वाम, वायु-दल पर 'मन' रहेगा तो लोभ उत्पन्न करेगा। (6) अग्नि-कोण पर 'मन' बैठेगा तो ईर्ष्या उत्पन्न होगी; दूसरे की बुराईयाँ बोलते रहोगे। (7) नैऋत्य-दल के कोण पर बैठेगा मन, तो वैराग्य उत्पन्न होगा। और (8) ईशान-दल पर 'मन' बैठेगा तो अहंकार उत्पन्न होगा, उतनी देर घमण्ड में रहेगा मनुष्य। इस विधि से सबको 'मन' नचाये जा रहा है। काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार से सब कर्म करवाये जा रहा है। आपको दुःखी रखता है, आपको सुखी रखता है; इस तरह सबको जकड़ा हुआ है। कोई इससे बचकर भाग भी नहीं सकता। पूरी-पूरी हुकूमत चल रही है 'मन' की। वो चाहे तो आप खुश हो जाते हैं; वो चाबी घुमाता है तो दुःखी हो जाते हैं। हर जीवात्मा को चौरासी के चक्कर में डालना है; इसलिये निश्चित पाप करवाना ही है।

दसों दिशा में लागी आग, कहे कबीर कहाँ जइयो भाग।

आठों-दल पर 'मन' घूमता रहता है मनुष्य के शरीर में; जहाँ-जहाँ जायेगा, मनुष्य वैसा-वैसा करता जायेगा। कबीर साहिब भी कहते हैं कि— "मेरी बातों को सुनकर लोग मुझ पर खीझते हैं, क्रोध करते हैं... लेकिन मुझसे झूठी बात नहीं कही जायेगी... और सच तो यह है कि जिसने इस संसार की रचना की है, वो खुद भी दुखी है।"

साँच कहों तो सब जग खीझै, झूठ कहा न जाई। कहै कबीर वो भी दुखिया, जिन यह राह चलाई।।

आपका शत्रु कौन है, कैसा है, जो आपकी 'आत्मा' को अज्ञान की पर्तों में ढके हुए है? सब अक्षम हो रहे हैं। जब चिंतन करते हैं तो पाते हैं कि एक ताकत जो आत्मा की विरोधी है, किसी को अपना निजस्वरूप नहीं पाने दे रही है, वो 'मन' ही है।

मन 24 घण्टे आत्मा को श्रमित किये हुए है। आखिर क्यों? क्योंकि जितने भी काम हैं, उनमें 'आत्मा' की उर्जा (शक्ति) चाहिये। यदि आत्म-तत्व को निकाल दो तो संसार में कुछ नहीं होगा, वीरान हो जायेगा 'मन' का यह कल्पित संसार। उसी 'मन' से अलग करके आपको 'आत्मस्वरूप' जानने की शक्ति देने मैं आया हूँ; वो 'वस्तु' केवल मेरे पास है।

ध्यान का रहस्य

आपके साथ में सिस्टम सेट कर दिया है। वो काम करेगा। पर फिर भी ध्यान-भजन में बैठना।

बिन बाजा झंकार उठै तहँ, समझि परै जब ध्यान धरे। गगन गुफा में अजर झरे।।

अर्थात चेतन होने की ज़रूरत पड़ेगी। क्यों बैठना ध्यान में? यह ध्यान ही आत्मा है। अगर यह ध्यान दुनियावी चीज़ों में है तो समझो कि आत्मा दुनियावी चीज़ों में भटक रही है।

मन सव्याद मनसा लहर में, बहत कतहू न जाय।।

सुरति से सब काम हो रहे हैं। ध्यान सूत्र में चार चीज़ों का ध्यान रहे—

  1. कमर को सीधा करके बैठना। कमर का दिमाग़ से संबंध है। इसी के सीधे रहने से ही सुषुम्णा खुलेगी। इसी के सीधे रहने से 10वाँ द्वार खुल सकता है।
  2. स्वाँसा में भजन चलता रहे। जैसे बैल को रस्सी से बाँधकर खूँटे से बाँध देते हैं तो इधर-उधर नहीं जा सकता है। इस तरह मन को बाँधने के लिए सुमिरन करना है। यदि सुमिरन नहीं चल रहा है तो समझो कि मन ने भटका दिया है। यह सुमिरन मन को बाँधने के लिए है।
  3. ध्यान-भजन में बैठे हुए हिलना-डुलना नहीं है।
  4. मन पर नज़र रखनी है। मन की कोशिश होगी कि किसी तरह से आपकी सुरति को घुमाकर ले जाए। क्योंकि वो जानता है कि एकाग्र होने पर आत्मा अपने को जान लेगी और तब मेरी बात नहीं मानेगी। मन कोई भेड़, बकरी नहीं है जो नजर रखो। इसके चार रूप हैं। जब यह इच्छा करता है तो इसे मन कहते हैं। यदि कोई भी इच्छा हुई तो समझो कि यह मन है। मन उन्हीं इच्छाओं में घुमा देगा। मन ने इच्छा की तो आपकी सुरति घूमने लगी। बड़ी चालाकी से घुमाता है। मान लो, मन ने इच्छा की कि घर बनाना है। अब वहीं घुमाता रहेगा। मिस्त्री और सीमेंट में ही घूमते रहोगे। अब ध्यान में बैठने का क्या लाभ! यह काम मन का है। यदि इच्छा को कण्ट्रोल कर लो तो मन का दूसरा रूप सामने आता है। फिर मन कुछ पुरानी बातें याद दिलाने लगेगा। किसी ने आपको गाली दी थी तो वहीं ले जायेगा। 10 साल पहले किसी ने आपको कुछ कहा था तो वहाँ ले जाकर पटक देगा। आप सोचने लग जायेंगे।

मनवा तो दस दिस फिरे, यह तो सुमिरन नाहिं।।

यह नज़र गहरी रखनी पड़ेगी। इससे यह लाभ होगा कि पता चल जायेगा कि यह मन किस तरह से भ्रमित कर रहा है।

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। कहैं कबीर गुरु पाइये, मन ही की परतीत।।

मन से हमेशा सावधान रहना। अगर चित्त को रोक दोगे तो फैसला लेने लगेगा। यह मन का तीसरा रूप बुद्धि है। मन चाहता है कि आप किसी भी तरह से अपने आप को न जानें। यदि आपने अपनी आत्मा को जान लिया तो मन की ताकत ख़त्म हो जायेगी। क्योंकि आत्मा को बाँधने वाला कोई नहीं है। इसने स्वयं अपनी ही ताक़त अपने ख़िलाफ़ लगा रखी है।

आपा की आपा ही बंध्यो।।

साहिब कह रहे हैं कि इस आत्मा ने स्वयं अपनी ताकत से अपने को बाँध दिया है।

जैसे स्वान काँच मंदिर में, भरमत भुँकि परयो।

जैसे काँच के महल में रहने वाला कुत्ता शीशे में अपनी ही परछाई को दूसरा कुत्ता समझ भौंकते-भौंकते प्राण गँवा देता है। उसने अपने ख़िलाफ़ ही अपनी ताक़त लगाई। ऐसे ही आत्मा भी भ्रमवश स्वयं अपना विनाश कर रही है।

इस तरह मन फिर शारीरिक तौर से उलझाने की कोशिश करेगा। ऐसे में इसका चौथा रूप अहंकार सामने आता है। कहेगा कि पाँव सो गया है; कहीं कहेगा कि हाथ थक गये हैं। इस तरह किसी-न-किसी तरह से परेशानी में डालेगा। फिर कहीं कुत्ता ही भौंक देगा, कहीं मच्छर ही काट लेगा। आप उसी के पीछे लग जायेंगे। इसलिए—

समझि परै जब ध्यान धरे।।

आत्म-कल्याण से परे जितनी ऊर्जा लगा रहे हो, फिजूल है। केवल आत्म-साक्षात्कार के लिए यह जीवन मिला है। पर हम शरीर की ज़रूरत के लिए ही सावधान हैं। क्योंकि शरीर की ज़रूरत समझ रहे हैं। आत्मा के लिए फुर्सत नहीं है। किसी ने आत्मा का महत्व नहीं समझा।
जो घूमने का शौकीन है, फिजूल ही घूमता रहता है। इस तरह आत्म-कल्याण की लग्न होनी चाहिए। जब भी मौका मिले, नाम-भजन में लग जाना चाहिए। एक ने मुझसे पूछा कि नाम-भजन किस समय करना चाहिए? मैंने कहा कि कभी भी कर लो। वो बोला कि कैसे करें? मैंने कहा कि यदि समय न मिले तो चलते-फिरते भी कर सकते हैं, लेटे-लेटे भी कर सकते हैं। पर वैसा भी नहीं करना जैसे एक पटवारी का बेटा कर रहा था। एक दिन पटवारी आकर कहने लगा कि आपने हमारे बेटे को सोने का लाइसेंस दे रखा है; वो सोता ही रहता है। कहा कि वो छोटेपन से अधिक सोता है। पहले तो हम उठा देते थे, पर जबसे आपका नाम लिया है, हम उसे उठा नहीं पाते हैं। मैंने पूछा— क्यों? वो बोला कि जब भी उसे उठाओ तो कहता है कि मैं ध्यान में हूँ।

क्योंकि पहले मैं लेटे-लेटे भी ध्यान-भजन के लिए बोल देता था। पर अब नहीं बोलता हूँ। यह तो मैंने उनके लिए कहा कि जो बैठकर न कर सकें। पर जवान आदमी को तो बैठकर करना चाहिए।

तो यह शौक से होना चाहिए। बैठने की फॉर्मेलिटी नहीं हो।

समझ परै जब ध्यान धरे।

आरती सतगुरु की

आरति करहूँ संत सतगुरु की, सतगुरु सत्यनाम दिनकर की। जय जय गुरुवर की, आरति करहूँ संत सतगुरु की।।

काम, क्रोध, मद, लोभ नसावन, मोह ग्रसित करि सुरसरि पावन। हरहि पाप कलिमल की, आरति करहूँ संत सतगुरु की।। सतगुरु सत्यनाम दिनकर की -

तुम पारस संगति पारस तब, कलिमल ग्रसित लौह प्राणी भव। कंचन करहि सुधर की, आरति करहूँ संत सतगुरु की।। सतगुरु सत्यनाम दिनकर की -

भुलेहूँ जो जिव संगति आवें, करम भरम तेहि बाँधि न पावें। भय न रहे यम घर की, आरति करहूँ संत सतगुरु की।। सतगुरु सत्यनाम दिनकर की -

योग अगन प्रगटहि तिनके घट, गगन चढ़े श्रुति खुले वज्रपट। दर्शन हों हरिहर की, आरति करहूँ संत सतगुरु की।। सतगुरु सत्यनाम दिनकर की -

सहस कॅवल चढ़ि त्रिकुटी आवे, शून्य शिखर चढ़ि बीन बजावे। खुले द्वार सतघर की, आरति करहूँ संत सतगुरु की।। सतगुरु सत्यनाम दिनकर की -

अलख अगम का दर्शन पावे, पुरुष अनामी जाय समावे। सतगुरु देव अमर की, आरति करहूँ संत सतगुरु की।। सतगुरु सत्यनाम दिनकर की -

एक आस विश्वास तुम्हारा, पड़ा द्वार मैं सब विधि हारा। जय, जय, जय गुरुवर की, आरति करहूँ संत सतगुरु की।। सतगुरु सत्यनाम दिनकर की -

अमर आत्मा का देश अमर लोक है। यह आत्मा वहाँ की रहने वाली है। जिस संसार में आप रह रहे हैं यह आत्मा का देश नहीं है। यहाँ आत्मा कैद की गयी है। पूरे तीन लोक में जितनी भी आत्माएँ हैं, सब कैद हैं। वो एक अगम देश है। वहाँ की सुधि आत्मा भूल चुका है। सद्गुरु उस अमर लोक से आत्मा को उसके अपने देश अमर लोक ले जाने के लिए आते हैं।

जी गृहस्थ सद्गुरू कडून नाम दीक्षा घेईल त्याला मुक्त होण्यापासून काळ रोखू शकणार नाही पण त्याचा हृदय सद्गुरू विषयी प्रिती असली पाहिजे. संत साधूविषयी प्रेमभाव ठेऊन सेवा आणि सत्यभक्ति मानत तेवली पहिजे . सर्व काही सोडून देऊन गुरूची भक्ति हृदयाने करावी. ममता, मोह, लोभ ठेऊ नये. सद्गुरूंनी जो शब्द दिला आहे तो तन मन वचन आणि कर्माने जपावा. अशा गृहस्थाला काळ-यम अडकवू शकत नाही. गृहस्थ भक्तांनी प्रत्येक अमावस्येला सद्गुरूंची आरती करावी. ज्या घरात आरती होत नाही त्या घरात काळाचा प्रवेश होतो. जर आरती रोज होत नसेल तर पौर्णिमेच्या दिवशी आरती अवश्य करावी. पौर्णिमेच्या दिवशी नाम आरती केल्याने शिष्याच्या घरात सुख येते, चंद्राच्या सोळाही कला घरात येतील. पौर्णिमेच्या दिवशी नामदान घेतल्याने सद्गुणाचा प्रवेश शीघ्र गतीने होतो।

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बोलो श्री सतगुरु देव की जय

बोलो श्री भक्तमंडली की जय।

बोलो आज के आनंद की जय।

पूर्णिमा महात्म

साहिब कह रहे हैं कि मैं तुम्हें परम पुरुष के व्रत के बारे में बताता हूँ।

व्रत प्रभाव धर्मनि सुनो, तोहि कहो समुझाय। निज यह व्रत अमर पद, जो नर निश्चय ध्याय।।

हे धर्मदास, तुम्हें व्रत का प्रभाव सुनाता हूँ। यदि दृढ़ निश्चय के साथ यह व्रत किया जाए तो यह व्रत अमर पद का दाता है। साहिब कह रहे हैं कि पूर्णिमा व्रत परम पुरुष के लिए है। परम पुरुष ने मुझे यह व्रत दिया है। इस व्रत से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। जो पूर्णिमा के व्रत करता है, उसका आवागमन नहीं होता। व्रतधारी को चाहिए कि काम, क्रोध, मद, लोभ, निंदा, ईर्ष्या आदि को दूर करे और सार नाम में समाए रहे। ऐसा हंस फिर चौरासी में नहीं आता।

धर्मदास वचन

धर्मदास दोनों कर जोरी, सतगुरु सुनिये विनती मोरी।। पूनों व्रत मोहि कहो बुझाई, जासों काल दगा मिट जाई।। जो कछु भेद अहै प्रभु आगर, सो कहिये हंसन पति नागर।।

धर्मदास जी दोनों हाथ जोड़कर पूछ रहे हैं कि हे साहिब, पूर्णिमा के व्रत के बारे में मुझे समझाओ, जिससे काल का धोखा मिट जाए।

पूर्णिमा के व्रत की महिमा बताते हुए साहिब कह रहे हैं कि करोड़ों यज्ञ करने पर, करोड़ों तीर्थ करने पर, सारी पृथ्वी की परिक्रमा कर लेने पर जो फल मिलता है, वो एक पूर्णिमा व्रत से मिल जाता है। जो सच्चे दिल से यह व्रत करता है, उसके सारे दुःख दरिद्रता मिट जाती है। व्रतधारी को चाहिए कि रात के समय जागरण करके नाम भजन में मन को लगाए। ऐसा भक्त अमर लोक को प्राप्त करता है। व्रत धारण करने वाले को चाहिए कि दिन के समय भोजन न करे और रात्रि को ही भोजन करे। साहिब को भोग लगाकर फिर भोजन करे। व्रत के दिन अपने हाथ से दीपक जलाकर सद्गुरु की आरती करे। झूठ और कपट को त्यागकर नाम के सुमिरन में लगा रहे। जो व्रत तो रखे पर जागरण न करे तो व्रत निष्फल है। व्रत में जागरण करे और सुबह साधुओं को भोजन कराए। जो पूर्णिमा को छोड़ अन्य व्रत रखता है, वो भवसागर में ही पड़ता है। जो सत्यनाम को दृढ़ता से ग्रहण करता है, वो भवसागर से पार हो जाता है। वो फिर गर्भवास में नहीं आता।

धर्मदास जी ने कहा कि यदि देह अशुद्ध हो तो फिर व्रत कैसे रख सकते हैं!
साहिब ने कहा कि मैं तुम्हें सारा भेद बताता हूँ। एक बनिया था, जिसने सद्गुरु का नाम लिया। स्त्री और पुरुष दोनों ने एकमत होकर नाम भजन लिया। दोनों मेरे भक्त थे। दोनों मन, वचन और कर्म से मेरी ही भक्ति करते थे। उनके मन में दूसरा कोई भाव नहीं था। दोनों पूर्णिमा का व्रत करते थे।

एक समय उसकी स्त्री का गर्भवास हो गया। नवें महीने में फिर पूर्णिमा आई। उसके घर में पुत्र उत्पन्न हुआ। उसी दिन पूर्णिमा का व्रत आ गया। स्त्रियों ने उसे कहा कि आज व्रत रहने दो, तुम अछूत हो। सूतक में व्रत नहीं करते हैं। जब अगली बार पूर्णिमा आएगी तो व्रत रख लेना।

स्त्री ने कहा कि देह चाहे अशुद्ध है, पर हृदय तो शुद्ध है। मैं सद्गुरु का सहारा नहीं छोड़ सकती हूँ। ऐसे में उसने व्रत रखा और नाम का सुमिरन करती रही। साँझ हुई तो व्रत संपूर्ण हुआ। रात हुई तो वो रसोईघर में गयी और घी के पकवान बनाए। उसी समय दो संत आए, जिन्हें देखकर स्त्री बड़ी प्रसन्न हुई। वो बालक को छोड़कर संतों के पास गयी और बड़े आदर से उन्हें ले आई। थाली लेकर चरणामृत लिया और उचित आसन पर बिठाया। फिर उन्हें भोजन खिलाया। संतों ने भोजन करके भोग लगाकर स्त्री को प्रसाद दिया। तब स्त्री को ध्यान करने की इच्छा हुई। तब उसे परम पुरुष के दर्शन हुए। तब उस स्त्री के घर में किसी चीज की कमी न रही। साहिब कह रहे हैं कि ऐसे भक्त बिरले होते हैं। जो सद्गुरु के चरणों में समाए रहते हैं, उसके सारे कर्म मिट जाते हैं।

साहिब कह रहे हैं कि इस तरह से जो पूर्णिमा का व्रत करता है, उसके जीव को पार उतरते देर नहीं लगती।

धर्मदास जी ने फिर साहिब से कहा कि अन्य व्रत सभी करते हैं, पर पूर्णिमा का व्रत कोई नहीं करता है। इसका क्या कारण है? साहिब कह रहे हैं कि अन्य व्रत आसान हैं। पूर्णिमा के व्रत की किसी भी अन्य व्रत के साथ तुलना नहीं की जा सकती है। पूर्णिमा का व्रत सब सुखों का दाता है। इसे करने से परम पद की प्राप्ति होती है। बाकी व्रतों में कर्मकाण्ड है, पर पूर्णिमा का व्रत सबसे न्यारा है। यह परम पुरुष का व्रत है। जब परम पुरुष ने अमर लोक की सत्य सृष्टि की और 16 पुत्रों को उत्पन्न किया, तब भक्ति के लिए पूर्णिमा व्रत की उपासना दी।

जो दिल से पूरणमासी का व्रत करता है, उसके सारे पाप कर्म मिट जाते हैं और फिर वो सुख के सागर अमर लोक में जाकर समा जाता है, जहाँ से फिर वापिस संसार सागर में नहीं आता।

यह पूरनमासी अमर लोक से आई है। बंदीछोर कबीर साहिब ने पूनम का व्रत ही श्रेष्ठ बताया है। अन्य व्रत तो आते-जाते रहते हैं, पर पूनम का व्रत मुक्ति का दाता है।

धर्मदास जी ने फिर साहिब से कहा कि मुझे पूनम व्रत का महात्म बताओ।

साहिब ने कहा कि हे धर्मदास, यह व्रत मुझे परम पुरुष ने दिया है। यह व्रत सुरति से होता है। इस दिन सुरति को नाम में समाए रखो। इससे सकल पाप समाप्त हो जाते हैं। जो पूनम का व्रत करता है, उसके सारे पाप समाप्त हो जाते हैं। वो काम, क्रोध, लोभ, निंदा, ईर्ष्या भाव आदि अवगुणों से दूर हो जाता है। वो सद्गुरु के चरणों में मन लगाकर कर्म और भ्रम से परे हो जाता है। वो हमेशा सत्य शब्द में समाकर रहता है और फिर गर्भवास में नहीं आता।

धर्मदास जी पूछ रहे हैं कि जागरण किस तरह करना चाहिए?
साहिब कह रहे हैं कि जागरण ऐसा हो कि सुरति साहिब में समाई रहे और मन भटके नहीं। जागरण बड़ी श्रद्धा से होना चाहिए। सारी रात नींद न आए और नाम भजन चलता रहे। प्रेम सहित जागरण करने वाला निश्चय ही अमर लोक को जाता है। जो पूनम को छोड़कर अन्य व्रत करता है, वो भेद को नहीं जानता है, इसलिए कल्याण नहीं हो पाता। यह पूनम का व्रत परम पुरुष को प्यारा है। जो पूनम का व्रत करता है, सब सिद्धियाँ उसके घर में वास करती हैं। वो फिर गर्भवास में नहीं आता।

साहिब कह रहे हैं कि पूर्णिमा के दिन आरती करने से जो फल मिलता है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता है। करोड़ों शिवरात्रि में जागरण करे, करोड़ों एकादशी का फल पाए, सो फल एक पूर्णिमा व्रत का है। तीस दिन अगर मुसलमान कष्ट के साथ भूख, प्यास को सहकर रोजा रखे, अड़सठ तीर्थ घूम आए, अश्वमेघ यज्ञ के समान फल को प्राप्त कर ले, करोड़ों गौयें दान कर दे, वो फल एक पूर्णिमा के व्रत से मिल जाता है। पूर्णिमा के व्रत के दिन जो ध्यान करता है, उसे मैं सभी फल दे देता हूँ। नवों निधि उसे मिल जाती है। उसकी सब इच्छा पूर्ण हो जाती है और चारों पदार्थ दे देता हूँ। वेद, शास्त्र सब यही कहते हैं कि पूर्णिमा के समान कोई व्रत नहीं है।।

मौत के बाद

इंसान जीवन में बड़े मित्र बनाता है, बड़े अपने बनाता है। हरेक यह चाहता है कि ऐसा मित्र हो जो अंत तक साथ निभाए। जीवन-साथी में भी तो यही चाहता है कि बीच में धोखा न दे, अंत तक निभाए। अन्य मित्रों से भी यही चाहना होती है। एक सहारा ही तो चाहता है न। पर इंसान यह नहीं सोचता है कि जब इस संसार से चलना होगा तो आगे के लिए भी कोई सहारा बना लिया जाए, जो आगे भी हमारे साथ चल सके। क्योंकि यह तो हर कोई समझता ही है कि ये संसार के मित्र इस संसार तक ही साथ निभा सकते हैं।

आप विचार करें कि अब तो 100 साल भी नहीं कहा जा सकता है। यूँ कह लें कि 50 साल तक के जीवन के कई साथ ढूँढ़े जाते हैं, पर आगे के लंबे सफ़र के बारे में कोई कुछ नहीं सोचता है। वहाँ का कोई साथी नहीं बनाता है। कोई भी सद्गुरु रूपी उस आगे के सफ़र के सारथी की तरफ ध्यान नहीं देता है।

जब भी मृत्यु होती है तो पहले कपाट में प्राणों को इकट्ठा किया जाता है। दो-ढाई घण्टे इसमें लगते हैं। फिर वहाँ से यमराज के पास ले जाया जाता है। वहाँ उसका लेखा देखा जाता है। उसे भी दिखाया जाता है। उसकी एक रील बनी होती है। जीवन में कितना कुछ याद रहता है। यानी दिमाग में एक चित्त की रील है, जिसमें सब कैद होता है। यही चित्त की रील वहाँ दिखाई जाती है। यदि किसी को मारा तो सचित्र रिप्ले वगैरह में धीमी चाल में दिखाया जाता है; बताया जाता है कि देख ले, यह सब किया है। वहाँ कोई खाते वाली किताब लेकर नहीं बैठा है यमराज। चित्त की रील में सब कुछ फिट है। कहाँ पाप किया, कहाँ पुण्य किया, सब उसमें है। इस तरह कर्मानुकूल शरीर की प्राप्ति होती है। यदि पाप किये तो फिर नरक में कुछ देर के लिए भेजकर चौरासी में फेंका जाता है। इसलिए महापुरुषों ने जगाया कि गर्भ में किये हुए कौल को याद कर और पाप कर्मों से दूर होकर सद्गुरु की शरण ग्रहण कर।

'मन' रूप निरंजन किसी भी दशा में सुरति को आत्मा की ओर नहीं जाने देता क्योंकि वह अपनी सृष्टि में आत्मा को जीव बनाकर ही राज करता है। कबीर साहिब को निरंजन (मन) ने अपना परिचय देते हुए बताया है—

**मैं सिरजौ मैं मारऊँ, मैं जारौ मैं खाऊँ।**
**जल थल नभ में रमि रहा, मोर निरंजन नाऊँ।।**

मैं ही अमरधाम परमपुरुष का पंचम शब्द पुत्र हूँ।
मैं ही विमृढ़ वरदान लेकर, परमपुरुष से शापित हूँ।
मैं ही आद्यशक्ति-सह-हँसों को ले कालपुरुष कहाता हूँ।
मैं ही निरंजन अमरधाम के मानसरोवर से निष्कासित हूँ।
मैं 'मन' ही आत्मरूप तीन लोक में वासित हूँ।।

मैं ही आद्यशक्ति का पति शरीरों का रचियता हूँ।
मैं ही त्रिदेवों का पिता-गुरु और आराध्य हूँ।
मैं ही वाय ध्वनि से वेद-शब्द शून्य में ओंकार हूँ।
मैं ही वेदों में परमेश्वर और पंचतत्व आधार हूँ।
मैं 'मन' ही सृष्टि से परे रारंकार हूँ।।

मैं ही साकार-निराकार में विद्यमान हूँ।
मैं ही आलोकित ज्योतिस्वरूप सौर्य मण्डलों में व्याप्त हूँ।
मैं ही सप्त आकाशी और सप्तसागर पाताल हूँ।
मैं ही सृष्टि रचना लघु-प्रलय महाप्रलय का आधार हूँ।
मैं 'मन' ही सकल सृष्टि का करतार हूँ।।

मैं ही शून्य मण्डलों से परे घनघोर अंधकार हूँ।
मैं ही त्रिदेवों दशावतारों का विधाता ध्यान हूँ।
मैं ही आत्म शक्ति के बन्धन का जीवों में कर्म विधान हूँ।
मैं ही माया संग शरीरों में आत्मावरण और ज्ञान हूँ।
मैं 'मन' ही जीवात्मा की गुण अवगुण पहचान हूँ।।

मैं ही शुभ अशुभ और पुण्य-पाप का सृजक हूँ।
मैं ही तीरथ व्रत यज्ञ जप तप कर्म निर्माता हूँ।
मैं ही धर्म अधर्म के जीवन कर्मों का व्याख्याता हूँ।
मैं ही बैकुण्ठ और स्वर्ग नरक कर्मफल प्रदाता हूँ।
मैं 'मन' ही कर्म संचय स्रोत बन जाता हूँ।।

मैं ही एक उज्जवल पक्ष, दया करूणा का वरदान हूँ।
मैं ही जीवों में तम रूप काम-क्रोध की खान हूँ।
मैं ही तपस्वी ऋषि मुनि योगी का सिद्धि दाता हूँ।
मैं ही मनुष्य की मनोकामना, सुख-दुःख हो जाता हूँ।
मैं 'मन' ही जन्म-मरण के क्रम बनाता हूँ।।

मैं ही देव और दानवों का कर्ता जग संचालक हूँ।
मैं ही योग ध्यान में सिद्धि निधियों का वाहक हूँ।
मैं ही त्रिकुटि मध्य बसा, दसवें द्वार विराजित हूँ।
मैं ही एकादश अधर द्वार सद्गुरु ध्यान में बाधक हूँ।
मैं 'मन' ही आत्म मोक्ष में भ्रम कारक हूँ।।