मुख्य कंटेंट तक स्किप करें

कबीर साहिब का प्राकट्य

संवत्‌ १४५५ ज्येष्ठ शु ° पूर्णिमा सोमवार के दिन काशी के लहर तालाव में कबीर साहिब का प्राकटय हुआ था, महापुरुषों के जन्मोपर जो २ प्राकृतिक सुषुमाएँ दीखा करती है वे इनके जन्मपर भी कम नहीं थीं सभी प्राकृतिक दृश्य सन्त पुरुषों को विशेषताएँ बताते हए दीख रहे थे । उस समय जूलाहे नीमा नीरु नामक मुसलमान दम्पती आपको उस तालाब से उठा लाए एवं पुत्रकी भावनासे ओत प्रोत होकर आपका लालन पालन करने लगे, आपने बाल्यकाले में लोकोत्तर चरित्र दिखाये जो कि, महापुरुषों की बाल लीलासे स्वाभावसेही चमका करते है । बड़े होनेपर तात्कालिक देहलीके बादशाह सिकन्दर लोधीको दिव्य सिद्धियाँ दिखाने एवम्‌ अपने नामसे कमाल कमालीको जिन्दा कर देनेके बाद आप खूब चमके । आपकी सर्व धर्म विषयके युक्तियोंने अच्छा उच्च स्थान पाया जैसे मध्यस्थकी आवश्यकता थी वैसाही हुआ आपने यावत्स्थिति सांप्रदायिक द्वेष मिटानेकी सदा चेष्टा की । आपके सर्व श्रेष्ठ शिष्य श्री धर्मदासजी थे जिनके कि, वंशधर आज की उनके पंथ की गुरुआई कर रहे है तथा कमाल कमाली आदिके वंशधर भी आपके उप- देशोंका प्रचार कर रहे है । आज कबीर साहिब के पन्थके अनेकोंही ग्रन्थ है , जिनमें से अनेकों को उच्च कोटिके हिन्दी दर्शनिक साहित्य में संभाला जा सकता है पर एसा कोई भी ग्रन्थ नहीं था जिससे कि, दूसरे संप्रदायों के आक्षेपसे कबीर पंथकी रक्षा हो सके।

कबीर पन्थकी इस कमीको इस कबीर मन्शूरने पूरा कर दिया इसके लेखक महात्मा परमानन्दजी ने इसे इस प्रोढतासे लिखा है कि, इससे कबीर दर्शनके सिद्धांत साङ्गोपाङ्ग पुष्ट वहो जाते है ।